बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
ऋतु कलसी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ऋतु कलसी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 1 जून 2014

ऋतु दा या ऋतु दी मतलब ऋतुपर्णो घोष

रिश्तों की जटिलता का बारीक फ़िल्मकार 



 








ऋतु कलसी की क़लम से  


विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।

ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता सुनील घोष से ही मिली थी। सुनील डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो  ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया। अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

ऋतुपर्णो घोष लेखक और कवि भी थे. बंगाल के सबसे प्रभावशाली लोगों में उनकी गिनती होती थी.कुछ समीक्षकों का यह भी कहना था कि उन्होंने बंगाल के साहित्य और फिल्म शैली को दुनिया तक पहुँचा कर, सत्यजीत रे की विरासत को आगे बढ़ाया था. लेकिन उनकी असमय मौत के कुछ वर्षों पहले वह फिल्म निर्माता कम और एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय के प्रतीक ज्यादा बन गए थे.
ऋतुपर्णो ने सार्वजनिक रूप से क्रॉसड्रेसिंग करके, मेकअप लगाकर, पगड़ी और खूबसूरत दुपट्टों का इस्तेमाल शुरू कर पूर्वाग्रहों को चुनौती दी. अपनी लैंगिकता को स्वीकार कर उन्हें एक अलग किस्म का प्रशंसक वर्ग मिला, लेकिन उनके करीबी लोगों ने उनसे कुछ दूरी भी बना ली, और उन्हें मिला एक अकेलापन, जिसे उन्होंने दुखी मन से स्वीकार भी किया.उनके बारे में अप्रिय चुटकुले बनने लगे. हालाँकि शीर्ष अभिनेत्रियाँ (राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद में) उनके साथ काम करने के लिए उतावली थीं, लेकिन फिल्म उद्योग में अंतर्निहित होमोफोबिया को समझते हुए वह इस बात को लेकर सतर्क थे कि वह मर्द कलाकारों के साथ कैसे बातचीत कर रहे हैं.
ऋतुपर्णो ने अर एकती प्रीमर गोल्पो, मैमोरिज़ इन मार्च और चित्रांगदा में उन्होंने अभिनय भी किया. उन्होंने स्त्री की तरह दिखने के लिए कुछ सर्जरियाँ करवाईं और हॉर्मोन थेरेपी का सहारा भी लिया. इन फिल्मों को बनाने और खुद को सबके निशाने पर रखा उनका व्यक्तित्व फीका और सावधानीपूर्ण हो चुका था, और वह पूरी तरह से स्वयं को अलग-थलग महसूस करने लगे थे. लेकिन वह जानते थे कि वह अपने सेलेब्रिटी हैसियत का इस्तेमाल एलजीबीटी समुदाय के लिए कर सकते हैं.














फैशन शो हो या फिर पुरस्कार समारोह, ऋतु महिलाओं की पोशाक में नज़र आते थे जिसके लिए वो कई बार मीडिया में चर्चा का पात्र भी बन जाते थे. बावजूद इसके वो बिना किसी झिझक या शर्म के महिलाओं के कपड़े पहनते थे और समलैंगिकता पर अपने विचार खुलकर व्यक्त करते थे.ऋतु की सहकलाकार रही दीप्ति नवल का कहना है अपनी सेक्शुएलिटी को लेकर इतना सहज मैंने किसी को नहीं देखा. उसने मुझे बताया था कि एक बार अभिषेक बच्चन ने उसे ऋतु दा नहीं ऋतु दी कहा और ये बताते हुए उसकी आंखों में चमक थी.
--
( रचनाकार परिचय:
 जन्म: 9 सितंबर
शिक्षा : एस एम् डी आर एस डी कालेज, पठानकोट से स्नातक
सृजन:पंजाबी की लगभग सभी स्तरीय पत्रिकाओं में कहानियां. दो पुस्तकें जल्द ही प्रकाश्य
रुचि: अध्ययन, लेखन और नृत्य
सम्प्रति:जालंधर से फ़िल्म की पत्रिका ‘सिने वर्ल्ड ’ का संपादन व प्रकाशन
ब्लॉग: पर्यावरण पर हरिप्रिया
संपर्क:reetukalsi@gmail.com)

read more...

सोमवार, 18 जून 2012

....... तो गायक होते सुरजीत पातर


 
 
 
 
 
 
 
सुरजीत पातर मार्फ़त ऋतु कलसी 



पाश के बाद पंजाबी कवि सुरजीत पातर सबसे ज्यादा पढ़े गए हैं. उनके लबो लहजे की ताजगी दायम है आज भी. जालंधर, पंजाब के एक गांव में १४ जनवरी 1944 को उनका जन्म हुआ। उनका पहला कविता संग्रह 1978 में हवा विच लिखे हर्फ है। कविताओं की उनकी  दर्जनों किताबें हैं .साफगोई और बेबाकी के लिए मशहूर पातर की कविताओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। पद्मश्री  के अलावा देस-दुनिया के कई सम्मानों से  उन्हें नवाज़ा जा चुका है.अँधेरे में सुलगती वर्णमाला के लिए 1993 का साहित्य अकादमी और २००९ में लफ़्ज़ों की दरगाह के लिए सरस्वती  सम्मान से वे समादृत हुए. युवा पत्रकार संजीव माथुर से एक संवाद  में उन्होंने  कहा  था : मैं कवि नहीं होता तो गायक होता.उन्हीं की बातें उन्हीं से जानिये:
मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं उसकी फिजा में ही गुरुबानी रची-बसी है। इसीलिए मेरी कविता में आपको लोकधारा, गुरुबानी और भक्ति या सूफी धारा का सहज प्रभाव मिलेगा। दरअसल मेरे चिंतन और कर्म दोनों में जो है वह प्रमुखत: मैंने पंजाब की फिजा से ही ग्रहण किया। एक बात और जुड़ी है। वह यह कि मैं जब भी दुखी होता हूं तो लफ्जों की दरगाह में चला जाता हूं। इनकी दरगाह में मेरा दुख शक्ति और ज्ञान में ट्रांसफॉर्म हो जाता है। यह ट्रांसफॉर्ममेंशन मुझे एक बेहतर इंसान बनाने में मददगार होता है। ध्यान रखें कि कविता मानवता में सबसे गहरी आवाज है.मैं अक्सर कहता हूं कि संताप या दुख को गीत बना ले, चूंकि मेरी मुक्ति की एक राह तो है। अगर और नहीं दर कोई ये लफ्जों की दरगाह तो है। इसलिए लफ्जों की दरगाह मेरे लिए एक ऐसा दर है जो मुझे इंसा की मुक्ति की राह दिखता है। और जो दर मुक्ति की राह दिखाए वह उदासी को भी ताकत में तब्दील करने कर देता है। जिंदगी आत्मसजगता में है। शब्दों की गहराई में समा जाओ तो दुख छोटे पड़ जाएंगे। मैं कविता का प्यासा था। मैंने विश्व काव्य से लेकर भारतीय साहित्य तक में सभी को पढ़ा। लोर्का हो या ब्रेख्त। शुरुआत में मुझ पर बाबा बलवंत का खासा प्रभाव पड़ा। इनकी दो किताबों ने खासा बांधा था- बंदरगाह व सुगंधसमीर। मेरी शुरुआती कविताओं पर इनका प्रभाव साफ देखा जा सकता है। पर मुझ पर हरभजन, सोहन सिंह मीशा, गालिब, इकबाल और धर्मवीर भारती का भी खासा प्रभाव रहा है। इसके अलावा शिव कुमार बटालवी और मोहन सिंह ने भी मुझे और मेरे लेखन को प्रेरित किया है। मैं राजनीति में कभी सीधे तौर पर सक्रिय नहीं रहा। जहां तक विचारधारा की बात है तो मैं साफ तौर पर मानता हूं कि लोकराज हो पर कल्याणकारी राज्य भी हो। इसीलिए मैंने लिखा है :
मुझमें से नेहरू भी बोलता है, माओ भी
कृष्ण भी बोलता है, कामू भी
वॉयस ऑफ अमेरिका भी, बीबीसी भी
मुझमें से बहुत कुछ बोलता है
नहीं बोलता तो सिर्फ मैं ही नहीं बोलता।
कविता को खोजते या रचते समय राजनीति, प्रकृति और आदम की बुनियादी इच्छाएं मेरी कविता में बुन जाती हैं। पर कविता में ये सचेतन नहीं आती है सहज-स्वाभविक हो तभी आती हैं। मैं खुद पर कोई विचारधारा लादता नहीं हूं। मैं कविता से विचारधारा नहीं करता हूं। मेरी प्रतिबद्धता इंसा और लोगों के साथ बनती है।

सुरजीत पातर की दो कविता

मेरे शब्दों

मेरे शब्दों
चलो छुट्टी करो, घर जाओ
शब्दकोशों में लौट जाओ

नारों में
भाषणों में
या बयानों मे मिलकर
जाओ, कर लो लीडरी की नौकरी

गर अभी भी बची है कोई नमी
तो माँओं , बहनों व बेटियों के
क्रन्दनों में मिलकर
उनके नयनों में डूबकर
जाओ खुदकुशी कर लो
गर बहुत ही तंग हो
तो और पीछे लौट जाओ
फिर से चीखें, चिंघाड़ें ललकारें बनो

वह जो मैंने एक दिन आपसे कहा था
हम लोग हर अँधेरी गली में
दीपकों की पंक्ति की तरह जगेंगे
हम लोग राहियों के सिरों पर
उड़ती शाखा की तरह रहेंगे
लोरियों में जुड़ेंगे

गीत बन कर मेलों की ओर चलेंगे
दियों की फोज बनकर
रात के वक्त लौटेंगे
तब मुझे क्या पता था
आँसू की धार से
तेज तलवार होगी

तब मुझे क्या पता था
कहने वाले
सुनने वाले
इस तरह पथराएँगे
शब्द निरर्थक से हो जाएँगे

----
एक नदी

एक नदी आई
ऋषि के पास
दिशा माँगने

उस नदी को ऋषि की
प्यास ने पी लिया
----------
 
 
 
 



 
 
 
 
 
 
 
 
पंजाबी की चर्चित युवा कहानीकार ऋतु कलसी पिछले लगभग दस साल से विभिन्न समाचार पत्रों के लिए फ्रीलांसिंग कर रही हैं.आपका संक्षिप्त परिचय है:

शिक्षा : एस एम् डी आर एस डी कालेज, पठानकोट से स्नातक
सृजन:
पंजाबी की लगभग सभी स्तरीय पत्रिकाओं में कहानियां. दो पुस्तकें जल्द ही प्रकाश्य 
रुचि: अध्ययन, लेखन और नृत्य
सम्प्रति:जालंधर से
युवाओं की पत्रिका ‘जी-नैक्स’  का संपादन व प्रकाशन
ब्लॉग: पर्यावरण पर हरिप्रिया
संपर्क:


read more...

बुधवार, 30 मई 2012

टूट कर तो पास था जीत कर बिख़र गया



पंजाब का दो काव्य आबा 







 









 देविंदर सिंह जोहल की क़लम से

1
एक पल ग़ुफ़ा में

तेरी आंखों से
पानी किस बात पे निकला
कुछ पता ना चला

ना तू ग़मगीन थी
न हालात नमकीन थे
बस मै बोल रहा था
या शायद
मेरा अपनापन खुल रहा था
किसी ग़ुफ़ा के दरवाज़े जैसा

दरीचे पे सूर्य का पहरा था
भीतर बुझ चुके दीप की महक थी
या लौ पे जल रहे मास की दुर्गंध
यकायक तेरी आवाज़ में
न जाने कहां से क्या आया
तेरॊ उंगलियाँ छुपा रही थी
या शायद सहला रही थी
आखों की सतह पे आए मोती
उसी एक पल में
तेरा हाथ
मेरे हाथ तक कैसे आया
बस पता ही न चला
बक्त का बह पल शायद
ग़ुफ़ा के गुम्बद में बंद था

मेरी आंख
तेरी आखों में कैसे उतर गई

शायद किसी पल का भी वकफ़ा नहीं था
मौसम का मिज़ाज एक तरफ़ा नहीं था
तू नदी नहीं थी
मैं पानी कैसे हो गया
तेरे होंठ कुछ कुछ खुले
जुबान शायद ज़रा सा लर्ज़ी
मेरी धड़कन तक आवाज़ आई
प्रेम जैसा कोई लफ्ज़ था या नहीं था
अहसास की इबारत थी

उसी पल दरवज़े पे थी
ताज़ा अतीत की दस्तक 
वक्त के गुम्बद से मै यकायक बाहर था
अपनी हथेली पे
नमी के शिलालेख़ थे
------------
2
मौत की सौगात

मुझे याद से निजात दे
सकूं की एक रात दे
मैं हूं हादसों में जी रहा
मुझे मौत की सौगात दे

बदन में रूप क्या मिला
करूप दिल से हो गया
मुझे रंग भी बेरंग दे
मुझे जात भी कुजात दे

मुझे मंज़िलों का हुलास ना
मुझे रास्तों की प्यास है
लबों को नमीं की चाह नहीं
मेरी रूह को प्रभात दे

इधर भी मैं उधर भी हूं
तुझी का ही मैं घर भी हूं
रहूं पास ही जाना कहां
तू अहद की बस बात दे

मैं टूट कर तो पास था
मैं जीत कर बिख़र गया
मुझी से मुझ को छीन ले
मुझी से मुझ को मात दे
----------


पत्रकार विदुषी ऋतु कलसी के प्रति हम आभारी हैं. जिनकी बदौलत  हमें जोहल साहब जैसे बुजुर्गवार सुगढ़ कवि और उनकी इतनी अच्छी कविता मिली.अनुवाद ऋतु का ही. वह कहती हैं: देविंदर जोहल एक सवेदनशील कवि हैं उनकी कविताएं रिश्तों के नाज़ुक अहसासों को खुबसूरत लफ़्ज़ों में अभिव्यक्त करती हैं
(कवि-परिचय
जन्‍म: 13 अप्रैल १९५७
सृजन: पंजाबी की पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। कविता संकलन के प्रकाशन की तैयारी।
सम्प्रति: आल इंडिया रेडियो जालंधर में प्रोग्राम एग्‍जीक्‍यूटिव पद पर कार्यरत।)




read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)