बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 19 सितंबर 2015

रवीश की रविश पर युवा पत्रकार की रनिंग

एक ख़त उनके लिए जो इसे पढ़ना नहीं चाहेंगे

 

रवीश कुमार रिपोर्टिंग के दौरान एक ग्रामीण के साथ। फोटो साभार।







गुंजेश की क़लम से

मेरे समाज’ के नेक लोगो !

इस ख़त को कई दिनों से टाल रहा था। बल्कि टाल ही चुका था। लेकिन इधर दो हफ्ते से रवीश कुमारकी पत्रकारिता ने मुझे फिर से हिम्मत दी है। मुझे यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है मैं यह ख़त रवीश के प्रभाव में आ कर ही लिख रहा हूँ। और अच्छा लग रहा है कि मैं कम से कम किसी तोगड़िया, किसी साध्वी, किसी ओवैसी के प्रभाव में या प्रतिक्रिया में कुछ नहीं लिख रहा हूं। लेकिन, बहुत संभव है आप ऐसे पढ़ कर अच्छा महसूस ना करें। एक तो इस ख़त में बातों का इतना बिखराव होगा, दूसरा इसका कंटेंट भी बहुत पुराना, एकदम घिसापिटा और आपकी सहिष्णुता पर सवाल करने वाला होगा।

कहां से शुरू करूँ ? तारीखों से ? नामों से ? तथ्यों से ? बयानों से? या बात से ? बीमार से? बीमारी से ? इलाज से ? तीमारदार से ? या अस्पताल से ? जुगनू, आदित्य, टूक, ये क्रमशः मेरी भतीजी, भांजे और भांजी के नाम हैं। जिनसे मेरी खूब छनती है। पंखुरी, गांधी और कृति ये क्रमशः मेरे फेसबूक मित्रों गिरीन्द्रनाथ जी, सत्येन्द्र भाई और विमल भाई के बेटे-बेटियों के नाम हैं। इसमें विमल भाई को छोड़ कर गिरीन्द्रनाथ जी और सत्येन्द्र भाई से मेरी ज़्यादा बातचीत भी नहीं है। लेकिन पंखुरी और गांधी के माध्यम से मैं इन्हें बहुत जानने लगा हूं और एक जुड़ाव सा महसूस भी होता है।

नेक लोगों, आपको यह बात सीनिकल लग सकती है लेकिन पिछले कुछ दिनों से मैं डरा हुआ और शर्मिंदा हूं। अविनाश, अमन, तान्या, मेनका या अंकित अब सिर्फ नाम नहीं रह गए हैं ? ये किसी आरटीआई के जवाब जैसे हैं ? अविनाश की माँ डाक्टर से कहती रही कि वह उसके बिना ज़िंदा नहीं रह पाएगी, वह रही भी नहीं। मेनका और अंकित के पिता दिनेश के दुख की सीमा के सोचना ही अथाह लगता है। आप सोच सकते हों तो बताइयेगा जिसने 2010 में डेंगू से अपना 11 साल के बेटा खोया हो यदि पांच साल बाद उतनी ही बड़ी उसकी बेटी भी उसी बीमारी की शिकार हो जाए, तो उसके दुख की क्या सीमा होगी। और यह सिर्फ राजधानी से निकलने वाले तथ्य हैं। भागलपुर, गोड्डा, दुमका, रांची, पटना, कहलगांव, बांका, वर्धा, नांदेड़, नागपुर, अकोला, यवतमाल, राऊरकेला, भिलाई इनके बारे में बात ही कहां हो रही है ? इनसब जगहों में तो बुखार को आत्महत्या और आत्महत्या को शराबखोरी साबित करना बहुत आसान है। और किया ही जाता है। इस सिस्टम से तो चिढ़ होती है। लेकिन मैं इससे डरा हुआ नहीं हूं? मुझे डर है और मैं शर्मिंदा हूं तो इसबात से कि 16 सितंबर को दुमका के एक स्कूल में एक क्लास फोर का बच्चा हार्ट अटैक से मारा गया? मैंने पूछा नहीं लेकिन 10-11-12 साल उम्र रही होगी शुभनील की। ठीक है, उसके दिल में कोई खराबी रही होगी। लेकिन 10-12 साल की उम्र में दिल की खराबी? यहां भागलपुर में 15 तारीख को अपने डेस्क पर मैंने जो खबर एडिट की, वो एक चार साल की बच्ची के बारे में थी जो पिछले 2 साल से लगातार दस्त से पीड़ित थी। डॉक्टरों ने जांच में पाया कि दो साल पहले उसने गेहूं का कोई पकवान खाया होगा, जिससे उसको यह बीमारी हुई। मुझे अभी उस बीमारी का नाम याद नहीं आ रहा। और नाम कुछ भी हो ज़रा सोचिए, एक तो वह पकवान किन कारणों से इतना जहरीला हो गया होगा, और फिर दो साल की बच्ची ने खाया भी कितना होगा? फिर डॉक्टरों को इस परिणाम तक पहुँचने में दो साल का वक़्त लग गया कि उसे बीमारी क्या है। वो भी भागलपुर जैसे शहर में जहां की चिकित्सा व्यवस्था पर आस-पास के करीब 6-7 जिले निर्भर हैं। प्राथमिक तौर पर तो ज़रूर ही।

मैं शर्मिंदा होता हूं जब 17 तारीख़ को एनडीटीवी के लिए लिखे एक लेख में आम आदमीपार्टी के नेता और पुराने पत्रकार आशुतोष बेशर्मी से अपनी गलती स्वीकारते हुए भी यह कहने से नहीं चूकते कि दुनिया के कुछ ही देशों में स्वस्थ्य सुविधाएं मानकों पर खरी उतरती हैं? हम मानकों पर खरे उतारने कि नहीं बल्कि न्यूनतम स्वस्थ्य जरूरतों की बात कर रहे हैं? और उसकी चाहत रखते हैं? खैर, दो हफ्ते लगातार प्राइमटाइम देखते हुए मुझे यह तो भरोसा हो ही गया है कि सरकार स्वस्थ्य सिस्टम तत्काल नहीं सुधार सकती। बहुत ईमानदारी से कोशिश करले तो भी नहीं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हम अपनी पीढ़ियों के लिए कैसी हवा, कैसी जमीन, कैसा पानी, कितना जंगल छोड़ जाएंगे? और यह भी सरकार को ही सोचना है क्योंकि जंगल जिनके थे उनको तो वहाँ से बेदखल करने की प्रक्रिया चल रही है या वो बेदखल हो चुके हैं?

रवीश कुमार को दोहराऊँ तो यह कि हिन्दू-मुसलमान-पाकिस्तान-आरक्षण-बुलेट ट्रेन में उलझे रहने वाले नेक लोगों क्या आपने कभी सोचा है कि वह क्या वजह है कि आने वाले समय में हम 25000 करोड़ के पीने के पानी के कारोबार का बाज़ार बनने वाले हैं? क्या इसमें समाज का कोई दोष नहीं है कि पिछले तीन साल में (अगर मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस की जांच को सही मानें तो ) मेरे चार से ज़्यादा दोस्तों और परिचितों ने या तो आत्महत्या करली या इसका प्रयास किया। मानसिक स्वस्थ्य के लिए कभी कोई चिंता मंदिर-मस्जिद बनवाने वाले हमारे नेताओं ने दिखाई है क्या? मैं इसलिए डरा रहता हूं कि कल जब जुगनू थोड़ी और बड़ी हो जाएगी और समाज से वही सब त्रासद अनुभव मेरे सामने बिखेर कर रख देगी (जिससे आज भी मेरे संवेदनशील दोस्त और सहेलियाँ गुज़रती हैं) और मुझसे सवाल करेगी कि समाज ऐसा क्यों है तो मैं क्या जवाब दूंगा? आपने कभी सोचा है कि आप अपनी बेटियों को क्या बताएँगे ‘साली आधी घरवाली कैसे होती है? (विषयांतर है, लेकिन यह मानसिक स्वस्थ्य से जुड़ा है)

नेक लोगों ज़रा सोचिएगा, एक डेंगू तो यह है ही जो फैला हुआ है, जिसने अविनाश के साथ उसके माँ-पिता को भी लील लिया। लेकिन एक संस्थागत डेंगू भी है, जिससे निपटने के लिए हम जन प्रतिनिधियों को चुनते हैं? और अगर आप यह मानते हैं कि कुछ नहीं बदलने वाला तो एक बार पीछे पलट कर देखिये कितना कुछ आउट कितने बुरे तरीके से बदल चुका है ? और अपनी हवा, पानी, मिट्टी के लिए सवाल कीजिये। वरना घर अस्पताल में तब्दील हो जाएगा, जब हम स्वस्थ्य रहेंगे तो वह एक खबर होगी।


रवीश जी,

आप समाज का पक्ष जानना चाहते हैं? किस समाज का जिसमें हम रहते हैं, या जिसमें हम रहने को मजबूर हैं ? आप इतना सब कुछ जानते हैं। यह भी जानते होंगे कि आपके इस ब्लॉग का जवाब दो ही तरह के लोग देंगे। एक जो आपको बहुत प्यार करते हैं और जिनसे आपको डर लगता है, दूसरे जो आपसे, और इस समाज में हर किसी से जो उनके जैसे नहीं हैं से, नफ़रत करते हैं। तीसरे तरह के भी लोग होंगे, जिनको शायद आप चाहते हैं, जो आपकी हर एक बात से सहमत नहीं हैं, लेकिन आप पर नज़र रखते हैं। जैसे जब आप बार-बार पैसों के लिए नौकरी नहीं बदलने की दलील देते हैं, तो मेरे जैसा पत्रकार जिसने अखबार की नौकरी में पचास महीने नहीं पूरे किए हैं और तीन संस्थान और चार नौकरियां बदल चुका है, वो आपसे पूछना चाहता है कि क्या नौकरी बदलने और पैसों के लिए नौकरी बदलना दलाल हो जाना है। हालांकि, मैं जानता हूं आपका यह मतलब बिलकुल नहीं रहा होगा। लेकिन हम ऐसे ही दीवाने लोग हैं, आपको एक-एक शब्द पर चेक करेंगे॥

लेकिन रवीश जी, आपका फेसबुक बंद करना एक गलत फैसला है। मैं नहीं मानता कि आपको पता नहीं होगा। लेकिन आप जानिए कि समाज, वह समाज जिसमें हम रहने को मजबूर हैं, में आम लोगों को क्या-क्या सहना और सुनना पड़ता है। एक अख़बार के दफ़्तर में अख़बार का स्थानीय संपादक और न्यूज़ एडिटर, डिप्टी न्यूज़ एडिटर जब यह तय करने लगें कि आप कहाँ रहेंगे और कहां नहीं। जब सवाल करने की प्रवृति की तारीफ भी आपको नक्सली कह कर होने लगे। जब पत्रकारिता में आपकी उम्र जितना समय गुज़ार चुका व्यक्ति जो आपके केआरए को भी प्रभावित कर सकता हो, आपके किसी मुसलमान के साथ खाना खाने पर आपसे सवाल करे। मुस्लिम मोहल्ले में रहने के आपके फैसले पर जब आपके साथ काम करने वाले यह कह कर शाबाशी दें कि मुस्लिम लड़कियां बहुत खूबसूरत होती हैं ? या कहें कि ज़रूर किसी मुस्लिम लड़की से तुम्हारा चक्कर होगा। या वो आपसे ऐसे ही पूछ दें खाने के दौरान कि तुम तो गाय का मांस भी खाते होगे? और रवीश जी यह सब तब हो, जब आपने घर वालों को समझा-बुझा कर। बहुत हद तक उन्हें नासमझ क़रार देकर, आपने अपने ड्रीम करियर की शुरुआत की हो। आपके ऊपर लालबहादुर वर्मा, एरिक होब्स्बाम, नोम चोमसकी, जॉन रीड, देरीदा, राही मासूम रज़ा, हरीशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, केदार नाथ सिंह, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल हावी हों। आपको अनिल चमड़िया और सुभाष गताड़े जैसे लोगों ने बिगाड़ा हो। तब आप क्या करेंगे। नौकरी को लात मारने का साहस सब में नहीं होता न!!!

रवीश जी, कोई माने या न माने मैं मानता हूं कि सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक असहिष्णुता हमारे समाज की गलियों में गंदी नालियों के साथ-साथ बहती है। इससे भी ज़्यादा जो भी सुनने की स्थिति में है, वह अपनी ही आवाज़, अलग-अलग सुर में, अलग-अलग गलों से सुनना पसंद करता है। उसे आवाज़ की विविधता चाहिए। बात की नहीं। यह बात मैंने इस समाज से कई बार, कम से कम मेरे हिस्से में अबतक जो समाज आया है, उससे हासिल की है। रवीश जी अभी भी जिस न्यूज़ रूम में आठ घंटे या उससे ज़्यादा ही बिताता हूं। वहाँ आज कल चुनाव का माहौल है। कई साथी पत्रकारों की चिंता यही है कि फलां व्यक्ति उम्मीदवार बन जाये, तो मैं उसका मीडिया प्रभारी बन जाऊंगा। फलां उम्मीदवार जीत जाये, तो मैं उसका पीए हो जाऊंगा। समाज का पक्ष यही है कि जो चल रहा है उसे बदलने की कोशिश मत करो। हिन्दू-मुसलमान अलग-अलग रहते आए हैं, तो एक साथ घर मत ढूंढो। न हिन्दू मुसलमान मोहल्ले में, और न मुसलमान हिन्दू मोहल्ले में। दोनों मिलकर तो इस देश के किसी मोहल्ले में घर न ढूंढे।

लेकिन रवीश जी, हम अपने अनुभव जुटा रहे हैं। आप हमसे, जाहिर है अपनी मेहनतों के कारण, बेहतर स्थिति में हैं। कोई आपसे सीधे ये पूछने की हिम्मत नहीं कर सकता है कि क्या किसी मुस्लिम लड़की से चक्कर है क्या? कोई आपसे जबरदस्ती यह कहलवाने की ज़िद नहीं करेगा कि कहो, मोदी ज़िंदाबाद। अगर आपने जवाब में कह दिया कि हम तो कुत्तों को भी ज़िंदा और आबाद देखना चाहते हैं, मोदी तो फिर भी आदमी है। तो आपके बारे गॉसिप नहीं फैलाये जाएंगे, आपको दफ़्तर में उपेक्षित नहीं कर दिया जाएगा।

तो नमस्कार रवीश कुमार जी, प्लीज़ समाज को, देश को उंसकी गति प्राप्त करने दीजिये। आप डांटिए तो कभियो नहीं। कहिये ना कभी कि कभी रवीश कुमार मत बनना... हम सुनेंगे और मानेंगे। कौन आपको सेलिब्रिटी कहता है। हम तो पकड़ लेते हैं किस प्राइम टाइम में आपके मेहमान पलट गए या आप ठीक वैसा शो नहीं कर पाये जैसा आपने सोचा था। और आप इस गलतफ़हमी में तो मत्ते रहिएगा गा टीवी पर कुछ महान कर रहे हैं। वो जैसे आपसे अपनी किताब पर बातचीत के दौरान राजदीप ने कहा था ना कि नरेंद्र मोदी को मनमोहन सिंह को कम से कम एक बार धन्यवाद ज़रूर देना चाहिए कि वो बिलकुल नहीं बोले। वैसे ही आप वाई सिक्योरिटी वाले संपादकों को धन्यवाद दीजिये कि वो कुछ नहीं कर रहे हैं। बाप रे बाप देखते देखते, मतलब लिखते लिखते 870 शब्द हो गया, इसमें कितनी वर्तनी की गलतियाँ होंगी उसको ठीक कर के पढ़ लीजिये गा। इतना ही ठीक ना !!!

और बाकी, गोली मार भेजे में की भेजा शोर करता है।

(किसका ये मत पूछिए गा )




(रचनाकार-परिचय :

जन्म : बिहार झरखंड के एक अनाम से गाँव में 9 जुलाई 1989 को
शिक्षा : वाणिज्य में स्नातक और जनसंचार में स्नातकोत्तर महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा से। प्रभात खबर व भास्कर से संबद्ध रहे।
सृजन : अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं व वर्चुअल स्पेस में लेख, रपट, कहानी, कविता
संप्रति : हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : gunjeshkcc@gmail.com )



read more...

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आबादी के आंकड़े का फ़र्जी खेल

कौन कितना जानना आसान नहीं इतना


 















फ़राह शकेब की क़लम से

संघ परिवार अपने निर्धारित विध्वंसक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए झूठ, फरेब, धोखा, मक्कारी, हिंसा, द्वेष और गोयबल्स के फ़र्ज़ी प्रचार तन्त्र पर आधारित हथकण्डे किस शातिराना ढंग से अम्ल में लाता है। इस पर संघ के नब्बे साला अतीत को ध्यान में रखते हुए काफी लम्बी बहस हो सकती है, लेकिन फिलहाल एक मूल तर्क को सामने रखते हुए जनसंख्या वृद्धि के नव अवतारित मुद्दे पर हर सम्भव तर्क के साथ अपना पक्ष रख रहा हूँद्। संघ की सफलता का मूल मन्त्र ये है कि वो देश के 20 से 25 प्रतिशत अल्पसंख्यकों विशेष कर मुसलमानों और ईसाइयों से 75 प्रतिशत से अधिक बहुसंख्यक समाज को मनोवैज्ञानिक रूप से भययुक्त कर उनके मानसिक पटल एक विशेष प्रकार का खौफ बिठाए रखना चाहता है। निरन्तर नित नए-नए प्रोपगंडा और अफवाहों से उस भय को खाद्य पानी उपलब्ध करवाते हुए उसे सींचते हुए बहुसंख्यक सामज के दिल दिमाग में सुनियोजित ढंग से उसकी जड़ को अंदर तक मज़बूत करने में संघ ने काफी सफलता पाई है इससे इनकार करना खुद को झूठी तसल्ली देने जैसा लगता है।


इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि अल्पसंख्यक समुदाय विशेष कर मुसलमानों और ईसाइयों के विरुद्ध फासिस्टों के तमाम षडयन्त्रों और साज़िशों में सामन्ती पूंजीवादियों का पोषक मेन स्ट्रीम मीडिया विशेष कर हिंदी मीडिया भी शामिल है। 26.08.2015 को देश के अस्सी. प्रतिशत प्रिंट मीडिया विशेष कर हिंदी मीडिया ने फासिस्टों की मंशा और लक्ष्य के अनुकूल इस अंदाज़ में सुर्खियां लगाया कि देश में केवल मुसलामनों की आबादी की बढ़ी है और किसी भी धर्म समुदाय की जनसंख्या में कोई वृद्धि नहीं हुई।

गुजरात के वर्तमान हालात के सामने इसे प्राथमिकता देना और पहले पन्ने की सुर्खी बनाना भी कुछ कम संदिग्ध नहीं है। संदिग्ध इसलिए कि इसी मीडिया के द्वारा अब देश भर को ये प्रभाव दिया जाता रहा है कि गुजरात के सिवा भारत में कहीं विकास नहीं हुआ और आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात की धरती सोना उगल रही है। अम्बर हीरे बरसा रहा है, दूध की नदियां बह रही हैं। लेकिन पिछले दो दिन से विगत दशकों से गुजरात की आधी सत्ता पर क़ाबिज़ बीएमडब्ल्यू और ऑडी जैसी गाड़ियों में घूमने वाला सम्पन्न व्यापरी समुदाय वहां की सड़कों पर आतंक मचा रहा है। उसे भी आरक्षण की ज़रूरत है तो फिर विकास किसका हुआ देश ये भी जानना चाहता है।
इधर, खबरों को आंकड़ों की वास्तविकता की कसौटी पर देखने के बाद ये सच सामने आता है कि मुसलमनों की जनसख्या वृद्धि दर में विगत कुछ वर्षों में लगभग 5 प्रतिशत और अगर 1991 से 2011 की बात करें तो सामूहिक रूप से लगभग 10 प्रतिशत की कमी आई है। 1991 में ये वृद्धि दर 34 प्रतिशत के आसपास थी जो 2011 में 24.5 प्रतिशत रह गई। इसी दौरान हिंदुओं की जनसंख्या वृध्दि दर 9 प्रतिशत कम हुई। अगर इस मापदण्ड को सामने रखा जाए तो देश के जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में मुसलमान हिंदुओं से 1 प्रतिशत अधिक ही हैं।
2001 में हिंदुओं की जनसंख्या 82 करोड़ 75 लाख थी, जो 2011 में 96 करोड़ 63 लाख पहुँच गयी और 2001 में मुसलमनों की जनसंख्या 13 करोड़ 80.लाख थी, जो 2011 में 17 करोड़ 22 लाख पहुंची। स्पष्टत: इन दस वर्षों में हिंदुओं की जनसंख्या में उतनी वृद्धि हुई जितनी मुसलमानों की कुल जनसंख्या थी। वर्ष 2001 में तो फिर हिंदुओं की आबादी घटी कैसे ??

लेकिन आंकड़े जारी करने वाले बाजीगरों ने बड़ी शातिराना ढंग से इसे प्रस्तुत करते हुए केवल ये प्रभाव देने की कोशिश की कि केवल मुसलमनों की जनसंख्या ही बढ़ी है. इन आंकड़ों में अप्रत्यक्ष रूप से एक और संघी षड्यंत्र को बल देने का प्रयास हुआ है .पश्चिम बंगाल और आसाम के मुसलमनों को बांग्लादेशी घुसपैठिये कहना भी फ़ासीवादियों का एक पसंदीदा अमल रहा है। इस जनसंख्या वृद्धि वाले ड्रामे में भी उन्हीं प्रदेशों में अधिक जनसंख्या वृद्धि वाली जगह के तौर पर चिन्हित किया गया है। जनगणना के इन आंकड़ों में इस पहलू को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा कि विगत कुछ वर्षों में मुस्लिम समाज जो अशिक्षा के कारण इन सब चीजों के प्रति उतनी रुचि नहीं लेता था। वहाँ अब काफी हद तक इन क्षेत्रों में जागरूकता आई है और पहले के मुकाबले अपने आधार कार्ड, राशन कार्ड, मतदाता सूची में नामकरण, मतदाता पहचान पत्र और जनगणना के समय उपस्थित होकर अपनी एवम् अपने परिवार की विस्तृत जानकारी इस क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को उपलब्ध करवाने के प्रति सचेत हुआ है।

इस पूरे प्रकरण और सांप्रदायिक सरकार के सांप्रदायिक षड्यंत्र और इस सामन्ती साज़िश को तर्कसंगत और अधिकृत रूप देने में लोकतंत्र के चौथे खम्बे की संज्ञा अपने माथे पर सजाये घूमने वाले पूंजीवाद की पोषक मीडिया के योगदान को देश का बहुसंख्यक समाज आंकड़ों के फर्जीवाड़ और वास्तविकता की रौशनी में किस तरह समीक्षा कर पाता है ये तो समय ही बताएगा। लेकिन इस प्रकरण के पीछे आरएसएस के रणनीतिकारों का हाथ और उनके संरक्षण का पर्दाफाश करने के लिए मैं यहां संघ के संचालन में चलने वाले बिहार सांस्कृतिक विकास परिषद के धर्म जागरण समन्वय विभाग, उत्तर बिहार द्वारा प्रकाशित साहित्य का हवाला देना ज़रूरी समझता हूँ. ये समाज तोड़क विध्वंसक साहित्य बिहार के सीमांचल इलाके में स्वयम्भू धर्मरक्षकों द्वारा बहुसंख्यक समाज के उन गावँ में बंटवाए जा रहे हैं जहां निर्धनता है, अशिक्षा है और धर्मनिरपेक्ष संविधान पर आधारित भारतीय राष्ट्र के सभ्य नागरिक गुणों एवम् जागरूकता का अभाव है।

मतांतरण से घटता भारत
घटता हिन्दू मरता भारत के शीर्षक से इस साहित्य के पहले और दूसरे पन्ने पर वर्णित कुछ पंक्तियाँ शब्दशः यहां अंकित कर रहा हूँ..

"" जहाँ जहाँ हिन्दू घटा, वहाँ का वह भाग भारत नहीं रहा! अफ़ग़ानिस्तान से ब्रह्म देश तक भारत था लेकिन आज पूर्व भारत का एक ही भाग हमारे पास है !
आखिर क्यों??
1947 में देश का विभाजन हुआ ! धर्म के आधार पर यानी द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जब देश का विभाजन हुआ उस समय भारत में तीन करोड़ मुसलमान थे! पश्चिमी पाकिस्तान में एक करोड़ हिन्दू और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 1.5 करोड़ हिन्दू थे, आज जब हम 67 वर्ष बाद विचार करते हैं तो पकिस्तान में हिंदुओं की संख्या केवल 8-10 लाख तथा बांग्लादेश में 60 लाख हिन्दू बचे हुए हैं! आखिर पाकिस्तान व बांग्लादेश के हिंदुओं का क्या हुआ ??
आसमान खा गया कि धरती निगल गयी, या तो उनका बलात् इस्लामीकरण कर दिया गया या वे मार दिए गए अथवा देश छोड़ने पर मजबूर हो गए! आज इन दोनों देशों में हिंदुओं की दुर्दशा हम आये दिन अखबारों में पढ़ते रहते हैं, दूसरी तरफ जहां भारत में तीन करोड़ मुसलमान थे आज वे 16 करोड़ हो गए हैं.
आये दिन सेकुलरिस्ट ये कहते नहीं थकते कि अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है, तो ये संख्या क्यों बढ़ रही है ! आज देश में सैकड़ों ऐसे स्थान हैं जहाँ हिंदुओं की बहन बेटियां सुरक्षित नहीं हैं! वे अपने ही देश में दो नम्बर के नागरिक बनने को मजबूर हैं! एक तरफ हम दो हमारे दो और दूसरी तरफ हम पांच हमारे पचीस--इस पर हिन्दू समाज को बिचार करना होगा नहीं तो हम कब तक देश का विभाजन होते देखेंगे,क्या हमें कश्मीर असम पश्चिम बंगाल और बिहार के हिंदुओं की दुर्दशा दिखाइ नहीं देती""""

इसके बाद एक चित्र बना कर सन् 2001 की जनगणना के आधार पर ये दर्शाने की कोशिश की गई है कि हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर घट रही है, जो 25 प्रतिशत से 20.प्रतिशत हो गयी है और मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर 34.5 प्रतिशत से 36 प्रतिशत हो गयी है।

ऐसे ज़हरीले साहित्यों के माध्यम से ये पुनीत कार्य दूसरे प्रदेशों में नहीं हो रहे होंगे शायद ही सम्भव हो सकता और इसी पर्दे के पीछे के असली अनधिकृत खेल को औपचारिक रूप से अधिकृत करने और आरएसएस के इस दुष्प्रचार को तर्कसंगत बना कर बल देने के लिए कल स्वर्ण सामन्ती और दलित अल्पसंख्यक विरोधी मीडिया ने अपना नैतिक सहयोग दिया है।
इससे पहले साध्वी प्राची साक्षी महाराज जैसे भाजपा नेताओं ने मौखिक विषबाण चला कर वातावरण तैयार किया। हिंदुओं को कितने बच्चे पैदा करने चाहिये जैसे प्रवचनों को भी मीडिया में खूब जगह मिली और अंततः उन बयानों को तर्कसंगत तौर पर इन खबरों के माध्ध्यम से प्रस्तुत किया गया..

ज्ञात हो कि ये जनगणना रिपोर्ट 2014 में ही प्रकाशित होनी थी। लेकिन अपने हर काम को सांप्रदायिक रंग दे कर सत्ता लोलुप भाजपा को आम जनता को गुमराह कर लाभ लेने में महारत हासिल है और इस रिपोर्ट को ठीक बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रकाशित कर संप्रादयिक ध्रुवीकरण का लाभ लेने की योजना के तहत ही मीडिया को भागीदार बना कर इस अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया। जातिगत आधारित जनगणना भी सार्वजनिक की जाए, तो कुछ और तस्वीर साफ़ हो सकती है। क्योंकि बहुसंख्यक वर्ग की कुछ जातियों में मुसलमानों की तुलना में जन्म दर अधिक है। जिसे चर्चा में लाना न्यायसंगत होगा।

(लेखक परिचय:

जन्म: 1 जनवरी 1981 को मुंगेर ( बिहार ) में

शिक्षा: मगध यूनिवर्सिटी बोधगया से एमबीए

सृजन: कुछ ब्लॉग और पोर्टल पर समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन

संप्रति: अनहद से संबद्ध

संपर्क: mfshakeb@gmail.com)



read more...

बुधवार, 13 मई 2015

दबंग से अम्मा तक का सफ़र











दो अदालती फ़ैसले और कुछ शंकाएं

भवप्रीतानंद की क़लम से
जेल में बैठे संजय दत्त सोच रहे होंगे कि वह चूक गए। जयललिता और सलमान खान के मामले में हाईकोर्ट ने दशकों पुराने मामले में जैसी जल्दबाजी दिखाई, वैसी परिस्थितयों को पैदा करने में शायद संजय दत्त के वकीलों से चूक हो गई। वह जज को आरोपियों की शोहरत और अकूत धन के आभामंडल में हिप्नोटाइज करने में सफल नहीं हो सके। कर्नाटक हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति सीआर कुमार स्वामी ने जयललिता के आय से अधिक संपत्ति के मामले में 11 मई को मात्र दस सेकंड में फैसला सुना दिया। उन्हें क्षणभर में दूध का धुला बताकर भ्रष्टाचार मुक्त बता दिया। यह केस 19 साल पुराना था। वैसे, हमारे यहां के न्यायालयों में न्याय पाने में व्यक्ति के जवान से बूढ़े हो जाने की कहानी आम है।
एक सामान्य इंसान की तरह सोचें तो हमारे तर्कों को भोथरा करने में माननीय वकीलों को मिनट भी नहीं लगेगा। पर सलमान खान, जयललिता आदि नेम-फेम वाले लोगों को जब उनके पक्ष में फैसला जाता दीखता है, तो एक क्षण के लिए बंबइया मूवी की वह पंक्ति, जिसे कई फ़िल्मों में बार-बार दुहराया गया है, कहने का मन करता है:
न्याय बिका हुआ है। न्यायाधीश बिके हुए हैं। जिस न्याय को पाने के लिए आम आदमी के जूते घिस जाते हैं, उसको बड़े लोग सेकंडों-मिनटों में प्राप्त कर लेते हैं। जबकि वह केस दशकों पुराना है। दशकों से जुटाए सबूत-गवाह क्षण भर में खारिज कर दिए जाते हैं। एक वकील की बात याद आती है जिसने कहा था कि कोर्ट में प्रस्तुत सैकड़ों पन्ने की बात जज के पास जाकर एक लाइन की हो जाती है। बात दमदार थी। न्याय के कटघरे में यही होता है। पर जज उस एक लाइन में ईमानदारी से डोल जाएं तो!

जयललिता राजनीति से पहले तमिल फ़िल्मों की जानी-मानी हिरोइन थीं। जाहिर के उनके पास धन की कमी नहीं होगी। उनके पास भौतिक वस्तुओं की भी कमी नहीं होगी। सैकड़ों जोड़ी कपड़े, सेंडल होना सामान्य बात होनी चाहिए। इसलिए जब वह राजनीति में आई और नब्बे के दशक के शुरू में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने का बहुमत मिला, तो उन्होंने दरियादिली दिखाते हुए मात्र एक रुपए, मतलब टोकन मनी सेलरी लेने की घोषणा की थी। वाकई यह आम लोगों के दिलों में जगह बनाने वाला स्टेप था। पर सत्ता के पांच सालों में जयललिता के पास 66 करोड़ रुपए कैसे आ गए। 1996 में उनके घर में छापा पड़ा। 28 किलो सोना, 896 किलो चांदी के अलावा हजारों की संख्या में साड़ियां, सैकड़ों की संख्या में जूते बरामद किए गए।
एक पूर्व जानीमानी तमिल फ़िल्मों में काम करने वाली हिरोइन के घर से यह सबकुछ बरामद होता, तो आम आदमी यह सोचकर मानसिक रूप से अपने को मना लेता। चलो हिरोइन के घर से यह सबकुछ निकलना कोई बहुत मायने नहीं रखता है। पर राजनीति के आने के बाद मात्र पांच वर्षों में इतनी बड़ी मात्रा में गहनों का निकलना कई शंकाओं को तो जन्म देता ही था। बहुत संभव है कि उन्हें पांच वर्षों के मुख्यमंत्रित्व काल में यह सब बतौर गिफ्ट मिला होगा। चूंकि वह पूर्व हिरोइन थीं तो गिफ्ट देने वाले सोने-चांदी का नेग चढ़ाने के बाद ही बात आगे बढ़ाते होंगे। और वही सब जमा होते-होते इतना जमा हो गया होगा। जयललिता के व्यक्तित्व को देखकर इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है। पर तर्क की कसौटी तो यही कहना चाह रही है कि यहां एक रुपए सेलरी लेने वाली सादगी कहां चली गई थी!
अभियोग लगाने वाले पक्ष का कहना था कि उन्हें हाईकोर्ट में अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। पर निचली अदालत ने उनपर दस साल चुनाव नहीं लड़ने का भी फैसला सुनाया था। अब हाईकोर्ट के फैसले आने के बाद जयललिता चुनाव लड़ सकती हैं। दस महीने बाद तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव है। जयललिता के भक्त और मुख्यमंत्री पन्नीरसेलवम कुर्सी पर जयलिलता की चरण पादुका रखकर, एक-एक बात पूछकर सत्ता चला रहे थे। वह भी मनो-टनों विनम्रता और भक्ति के साथ जयललिता को उसी कुर्सी पर सत्ता सौंपेंगे जो उनके जाने के बाद से ही सुरक्षित रखी हुई है।
संवेदना और भक्ति के क्रूर बैर रखने वाले इस युग में जयललिता के भक्तों को नाचते और पूजा करते देखते यह प्रश्न कौंधता रहता है कि क्या यह इसी युग के कार्यकर्ता हैं या फिर सत्ता में बने रहने के लिए जयललिता ही उनके तुरुप का पत्ता हैं।
ठेठ बंबइया फिल्म के हीरो सलमान खान पर भी हाईकोर्ट ने जिस तेजी से फैसला सुनाया वह कॉमन मैन के गले नहीं पच पाया। उनपर भारतीय दंड संहिता के तहत जो धाराएं लगीं थी, पक्का विश्वास है अगर वह सलमान खान नहीं होकर कोई सामान्य अपराधी रहता, तो जेल के भीतर होता। सोशल मीडिया पर चली एक बात पर यहां गौर करना समीचीन होगा। इसमें कहा गया है कि निचली अदालतों का आईक्यू लेवल इतना ही कम है जो उनका फैसला रद्द ही होना है तो उन्हें बंद ही क्यों नहीं कर दिया जाता है। वाकई वर्षों से जुटाए सबूतों और गवाहों को सुनने और मगजमारी करने के बाद जो फैसले यह निचली अदालतें देती हैं उनकी औकात ऊपर की अदालतें चंद सेकंड में बता देती हैं।
हम सलमान के मामले को थोड़ा भावनात्मक रूप से भी सोचने को विवश हैं। वह सेलिब्रेटी हैं। शराब पीकर गाड़ी चला रहे हैं। फुटपाथ पर दीनहीन-घर विहीन लोगों को कुचलते हुए निकल गए। जब उन्हें अपराध का भान हुआ, तो घायलों को अस्पताल पहुंचाने की बजाय अपने घर में दुबक गए। निचली अदालत को एक सारगर्भित प्रश्न यह भी पूछना था कि अगर सलमान खान निर्दोष थे, वह कार नहीं चला रहे थे तो दुर्घटना के बाद वह भागे क्यों। क्या उनमें इतनी भी संवेदना नहीं थी कि उनकी कार से एक्सीडेंट हो गया है और और वह घायलों की खोज-खबर लेने की बजाय भागकर अपने घर जाना उचित समझा। बाद में जब उन्होंने मृतकों और घायलों की सहायता भी की तो व इतनी कम थी वह इलाज में ही चुक गई। एक्सीडेंट में अधिकांश अपंग हुए लोग किसी काम के नहीं रह गए हैं। उनके लिए इतनी तो व्यवस्था वह कर ही सकते हैं जिससे कि जिंदगी कट सके। बाद में कोर्ट को मानवीय कार्यों में लगे रहने का हवाला देना मात्र दिखावा ही है। वह हंसने के तर्क के अलावा कुछ और सोचने को विवश नहीं करता है। कहते हैं, ईश्वर-अल्लाह के घर देर है, अंधेर नहीं। पर प्रश्न यह भी है कि जब वही नियामक हैं तो यह अदालत किस लिए!

(लेखक-परिचय:
जन्म : 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति : दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )


read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)