बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
गुंजेश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गुंजेश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 19 सितंबर 2015

रवीश की रविश पर युवा पत्रकार की रनिंग

एक ख़त उनके लिए जो इसे पढ़ना नहीं चाहेंगे

 

रवीश कुमार रिपोर्टिंग के दौरान एक ग्रामीण के साथ। फोटो साभार।







गुंजेश की क़लम से

मेरे समाज’ के नेक लोगो !

इस ख़त को कई दिनों से टाल रहा था। बल्कि टाल ही चुका था। लेकिन इधर दो हफ्ते से रवीश कुमारकी पत्रकारिता ने मुझे फिर से हिम्मत दी है। मुझे यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है मैं यह ख़त रवीश के प्रभाव में आ कर ही लिख रहा हूँ। और अच्छा लग रहा है कि मैं कम से कम किसी तोगड़िया, किसी साध्वी, किसी ओवैसी के प्रभाव में या प्रतिक्रिया में कुछ नहीं लिख रहा हूं। लेकिन, बहुत संभव है आप ऐसे पढ़ कर अच्छा महसूस ना करें। एक तो इस ख़त में बातों का इतना बिखराव होगा, दूसरा इसका कंटेंट भी बहुत पुराना, एकदम घिसापिटा और आपकी सहिष्णुता पर सवाल करने वाला होगा।

कहां से शुरू करूँ ? तारीखों से ? नामों से ? तथ्यों से ? बयानों से? या बात से ? बीमार से? बीमारी से ? इलाज से ? तीमारदार से ? या अस्पताल से ? जुगनू, आदित्य, टूक, ये क्रमशः मेरी भतीजी, भांजे और भांजी के नाम हैं। जिनसे मेरी खूब छनती है। पंखुरी, गांधी और कृति ये क्रमशः मेरे फेसबूक मित्रों गिरीन्द्रनाथ जी, सत्येन्द्र भाई और विमल भाई के बेटे-बेटियों के नाम हैं। इसमें विमल भाई को छोड़ कर गिरीन्द्रनाथ जी और सत्येन्द्र भाई से मेरी ज़्यादा बातचीत भी नहीं है। लेकिन पंखुरी और गांधी के माध्यम से मैं इन्हें बहुत जानने लगा हूं और एक जुड़ाव सा महसूस भी होता है।

नेक लोगों, आपको यह बात सीनिकल लग सकती है लेकिन पिछले कुछ दिनों से मैं डरा हुआ और शर्मिंदा हूं। अविनाश, अमन, तान्या, मेनका या अंकित अब सिर्फ नाम नहीं रह गए हैं ? ये किसी आरटीआई के जवाब जैसे हैं ? अविनाश की माँ डाक्टर से कहती रही कि वह उसके बिना ज़िंदा नहीं रह पाएगी, वह रही भी नहीं। मेनका और अंकित के पिता दिनेश के दुख की सीमा के सोचना ही अथाह लगता है। आप सोच सकते हों तो बताइयेगा जिसने 2010 में डेंगू से अपना 11 साल के बेटा खोया हो यदि पांच साल बाद उतनी ही बड़ी उसकी बेटी भी उसी बीमारी की शिकार हो जाए, तो उसके दुख की क्या सीमा होगी। और यह सिर्फ राजधानी से निकलने वाले तथ्य हैं। भागलपुर, गोड्डा, दुमका, रांची, पटना, कहलगांव, बांका, वर्धा, नांदेड़, नागपुर, अकोला, यवतमाल, राऊरकेला, भिलाई इनके बारे में बात ही कहां हो रही है ? इनसब जगहों में तो बुखार को आत्महत्या और आत्महत्या को शराबखोरी साबित करना बहुत आसान है। और किया ही जाता है। इस सिस्टम से तो चिढ़ होती है। लेकिन मैं इससे डरा हुआ नहीं हूं? मुझे डर है और मैं शर्मिंदा हूं तो इसबात से कि 16 सितंबर को दुमका के एक स्कूल में एक क्लास फोर का बच्चा हार्ट अटैक से मारा गया? मैंने पूछा नहीं लेकिन 10-11-12 साल उम्र रही होगी शुभनील की। ठीक है, उसके दिल में कोई खराबी रही होगी। लेकिन 10-12 साल की उम्र में दिल की खराबी? यहां भागलपुर में 15 तारीख को अपने डेस्क पर मैंने जो खबर एडिट की, वो एक चार साल की बच्ची के बारे में थी जो पिछले 2 साल से लगातार दस्त से पीड़ित थी। डॉक्टरों ने जांच में पाया कि दो साल पहले उसने गेहूं का कोई पकवान खाया होगा, जिससे उसको यह बीमारी हुई। मुझे अभी उस बीमारी का नाम याद नहीं आ रहा। और नाम कुछ भी हो ज़रा सोचिए, एक तो वह पकवान किन कारणों से इतना जहरीला हो गया होगा, और फिर दो साल की बच्ची ने खाया भी कितना होगा? फिर डॉक्टरों को इस परिणाम तक पहुँचने में दो साल का वक़्त लग गया कि उसे बीमारी क्या है। वो भी भागलपुर जैसे शहर में जहां की चिकित्सा व्यवस्था पर आस-पास के करीब 6-7 जिले निर्भर हैं। प्राथमिक तौर पर तो ज़रूर ही।

मैं शर्मिंदा होता हूं जब 17 तारीख़ को एनडीटीवी के लिए लिखे एक लेख में आम आदमीपार्टी के नेता और पुराने पत्रकार आशुतोष बेशर्मी से अपनी गलती स्वीकारते हुए भी यह कहने से नहीं चूकते कि दुनिया के कुछ ही देशों में स्वस्थ्य सुविधाएं मानकों पर खरी उतरती हैं? हम मानकों पर खरे उतारने कि नहीं बल्कि न्यूनतम स्वस्थ्य जरूरतों की बात कर रहे हैं? और उसकी चाहत रखते हैं? खैर, दो हफ्ते लगातार प्राइमटाइम देखते हुए मुझे यह तो भरोसा हो ही गया है कि सरकार स्वस्थ्य सिस्टम तत्काल नहीं सुधार सकती। बहुत ईमानदारी से कोशिश करले तो भी नहीं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हम अपनी पीढ़ियों के लिए कैसी हवा, कैसी जमीन, कैसा पानी, कितना जंगल छोड़ जाएंगे? और यह भी सरकार को ही सोचना है क्योंकि जंगल जिनके थे उनको तो वहाँ से बेदखल करने की प्रक्रिया चल रही है या वो बेदखल हो चुके हैं?

रवीश कुमार को दोहराऊँ तो यह कि हिन्दू-मुसलमान-पाकिस्तान-आरक्षण-बुलेट ट्रेन में उलझे रहने वाले नेक लोगों क्या आपने कभी सोचा है कि वह क्या वजह है कि आने वाले समय में हम 25000 करोड़ के पीने के पानी के कारोबार का बाज़ार बनने वाले हैं? क्या इसमें समाज का कोई दोष नहीं है कि पिछले तीन साल में (अगर मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस की जांच को सही मानें तो ) मेरे चार से ज़्यादा दोस्तों और परिचितों ने या तो आत्महत्या करली या इसका प्रयास किया। मानसिक स्वस्थ्य के लिए कभी कोई चिंता मंदिर-मस्जिद बनवाने वाले हमारे नेताओं ने दिखाई है क्या? मैं इसलिए डरा रहता हूं कि कल जब जुगनू थोड़ी और बड़ी हो जाएगी और समाज से वही सब त्रासद अनुभव मेरे सामने बिखेर कर रख देगी (जिससे आज भी मेरे संवेदनशील दोस्त और सहेलियाँ गुज़रती हैं) और मुझसे सवाल करेगी कि समाज ऐसा क्यों है तो मैं क्या जवाब दूंगा? आपने कभी सोचा है कि आप अपनी बेटियों को क्या बताएँगे ‘साली आधी घरवाली कैसे होती है? (विषयांतर है, लेकिन यह मानसिक स्वस्थ्य से जुड़ा है)

नेक लोगों ज़रा सोचिएगा, एक डेंगू तो यह है ही जो फैला हुआ है, जिसने अविनाश के साथ उसके माँ-पिता को भी लील लिया। लेकिन एक संस्थागत डेंगू भी है, जिससे निपटने के लिए हम जन प्रतिनिधियों को चुनते हैं? और अगर आप यह मानते हैं कि कुछ नहीं बदलने वाला तो एक बार पीछे पलट कर देखिये कितना कुछ आउट कितने बुरे तरीके से बदल चुका है ? और अपनी हवा, पानी, मिट्टी के लिए सवाल कीजिये। वरना घर अस्पताल में तब्दील हो जाएगा, जब हम स्वस्थ्य रहेंगे तो वह एक खबर होगी।


रवीश जी,

आप समाज का पक्ष जानना चाहते हैं? किस समाज का जिसमें हम रहते हैं, या जिसमें हम रहने को मजबूर हैं ? आप इतना सब कुछ जानते हैं। यह भी जानते होंगे कि आपके इस ब्लॉग का जवाब दो ही तरह के लोग देंगे। एक जो आपको बहुत प्यार करते हैं और जिनसे आपको डर लगता है, दूसरे जो आपसे, और इस समाज में हर किसी से जो उनके जैसे नहीं हैं से, नफ़रत करते हैं। तीसरे तरह के भी लोग होंगे, जिनको शायद आप चाहते हैं, जो आपकी हर एक बात से सहमत नहीं हैं, लेकिन आप पर नज़र रखते हैं। जैसे जब आप बार-बार पैसों के लिए नौकरी नहीं बदलने की दलील देते हैं, तो मेरे जैसा पत्रकार जिसने अखबार की नौकरी में पचास महीने नहीं पूरे किए हैं और तीन संस्थान और चार नौकरियां बदल चुका है, वो आपसे पूछना चाहता है कि क्या नौकरी बदलने और पैसों के लिए नौकरी बदलना दलाल हो जाना है। हालांकि, मैं जानता हूं आपका यह मतलब बिलकुल नहीं रहा होगा। लेकिन हम ऐसे ही दीवाने लोग हैं, आपको एक-एक शब्द पर चेक करेंगे॥

लेकिन रवीश जी, आपका फेसबुक बंद करना एक गलत फैसला है। मैं नहीं मानता कि आपको पता नहीं होगा। लेकिन आप जानिए कि समाज, वह समाज जिसमें हम रहने को मजबूर हैं, में आम लोगों को क्या-क्या सहना और सुनना पड़ता है। एक अख़बार के दफ़्तर में अख़बार का स्थानीय संपादक और न्यूज़ एडिटर, डिप्टी न्यूज़ एडिटर जब यह तय करने लगें कि आप कहाँ रहेंगे और कहां नहीं। जब सवाल करने की प्रवृति की तारीफ भी आपको नक्सली कह कर होने लगे। जब पत्रकारिता में आपकी उम्र जितना समय गुज़ार चुका व्यक्ति जो आपके केआरए को भी प्रभावित कर सकता हो, आपके किसी मुसलमान के साथ खाना खाने पर आपसे सवाल करे। मुस्लिम मोहल्ले में रहने के आपके फैसले पर जब आपके साथ काम करने वाले यह कह कर शाबाशी दें कि मुस्लिम लड़कियां बहुत खूबसूरत होती हैं ? या कहें कि ज़रूर किसी मुस्लिम लड़की से तुम्हारा चक्कर होगा। या वो आपसे ऐसे ही पूछ दें खाने के दौरान कि तुम तो गाय का मांस भी खाते होगे? और रवीश जी यह सब तब हो, जब आपने घर वालों को समझा-बुझा कर। बहुत हद तक उन्हें नासमझ क़रार देकर, आपने अपने ड्रीम करियर की शुरुआत की हो। आपके ऊपर लालबहादुर वर्मा, एरिक होब्स्बाम, नोम चोमसकी, जॉन रीड, देरीदा, राही मासूम रज़ा, हरीशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, केदार नाथ सिंह, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल हावी हों। आपको अनिल चमड़िया और सुभाष गताड़े जैसे लोगों ने बिगाड़ा हो। तब आप क्या करेंगे। नौकरी को लात मारने का साहस सब में नहीं होता न!!!

रवीश जी, कोई माने या न माने मैं मानता हूं कि सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक असहिष्णुता हमारे समाज की गलियों में गंदी नालियों के साथ-साथ बहती है। इससे भी ज़्यादा जो भी सुनने की स्थिति में है, वह अपनी ही आवाज़, अलग-अलग सुर में, अलग-अलग गलों से सुनना पसंद करता है। उसे आवाज़ की विविधता चाहिए। बात की नहीं। यह बात मैंने इस समाज से कई बार, कम से कम मेरे हिस्से में अबतक जो समाज आया है, उससे हासिल की है। रवीश जी अभी भी जिस न्यूज़ रूम में आठ घंटे या उससे ज़्यादा ही बिताता हूं। वहाँ आज कल चुनाव का माहौल है। कई साथी पत्रकारों की चिंता यही है कि फलां व्यक्ति उम्मीदवार बन जाये, तो मैं उसका मीडिया प्रभारी बन जाऊंगा। फलां उम्मीदवार जीत जाये, तो मैं उसका पीए हो जाऊंगा। समाज का पक्ष यही है कि जो चल रहा है उसे बदलने की कोशिश मत करो। हिन्दू-मुसलमान अलग-अलग रहते आए हैं, तो एक साथ घर मत ढूंढो। न हिन्दू मुसलमान मोहल्ले में, और न मुसलमान हिन्दू मोहल्ले में। दोनों मिलकर तो इस देश के किसी मोहल्ले में घर न ढूंढे।

लेकिन रवीश जी, हम अपने अनुभव जुटा रहे हैं। आप हमसे, जाहिर है अपनी मेहनतों के कारण, बेहतर स्थिति में हैं। कोई आपसे सीधे ये पूछने की हिम्मत नहीं कर सकता है कि क्या किसी मुस्लिम लड़की से चक्कर है क्या? कोई आपसे जबरदस्ती यह कहलवाने की ज़िद नहीं करेगा कि कहो, मोदी ज़िंदाबाद। अगर आपने जवाब में कह दिया कि हम तो कुत्तों को भी ज़िंदा और आबाद देखना चाहते हैं, मोदी तो फिर भी आदमी है। तो आपके बारे गॉसिप नहीं फैलाये जाएंगे, आपको दफ़्तर में उपेक्षित नहीं कर दिया जाएगा।

तो नमस्कार रवीश कुमार जी, प्लीज़ समाज को, देश को उंसकी गति प्राप्त करने दीजिये। आप डांटिए तो कभियो नहीं। कहिये ना कभी कि कभी रवीश कुमार मत बनना... हम सुनेंगे और मानेंगे। कौन आपको सेलिब्रिटी कहता है। हम तो पकड़ लेते हैं किस प्राइम टाइम में आपके मेहमान पलट गए या आप ठीक वैसा शो नहीं कर पाये जैसा आपने सोचा था। और आप इस गलतफ़हमी में तो मत्ते रहिएगा गा टीवी पर कुछ महान कर रहे हैं। वो जैसे आपसे अपनी किताब पर बातचीत के दौरान राजदीप ने कहा था ना कि नरेंद्र मोदी को मनमोहन सिंह को कम से कम एक बार धन्यवाद ज़रूर देना चाहिए कि वो बिलकुल नहीं बोले। वैसे ही आप वाई सिक्योरिटी वाले संपादकों को धन्यवाद दीजिये कि वो कुछ नहीं कर रहे हैं। बाप रे बाप देखते देखते, मतलब लिखते लिखते 870 शब्द हो गया, इसमें कितनी वर्तनी की गलतियाँ होंगी उसको ठीक कर के पढ़ लीजिये गा। इतना ही ठीक ना !!!

और बाकी, गोली मार भेजे में की भेजा शोर करता है।

(किसका ये मत पूछिए गा )




(रचनाकार-परिचय :

जन्म : बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में 9 जुलाई 1989 को
शिक्षा : वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा से। प्रभात खबर व भास्कर से संबद्ध रहे।
सृजन : अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस में लेख, रपट, कहानी, कविता
संप्रति : हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : gunjeshkcc@gmail.com )



read more...

शनिवार, 29 अगस्त 2015

कैसे बढ़ी मुसलमानों की आबादी और हिंदुओं की घटी































रक्त रंजित गोधरा, रस रूप मंथन करे
शव की उड़ती धूल, शिव का महिमा मंडन करे



गुंजेश की क़लम से

ठीक है, मेरी गणित कमज़ोर है। लेकिन फिर भी मैं समझना चाहता हूँ कि जब किसी हिन्दू घर में कोई मुसलमान बच्चा पैदा नहीं हो सकता तो फिर, मुसलमानों की आबादी बढ़ी कैसे, और कैसे हिंदुओं की घटी। 2001 में हिंदुओं की आबादी 82.75 करोड़ थी जो 2011 में 96.63 करोड़ हो गई है। फिर सरकार इसे घटा हुआ क्यों बता रही है? क्या वृद्धि में प्रतिशत कमी जनसंख्या में भी कमी है? 2001 के मुक़ाबले 2011 में 13 करोड़ से ज़्यादा हिन्दू बढ़े हैं। वहीं 2001 में आबादी का 13.4 प्रतिशत हिस्सा रहे मुसलमानों की आबादी 2001 में 13.8 करोड़ थी जो अब 3.42 करोड़ बढ़ कर 17.22 करोड़ हो गई है। इस लिहाज से देखा जाय तो 2001 से 2011 के बीच जहां मुसलमों की आबादी में 24.78 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है वहीं हिन्दू भी इस अवधि में 15.7 प्रतिशत बढ़े हैं। जनसंख्या में 2.3%, 1.7%, 0.7%, 0.4% की हिस्सेदारी रखने वाले धर्मावलंबी जो क्रमशः ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन हैं की संख्या में भी क्रमशः 15.5%, 8.4%, 6.1% और 5.4 की बढ़ोतरी हुई है। तो गज़ब देश के देश भक्त नागरिकों, एक बात तो पक्की है कि किसी भी कौम की संख्या कम नहीं हुई है, प्रतिशत वृद्धि में कम-बेसी हुआ है। देश की जनसंख्या बढ़ी है तो इसमें हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन सबका योगदान है और अभूतपूर्व योगदान है।
इतना ही नहीं, एक आंकड़ा देखिये। यह दशक वार जनसंख्या में प्रतिशत वृद्धि का आंकड़ा है। जो यह भी बताता है कि हिन्दू बनाम मुसलमान आबादी में प्रतिशत वृद्धि के मुक़ाबले में, हिन्दू कभी आगे नहीं रहे, मतलब यह ब्रेकिंग न्यूज़ वाला मामला नहीं है। ये आंकड़े साथ ही यह भी बताते हैं कि दशक दर दशक, हिन्दू बनाम मुसलमान आबादी में प्रतिशत वृद्धि का अंतर लगातार काम होता जा रहा है।

वर्ष 1961 की जनगणना के मुताबिक, 1951 के मुक़ाबले मुस्लिम आबादी में 32.49% की वृद्धि हुई थी तो हिन्दू आबादी में 20.76 % की। 1971 में 61 के मुक़ाबले मुस्लिम आबादी में 30.92 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और हिन्दू आबादी 23.68 की औसत से बढ़ी थी। 1981 में 71 के मुक़ाबले मुस्लिम आबादी 30.78 प्रतिशत की दर से बढ़ी तब हिन्दू आबादी की बढ़ोतरी दर 24.07 प्रतिशत थी। 81 के मुक़ाबले 1991 में हिन्दू आबादी 22.71 प्रतिशत से बढ़ी तो मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर 32.88% रही थी। 2001 में हिन्दू आबादी 19.92 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी, 1991 के मुक़ाबले, तो इस दौरान मुस्लिम आबादी में वृद्धि दर 29.52 प्रतिशत रही। 2001 के मुक़ाबले 2011 में हिन्दू आबादी की वृद्धि दर 16.76 प्रतिशत रही तो मुस्लिम आबादी में यह 24.60 दर्ज़ की गई। तो जिम्मेदार नागरिकों अगर हम पिछले 50 साल के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि मुस्लिम आबादी के प्रतिशत वृद्धि में भी कमी आ रही है। लेकिन, बहुमत वाले भाई लोगों जनगणना 2011 के आंकड़ों से आप लोगों को चिंतित तो होना चाहिए क्योंकि सेक्स रेशिओ (लिंगानुपात) के पेरामीटर पर देखें तो मुसलमाओं में जहां 951 महिला प्रति हज़ार पुरुष है, हिंदुओं में यह 939 महिला प्रति हज़ार पुरुष है।


अब आइये, गणित के जंजाल से निकल कर सामाजिक विज्ञान के समर में चलें। पहली बात जो सरकारी विज्ञापन से चलने वाले देश के प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र आपको नहीं बताएँगे वह यह कि ये आंकड़े ऐसे क्यों हैं? क्या धर्म आधारित जनगणना का कोई ताल्लुक सीधे धर्म से है भी? क्या जनसंख्या के बढ़ने का सीधा ताल्लुक, यह एक मात्र ताल्लुक धर्म से है? यह इसके कुछ अधिक गहरे सामाजिक आर्थिक कारण हैं। फिलहाल मैं सच्चर कमेटी के द्वारा उठाए गए समस्याओं और उसके सुझावों पर नहीं जाऊंगा। पर एक ज़रा पढ़िये कि द हिन्दू अख़बार को दिये बयान में अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान, मुंबई के प्रोफेसर और जनसंख्याविद P. Arokiasamy क्या कहते हैं। P. Arokiasamy कहते हैं कि यह एक सामान्य रुझान है। शिक्षा का सत्र बढ़ने और परिवारों की जरूरतों में बदलाव की वजह से जनसंख्या की वृद्धि दर में कमी आना स्वाभाविक और उम्मीद के मुताबिक है। उन समुदायों में जो ज़्यादा शिक्षित हैं और जिनतक स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतर पहुँच है, वहाँ जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई है। P. Arokiasamy केरल का उदाहरण हमारे सामने रखते हैं और बताते हैं कि केरला में मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर पूरे राज्य में किसी और समुदाय के मुक़ाबले सबसे कम है। मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना....


आखिर मैं इन आंकड़ों पर इतना लंबा क्यों लिख रहा हूँ, क्योंकि मैं डरा हुआ हूँ, क्योंकि मुजफरनगर अभी बांकी है, क्योंकि इस देश में अभी बीजेपी की सरकार है, जो आरएसएस, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक इकाई है, आरएसएस जो भारत को एक हिन्दू राष्ट्र की तरह देखना चाहता है, और अभी अभी मैं जमशेदपुर को जलते- झुलसते महसूस किया है। मैं सोच रहा हूँ कि सरकारें और संस्थाएं आंकड़ों से जो प्रामाणिकता हासिल करती हैं, उससे कैसे बचा जाय। खास तौर से, ऐसे गज़ब देश में। जहां दो लोग आपसी बातचीत में भी अपनी बात मनवाने के लिए तुरंत किसी तीसरे अंजान व्यक्ति से कंसेंट लेते भी नहीं घबराते हैं ; क्यों भाई साहब सही कह रहा हूं न !!, और यह सिर्फ इसलिए होता है कि बंदे के पास इतना पेशेंस नहीं होता कि वह अपनी बात के पक्ष में जिरह कर सके। यह राजनीति का “फैसला ऑन द स्पॉट काल” है, यह राजनीति का आरएसएस काल है। अभी तो सिर्फ आंकड़े आए हैं। अब गली मोहल्लों में चर्चा भी पहुंचेगी कि हिन्दुत्व पर खतरा है। हिन्दू अपनी संख्या न भी बढ़ाएँ तो भी हिंदुओं को मुसलमानों की संख्या कम करने पर सोचना होगा, ऐसी बातें फैलाई जाएंगी। मैं डरा हुआ हूँ कि नेक लेकिन असहिष्णु लोगों से भरा यह समाज इन अफवाहों से कैसे लड़ेगा, अफवाहों से लड़ेगा या अफवाहों के चक्कर में लड़ेगा। मैं डरा हुआ हूँ इसलिए क्योंकि 60 प्रतिशत साक्षारता वाले देश में, किसी भी बात को धार्मिक उन्माद और फिर दंगों का रूप दिया जा सकता है। सरकार और मीडिया को जिस तैयारी के साथ ऐसे आंकड़े जारी करने चाहिए वो तैयारी नहीं की गई, जनता तक पूरी और साफ-साफ जानकारी नहीं दी गई। मोटा-मोटी जानकारी, ऐसे मामलों में नीमहकीम से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो सकती है। इसलिए मैं अपील करता हूँ, अगर आप वाक़ई हिन्दू या मुसलमान होकर सोचते हैं तो इन आंकड़ों के हिस्ट्री, जियोग्राफी, एकोनोमिक्स, पोलिटिकल साइंस, फ़िजिक्स, केमेस्ट्री सबके बारे जानिए फिर राय बनाइए।वरना मत सुनिए कि कौन सी सरकार कौन सा आंकड़ा जारी कर रही है।




(रचनाकार -परिचय:
जन्म: बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में 9 जुलाई 1989 को
शिक्षा: वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा से। प्रभात खबर व भास्कर से संबद्ध रहे।
सृजन: अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस में लेख, रपट, कहानी, कविता
संप्रति: हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क: gunjeshkcc@gmail.com )

read more...

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

रेड ज़ोन यानी झारखंड का औपन्यासिक दस्तावेज़

समस्याओं को समग्रता में डायग्नोस करता उपन्यास


















गुंजेश की क़लम से
हम अपनी पीढ़ी में अंतिम इतिहास नहीं लिख सकते, लेकिन हम परंपरागत इतिहास को रद्द कर सकते हैं और इन दोनों के बीच प्रगति के उस बिंदु को दिखा सकते हैं, जहां हम पहुंचे हैं। सभी सूचनाएं हमारी मुट्ठी में है और हर समस्या समाधान के लिए पक चुकी है।  -ऐक्टन

एलोपैथ में अक्सर होता है कि कान की बीमारी के इलाज के लिए नाक में दवाई दी जाती है। साहित्य रचना बीमारी का इलाज भले ही न हो, लेकिन उसको डायग्नोस करने का एक तरीका तो जरूर है। विनोद कुमार रचित रेड जोन, ऐसा ही एक उपन्यास है जो हमारे आसपास मौजूद समाजों (दल, वर्ग, जाति, राष्ट्र, या जो भी नाम हम देना चाहें) में समाधान के लिए पक चुकी समस्याओं को समग्रता में डायग्नोस करता है। रेड जोन, में सिर्फ रेड जोन की बात नहीं है बल्कि यह पूरे झारखंड और उसके बनने के क्रम में यहां की समाजिक हलचलों का दस्तावेज है। खुद लेखक इस बारे में लिखते हैं ""सच पूरा का पूरा देखना तो कठिन है ही, लिखना और भी ज्यादा कठिन। कुछ यथार्थ और कल्पनाओं को जोड़ कर यह रचना बनी है। मौजूदा राजनीति, राजनेताओं, पत्रकारों के ब्योरे में यथार्थ का अंश ज्यादा है। झारखंड को लाल रंग देती भूमिगत गतिविधियों और प्रवृत्तियों में कल्पना का अंश ज्यादा।'' (दो शब्द)
रेड जोन में दर्ज समय झारखंड अलग राज्य बनाने की मांग से लेकर अलग राज्य बनने के कुछ बाद तक का है। पहली नजर में उपन्यास का नायक मानव दिखता है जो कि लौहनगरी में राजधानी से निकलने वाले एक अखबार का स्टॉफ रिपोर्टर है। लेकिन पाठ खत्म होते ही यह सवाल उठता है कि क्या वाकई मानव उपन्यास का नायक है? या वह उस दिक (स्पेस) में जिसमें उपन्यास रचा गया है, के काल (टाइम) का प्रतिक है। जिसमें सब कुछ घटित हो रहा है। लेकिन उन तमाम घटनाओं पर उसका कोई प्रभाव नहीं है। वह सिर्फ मौजूद है और कई बार तो पीड़ित भी।

उपन्यास अपने आधे हिस्से में जिस सवाल को प्रमुखता से उठाता है वह है ""... अब देखिए न, इस लौह कारखाना के चलते इस औद्योगिक शहर के रूप में झारखंड में समृद्धि का एक द्वीप जरूर बन गया है लेकिन यहां के आदिवासियों और मूलवासियों को क्या मिला?''

सुप्रसिद्ध आलोचक वीर भारत तलवार ने अपने किसी लेख में शिबू सोरेन का जिक्र करते हुए लिखा था कि कभी सोचा था की उन पर किताब लिखूंगा लेकिन अब स्थितियां काफी बदल गईं हैं। रेड जोन में गुरुजी की कहानी शिबू सोरेन की उन्हीं बदली हुई स्थितियों का बयान है। गुरुजी, बाटूल, मुक्ति मोर्चा, मंडल जी, विस्थापन की राजनीति। भाजपा, दादा, बिहार, वनांचल की मांग। दुर्गा, कालीचरण, तेज सिंह, लेवाटांड़, पछियाहा राजनीति, दारोगा, बंदूक और उसकी नली से निकलने वाली सत्ता का स्वप्न। दो अन्य नेता एके राय और महेंद्र सिंह। इन सब से गुजरने वाला मानव, मानव पर नजर रखने वाला उसका अखबार और अखबार के संपादक हर्षवर्द्धनजी।

क्या हम यह मान सकते हैं कि ऐतिहासिक समस्याएं हमेशा व्यक्तिगत व्यवहार और व्यक्तिगत सनक की समस्या होती है। चाहे वह अलग राज्य को लेकर चला आंदोलन हो या फिर राज्य बनने के बाद सत्ता हासिल करने की राजनीति, इत्तिफाक से झारखंड में हमेशा व्यक्तियों के इर्दगिर्द ही नाचती रही है। "" इसके अलावा झारखंडी समाज में एक और द्वंद्व है, वह है बाहरी और भीतरी का। कॉमरेड राय ने इस विभाजन- रेखा को एक दशक पहले बहुत गहरा कर दिया था।'' (पृष्ठ सं. : 121) में लेखक व्यक्ति आधारित राजनीति के साथ-साथ नेताओं के व्यक्तिवादी होने पर भी टिप्पणी कर रहा है। मानव खुद जेपी आंदोलन से निकल कर पत्रकारिता के क्षेत्र में अाया है और जन आंदोलनों की ओर सहानुभूति रखता है। लेकिन यह मानव का जेपी आंदोलन के मोह से निकला हुआ मन है या पत्रकारिता में रम चुका वस्तुनिष्ठ दिमाग कि वह किसी भी व्यक्ति पर चाहे वह गुरुजी हों, एके राय हों, दादा हों या महेंद्र सिंह हों पूरी तरह भरोसा नहीं करता। वास्तव में यही उपन्यास के पूरे क्राफ्ट की विशेषता और सफलता है कि वह किसी को हीरो नहीं बनाता। वरना हाल के दिनों में आदिवासियों और जन आंदोलनों के हीरो गढ़ने की जो परंपरा चल निकली है वह इतिहास दृष्टि में बहुत अधिक गलतियां और भ्रम पैदा कर रही हैं।

कालीचरण और दुर्गा

दो आदिवासी चरित्र उभर कर सामने आए हैं। कालिचरण बरास्ते गुरुजी वामपंथ और फिर माओवाद की शरण में चला जाता है। दुर्गा पर समय की नजर कुछ ऐसी पड़ी है कि उसे यकीन होने लगा है कि सत्ता बंदूक के रास्ते से ही मिल सकती है। कालीचरण तो पहले से ही हिंसा के मार्ग के पक्ष में नहीं था।
लंबी बहसों और हत्याओं के एक सिलसिले के बाद दुर्गा को भी लगने लगता है कि ""लड़ें-मरें हम और निर्णय कोई और ले। हमारे यहां ऐसा नहीं होता।.....
हमारे यहां नहीं होता माने हमारे समाज में नहीं होता। आदिवासी समाज में नहीं होता।'' (पृष्ठ सं. 334)  दरअसल झारखंड की विडंबना यही रही कि "" आम झारखंडी नेता समाजवादी आंदोलन मुखी नहीं है और जो लोग आंदोलन में हैं वे झारखंडी नहीं हैं।'' (पृष्ठ सं. 372) और इन सब स्थितियों में कई कालीचरण और दुर्गा बनते जा रहे हैं। जो अपनी समाज की तरह "राज्य' की तलाश में एक खेमे से दूसरे खेमे में जाते हैं और हर जगह से ठगे से लौटते हैं।

यह कहने में कोई संकाेच नहीं है कि लेखक ने वो सारे खतरे उठाए जो इस उपन्यास को व्यक्तिवादी और सेंसेशनल बना सकता था और लेखक उन सब खतरों के बीच से समाज में फैले कमिटमेंट की कमी को दर्ज करने में भी कामयाब हुआ। चाहे वह पत्रकारिता से जुड़े मानव के अपने सवाल हों या फिर राजनीतिक हलकों से जिंदा नजिरों को उठाना। वीर भारत तलवार ने फ्लैप पर सटीक ही लिखा है कि लेखक के जवाबों से कोई सहमत या असहमत हो सकता है लेकिन उसकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता। अंत में सिर्फ इतना ही कि यह न केवल एक राजनीतिक उपन्यास है बल्कि पिछले कुछ समय का एक महत्वपूर्ण डाक्यूमेंट भी है।


पुस्तक : रेड ज़ोन
लेखक : विनोद कुमार
 प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली
 कीमत : 395
 पृष्ठ : 400

दैनिक भास्कर के झारखंड संस्करणों में 12 फरवरी 2014 को प्रकाशित

(रचनाकार -परिचय:
जन्म: बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में 9 जुलाई 1989 को
शिक्षा: वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर महात्मा  गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा से
सृजन: अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस  में लेख, रपट, कहानी, कविता
संप्रति: भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क: gunjeshkcc@gmail.com )



read more...

बुधवार, 18 जून 2014

डुबोया होने ने, न होता तो क्या होता



 








गुंजेश की कविताएं

1.

तुम जवाब मत दो
मैं सवाल भी नहीं करूंगा
मेरा और तुम्हारा रिश्ता
बादल और धूप का हो
लोग, एक की उपस्थिती में
दूसरे को चाहें

2.

अरसा हो गया
तुमसे मिले हुए
अब तो तुम्हें याद भी नहीं होगा कि
आखरी दिन मैंने शेव किया था या नहीं
आखरी दिन तुमने कौन से रंग का सूट पहना था
अब कुछ ठीक से याद नहीं पड़ता
वैसे भी, कितने तो रंग पहन लेती थी एक साथ
इसलिए याद नहीं अब कोई भी एक
तुम मेजेंटा कहो, पर्पल कहो
मुझे तो सब आसमानी लगते हैं
...
आसमानी रंग, आसमानी ख्वाब
आसमानी साथ
......

अद्भुत तरीके से
तुम्हें
हरा, नीला और लाल
तीनों रंग पसंद थे
ताज्जुब है कि तुम
पसीने के गंध को भी रंगों में ही देखती थी
पहले झगड़े के बाद तुमने मेरे पसीने के पीले
गंध से ही मेरी उदासी पहचानी थी
और दुलार के हरे दुप्पट्टे से
पसीने का पीलापन पोछा था
उस दिन पहली बार मैंने इंद्रधनुष को चूमा था
छुआ था, जाना था.

3.

तुम पड़ी हो
मेरे यादों के बुक शेल्फ में
उस किताब की तरह
जो हर बार दूसरी को ढूँढने में सबसे पहले आती है हाथ
रख दूँ तुम्हें कहीं भी किसी भी कोने में
कुछ भी ढूंढते हुए, पहुंचता हूँ तुम्हीं तक ...


4.

इस शहर में
जहां अब हूँ
तुम्हारे साथ से ज्यादा तुम्हारे बिना
जिसके लिए कहा करता था
'तुम हो तो शहर है, वरना क्या है'
'नहीं, शहर है तो हम हैं
हम, हम नहीं रहेंगे तो भी शहर रहेगा' तुम्हारी हिदायत होती थी.
अपनी रखी हुई कोई चीज़ भूल जाने
रसोई में एक छिपकली से डर कर चाय
बिखेर देने के बावजूद
तुमने बेहतर समझा था इस शहर को
कैसे झूम कर बरसता था यह शहर, उन दिनों में
जिनको अब कोई याद नहीं करता
तुमने ही तो कहा था - 'जब बहुत उमड़-घुमड़ कर शोर मचाते हैं बादल
और बरसते हैं  दो एक बूंद ही,
तो लगता है जैसे, खूब ठहाकों के बाद
दो बूंद पानी निकली हो किसी के आँखों
से'..........


5.

हमने कुछ नहीं किया था
बस ढूंढा था
तुम्हारी हंसी को, अपने चेहरे पर
तुमने
मेरे आंसुओं को अपनी आँखों में


अब भी कुछ नहीं हुआ
हमने
पेंसिल और इरेज़र की तरह
एक दूसरे की चीज़ें
एक दूसरे को लौटा दी है .....

6.

कमरा ठीक करना भी कविता लिखने जैसा है
जब आप एक कविता लिख रहे हों तो दूसरी नहीं लिखी जाएगी
कवि ठीक नहीं कर पाते हैं
अपना कमरा
कई-कई दिनों तक
ज़रूरी नहीं कि लिख रहे हों कविता ही
मन में अ-कविता की स्थिति हो
तो भी कमरा ठीक कर पाना, बेहद मुश्किल है
कि ऐसे में आप भूल जाएंगे/जाएंगी अपनी ही रखी कोई चीज़......
कि किसी पंक्ति के बीच से गायब
हो जाएगा कोई संयोजक
और बेमेल हो जाएगी
अगली लाइन पिछली से....
कि कमरा ठीक करने के लिए उठते ही
याद आएगा
टिकट के लिए स्टेशन जाना
स्टेशन जाते ही माँ के लिए चश्मा बनवाना, दवाइयाँ ले लेना
अपनी छोटी सी भतीजी के लिए
जिसे पीला रंग इतना पसंद है कि वह पिता के चेहरे से ही पहचान लेती है
कि दिन सुनहरा पीला रहा या उदास पीला
एक बहुरंगी पीला फ्राक....
और इस तरह से रह जाएगी एक कविता
और रह जाएगा एक कमरा
ठीक होते-होते
 ......

कि कविता लिखना प्रेम करने जैसा है
कि जिसके लिए भूलनी पड़ती है सारी दुनिया
कि जिसके लिए सारी दुनिया याद करती है आपको
कि आपकी सारी दुनिया सिमट आती है आप दोनों के बीच
आपके मन-मस्तिष्क से बाहर
दो हथेलियों के बीच, उलझी हुई उँगलियों में
जैसे गद्य और पद्य की किताबें रखीं हों शेल्फ में
एक बाद एक, अपने रखे होने में बेतरतीब
अनुशासित और अनुशासनहीन दोनों एक साथ
भरे पूरे जीवन की तरह 
कि प्रेम करना जीवन को ठीक करना है.......

7.

उसने जैसा सोचा वैसा लिखा
जैसा लिखा वैसा जीया
जैसा जीया वैसा स्वीकार किया
इसलिए वह लगातार अनुपयोगी होता हुआ
पागलों में शुमार किया गया।
……

बहुत ज़रूरी था
कि, वह जैसा सोचे उसमें मिला दे थोड़ी सी
वैसी सोच जो वह नहीं सोचता
कि वह जैसा जिए उसमें मिला दे
थोड़ा सा वैसा जीना जो वह नहीं जीता
कि वह जो स्वीकारे उसमें मिला दे
वह स्वीकृति भी जो उसकी नहीं है
कुल मिला कर यह पैकेजिंग का मामला था
उसे एक पैकेट होना था
एक ऐसे उत्पाद का पैकेट जो कि वह नहीं था
बाजार के विशेषज्ञों का मानना था इससे उपभोक्ता चौंकेगा
'उपभोक्ता का चौंकना' उत्पाद से  ज़्यादा अहम था
लेकिन, वह, वह था
जिसने पहली बार प्रेम करने के बाद चौंकना बंद कर दिया था
और अब भी उसे माँ और विचार
दोनों की याद बुरी तरह परेशान कर देती थी
था, था की बहुलता से आप इस बात की तस्सली न कर लें
कि  वह आपके बीच नहीं रहा
वह है, अगर आप बर्दाश्त कर सकें उसकी असहमतियों को
तो आपके विचार के विरोध में एक विचार के रूप में
आपकी नफरतों के विरोध में एक प्रेम के रूप में
वह है, तमाम तालाबों में प्यास के रूप में
छायायों में धुप के रूप में
वह है बेटी की होटों में पुकार के रूप में ……

8.

रोज़-ब-रोज़
दर-ब-दर
सार्वजनिकता के एकांत में
बहुमत के उमस से लथपथ
भाषा के बिना अभिव्यक्त होने की आस लिए
कई शब्द हैं, दम तोड़ रहे हैं
और इधर
जो है
और जो नहीं है, उस सबके बीच
तुम्हारा होना एक पुल है
जिससे होकर सारी त्रासदियों को होकर गुज़रना है


(कवि-परिचय:
जन्म: बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में 9 जुलाई 1989 को
शिक्षा: वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर महात्मा  गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा से
सृजन: अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस  में लेख, रपट, कहानी, कविता 
संप्रति: भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क:gunjeshkcc@gmail.com)




हमज़बान पर गुंजेश की रचनाओं को पढ़ने के लिए क्लिक करें



read more...

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

मुल्क के लाल कब तक रहें बदहाल !

















आज़ादी के संग्रामी व दुमका के पहले सांसद की विधवा के मार्फ़त 
























गुंजेश की क़लम से 


यह सरायदाहा गाँव है. यहीं आज़ादी के नामवर सिपाही लाल हेंब्रम उर्फ़ लाल बाबा  ने विदेशी दासता के क्रूर दस्तावेज़ को मटियामेट करने की कोशिश की थी, जिसकी उन्हें सज़ा भी मिली.लेकिन सत्ता से विद्रोह करने के खामियाजा से उनका  परिवार आज भी ज़ार-ज़ार है. महज़ सत्ता के चेहरे अपने हैं! अपनी सारी की तरह ही उनकी विधवा मोंगली देवी तार-तार हो चुकी ज़िंदगी को समेटने के अथक प्रयास में है. इस सिलसिले में 28 जुलाई को उसे मुख्यमंत्री से भी उस तोते की कहानी ही मिली.काम हो जाएगा! वह मिली तो भी किसी व्यक्तिगत हित के लिए नहीं उनकी मांग थी कि मुख्य सड़क से गाँव को जोड़ने वाली जगह कुसपहाड़ी मोड से सरायदाहा गाँव तक सम्पूर्ण सड़क का निर्माण हो, लाल बाबा के नाम से गाँव के बाहर तोरण द्वार बनाया जाय और स्कूल के पास वाली जगह पर गाँव के बच्चों के खेलने के लिए स्टेडियम का निर्माण किया जाय। आज अगर आपके मोहल्ले में आपके सांसद या विधायक या जिला परिषद के ही किसी नेता का घर हो तो आपको बिजली, पानी, सड़क की तकलीफ तो बिलकुल नहीं होगी, लेकिन शहर के पहले और सबसे कर्मयोगी सांसद के घर न तो सड़क पहुंची है, न ही गाँव में पानी और स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था हो पाई है। 21 अगस्त भी गुज़र गया. लालबाबा की 37 वीं पुण्यतिथि थी.विधवा के आंसूं में सरकार की कलई पुनः: धुल गयी.
9 अगस्त 1942 को जब देश भर में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ था तो संथाल परगना जिले के मुख्यालय में भी अँग्रेजी सरकार का जबरदस्त विरोध हुआ था और मुख्यालय में कांग्रेसी झण्डा भी फहराया गया था, बाद में अँग्रेजी सरकार की फौज आंदोलनकारियों के नेता लाल हेंब्रम की तलाश में लग जाती है और पकड़ नहीं पाने पर उन्हें भगौड़ा घोषित कर देती है। लाल हेंब्रम भूमिगत होकर सरकार के खिलाफ आंदोलन जारी रखते हैं, लाल सेना का गठन करते हैं। आज भी लाल हेंब्रम को अँग्रेजी सरकार से लड़ते-भिड़ते संथाल आदिवासियों को संगठित कर आज़ादी मिलने तक अंग्रेजों के नाक में दम कर देने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है। आज़ादी के बाद 1952 पहले चुनाव में कांग्रेस लाल हेंब्रम को टिकट देती है, भारी मतों से जीतकर लाल हेंब्रम दुमका के पहले सांसद बनते हैं. पाँच साल के कार्यकाल के दौरान दौरान उन्होंने डिवीसी (दामोदर वैली कार्पोरेशन) को स्थापना करवाई । दुमका में संथाल परगना महाविदयालय और राजकीय पोलेटेनिक की स्थापना और दुमका और पश्चिम बंगाल सीमा पर स्थित मसांजोर डैम के  निर्माण में भी  उनका महत्वपूर्ण योगदान है। 16 करोड़ की लागत वाला यह डैम सिर्फ एक वर्ष में बन कर तैयार हो गया गया था।  









 






पहले सांसद के घर-गाँव में 

   
     
जब हम मोंगली देवी से मिलने के के लिए सरायदाहा गाँव के लिए निकले थे तो यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि सचमुच में यह एक पूर्व एवं प्रथम सांसद का गाँव है और गाँव में उनके घर को पहचानना और उसपर यकीन करना और भी ज़्यादा मुश्किल था। दुमका-रामपुरहाट सड़क पर दुमका से 15-17 किलोमीटर चलने के बाद आप कुसपहाड़ी मोड पहुँचते हैं और फिर वहाँ से दाईं तरफ मुड़ जाते हैं, एक ठीक- ठाक आरामदेह सड़क आपको सरायदेहा गाँव तक ले जाती है। शुरुआत में ही, 1964 में अपनी मृत्यु से 6-7 महीने पहले लाल बाबा कि और से बनवाया गया हाई- स्कूल आपको नज़र आता है आप खुश हो सकते हैं इस गाँव में इतना बड़ा स्कूल , सड़क अभी भी ठीक ठाक है। थोड़ा और आगे जाने पर आपको एक मिडिल स्कूल भी मिलेगाआगे बढ़ते हैं, दाईं तरफ़ एक मजार जैसा कुछ है, श्रुति हेंब्रम,(उम्र 12साल) को यहीं पर दफ़नाया गया था कुछ साल पहले जोंडिस से उसकी मृत्यु हो गई थी, यह इत्तेफाक है या कोई बुरा सच सड़क की बाईं तरफ़ ही स्वास्थ्य केंद्र है, स्वास्थ्य विभाग ने विज्ञापन लगा रखा है “कोंडम को अपनाएं, दो बच्चों में तीन साल का अंतर बनायें”। बच्चे ज़िंदा कैसे रहेंगे सरकार इसका कोई विज्ञापन क्यों नहीं बनाती? खैर, आरामदेह सड़क पर हम आगे बढ़ते हैं। और आखिर सड़क खत्म हो ही जाती है, सड़क के खत्म होते ही शुरू होता है लाल बाबा का घर। लाल बाबा को बचपन में देखने वाले लीताई हैंब्रम बताते हैं कि 2 साल पहले सड़क बनी है पर लाल बाबा का घर छोड़ दिया गया “पता नहीं काहे”। टूटी-फूटी सड़क के ठीक बगल में मिट्टी के दीवार पर खपरैल का छत, यही है लाल बाबा का घर। घर के मुख्य द्वार के ऊपर आपको, सचिन की हेलमेट की तरह, तीन रंगों की पट्टी नज़र आएगी, गुलाबी, सफ़ेद और हरा, मैं समझता हूँ यह तिरंगा बनाने की कोशिश रही होगी जो संसाधनों के कमी के कारण अधूरी रह गई।






















कम नहीं हैं जीवन के रंग

दिमाग में था की बाद में किसी से पूछूंगा कि यह तिरंगा बनाने की ही कोशिश हैं न ! पर गोबर से लिपे और चुने से पुते उस घर आँगन में जीवन के जिस रंग को मैंने महसूस किया वह उपेक्षा का रंग था। हमारे लिए कुर्सियाँ लगाई जाती है मोंगली देवी कासे के लोटे में हमारे लिए पानी लाती हैं और बड़े एहतराम से हमें पारंपरिक नमस्कार भी करती हैं। हम पानी-पानी हो जाते हैं, कुछ दिन पहले इन्हें ही हमारे जिला के उपायुक्त ने मंच से आदेश दे कर उतरवा दिया था। क्या व्यवस्था पर किसी का ऋण नहीं चढ़ता?  मोंगली देवी अब ऊंचा सुनती हैं, हिन्दी बोल नहीं पाती पर बिना बोले बिना समझाये वह बहुत कुछ बोल समझा जातीं हैं 6 महीने से सांसद को मिलने वाला उनका पेंशन बंद है, बैंक कहती है सबूत लाइये की आप लाल हेंब्रम की पत्नी है। संथाली में यह कहते हुए वह मुस्कुरा देती हैं। यही हसना-मुस्कुराना चुनौती है व्यवस्था के लिए।
महात्मा गांधी के भारत और पूर्व सांसद के गाँव के उपेक्षा की कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि यहाँ भी आपको वह सब कुछ देखने को मिल जायेगा जो आप किसी भी गाँव में देख सकते हैं। अनियमितताओं में समानता हमारी सरकारी योजनाओं की खासियत है। फिलहाल सरायदाहा में एक स्वास्थ्य उप केन्द्र बन रहा है योजना की कुल राशि दस लाख रुपये है। गोपी नाथ सोरेन, जो उस योजना के मुंशी है और गाँव के ही निवासी हैं बताते हैं कि इस्टिमेट तो चिमनी ईटा का है, पर चिमनी ईटा लगेगा तो काम कैसे होगा। इंजीनियर साहब को कहते हैं की ठीक माल नहीं आ रहा है तो बोलते हैं जो जो आ रहा है उसीमें काम करो। जादे बोलेंगे तो काम से निकाल देगा। योजना में काम करने वाले राजमिस्त्री नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं जिस तरह काम हो रहा है उसमें तो बिल्डिंग पाँच से सात लाख में बन जायेगा। हम बचे पैसों में उनके हिस्से के बारे में पुछते हैं वो हंस कर कहते हैं मिलता है पर जादे तो साहबे लोग के पाकेट में जाता है। यह सब बात करते हुए हम लालबाबा की समाधि पर पहुँच जाते हैं, यह समाधि उनके ही ज़मीन पर उनके अपने बेटे ने बनवाई है, मायावती याद आती हैं। कई बार इतिहास खुद को नहीं दुहराता। लालबाबा के परिवार ने नरेगा के अंतर्गत बनने वाले सिंचाई कुआं के लिए अपनी ज़मीन भी दी लेकिन अब सिंचाई कुआं का काम तीन महीने से अधूरा है, रुका है, खुला कुआँ किसी के लिए भी खतरनाक हो सकता है खैर इस गाँव में कोई प्रिंस नहीं रहता। 



















अब दस रुपये की भी साख नहीं!

लौटते हुए मोंगली जी चाय- बिस्कुट कराना चाहती हैं, हम थोड़े हड़बड़ी में हैं वह जल्दी से किसी को बिस्कुट लाने भेजती हैं। तब तक हम लीताई हैंब्रम से गाँव में डाक्टर की आवाजाही के बारे में पूछते हैं, लीताई हेंब्रम की अपनी समझदारी है “डाक्टर यहाँ काहे आयेगा, दुमका में रोगी देख के कमाता है यहाँ आयेगा तो उसको पैसा कौन देगा, आता है कभी-कभी ....”। चाय तैयार हो गई है चाय देते हुए मोंगली जी ने संथाली में जो कुछ कहा उसका आशय था “बिस्कुट लेने भेजे थे लेकिन डीलर बोला नोट ठीक नहीं है, लड़का को लौटा दिया”।
जिन लालबाबा के आवाहन पर कभी पूरा संथाल परगना अंग्रेजों के खिलाफ एक जुट हो गया था आज क्या उनके परिवार पर दस रुपये का भी भरोसा नहीं किया जा सकता।



इस व्यथा को आप तहलका के बिहार-झारखंड संस्करण, १५ सितम्बर ११ में भी पढ़ सकते हैं.


(लेखक परिचय 
जन्म: बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में ९ जुलाई १९८९ को
शिक्षा: वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर वर्धा से
सृजन: अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस  में लेख, रपट, कहानी, कविता
ब्लॉग: हारिल
संपर्क:gunjeshkcc@gmail.com

read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)