बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल का ताज़ा स्टेटस मुखिया कुरुवा


जीवन पर बनी फिल्म ‘बुरू-गारा’ को मिल चुका है राष्ट्रीय पुरस्कार
 




















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
दौड़ती-हांफती-भागती
तलाश रही हूं सदियों से निरंतर
अपनी जमीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ।

स्त्री के अस्तित्व की खोज करती यह काव्य पंक्तियां संताली व हिंदी कवयित्री निर्मला पुतुल की हैं। जद्दोजेहद की एक और मंजिल उन्होंने हासिल की है। जिसे पंचायती जबान में मुखिया कहा जाता है। बीती सदी के अंतिम दशक में धुमकेतु की तरह उभरी झारखंड की इस आदिवासी बाला ने साहित्य संसार के सभी तीसमारों को चकित कर दिया था। स्त्री, तिस पर आदिवासी। लेकिन साहस के पंख के सहारे उन्होंने कला, प्रतिभा और आंदोलन की उड़ान जारी रखी। तीन-चार किताबों, दर्जन भर पुरस्कारों और देशी-विदेशी कई भाषाओं में अनुवाद उनके नाम दर्ज होते गए। लेकिन धरती आबा बिरसा मुंडा को आदर्श मानने वाली झारखंड की यह बेटी महज साहित्य तक सीमित कैसे रहती। उसने ग्रामीण महिलाओं को उनका वाजिब अधिकार दिलाने के लिए पंचायत चुनाव में शामिल होने का निर्णय लिया। पहले से ही उनके जमीनी संघर्ष के अनुभव ने उनका साथ दिया। भारी मतों से जीत कर वह दुमका जिला की कुरूवा पंचायत की मुखिया बन गईं। उन्होंने 1037 वोट हासिल कर पुनिका टुडु और अनिल मरांडी को पराजित किया।

हौसले से किया संकटों को परास्त

निर्मला पुतुल का जन्म 6 मार्च, 1972 को हुआ। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इस संकट से पार पाने के लिए उन्होंने नर्सिंग का कोर्स किया। बाद में उन्होंने इग्रू से स्नातक की डिग्री हासिल की। ग्रामीण आदिवासी जीवन की त्रासदी ने उन्हें लिखने को प्रेरित किया। पहले संताली में उन्होंने कविता लिखना शुरू किया। देश की पत्र-पत्रिकाओं में जब उनकी कविताएं छपीं, तो तहलका मच गया। उसके बाद वह हिंदी में भी लिखने लगीं। उनके जीवन पर आधरित ‘बुरू-गारा’ नामक फिल्म बनाई गई है, जिसे 2010 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

नगाड़े की तरह बजते शब्द

उनके शब्द नगाड़े की तरह बजते हैं। यही वजह है कि भारतीय ज्ञानपीठ जैसे संस्थान से प्रकाशित उनके पहले कविता संग्रह का नाम भी ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ है। इसके बाद रमणिका फाउंडेशन ने उनका काव्य संग्रह ‘अपने की घर की तलाश में’ छापा। ‘फूटेगा एक नया विद्रोह’ उनका तीसरा संग्रह है। ओनोंड़हें में उनकी संताली कविताएं संगृहित हैं। उनकी कविताएं अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उडिय़ा, कन्नड़, नागपुरी, पंजाबी व नेपाली सहित अनेक भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं।

झोली में हैं कई राष्ट्रीय सम्मान

निर्मला के व्यक्तित्व और कृतित्व को कई पुरस्कार और सम्मानों से नवाजा जा चुका है। 2001 में उन्हें केंद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने ‘साहित्य सम्मान’ प्रदान किया। झारखंड सरकार ने 2006 में ‘राजकीय सम्मान’, तो 2008 में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, 2014 में हिमाचल प्रदेश हिंदी साहित्य अकादमी ने उन्हें सम्मानित किया। पहला शैलप्रिया स्मृति सम्मान समेत उन्हें मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान, भारत आदिवासी सम्मान और राष्ट्रीय युवा पुरस्कार मिल चुका है।

दैनिक भास्कर के रांची संस्करण में 15 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित











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गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

राजधानी की सड़कों पर लेक्चरर रिक्शावाला

























सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

कुड़ुख भाषा के विद्वान एडवर्ड कुजूर की जिंदगी की तरह ही उनके बिखरे बाल और दाढ़ी बेतरतीब है। हालांकि सांसों को वापस खीचने के यत्न में करीब 23 सालों से वे रोज पैडल चलाते हैं। लेकिन गढ़ाटोली, कोकर स्थित उनके किराये के घर वाले आंगन जितनी हरियाली भी उन्हें नसीब नहीं। गुमला के नटावल गांव से वे रांची परिवार के कई सपने लेकर आए थे। चार भाई-बहन के परिवार में एडवर्ड 1984 में एमए करने वाले इकलौते सदस्य बने। रांची विवि के जनजातीय भाष विभाग के पहले बैच के छात्र थे। प्रथम श्रेणी में जब उत्तीर्ण हुए तो उसी साल जेएन कॉलेज धुर्वा में जनजातीय भाषा पढ़ाने के लिए लेक्चरर के अस्थायी पद हेतु वेकैंसी निकली। एडवर्ड की लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद कुड़ुख के लिए नियुक्ति कर ली गई। वे अरसा का स्वाद आज भी नहीं भूले हैं, जब इस खुशखबरी पर उनके घरवालों ने गांव में बंटवाया था।

पहली नौकरी का पहला वेतन आज तक नहीं मिला

पहली नौकरी तो एडवर्ड कुजूर को मिल गई, पर उन्हें पहला वेतन आज तक नहीं मिल सका। अबतो उन्होंने आस भी छोड़ दी है। एक माह से दो माह, फिर एक साल से दूसरा साल। इस तरह वे छह वर्षों तक छात्र-छात्राओं को नि:शुल्क कुड़ुख भाषा व साहित्य पढ़ाते रहे, कि कभी तो उन्हें स्थायी किया जाएगा। लेकिन 1991 तक जब उनकी जेब पहले वेतन के इंतजार में खाली ही रह गई। इस बीच कॉलेज में नागपुरी और मुंडारी के लिए लेक्चरर पद सैंकशन हो गए, और इनके साथ वहां बहाल हुए इनके मित्र-संगी की नौकरी स्थायी हो गई, तो एक दिन वे चुपचाप कॉलेज छोड़कर घर आ गए।


रात भर सोचा, सुबह चलाने लगे रिक्शा

बिना त्याग पत्र दिए एडवर्ड ने कॉलेज जाना तो छोड़ दिया, लेकिन अब क्या करें। कर्ज लेकर घर की चूल्हा-चौकी कबतक चलती। इस बीच ग्रेजुएट पतरीसिया से लेक्चरर एडवर्ड की शादी 1989 में हो चुकी थी। बड़ा बेटा एगनासिस भी बड़ा हो रहा था। कुछ दिनों शिक्षा परियोजना में जुड़े, लेकिन बात नहीं बनी। सर्दी की एक रात वे यही सोचते रहे कि क्या किया जाए। जब सूरज निकल आया, तो रिक्शा गैरेज जा पहुंचे। तब सेहत थी। दिनभर के परिश्रम का फल जब पत्नी को शाम में पकड़ाया, तो पतरीसिया बहुत खुश हुई। लेकिन ज्योंही उन्हें पति के रिक्शा चलाने की बात पता चली, रोने लगीं।

आइटीआई बेटा नौकरी से, पिता वृद्धा पेंशन से वंचित

एडवर्ड ने कुछ सालों बाद अपना रिक्शा खरीद लिया। क्योंकि आरयू वीसी से लेकर राज्यपाल तक का दरवाजा खटखटाया, स्थायी नौकरी के लिए महज आश्वासन के उन्हें कुछ न मिला। जब दूसरा बेटा पवन उनकी जिंदगी में आया, तो पत्नी ने भी प्रायवेट काम पकड़ लिया। आज वह हॉली क्रॉस में साफ-सफाई का काम करती हैं। बड़े बेटे को किसी तरह आइटीआइ कराया। पर उसकी किस्मत में भी सरकारी नौकरी हाथ न आई। आर्मी कैंप में वह अस्थायी तौर पर जुड़ा है। एडवर्ड कहते हैं कि नौकरी में रहते तो रिटायर हो गए होते। पर जीवन में ऐसा कहां, पर न ही उन्हें वृद्धा पेंशन मिलती है, न राशन।

दैनिक भास्कर के रांची संस्करण में 3 दिसंबर के अंक में संपादित अंश प्रकाशित



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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

धरती आबा बिरसा के गांवों में आदिवासी कर रहे फिल्म उलगुलान

राम-रहीम नाम के कथित बाबाओं को दे रहे जवाब




 


















शहरोज़ की क़लम से


कभी उलिहातू गांव के बिरसा मुंडा ने अबुआ दिशुम अबुआ राज के लिए उलगुलान किया था। वो 19वीं सदी के आखिरी वर्षों की घटना है। अब 21 वीं सदी में उलिहातू के पास के जोरको गांव की लड़की माकी मुंडा नया उलगुलान कर रही है। प्रोजेक्ट बालिका उच्च विद्यालय, अड़की में नवीं क्लास की यह छात्रा फिल्म सोनचांद में नायिका है। इसने न कभी कैमरा का सामना किया, न ही कभी मुंबई ही गई। लेकिन फिल्म में आदिवासी धाविका की केंद्रीय भूमिका उसे बहुत रास आ रही है। दरअसल उसके उत्साह की वजह है, कि पहली बार आदिवासी ही आदिवासियों के लिए आदिवासियों पर फिल्म बना रहे हैं। जिन्होंने कभी अभिनय नहीं किया है, इसमें प्रमुख किरदारों को जी रहे हैं। पेशे से चालक तिर्की बैठा उर्फ फुचो दा एक ऐसे ही अहम कलाकार हैं। इसके अलावा और भी कई नाम हैं, जिनकी पर्दे पर आने की हसरत पूरी होने जा रही है। नये लोगों में अधिकतर गुनतुरा गांव के लोग हैं। इनमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक शामिल हैं। वे खुश भी इसलिए हैं कि उनके ही गांवों में, उनकी ही भाषा-बोली में फिल्म बन रही है। बिर बुरु ओम्पाय मीडिया एंड इंटरटेनमेंट के बैनर तले फिलहाल खूंटी के अड़की प्रखंड के विभिन्न स्थानों पर इसकी शूटिंग चल रही है।

10 जिलों के आदिवासी कलाकार
 
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, पूणे के ग्रेजुएट व निर्देशक रंजीतउरांव ने बताया कि राज्य के करीब 10 जिलों के आदिवासी कलाकारों को फिल्म में मौका मिला है। इसमें मार्शल बारला, रीमा ठाकुर, प्रकाश मसीह सोय और राजन कुजूर (खूंटी), आभा मांझियान, अंजित अरमान, बैजंती सरदार, छवि दास, गणेश ठाकुर हांसदा , जीतराई हांसदा, मानु मुर्मू, नरसिंह टुडू, फुलमनी सोरेन, पोरान हांसदा, राहुल सिंह तोमर, रितेश टुडू, टीकाराम हांसदा, विमल भंज और विनोद मांझी (जमशेदपुर), रवि लकड़ा, शैलजा बाला, संदीप कुमार, सुदीप केरकेट्टा, सुशील केरकेट्टा (रांची), तिलक सिंह मुंडा, राकेश गाड़ी (बोकारो), शीतल बागे, विमल भंज (चाईबासा), कुमेश कुमार मंडल, सागर कुमार, कुमार अश्विनी, सबीना (धनबाद), ब्रजेश उरांव (गुमला), पवन कुमार (लोहरदगा), लखीचरन सिंह मुंडा (सरायकेला खरसावां) और तारकेलेंग कुल्लू व पुरुषोत्तम कुमार (सिमडेगा) शामिल हैं।
टेक्निकल टीम में भी आदिवासी
 
मुंडारी के साहित्यकार जोवाकिम तोपनो व उनकी पत्नी मरियम तोपनो, हिंदी व संताली के लेखक शिशिर टुडू भी फिल्म में भूमिकाएं कर रहे हैं। जबकि मानु मुर्मू, एस मृदुला, शीतल बागे, सुनील हांसदा, रितेश टुडू और जीतराय हांसदा जैसे रंगकर्मी भी फिल्म में नजर आएंगे। फिल्म की टेक्निकल टीम में भी आदिवासी शामिल हैं। कैमरा यूनिट में रांची के प्रवीण होरो, सुरेंद्र कुजूर हैं तो साउंड रिकॉर्डिंग का जिम्मा सत्यजीत रे फिल्म इंस्टीट्यूट के मंजुल टोप्पो और जेवियर मॉस कम्युनिकेशन के बसंत अभिषेक बिलुंग व विकास पर है। महेश मांझी तकनीकी को ऑर्डिनेशन संभाल रहे हैं।
सरहुल तक प्रदर्शित होगी सोनचांद
 
निर्माता वंदना टेटे ने बताया कि शूटिंग 40 दिनों तक चलेगी। सरहुल तक फिल्म प्रदर्शित करने की योजना है। उन्होंने कहा, हमारे पास एक समृद्धशाली कला परंपरा है। हमारे लोग नैसर्गिक रूप से नृत्य, गीत और संगीत में पारंगत होते हैं। परंतु सिनेमा में आज तक झारखंडी लोगों को अवसर नहीं मिला। सोनचांद में 80 फीसदी कलाकार आदिवासी हैं। फिल्म समुदाय के सहयोग से बन रही है। छह सितंबर से दूसरे शेड्यूल की शूटिंग शुरू हुई है। इसमें बड़ी संख्या झारखंड के लोगों की है ही, बाहर के भी कुछ चुनिंदा कलाकार एक्टिंग कर रहे हैं। रांची व इसके आसपास में फिल्मांकन के बाद आजकल यूनिट खूंटी के अड़की प्रखंड के गांवों में है। रांची के मशहूर रंगकर्मी अशोक पागल की भी इसमें बड़ी दमदार भूमिका है। फिल्म की टेक्निकल टीम में फिल्म इंस्टीच्यूट, पुणे से प्रशिक्षित नीरज समद, कोलकाता के राजकुमार के अलावा मुंबई से पहुंचे कैमरामैन कृष्णदेव भी हैं।


दैनिक भास्कर, रांची के 22 सितंबर 2015 के अंक में प्रकाशित





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रविवार, 6 सितंबर 2015

लड़कियों के जीवन में विलचन फैला रहीं उजियारा

अभावों में गुजरा बचपन, मैट्रिक से आगे न पढ़ सकीं 

पर दूसरों को शिक्षा व हुनर का पढ़ा रहीं  पाठ








 














सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


संघर्ष के बल शिखर तक पहुंचने की आपने कई कहानी पढ़ी होगी। लेकिन अभावों से लड़कर दूसरों को आत्मनिर्भर बनाने की मिसाल निसंदेह कम मिलती है। बात आनंदपुर, रांची की विलचन एक्का की है, जिनका बचपन घोर अभाव में बीता। हर छुट्‌टी के दिन पौ फटने के साथ ही वह घर से जंगल के लिए निकल जाती थीं। दिनभर घूम-घूमकर वह करंज, महुआ और इमली इकट्‌ठा कर बाजारों में बेचतीं। इससे कॉपी-किताब खरीद लातीं। पढ़ाई के दौरान ही सिलाई-बुनाई और कढ़ाई के गुर सीखती रहीं। जब किसी तरह मैट्रिक कर लिया, तो उनके लिए कुछ करने की ठान ली, जो बच्चे गरीबी के कारण पढ़ नहीं पाते, या हुनर के अभाव में जिनके सामने जीविकोपार्जन की समस्या रहती है। आज विलचन की जलाई शिक्षा और हुनर की मशाल से ढेरों जिंदगियां रौशन हैं।

बेसहारा बच्चियां का तालीमी सहारा

विलचन ने अपने गृहग्राम खरसीदाग में 2008 में आवासीय विद्यालय खोला। इसमें 50-50 लड़के-लड़कियाें को नि:शुल्क पढ़ाने का संकल्प था। लेकिन आर्थिक संकट के कारण स्कूल अधिक दिनों तक न चल सका। उसे बंद करना पड़ा। लेकिन 2007 में शुरू अनाथ, आदिवासी व बेसहारा लड़कियों की मुफ्त कोचिंग क्लासेस आज भी जारी है। इसमें कक्षा आठ से मैट्रिक तक लड़कियों को पढ़ाया ही नहीं जाता, एवीआई की मदद से कॉपी, किताब और पेंसिल-कलम भी उपलब्ध कराया जाता है। इन बच्चों को पढ़ाने का दायित्व सुसन्ना कुजूर और सविता कुमारी बखूबी निभाती हैं। इसका लाभ खरसीदाग के अलावा कुदासूद, सहेरा, कुटियातु, तेतरी, मालटी, डाहुओली और चरनाबेड़ा गांवों को मिल रहा है।

दो हजार से अधिक हो चुकीं स्वावलंबी

विलचन ने 1994 में आरोही नामक समाजिक संस्था की स्थापना खूंटी में की। आसपास के गांवों की महिलाओं को कैंडल, साबुन, आर्टिफीशियल ऑरनामेंट, लाह की चूड़ी और गुलदस्ता बनाना सिखाने लगीं। जब लोगों का सहयोग मिलने लगा, तो उन्होंने रांची स्थित आनंदपुर के अपने खपरैल घर को ही केंद्र बना लिया। यहां रांची के स्लम की महिलाएं जुड़ीं। अब प्रशिक्षण का दायरा बढ़ा ही, प्रशिक्षणार्थियों की संख्या भी बढ़ी। उन्होंने 250 स्वयं सहायता समूह का गठन करवाया। इनकी निगरानी में अब तक दो हजार से अधिक महिलाएं पापड़, मशरूम उत्पादन, कैंडल मेकिंग और सिलाई-कढ़ाई सीखकर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। अपने-अपने स्तर पर काम शुरू कर आज घर व परिवार की आर्थिक संबल हैं।


भास्कर, रांची के छह सितंबर 2015 के अंक में प्रकाशित










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शनिवार, 5 सितंबर 2015

मोबाइल से लड़कियां कर रहीं जन संचार क्रांति

घूम-घूम दुख-दर्द बटोर उसका कर रहीं समाधान


 

















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

अकबर इलाहाबादी ने कहा था, खीचो न तीर कमानों से, न तलवार निकालो / दुश्मन हो मुकाबिल तो अखबार निकालो। लेकिन निर्मला, प्रियशीला, अमिता, शांति, हलीमा, ज्योति, शिखा और बसंती जैसी लड़कियों के पास इतने संसाधन न थे कि अखबार निकालती। उन्होंने अंधविश्वास, जातिवाद व संप्रादायिकता जैसे शत्रुओं और शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली- पानी, मजदूरी और मानवाधिकार की समस्याओं से लड़ने के लिए अपने-अपने मोबाइल को ही सहारा बना लिया। बाद में समूह की मदद से छोटे-छोटे कैमरे खरीदे और शहर के स्लम और गांवों में घूम-घूमकर दर्द, दुख और परेशानियों को बटोरना शुरू किया। उन्हें शूट कर संबंधित अधिकारियों को जब दिखाया, तो उन्होंने इनके हौसले को सराहा और तुरंत समस्याओं का हल भी कराया। इस तरह इनका कारवां चल पड़ा। इंडिया अनहर्ड के बैनर तले अब सूबे के 24 ज़िलों में इनकी टोलियां बन चुकी हैं। हर जिले में 2-2 सामुदायिक संवाददाता हैं, जो मुद्दा आधारित विडियो बना रहे हैं। रांची में निर्मला एक्का और प्रियशीला सक्रिय हैं।


केस 1
पिछले नवंबर में निर्मला एक्का को पता चला कि भगतकोचा में छह साल की बच्ची के साथ 12 साल के बच्चे ने बेइज्जती करने की कोशिश की। वे वहां पहुंची। पीड़िता और उसकी मां का बयान रिकॉर्ड किया। आरोपी के परिजनों से बात करनी चाही, लकिन वे बोले जो करना है, कर लो। थाना से छुड़वा लेंगे। निर्मला अरगोड़ा थाना पहुंची, सारा मामला बताया। रिकार्ड सुनवाया। इसके बाद उसी दिन ही आराेपी की गिरफ्तारी हो गई। मामला ज्वेलाइन कोर्ट में है।

केस 2

अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद रांची के कुछ विस्थापितों को चिरौंदी में बसाया गया है। लेकिन यहां न पानी की कोई व्यवस्था की गई, न ही ही बिजली कनेक्शन ही इनके घरों में था। ऐसे में लोगों को खासकर महिलाओं और पढ़नेवाले बच्चों को काफी परेशानी हो रही थी। निर्मला ने सभी प्रभावितों से बातचीत की। इसकी रिकॉर्डिंग तत्कालीन मेयर रमा खलखो और राज्यसभा सदस्य परिमल नथवाणी को दिखाया। इसके बाद बिजली-पानी नसीब हो सका।

जब निर्मला पर चली गोली

इन कार्यकर्ताओं को कई बार विपरीत स्थितियों का भी सामना करना पड़ता है। लेकिन इनके जज्बे ने उसे धार ही दी है। एजी कॉलोनी में जमीन दलालों ने किसी आदिवासी की जमीन पर कब्जा कर लिया। वहीं उसके लोग भूमिस्वामी से लड़ने भी पहुंच गए। संयोग से निर्मला वहां मौजूद थीं। उन्होंने तुरंत ही अपने मोबाइल से उसे शूट करने लगी। इस बीच जमीन दलाल के आदमी ने उन्हें देख लिया और गोली चला दी। लेकिन निर्मला बेहद फुर्ती से कुएं की ओट में बैठ गईं, जिससे वह बच गईं। बाद में आरोपी पकड़ा गया। अब जेल में है। खूंटी में अमित सोलरलाइट नहीं लगाए जाने पर लोगों की शिकायत रिकॉर्ड कर रहे थे। तभी मुखिया और उसके लोग पहुंच गए और अमित का कैमरा तोड़ दिया। मुखिया फंड से ही लाइट लगनी थी। बाद में आरोपियों ने माफी मांगी।

अनसुने भारत की कथा: आनंद हेम्ब्रोम

इंडिया अनहर्ड का उद्देश्य पहले कभी भी नहीं सुनी व देखी गई स्टोरीज़ को सामने लाना है.। ऐसे प्रसंग, घटनाएं, मुद्दे जिन्हें मुख्य धरा का मीडिया कवर नहीं करता। ऐसी स्टोरीज़ जो आपको एक सामुदायिक संवाददाता (Community Correspondent) के रूप में देखनी चाहिए। झारखण्ड में विडियो स्टोरीज़ जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य फोकस के मुद्दे हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अमलीकरण का ज़मीनी हकीक़त जानने के लिए विडियो वोलेंटीयर्स का राष्ट्रिय विडियो डॉक्यूमेंटेशन अभियान (पास या फेल) चल रहा है। (राज्य समन्वयक)


भास्कर रांची के चार सितंबर 2015 के अंक में प्रकाशित



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सोमवार, 10 अगस्त 2015

डायन के नाम पर पांच महिलाओं की हत्या के बाद का तीन मंज़र



सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से





फोटो: रमीज़


शोक के समुंदर में डूबे मरईटोला की एकांत कथा


मांडर थाना से चंद क़दम पर वो कच्ची सड़क उस गांव का पता देती है, जिसकी दर्द भरी कहानी बहुत पुख्ता है। कंजिया के फैले हरे-भरे खेतों में काम करती महिलाएं रविवार को बिना गीता गाए रोपनी कर रही थीं। शोक गीत का अंतरा उनके अंदर कहीं रीत रहा होगा। इस गांव का ही तो विस्तार है, मरईटोला, जहां शुक्रवार को गहराती रात के साथ डूबी पांच महिलाओं की चीख ने कंजिया से लेकर मांडर तक सन्नाटे को भर दिया था। जिसके बादल रविवार शाम और घने थे। अखड़ा से पहले के पीपल पर टंगा तन्हा डोलता झूला दहशत को बढ़ाता ही मिला। शुक्रवार शाम तक गांव के बच्चों की ठिठोली इसके हिंडोले के साथ गगन चूम रही थी, लेकिन उसके रात में ढलते ही मानो गांव का यौवन ही ढल गया। कभी शीतल छांव देने वाले शाल, सखुवा, पीपल व कटहल के पेड़ की गहनता डरावनी हो चुकी है। आंगन में बिखरे पत्ते देख मदनी की बहू की आंखों में बादल उमड़ आया। उस रात गांव के लड़कों ने उनके घर की खुशियां ही तो बिखेर दीं। वो लड़के जो उनके पति करम देव के हमजोली थे। जो काकी, मौसी व चाची बोलते थकते नहीं थे, उन्हीं काकी की जान लेते उन्हें देर न लगी। करम बोला, कोन चाहेगा अब रहना यहां। पर जाएं, तो जाएं कहां।
गांव की चारों दिशाओं से चुनकर अबला पांच स्त्रियों के जिस्म को अंधविश्वास की धार से धड़ से अलग कर दिया गया था। धार की चमकती दहशत अब भी उनके बच्चों व परिजनों के चेहरे पर चमकती है। जिसे गौर से पढ़ा जाए तो साफ तहरीर दिख जाएगी, अब देस हुआ बेगाना। नशे में धुत युवाओं की पहली शिकार हुई एतवारी के दोनों बेटे सुकुमार व आशिष कहते हैं, नहीं रहेंगे भैया अब गांव में। बोलिये तो, दोस्त ने मां को मार दिया, अपने मामा ने ही उनका साथ दिया। मल्टी, मांडर, लुंडरी, नामकोम और जोरिया से आए रिश्तेदारों से घिरीं जसिंता की दोनों बेटियां अनिमा व अन्नू कहती हैं कि अब गांव में क्यों रहें, कैसे रहें। जब पड़ोसी ही, अपने भाई-चाचा ही दुश्मन बन बैठे। कभी ऐसा नहीं सोचा था। पर जब रात के साथ आफत पहुंची, तो उसने अंधेरे में भी अपनों के नंगापन को साफ दिखा दिया।
जसिंता के घर से पीछे से घूमकर जब गांव की चौहद्दी नाप भास्कर टोली घटनास्थल के पास पहुंची, तो लाठी टेक बार-बार चक्कर लगाती एक बुजुर्ग महिला से सामना हुआ, मानो समूचे गांव का बोझा उठाए हो। उधर, झूले के पास आकर बार-बार उसे निहारती बच्चों की टोलियां, फिर एक-दूसरे की आंखों में देख लौट गईं। मरईटोला का आज यही सच है, गांव के अधिकतर युवा गिरफ्तार हो चुके हैं, और कुछ फरार हैं। घरों में बुजुर्ग, औरते और बच्चे हैं। हर आंखें एक दूसरे में कुछ टटोलती हैं। कहती कुछ भी नहीं। कहना चाहती हैं कि उनके धुमकुड़िया की तरह गांव का परस्पर विश्वास महज एक रात के बवंडर में खंडहर कैसे हो गया।


एतवारी के बेटे थाना पहुंच जाते तो बच सकती थी मां

रांची। डायन बिसाही के आरोप में सेंदरा कर दी गईं पांच महिलाओं के दर्दनाक हादसे के तीसरे दिन के सन्नाटे को मरईटोला में कुछ यदि तोड़ता है, तो वो पुकार है, जो उनके बेटे व बेटियों के दिल से निकलती है। गांव में सबसे पहले विधवा मां-बेटी रतिया व तितरी का घर है। आंगन के तीन ओर घर बने हैं। इसके एक कमरे में मां-बेटी रहती थीं। रतिया के तीन बेटे बाहर रहते हैं। रांची में रह रहे छोटे बेटे परथो की पीड़ा है कि डेढ़ साल पहले छोटी सी जमीन को लेकर दिवंगत पिता एतवा खलखो के भाई भांवरा के पोतों सचिन व संदीप से गर नोकंझोंक न हुई होती, तो शायद इतनी बड़ी घटना न होती। हालांकि अब वो दोषियों को फांसी तक दिए जाने की मांग करते हैं। वो उस कमरे का दरवाजा दिखाते हैं, जिसे कुल्हाड़ी से तोड़कर संदीप व सचिन उनकी मां व बहन को ले गए। वे जब चिल्लाने लगीं, तो बड़ा बेटा शिबी आंगन में आए, पर उनके गर्दन पर भी भीड़ ने तलवार रख दी। वे दोनों चीखती रहीं, मिन्नतें करती रहीं, पर हिंसक भीड़ उन्हें पशु के समान खसीटते हुए, अखड़ा कटहल पेड़ के नीचे ले आई, फिर कटहल की तरह ही उनके टुकड़े कर डाले। हां उसके बाद उनके बेटे को जरूर बुलाया, देखो डायन बिसाहू का हश्र।
धुमकुड़िया के सामने चार बांस की दूरी पर बांसों के झुरमुट में मतियस खलखो का पक्का मकान है। लेकिन उसके दायीं ओर उनके छोटे भाई बरनाबस का मिट्‌टी का घर। मतियस व उनकी छोटी बेटी अन्नु की बस आंखें बोलती हैं। होली फैमिली में नर्स बड़ी बेटी अनिमा सिलसिलेवार कहानी कहते हुए उस रात के अंधकार को चीरती है। भैया जोसेफ फौज में हैं। मां जसिंता ने भले न पढ़ा हो, उसने हम सभी को पढ़ाया, जगरानी बारहवीं में, तो छोटी बहन अन्नु दसवीं में है। लेकिन उनके चाचा के लड़के पढ़ नहीं सके। यदि पढ़े होते, तो उस रात अपनी ही चाची की अंधविश्वास के नशे में आकर हत्या न करते। बीच-बीच में आंसू पोछते हुए, अनिमा कहती है, रात अचानक सभी आ धमके। मां को ढूंढने लगे। मैं मां के साथ सोयी थी। उन्हें जब घसीटने लगे, तो हमने विरोध किया। बाबा को पहले ही धक्का देकर वे अलग कर चुके थे, पर उनकी हिम्मत अब भी भीड़ से संघर्ष कर रही थी। मां को बाहर लाकर सामने के बांस के नीचे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। इसके बाद उसे घसीटते हुए, धुमकुड़िया तक जब ले जाने लगे, इस बीच बाबा ने मांडर, रातू, चान्हो व खलारी थाना फोन किया। कहीं पुलिस गश्त पर गई थी, तो कहीं का फोन बंद मिला। तो हम दोनों बहन ने चुपचाप से अपनी स्कूटी निकाली। पगडंडियों पर कुछ दूर ले जाने के बाद स्टार्ट की, ताकि आवाज न हो। मांडर थाना पहुंचे, पुलिस तुरंत हमें साथ लेकर गांव पहुंची। लेकिन उग्र भीड़ के भगाने पर जीप छोड़कर पुलिस भाग खड़ी हुई। जीप में हम दोनों बहन और चारों तरफ आक्रामक मजमा। वे लाठी-डंडों से हमें मारने-पीटने लगे। बाबा के सख्त हस्तक्षेप के बाद हम किसी तरह वहां से भागे। आगे बोली, अगर एतवारी के बेटे थाना पहले पहुंच जाते, तो उनकी मां की जान बच सकती थी। लेकिन उन्हें इतना संतोष है कि उन्होंने उन दो और औरतों को बचा लिया, जिन्हें भीड़ मारना चाहती थी। वे कौन औरतें हैं, इनके बारे में वे चुप हो गईं।



नहीं छटा अंधविश्वास का अंधेरा 

 
रांची। मराईटोला में सन्नाटा ही नहीं बोलता, एक चीज और बार-बार चीखती है, वो है अंधविश्वास। डायन बिसाहू के इल्जाम में पांच महिलाओं की हत्याओं के बावजूद अंधविश्वास का घटाटोप कायम है। जिनकी मां, बहन व पत्नी की हत्या की गई, वो सिरे से डायन-वायन जैसे किसी भी वजूद से इंकार करते हैं, लेकिन गांव के दूसरे बुजुर्ग व महिलाएं स्वीकार करती हैं कि डायन बिसाहू होती हैं। उनके अच्छे से गांव को उनकी बुरी नजर लग गई है। गांव के पुरुष तो दिखते नहीं। घरों में महिलाएं और बूढ़े ही रह गए हैं। इनमें से किसी से बात कर लीजिए, किसी को भी इन हत्याओं का पछतावा तक नहीं है। जबकि अस्सी से सौ घरों की इस बस्ती में साक्षरता दर बहुत अच्छी नहीं, तो खराब भी नहीं है। लड़कियां तक पढ़ रही हैं, जाॅब कर रही हैं।

अखड़ा के पास ही दो बुजुर्ग दंपती रहते हैं। उनमें से महिला तो तीखे ही लहजे में सवाल करती है कि कब तक चुप रहते। उन जैसे कई लोग हैं, जो घटना को सही नहीं, तो गलत भी नहीं कहते। भास्कर टीम ने कई लोगों से जानना चाहा कि आखिर वो ओझा या भक्त या भक्तिन कौन है, जिसने बताया कि गांव के तेरह वर्षीय छात्र विपीन की मौत पीलिया से नहीं, बल्कि डायन बिसाहू की करतूत थी। वो कौन है, जिसने बताया कि इसकी दोषी अमुक-अमुक महिलाएं ही हैं। कुछ लोगों ने यह तो बताया कि भक्तिन ने बताया था कि एतवारी ने बच्चे को खाया है। जब एतवारी को पकड़ा गया, तो उसने बाकी चार और महिलाओं के नाम बताए, जिनकी हत्याएं की गईं। लेकिन एतवारी का नाम बताने वाली भक्तिन कौन थी, इसपर हर जबान चुप।


फोटो: रमीज़













भास्कर, रांची के 10 अगस्त 2015 के अंक में प्रकाशित



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