बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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सोमवार, 5 जनवरी 2009

कविता को लेकर फ़िरदौस भूल जाना चाहता है सुधांशु को.......


कविता का नया प्रेमी : सुधांशु फ़िरदौस


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कभी आपने कैलाश वाजपई की कविताओं को पढ़ा है.रहीम, खुसरो , जायसी और नानक के दोहों के साथ उतरे-डूबे हैं.यदि ऐसी पृष्ठ भूमि में मुक्तिबोध और निराला के दिग्दर्शन हो जाएँ तो है न कमाल! बंधुओं मैं उस कविता की बात कर रहा हूँ जिसे भाई सुधांशु फिरदौस ने अपनी ज़िंदगी बना ली है.अजब किस्म की बेचैनी मुझे उनके यहाँ मिलती है. उन्हें किसी तरह का कोई गुमान नहीं है.उनका बस विश्वास है बात बोलेगी हम नहीं । २ जनवरी १९८५ को निराला के समकालीनों में से वाहिद दुर्लभ रहे जानकी वल्लभ शास्त्री के शहर मुजफ्फरपुर में जन्मे सुधांशु ने बी.एच.यु. से गणित में स्नातक किया और फिलवक्त जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम्-एस-सी(टेक)कर रहे हैं.ख़ुद के बारे में ये युवा कवि कहता है:
.... कुछ ऐसा नहीं कि छुपाया जाये कुछ ऐसा भी खास नहीं कि बताया जाये...मेरे मित्र कहते है बोलने के प्रवाह मे बहुत ज्यादा बोल जाता हूँ और जब चुप होता हूँ तो उतना ही मौन.... आजकल, ज्ञानेन्द्रपति और तालस्ताय को पढ़ रहा हूँ...

अब आप उनकी ताज़ा रचना से रूबरू हों:
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चाह्ता
भूल जाऊं
उस प्यार को
जो किया था,तुमसे
सलामत नहीं वह भी
ज़माने की नजरों से,
इस समय कुछ-कुछ
मेरी दाढ़ी की तरह


चाहता
भूल जाऊं
बाटला हाउस की सुबह
जब सुनी थी
न सुनी जाने वाली आवाजें
देखी थी,
लोगों के चेहरे पे मौत सी चुप्पी!!

चाहता
भूल जाऊं
अखबार के पन्ने को
जिसमे छपी थी खबर
-"करोलबाग मे
गरीबी से तंग आकर
एक औरत पंखे से झूल गयी

चाहता
भूलजाऊं
साईनाथ की रिपोर्ट : इस
साल मे सोलह हजारसे
अधिक किसानो ने आत्महत्या की

चाहता
भूल जाऊँ
खबरिया चैनलों पर दीख रहे
ताज से निकलते धुएँ
जो राजनीति के रंग से लाल,
भगवा होते हुए
सुबह न जाने
किस रंग मे बदल जाये...

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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)