बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

बिक रही है देशभक्ति

 छह छोटे क़िस्से व्यंग्य और मर्म के














  विभांशु दिव्याल की क़लम से



1.
सेठ खोखामल अपनी धर्म की दुकान पर मस्जिद मंथन से उत्पन्न हुए हिंदुत्व के अमृत को बेचकर बच्चे-बच्चे को राम बनाने लगे, माताएं खिलौनों की दुकान पर न जाकर सेठ जी की दुकान पर आने लगीं. बच्चों के लिए हेलीकाप्टर और बंदूकों की जगह पुष्पक विमान और तीर-धनुष खरीदने लगीं, पुरुषों ने कपड़ों की दुकान पर जाना छोड़ दिया, अब वो सेठ जी की दुकान से रामनामी कपड़े खरीदने लगे, सेठ जी ने भक्ति का नया ट्रेंड देखते हुए लगे हाथ मंदिर निर्माण में सहयोग देने के लिए दुकान के बाहर एक दान पेटी भी लगवा दी, मंदिर तो बना नहीं लेकिन सेठ खोखामल के घर को लक्ष्मी जी ने अपना निवास बना लिया.
सब कुछ ठीक चल रहा था, देश राम राम जप रहा था, इसी बीच देश के एक कोने से साईं राम साईं राम की धुन सुनाई देने लगी, दिन भर भगवान की मूर्तियों की शरण में रहते-रहते सेठ जी को भगवान की आगामी योजनाओं का आभास होने लगा था. सेठ खोखमाल ने भक्ति के नए ट्रेंड की धुन से अपनी धुन मिलाई और दुकान के मंदिर से राम जी की मूर्ती हटाकर साईं राम जी की प्राण-प्रतिष्ठा कर दी,. अगरबत्ती साईं राम जी के नाम की जलाते और मंत्र लक्ष्मी जी का पढ़ते, भक्ति के नए ट्रेंड ने अपना चमत्कार दिखाया. अब बच्चा-बच्चा साईं राम होने लगा. गली-गली में साईं राम की प्रतिष्ठा होने लगी. कॉलोनी-कॉलोनी धर्म की दुकानें खुलने लगीं, चौदह वर्ष तक वनवास झेलने वाले राम जी अब अनिश्चितकालीन वनवास पर भेज दिए गए.
अब जमाना भी आधुनिक हो चला था, रियल स्टेट के कारोबारी मंदिर निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख चुके थे, टीवी पर स्वर्ग का रास्ता और ऑनलाइन दर्शन पूजन की सुविधा उपलब्ध हो जाने से सेठ खोखामल की धर्म की दुकान पर ग्राहक भक्तों की संख्या घट गई थी. देश आर्थिक मंदी से जूझ रहा था और सेठ जी आर्थिक तंगी से, सेठ जी ने भक्ति का नया ट्रेंड पता करने के लिए जमाने की चाल से अपने कदम मिलाये और इंटरनेट की शरण में गए, तिरुपति बालाजी के ऑनलाइन अकाउंट में चढ़ावा चढ़ाया, दुकान के मंदिर में साईं राम जी की जगह बालाजी की प्राण प्रतिष्ठा की, दुकान के ऊपर नया बोर्ड लगवाया, बोर्ड पर लिखा था- ज्योतिषाचार्य बाबा जगरोपन दास द्वारा प्रमाणित, घर के दक्षिण कोने में प्राण प्रतिष्ठा करें और दक्षिण दिशा में किये गए सभी पापों से मुक्ति पाएं.... सेठ जी की दुकान पर पाप को पुण्य में बदलने वाली मूरत खरीदने वालों की लाइन लगने लगी, देश आर्थिक मंदी से उबर चुका था और सेठ खोखामल आर्थिक तंगी से.


2.
 मंदिर का वार्षिक श्रृंगार था,  इस वर्ष भी इलाके के गणमान्य लोगों को निमंत्रण पत्र भेजे गए. कुल मिलाकर पंद्रह सौ लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई..बिना निमंत्रण वालों को मंदिर में हो रहे भजन-कीर्तन तक ही सिमित रखा गया था, भगवान के सामने हाथ जोड़ने के बाद प्रसाद के रूप में गेंहू के आटे से बना चूरन देकर व्यवस्था में लगे सेवक सबको दरवाजे तक छोड़ आते...निमंत्रण कार्ड वाले गणमान्य लोग आते, मालिक के पास बैठते. हजार दस हजार का चंदा पकड़ाते और हाथ जोड़कर विदा मांगते. कुछ गणमान्य लोगों को अगले निमंत्रण में भी जाना था.. भूखे पेट भजन कीर्तन करने के बाद एक बच्चे को खाने की खुशबू ने पागल बना दिया. बच्चा गणमान्य लोगों की भीड़ में घुस गया, थोड़ी ही देर में उसकी कमर पर एक सेवक की जोरदार लात पड़ी. कमर पर मिले एक नए दर्द ने पेट में लगी आग के दर्द पर मरहम का काम किया, भगवान की जय जयकार के बीच अपनी सिसकियां दबाये वो बच्चा मंदिर के पीछे निढाल पड़ गया..सुबह हुई, मंदिर की रसोई साफ़ करने के लिए मजदूर खोजा जाने लगा, तभी एक सेवक मंदिर के पीछे से आंख मलते बच्चे को पकड़ लाया, पचास रूपये मजदूरी तय हुई, लगभग चार सौ लोगों का खाना बच गया था, खाने के बदले जोरदार लात खाने वाला बच्चा अब वही खाना फेंक रहा था, जिसमें वो दो तीन रोटियां भी थीं जितने में उसकी भूख मिट जाती.

3.
आज सजीले को अभिनय करना था, गांव की कुटी जहां बारात घर भी बना हुआ था, वहां जनता  की अदालत में उनको एक आरोपी का किरदार अदा करना था, उस किरदार ने गुप्ता और तोदी एक साथ लिख दिया था, वरिष्ठ अधिवक्ता नवानी की याचिका को संज्ञान में लेते हुए अदालत ने अभिव्यक्ति की आज़ादी रोकने के लिए बनाये गए कानून को तोड़ने के आरोप में किरदार को गिरफ्तार कर अदालत में पेश करने का आदेश दिया था कुटी पर पहुंचने के बाद सजीले के साथ उनके अन्य दोस्तों ने अपने अपने किरदार के लिए निर्धारित स्थान ग्रहण किया, वरिष्ठ अधिवक्ता नवानी  ने अपनी तरफ से अपने जूनियर को इस केस का वकील नियुक्त किया, आरोपी बने सजीले को अपनी पैरवी खुद करनी थी, गीता ब्रांड की ईंट पर हाथ रखकर सच बोलने की कसम खाकर सजीले ने जूनियर से जिरह शुरू की- हमने किस गुप्ता या तोदी का नाम लिखा, हरेंद्र गुप्ता कामनाथ गुप्ता या सुकेश तोदी सुनील तोदी, ना किसी गुप्ता जी को बुरा लगा ना किसी तोदी जी को, गुप्ता और तोदी में आप इतनी रुचि क्यूं ले रहे हैं, इतनी रुचि दलितों को कहे जाने वाले चमार शब्द में क्यूं नहीं लेते अपने किरदार में उतर रहे सजीले की बात बीच में काटते हुए जूनियर चीख पड़े- आई ऑब्जेक्ट योर ऑनर, ये इधर-उधर की बातों में अदालत का समय नष्ट कर रहे हैं, इनको पता होना चाहिए कि अदालत में कानून की डिग्री चलती है… बातों की नहीं, ये केस शीशे की तरह साफ़ है मी लार्ड, मैं अदालत से दरख्वास्त करूंगा कि इस केस का फैसला आज ही सुनाया जाए.
 जूनियर की कानूनी भाषा सुनने के बाद जज साहब ने सजीले को फटकार लगाई और कानूनी भाषा में बात करने को कहा, सजीले अब पूरी तरह किरदार में डूब चुके थे, उन्होंने फिर बोलना शुरू किया- वकील साहब अदालत में केस का फैसला होता है, सच या झूठ का नहीं, यहां सिर्फ केस हारे या जीते जाते हैं, सत्य को जीत हासिल करने के लिए कानून की किताबों के सहारे की जरूरत नहीं, हम कैसे मान लें कि एक स्त्री के सर पर हाथ रख कर सभी लोग सच ही बोलते हैं, वही स्त्री है ये न्याय की देवी वाली मूर्ति, जिनकी आंखों पर काली पट्टी भी बांधी गई है, इन्हें तो आज तक इस अदालत ने बैठकर सांस लेने की इजाजत नहीं दी, अब इनकी जगह न्याय के देवता की मूर्ति खड़ी की जाए....आंखों पर पट्टी बांधकर और स्त्री के नाम की जगह पुरुष के नाम पर हाथ रख कर कसम दिलाई जाए सजीले की बातों को अदालत की तौहीन करार देते हुए जज साहब ने अपना फैसला सुनाया, पुलिस का किरदार निभा रहे सजीले के दोस्त गमछे से बनी हथकड़ी सजीले के हाथों में पहना देते हैं, सजीले अपना बिगुल बजाते हुए बारात घर के एक कमरे में बनी जेल की तरफ बढ़ते हैं.

4.
अंग्रेजों के ज़माने के जमींदार थे, आजादी के बाद जमीनें सरकार ने ले लीं, लेकिन मूंछों का ताव अब भी बरकरार था. घर की शान ओ शौकत और मूंछों की इज्जत बरकरार रखने के लिए बची जमीनें बेच-बेचकर शाही शादियों और भव्य ब्राह्मण भोजों का आयोजन करते रहे. बेटे बड़े हुए, ठसक जमींदार पिता वाली ही थी, इसीलिए पढ़ाई बीच में ही छोड़ ठेकेदारी करने लगे. घर की दहलीज से विद्या कोसों दूर थीं लेकिन अब घर में पूंजी का प्रवाह होने लगा, एक पीढ़ी और बदली, शान ओ शौकत छोड़ उच्च शिक्षा की तलाश में 'बड़े घर' की दहलीज के बाहर कदम पड़ने लगी. कभी खेतों में मजदूरों को हांक देने वाले और गांव की अदालत में मुखिया बनने वाले जमींदार साहब के अंदर का रौब मूंछ के झड़ते बालों के साथ कम होता जा रहा था. बदलते जमाने के साथ बदलती सोच ने जमींदार साहब को समझौते करने पर मजबूर कर दिया.  दो पीढ़ियों के बीच समय की मार से इकलौती बची बेटी को भी शहर जाकर पढ़ने की इजाजत मिल गई. इसके पहले 'बड़े घर' की बेटी के कदम जब भी चौखट के बाहर पड़े वो डोली में बैठकर ससुराल ही गई थी. स्टेशन पर अपनी पौत्री को ट्रेन में
बिठाने के बाद जमीदार साहब तेजी से बूढ़े होने लगे.दिन रात पौत्री की चिंता में डूबे रहते.... समय गुजरता रहा, भाप के रेल इंजनों की जगह डीजल के रेल इंजनों ने ले ली. पौत्री की रोज कॉलेज तक की भाग दौड़ अब नौकरी के लिए की जाने वाली भागदौड़ बन गई थी. शहर में उसके सुख दुःख का भागी बनने वाला एक लड़का भी अपने पैरों पर खड़े होने के लिए जी जान लगाकर जुटा हुआ था. 
एक-एक कर दोनों को नौकरी मिलती है. लड़की घर जाने की तैयारी करती है. अपने दादा को 'एक और' ख़ुशखबरी देने की हड़बड़ी में उसे सूझ ही नहीं रहा था कि वो क्या पहने, बिखरे बालों के साथ ही वह घर की ट्रेन पकड़ती है. उधर स्टेशन पर अपनी पौत्री को लेने आये दादा जी राहत की सांस ले रहे हैं. लड़की की शादी अब ऊंचे खानदान में होगी ये सोचकर अपनी मूंछों को ताव देते हैं. लड़की दादा जी के साथ घर जाती है. रास्ते में अपने उस एक साधारण घर के साथी लड़के के बारे में बताती है जिसने शहर में लड़की को उसके घर वालों की कमी महसूस नहीं होने दी थी, उस लड़के के बारे में जानकर दादा जी बेचैन हो उठे. लेकिन लड़की की हिम्मत के आगे उनकी बेचैनी मन में ही दबी रही. दादा जी ने अपने पुत्रों से सलाह मशविरा करने के बाद शादी की रजामंदी दे दी. वर्षों पहले समय की मार को मात देकर 'बड़े घर' में जिस लड़की की किलकारी गूंजी थी, आज फिर वही लड़की चहक रही थी. मेहंदी लगे हाथ और आईने में खुद को निहारती आंखों में एक आजाद दुनिया के सपने तैर रहे थे. लड़के के घर वाले आज लड़की देखने की रस्म निभाने आ रहे थे. 
मूछों के सफ़ेद बाल काले कराकर दादा जी भी आज सज धज कर तैयार थे. साल दर साल मौसम और वक्त की मार सहते-सहते जर्जर हो आया 'बड़ा घर' आज सजा धजा हुआ था. बड़े घर की कई दीवारें अचानक ही गिरी थीं. आज फिर अचानक एक हादसा हुआ, लड़की ने छत से कूदकर अपनी जान दे दी.  शुभ घड़ी में हुए इस अमंगल की सूचना पाकर पूरा गांव जमींदार साहब के दरवाजे पर जुट गया. सबकी जबान पर यही बात थी- लगता है लड़की की शादी जबरदस्ती की जा रही थी, इसीलिए उसने अपनी जान दे दी. तिरछी नज़रों से लोग एक मंजिला बड़े घर की बारह पंद्रह फ़ीट ऊंची उस छत को देख रहे थे जहां से गिरकर बचपन में जमींदार साहब के लड़के का हाथ टूटा था, आज उसी छत से गिरकर एक लड़की की जान चली गई. जमींदार साहब ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था, आदमकद आईने के सामने कुर्सी पर बैठे हुए थे, आईने में उनकी बूढ़ी मूंछों पर जवानी वाला ताव और चेहरे पर मजदूरों को हांकने वाला रौब नजर आ रहा था.

5.
आजादी की दुकान सज गई है, देशभक्ति बिक रही है, प्लास्टिक के झंडों वाली देशभक्ति पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है, देशभक्ति अब खादी के कपड़ों में बिक रही है, सूरज ढलने के बाद सरकारी देशभक्ति उतार दी गई है, संसद और अदालत की देशभक्ति हवा के अभाव में शांत हैं, दुकानों पर चौबीस घंटे देशभक्ति फहरा रही है, दसों दिशाओं से हवा चल रही है, देशभक्ति भी दसों दिशाओं में खड़ी है, किसी का सर हिमालय की चोटियों की तरह तना हुआ है, किसी का सर नीचे बह रही नाली के मुंह में जाने को है, उसी नाली में एक कुत्ता सोया हुआ है, अचानक वो उठता है, अपनी नींद की खुमारी दूर करता है, अपना शरीर भूकंप में कांप रही बहुमंजिली इमारत ही तरह हिलाता है, फिर अपनी पूंछ का कीचड़ साफ़ करता है, तभी नाली के मुंह के पास खड़ी देशभक्ति के दामन में कीचड लग जाता है, दुकानदार को कुत्ते की हरकत पर गुस्सा आता है, देशभक्ति के डंडे से कुत्ते को उसके किये की सजा देता है, अब ये देशभक्ति नहीं बिकेगी ये बुद-बुदाता है, देशभक्ति का गोला बनाता है, उसे शैंपू वाले पानी में भिगोता है, अपनी कमाई की पेटी पर जमी धूल साफ़ करने लगता है, दूर खड़ा कुत्ता ये दृश्य देखकर भौं भौं करता है. संविधान के सभी अधिनियम ख़त्म हो गए हैं, अदालतों की शान में गुस्ताखी हो रही है, सब खामोश खड़े हैं हाथ पीछे बांधे, दुकान का बोलबाला है आजादी की दुकान सज गई है, देशभक्ति बिक रही है.

6.
उसका जन्म हुआ, थोड़ी ख़ुशी थोड़े गम के बीच उसका नामकरण हुआ, घर परिवार के लोग और उसे देखने आने वाले नाते- रिश्तेदार प्यार से उसके गालों को सहलाते. समय गुजरता गया और वो बड़ी होती गई. अब वो अपने पैरों पर चलने लगी थी और स्पर्श में छुपे भावों को भी समझने लगे थी. सात-आठ साल की हुई तो बचपन में उसके गालों को सहलाने वाला एक रिश्तेदार उसके उन अंगों को सहलाने लगा जो छुपाये जाते हैं.
बारह-पंद्रह साल की हुई. एक रात सबके सोने के बाद उसे शौच जाना पड़ा, हाथ में टॉर्च लिए खेतों की तरफ गई. टॉर्च की रोशनी देख आकर्षित होने वाले कीट पतंगों की तरह उसके गांव के दो चार पुरुष भी उसके पीछे लग गए. उनसे बचने के लिए वो कई घण्टे चारे की फसल में छुपी रही, घर में किसी की नींद नहीं टूटी. चारे की फसल में छुपी उस लड़की की उम्मीद हर पल टूट रही थी. घण्टों तक खेत को अपने आंसुओं से सींचने के बाद हिचकियों के साथ वह घर लौटी. अपनी आबरू बचाकर बिस्तर पर पड़े-पड़े अपना दुपट्टा मुंह में डाले रात भर वो सिसकती रही. नींद तब भी किसी की नहीं टूटी और बड़ी हुई, स्कूल के दिन ख़त्म हुए और कॉलेज जाने के दिन आ गए, घर से कॉलेज जाने के लिए बस का सहारा था.
एक दिन बस स्टैंड पर उसे लघु शंका महसूस हुई, हर तरफ देखने के बाद ऐसी कोई जगह नहीं नजर आई जहां किसी की नजर ना पहुंचे, एक बस के पीछे खड़े होकर वो इस उम्मीद से सबकी तरफ देखती रही कि शायद लोग अपनी नजर दूसरी तरफ कर लें. दूसरों से लगी उसकी उम्मीद टूटती रही और अपना सर नीचे किये वो लघु शंका करती रही. जमीन पर पड़ती मूत्र की हर बूंद के साथ वह शर्म के मारे जमीन में धंसती जा रही थी. कॉलेज के दिन ख़त्म हुए, दूसरे शहर में नौकरी मिली. उस शहर जाने के लिए ट्रेन का सहारा था. स्टेशन पहुंची और प्लेटफॉर्म पर बैठी. सामने वाले प्लेटफॉर्म पर एक युवक को लघु शंका महसूस हुई, उसकी लघु शंका में कोई शर्म नहीं थी.  लड़की के सामने ही उसने अपनी जिप खोली और रेलवे लाइन पर पड़े मल को अपने मूत्र से धोने लगा, लड़की ने दोनों घुटनों के बीच अपना सर छुपाया और फिर से प्लेटफॉर्म के पक्के फर्श में धंसती गई. लड़की द्वारा अनदेखा किये जाने के बाद युवक के पैंट की जिप भी बंद हो गई. इतना कुछ हुआ लेकिन ये बलात्कार की श्रेणी में नहीं आया.

 वो दिन भी आया जब उस लड़की का बलात्कार हुआ, लोग उबल पड़े. दुष्कर्मियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के लिए धरने-प्रदर्शन शुरू हो गए. लड़की के साथ हुए बलात्कार से अत्यधिक उद्वेलित लोगों ने अब तक खामोश रहे लोगों के खून में उबाल लाने के लिए लड़की की फोटो के साथ धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया. उनकी मेहनत रंग लाई, दोषियों को सजा हुई, अब लड़की घर वापस आ गई, घर में ही पड़ी रहती, उसकी फोटो ने उसे पूरे देश में चर्चित बना दिया था, सभी पहचानने लगे थे उसे, अब उसके नाम से उसकी पहचान नहीं होती थी. लोग कहते यही वो लड़की है जिसके साथ पांच ने बलात्कार किया था, बलात्कार में निकले खून के छींटे उसके दामन पर हर तरफ पड़े थे. खून के उन लाल धब्बों ने उसके हाथ भी पीले नहीं होने दिए, अब तक सब कुछ ख़ामोशी से सहती आई उस लड़की ने खामोशी से ही एक दिन मौत को गले लगा लिया, उसके मरने के बाद कुछ लोग उसे गले लगाकर रो रहे थे तो कुछ लोग कह रहे थे कि अच्छा ही हुआ, कौन इसे अपना जीवनसाथी बनाता.

(रचनाकार-परिचय
जन्म: 20 अगस्त 1984 को छितौना-वाराणसी, उत्तर प्रदेश में
शिक्षा: स्नातक (पत्रकारिता)
सृजन: स्वतंत्र लेखन
संप्रति: मुक्त श्रमिक
संपर्क: vibhanshu.kvp@gmail.com)

 
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सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

हौसला फिर से कश्मीर को बना रहा जन्नत

 फोटो रमीज़


श्रीनगर से सैयद शहरोज़ क़मर

लाल चौक धूप में भले चटक रहा हो, लेकिन फुटपाथ पर दुकानों से सामान निकालकर बेचने वालों और खरीदारों के चेहरे से रौनक गायब है. जबकि नाम के अनुरूप ही श्रीनगर के इस दिल की लालिमा निशात बाग़ की तरह ही खुश बाग़ हुआ करती थी. जबकि डेढ़ माह पहले समूचा शहर ही डल झील हो चुका था। डल पर बसी चालीस हजार आबादी अपने चौदह हजार शिकारे के साथ नहर बनी सड़कों पर आ चुकी थी। इनके साथ ही मुन्ना भाई, वसीम, करतार और उमर जैसे युवाओं की टोलियां। इन सबने हौसले की कश्ती से लाखों लोगों की जानें बचाईं। वहीं लतीफ खान जैसों ने अपने होटल में लंगर खोल दिया।
यह 7 सितम्बर की बात है. फ़िज़ा में शोर व खौफ था. बीस से चौबीस फ़ीट पानी में डूबे घरों से निकलने की हड़बड़ाहट का प्रवाह झेलम से भी तेज़ था. मजहूर नगर के गगन दीप कोहली सुबह जल्दी उठ गए थे। उन्हें गुरुद्वारा में अरदास के बाद लाल चौक अपनी जूतों की दूकान खोलनी थी. लेकिन खिड़की से झाँका तो उनके पैरों तले ज़मीन न थी. बस था पानी-पानी। बाहर शिकारे लिए मोहल्ले के युवा। गगन ने माँ, पत्नी और दो बच्चे को लिया और उस पर बैठ गये. लेकिन कुछ दूर पर ही नाव पलट गयी. सभी सवार को बचा तो लिया गया. पर गगन को ही धरती ने समो लिया। लाल चौक स्थित कोहली एंड संस धन तेरस पर खुली है। इसे संभाल रही हैं, अरविंदर कौर और जिंदर। इनकी आंखों में रह -रह कर सैलाब उमड़ पड़ता है।  गगन दीप कोहली का शोक इन महिलाओं के चेहरों पर अयां है। मां जिंदर तो कभी-कभार पहले भी दुकान आ जाया करती रही हैं। पर गगन की पत्नी अरविंदर पहली बार साहस बटोर रही हैं। दुकान के सारे जूते-चप्पल पानी में होम हुए। गगन के भाई दिल्ली से नया माल लेकर आए। वहीं हिम्मत ने शोक को हवा किया। 















इधर, जम्मू एंड कश्मीर बैंक की कार्गो शाखा दफ्तर पहुंची काशिफा नज़ीर की उंगलियां की-पेड पर कांपती हैं, लेकिन यह कंपन 7 सितंबर से काफी कम है, लेकिन उनकी आँखों में उतरी झेलम डेढ़ माह पहले ठहरी। उसका असर उनके गालों पर ज़र्द हुआ जाता है. उनकी ललाट पर खिल-खिलाती उनकी बच्चियां। जल-प्रलय की चपेट में आया रविवार का दिन था. काशिफा आसिफ सरवाल ने बच्चों के साथ चश्म शाही जाने का इरादा किया था. लेकिन वे कुछ समझ और संभल पाते कि इससे पहले अचानक ही राज बाग़ जैसे उनके इलाक़े में चारों तरफ तबाही फैल चुकी थी.

उनके घर के पास भी लोग शिकारे लेकर पहुंचे। आसिफ ने उस पर काशिफा के साथ तीन छोटी बच्चियों और माँ हाजरा बेगम को बैठा दिया। पर कुछ देर बाद यह नाव भी पानी का वेग न संभाल सकी। दादी की गोद में सात माह की राहत, तो काशिफा ने ढाई साल की सर्वत का हाथ थामा। बड़ी बिटिया तरावत खुद पानी में. इधर, आसिफ जब कुछ देर बाद दूसरी नाव से सुरक्षित जगह पहुंचे तो पत्नी, माँ और बच्चियों को न पाकर बेचैन हो गए. घंटे भर बाद भी जब उनका पता न चला तो उनकी बेज़ारी बढ़ गयी. काशिफ़ा जब तरावत के साथ पहुंची तो लिपट कर सुबकने लगी. दूध मुँही बच्ची समेत सर्वत और माँ के डूबने की खबर ने आसिफ को चिनार के पत्तों की तरह बिखेर दिया.    


लेकिन कहते हैं कि तमसो मा ज्योतिर्गमय। आसिफ हो काशिफ़ा, अरविंदर हों राजिंदर या राजा खान के परिजन। और ऐसे ढेरों लोग जिनके घरों के चिराग हमेश के लिए बुझ गए। लेकिन अब इन्होने बिखरे तिनकों को इकठ्ठा कर ज़िन्दगी को नयी रौशनी दी है। बक़ौल कश्मीरी कवि लल दह आमे पन रस नाए छस लमान कच्चे धागे की मदद से काशिफा, आरिफा, मदीहा और गुरप्रीत अपनी किश्ती को खींच रही हैं। मदीहा एनआईटी से मेकेनिकल इंजीनियरिंग कर रही हैं। उनका घर पूरी तरह तबाह हो गया। मामू के घर से फिलहाल इंस्टीच्यूट आना-जाना करती हैं। शीतरा शाही का गुरप्रीत का घर भी कहां रहा। दीवारों के साथ उस ऑटो को भी तो गिरी छत ने लील लिया, जिसे उनके पति कँवल नैन सिंह चलते थे। भास्कर टीम जब पहुंची तो पूरा परिवार घरों के बिखरे तिनकों को इकट्ठा कर रहा था। उनकी बेटी सिमरन का आत्मविश्वास बोलता है, रब्बा ने दर्द दिया वही दवा देगा। अब ज़िन्दगी है. यही हौसला मुन्ना भाई में नज़र आया। मलवे में दबी दुकानों से किसी तरह सामान निकाल कर धोने और चमकाने में लगे हैं। उनका जज़्बे का तेज शहीद गंज पुलिया पर दौड़ती ज़िन्दगी में भी अकार पाता है। झेलम की नहर पर बनी इस पुलिया ने भी तो साथ छोड़ दिया था। पर लोगों ने आपसी मदद से उसे बना डाला, न वक़्त रुकता है , न ही हवा-बवंडर लेकिन इंसानी हिम्मत चिर युवा होती है। इसका एहसास जवाहर श्रीनगर से अनंत नाग तक दिखा। फ़िदा हुसैन के तीन भाई हैं, सभी ने साथ-साथ एक जगह आशियाने बनाये। पर अब बचा है तो सिर्फ ईंट और गारे का ढेर। फ़िदा जब बिना यूनिफार्म के अपनी बेटियों को स्कूल छोड़ने के लिए निकले तो उनकी माँ की आँखें से चश्मा (झरना) तारी हो गया, जिसे उनका चश्मा (ऐनक ) न छुपा सका। सारे कपड़ों और सामानों के साथ यूनिफार्म और किताबें भी तो नष्ट हो गयीं। लेकिन उड़ान निसंदेह हौसले में होती है, यही हौसला कश्मीर को फिर से जन्नत बना रहा है।  


फोटो रमीज़     



भास्कर के कई संस्करणों में 26 अक्टूबर 2014 के अंक में प्रकाशित

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गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

16 मई के बाद


दो कविता अगस्त की 

फोटो: स्व. विजय गुप्ता













शहरोज़ की क़लम से

आफ़त कभी आती थी
हमने इतना विकास कर लिया कि
आफ़त जब चाहा, जहाँ चाहा उंडेल दी जाती है
बवंडर बवा भी कर ली जाती है निमंत्रित।

आपके और  आपके परिवार की रातों रात
बनाई जा सकती है वंशावली
बदल दी जा सकती  पहचान।

दुःख और पीड़ा ने भी
बदल लिया है अपना धर्म।
जाति और संप्रदाय भी
सुविधानुसार कर सकता है तब्दील।

मेरी त्रासदी जैसे आपकी ख़ुशी का बायस हो सकती है
आपका दर्द मेरे हर्ष का कारण।

नर्क और जहन्नुम से मुक्ति के अपने-अपने हैं यत्न
जन्नत की ख़रीद क़त्ल और ग़ारत के बाज़ारों में होती है।

2.

तुम हँसते-हँसते चुप हो जाते हो
तुम कहते-कहते गुम हो जाते हो
तुम खेलते-खेलते लड़ पड़ते हो

दरअसल यह तुम भी नहीं जानते
ऐसा अचानक क्यों करते हो
क्या हो जाता है तुम्हें
कि एक थाली में कौर निगलते हुए
तुम्हें खाने से मांस की गंध आने लगती है
कि अच्छा सा शेर सुनाते हुए
मेरी प्रेमिका का तुम्हें धर्म याद आ जाता है
कि कभी मध्य प्रांत की राजधानी रहा शहर
तुम्हें देश की राजधानी लगने लगता है.

कि अचानक तुम्हें ध्यान आता है
पंद्रह अगस्त पर किसी मदरसे पर फहराते तिरंगे की
फेसबुक पर शेयर तस्वीर के नीचे मैंने वंदे मातरम् लिखा या नहीं
जबकि तुम अपनी उस राजधानी के मुख्यालय पर तिरंगे का फोटो
कभी लगा नहीं पाये।
लगा भी नहीं सकोगे(क्योंकि मुख्यालय एक रंगा है )।
पर यह तुम्हारी पीड़ा नहीं बन सका.

हालांकि इससे कोई अब फ़र्क़ नहीं पड़ता
पर भरे दफ़्तर में मुख्यालय का सदस्य
होने की सगर्व घोषणा करते
तुम मेरे चेहरे के भय को अनदेखा कर जाते हो.
दरअसल हम सभी शोक मुद्रा में हैं
लेकिन तुम क्षणिक आवेश में उत्साह समझने की भूल कर जाते हो.
हर्ष और विषाद की लहर में डूबते-उतरते हुए

अब सभी रास्ते एक ओर जाते हैं
कहने का ढोंग हमें तुरंत बंद कर देना चाहिए।
वरना हर्ष और विषाद की परिभाषा बदलनी होगी
अब हमें पहनावे भी बदल देने चाहिए
और बढ़ा लेने चाहिए अपने-अपने केश
परंपरागत धार्मिक बुर्जों पर चढ़ने का यही अंतिम उपाय है

आओ लौट चलें आदिम कंदराओं में
तेज़ कर अपनी-अपनी धार

रूहें गर हों, तो लौटेंगी फीनिक्स की तरह
प्रेम और स्नेह बनकर




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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)