बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 25 मई 2016

न कोई अगड़ा, न कोई पिछड़ा, सभी समरसता में झिलमिल

उज्जैन सिहंस्थ बना सनातन परंपरा की एकता बंधुत्व का महाकुंभ











सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से
हावड़ा से चली क्षिप्रा एक्सप्रेस देर रात ज्योंही भोपाल जंक्शन से छूटी, यात्रियों में खलबली शुरू। कोई एक हो तो नाम लूं। लगभग 90 प्रतिशत मुसाफिरों के चेहरे खिल उठे। मुखर्जीजी हों, या यादवजी, मिश्राजी हों या कुशवाहाजी, चौधरीजी हों या सिंहजी । सिंहस्थ में पहुंचने के लिए अधिकतर श्रद्धालु सपरिवार ही ट्रेन पर सवार थे। रात्रिकाल में उनकी कांतिमयी उपस्थिति का कारण बनी महाकाल की नगरी उज्जयिनी। माताएं, बहनें अपने-अपने बर्थ से उठ बैठीं। अपने-अपने सामान संभाले। कुछ के हाथों की मनकाएं रेलचक्र की तरह तीव्रता से चलने लगीं, तो कइयों के होंठ पर मंत्रोच्चार। उज्जैन स्टेशन पहुंचने से घंटे भर पहले ही ढेरों ने गेट पर कतार सी लगा दी। मात्र एक ही लक्ष्य, पावन धरती पर पग धरूं पहले सबसे पहले। गंतव्य पहुंचने के बाद जब इनका कारवां कुंभ मेला पहुंचा, तो मंदिरों की आरती, मस्जिद की अजान और गुरुद्वारे के अरदास उजास को अलौकिक कर रहे थे। जैसे-जैसे पौ फटता गया, रामघाट से भूखीमाता मंदिर घाट तक क्षिप्रा में डुबकी लगाती आस्थाएं इंद्रधनुषी होती गईं। न कोई गोरा, न कोई काला। न कोई अगड़ा, न कोई पिछड़ा। कोई भेद नहीं, न भाव। सभी एक ही रंग समरसता में झिलमिल। यही सनातन है। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री, क्या पुरुष आस्था की बर्फीली चादर ओढ़े पंक्तिबद्ध इनकी लाखों की संख्या अच्छे से अच्छे प्रबंध गुरु की युक्तियों समेत दोपहर की तपिश को मात देती रहीं।

इधर, कोलकता की सोहानी अधिकारी खुश थीं कि उन्हें प्रयाग के बाद सिहंस्थ में अजूबे संगम के दर्शन हुए। उन्होंने स्नान कर अमृतपान किया ही, ज्ञान भी हासिल कर लिया। दरअसल मप्र सरकार ने क्षिप्रा में नर्मदा जल उपलब्ध कराए हैं। नर्मदा को ज्ञान देने वाली कहा गया है। 
उज्जैन शहर के कई कोनों से सरकार ने नि:शुल्क वाहन की व्यवस्था मेला क्षेत्र के लिए कराई है। इसके बावजूद लगभग 5-6 किमी तक पदयात्रा ही एकमात्र विकल्प है। रामघाट पर बाड़मेड़ से आए करीब 70 वर्षीय बुजुर्ग ओमप्रकाश गहलोत स्नान के बाद महाकालेश्वर के दर्शन करने जाना चाहते थे। उनके बेटे-बहू हाथ ठेलावाले यासीन मियां को पकड़ लाए। लेकिन बाबा बोले, मैं पैदल ही जाऊंगा दर्शन करने। उनके आठ साल के प्रपौत्र विवेक भी उनसे लिपट गए। दादू मैं भी पैदल ही जाऊंगा। इस बीच ऑस्ट्रेलिया की मार्था और मेरी के विवेक ने तुरंत ही विवेक को गोद उठा लिया। रामघाट पुल पर एक बाइक सवार ने पूछा, साहब कहां जाएंगे। आपको जो देना हो दे देना। हम तो सेवा के लिए खड़े हैं। पता चलता है कि अमीन खान जैसे 100 मुस्लिम युवा बाइक पर एक-दो श्रद्धालुओं को इधर से उधर पहुंचाने की सेवा दे रहे हैं। ऐसे कई दृश्य यहां आम हैं। जिसमें मंथन के बाद छलके अमृत की बूंदों की झलक इंसान के व्यवहार में झूम-झमक होती है। कोई नहीं चाहता कि उनसे मनुष्य होने के नाते कोई चूक हो। क्योंकि:
श्मशान ऊर्वर क्षेत्रं पीठं तु वनमेव च।
पञ्चैके न लभ्यंते महाकाल बनाद्रते।।
कश्मीर से कन्याकुमारी और नेपाल से अमेरिका तक से सभी उज्जैन इसी लिए आए है कि यहां भगवान् रमण करते हैं। यहीं से मोक्ष मिलता है। सब पापों का विनाश होता है। हरसिद्धिजी व अन्य मातृकाओं का स्थान है। सबसे सर्वोपरि महाकाल का निवास स्थान है।
महाकालेश्वर मंदिर पहुंचते-पहुंचते कई आंखों में क्षिप्रा उतर आई। जाने-अनजाने जिंदगी में हुई कोई भूल, कोई गल्ती, कोई अपराध की गलानि। वहीं अरदास, भोले बाबा अब न करेंगे ऐसा। कतारों में महिलाओं की तादाद हर जगह अधिक दिखी। संध्या आरती के बाद महाकालेश्वर से कुछ बांस की दूरी पर मस्जिद के ओटे पर आईआईटी कर चुके राजस्थान के युवा संन्यासी स्वामी पशुपतिनाथ, बिहार के साधु शिवकुमार पांडेय और मौलाना सैयद मशहूद हसन की बैठकी समरसता के अलग कोलाज निर्मित करती रही। श्रद्धालुओं के लिए बने चिकित्सा सेवा शिविर के संचालक अब्दुल माजिद नागोरी कहते हैं कि पिछले दिनों शहर में आए बारिश-तूफान में मस्जिदों ने श्रद्धालुओं के लिए दरवाजे खोल दिए थे। शायद सिहंस्थ का अध्यात्मिक स्वर भी यही है, वसुधैवकुटुंबकम।

भास्कर के लिए लिखा गया



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शनिवार, 21 मई 2016

छैला संदु पर बनी फिल्म को लेकर लेखक-फिल्मकार में तकरार
























मंगल सिंह मुंडा बोले, बिना उनसे पूछे उनके उपन्यास पर बना दी 

गई फिल्म, भेजेंगे लिगल नोटिस जबकि निर्माता और निर्देशक का 

लिखित अनुमति का दावा



सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

शीरीं-फरहाद, हीर-रांझा, लैला-मजनूं, सोहीनी-महिवाल और रोमियो-जूलियट की प्रेम कथाएं अमर हो चुकी हैं। लेकिन झारखंड के छैला-संदु की मोहब्बत के संगीत से देश-दुनिया अंजान थी। जबकि वो आज भी दशमफाॅल के आसपास की हरी-भरी वादियों में गूंजता है। मुंडारी जानने वालों के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कहानी अलग-अलग शैली और मुहावरे में प्रचलित रही है। पर साहित्य की शक्ल में इसका दस्तावेजी प्रमाण नहीं मिलता। खूंटी के मुंडारी-हिंदी साहित्यकार मंगल सिंह मुंडा ने सबसे पहले इस लोक कथा को आधार बनाकर 1995 में हिंदी में छैला संदु शीर्षक से उपन्यास लिखा। राजकमल प्रकाशन से 2004 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ। इसके बाद हिंदी की कई पत्र-पत्रिकाओं में यह प्रेम कहानी छपकर अमर हो गई। ताजा खबर है कि छैला संदु के नाम से ही ओवियान मूवीज जमशेदपुर ने राढ़ी बांग्ला में फिल्म बनाई है। पिछले दिनों उसका प्रीमियर शो भी हुआ। फिल्म के पोस्टर में बतौर कहानी लेखक मंगल सिंह मुंडा का नाम दर्ज है। स्क्रीन पर भी उनका नाम आता है। लेकिन इन सबसे लेखक मंगल अनभिज्ञ हैं। उनका कहना है कि बिना उनसे अनुमति लिए उनके उपन्यास पर फिल्म बना दी गई है। वह जल्द ही प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को कानूनी नोटिस भेजेंगे। इधर, निर्माता और निर्देशक ने दावा किया है कि उनके पास मंगल सिंह मुंडा का लिखित अनुमति पत्र है।

फिल्मकार ने कहानीकार को किया पहचानने से इंकार

लेखक मंगल सिंह मुंडा ने बताया कि सालभर पहले उन्हें पता चला था कि उनकी जगह साहित्यकार रणेंद्र का नाम कहानीकार के नाते फिल्म में शामिल किया जा रहा है। इसके बाद मुंडा रणेंद्र से मिले। उनसे पता लेकर जमशेदपुर जाकर निर्माता और निर्देशक से मिले। बकौल मुंडा, निर्माता-निर्देशक ने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। कहा कि वे किसी मंगल सिंह मुंडा को नहीं जानते। उन्होंने रणेंद्र की पुनर्लिखित लोक कथा के आधार पर फिल्म बनाई है।

लोक कथा किसी की बौद्धिक संपदा नहीं होती : रणेंद्र

कवि-लेखक रणेंद्र ने कहा है कि छैला संदु उपन्यास मंगल सिंह मुंडा का ही है। हालांकि छैला संदु की लोककथा बहुत पहले से जन-जन में लोकप्रिय रही है। लोक कथा किसी की बौद्धिक संपदा होती भी नहीं है। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने फिल्मवालों से कहा था कि कहानी लेखक की हैसियत से मंगल सिंह मुंडा का ही नाम जाए। फिल्म के ब्रोशर, पोस्टर में उनका नाम छपा भी है। इसके अलावा फिल्म के परदे पर भी मुंडाजी का ही नाम आता है।

लिखित अनुमति देकर सरासर झूठ बोल रहे हैं मंगल : निर्देशक

छैला संदु के निर्देशक मो. निजाम ने बताया कि साहित्य अकादमी से प्रकाशित पुस्तक भारत की लोककथाएं से उन्हें छैला संदु की कहानी मिली थी। जिसमें पुनर्लेखन के तौर पर रणेंद्र नाम लिखा था। उनके प्रोड्यूसर कुमार अमित ने फिल्म बनाने की इच्छा जताई। हमलोग रणेंद्र से मिले। उन्होंने सहमति दी और लेखक बतौर मंगल सिंह मुंडा का नाम देने को कहा। बाद में मंगल सिंह जमशेदपुर आए और उन्होंने लिखित अनुमति दी। अब वह सरासर झूठ बोल रहे हैं।


यह है प्रेम कहानी

कहा जाता है कि आदिवासी युवक था छैला संदु। जिसकी बांसुरी पर एक राजकुमारी बूंदी फिदा हो गई। जिद कर बैठी कि वह विवाह करेगी, तो उसी से। राजा ने शर्त रखी कि छैला को दरबारी संगीतज्ञ से संगीत प्रतियोगिता जीतनी होगी। वह जीत भी गया, पर उसने शादी से इसलिए इंकार कर दिया कि राजकुमारी को गरीबी में जिंदगी गुजारनी पड़ेगी। इधर, छैला की विधवा भाभी उससे विवाह करना चाहती है। जबकि छैला नदी पार के गांव की लड़की नारो से प्रेम करने लगता है। रोज की तरह एक रात जब वह एक जंगली लता के सहारे नदी पार कर रहा होता है, तो लता काट दी जाती है। बांसुरी और मांदर के साथ नदी में गिरकर छैला मर जाता है। जब से समूचा इलाके में उसकी बांसुरी की धुन गूंज रही है।


भास्कर के लिए लिखा गया



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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

2015 अलविदा खुश आमदीद 2016

गुज़रे साल का सरसरी आकलन

 



















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


उजियारा कभी, तो कभी घुप्प अंधेरा। बात जब भी होगी, तो सवेरे की होगी, क्योंकि रौशनी में हर वो चीज दिख जाती है, जिसे आप देखना चाहें या न चाहें। पिछले दिसंबर में हम 2015 का सूरज देख रहे थे। जिसके सफर के साथ हमने कई मंजिलें तय कीं। इसमें सियासत की कलाबाजियां थीं, तो विकास का दौड़ता रथ भी। जगह-जगह बनते खून के बादल थे, तो उस बारिश से बचने के लिए गंगा-जमनी संस्कृति की बरसों पुरानी हमारे पास छतरी भी थी। माइक से जगह-जगह असिहष्णुता के प्रचारक थे, तो मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना गाने वाली टोलियां भी थीं। इनमें कलमकार थे, तो फनकार भी। कल-कारखानों के मजदूर थे, तो आम अवाम भी। इस दौरान मुल्क की करीब सभी जबानों में लाखों किताबें आईं। उनमें इतिहास, भूगोल, समाज और साहित्य समेत कई अनछुए विषय हमारे सामने आए। राष्ट्रीय और अंतररराष्ट्रीय इनामों से लेखकों और शायरों को नवाजा गया। लेकिन कहीं-कहीं सांप्रदायिकता की आग की लपटों ने उनके संवेदनशील मन को प्रभावित किया। कईयों ने भावुकता में आकर बरसों पहले मिले इनामों-एकराम को लौटाने का एलान किया। वहीं असिहष्णुता के खिलाफ जगह-जगह प्रदर्शन हुए। यह दिगर है कि इसमें नामवर न हुए। न कोई मनव्वर हो सका। रानाई अपनी जगह कायम रही। इसका असर यह हुआ कि सरकार को भी सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़े कदम उठाने पड़े। हालांकि इसमें मुल्क की इल्मो-मोहब्ब्त का कंट्रीब्यूशन सबसे ज्यादा रहा।


बिस्मिल अजीमाबादी की मशहूर गजल सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, की नेक नियत आजादी की जंग के वक्त हर हिंदुस्तानी के दिल में जोर मारा करती थी। इसमें उर्दू के सहाफी और अखबार भी थे। लेकिन आज उर्दू सहाफियों की हालत बदतर है। हालांकि रोजनामों और हफ्तारोजा अखबारों की कमी नहीं। पर उसमें खूनजिगर एक करने वाले परेशान हाल हैं। इस साल उर्दू पत्रकारों ने कई शहरों में कॉन्फ्रेंस और सेमिनार कर अपने दर्द को सरेआम किया।

इधर, दिल्ली से लकर रांची और पटना तक कई बुक फेयर लगे। जो मुल्क में तहजीबी और अदबी फिजा बरकरार रखने के बायस बने। तालीमी बेदारी का कारवां भी स्कूली बच्चो से लेकर युनिवर्सीटियों में लोगों के जेहन का मरकज बना। डिजिटल इंडिया की चमक गांवों में भी इस साल पहुंची। राजस्थान के रेगिस्तान हों या झारखंड के सारंडा। नौजवानों में इल्मो-हुनर की हरियाली फैली। वहीं वजीरेआजम नरेंद्र मोदी के सफाई मिशन का सिला यह हुआ कि लोग सड़कों पर कूड़ा-कचरा फेंकने से परहेज करने लगे हैं। शहर की स्लम बस्तियों और गांवों में हाजत के लिए अब औरतों और बुजुर्गों को झाड़ या पेड़ के झुरमुटों या सूरज ढलने का इंतजार खत्म हुआ। सरकार ने जगह-जगह पब्लिक टॉयलेट बनवाने शुरू किए हैं। औरतों के लिए बैंकों में खाते खुलवाए जा रहे हैं, यह कदम भी आने वाले दिनों में सुनहरी सुबह की तरफ गामजन होगा। औरतों को लकर मर्दों का नजरिया आज भी दकियानूसी है। वजह जो भी रही हो, उनका जिस्मानी इस्तहसाल खूब बढ़ा। रेप की खबरें साल भर सुर्खिंयां बनती रहीं। लेकिन जाते-जाते 2015 ने इस सिलसिले में सख्त कानून दे दिए। अब ऐसे मामले में 16 साल तक की उम्र सजा के लिए तय कर दी गई। साल की खुशखबर यह भी रही कि भारत के मंगलयान का सफर जारी है ही, चंद्रयान 2 को भी कामयाबी मिली। सेमी बुलेट ट्रेन का ट्रायल हुआ, कामयाब रहा। कुछ बड़े शहरों में ग्रीन कॉरीडोर जैसी पहल मरीजों के लिए ऑक्सीजन बनी। दरअसल इमरजेंसी केसों में मरीजों को वक्त पर अस्पताल पहुंचाने में अक्सर रोड की रश ट्रैफिक जानलेवा होती है। लेकिन कुछ शहरों में एक सायरन के बाद लोगों ने एंबुलेंस को जाने के लिए ट्रैप्िक रोकने की शुरुआत की। इससे कई लोगों की जानें बचीं। कई खतरनाक ऑपरेशन वक्त पर हो सके।


हालांकि गुजरे साल में ऐसी शख्यियतें भी हमसे बिछुड़ गईं। जिनका होना, हिंदुस्तानियत की शिनाख्त थी। डॉ. अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम जिन्हें मिसाइल मैन का लकब मिला, नहीं रहे। वे मुल्क के सदर भी रहे। लेकिन अवामी सदर के नाते उन्हें शोहरत मिली। वहीं आम आदमी को पहचान देने वाले और कॉमनमैन को हीरो बनाने वाले कार्टूनिस्ट रसिपुरम कृष्णस्वामी अय्यर लक्ष्मण (आर.के. लक्ष्मण) साल की शुरुआत में ही हमसे जुदा हो गए। उनके कार्टून ने भारत की दुनिया में अलग पहचान बनाई। आम इंसान की बात चली है, तो मदर टेरेसा का जिक्र जरूरी समझता हूं। उनके ही गरीब-मजदूर बेसहारा बच्चों को सहारा देने वाली मिशनरीज ऑफ चैरिटी की चीफ सिस्टर निर्मला जोशी का इंतकाल भी इसी साल हो गया। आउटलुक के बानी शोहरतयाफ्ता सहाफी विनोद मेहता की रहलत भी मुल्क की अमनो-सलामती में एक झटका की मानिंद है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी रहे अमीर--शरीअत मौलाना सैयद निजामुद्दीन भी आखिरी सफर पर कूच कर गए। उनकी कमी बरसों तक उनके चाहने वाले महसूस करते रहेंगे।


सड़क और रेल हादसों में कई जानें हलाक हुईं। लेकिन आइंदा इनमें कमी आए इसके लिए सरकार ने कई प्लान बनाए। अब रेलवे एक तयशुदा अवकात के साथ जीरो हादसा मिशन शुरू करेगा।इसका मकसद हादसों को टालना और मौतों की तादाद को रोकना है। इसके लिए रेलवे को हाइटेक किया जाएगा। इन खुशनुमा खबरों के दरम्यान कइ्र सूबों में कुर्सियां बदलती रहीं, सुबह-शाम जलसे-जुलूस होते रहे। आम आदमी लुटता रहा, खास जेबें भरती रहीं। हाईवे बने, तो कई सड़कें गउ़ढों में तब्दील भी हुईं। कारों ने कहीं फर्राटे भरे, तो कहीं गाड़ियां रह-रहकर उछलती भी रहीं। भ्रष्टाचार की तोंद तंदरुस्त होती रही, तो वहीं कइयों को इसके इल्जाम में जेलों की चक्कियां भी पीसनी पड़ रही हैं।

खिलाड़ी देश का नाज़ होते हैं। दुनिया के कोने-कोने में जाकर मुल्क का नाम रोशन करते हैं। इस साल भी टेनिस सितारा सानिया मिर्जा और बैडमिंटन स्टार शइना नेहवाल ने इस मिथ को मटियामेट किया कि लड़कियां पीछे रहती हैं। सानिया ने ग्रैंड स्लैम, तो शाइना ने पहली मर्तबा टॉप पर पहुंची। शानदार प्रदर्शन के लिये टेनिस स्टार सानिया मिर्जा को खेल का सबसे बड़ा सम्मान मुल्क के सदर ने दिया। हॉकी एशिया कप (जूनियर) में भारत ने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 6-2 से हराकर खिताब अपने नाम किया।


बुजुर्गवार कह गए हैं, बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेय। 2015 की बिदाई पर आप हाथ हिलाएं या तालियां बजाएं। पर खोया-पाया का हिसाब न लगाएं। जो बुरा हुआ, उसे भूल जाएं। जो अच्छा हुआ, उसे ताकत बनाएं। कुछ सीख लें, तो कुछ सीख दें। नए साल का इस्तकबाल करें। नया सूरज आपके लिए कई सौगातें लेकर आ रहा है। जल्द ही शहर से गांवों तक 24 घंटे बिजली मिलने लगेगी। वहीं इस पॉवर का इस्तेमाल तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन में आप करेंगे।

नेक तमन्नाओं से भरी अपनी इस दुआईया नज्म के साथ आपसे इजाजत चाहूंगा:


सब की फरियाद हो
गांव शाद-बाद हो
इरादा चट्‌टान हो
खुला आसमान हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


हर होठ पे गुलाब हो
पके आम सा शबाब हो
खूबसूरत मकान हो
मुट्‌ठी में जहान हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


हर गाल पे गुलाल हो
रिश्ता न महाल हो
मां का ख्वाब हो
आंगन शादाब हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।

कोयल का साज़ हो
सब की आवाज़ हो

मसला न सवाल हो
हर हाथ में कुदाल हो।

जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।

नदी की रवानी हो
न कभी बदगुमानी हो
वक्त न होलनाक हो
हर सोच ताबांक हो।


जिंदगी खुशहाल हो
ऐसा नया साल हो।


रांची आकशवाणी से यह मक़ाला 25 दिसंबर की सुबह 9:30 बजे प्रसारित हुआ।







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गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

शहर के बीच 22 सालों से लग रही पंचायत

सुलझाए गए भूमि विवाद, शादी और तलाक के डेढ़ हजार मामले























सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

रांची लेक रोड से जब देर रात आपका हिंदपीढ़ी की गली नंबर दो में गुजर हो, तो आधे सफर बाद आपको अक्सर भीड़ दिखाई दे जाएगी। जिसमें कोई वकील की तरह जिरह कर रहा होगा, तो बाकी लोग चुपचाप उसकी बातों पर गौर करने में तल्लीन। तभी दूसरा पक्ष कागजातों का पुलिंदा मेज पर फैला देता है। दरअसल यह पठान तंजीम का कार्यालय है। जहां शहर के लोग भूमि विवाद, शादी और तलाक के मामले लेकर इंसाफ की आस में पहुंचते हैं। यहां वैसे ही मामले सुलझाए जाते हैं, जिनमें केस थाना-पुलिस में दर्ज नहीं हो पाते या करवाए जाते हैं। कभी एक से दो घंटे, तो कभी कई दिनों तक पक्ष-विपक्ष पंचों के साथ बैठकें करते हैं। बहस-मुबाहिसे और कागजातों को देखने के बाद निर्णय सुनाया जाता है, जिसे दोनों पक्ष सहर्ष मंजूर करते हैं। शहर के बीच लगती इस पंचायत ने बारह वर्षों में डेढ़ हजार से अधिक मामले सुलझाए हैं। तंजीम की स्थापना 2003 के क्रिसमस के दिन इस संकल्प के साथ की गई थी कि हजरत ईसा मसीह के अमर वचन "न बुरा, देखो, न बुरा बोलो और न बुरा सोचो" पर अमल करते हुए समाज के उन पीड़ितों की मदद की जाएगी, जिनके पास कोर्ट-कचहरी के लिए पैसे नहीं होते। वहीं जो पंच परमेश्वर की परंपरा पर विश्वास करते हों।

मरहूम अधिवक्ता महमूदुल हसन, मो. रिजवान खान, सलीम इब्राहिम, नसीम खान आदि की मेहनत ने असर दिखाना शुरू किया, तो उनके जज्बे को परवान चढ़ाने युवाओं की कतार लग गई। अभी मो. शुएब खान राजू (अध्यक्ष), मो. शहजाद बबलू (सचिव), मो. नसीम (कोषाध्यक्ष) की अगुवाई में अनवर खान, मो. अनवर, नसीरउद्दीन, शाहिद जमाल और अलीम खान जैसे जुझारू हजारों लोग शांति, सद्भाव और शिक्षा जागरूकता के प्रचार-प्रसार में लगे हैं। ये लोग सरहुल, दशहरा, मुहर्रम, ईद मिलादुन्नबी और छठ के मौके पर चना, शर्बत और फलों का वितरण करते ही हैं। स्कॉलरशिप कैंप, मतदाता जगारूकता और नरेगा जागरूकता शिविर भी शहर से लेकर गांवों तक लगाते हैं। वंचितों के बीच रिक्शा, नि:शक्तों को ट्राई साइकिल देने और गरीब बेटियों की शादी में भी आर्थिक मदद करने में नहीं हिचकते।

केस-1 शंकर और फजल हुए एक

बंशी चौक स्थित श्रीशंकर और फजल बरसों से पड़ोसी हैं। उनके बीच के प्रेम और सद्भाव को थोड़ी सी जमीन अक्सर दरार डाल देती थी। एक पक्ष का आरोप था कि उसकी जमीन दूसरे पक्ष के कब्जे में है। चूंकि दोनों अच्छे पड़ोसी हैं, इसलिए कोर्ट-कचहरी जाना नहीं चाहते थे। मामला तंजीम के पास पहुंचा। दोनों पक्षों की बात सुनी गई। अमीन बुलवाकर जमीन की नाप-जोख हुई कागजात के मुताबिक। निर्णय हुआ, जिसे दोनों पक्षों ने माना।

केस-2 दोनों परिवार को मिला रास्ता

मो. इज्हार और जमीला बेगम के घर और जमीन के बीच आने-जाने के मार्ग को लेकर विवाद चला आ रहा था। प्राय: इनमें वाद-विवाद होता रहता। कुछ लोगों ने इन्हें मोहल्ले की बात मोहल्ले में ही सुलझा लेने की सलाह दी। इसके बाद दोनों परिवार ने अलग-अलग घरों के बड़ों से राय-मश्विरा किया। अंत में तंजीम के पास ये पहुंचे। वकील और बुद्धिजीवी की टीम की रिपोर्ट के बाद दोनों पक्षों की बात सुनी गई। आखिर दोनों की सहमति से दोनों को रास्ता मिल गया।

केस-3 लड़की को मिला 60 हजार हर्जाना

शाहीन और रमजान (नाम बदले हुए) ने प्रेम विवाह किया था। लेकिन उनमें बहुत दिनों तक प्रेम बचा नहीं रही। किसी न किसी बहाने इनके बीच खटपट होने लगी। एक दिन लड़की थाना पहुंच गई कि उसे सुसराल में जलाने का प्रयास किया गया। बिना केस दर्ज कराए लोगों के हस्तक्षेप से लड़की वापस तो आ गई, पर मायके चली गई। तंजीम की पंचायत में दोनों ने अलग रहने का निर्णय किया। लड़की को 60 हजार रुपए हर्जाना दिलवाया गया। इसमें आधे पैसे तंजीम ने दिए।

दैनिक भास्कर रांची के 17 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित




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मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल का ताज़ा स्टेटस मुखिया कुरुवा


जीवन पर बनी फिल्म ‘बुरू-गारा’ को मिल चुका है राष्ट्रीय पुरस्कार
 




















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
दौड़ती-हांफती-भागती
तलाश रही हूं सदियों से निरंतर
अपनी जमीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ।

स्त्री के अस्तित्व की खोज करती यह काव्य पंक्तियां संताली व हिंदी कवयित्री निर्मला पुतुल की हैं। जद्दोजेहद की एक और मंजिल उन्होंने हासिल की है। जिसे पंचायती जबान में मुखिया कहा जाता है। बीती सदी के अंतिम दशक में धुमकेतु की तरह उभरी झारखंड की इस आदिवासी बाला ने साहित्य संसार के सभी तीसमारों को चकित कर दिया था। स्त्री, तिस पर आदिवासी। लेकिन साहस के पंख के सहारे उन्होंने कला, प्रतिभा और आंदोलन की उड़ान जारी रखी। तीन-चार किताबों, दर्जन भर पुरस्कारों और देशी-विदेशी कई भाषाओं में अनुवाद उनके नाम दर्ज होते गए। लेकिन धरती आबा बिरसा मुंडा को आदर्श मानने वाली झारखंड की यह बेटी महज साहित्य तक सीमित कैसे रहती। उसने ग्रामीण महिलाओं को उनका वाजिब अधिकार दिलाने के लिए पंचायत चुनाव में शामिल होने का निर्णय लिया। पहले से ही उनके जमीनी संघर्ष के अनुभव ने उनका साथ दिया। भारी मतों से जीत कर वह दुमका जिला की कुरूवा पंचायत की मुखिया बन गईं। उन्होंने 1037 वोट हासिल कर पुनिका टुडु और अनिल मरांडी को पराजित किया।

हौसले से किया संकटों को परास्त

निर्मला पुतुल का जन्म 6 मार्च, 1972 को हुआ। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इस संकट से पार पाने के लिए उन्होंने नर्सिंग का कोर्स किया। बाद में उन्होंने इग्रू से स्नातक की डिग्री हासिल की। ग्रामीण आदिवासी जीवन की त्रासदी ने उन्हें लिखने को प्रेरित किया। पहले संताली में उन्होंने कविता लिखना शुरू किया। देश की पत्र-पत्रिकाओं में जब उनकी कविताएं छपीं, तो तहलका मच गया। उसके बाद वह हिंदी में भी लिखने लगीं। उनके जीवन पर आधरित ‘बुरू-गारा’ नामक फिल्म बनाई गई है, जिसे 2010 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

नगाड़े की तरह बजते शब्द

उनके शब्द नगाड़े की तरह बजते हैं। यही वजह है कि भारतीय ज्ञानपीठ जैसे संस्थान से प्रकाशित उनके पहले कविता संग्रह का नाम भी ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ है। इसके बाद रमणिका फाउंडेशन ने उनका काव्य संग्रह ‘अपने की घर की तलाश में’ छापा। ‘फूटेगा एक नया विद्रोह’ उनका तीसरा संग्रह है। ओनोंड़हें में उनकी संताली कविताएं संगृहित हैं। उनकी कविताएं अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, उडिय़ा, कन्नड़, नागपुरी, पंजाबी व नेपाली सहित अनेक भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं।

झोली में हैं कई राष्ट्रीय सम्मान

निर्मला के व्यक्तित्व और कृतित्व को कई पुरस्कार और सम्मानों से नवाजा जा चुका है। 2001 में उन्हें केंद्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने ‘साहित्य सम्मान’ प्रदान किया। झारखंड सरकार ने 2006 में ‘राजकीय सम्मान’, तो 2008 में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, 2014 में हिमाचल प्रदेश हिंदी साहित्य अकादमी ने उन्हें सम्मानित किया। पहला शैलप्रिया स्मृति सम्मान समेत उन्हें मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान, भारत आदिवासी सम्मान और राष्ट्रीय युवा पुरस्कार मिल चुका है।

दैनिक भास्कर के रांची संस्करण में 15 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित











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वंचित बच्चों के लिए रिज़वाना का मुफ़्त स्कूल


पांच शिफ्ट में 22 सालों से संचालित है तालीमी आशियाना
 





















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

पांच शिफ्ट में संचालित महज चार कमरे वाले किसी स्कूल के बारे में आपने शायद कम ही सुना होगा, जहां नर्सरी से लेकर मैट्रिक तक के स्टूडेंट्स पढ़ते हों। वो भी नि:शुल्क। ये वो बच्चे हैं, जो कहीं काम करते हैं, या उनके माता-पिता मजदूरी कर गुजर-बसर चलाते हैं। यहां से पढ़ चुके कई छात्र इंजीनियर और अधिकारी तक बन चुके हों। यह कहानी हिंदपीढ़ी मुजाहिद नगर की आजाद गली स्थित रिजवाना के केयूजी स्कूल की है। उनके साथ हैं छह टीचरों की टीम। सवाल उठना लाजिम है कि सब कुछ होता कैसे है। एमए और बीएड कर चुकीं रिजवाना कहती हैं कि वे देर रात तक संपन्न परिवारों के बच्चे को ट्यूशन पढ़ाती हैं, उससे प्राप्त आय से वह टीचरों को नाम मात्र का मुआवजा देती हैं। अलग-अलग शिफ्ट में अलग-अलग टीचर सेवा देती हैं। इसलिए बाकी समय वे दूसरे स्कूलों में पढ़ाने चली जाती हैं, ताकि उनका खर्च चल सके। वहीं इसी स्कूल की कभी स्टूडेंट रही ये टीचर रिजवाना के जज्बे को ऊर्जा देती हैं। बच्चों के इस तालीमी आशियाना की शुरुआत जून 1993 में की गई थी।

सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक पढ़ाई

सुबह होने के साथ ही गली में चहल-पहल शुरू हो जाती है। ये कक्षा नौवीं से दसवीं तक के छात्र हैं, जिनकी क्लास 06 बजे से 09 बजे तक चलती है। इसके बाद 09 से 11 बजे तक 5वीं से 8 वीं तक के बच्चे पढ़ते हैं। इसी तरह 11 से 01 बजे तक नर्सरी से चौथी, 02 बजे से 08 बजे रात तक फिर नौवीं से दसवीं और 08 बजे से 10 बजे रात तक 06 वीं से 07 वीं तक की कक्षाएं यहां संचालित होती हैं। कमरों की कमी के कारण कक्षाएं शिफ्ट में लगती हैं।

250 स्टुडेंट्स के लिए हैं 6 टीचर्स

रिजवाना के तालीमी हौसले को स्कूल की टीचर्स बढ़ावा देती हैं। स्कूल के 250 बच्चों को पढ़ाने के लिए नेहा परवीन, शबनम निसा, शबनम परवीन, रूबी परवीन, शमा परवीन और मो. अर्शद अपनी सेवा देते हैं। ये बतौर मुआवजा हजार रुपए से अधिक नहीं लेतीं। वहीं कुछ की ममता कभी-कभी इन बच्चों के लिए कॉपी-पेंसिल और टॉफी भी ले आती है। वहीं कुछ अभिभावक स्कूल की मदद के प्रति छात्र बतौर 20 रुपए मासिक शुल्क भी अदा कर देते हें।

एक किताब से पढ़ते हैं दो से तीन बच्चे

रिजवाना कहती हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत बच्चों के लिए किताब और कॉपी की उपलब्धता की है। इसलिए एक किताब से दो से तीन बच्चे पढ़ते हैं। कभी-कभार समर्पित फाउंडेशन और वीकर सोसायटी जैसी एक-दो संस्थाएं और संपन्न लोग बच्चों के लिए किताब-कॉपी स्कूल में आकर दे जाते हें। लेकिन सरकार की ओर से आज तक स्कूल या यहां पढ़ रहे बच्चों की कभी किसी तरह की सहायता नहीं मिली। दो कमरे बिना छत के थे। लोगों की मदद से उसे छा दिया गया है।


दैनिक भास्कर रांची के संस्करण में 15 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित



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