बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

पटना में कामकाजी स्त्री


तकिया और बस के सिवा कौन है उसका साथी 

प्रीति सिंह की क़लम से
सुबह का धुंधलका. रात की कालिमा को परे धकेलते हुए सूरज की हल्की-हल्की रोशनी बिखरने को तैयार थी. चिड़ियों का झुंड शोर मचाते हुए दाने की तलाश में निकल पड़ा हो. ओस की बूंदें यूं लग रही थीं मानो अपने प्रीतम से बिछड़ने का दर्द किसी नवयौवना की आंखों से छलक आये हों.. सब कुछ ठहरा-ठहरा.. अलसाया हुआ था...
लेकिन इन सबसे अलग एक तबका भोर की इस हल्की सी रोशनी में भी भाग रहा था. आपाधापी कर रहा था .. बड़ी उत्सुकता से जब मैंने इन्हें जानने की कोशिश की.. तो हैरान रह गई.. दरअसल.. ये परछाईयां जो भाग रही थीं.. ये वो महिलायें थीं.. जो कामकाजी हैं.. ऑटो और बसों में एक-दूसरे को धकियाते हुए आगे निकलने की इनकी होड़ इसलिए थी ताकि ये सही समय पर अपने ऑफिस पहुंच सकें. किसी को अपने शहर के किसी सड़क तक जाने की हड़बड़ी थी, तो कुछ महिलाओं को दूसरे शहरों की ओर रुख करना था. इसके लिए पहले उन्हें पहले ऑटो फिर ट्रेन पकड़नी थी.
लेकिन समस्यायें यहीं पर खत्म नहीं हुई थीं. ये तो बस एक शुरुआत थी. उसकी जो इन्होंने कामकाजी होने के एवज में चुकाई थी. कई घंटों का ट्रेन का सफर करने के बाद तय समय पर अपने ऑफिस पहुंचना इनकी पहली चुनौती थी. उससे भी बड़ी चुनौती थी अपने घर के सारे काम-काज को पूरा कर ऑफिस के लिए तैयार होकर सही समय पर निकलना. सुबह 4 बजे उठने के बाद भी उनकी ये तपस्या तब तक पूरी नहीं होती.. जब तक थक-हार कर घर लौटने के बाद वो फिर से अपने सारे काम-काज को निबटा न लें. काम-काज से यहां तात्पर्य उन कामों से हैजिसका न तो कोई तय रुटीन है.. और न ही कोई ड्यूटी आवर.. इसके लिए इन कामकाजी महिलाओं को कोई वेतन भी नहीं मिलता.. लेकिन.. फिर भी जन्म से लेकर मरते दम तक उसे ये घरेलू काम अनवरत करने पड़ते हैं.
कमोबेश ये हालत हर शहर, हर क़स्बे की है. लेकिन पटना जैसे शहर में तो हालात और भी बुरे हैंबुरे इसलिए क्योंकि यहां कुछ दिनों में लोगों के खान-पान और पहनावे में बदलाव तो आया है. लेकिन महिलाओं को लेकर पुरुषवादी मानसिकता में आज भी यहां बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है. सामाजिक रुढ़ियां लोगों को जकड़े हुई हैं.  कामकाजी महिलाओं के लिए हालात बहुत ज्यादा मुफीद नहीं हैं. आने-जाने के साधनों की कमी की वजह से महिलाओं को हर दिन परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है. पटना जैसे छोटे शहर में महिलाओं के लिए स्पेशल ट्रेन तो नहीं ही है. जो महिला बोगी है, उस पर भी पुरुषों का ही कब्जा अधिक नजर आता है. बंदी और हड़ताल में तो इन महिलाओं की हालत और भी ज्यादा खराब हो जाती हैऐसे में कभी ट्रेन छूट जायेतो फिर भगवान ही मालिक है.
मुझे याद आता है. रात 8 बजे ऑफिस से घर लौटने के दौरान मैंने पटना जंक्शन से घर जाने के लिए बस पकड़ी. बस में मेरी बगल वाली सीट पर एक महिला (जिनकी उम्र लगभग मेरे ही बराबर थी) बैठीं. रास्ते में बातचीत के दौरान पता चला कि वो हर दिन पटना बाइपास से मोकामा जाने के लिए सुबह 6 बजे घर से निकलती हैं. इसके पहले उन्हें सुबह जल्दी उठकर घर का सारा काम-काज निपटाना पड़ता है. घर पर अपनी छोटी सी बेटी को सास-ससुर पर छोड़कर वो हर दिन अपने काम पर जाती हैं. इस दौरान उन्हें बस स्टॉप तक जाने के लिए डेढ़ घंटे पैदल जाना पड़ता है. कई बार उनकी बेटी बीमार होती है. लेकिन उन्हें काम पर जाना ही पड़ता है. फिर भी आये दिन वो देर से ऑफिस पहुंचती हैं. वहां बॉस की झिड़कियां उन्हें सुननी पड़ती हैं. उन्होंने बताया कि कैसे घर लौटने के दौरान आये दिन ट्रेन में लोग बदतमीजी करते हैं. डांटने पर उल्टे वही लोग इन्हें ‘मनबढ़ू महिला’ की संज्ञा देते हैं. कहते हैं हमारे घर में ऐसी महिलायें हों तो हम उन्हें जिंदा न रहने दें. इन सबसे लड़ते-निपटते जब वो घर पहुंचती हैं, तो फिर से रात के खाने का वक्त हो जाता है. कई बार तो बिना कपड़े बदले ही उन्हें भयंकर गर्मी में सीधे रसोई में घुस जाना पड़ता है. देर रात गए जब वो बिस्तर पर जाती हैं तो पति से बिना बात किए सो जाती हैं. जिस पर उनके पति की नाराजगी और बढ़ जाती है.. उसी कामकाजी महिला के शब्दों में..”नौकरी करना जी का जंजाल बन गया है. न करो तो घर में पैसों की तंगी और करो तो जिंदगी हराम.“ उन्होंने बस से उतरते-उतरते मुझे सलाह दी, काम तभी तक करना जब तक शादी न हो जाये. शादी के बाद तो नौकरी और जिंदगी में तालमेल बिठाते-बिठाते ही उम्र खत्म हो जाती है और हम जिंदा हैं या नहीं ये एहसास भी मर जाता है.
लगभग हर कामकाजी महिला की यही कहानी है... काम पर से देर रात गए घर लौटते वक्त हाड़-हाड़ थक कर चूर हो जाता है. सोचने-समझने की शक्ति जवाब दे जाती है. लेकिन  घर के ढ़ेरों काम इनके इंतजार में रुके होते हैं. सब निबटा कर बिस्तर पर गिरने के बाद कोई होश नहीं रहताऐसे में पति की इनसे अलग शिकायतें होती हैं और बच्चों की अपनी. सासू मां और ससुर जी को इनका नौकरी करना रास नहीं आता, तो पति को घर पर खाली बैठे रहना.
लेकिन कोई नहीं सोचता कि महिला क्या चाहती हैकैसा लगता है उसे जब घर पर अपने छोटे बच्चे को छोड़ कर उसे नौकरी पर जाना होता है. मन बच्चे में अटका होता है. काम सही समय पर पूरा नहीं होने पर बॉस से झिड़कियां खानी पड़ती हैं. कैसा लगता है उसे तब.. जब ट्रेन की भीड़भाड़ में कई लोग हर रोज जाने-अंजाने उसे टटोलना चाहते हैं. कैसा लगता है जब बुखार के बाद भी उसे अहम फाइलों को निबटाने के लिए ऑफिस जाना पड़ता है.
सबसे अहम लेकिन सबसे खास कि कैसा लगता है उसे जब महीने के आखिर में उसकी मेहनत से कमाये गए रुपये बिना उसकी मर्जी जाने पति उससे ले लेते हैं. कहते हैं कि लाओ इसे मुझे दो नहीं तो तुम इसे बेकार की चीजों पर खर्च कर दोगी. तब पता चलता है एक कामकाजी महिला होने के सारे संघर्ष किस कदर बेमानी और बेमकसद हो जाते हैं. सारी रात तकिये को गीला करने के बाद अगली सुबह कामकाजी महिलायें फिर तेज-तेज कदमों से भागे चलती है उस बस को पकड़ने.. जो संघर्षों और संकटों में अकेला उसका साथी है. दूर खड़ी होकर मैं महिलाओं की इन भागती-दौड़ती परछाईयों को देखती हूं.

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 20 मई 1980 को पटना बिहार में
शिक्षा: पटना के मगध महिला कॉलेज से मनोविज्ञान में स्नातक, नालंदा खुला विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में हिन्दी से स्नाकोत्तर
सृजन: कुछ कवितायें और कहानियां दैनिक अखबारों में छपीं। समसायिक विषयों पर लेख भी
संप्रति: हिंदुस्तान, सन्मार्ग और प्रभात खबर जैसे अखबार से भी जुड़ी, आर्यन न्यूज चैनल में बतौर बुलेटिन प्रोड्यूसर कार्य के बाद फिलहाल वास्तु विहार मीडिया वेंचर प्राइवेट लिमिटेड में कंटेंट डेवलपर और  आकाशवाणी में नैमित्तिक उद्घोषक
संपर्क: pritisingh592@gmail.com)
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मंगलवार, 12 मार्च 2013

जगन्नाथ ने लिखा था पाक का पहला क़ौमी तराना

जगन्नाथ आज़ाद (5दिसंबर 1918-24 जुलाई 2004)

 

 

 

 

 

 

 

जिन्ना की ख्वाहिश 

पर लिखा 

 

हुसैन कच्छी की क़लम से

वर्ष 2004 में उर्दू के मशहूर शायर जगन्नाथ आज़ाद के इंतक़ाल के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान के साहित्यिक जगत में एक नयी बहस का आगाज़  हुआ कि दिवंगत शायर ने पाकिस्तान का पहला क़ौमी  तराना (राष्ट्र गीत) लिखा था।  तराना उन्होंने क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना की ख्वाहिश पर लिखा था। 24 जुलाई, 2004 को जगन्नाथ आज़ाद  की मौत हुई। उसके  बाद उनकी जिंदगी में किया गया एक इंटरव्यू सामने आया, तो यह बात जाहिर हुई. उस वक्त तक बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी थी.
आजाद कहते हैं कि जब पूरा उपमहाद्वीप बंटवारे से पहले की फसाद की लपेट में था, मैं लाहौर में रहता था और एक साहित्यिक पत्रिका से जुड़ा था. मेरे तमाम रिश्तेदार हिंदुस्तान जा चुके थे, मेरे लिए लाहौर छोड़ना बहुत तकलीफ देनेवाली बात थी. लिहाजा, मैंने लाहौर में ही ठहरने का फैसला किया.
दोस्तों ने मेरी हिफाजत का जिम्मा लेते हुए मुझे पर लाहौर में ही रहने के लिए जोर दिया. नौ अगस्त,1947 की सुबह रेडियो लाहौर में काम करनेवाले मेरे एक दोस्त ने मुझे तक यह पैगाम पहुंचाया कि कायदे आजम चाहते हैं कि पाकिस्तान का कौमी तराना उर्दू का बड़ा जानकार कोई हिंदू लिखे और इसके लिए उन्होंने आपका नाम तय किया है.

मुझे इतनी जल्द यह काम करना मुश्किल लगा, तो मेरे दोस्त ने मुझे कायल रहने के लिए कहा कि यह प्रस्ताव मुल्क की सबसे बड़ी शख्सीयत की जानिब से है, इसलिए इनकार न करें.
मैंने हामी भर ली. हालांकि, मैंने यह भी कहा कि इस वक्त लाहौर में मौलाना ताजवर नजीबाबादी, सैयद आबिद अली आबिद, सूफी गुलाम मुस्तफा तबस्सुम, अब्दुल मजीद सालिक, हफीज जालंधरी जैसी बड़ी हस्तियों सहित फैज अहमद फैज जैसे मुझसे सीनियर शायर हजरात की मौजूदगी में यह तराना मुझसे ही क्यों लिखवाना चाहते हैं, तो उन्होंने बताया कि कायदे आजम की यही ख्वाहिश है.
खैर, मैंने कम वक्त में एक तराना लिख कर उनके हवाले करके जिन्ना साहब की खिदमत में रवाना कर दिया, जिन्होंने उसे पसंद करके अपनी मंजूरी दे दी. इसे पहली बार रेडियो पाकिस्तान कराची में गाया गया, जो उन दिनों देश की राजधानी थी.
मैं बंटवारे के दिनों में लाहौर में ही था कि पंजाब के दोनों हिस्सों में हालात हद से ज्यादा खराब होते चले गये. मेरे दोस्तों ने मन के साथ मुझसे दरख्वास्त की कि अब मुझे हिंदुस्तान हिजरत कर जाना चाहिए, क्योंकि इन हालात में मेरी हिफाजत में वे असमर्थ महसूस कर रहे हैं. दोस्तों के मशविरे पर मैंने अमल किया और हिंदुस्तान चला आया!
जो तराना आजाद ने तैयार किया था, वह डेढ़ बरस तक पाकिस्तान के कौमी तराने के तौर पर प्रसारित होता रहा. कुछ लोगों का कहना है कि यही तराना 1954 तक इस्तेमाल में रहा, बाद में हफीज जालंधरी का तराना मंजूर होकर पाकिस्तान का कौमी तराना बन गया.
जिन्ना के इंतकाल के बाद से ही एक नये तराने की तहरीक शुरू हुई और अनेक शायरों के तरानों को जांचने परखने के बाद आखिर 1954 में हफीज जालंधरी का तराना मंजूर किया गया, जो अब पाकिस्तान का कौमी तराना है. जगन्नाथ आजाद और उनके तराने के समर्थन में 13 अगस्त, 2006 को पाकिस्तान के अंगरेजी अखबार डान (DAWN) में यौमे आजादी के एक दिन पहले मेहरीन एफ अली का लेख A Tune to die for शीर्षक से छपा था.
अपने लेख में मेहरीन लिखती हैं कि आजादी के पांच दिन पहले कायदे आजम ने लाहौर में रह रहे जगन्नाथ आजाद नाम के हिंदू जो उर्दू के शायर थे, को पाकिस्तान का कौमी तराना लिखने का प्रस्ताव दिया था और जो कायदे आजम की मंजूरी के बाद रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित होता रहा.
तीन मई, 2009 को पाकिस्तान के एक दानिश्वर जहीर किदवई ने Wind mills नामी अपनी वेबसाइट में दर्ज किया कि आजादी के वक्त उनकी उम्र सात बरस की थी और उन्हें रेडियो पाकिस्तान से जगन्नाथ आजाद का लिखा तराना सुना जाना याद है. जहीर किदवई को तराने में शुरू की लाइनें ही याद हैं.
पांच जून को आदिल अंजुम ने अपनी वेबसाइट pakistaniat.com पर ब्लॉग कर इस विषय पर तफसील से लिखा है. आदिल अंजुम ने जगन्नाथ की जिंदगी पर रोशनी डाली है. ब्लॉग में जगन्नाथ की आवाज की रिकॉर्डिंग को शामिल करने से आदिल अंजुम की वेबसाइट को बहुत शोहरत मिली और फिर पाकिस्तान की सरकारी एयरलाइन पीआइए की मैगजान (पत्रिका) ‘हमसफर’ - (जुलाई-अगस्त 2009) में खुशबू अजीज का एक रिपोर्टनुमा लेख pride of pakistan छपा, जिसमें खुशबू ने इतिहास में कहीं गुम हो रहे इस वाकया को उजागर किया है.
हमसफर का यह अंक लाहौर-कराची उड़ान के दौरान जानी-मानी महिला पत्रकार बीना सरवर की नजर से गुजरा, जिन्होंने अखबार डान सहित दूसरी वेबसाइटों पर अपने ब्लॉग में आजाद के तराने को पाकिस्तान का पहला कौमी तराना बताया. अखबार डान में Archive में जाकर 19 सितंबर, 2009 को छपे उनके लेख Another Time Another Anthem को देख लीजिए.


ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  

ज़र्रे-ज़र्रे  हैं आज सितारे से ताबनाक 

रौशन है कहकशां से कहीं आज तेरी ख़ाक 

तुन्दीये हासिदां पे है ग़ालिब तेरा सिवाक
दामन वो सिलगया हैं जो था मुद्दतों से चाक

ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  
अब अपने अज्म को है नया रास्ता पसंद
अपना वतन हैं आज जमाने में सरबुलंद
पहुंचा सकेगा इसको न कोई भी अब गजंद
अब हमको देखते हैं अतारो यो या समाक

ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  
उतरा है इम्तिहां में वतन आज, कामयाब
अब हुर्रियत की जुल्फ नहीं महवे पेचो ताब
दौलत है अपने मुल्क की बेहद्दों बेहिसाब
मगरिब से हमको खौफ न मशरिक से हमको बाक

ऐ सर ज़मीन-ए-पाक  
अपने वतन का आज बदलने लगा निजाम
अपने वतन में आज नहीं है कोई गुलाम
अपना वतन है राहे तरक्की पे तेजगाम
अब इत्र बेज हैं हवाएं थीं जहरनाक

((प्रभात ख़बर  के लिए लिखा गया))

(लेखक-परिचय:
जन्म: 19 जुलाई 1949, झारखंड के रांची में
ज्ञान: उर्दू, हिंदी, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी ज़बानों के अलावा अदब इतिहास, संस्कृति के जानकार
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविता, व्यंग्य प्रकाशित। साथ ही खोजी रपट
संपर्क: +919334420618 )
 

 

 

 


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