बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

26/05 की अद्भुत शाम

सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है
 











ऋषभ श्रीवास्तव की क़लम से
 
कुछ दिनों पहले से ही जिस्म शल (ठंडा) हो रहा था।  सिर दर्द कर रहा था. कुछ सोच नहीं पा रहा. क्या बोलूंगा उस दिन? 3-4 दिन ही तो बचे हैं! विगत 8-9 महिनों में सब तो बोल ही दिया है. बोल ही तो रहा हूँ यार. उस बन्दे की मैं इज़्ज़त तो करता हूँ भाई, बिना बोले ही दस साल निकाल दिया. बिना बोले ही चला भी गया. है कोई माई का लाल? धन्य है भारत माता! असल शेर तो वही था. एक गिलास पानी ही पी लेता हूँ. यार, चैन नहीं आ रहा. वाइफ को फोन करुंँ क्या? अबे यार, उस बैसाख् नन्दिनी गँवार पशु को क्या पता? रोने लगेगी कि अब तो साथ रख लो. स्त्री का जीवन तो पति के ही चरणों में होता है. जंगल में भी रह लूँगी. बस आपका सान्निध्य चाहिए. 

कैसे होगा? इतने बड़े-बड़े लोग होंगे! बड़े बड़े उद्योगपति,  हीरो हीरोइन , विदेशी लोग होंगे. क्या बताऊँगा? ये मेरी वाइफ है? थेपला अच्छा बनाती है. नही, मैं आजन्म कुंवारा रहूँगा. जो बोल दिया, वही सही है. कोई बहस नही होनी चाहिए. एक पशु के साथ बाँध देने से मैं विवाहित तो नही हो जाता? बस अब कोई बहस नहीं.
आज रात पार्टी ही कर लूँ क्या?  
यार, हिंदू हृदय सम्राटों को पता चलेगा तो बोलेंगे कि आ जाओ मस्ती करते हैं. अनूप भाई का नया भजन आया है. आ जाओ, धमाल होगा. अखंड दीप प्रज्वलित करेंगे. अनवरत आरती होगी. कसम से, बहुत बोर करते हो तुम लोग यार. दर्द सा लग रहा है सीने में. चिकित्सक बुला लूँ क्या? नहीं यार, फिर वही सीने वाली बात हो जायेगी. इतना इंच, उतना इंच. बात का बतंगड बना देते हैं लोग. थरूर को अंग्रेज़ी में धर लिया, मुझे हिन्दी में धर लेते हैं. इन लोगों को एक ही भाषा समझ आती है. रुक जाओ दो चार दिन, सब समझा दूँगा इधर. वन का गीदड़ जायेगा किधर.
ये तो कविता हो गयी. अरे वाह ! किसी कविता से ही शुरू करूँगा उस दिन. लेकिन वो अमेठी वाला लौंडा धर लेगा. रिज़ाला आदमी है. वाजपेयी जी तक को हथियाने लगता है. बोलेगा कि आ गए लाइन पर बेटा. मेरी पार्टी का प्रभाव है. श्री मुख से कविता फूटने लगी. मधुरता का संचार हो रहा है. शेर कोयल की आवाज़ में कूक रहा है. ख़ुद को हिन्दी कविता का छोटा पुत्र बताता है, मुझे तो बिन मांगी मुराद बता देगा. कविताएं सुनी है उसकी, संघी आदमी ही तो लगता है.
 जार्ज वाशिंगटन की tryst with destiny से शुरू करुं क्या? मस्त रहेगा! लेकिन फिर हंगामा हो जाएगा. ग़लत बोल दिया. नेहरु ने बोला था. विवेकानंद ने बोला था. भाइयों और बहनों, नेहरु ने कौन सा सही बोला था? when the whole world sleeps....... कहां भाई , रात तो भारत में ही थी. यहीं लोग सो रहे होंगे. पूरी दुनिया में तो दिन निकल गया था उस बखत. भावनाओं में बह गए थे नेहरू . भूगोल नहीं पता था उनको. मेरा इतिहास गड़बड़ है. भूगोल तो पक्का है मेरा. कश्मीर के भूगोल में भी नेहरू गच्चा खा गए थे. मुझे तो पूरा पता है कश्मीर का भूगोल. एक एक इंच नाप नाप के लूँगा.
 छडडो यार, हटा सावन की घटा़. जय श्री राम से ही शुरू करूँगा. पर यार ये बवाली साले गँवार ! एकदम से उन्मत हो जायेंगे. कही दंगा-फसाद कर दिया तो...... छोडूंगा नही मैं, बता देता हूँ. एक दो बार हो गया, हो गया. बार बार तुम्हारी वही बकैती. तुम्हारे चलते लोग प्रधानमंत्री बनना छोड़ दे अब. फिर मैं भूल जाऊँगा कौन सा देवता किसके सर आता है. मिलिटरी लगाऊँगा़. सारे भूत नक्षत्र उतरवा दूँगा.
 trin....trin....trin...trin....trin...
 हैलो , हाँ भाई बोलो. क्या? क्या? कब? LoL ....अच्छा मैं अभी आता हूँ. एकदम तुरंत. हाँ यार, हेलिकाप्टर यहीं पर है. जून जुलाई के बाद ही दूँगा. माँग भी नहीं रहे वो लोग. एक घंटा लगेगा. जय श्री राम. take care.
तैयार तो हूँ ही. भइया इस चुनाव में कई रंग देख लिए. लो, अब iron man को हार्ट अटैक आ गया. गज़ब नौटंकीबाज आदमी है. भइया तुम निकल ही लेते. जान छूटती. मूर्ति लगवा देते तुम्हारी. बच्चों की तरह करोगे तो अब कौन बरदाश्त करेगा. हिन्दुत्व वादी हो. पढ़े होगे कि जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का हो जायेगा. बात करते हो.पर चलो, थोड़ा टाइम पास हो जायेगा. खिलाड़ी आदमी है. मरेगा नहीं. इतना तो मुझे पता है. चलूँ मैं. देश पुकार रहा है. गिरने नहीं दूँगा मैं . मिटने नहीं दूँगा मैं.

(रचनाकार -परिचय:
जन्म: २१ मई १९८७ को गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में
शिक्षा: प्रारंभिक- तराँव, गाजीपुर स्कूल- बक्सर कालेज- नोएडा से मेकेनिकल इंजीनियर
सृजन: फेसबुक पर सक्रिय। कोई प्रकाशित रचना नहीं।
संप्रति: मुंबई में सरकारी नौकरी
संपर्क: axn.micromouse@gmail.com )  

ऋषभ की कविताएं हमज़बान पर पहले  आ चुकी हैं
  
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बुधवार, 26 नवंबर 2014

ख्वाजा अहमद अब्बास और अलीगढ़

 वसुधैव कुटुंबकम के सच्चे पैरोकार 












सैयद एस.तौहीद की क़लम से


ख्वाजा अहमद अब्बास इस सदी के मकबूल पत्रकार,कथाकार एवं फिल्मकार थे। आपको वाकिफ होगा कि अब्बास अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से ताल्लुक रखते हैं। अलीगढ से पढकर निकलने वाले महान विद्यार्थियों में आपका एक मुकाम था। अलीगढ को अब्बास सरीखा छात्रों पर नाज है।  अब्बास साहेब के परिवार का अलीगढ से एक पुराना रिश्ता रहा है। आपके परनाना ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली जनाब सर सैयद अहमद के करीबी दोस्त थे। आपके नाना ख्वाजा सज्जाद का ताल्लुक अलीगढ की पहली नस्ल से था। ख्वाजा सज्जाद ने मोहम्मडन एंग्लो इंडियन कालेज से स्नातक किया था। अब्बास के पिता ख्वाजा गुलाम भी विश्वविद्यालय से जुडे रहे। विश्वविद्यालय रिकार्ड अनुसार अब्बास का जन्म हरियाणा के पानीपत में हुआ था। तीस के दशक में आप अलीगढ में शिक्षा ले रहे थे। आपके चचाज़ात भाई ख्वाजा अल सैयद भी अलीगढ के छात्र थे। बाद में जाकर आपके यह भाई वहीं प्रोफेसर भी नियुक्त हुए। 
अलीगढ में अब्बास पहली बार ख्वाजा सज्जाद संग सन पच्चीस के जुबली समारोह में आए । सामारोह में मुसलमानों के सबसे मशहूर नेता व शख्सियतें शामिल थी । इन शख्सियतों में मुहम्मद अली जिन्ना एवं इक़बाल तथा अली इमाम फिर आगा खान का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। मशहूर लीडर अली इमाम से आप पहली मर्तबा इसी सामारोह में मिले। विश्वविद्यालय के जुबली सामारोह व दिलकश फिजा ने अब्बास को बहुत प्रभावित किया। जुबली सामारोह में पेश वाद-विवाद प्रतियोगिता ने दिल जीत लिया था। शानदार इमारतों और जुबली के हंगामों के बीच वाद-विवाद का कार्यक्रम सबसे हटकर था। जुबली डिबेट कंपीटिशन में आपके चचाज़ात भाई हीरो बनकर उभरे। वो  घटना ने जिसने आपकी जिंदगी को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह यही डिबेट कंपीटिशन था । तकरीबन पांच हजार लोगों की भीड थी । मंच पर मुसलमानों के सबसे मशहूर नेता मौजूद थे। डिबेट का विषय ‘हिन्दुस्तान के मुसलमानों को क़ौमी सियासत में बाक़ी लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, अथवा अलग पार्टी भी बनानी चाहिए’।  पक्ष में  बात आपके भाई ने रखी जिसको वहां आए सभी मशहूर लोगों ने काटने की कोशिश की। आपके चचाज़ात भाई  ख्वाजा अल सैयद की तक़रीर अलीगढ के इतिहास में  यादगार है। इसने आपकी जिंदगी का रुख मोड दिया । तक़रीर खत्म होते ही पंडाल तालियों से गूंज उठा।  विपक्ष में बोलने वाले मिस्टर अली इमाम ने आपके विजेता भाई को गले लगा लिया था। इस पर उनके धडकते हुए दिल ने कहा ‘भाईजान ने बहुत खूबसुरत व काबिले तारीफ तक़रीर पेश की है, एक दिन मैं भी इनकी तरह बनूंगा। बडे भाई की तरह ओजस्वी तकरीरें दूंगा । लेकिन इसके लिए बहुत कुछ पढना-लिखना पढेगा, बडे आदमियों का मुक़ाबला करना पडेगा…सब करूंगा…सब करूंगा’। 
अब्बास अपने एक आलेख में लिखते हैं 
‘कभी इंजन ड्राईवर बनने का ख्वाब था, फिर जज बनना चाहता था, डाक्टर बनकर लोगों की खिदमत करने का दिल आया । डिप्टी कमीशनर होने का भी ख्वाब सजाया। इल्म ताल्लुक इस मंथन उपरांत पत्रकार, नेता व वक्ता बनने का सपना देखने लगा। इनके अलावा वो शख्सियत भी जिनसे मेरी उम्र के करोडों हिन्दुस्तानी प्रभावित हुए । जिनकी छाप हजारों युवाओं की जिंदगी व किरदार पर कायम रही । महात्मा गांधी…इनको पहली बार जब देखा तो उस वक्त मेरी उम्र पांच या छह बरस की थी ,लेकिन उस बचपन में भी उनकी महान शख्सियत ने मुझे प्रभावित किया। भगत सिंह जिनकी शहादत के दिन मैं और मेरे कालेज के बहुत से साथी इस तरह फूट-फूट कर रोए कि हमारा सगा भाई शहीद कर दिया गया है...।

इंटर कालेज के दिनों में एक रोज आप दोस्तों के साथ साइकल पर ताजमहल को चांदनी रात में देखने निकल पड़े । रास्ते में साइकल का टायर फट जाने की वजह से एक गांव में रुके। उस गांव के लोगों की आर्थिक बदहाली ने आपके दिल में पीडा व संवेदना का समुद्र जगा दिया। आप इसे ज़ाहिर  करने का जरिया तलाश करने लगे। इन हालातों ने आपको हांथ बांधे चुपचाप वक्त गुजारने नहीं दिया। तीस दशक में अलीगढ विश्वविद्यालय मुसलमानों की उभरती नस्ल का चिंतन स्थल एवं सांस्कृतिक केंद्र था। प्रगतिशील आंदोलन ने साहित्य को नया भविष्य दिया, अलीगढ आंदोलन का एक मुख्य स्रोत था।  अख्तर रायपुरी, ख्वाजा अहमद अब्बास, सआदत हसन मंटो, जानिसार अख्तर एवं मजाज तथा अली सरदार जाफरी सब अलीगढ के छात्र थे। कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक कुंवर अशरफ उस्तादों में से थे। उस जमाने में अलीगढ में कम्युनिज्म की लहर थी। छात्रों की कोशिश यह थी कि लहर की रफ्तार तेज कर दिया जाए। मुल्क को आज़ाद करने का हर जतन लोग दीवाने कर रहे थे। 
अलीगढ तराना के लेखक मजाज की बहन के अनुसार
 विश्वविद्यालय का हर जमाना प्रकाशवान जमाना था।  इसके क्षितिज पर जगमगाने वाले सितारों की रोशनी देश के हर कोने में पहुंची। शिक्षा साहित्य चिंतन व आंदोलन में अलीगढ के छात्रों का नाम था।  ऐसा मालूम होता था मानो यहां प्रेरणा की रोशनी फूट रही हो। अलीगढ के अहाते से आजादी के दीपक को खुराक मिल रही हो। कोई जोशीला सामाजिक कार्यकर्ता, कोई आजादी का दीवाना…कुछ युं फिजा रही जिसमें सब अपने-अपने शस्त्रों से विदेशी निजाम को जडों से उखाडने पर आमादा थे। एक नया सवेरा…एक नयी जिंदगी जन्म ले रही थी। उस वक्त अलीगढ में जोशीले युवाओं का दल उभर चुका था जिसके कार्यों को विश्वविद्यालय का इतिहास कभी भूला नहीं सकेगा।  पत्रकारिता के माध्यम से आंदोलन की पहल अख्तर रायपुरी ने की । आपने हांथ से लिखा साप्ताहिक अखबार निकाला। हांथ से लिखे इस अखबार की प्रतियों को हरेक हास्टल पर चिपकाया जाता था। इस हफ्तावार की खबरें व आलेख आज़ादी के जददोजहद के सरमाया था। सामग्री अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ तेवर की थी। अख्तर रायपुरी से सीख लेकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने भी हांथ से लिखा अखबार ‘अलीगढ मेल’  निकाला। अखबार अब्बास की पत्रकारिता का पहला तेजाब था।  वकालत की पढाई के दरम्यान आपने Aligarh Opinion नामक अखबार भी निकाला। 
शुक्रवार का आधा दिन व रविवार का आधा दिन इन उत्तरदायित्वों को संभालने में गुजर जाता था। इसके अलावे अब्बास विश्वविद्यालय से जुडी खबरों को खुफिया तरीके से Hindustan Times एवं Bombay Chronicle को भेजा करते थे। इन खबरों पर विश्वविद्यालय पर्दा डालने की कोशिश करता था।  खुफिया खबरों को प्रकाश में लाने के लिए प्रशासन की ओर से धमकियां भी मिलती थी। अखबार विश्वविद्यालय प्रशासन व शिक्षकों व अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ आम राय को प्रकाश में लाता था। अब्बास प्रशासन द्वारा बाग़ी करार दिए जाने लगे। अली सरदार जाफरी लिखते हैं…अलीगढ में तहरीक-ए-आजादी का तेजाब उठ रही थी। अब्बास ऐसे ही एक तेजाब थे। आप अपने जमाने के बेबाक वक्ता थे। अब्बास व मजाज तथा उनके साथी रात गए रेलवे प्लेटफार्म पर तफरीह करना पसंद था। प्राक्टर आफिस द्वारा लगाई गयी पाबंदियों को तोडने का मजा था ही साथ ही उम्मीद रहती कि हसीन लडकियों का दीदार होगा। जाडों की रातों में स्टेशन की गरम चाय में भी एक खास लुत्फ था। उन दिनों आप बाछु भाई के नाम विख्यात थे। अब्बास के हवाले से अलीगढ से ताल्लुक रखने वाले एक किस्से अनुसार अब्बास अपने जिगरी अंसार भाई को प्लेटफार्म गर्दी के लिए देर रात बुलाने आते थे। दोस्तों में तय था कि वो खिडकी पास आकर भौंकने की आवाज़ निकालेंगे और इस आवाज़ पर अंसार भाई खामोशी साथ बाहर निकलेंगे। एक मर्तबा रात प्लेटफार्म पर किसी रेलवे कर्मचारी से खबर मिली कि रेल से अलगे दिन जवाहर लाल नेहरू देहली से इलाहाबाद जाने वाले हैं। अब्बास और अंसार भाई दोनों ने ही तय किया कि खुर्जा पहुंचा जाए। अलीगढ में मेल दो मिनट के लिए रूकेगी। पुलिस एवं नगर के कांग्रेसियों का हुजूम होगा। पंडित जी का चेहरा भी मुश्किल से देखने को मिलेगी। यह सोंचकर दोनों दोस्त खुर्जा पहुंच गए। वो चलती गाडी में किसी तरह नेहरू जी के पहले दर्जा कंपार्टमेंट तक पहुंचने में सफल रहे। इनकी काली शेरवानियां अलीगढ की खास पहचान थी । आपने पंडित नेहरू से अलीगढ आने का आग्रह किया, जिसे नेहरू जी ने कुबूल किया।
एक मर्तबा डिबेट प्रतियोगिता सिलसिले में बंबई से भी छात्र अलीगढ आए। इन्होंने विश्वविद्यालय स्वीमिंग पूल पास रानी विक्टोरिया की तस्वीर टंगी देखने बाद कुछ युं कहा ‘हमने अपने यहां फाउंटेन पर बनी रानी की प्रतिमा की तोड दी। यहां के छात्र अब भी अंग्रेजपरस्त हैं।  अगली ही रात अब्बास व दोस्तो ने स्वीमिंग पर टंगी रानी की तस्वीर को फ्रेम से निकाल फेंका। प्रशासन ने समझदारी का तकाजा दिखाते हुए मामले को तूल नहीं दिया।  महान शख्सियतों में अब्बास महात्मा गांधी की विचारधारा से प्रभावित थे। अलीगढ में ग़ांधी जी से अपनी दूसरी मुलाकात के बारे में अब्बास ने लिखा…महात्मा गांधी विश्वविद्यालय छात्र युनियन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में तकरीर देने आए थे।  हाल हाऊसफुल था…लेकिन मैं डायस के फर्श पर गांधी जी के कदमों पास बैठने में कामयाब रहा। युनियन के प्रेसीडेंट के भाषण दौरान मेरा ध्यान गांधी जी तरफ था। बापू बेफिक्री से इधर-उधर देख रहे थे। कुछ युं जैसे यह बातें किसी दूसरे वयक्ति के बारे में कही जा रही हों। एक बार इक नजर मेरी ओर डाली तो उन्होंने शायद देखा कि यह युवा टकटकी बांधे इन्हें देख रहा। मेरा अंदाज देखकर वह मुस्कुराए,पहले तो मैं घबराया जैसे चोर पकडा गया हो। लेकिन शायद मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट उभर आई । गांधी जी मासूम मुस्कुराहट तो हरेक आदमी के लिए थी। यह अलग बात है कि हरेक यही समझता कि यह मुस्कुराहट…यह मां की ममता समान मुहब्बत सिर्फ उसके लिए है। फिर वो समय भी आया जब जनवरी तीस की शाम को बंबई के मरीन ड्राईव पर टहलते हुए किसी ने बताया कि किसी सिरफिरे ने महात्मा गांधी को गोलियां चलाकर मार डाला है। सुनकर ऐसा लगा कि चलती दुनिया रुक गयी…जिंदगी थम गयी है। अब्बास खुद को वतन एवं कौम की संतान तस्व्वुर करते थे। गांधीजी व पंडित नेहरू के परिवार को अपना परिवार समझते थे। इंसानियत व समाज के नजरिए से पूरी दुनिया को रिश्तेदार मानते थे।

















(रचनाकार-परिचय
 जन्म: 2 अक्टूबर 1983 को पटना( बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म रिव्युज
संप्रति : सिनेमा लेखन
संपर्क : passion4pearl@gmail.com )

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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

नेताओं को देखा तो मक्कारी याद आई।


दो चुनावी व्यंग्य 





 








सैयद शहरोज़ क़मर  की क़लम से

शरमा जाए गिरगिट भी

हम सियासत के कभी कायल न थे

तुमको देखा तो मक्कारी याद आई।


चचा दुखन यूं तो शायरी करते नहीं, पर जब मेरी खटारा बाइक की मरम्मत करने के दौरान दुआ-सलाम हुई, तो उनके लब पर कमर सादीपुरी का यह शेर बेसाख्ता आ गया। हम भी पूछ बैठे, काहे चचा खफा बैठे हैं। इतना कहना था कि मानो उनके अंदर बरसों से जमा गुबार सर्दी में हुदहुद की तरह फट पड़ा। का पूछते हैं, पत्रकार बाबू। आप लोगों से कुछो छुपल है का। देखिये न रहे हैं, ई नेतवा सब हम सबके मूरखे समझ ले है। सुबह में कुछ और बोलता है, तो दोपहर ढलते-ढलते इसकी बोलती कुछ और। शाम व रात तक तो जिसको जिंदगी भर गरियाता रहा, उसको माला पहनाते हुए फोटो खिंचवा लेता है। चचा से जरा चुहल सूझी, देखिये दुखन चा अब आपके नेता जी सेकुलर हो गए। लेकिन चचा चिढ़ गए। ई अऊ सेकुलर। अरे बबुआ आपसी प्रेम मोहब्ब्त के लिए दिल की जरूरत पड़ती है। पार्टी-वार्टी की अदला-बदली से फरक नहीं पड़ता। ई सबबे नेता बस छटल मक्कार है। अपन फायदा की खातिर ई पार्टी से ऊ पार्टी डगरा के बैगन की तरह भागल फिर रहा है। बात गांधी की करेगा, काम गोडसे का। बिरसा भगवान की मूरत पर फूल तो चढ़ाएगा, पर अबुआ दिशुम-अबुआ राज के लिए डोंबारी व सारंडा को गिरवी रखने में परहेज नहीं करेगा.. उनकी बात अधूरी ही थी कि अचानक दुकान की दीवार पर गिरगिट महाराज प्रकट हो गए। हम दोनों की नजर गिरगिट से होते हुए परस्पर टकरा गई, तो दुखन चा मुस्कुरा दिए। आंखों बोल पड़ीं, देखिये ;gनेता जी पधार दिये। मुझे अचानक रूसी लेखक चेखव की कहानी गिरगिट का स्मरण हो आया।

(भास्कर के 5 नवम्बर 2014 के  अंक में प्रकाशित)


कौए के बीच कोयल की खोज
कांव ! कांव !! कांव !!! कभी यह आवाज़ कानों में पड़ते ही हम बच्चे उछल कर कहते थे, उड़ कौआ उड़ संदेसा आएगा!  लेकिन अब घर  की मुंडेर पर कौए नहीं आते. कहते हैं कि पेड़ों के साथ इनका भी सफाया हो गया. वहीं कुछ विद्वानों की राय है कि कौए का  मनुष्य की एक विशेष प्रजाति में पुनर्जन्म  हो गया है.  इनका रहना-सहना भी बदल चुका है. यह एक ख़ास मौसम में बड़े-बड़े शहरों के अपने वातानुकूलित प्रासादों से विचरण को निकलते हैं. कंदराओं से उनके बाहर निकलने का यह सही समय है. कांव ! कांव !! कांव !!! यह गूंज अब हर सड़क-गलियारे में शोर बनकर उभर रही है. लेकिन बचपन में सुने और अब के इनके कांव-कांव में काफी विभिन्नताएं हैं.  अब हालत यह है कि कौए को महज़ उड़ने के लिए नहीं बल्कि रफू-चक्कर होने की दुआ की जा रही है. लेकिन वे हैं कि रोज़ नई टेर रेघा रहे हैं. हालांकि कुछ ने शहरों में जाकर गले की सर्जरी करा ली है. रंग-रूप भी बदला है.  लेकिन गौर कीजिये तो चेहरे पर उनकी करतूत काली दिख जाएगी।  इनमें एक और विशेषता देखी जा सकती है, कि राजधानी की दौड़ में यह  काकरोच का कवच ओढ़ लेते हैं. दूसरे को  आगे जाता देख तुरंत उनके सदस्य उसकी टांग खींच कर नीचे  गिरा देते हैं.  लेकिन ख़ुदा-न-खास्ता इन किसी भी खद्दर धारी की मौत हो जाती है, तो सारे अपने समूह और खेमे को भूल कर एक जुट हो जाते हैं.  वहीं राज्य से लेकर देश की राजधानी और शहर लेकर गाँव-पंचायत तक के कौओं  को इकट्ठे कर इतना कांव-कांव मचाते हैं कि एहसास पुख्ता होता है कि इन्होने शहर को तो पहले ही जंगल बना रखा है. नित्य ही कंक्रीट के गगन चुंबी पेड़ खड़े किये जा रहे हैं. इधर,  कांव ! कांव !! कांव !!! के बीच हंस को तिनके  का भी टोटा है.  वहीं कहते हैं कि कौए को मूर्ख सिर्फ कोयल ही बना सकती है. उसकी तलाश जारी है. 

(भास्कर के 14 नवम्बर 2014 के  अंक में प्रकाशित)

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शनिवार, 8 नवंबर 2014

चाँद को फिर-फिर बुला लाएँ


आओ ! इस शादमाँ पल में

चित्र: गूगल साभार












क़मर सादीपुरी की क़लम से

मैं तेरे ख़्याल  के क़ाबिल न था
हमने आँखों को न चुराया था
तू दिल से जुदा हरगिज़ न हुआ
पर मै तेरे प्यार के हामिल न था!

उन तारों से बात की थी मैंने
जो तेरे आस्मां से आते थे
चाँदनी को छूता था अक्सर
जिसका अक्स तेरा चेहरा था

उन हवाओं से पता पूछा था
तेरी गलियों में जिसका आना था
उनको छूने की कोशिश की हमने
तेज तूफ़ान ने डराया था

मैंने न डरने की जब क़सम खाई
उन हवाओं ने आना छोड़ दिया
मेरी अब सांस उखड़ी जाती है
दिन कहो,  रात हुई जाती है!

कहीं यह जीवन का अंतिम पहर तो नहीं!

कसमें वफ़ा भी वे जब भूल गए
हमने उनकी जफ़ा का पास रखा
दिल को न कभी उदास रखा
सूरज से जब दुआ मांगी
चाँद-तारे को साथ-साथ रखा

लेकिन बादल कहाँ से आ धमके
तूफाँ ने भी की, यूँ ही यारी
हमने ख़त को दबा कर सीने से
हरेक तहरीर को छुपा रखा

ऐसी तहरीर फिर कहाँ होगी
जिसमें तारे भी झिलमिलाते थे
चाँद सूरज से बात करता था
फूल, पत्थर भी मुस्कुराते थे

उन पत्थर को हमने घर रख कर
एक आँगन में आरती की थी
और चराग़ों से कर लिया रौशन
उसके अलफ़ाज़ को टटोला था

कहीं तो होगा वो पैमाने वफ़ा
कि जिसकी ख़ाक हमने छानी थी
कि रह-रह आंसुओं की बारिश में
तेरे होठों के लाल -लाल डोरे
कैसे तिल का कमाल करते थे

हमने तिल को दिल था दे डाला
कैसे-कैसे जमाल करते थे

हमने उस बोसा-ए-दिल से
कैसे था रूह को भिगो डाला
तुमने सजाई मांग में बूंदे
फूल का रंग भी चटख आया

ख्वाइश की राह पर चले कब थे
हमने रिश्ते को, पोसा, न पाला
स्याह रात को जगे अक्सर
कि हिचकी को पास आना था।

माँ-सी आरज़ू को मुठ्ठी में
लिये नींद से ना जागा था
ऐसे ख़्वाबों के कैसे सज्दे में
कौन सहीफ़े लिए आया था।
कि अल्फाज़ ने तपिश बन कर
पीर पयंबरी को पाया था।

आओ ! इस शादमाँ पल में
चाँद को फिर-फिर बुला लाएँ
कैसे दहक़ाँ के खेत पसीने में
रह-रह फसल को उगा आएँ।

यही ज़िन्दगी का हासिल है
यही मोहब्बतों का हामिल है!

(बोसा-ए-दिल=दिल का चुम्बन, हामिल= योग्य , सहीफ़े= ईश्वरीय संदेश, पयंबरी=पैगम्बरी, दहक़ाँ=किसान, शादमाँ=हर्षित, हामिल= धारक )

{6-7may2013 को फ़ेसबुक पर ही लिखी और पोस्ट की गयी थी.} 


छत्तीसगढ़ रायपुर के  इतवारी अख़बार के 16 नवंबर 2014 के अंक में प्रकाशित

 
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बुधवार, 5 नवंबर 2014

खत को लेकर चोंच में यादें खड़ीं रहीं, किताबों के पन्ने खोल दिए डाकिया आ गया

आओ फिर से चिट्ठियाँ लिखें ....













विजेंद्र शर्मा की क़लम से

घर में कुछ मेहमान आये हुए थे उनके साथ चाय की चुस्कियों का लुत्फ़ लिया जा रहा था ! दसवीं जमात में पढ़ने वाली मेरी बेटी आयी और कहने लगी कि पापा कोई बेटियों पे शे'र लिखवा दो कल स्कूल में एक छोटा सा कार्यक्रम है मैं  सुनाऊंगी  ! मुझे पदम् श्री बशीर बद्र साहब का एक मतला याद आया और उसे सुनाया : 
वो शाख़ है न फूल अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियां न हों

इसी ग़ज़ल का मुझे एक और ख़ूबसूरत शे'र याद आ गया मैंने सोचा मेहमानों को ये भी सुनाया जाए :

मैं पूछता हूँ मेरी गली में वो आये क्यों
जिस डाकिये के पास तेरी चिट्ठियाँ न हो

शे'र सुनते ही मेहमान तो वाह -वाह करने लगे मगर बेटी ने एक सवाल दाग़ दिया " पापा ये डाकिया क्या होता है ? उसका ये सवाल मेरे ज़हन में न जाने कितने और सवाल पैदा कर गया ! मैंने उसे बताया कि बेटे पोस्ट मैन को डाकिया कह्ते है ,जो हमारी चिट्ठियाँ हम तक पहुंचाता है ,बेटी को बात आधी -अधूरी समझ आयी, उसका प्रश्न स्वाभाविक था जब से उसने होश सम्भाला घर में कौनसी चिट्ठियाँ आयी थी और मैंने भी तो एक मुद्दत से किसी को ख़त नहीं लिखा था !
बेटी का ये कहना कि "डाकिया क्या होता है" मेरे ज़हन में ऐसा शोर करने लगा जो शोर अख़बार के छपते वक़्त प्रिंटींग मशीन करती है ! मैं सोचने लगा कि आख़िर कौन- कौन से ऐसे तत्व हमारे जीवन में आ गये जिससे कि  हम हमारी ज़िंदगी के एक अहम किरदार "डाकिये"  को भी भूल गये ! मेरे ज़हन में फ़िक्र मश्क़ करने में लगी ही थी कि अचानक एक दोहे की शक्ल में मुझे इस सवाल का जवाब भी मिल गया :

मोबाइल ई - मेल ने , कैसा किया कमाल !
क्या होता है डाकिया ? बच्चे करें सवाल !!

हालांकि तकनीक में आयी क्रांति ने हमारे जीवन को बड़ा सुलभ बना दिया है  , दूर रह रहे अपनों से हम फट से बातें करने लगे हैं , बड़े-बड़े काग़ज़ात इक पल  में ई-मेल के ज़रिये एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे है जिन्हें डाक के ज़रिये  भेजने में कई दिन लग जाते थे ! दोस्ती , जान- पहचान , संबंधों और रिश्तों का पूरा सागर जैसा फैलाव सिकुड़ कर एक मोबाइल में क़ैद हो गया  है ! मुनव्वर राना ने इसे यूँ बयान किया है  :

अब फ़ासलों की कोई हक़ीक़त नहीं रही
दुनिया सिमट के छोटे से इक सिम में आ गई

मुझे लगता है कि नयेपन के चस्के और वक़्त से भी आगे निकलने के चक्कर में हम लोग उन चीज़ों को भी भुलाते जा रहें हैं जो हमारी ज़िंदगी का कभी अहम हिस्सा थी ! .ख़त और डाकिया दो ऐसी चीज़ें थी जो हमे इंतज़ार के लुत्फ़ से जुदा नहीं होने देती थीं ! हर उम्र की आँखों को चिट्ठी का इंतज़ार रहता था ! एक माँ को सरहद पे तैनात बेटे की चिट्ठी का , बहन को अपने भाई की खैर-ख़बर की चिट्ठी का , एक बीवी को रोटी की जुगत में परदेस गये शौहर की चिट्ठी का, एक बे-रोज़गार को किसी सरकारी महकमें से नौकरी के लिए आये बुलावे  और ज़माने की नज़रों से छुप कर मुहब्बत करने वालों को अपने मुहब्बत- नामे का इंतज़ार रहता था ! इंतज़ार की इस सियाही से लिखी तहरीर ( लिखावट ) को जो शख्स सबसे ज़ियादा पढ़ना जानता था, बड़ा अफ़सोस है कि अब वो डाकिया प्राय-प्राय लुप्त सा हो गया है !
ख़त, हमारी ज़िंदगी और हमारे अदब ( साहित्य ) का   हिस्सा थे  जिसे भुला कर हमने  अपनी तहज़ीब के दरख्त को ख़ुद अपने ही  हाथों से काट दिया !
मीर ओ ग़ालिब के ज़माने से ही ख़त और ख़त को पहुंचाने वाले डाकिये (क़ासिद, नामावर ) के बिना शाइरी अधूरी थी ! मीर ने तो ख़त और क़ासिद के हवाले से एक पूरी ग़ज़ल ही कह दी थी ! उस ग़ज़ल का मतला और एक शे'र मुलाहिज़ा हों :

न पढ़ा ख़त को या पढ़ा क़ासिद
आख़िरे -कार क्या कहा क़ासिद
है तिलस्मात उसका कूचा तो
जो गया सो वहीं रहा क़ासिद

उस ज़माने में ये आलम था कि ख़तों का सिलसिला  थमता ही नहीं था तभी तो ग़ालिब ने कहा कि :

क़ासिद के आते -आते ख़त इक और लिख रखूं
मैं  जानता  हूँ  जो   वह   लिखेंगे  जवाब  में

ग़ालिब शाइरी के साथ - साथ ख़त लिखने में भी बड़े माहिर थे उनके अहबाब ( मित्र ) उनसे अपने मुहब्बत-नामे (प्रेम-पत्र ) लिखवाने आते थे ! अपनी एक मक़बूल ग़ज़ल में ग़ालिब ने इसी लिए ये शे'र कहा :

मगर लिखवाये कोई उसको ख़त ,तो हम से लिखवाये
हुई सुबह , और घर से कान पर रखकर क़लम निकले
आज की नस्ल मोबाइल के एसएम्एस (SMS)की दीवानी है मगर ये एसएमएस और ई-मेल कोई सहेज के नहीं रखेगा,  ख़त सहेज के रखे जाते थे ग़ालिब ने जो ख़त लिखे लोग  आज उन पर शोध कर के पीएचडी कर रही है ! ख़त जिन्हें  अब हमने लिखने बन्द कर दिये हैं  वाकई  धरोहर होते है तभी तो ग़ालिब ने पहले ही लिख दिया था :
चंद   तस्वीर-ए-बुताँ , चंद हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मिरे घर से यह सामान निकला

  नौजवान शाइर  डॉ. विकास शर्मा  ख़तों को अपनी  पूंजी  समझते है और अगर  नई उम्र का  कोई शाइर इस ख़याल को शाइरी में ढालता है तो थोड़ी उम्मीद जगती है कि ख़ुतूत की क़ीमत हमारी नई - नस्ल को मालूम तो है ! डॉ .विकास शर्मा "राज " का ये मतला और शे'र सुनने के बाद उनके क़लाम को सलाम करने का मन करता है :

क़बीले से जुदा कर दे
मुहब्बत बावला कर दे
ख़तों को भी उठा ले जा
मुझे दिवालिया कर दे

ख़त होते ही ऐसे थे जिन्हें मुहब्बत करने वाले महबूब के दिये गुलाब  की तरह किताबों में संभाल के रखते थे आज की तरह नहीं कि  एस. एम् .एस पढ़ा ज़ियादा से ज़ियादा एक-दो  रोज़ रखा और डिलीट कर दिया ! हसरत मोहानी ने यूँ ही थोड़ी कहा :

 लिक्खा था अपने हाथ से तुमने जो एक बार
अब तक हमारे पास है वो यादगार ख़त

ख़तों के उस ज़माने में ऐसे - ऐसे ज़ावियों (कोण )  से शाइरों ने अपनी बात कही कि बस आह-वाह अपने - आप दिल से निकलने लगे, बशीर बद्र के ख़त लिखने का अंदाज़ सबसे मुख्तलिफ़ था :

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं

कई बार मुहब्बत में ऐसे भी मुकाम आते थे कि ख़त जला दिये जाते थे, मगर वे कोई आज के एसएमएस की तरह डिलीट नहीं होते थे उनकी तहरीर ज़िन्दा रहती थी ! बकौल वसीम बरेलवी  :

प्यार की फांस किसी तरह निकलती भी नहीं
ख़त जला डालिये तहरीर तो जलती भी नहीं 
 ख़त लिखने में कोई आंसुओं की सियाही काम में लेता था  तो कोई अपना लहू इसलिए न तो कोई इन्हें फाड़ता था ना ही कोई जलाता था ..हाँ मगर राजेंदर नाथ रहबर ने किसी के मुहब्बत भरे ख़त गंगा में ज़रूर बहाए :
तेरे खुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मैं गंगा मैं बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

मोबाइल के किसी एक मैसेज को आप दो -तीन बार से अधिक नहीं पढ़ते मगर जब - ख़तों का दौर था तो ख़त को कई - कई बार पढ़ने के बाद भी मन नहीं भरता था !
इसका कारण ये था कि ख़त लिखने वाला अपने जज़बात , अपने आंसू यहाँ तक कि अपने लहू तक को सियाही बना देता था ! जब आंसुओं की सियाही से कोई ख़त लिक्खा हो तो शाइर यहाँ तक तसव्वुर करता था :

 सियाही आँख से ले कर  ये नामा तुमको लिखता हूँ
कि तुम नामे को देखो और तुम्हे देखें मेरी ऑंखें
 
(नामा =ख़त )

 ये पाकीज़गी , ये शिद्दत क्या आज की  नस्ल समझ पाएगी , शायद नहीं क्यूंकि हमने उन्हें चिट्ठियों से दूर कर दिया है ! आज के बच्चे पुराने गानों से भी दूर होते जा रहें है अगर पुराने फ़िल्मी गीतों से भी उन्हें लगाव हो जाए तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि ख़त क्या होते है और डाकिये की क्या अहमियत होती है ! हमारे फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों ने ख़त को लेकर जो गीत लिखे वो मशहूर हुए और लोगों की ज़ुबान पे चढ़ गये !  इन्दीवर का लिखा ये गीत : 

फूल तुम्हे भेजा है ख़त में ,फूल नहीं मेरा दिल है
प्रियतम मेरे तुम भी लिखना क्या ये तुम्हारे काबिल है
प्यार छिपा है ख़त में इतना, जितने सागर में मोती
चूम ही लेता हाथ तुम्हारा पास जो मेरे तुम होती

नीरज जी का लिखा ये गीत :

फूलों के रंग से दिल की क़लम से तुझको लिखी रोज़ पाती
कैसे बताऊं किस किस तरह से पल पल मुझे तू सताती

"नाम" फिल्म के लिए आनंद बक्शी ने जब ये गीत लिखा तो जिसने भी सुना उसे अपने घर की दास्तान मालूम हुई , पंकज उदास के गाए इस गीत ने लोगों की सोई हुई संवेदनाओं को जगाया ,हमे अपने बच्चों को  ये गीत ज़रूर सुनाना चाहिए :

चिट्ठी आयी है आयी है चिट्ठी आयी है ....

फिल्म "बोर्डर" के लिए जब जावेद अख्तर की लिखी चिट्ठी " संदेशे आते है हमे तड़पाते है , के घर कब आओगे , लिखो कब आओगे .....को सोनू निगम ने गाया तो वो भी लोगों के दिलों में घर कर गयी ! ये सब चिट्ठी / ख़त के ही तो कमाल थे !
आनंद बक्शी ने भी सनम को ख़त लिखा त ऐसे लिखा :

हमने सनम को ख़त लिखा ख़त में लिखा .....
ऐ दिलरूबा दिल की गली शहरे वफ़ा ..
इसी गीत में ये मिसरा तो कमाल का लिखा
पहुंचे ये ख़त जाने कहाँ ,जाने बने क्या दास्ताँ
उस पर रकीबों का ये डर लग जाए उनके हाथ गर

जब ख़तों के दौर थे तब एक बात का अंदेशा हमेशा बना रहता था कि ख़त किसी के हाथ ना लग जाये ,ख़त को न जाने कहाँ - कहाँ छिपा के रखा जाता था कभी किताबों में , अलमारी में , संदूक में तो कभी दराजों में !  कैसर उल जाफरी ने इसे यूँ शाइरी बनाया :
 

ख़त में दिल की बातें लिखना ,अच्छी बात नहीं
घर में इतने लोग है , जाने किस के हाथ लगे

आज ना तो घरों में इतने लोग होते है ,ना अब घर घर रहें है ना अब वो पहले सी पर्दादारी रही है ! नई पीढ़ी की रफ़्तार देख के अब तो डर लगता है ! आज किसी को देखा , आज ही उस से सीधे - सीधे बात की और आज ही चले गये डेट पे , कहाँ गहराई आयेगी ऐसे प्यार में ! उस ज़माने में इज़हार करने और पहला ख़त लिखने की हिम्मत जुटाने में ही साल गुज़र जाते थे ! हस्ती मल हस्ती जी ग़लत थोड़े कह्ते हैं : 

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नए   परिंदों   को  उड़ने    में वक़्त   तो   लगता है
 
जब पहला ख़त लिख दिया जाता था और महबूब तक पहुँच जाता था तो फिर मुहब्बत परवान चढ़े बिना दम नहीं लेती थी ! ऐसा भी नहीं था कि सभी ख़तों के नसीब में महबूब तक पहुंचना लिखा हो  कुछ ख़त बस लिखे ही रह जाते थे ! कुंवर बैचैन साहब ने जो ख़त लिखे वो आज भी उनकी दराजों में है :
अब भी किसी दराज  में मिल जायेंगे तुम्हे
वो ख़त जो तुमको दे न सके लिख-लिखा   लिए

 बशीर बद्र साहब पे क्या गुज़री वो तो उन्होंने बताया नहीं हाँ ये ज़रूर कहा उन्होंने :

हम पे जो गुज़री बताया न बताएँगे कभी
कितने ख़त अब भी तेरे नाम लिखे रक्खे  है

कुछ ऐसे बदनसीब ख़त भी थे जिन्हें लिखने वाला उनसे भी बड़ा बदनसीब था :

मैंने जितने मुहब्बत भरे ख़त लिखे
सब पे अपने ही घर का पता लिख दिया

अगर ख़तों का सिलसिला  किसी वजह से थम जाता था  तो सिर्फ़ ख़त में ये लिखा हुआ आता था :

हमसे क्या ख़ता हो गयी कि ख़तों का आना बन्द है
आप ख़फ़ा  है हमसे या फिर डाक खाना बन्द है

ख़तो-ख़तावत से कोसों दूर हो चुकी हमारी नई पीढ़ी को ख़त लिखने के लिए हमे प्रेरित करना चाहिए ! ख़त लिखना भी शाइरी और कविता लिखने की तरह एक आर्ट है ! जो ख़ूबसूरत ख़त दुनिया के सामने आये है उन्हें पढ़ा जाए तो इन नए- चराग़ों  को पता चले कि  बिन बाती के जलने का हुनर क्या है ! अमृता प्रीतम  और इमरोज़ के ख़त पढ़कर महसूस किया जा सकता है कि मुहब्बत ऐसे होती थी वैसी  नहीं जो आज की नई उम्र की खुदमुख्तारियो ने समझ लिया है ! मिसाल के तौर पे अमृता और इमरोज़ के ख़तों के कुछ अंश आपको पढवाता हूँ :

"यह मेरा उम्र का ख़त व्यर्थ हो गया ! हमारे दिल ने जो महबूब का पता लिखा था ,वह हमारी क़िस्मत से पढ़ा न गया ..तुम्हारे नए सपनों का महल बनाने के लिए अगर मुझे अपनी ज़िंदगी खंडहर भी बनानी पड़े तो मुझे एतराज़ नहीं होगा ! जो चार दिन ज़िंदगी के दिये है ,उनमे से दो की जगह तीन आरज़ू में गुज़र गये है और बाकी बचा एक दिन सिर्फ़ इंतज़ार में ही न गुज़र जाए !अनहोनी को होनी बना लो मिर्ज़ा ..... 
तुम्हारी अमृता

इमरोज़ ये लिखते हैं :

मुझ पे और भरोसा करो , मेरे अपनत्व पे पूरा एतबार करो !  जीने की हद तक तुम्हारा ! ये अपने अतीत ,वर्तमान   और  भविष्य    का   पल्ला   तुम्हारे  आगे  फैलाता  हूँ  , इसमे  अपने अतीत , वर्तमान  और भविष्य  को  डाल  दो   जीतो  !.
तुम्हारा  इमरोज़

 ये था प्यार और खतों के ज़रिये इस तरह अपने दिल की बात पहुँचती थी ! हम फोन पे किसी को अपने दिल के जज़बात नहीं कह सकते ना ही उन्हें मोबाइल के मैसज में तब्दील किया जा सकता है ! दिल के जज़्बे तो अपने हाथ से ही काग़ज़ के सीने पे उकेरे जा सकते हैं !
ख़तों के दौर में लोगों का रुझान अदब ( साहित्य ) की तरफ़ ख़ुद ब ख़ुद हो जाता था ! ख़त तक़रीबन सभी लिखते थे और ख़त लिखना किसी अनुष्ठान से कम न था और जब मोहतरम डाकिया जी  गली में नज़र भर आ जाते थे तो  उत्सव का  सा नज़ारा हो जाता था ! ख़त में संबोधन क्या लिखना है ...इसकी शुरुआत किस लफ़्ज़  से की जाए वगैरा -  वगैरा उस वक़्त एक इम्तेहान की तरह होता था ! अपनी प्रेयसी को ख़त लिखते समय कुछ तो  ..मेरी ग़ज़ल , मेरी जाने जाँ , मेरी तरन्नुम , मेरी रूह , मेरे ख़्वाबों की मल्लिका आदी  संबोधन का इस्तेमाल करते थे ! आशिक के दिल  का जज़्बा क़लम में मिसरी  की डली की तरह घूल जाता था  जबकी आज ख़त लिखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता मैसज में लिखा जाता है hi स्वीटू ,hi जानू  जैसे संबोधन जो किसी भी कोण से   मुहब्बत की राह के मुसाफ़िर नज़र नहीं आते !

ख़त वाकई अमूल्य पूंजी थे , नेहरू जी के  पत्र  "भारत एक खोज " जैसा एतिहासिक दस्तावेज़ हो गया ! मेरे फ़िरोज़ पुर में एक मित्र है गौरव  भास्कर उनके वालिद स्व. श्री मोहन लाल भास्कर कवि थे उनके मरासिम  हरीवंश राय बच्चन  जी से बहुत अच्छे थे ! भास्कर साहब बदकिस्मती से पाकिस्तान में जासूसी के इल्ज़ाम में पकडे गये ! सात साल तक उन्होंने पाकिस्तान की जेलों में यातनाएं सही ! बच्चन जी तब विशेष मंत्रालय में थे उन्होंने भास्कर साहब की रिहाई में अहम रोल अदा किया ! उस दौरान उनमें ख़तों का बड़ा आदान - प्रदान हुआ ! गौरव भाई की माता जी ने उन सब ख़तों को सहेज के रखा ! किसी माध्यम से जब अमिताभ बच्चन साहब को पता चला कि बाबू जी के हाथ से लिखे ख़त फीरोज़पुर में किन्ही के पास है तो ख़बर की पूरी तस्दीक के बाद अमिताभ जी ने उन्हें सपरिवार मुंबई बुलवाया उस परिवार का सम्मान किया  और उन ख़तों की एक - एक प्रीति  ली  ,ये है ख़त की ताक़त !
अपने महकमे की बात करता हूँ , सरहद पे तैनात जवान के लिए ख़तों की बहुत  अहमियत होती थी   ! घर से बीवी - बच्चों के ख़तों  का सरहद के पहरेदारों को इंतज़ार रहता था ! बीवी लिखती थी कि आपके जाने के बाद   मन  नहीं लग रहा , जी बहुत घबराता है तो जवान भी ख़त के ज़रिये जवाब दे देते थे !
भाई जीतेन्द्र परवाज़ ने इसे  महसूस किया और लिखा :

तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है
तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर 

मगर जब से ख़तों की जगह मोबाइलों ने ले ली हमारे यहाँ समस्या कुछ गंभीर  हो गयी है !  पहले ख़त के आने में दस-पंद्रह  दिन लग जाते थे ! पीछे से जवान के घर में अगर कोई बात हो जाती या  सास - बहू की मामूली कहा - सुनी हो जाती तो जब तक बीवी ये सब ख़त में लिखती उस से पहले मुआमला शांत हो जाता था मगर अब  मोबाइल के दौर में जैसे ही घर में कोई बात होती है घर से फ़ौरन फोन आ जाता है जवान अपनी ड्यूटी पे एक दम परेशान हो जाता है और कई बार ऐसा भी हुआ  कि जवानों ने ख़ुदकुशी भी कर ली ! इस लिहाज़ से  ख़तों का ज़माना सरहद के प्रहरी के लिए ज़ियादा   बेहतर  था !
 एक ज़माना था जब ख़तों को पहुंचाने का काम कबूतर किया करते थे ! क़ासिद का किरदार कबूतरों ने बड़ी ख़ूबी से   निभाया वे इतने  मंझे हुए होते थे कि सीधा ख़त उसी को देते  जिसके लिए लिखा जाता था  ! अस्सी के दशक के आख़िर में आयी फिल्म " मैंने प्यार किया में " इस की मिसाल भी दी गयी , कबूतर जा जा जा कबूतर जा ...वाला गीत भी बड़ा प्रसिद्ध  हुआ ! जाने - माने शाइर राहत इन्दौरी ने भी इसी मफ़हूम से  शे'र निकाला  :--
 

अगर ख़याल भी आये कि तुझे ख़त लिखूं
तो घौसलों से कबूतर निकलने लगते हैं

आठों पहर मोबाइल से चिपके रहने वाली ये नस्ल कहाँ समझेगी कि ख़त क्या है, कबूतर क्या है और डाकिया क्या ! राजेश खन्ना अभिनीत एक फिल्म आयी "पलकों की छाँव में " उसके लिए गुलज़ार ने एक गीत लिखा  "डाकिया डाक लाया ....   राजेश खन्ना का खाकी वर्दी में साइकल पे फिल्माया  ये गीत हर आँख में डाकिये की  सच्ची  तस्वीर बनाता है मगर हमारे आज के बच्चे ऐसे गीत भी तो नहीं सुनते है जिससे  उन्हें पता चले कि डाकिया क्या होता है !
डाकिये की शान में निदा फाजली ने तो यहाँ तक लिखा :

सीधा - साधा डाकिया , जादू करे महान !
इक ही थैले में भरे , आंसू ओ मुस्कान !!

 चिट्ठी या डाक अपने गंतव्य तक जल्दी से जल्दी पहुंचे लोगों ने डाक महकमे की जगह कुरियर कंपनियों पे भरोसा करना शुरू किया मगर जब डाक ले के कुरियर कंपनी का कोई नुमाइंदा आता तो वो डाक तो दे के चला जाता पर वो  डाकिये जैसा मुहब्बत का रिश्ता नहीं बना पाया ! वक़्त के साथ - साथ ख़त लिखने का चलन कम होता गया  और ख़त लिखने की लोगों को ज़रूरत भी नहीं रही ! चिट्ठी के काम मोबाइल से होने लगे और डाकिया हमारे स्मृति पटल से गायब होने लगा मुझे आज भी याद है  शाम के वक़्त रोजाना डाकिया हमारे मोहल्ले में आता था ! मोहल्ले की औरतें एक दूसरे से  पूछती रहती थी कि डाकिया आया क्या , बगल वाली अम्मा को अपने बेटे के मनी -ऑर्डर का इंतज़ार रहता था ! बहुत से दरवाज़े बार - बार सिर्फ़ डाकिये की प्रतीक्षा में पलकें बिछाए रहते थे ! अब तो ये नज़ारा देखे बरसों हो गये तभी मैंने लिखा :

कब आवेगा डाकिया , पूछे कौन सवाल !
क़ासिद को देखे हुए , गुज़र गये है साल !!

बीकानेर के कलंदर सिफ़त शाइर शमीम बीकानेर से एक दिन इसी मौज़ू पे गुफ्तगू हो रही थी उन्होंने कहा कि विजेंदर भाई मैं ये प्रण करता  हूँ कि आज से ख़त लिखने का सिलसिला दोबारा शुरू करूंगा ! मेरी आप सब से भी  यही  गुज़ारिश है कि हम एक बार फिर से ख़त लिखने का सिलसिला शुरू करें  अगर कोई बहुत ज़ियादा आपात स्थिती ना हो तो हम सिर्फ़ ख़त लिखें और हो सकता है कि हमे देख कर  बच्चों को भी लगेगा कि वाकई ये मुआमलात इस मैसजबाज़ी  से बेहतर है ! ऐसा करने से हम फिर से अदब से जुड़ जायेंगे , इंतज़ार के लुत्फ़ से  फिर से मुखातिब होंगे  ,हमारी सूखी हुई क़लम में रोशनाई आ जायेगी और राह  भटकी हुई हमारी नई पीढ़ी फिर से तहज़ीब के फ्रेम में अपनी तस्वीर तलाश करने लगेगी !
 उम्मीद करता हूँ  कि  आप सब  भी  शमीम बीकानेरी की तरह ख़त लिखने  का सिलसिला फिर से शुरू करेंगे  और  ये अलख जगायेंगे  कि " आओ फिर से चिट्ठियाँ लिखें ...

 उदय प्रताप सिंह जी की इन्ही पंक्तियों के साथ विदा लेता हूँ   :

सब  फैसले होते  नहीं सिक्का उछाल के
 ये दिल का मुआमला है ज़रा देख भाल के

ये  कह के नई रौशनी रोयेगी एक दिन
अच्छे थे वही लोग पुराने ख़याल के 

मोबाइलों के दौर की नस्लों को क्या पता
रखते थे ख़त में  कैसे कलेजा निकाल के
 



(लेखक परिचय:
जन्म: 15 अगस्त 1972, हनुमान गढ़ (राजस्थान)
शिक्षा: विद्युत् इंजीनियरिंग में स्नातक एवं एमबीए
सृजन: गत पंद्रह  वर्षों से शायरी पर लेखन. दोहा  लेखन भी ...
           विभिन्न अखबारात के लिए साप्ताहिक कॉलम
संप्रति : सीमा सुरक्षा बल में  उप कमांडेंट, नई दिल्ली
संपर्क:  vijendra.vijen@gmail.com )





छत्तीसगढ़ रायपुर के  इतवारी अख़बार के 16 नवंबर 2014 के अंक में प्रकाशित
विजेंद्र शर्मा हमज़बान  में पहले भी

शीर्षक क़मर सादीपुरी का इक शेर
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शनिवार, 1 नवंबर 2014

महिला का दलित और दमित होना

कोई इक शमा तो जलाओ यारो!

 
 










फ़रहाना रियाज़ की क़लम से


नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था, ‘तुम मुझे एक योग्य माता दो, मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूंगा.'  किसी भी समाज का स्वरूप वहां महिलाओं की स्थिति  पर निर्भर करता है,  अगर उसकी  स्थिति मज़बूत  और सम्मानजनक है,  तो समाज भी स्वाभिमानी  होगा. अगर हम इस बात को भारतीय संदर्भ में देखें, तो मालूम होगा कि आज़ादी के बाद शहरी और सवर्ण महिलाओं की  स्थिति में तो सुधार हुआ है , लेकिन पिछड़े ग्रामीण इलाकों की और दलित महिलाओं की  स्थिति क्या है ? इस बात का अंदाज़ा हम राजस्थान में दलित महिला भंवरी देवी के साथ हुई घटना से लगा सकते हैं. 22 दिसम्बर 1992 को राजस्थान की दलित महिला भंवरी देवी का सामूहिक बलात्कार हुआ था. लेकिन इनके द्वारा पुलिस में अपनी शिकायत व्यक्त करने के बावजूद पुलिस ने F.I.R. दर्ज करने से इनकार कर दिया.
इस मामले में हाई कोर्ट की भूमिका भी बहुत शर्मनाक रही,  जिसने अपने आदेश में कहा था:  ‘जब कोई सवर्ण व्यक्ति दलित को छू नहीं सकता, तो भला वह दलित महिला के साथ बलात्कार कैसे कर सकता है .’ यह तो एक बानगी भर है. आज आज़ादी के छः दशक बाद भी दलित महिलों को हिंसा,  भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है .
2011 के जनसंख्या  आंकड़ों के मुताबिक भारत की 1.2 बिलियन आबादी का क़रीब 17.5 फीसदी अथवा 210 मिलियन लोग दलित हैं.  ग़रीब, दलित,  महिला ये तीनों फैक्टर इनके शोषण में मुख्य भूमिका निभाते हैं. दुर्व्यवहार की शिकार सबसे ज़्यादा दलित महिलाएं होती हैं. इनके साथ सामाजिक  स्थिति की वजह से भेदभाव किया जाता है. आए दिन दलित  महिलाओं पर सवर्ण समाज द्वारा ज़ुल्म ढाने की घटनाएँ सामने आती रहती हैं.
 2006 के एक अध्ययन के तहत जिन 500 दलित महिलाओं का साक्षात्कार किया गया. उनमें से 116 ने दावा किया कि उनका एक अथवा ज़्यादा पुरुषों ने बलात्कार किया , जिनमें ज़्यादातर ज़मींदार , उन्हें काम देने वाले उच्च जाति के लोग थे.
दलित महिलाओं को प्रताड़ित करने वाले मामलों में सिर्फ 1 फीसद अपराधियों को ही अदालत सजा सुनाती है. अदालत में अपराधियों  को सज़ा से मुक्त करना भी एक बडी समस्या है, जो दलित महिलाओं को बहुत सालती है. जब भी किसी  पीड़ित महिला ने  ज़ुल्म का विरोध किया है,  तो इन्हें जिंदा जला डालने, कभी निर्वस्त्र कर गाँव में घुमाने , उनके परिजनों को बंधक बनाने और मल खिलाने जैसे पाशविक और पैशाचिक  कृत्य वाली घटनाएँ सामने आती हैं. हैरत की बात ये है कि आर्थिक , वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से सभ्य होने का दावा करने वाले भारतीय समाज को इन घटनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. दलित महिलाओं पर मीडिया का ध्यान भी तब जाता है , जब वे बलात्कार या सामूहिक बलात्कार का शिकार होती हैं या फिर उन्हें निर्वस्त्र कर के सड़कों पर घुमाया जाता है. बात अकेले मीडिया की नहीं है.  सारा समाज ही दलित महिलाओं के साथ हुई इस तरह की घटना पर इसी तरह का व्यवहार करता है. अभी हाल ही में बिहार के भोजपुर ज़िले की छह दलित महिलाओं के साथ गैंग रेप का मामला सामने आया है. भोजपुर ज़िले के सिकरहटटा थाने के कुरकुरी गाँव में हुए इस गैंग रेप पीड़ितों में 3 नाबालिग़ भी शामिल हैं. प्रशासन ने पहले तो इस मामले को दबाने की कोशिश की फिर बाद में घटना की पुष्टि करते हुए प्राथमिकी दर्ज की.
 दूर ग्रामीण क्षेत्र में दलित महिलाओं के साथ हुए इस इतने बड़े गैंग रेप पर कहीं कोई हलचल नहीं दिखाई दी , न ही कोई खास विरोध.  न ही  इन महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए कहीं कोई आवाज़. क्या अगर ये महिलाएं किसी बड़े शहर या सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न किसी सवर्ण समाज से होतीं, तो तब भी मीडिया , राजनेता और समाजसेवी संगठनों  में इसी तरह की ख़ामोशी होती ?
निर्भया केस में केंडल मार्च निकाल कर अपना विरोध दर्ज करने वाले देश के प्रबुद्ध नागरिक और आंसू बहाने वाले लोग, और 24 घंटे प्रसारण कर न्याय दिलाने वाली मीडिया देश के ग्रामीण क्षेत्र में दलित महिलाओं के साथ हो रहे ऐसे अत्याचारों पर क्यूँ खामोश हो जाती  हैं ?
भारत के अर्थशास्त्री और नोबेल पुरुस्कार विजेता अमर्त्य सेन कहते हैं, ' दलित महिलाओं की सहायता के लिए ज़्यादा कुछ नहीं किया जाता.  मैं इस बात से खुश हूँ कि आख़िरकार महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का मामला ध्यानाकर्षण पा रहा है.'  सेन ने अपने एक भाषण में दिल्ली में हुए निर्भया केस के बाद सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा था ‘लेकिन मैं तब और ज़्यादा प्रसन्न होता अगर ये मान लिया जाता कि दलित महिलाएं अरसे से असल हिंसा का सामना कर रहीं हैं. उनके हक में न तो कोई विरोध प्रदर्शन होता है और न ही कोई संगठन उनकी हिमायत करता है , मैं समझता हूँ कि इस तस्वीर में एक निरपेक्ष खाई है.’

आज अगर देखा जाये तो हर रोज़ कहीं न कहीं कोई न कोई महिला इसी तरह अपमानित और प्रताड़ित की जा रही है. बात सिर्फ ये नहीं है कि महिला दलित थी या संभ्रात. असल बात ये है कि जिस तरह किसी बड़े शहर की एक महिला के लिए पूरा देश उमड़ आता है. ऐसे ही पिछड़े ग्रामीण इलाक़ों की और दलित होने के कारण महिलाओं को और उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए. क्यूंकि महिला की कोई जाति नहीं होती है , महिला होना ही उसकी जाति है. महिला कहीं भी हो कैसी भी हो,  अगर उसके साथ अत्याचार होता है, तो आवाज़ को उठाना ही होगा.
हो कहीं  भी पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
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(रचनाकार-परिचय:
 जन्म:11 अप्रैल 1985 को मेरठ( उत्तर प्रदेश) में
शिक्षा: बीए ( चौ .चरण सिंह विश्विद्यालय मेरठ)
सृजन: समसायिक विषयों पर कुछ पोर्टल पर लेख
संप्रति: अध्ययन और स्वतंत्र लेखन
संपर्क : farhanariyaz.md@gmail.com)

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