बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 27 अगस्त 2014

ऋषभ @ कविताएं संगीत के दूसरे सात स्वर की तरह














अजित कुमार सिन्हा की कविताएं

याद
हवा के झोंके  की तरह
तुम आये मेरे जीवन में
कर दिया खुशबू से सराबोर मुझे
उड़ा दिया हिचकिचाहट के परदे को
हवा के झोंके की तरह
बस गयी तुम्हारी महक साँसों में
स्पर्श से तुम्हारे थरथराता रहा जिस्म
छेड़ते रहे तुम मेरी जुल्फों के तार
हवा के झोंके की तरह
सर्वस्व दिया मैंने तुमको, पर हुआ क्या?
मुझे नहीं पता, आये थे जितनी तेजी से
उतनी ही तेजी से लौट गए, बिलकुल
हवा के झोंके की तरह
पर अफ़सोस नहीं जरा भी, खुश हूँ मैं
क्योंकि, मेरी रूह में बसे हो तुम
हर सुगंध में तुम्हारी याद चली आती है
हवा के झोंके की तरह

अवसाद
घुप्प अँधेरा घिरता हुआ
रौशनी को लीलता हुआ
सुदूर क्षितिज तक आसमां के पार तक
बिंदु रौशनी भी दृष्टिगोचर नहीं
लोभ नहीं छूटता कहने का,
मिलेगा चाँद कहीं पे सहमा हुआ.
अवसादग्रस्त हैं फिजायें
हवा में भी सूनापन है
ठहरा हुआ है सब कुछ
आ रहा है बस अँधेरा घिरता हुआ
अब आशा की किरणें भी मद्धिम होती सीं
अनिश्चित भविष्य के गर्भ में विलीन होती सीं
इनपर घना कोहरा सा छाता हुआ
डूबता हुआ सा मन इस अँधेरे में
प्रतीत होता है इन क्षणों में
बस अँधेरे से अँधेरा मिलता हुआ

इंतजार
ये बिखरे हुए कागज़ ,
अलसाए से परदे, खिड़कियाँ
कर्कश प्रतीत होता बुलबुल का कलरव
भुतहा लगता अंधियारे में पार्क, बोझिल हवा
और ये सहमा हुआ चाँद
हाथ की किताब का मुड़ा हुआ पन्ना, बुझती मोमबत्ती
पॉकेट में सूखी गुलाब की पंखुडिया
तुच्छ लगती भावनाएं
मन को भाता अकेलापन
याद दिलाता है मुझको
अभी भी मैं वहीँ हूँ
जहाँ छोड़कर चले गए थे तुम

मन की बात
निस्तब्ध चंद्रमा को देखती एकटक झील में
ज्यों कोई कंकड़ गिरा हो
असंख्य उर्मियाँ खेलती ह्रदय के आँगन में
मथती हुई झील के ह्रदय पटल को
विलोड़ित करती नीरव शांति को
हो रहा लगातार ऊर्जा प्रवाह
रात्री के अन्धकार में
एक हलचल आती है एक हलचल जाती है
शांत हो जाता है सब , कुछ समय उपरांत
सीमाओं में बाँध लिया है खुद को
झील के बाहर नहीं होता ऊर्जा प्रवाह
कितने ही कंकड़ गिरे , कितनी ही तरंगे आईं और गयी
तोड़ न सकी कोई सीमाओं के बंधन को
कलुषित हृदयों के उद्धार के लिए पर्याप्त थी एक ही हलचल
सीमायें हम खुद बांधते हैं सो
कोई तरंग उठती है कुछ समय के लिए
पर उद्वेलित नहीं क़र पाती , जड़ बना रहता है सब कुछ
संचार नहीं होता ऊर्जा का
हम होने देते हैं कह के होनी और रह जाते हैं
निस्तब्ध , चंद्रमा को देखती , एकटक , झील की तरह .

(रचनाकार -परिचय:
जन्म: २१ मई १९८७ को गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में
शिक्षा: प्रारंभिक- तराँव, गाजीपुर स्कूल- बक्सर कालेज- नोएडा से मेकेनिकल इंजीनियर
सृजन: फेसबुक पर सक्रिय। कोई प्रकाशित रचना नहीं।
संप्रति: मुंबई में सरकारी नौकरी
संपर्क: axn.micromouse@gmail.com 
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