बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 6 अप्रैल 2016

शहीद तंज़ील के ख़ानदान की बिटिया जब बोली....

तंज़ील अहमद काश तुम लौट आते !
















सीमा आरिफ़ की क़लम से

तारीख़ 3 अप्रैल। रात 12 बज कर 40 मिनट। तारीकियों की आग़ोश से फायरिंग की आवाज़। जो खामोशियों का सीना चीरती हुई जब मेरे गावं सहसपुर (बिजनौर) तक पहुँचती है, तो उस वक़्त दिल्ली से सहसपुर आए हुए मेरे भाई, अम्मा जाग रहे होते हैं। अम्मा, भाई से कहती है, इतनी रात को किस की बारात आई है।इससे पहले कि भाई कोई जवाब दे पाते, अचानक बाहर से कोई आकर कहता है, तंज़ील के बच्चे अभी कार से रोते हुए निकले हैं, सुना है उन्हें ( तंजील ) गोली मार दी गई है!  ये ख़बर पूरे गांव पर बिजली बन कर डराती है। जो पौ फटने तक गांव के हर घर-आंगन को अश्कबार कर जाती है।

एनआईए के उपाधीक्षक मोहम्मद तंज़ील को बाइक पर सवार दो व्यक्तियों ने उस वक़्त गोलियों बरसा कर हमेशा के लिए खामोश कर दिया, जिस समय वह अपनी भांजी को विदा कर के वापस अपने घर दिल्ली आ रहे थे। हमलावर उन पर 24 गोलियां बरसाते हैं और उनकी पत्नी भी उस हमले में गम्भीर रूप से घायल होती हैं। तंजील मौक़ा--वारदात पर ही मालिक--हक़ीक़ी से जा मिलते हैं जबकि उनकी पत्नी इस मज़मून के तहरीर किये जाने तक अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ रही हैं। काफी देर तक उनके दो मासूम बच्चे मदद के लिए चीखते-चिल्लाते रहते हैं। पीछे से उनके बड़े भाई की गाडी पहुँचती हैं। सामने की सीट पर रक्तरंजीत छोटे भाई की लाश। तड़पती हुई बहु। घबराए डरे सहमे बच्चे। कोई भी होश खो बैठे। लेकिन उन्होंने किसी तरह खुद को सम्भाला। एक ज़िंदगी तो बचाई जा सकती है इस उम्मीद के साथ डॉक्टर की तलाश में निकलते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस मौके पर जब पहुंचती है, तब तक पूरे क़स्बे में उथलपुथल मच चुकी होती है। पुलिस की चौकी करीब होने का भी कोई फायदा इस अफसर के परिवार को नहीं मिल मिल पाता है और हमलावर फरार होने में कामयाब हो जाते हैं।

मैं अपने इस जांबाज ईमानदार पुलिस अफसर की निर्मम हत्या पर नि:शब्द हूँ। और आज तीसरे दिन गुजर जाने के बाद भी उनकी अफसोसनाक मौत को ज़ेहन से निकाल नहीं पा रही। उसके पीछे उनसे मेरी ज़ाती पहचान, रिश्ता, एक गाँव, एक मोहल्ले के होने का सबब हो सकता है। लेकिन दुनिया का हर सच्चा इंसान इस दर्दनाक हादसे से बेचैन है। मेरे होश सँभालने के बाद सहसपुर में दो बार घर आए थे। एक बारी अपनी शादी की दावत देने के वास्ते आये थे शायद और दूसरी बार अम्मी से मुलाक़ात के लिए। एनआईए में रहकर उन्होंने कई अहम केसों में अहम भूमिका निभाई थी। इस समय पठानकोट हमले की भारतीय जांच दल के हिस्सा थे। गाँव में सब लोगो को सिर्फ इतना भर मालूम था कि वह बीएसएफ़ में हैं। उनकी वालिद की आमदनी उतनी नहीं थी कि वह अपने दोनों लड़कों को किसी महंगे स्कूल में तालीम दिला सकते.. तंज़ील अहमद और उनके बड़े भाई ने दिल्ली आकर अपने बलबूते कॉलेज में दाखिला लिया। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए खुद ज़मीन बनाई। सपनों को पूरा करने के लिए आस्मां बनाया। अपनी ईमादारी, काबिलियत और मेहनत के बल पर उन्हें एनआईए का उपाधीक्षक नियुक्त किया गया था। खबरें आई हैं कि उर्दू फ़ारसी पर पकड़ मज़बूत होने के बायस वो पाकिस्तानी दहशतगर्दों के कोड वर्ड समझ उनके मंसूबो को भाप जाते थे। जिससे आतंकवादियों को पकड़ने में उनकी ख़ास भूमिका रहती थी।

लेकिन अफ़सोस कि इस भ्रष्ट तंत्र में एक ईमानदार अफसर, एक ज़हीन इंसान को सम्भलने तक का मौका नहीं दिया गया और उसकी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश कर दी गई। तंजीम अहमद ने देश के सिस्टम में रहकर जो क़ुरबानी दी है क्या उनका कोई वजूद नहीं था? क्या देश की प्रशासनिक व्यवस्था इतनी लचर है कि एक जांबाज़ अधिकारी इतनी इतनी आसानी से मौत की नींद सुला दिया जाए।
अब तक गृह मंत्रलय से किसी का कोई बयान नहीं आया है। सरकार की तरफ से कोई भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होता है। फ़र्ज़ी टवीट को अंतिम सत्य मान कर देश को पठानकोट आतंकी हमले के संबंध में गुमराह करने वाले गृह मंत्री उस केस की जांच कर रहे एक ईमानदार अधिकारी की नृशंस हत्या पर खामोश क्यों हैं??

मरहूम तंज़ील किसके लिए खतरा थे ? किसकी पूर्वाग्रही नीतियों के खुलने का डर था जो उनकी शहादत से छिप जाएगा ?? ऐसा माना जा रहा है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है कि तंजील अहमद की शहादत ने शहीद हेमंत करकरे की शहादत की याद दिला दी है। जब उनके साथ इस देश ने विजय सालस्कर और नारायण आप्टे के रूप में दो और जांबाज़ सपूतों को खोया था। शहीद हेमंत करकरे किनकी आँखों की किरकिरी बन चुके थे ये वो लोग बेहतर जानते हैं, जो देश की राजनीतिक सामाजिक स्थिति पर गम्भीर नज़र रखते हैं.

इस घटना के गर्भ से कई सवाल पैदा होते हैं:
क्या उनके परिवार के अलावा अन्य कुछ लोग भी जानते थे कि वो कितने दिन के अवकाश पर है?
वह अपनी छुटि्टयाँ खत्म करने के बाद वापस दिल्ली कब आनेवाले हैं?
क्या तंज़ील अहमद के पास ऐसे सबूत थे जिससे वह कुछ उजागर कर सकते थे?
क्या तंज़ील अहमद अपनी टीम के उस बयान से असहमत थे जिसमें उन्होंने पाकिस्तान से आकर पठानकोट आतंकी हमले में पकिस्तान के हाथ होने से इनकार किया था?
क्या इसे मात्र संयोग माना जाए कि पाकिस्तान से आए जांच दल ने इस्लामाबाद लौटकर पठानकोट आतंकी वारदात में अपने देश की किसी भी संलिप्प्ता से इनकार कर दिया और इधर केस की जांच कर रहे एक जांबाज़ ईमानदार अधिकारी को ही रास्ते से हटा दिया गया...!!!


यह हत्या एक पूर्ण साज़िश के तहत अंजाम दी गई लगती है। अफ़सोस इस बात का भी है कि शहीद तंज़ील अहमद आपका ताल्लुक़ उस मज़हब से है, जिसे लोग आतंकवाद का धर्म समझते हैं। वर्ना यह राजनेता आपको इतने आराम से क़ब्र में सोने नहीं देते। आपकी शहादत से इनको तिनके भर भी फायदा नहीं। क्योंकि आप राष्ट्र की सामूहिक चेतना को संतुष्ट केवल बेगुनाह जेलों में रहकर ही कर सकते हैं या फांसी चढ़ कर। शहादत दे कर तो हरगिज़ नहीं। कोई यह भी पूछ सकता है कि मरते वक्त आपने भारत माता की जय की थी कि नहीं। कोई कल्मा शहादत भी पूछ बैठे।
तंज़ील साहब आपने मादर--वतन के लिए जो किया उसकी कीमत केजरीवाल सरकार ने एक करोड़ लगा दी है। आपकी कर्तव्यनिष्ठा का इतना ही मोल मिल पाएगा आपको। आपके मासूम बच्चों को सीने से लगाना तो उन्हें भी गवारा नहीं हुआ, जिन्होंने शाहदत की कीमत लगा कर एक परंपरा निभाई है। लोग धर्म की अफीम चाट कर किसी निर्दोष को घर में घुस कर मार देते हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर अदालतों की चहारदीवारों के अंदर कानून को रौंद दिया जाता है वहाँ देश की सेवा में शहीद होने वाले जांबाज़ की पत्नी को सही समय पर इलाज मुहय्या नहीं हो पाता। कई अस्प्ताल इलाज करने से इंकार कर देते हैं।





(रचनाकार परिचय:
जन्म : 10 दिसंबर 1985 को सहसपुर, बिजनौर में।
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास कॉम की उपाधि।
सृजन : कविताएं और कहानियां। छिटपुट प्रकाशन।
संप्रति : दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन और अध्ययन
संपर्क : seema.arif1@gmail.com )




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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

कौन लौटाएगा पल-पल घुटती सांसों के 56 दिन


कथित रूप से विस्फोटक के साथ पकड़े गए

इंतजार अली को जमानत मिलने के बाद 



फोटो- रमीज़
 



सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


यातना भरी 55 लंबी रातों के बाद लौटा उम्मीद का सूरज गुरुवार को हिंदपीढ़ी, निजाम नगर की अमन गली में उतरा, तो उससे सराबोर होने को महिलाएं, बूढ़े, बच्चे और जवान बेताब रहे। इसकी चमक से इंतजार अली के आंगन की उनिंदा आंखें सबसे अधिक आश्वस्त दिखीं। उन्हें अदालत पर यकीन पुख्ता था कि उनके घर का इकलौता कमाऊ सदस्य जरूर आएगा। लेकिन 20 अगस्त की शाम से शुरू पुलिसिया जुल्म की किस्त-दर-किस्त उन्हें हर रात सोते से जगाती रही। पलकें झुकाए जब इंतजार की पत्नी रिहाना खातून ने दरवाजा खोला, तो उन्होंने सबसे पहले मीडिया पर अपना बुखार उतारा। उसके बाद पुलिस बर्बरता के किस्से खामोशी से सुनाती रहीं। बोलीं, उस दिन यानी 20 अगस्त को जब चार बजे से उनके पति ने मोबाइल नहीं उठाया, तो वे परेशान हो गईं। शाम में वर्दी व सादे लिबास में पुलिस आ धमकी। बिना कुछ बताए घर का सामान तितर-बितर करने लगी। पुलिस के साथ आए सिविल ड्रेस के एक व्यक्ति अचानक डांटने-डपटने लगे। जब 12 साल की बड़ी बेटी ने कहा, अंकल अम्मी को क्यों डांट रहे हैं, तो वह व्यक्ति बोला, तुम जिंदगी भर पछताओगी, टीवी पर रोज पापा के बारे में सुनना कि वह आतंकवादी है।

इतना कहकर रिहाना बिलखने लगीं। पास बैठीं इंतजार की बहन शकीला बोल पड़ीं, बताईये मासूम से बच्चों पर क्या असर पड़ा होगा। पुलिस जाते-जाते कह गई, इंतजार बम के साथ पकड़ा गया है। रिहाना के गालों पर लुढ़क आया आंसू आंखों में लौट आक्रोश बना। बोलीं, अब अदालत ने बेल दे दी, इंशा अल्लाह केस भी खत्म हो जाएगा। लेकिन कौन लौटाएगा पल-पल घुटती सांसों के वे 56 दिन जिसने छोटकी की खोई मुस्कान छीन ली। किसने आखिर साजिश रच उसके पापा को जेल की सलाखों में कैद कर दिया। जिसे नींद ही पापा के पेट पर आती थी। पापा के न रहने पर हर दो दिन बाद उसे बुखार घेर लेती है।

बहुत देर तक कमरे में चुप्पी पसरी रही। इस बीच इंतजार की वही सबसे लाडली पांच वर्षीया छोटी बेटी आकर रिहाना से लिपट गई। अम्मी पापा कब आएंगे। उसके सवाल पर इंतजार के मित्र नदीम इकबाल ने उसे पास बुलाकर गाल थपथपाया। बोले, बेटा बस आ ही रहे हैं। उनके इतना कहते ही छोटकी फिर अम्मी से चिपक गई, हम बोले थे न मोहल्लम (मोहर्रम)में दलूल (जरूर)आएंगे पापा। अब मेली (मेरी)तबियत थीक (ठीक)हो जाएगी। उसकी तुतलाहट भरी मासूमियत ने माहौल जरा सामान्य किया। फिर रिहाना सिलसिलेवार कई सवाल दागती हैं। जैसे, एनआईए ने क्लिन चिट दे दी। कोई साक्ष्य नहीं मिला। वहीं कुछ अखबार वाले लगातार मेरे पति को आतंकवादी बताते रहे। पुलिस ने अदालती कार्रवाई में इतनी देरी क्यों की। बच्चे दस दिनों तक स्कूल नहीं गए। बेटी ने सहेलियों से मिलना-जुलना बंद कर दिया। कहती हैं कि बेटा वकील, तो बेटी अब चाहती है कि जज बने, ताकि कोई भी बेकसूर इसतरह तिल-तिल ताजा सांस लेने को न तरसे। बेटा अक्सर पूछता है आखिर पापा को किस बात के लिए पुलिस ने पकड़ा।

नोट: इंतजार अली को 20 अगस्त 2015 को पुलिस ने पकड़ा। बताया कि उनके पास विस्फोटक भरा थैला था। बाद में एनआई और सीआईडी ने दी क्लिन चीट। लेकिन पुलिस अहं के चक्कर में उसपर आरोप दर आरोप लगाती रही। आखिर अदालत ने 15 अक्टूबर को उसे जमानत दे दी।


भास्कर, रांची के 16 अक्टूबर 2015 के अंक में प्रकाशित




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गुरुवार, 14 मई 2015

बंद कब होगा चश्मे से देखना आतंकवाद













फ़राह शकेब की क़लम से
विकराल रूप धारण कर समस्त विश्व के लिए आतंकवाद निश्चित ही चुनौती बन चुका हैदेश, समुदाय, जाति, धर्म इत्यादि से हट कर इसकी निंदा की जानी चाहिए यह इस्लाम के नाम पर हो या हिंदुत्व के नाम पर। जिहाद हो या क्रूसेड। इसका समूल नष्ट होना जरूरी है। लेकिन आतंकवाद के नाम पर एक समुदाय विशेष के विरुद्ध वातावरण तैयार करने की साजिश का भी उतना ही विरोध भी होना चाहिए।
भारतीय संदर्भ में देखें, तो इसमें डिया, पुलिस और राजनेताओं की भूमिका संदिग्ध रही है। भारत में विगत कई वर्षों से लगातार देश के विभिन्न राज्यों की पुलिस के द्वारा आतंकवाद के नाम पर पहले से निर्धारित Targetted Goal के साथ एक समुदाय विशेष पर क्रैक डाउन का सिलसिला चल रहा है बार -बार अदालत के सामने मुंह की खाने के बाद भी इस रवैय्ये में कोई ब्दीली दिखाई नहीं देतीजिन-जिन युवाओं को कुख्यात आतंकी बता कर फ़िल्मी कहानी की स्क्रिप्ट के साथ गिरफ्तार कर वर्दी पर सितारों की गिनती बढ़ाई गयी पुस्कार जीते गए वो सब आज एक-एक कर अदालत के सामने निर्दोष साबित हो रहे हैं जिसे आधार बना कर उन युवकों को जेल की चहारदीवारी में क़ैद रखा जाता है, वो, सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की बनाई हुई कहानियां अदालतों की चहारदीवारी में दम तोड़ती जा रही हैं एक साल के अंदर-अंदर कई धमाकों के आरोपी अदालतों में निर्दोष साबित हुए और अदालतों ने ये स्वीकार किया है के उनके साथ अन्याय हुआ उन युवाओं की पूरी ज़िन्दगी कई-कई साल तक जेल में रखकर तबाह कर देने वाली सुरक्षा एजेंसियां अपने कुकर्मों पर सिर्फ " गलती हुई का कवच चढ़ा कर फिर दूसरे शिकार की तलाश में लग जाती हैं। इसे सियासी शब्दावली में प्रेशर पॉलिटिक्स कहा जाता है। दिल्ली पुलिस के द्वारा अंसल प्लाजा एन्कोउन्टर, बटला हाउस इंकॉउंटर घटित होने के पहले ंटे से ही संदिग्ध और फ़र्ज़ी होने की चुगली करता रहा है लियाक़त शाह की गोरखपुर से गिरफ्तारी और रेस्ट होउस में हथियार ज़ब्ती की मनोरंजक कहानी औंधे मुंह गिर चुकी है लियाक़त को एनआईए द्वारा क्लीन चिट देते हुए दिल्ली पुलिस को ठघरे में खड़ा किया जा चुका हैइस जैसे कई केसेज़ में दिल्ली पुलिस बार-बार बैकफुट पर चुकी है लेकिन पुलिस मोरल डाउन होगा जैसे जुमले की आड़ में इनके कुकर्मों को छुपाते सत्ताधारी और विपक्ष सब एकजुट हो जाते हैं। यही एकजुटता और खादी का संरक्षण ख़ाकी को एक धर्म विशेष एक समुदाय विशेष पर देश की आंतरिक सुरक्षा की आड़ में अत्याचार करने को प्रोत्साहित कर रहा है

एक मई को विभिन्न बम धमाकों के आरोप में कई वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे अपनी अँधेरी हो चुकी ज़िन्दगी का बोझ उठाते 17 नौजवान देश की अदालत में निष्कलंक और निर्दोष साबित हुए और ठीक 11 दिन बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के द्वारा एक बार फिर "" इंडियन मुजाहिदीन का इरफ़ान"" नामक फ़िल्म रिलीज़ की गयीइसकी पटकथा लिखने वाले ने गिरफ्तारी के लिए उत्तर प्रदेश के बहराइच को चुना और अपराध के नाम पर 1993 में होने वाले कई बम धमाकों के आरोप का झूमर उसके माथे पर लगा कर अपनी वर्दी पर सितारों के शृंगार का प्रयास किया गया हैजिस तरह 2002 के बाद होने वाले तमाम बम धमाको को पुलिस और एजेंसियों द्वारा मुस्लिम युवकों को आरोपी बनाने की मुहि में बल देने के लिए गोधरा और गुजरात का प्रतिशोध जैसा कवच चढ़ाया जाता रहा है, उसी तरह इरफ़ान अहमद को 1993 में होने वाले बम धमाके का आरोपी बताते हुए इसे बाबरी विद्ध्वंस का प्रतिशोध बताते हुए कहानी में थोड़ा थ्रिल पैदा करने की कोशिश की गयी हैबाक़ी पूरी कहानी उसी घिसे-पिटे पुराने पैटर्न पर है
अगर आप 12 मई 2015, दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान के पृष्ठ 3 को बांचने का कष्ट करें, तो आप कुछ भी नया नहीं पाएंगेहो सकता है, कुछ समय बाद इरफ़ान भी निर्दोष साबित हो जाए अगर वो दोषी है, तो उसे अदालत में कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिएलेकिन अदालत में पेशी से पहले जिस तरह हिंदी डिया ने सुरक्षा अधिकारियों के द्वारा उपलब्ध करवाई गयी जानकारी को ईश्वरीय आकाशवाणी समझते हुए गिरफ्तार युवक को परंपरागत तरीके से कुख्यात आतंकी घोषित कर दिया है क्या ये न्यायसंगत केवल इसलिए मान लिया जाए ये मामला किसी इरफ़ान का हैक्या डिया हॉउसेज़ की वातानुकूलित केबिनों में बैठे भ्रष्ट कॉर्पोरेट के वेतन भोगी कर्मचारी देश की अदालतों से भी सर्वपरि हैं, जो किसी दानिश या जावेद की गिरफ्तारी पर उसे केवल पूर्वाग्रह के आधार पर मुल्ज़िम से मुजरिम बना देने के लिए स्वतंत्र हैं
विगत आठ वर्षों में आज तक कोई हिंदी तो क्या उर्दू अखबार ऐसा नहीं मिला, जिसने साध्वी प्रज्ञा पुरोहित पांडे असीमानंद को अभिनव भारत का कुख्यात आतंकवादी लिखा हो क्योंकि यहां मालेगा धमाकों के आरोपी शब्द का इस्तेमाल होता है। सवाल क्या मौजूं नहीं कि यही मापदंड किसी इरफ़ान या किसी दानिश के साथ क्यों नहींइस देश में नियम-नीतियां सबके लिए समान हैं या जाति,, समुदाय और धर्म के आधार पर उनमे फेरबदल किया जा सकता है???? मुस्लिम है, तो आतंकवादी कहो आदिवासी है, तो नक्सली कहो ईसाई है, तो मिशन चला कर र्मांतरण करवाने वाले कहो सिख है, तो खालिस्तानी अलगाववादी कहो और देशभक्त....... केवल....
सिस्टम और इस तंत्र की जवाबदेही जनता के प्रति कब प्रायोगिक तौर पर तय की जायेगी ??? चोटी तक भ्रष्टाचार दलाली और पूंजीवादियों की गुलामी में आकंठ तक डूबा भ्रष्ट सामंती डिया कब अपने नैतिक दायित्वों के साथ न्याय करेगा..??? जनता के रक्षक कब तक इस देश में जन भक्षक कि भूमिका निभाएंगे ..?? इन प्रश्नों का जवाब कब मिलेगा..?? अगर ये सब नहीं होगा, तो आप सरकारें बदलते रहें स्तिथि ढाक के तीन पात से कुछ इतर नहीं होने वालीदिल्ली में चेहरे बदलेंगे देश नहीं.... और यही मूल कारण है के आज मंगल पर पहुँचने वाले देश में किसी दलित के घर शादी में दूल्हा घोड़ी चढ़ जाए, तो देश को सदियों से अपने द्वारा रचे गए विद्ध्वंसक पाखंड का मानसिक गुलाम बना कर रखने वाले नीच पाखंडियों को उस पर पत्थर बरसाने में देर नहीं लगती ""मंगल पर पहुँचने का गर्व"" वहीँ इस भारतीय संस्कृति और समाज पर हंसता मुंह चिढ़ाता दिखाई देता हैयह एक सच है
 
बेड़ियां टूटे हुए ज़माना हो गया,
फिर भी रुख बदला नहीं हालात का
हम कल भी तारीकियों में थे, आज भी हैं
सिलसिला बाक़ी है, अब भी रात का

(लेखक परिचय:
जन्म: 1 जनवरी 1981 को मुंगेर ( बिहार ) में
शिक्षा: मगध यूनिवर्सिटी बोधगया से एमबीए 
सृजन: कुछ ब्लॉग और पोर्टल पर समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन
संप्रति: अनहद से संबद्ध
संपर्क: mfshakeb@gmail.com)



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