बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 12 मई 2015

धर्मांतरण बनाम घर वापसी

चित भी उनका, पट भी उनकी











पंकज साव की क़लम से

आगरा में हुई कथित 'घर वापसी' की खबर मीडिया के लिए भले बासी हो चुकी है। लेकिन उसके अर्थ व भाव भारतीय लोक चेतना को रह-रहकर उद्वेलित करते रहेंगे। क्योंकि इस घटना को स्वाभाविक मान लेना बौद्धिक भोलेपन के सिवा कुछ नहीं है। कुछ घटनाओं की कड़ियां जोड़ने पर यह बात साफ हो जाती है कि इसे हवा देने में उन्हीं तत्वों का हाथ है, जो चाहते हैं कि किसी न किसी तरह धर्मांतरण के खिलाफ कानून बन जाए ताकि उनका 'हिन्दू राष्ट्र का सपना' साकार हो सके। पिछली सरकारों की दूरदर्शिता अथवा हिन्दुत्ववादी ताकतों के सत्ता पर उतनी मजबूत पकड़ (जो अब है) से दूर होने के कारण इस तरह का कानून बनाना अब तक संभव नहीं हो सका था।

आठ दिसंबर को आगरा के 57 गरीब मुसलमानों ने हिन्दू धर्म अपना लिया। यह धर्मांतरण की घटना थी, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अन्य हिन्दूवादी संगठन घर वापसी कहते हैं। आरएसएस के ही एक विंग धर्म जागरण समिति की इसमें मुख्य भूमिका थी। यह समिति देश के बहुत से हिस्सों में अन्य धर्मों के लोगों को हिन्दू बनाने का काम कई सालों से कर रही है, पर गोपनीय तरीके से। लेकिन, इस बार इसी समिति के एक नेता ने आगरा की घटना के बाद घोषणा कर दी कि क्रिसमस के दिन पांच हजार ईसाइयों को हिन्दू बनाया जाएगा। केंद्र ने राज्य सरकार के पाले में गेंद डालते हुए खुद को मामले से दूर कर लिया, मगर बयानबाजी जारी रही।

पिछले वर्ष मई में देश में मोदी सरकार बनने के सात महीने के अंदर आगरा में ऐसा हुआ और संसद से सड़क तक बहस छिड़ गई। इसमें मीडिया की भूमिका अहम रही। संसद में भाजपा नेताओं की ओर से धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाने की वकालत के पीछे उनके मातृ संगठन की ही बरसों पुरानी मांग है। संसद के बाद देश भर में योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, अमित शाह के बयान यह साबित करने के लिए काफी हैं कि धर्मांतरण को चर्चा में लाने में वे सफल हो गए हैं। मिला-जुलाकर उनकी बातों का यही मतलब बना कि या तो घर वापसी (जो वास्तव में धर्मांतरण ही है) का विरोध बंद कर दिया जाए या फिर धर्मांतरण के खिलाफ कानून बना दिया जाए। आरएसएस-भाजपा के लिए ये दोनों ही स्थितियों में 'चित भी उनका है और पट भी उनकी'

आरएसएस शुरू से धर्मांतरण का विरोधी रहा है। इसके खिलाफ कानून बनाने की उसकी मांग पुरानी है। कानून बनवाने में सक्षम नहीं होने पर हिन्दुओं की घटती आबादी का ढिंढोरा पीटते हुए उसने आदिवासियों के बीच ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का जवाब देने के लिए वनवासी आश्रम, वन बंधु परिषद, एकल विद्यालय जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू किए। लेकिन मिशनरियों की सेवा भावना, आधुनिक सोच, संसाधनों की ताकत के आगे उनकी कोशिशें बौनी ही रहीं। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पूर्वोत्तर के राज्यों समेत देश के बड़े इलाके में आधुनिक स्कूलों, हॉस्पिटल्स, रोजगार प्रशिक्षण केंद्रों के फैले जाल ने मिशनरियों को जो ताकत दी है, उसका सत्ता की बदौलत संघ मुकाबला करना चाहता है। उसके इस मिशन में भाजपा बहुत चालाकी से साथ देती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने 'झुंझलाहट' में पद छोड़ने की जो चेतावनी दी थी, उसमें सच्चाई खोजना हमारी भूल होगी। धर्मांतरण की चर्चा का एक और फायदा सरकार को और हुआ है कि जनता और मीडिया का ध्यान उन जमीनी मुद्दों से भटका, जिन पर नई सरकार कुछ उल्लेखनीय कर पाने में नाकाम रही है।

(लेखक-परिचय :
जन्म: 8 अक्टूबर 1986 को हज़ारीबाग (झारखंड) में
शिक्षा : संत कोलंबा कॉलेज, हजारीबाग से कला स्नातक तथा माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि, भोपाल से MA in Mass Communication
सृजन : छिटपुट यत्र-तत्र लेख, रपट प्रकाशित
2011 से पत्रकारिता की शुरुआत
संप्रति : रायपुर में दैनिक भास्कर डॉट कॉम से संबद्ध
संपर्क : pankajsaw86@gmail.com )



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बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

किसको राहत देती हैं संघ की बातें

चित्र: गूगल से साभार

हमारी अतियों से माहौल और बिगड़ेगा ही
 
भवप्रीतानंद की क़लम से
आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने जब हिंदू महिलाओं को कितने बच्चे जन्म दें के मुद्दे पर बीजेपी के कुछ सांसदों को अघोषित रूप से फटकार लगाई थी तो यह भान स्वभाविक था कि चीजों को तार्किक नजरिए से देखने की कोशिश की जा रही है। उसी के आसपास दिल्ली में चर्चों पर हुए हमलों के विरोध में पीएम नरेंद्र मोदी की स्पष्ट टिप्पणी भरोसा जगाने वाली लगी थी। पर पता नहीं क्यों बार-बार कुछ मुद्दों पर, जिसपर बोलने की आवश्यकता नहीं है और जिसका कोई तार्किक आधार हम प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं उसपर कुछ बेतुका बोल दिया जाता है। मदर टेरेसा में मन में लोगों को  ईसाई बनाने की भी मंशा थी, इसे पुष्ट करने के लिए हमारे पास कोई तथ्यात्मक सबूत नहीं है। खुद मोहन भागवत  के पास ऐसा कोई सबूत हो तो वे बताएं, और साबित करें। बाद में जब मीडिया में ऐसे बयान मुद्दे के रूप में व्याख्यायित होते हैं तो सफाई दी जाती है कि बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। यही सफाई बोलते  वक्त ध्यान में रखी जाए तो ऐसी नौबत ही नहीं आएगी। इससे होता कुछ नहीं है पर ऐसे-ऐसे वक्तव्यों को एक तार में जोड़कर यह साबित करने का  प्रयास किया जाता है कि आरएसएस की सोच इससे आगे बढ़ी ही नहीं है। अगर किसी पार्टी या संगठन में समस्या समाधान करने की सम्यक सोच है तो वह कश्मीर समस्या का समाधान क्यों नहीं कर देते हैं जो सर्वमान्य हो। बार-बार उन चीजों को कुरेद कर जिसका कोई इतिहास हमारे पास उपलब्ध नहीं है, उसपर बयानबाजी से क्या होगा।

जब मुसलामानों और ईसाइयों के लिए घर वापसी वाला बेतुका शोर वातावरण में घुल रहा है तो मोहन भागवत को यह स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि हिंदू धर्म में वह मुसलमान और ईसाई बने हिंदुओं को वापस लाकर ब्रह्मण का दर्जा देंगे। क्योंकि वह भागे ही इसलिए थे कि उन्हें हिंदू धर्म की अतियां जीने नहीं दे रही थीं। लतमारा की श्रेणी में रखे हुई थी। मैला ढुलवाती थी। गांव के अंतिम छोर पर उसके रहने के लिए झुग्गी मुकर्रर थी। उसकी छाया तक ब्रह्मण-राजपूत अपनी जमीन में पडऩे नहीं देता था। कोई भी हिंदुवादी संगठन खुलकर, इतिहास को ठीक से पढ़कर बताए कि किसी देशकाल में बड़ी संख्या में ब्रह्मण और राजपूतों ने धर्म परिवर्तन किए हैं।
सत्ताधारी पार्टी भाजपा के लिए यह सतत प्रक्रिया की तरह हो जााएगा कि कोई संघी जबतब कुछ बोल देगा और केंद्र सरकार यह कहकर किनारा करते रहेगी कि इस वक्तव्य का सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। आप से दिल्ली में करारी हार के बाद प्रधानमंत्री चर्चों के हमले पर बोलने के लिए मजबूर हुए नहीं तो शायद ही उनसे इस तरह की भाषा की अपेक्षा थी।  पता नहीं अपनी इस भाषा पर वह कालांतर में कायम रह भी पाएंगे या नहीं। मीडिया से वह जिस तरह की दूरियां बनाकर रखते हैं, वह चीजों को भड़काउ बनने का वक्त दे देती हैं। गुजरात के गोधरा कांड के बाद जो उन्होंने मीडिया से परहेज किया वह पीएम बनने तक जारी है। यह बहुत खतरनाक इस मायने में  है कि राष्ट्रीय स्तर के संवेदनशील मुद्दों पर प्रधानमंत्री का वक्तव्य ही मायने रखता है, क्योंकि उसे ही पार्टी लाइन कहा जाता है।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी बहुत कम लाइम लाइट में दिखते हैं। जरूरी होने पर ही बोलते और दिखते हैं। लेकिन उनका मन भी संघी आग्रह  कहां छोड़ पाता। एक आरोपी बलात्कारी आसाराम बापू को वह पूज्य संत कहने में एक जरा हिचक महसूस नहीं करते हैं तो शक होता है कि सत्ता के इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठे लोग क्या देश की संप्रभुतता से न्याय कर पाएंगे। उसकी विविध सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रख पाएंगे। 

अभी तो सत्ता के एक साल भी पूरे नहीं हुए हैं। ऐसी नकारात्मक चीजों से उन तत्वों को बढ़ावा ही मिलेगा जो दंगे करने में या फिर अराजक स्थिति पैदा करने में सहायक होते हैं। कांग्रेस ने भ्रष्टाचार में जिस तरह से अराजकता की स्थिति पैदा कर दी थी, वैसी ही स्थिति भाजपा के शासनकाल में समाज के स्तर पर बलवती होंगी तो इसके कई खतरनाक परिणाम हमें भुगतने पड़ेंगे। आरएसएस की धर्म से जुड़ी बयानबाजी में वह तत्व निराधार रूप से संपुष्ट होते रहते हैं कि मैं इस देश का असली वारिस, बाकी सब बाहरी। बाहरी को अगर रहना है तो मैंने जो तय किया उसके तहत रहो।
किसी को कोई शक नहीं पालना चाहिए, कांग्रेस की दुर्गति का मुख्य कारण है कि वह भ्रष्टाचारी और कालाबाजारी पर मजबूती से काबू नहीं रख पाई। उसने सत्ता को बेजा इस्तेमाल होने दिया। मनमोहन सिंह को कठपुतली की स्थिति में ला दिया। लगातार दस वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद अगर भ्रष्टाचारी और कालाबाजारी पर अंकुश लगा लिया गया होता तो देश की प्रगति की रफ्तार दूनी तो निश्चित ही होती। भाजपा के शासन का मूल्यांकन जल्दबाजी होगी, क्योंकि अभी एक वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं, पर एक जिस मोर्चे पर अभी से वह कमजोर दिखाई दे रही है वह है उसका संघ से, उसके विचारों से लाग-लपेट। बार-बार संघ की ओर से और पार्टी की ओर से इस मद्देनजर सफाई दी जाती है कि दोनों एक-दूसरे के कार्यों में दखल नहीं देते हैं। पर जब बिना लगाम की बातें निकलती हैं तो समाज में उसके बहुत अच्छे अर्थ नहीं जाते। और जब कोई एक ही प्रकृति की चीजें बार-बार होती रहती हैं तो वह कई मुश्किलें खड़ी करती हैं। कें्रद के लिए यह स्थिति असमंजसपूर्ण होती है। मेक इन इंडिया को यह सफाई देनी पड़ी है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी से उनका कोई लेनादेना नहीं है। कल को गृहमंत्री जी भी सफाई देंगे।

अब जिला स्तर पर, राज्य के स्तर पर होने वाले हिंदू सम्मेलन को अधिक मीडिया कवरेज इसलिए मिलेगा क्योंकि भाजपा सत्ता में है। सम्मेलन करने में कोई गड़बड़ी नहीं है। पर वहां से कोई ऐसी  बात निकलकर समाज के आखिरी छोर तक नहीं पहुंचनी चाहिए जो बेवजह लोगों को उत्तेजित करती है। कोई भी धर्म, मथकर ही दुरुस्त और तार्किक होता है। विशुद्ध आस्था को भी तार्किकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए, नहीं तो मुश्किलें पैदा होती हैं। इराक में आईएस की गतिविधियां इस्लाम की व्याख्या नहीं है। इस्लाम के नाम पर वह रोटी इसलिए सेंक पा रहे हैं कि चीजें सामाजिक स्तर पर बहुत विद्रूप रूप में पहुंची और लोगों को उत्तेजित करती गईं। और अब वह काबू से बाहर हो गईं हैं। किसी को जला देना, किसी को काट देना, मौत की सजा देने से पहले यह पूछना कि आपको मौत से पहले कैसा महसूस हो रहा है आदि जघन्यतम स्थितियां कोई एक दिन की उपज नहीं है। विद्रूप चीजों और विचारों के हावी होने और समाज में उसके  व्यवस्थित रूप ले लेने का कारण यह नासूर पैदा हुआ। हमें इससे बचना है किसी भी कीमत पर। फरवरी-मार्च के इस मौसम में अभी फुलवारी में एक साथ कई फूल खिले होंगे,  अपना-अपना स्पेस लेकर। हमें विचारों को स्पेस देना होगा। ऊंचे पद पर बैठे लोगों को न तो लट्ठमार भाषा शोभा देती है और न ही लट्ठमार स्वभाव।

 













(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )

हमज़बान पर पढ़ें  भवप्रीतानंद को

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बुधवार, 10 सितंबर 2008

आर एस एस बनाम भाजपा की राष्ट्रीयता


खुली बहस की मांग करते सवाल
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लेखक का परिचय : पेशे से पत्रकार।करीब 6 साल तक दैनिक जागरण(पटना) में बतौर संवाददाता रह चुके युवा पत्रकार राकेश पाठक का जन्म मगध अंचल , बिहार के रानीगंज हल्क़े में 01 मार्च 1977 को हुआ। आपने नक्सल प्रभावित क्षेत्रो पर विशेष रिपोर्टिंग और कुछ पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता भी की । कुछ कविताओं का यत्र-त्रत प्रकाशन ...फिलवक्त एक निजी कंपनी में अजमेर में ऑफिसर(प्रशासन) के पद पर कार्यरत.............


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राकेश पाठक की क़लम से






नब्बे के पूर्वाध में भारतीय राजनीती में धुव्रतारा की तरह चमकी 'भाजपा' क्या सांप्रदायिक पार्टी है ?
क्या यह भारतीय संस्कृति के पुरातन तानेवाने को छिन्न -भिन्न कर रही है ?
कट्टर हिन्दुत्त्व से जुड़े इसके विचार क्या देश में हिंदू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य की खाई बढ़ाने का काम कर रहे हैं ?
'विविधताओं में एकता ' का भारतीय नारा क्या भाजपा व इसके तथाकथित संघ संगठनों के कट्टरतावाद की भेट चढ़ चुका है ?
आज कितना यथार्थपरक है भाजपा व संघ का राष्ट्रवाद ?
ऐसे अनगिनत सवाल हैं जो प्रबुद्ध तबके के ज़हन में आकर उन्हें व्यथित और उद्वेलित करते रहते हैं.
कुछ ऐसे ही विचार जो बर्तमान में मुस्लिम अल्पसंख्यको में घुमड़कर उनमे अलगावाद की भावना पैदा कर रहे है ? मुसलमानों के बीच क्यों सीमी या लश्करतैय्यबा जैसे संगठनों को कुछ जगह मिल जा रही है? आखिर क्या सोचता है ? मुस्लिम समाज इन मुद्दों पर।
क्यों शकील शम्सी जैसा पत्रकार-कवि कहने को मजबूर होता है :
नफरतों की आग भड़काई है जिसने मुल्क में
कोई कैसे मान ले वो मुल्क का हमदर्द है
खून बहाता है उडीसा से जो आज़मगढ़ तक
ऐ वतनवालो वही टोला तो दहशतगर्द है
क्यों पकडे गए आंतंकवादियों में सिर्फ मुस्लिम का ही नाम नज़र आता है? और अभी के कानपुर, इससे पहले नागपुर, नांदेड में हिन्दू संगठनों जे जुड़े लोगों से मिली विष्फोटक सामग्री पर सीमी-सीमी रटने वाला मीडिया चुप रह जाता है?
गुजरात को लोग भूल नहीं सकते और अभी उडीसा में हुई हिंसा में किस संगठन का हाथ है? क्या कभी मुस्लिम लोग हथियार सीखने के लिए गाँव, कस्बों या शहर के मैदान में रोज़ सुबह-सुबह इकठ्ठे होते हैं?आर एस एस खुले आम शाखा लगता है और ये देशभक्ति की श्रेणी में क्यों?।
आइये गौर करे संघ, इसके गठन व स्वतंत्रता आन्दोलन में इनके संघटक नेताओं की भूमिका पर ? आख़िर इसे संयोग कहे या कारण --आज़ादी के बाद सर्वाधिक दंगे भाजपा के भारतीय राजनीति पर उभरने के बाद ही हुए है . बम बिस्फोट एवं दंगे के पीछे का कारण धार्मिक वैमनस्यता का बढ़ना तो नही है ? क्या बाबरी मस्जिद का तोडा जाना हिंदू -मुस्लिम भाईचारे का अंत नही था ? धार्मिक भावनाओ को आंदोलित करके दंगा जैसे हिंसक कामों को अंजाम देने जाने वाली पार्टी भाजपा को सचमुच में राष्ट्रभक्त पार्टी कहा जा सकता है ? क्या राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ व इनके नेताओ का भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में अमूल्य योगदान रहा है ? स्वतंत्रता आन्दोलन में आर.एस.एस की भूमिका पर अक्सर उँगली उठती रही है .और इनके नेताओ की गतिविधियाँ भी अंग्रेजो के समर्थको की रही है तब क्या हम इन्हे आज़ादी में जान न्योछाबर करने वाले राष्ट्रभक्त कह सकते है ? माना जाता है कि आर.एस .एस की स्थापना हिंदू -मुस्लिम को बाटने के उदेश्य से अंग्रेज वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा करवाई गई थी .क्योकि गठन के एक वर्ष के अन्दर ही वर्ष 1926 में नागपुर में दो सम्प्रदायों के बीच दंगे हुए थे ."हिंदू धर्म ही राष्ट्र धर्म है " जैसा नारा ही तात्कालिक दंगों का कारण बना था. आज हिंदुत्व को फुटबाल की तरह उछालती भाजपा व आर .आर. एस. से मुस्लिम ही नही हिन्दुओं का बुद्धिजीवी वर्ग कई सवाल पूछ रहा है --
१.भारतीय आज़ादी के लिए किए गए किस आन्दोलन में आर.आर. एस. ने सक्रिय भूमिका निभाई है ?
२ साइमन कमीशन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोडो आन्दोलन,शाही नौसेना का विद्रोह,आजाद हिंद सेना के खिलाफ चलाये जाने वाले मुकदमों पर नागरिक प्रदर्शन ,धरना आदि संघर्ष में जब पूरा भारत अंग्रेजो का विद्रोह कर रहा था तब आर.आर.एस. के नेता कहाँ थे ?
३ शहीद भगत सिंह , एवं काकोरी षडयन्त्र के आरोपियो की फाँसी पर जब पुरे भारत में विद्रोह किए जा रहे थे तो संघ व इसके नेता मौन क्यो थे ?
जब आर. आर. एस. का गठन हुआ उस समय देश में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ नागरिक आन्दोलन की शुरुआत हो चुकी थी.गरम -नरम दल में विभाजीत संघटन व कांग्रेस के साथ आन्दोलनों में सभी वर्गों ने बढ़- चढ़कर हिस्सा लिया ,परन्तु संघ इन आंदोलनों से दूर रहा. कांग्रेस नेताओं ने हजारों की तादाद में गिरफतारिया दी पर संघ इन आंदोलनों से अपने को दूर रखा तथा अंग्रेजो के समर्थक बने रहे ।
दलितों के साथ छुआ- छूत जैसे आंय कुरीतियों के खिलाफ ,पेरियार ,आम्बेडकर जैसे नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किया पर संघ मौन रहा ।
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है की संघ ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कभी आवाज उठाई हो .अगर आवाज बुलन्द की भी तो हिन्दुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने में ,द्वेष पैदा करने में ,घृणा और शत्रुता फैलाने में जिसमे प्रतक्ष्य भूमिका अंग्रेजो की भी रही. आख़िर क्या कारण था की एक तरफ अंग्रेज किसी भी पत्रिका प्रकाशन ,आन्दोलन, सभा ,सोसायटी सभी को प्रतिबंधित कर दिया तथा इनसे जुड़े लोगो को जेल के सीखचों के पीछे कर दिया वही दूसरी ओर संघ को युवको को संगठित करने एवं सैनिक प्रशिक्षण देने की अनुमति दे दी. ये शाखा लगा सकते थे ,मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दे सकते थे इसी से प्रतीत होता है की संघ अंग्रेजो के पिट्ठू बन आन्दोलनकारियों के लिए जयचंद का काम कर रहे थे . हिंदू महासभा ने जब सनातन हिंदू युवको के लिए सैनिक अकादमी स्थापित की तो इसे प्रतिबंधित करना तो दूर इन्हे भरपूर आर्थिक व अन्य मदद अंग्रेजी हुकूमत ने की .......आख़िर क्यों
यह कह सकते है की भारत -पाकिस्तान और हिंदू -मुस्लमान बटवारे की नीव संघ परिवार द्वारा ही रखी गई जिसका खामियाजा आजतक कश्मीर समस्या के रूप में भुगतना पड़ रहा है ...आज संघ व इसकी समर्थक पार्टी भाजपा जिस राष्ट्रिय एकता की बात करते है उस एकता के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में इनकी ही महती भूमिका रही है .....
इतिहास में संघ को घृणा ,द्वेष, वैमनस्य, जातीय भेदभाव , धार्मिक असंतुलन छुआ -छूत और मतभेद के लिए याद किया जाना चाहिए न की राष्ट्रिय एकता के संघटक के रूप में ॥
भोथरी दलीले देने वाले संघ के लोगों जवाब दो ???
आपकी संदिग्ध कारगुजारियों का आज जनता आप से जवाब मांग रही है ...............
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इस सिलसिले में आप समाजवादी चिन्तक अफ़लातून" href="http://samatavadi.wordpress.com/author/afloo/">अफ़लातून का आलेख एक हिटलर-प्रेमी ‘गुरुजी’ भी पढ़ सकते हैं .-सं
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