बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 6 अप्रैल 2016

शहीद तंज़ील के ख़ानदान की बिटिया जब बोली....

तंज़ील अहमद काश तुम लौट आते !
















सीमा आरिफ़ की क़लम से

तारीख़ 3 अप्रैल। रात 12 बज कर 40 मिनट। तारीकियों की आग़ोश से फायरिंग की आवाज़। जो खामोशियों का सीना चीरती हुई जब मेरे गावं सहसपुर (बिजनौर) तक पहुँचती है, तो उस वक़्त दिल्ली से सहसपुर आए हुए मेरे भाई, अम्मा जाग रहे होते हैं। अम्मा, भाई से कहती है, इतनी रात को किस की बारात आई है।इससे पहले कि भाई कोई जवाब दे पाते, अचानक बाहर से कोई आकर कहता है, तंज़ील के बच्चे अभी कार से रोते हुए निकले हैं, सुना है उन्हें ( तंजील ) गोली मार दी गई है!  ये ख़बर पूरे गांव पर बिजली बन कर डराती है। जो पौ फटने तक गांव के हर घर-आंगन को अश्कबार कर जाती है।

एनआईए के उपाधीक्षक मोहम्मद तंज़ील को बाइक पर सवार दो व्यक्तियों ने उस वक़्त गोलियों बरसा कर हमेशा के लिए खामोश कर दिया, जिस समय वह अपनी भांजी को विदा कर के वापस अपने घर दिल्ली आ रहे थे। हमलावर उन पर 24 गोलियां बरसाते हैं और उनकी पत्नी भी उस हमले में गम्भीर रूप से घायल होती हैं। तंजील मौक़ा--वारदात पर ही मालिक--हक़ीक़ी से जा मिलते हैं जबकि उनकी पत्नी इस मज़मून के तहरीर किये जाने तक अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ रही हैं। काफी देर तक उनके दो मासूम बच्चे मदद के लिए चीखते-चिल्लाते रहते हैं। पीछे से उनके बड़े भाई की गाडी पहुँचती हैं। सामने की सीट पर रक्तरंजीत छोटे भाई की लाश। तड़पती हुई बहु। घबराए डरे सहमे बच्चे। कोई भी होश खो बैठे। लेकिन उन्होंने किसी तरह खुद को सम्भाला। एक ज़िंदगी तो बचाई जा सकती है इस उम्मीद के साथ डॉक्टर की तलाश में निकलते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस मौके पर जब पहुंचती है, तब तक पूरे क़स्बे में उथलपुथल मच चुकी होती है। पुलिस की चौकी करीब होने का भी कोई फायदा इस अफसर के परिवार को नहीं मिल मिल पाता है और हमलावर फरार होने में कामयाब हो जाते हैं।

मैं अपने इस जांबाज ईमानदार पुलिस अफसर की निर्मम हत्या पर नि:शब्द हूँ। और आज तीसरे दिन गुजर जाने के बाद भी उनकी अफसोसनाक मौत को ज़ेहन से निकाल नहीं पा रही। उसके पीछे उनसे मेरी ज़ाती पहचान, रिश्ता, एक गाँव, एक मोहल्ले के होने का सबब हो सकता है। लेकिन दुनिया का हर सच्चा इंसान इस दर्दनाक हादसे से बेचैन है। मेरे होश सँभालने के बाद सहसपुर में दो बार घर आए थे। एक बारी अपनी शादी की दावत देने के वास्ते आये थे शायद और दूसरी बार अम्मी से मुलाक़ात के लिए। एनआईए में रहकर उन्होंने कई अहम केसों में अहम भूमिका निभाई थी। इस समय पठानकोट हमले की भारतीय जांच दल के हिस्सा थे। गाँव में सब लोगो को सिर्फ इतना भर मालूम था कि वह बीएसएफ़ में हैं। उनकी वालिद की आमदनी उतनी नहीं थी कि वह अपने दोनों लड़कों को किसी महंगे स्कूल में तालीम दिला सकते.. तंज़ील अहमद और उनके बड़े भाई ने दिल्ली आकर अपने बलबूते कॉलेज में दाखिला लिया। अपने पैरों पर खड़े होने के लिए खुद ज़मीन बनाई। सपनों को पूरा करने के लिए आस्मां बनाया। अपनी ईमादारी, काबिलियत और मेहनत के बल पर उन्हें एनआईए का उपाधीक्षक नियुक्त किया गया था। खबरें आई हैं कि उर्दू फ़ारसी पर पकड़ मज़बूत होने के बायस वो पाकिस्तानी दहशतगर्दों के कोड वर्ड समझ उनके मंसूबो को भाप जाते थे। जिससे आतंकवादियों को पकड़ने में उनकी ख़ास भूमिका रहती थी।

लेकिन अफ़सोस कि इस भ्रष्ट तंत्र में एक ईमानदार अफसर, एक ज़हीन इंसान को सम्भलने तक का मौका नहीं दिया गया और उसकी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश कर दी गई। तंजीम अहमद ने देश के सिस्टम में रहकर जो क़ुरबानी दी है क्या उनका कोई वजूद नहीं था? क्या देश की प्रशासनिक व्यवस्था इतनी लचर है कि एक जांबाज़ अधिकारी इतनी इतनी आसानी से मौत की नींद सुला दिया जाए।
अब तक गृह मंत्रलय से किसी का कोई बयान नहीं आया है। सरकार की तरफ से कोई भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होता है। फ़र्ज़ी टवीट को अंतिम सत्य मान कर देश को पठानकोट आतंकी हमले के संबंध में गुमराह करने वाले गृह मंत्री उस केस की जांच कर रहे एक ईमानदार अधिकारी की नृशंस हत्या पर खामोश क्यों हैं??

मरहूम तंज़ील किसके लिए खतरा थे ? किसकी पूर्वाग्रही नीतियों के खुलने का डर था जो उनकी शहादत से छिप जाएगा ?? ऐसा माना जा रहा है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है कि तंजील अहमद की शहादत ने शहीद हेमंत करकरे की शहादत की याद दिला दी है। जब उनके साथ इस देश ने विजय सालस्कर और नारायण आप्टे के रूप में दो और जांबाज़ सपूतों को खोया था। शहीद हेमंत करकरे किनकी आँखों की किरकिरी बन चुके थे ये वो लोग बेहतर जानते हैं, जो देश की राजनीतिक सामाजिक स्थिति पर गम्भीर नज़र रखते हैं.

इस घटना के गर्भ से कई सवाल पैदा होते हैं:
क्या उनके परिवार के अलावा अन्य कुछ लोग भी जानते थे कि वो कितने दिन के अवकाश पर है?
वह अपनी छुटि्टयाँ खत्म करने के बाद वापस दिल्ली कब आनेवाले हैं?
क्या तंज़ील अहमद के पास ऐसे सबूत थे जिससे वह कुछ उजागर कर सकते थे?
क्या तंज़ील अहमद अपनी टीम के उस बयान से असहमत थे जिसमें उन्होंने पाकिस्तान से आकर पठानकोट आतंकी हमले में पकिस्तान के हाथ होने से इनकार किया था?
क्या इसे मात्र संयोग माना जाए कि पाकिस्तान से आए जांच दल ने इस्लामाबाद लौटकर पठानकोट आतंकी वारदात में अपने देश की किसी भी संलिप्प्ता से इनकार कर दिया और इधर केस की जांच कर रहे एक जांबाज़ ईमानदार अधिकारी को ही रास्ते से हटा दिया गया...!!!


यह हत्या एक पूर्ण साज़िश के तहत अंजाम दी गई लगती है। अफ़सोस इस बात का भी है कि शहीद तंज़ील अहमद आपका ताल्लुक़ उस मज़हब से है, जिसे लोग आतंकवाद का धर्म समझते हैं। वर्ना यह राजनेता आपको इतने आराम से क़ब्र में सोने नहीं देते। आपकी शहादत से इनको तिनके भर भी फायदा नहीं। क्योंकि आप राष्ट्र की सामूहिक चेतना को संतुष्ट केवल बेगुनाह जेलों में रहकर ही कर सकते हैं या फांसी चढ़ कर। शहादत दे कर तो हरगिज़ नहीं। कोई यह भी पूछ सकता है कि मरते वक्त आपने भारत माता की जय की थी कि नहीं। कोई कल्मा शहादत भी पूछ बैठे।
तंज़ील साहब आपने मादर--वतन के लिए जो किया उसकी कीमत केजरीवाल सरकार ने एक करोड़ लगा दी है। आपकी कर्तव्यनिष्ठा का इतना ही मोल मिल पाएगा आपको। आपके मासूम बच्चों को सीने से लगाना तो उन्हें भी गवारा नहीं हुआ, जिन्होंने शाहदत की कीमत लगा कर एक परंपरा निभाई है। लोग धर्म की अफीम चाट कर किसी निर्दोष को घर में घुस कर मार देते हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर अदालतों की चहारदीवारों के अंदर कानून को रौंद दिया जाता है वहाँ देश की सेवा में शहीद होने वाले जांबाज़ की पत्नी को सही समय पर इलाज मुहय्या नहीं हो पाता। कई अस्प्ताल इलाज करने से इंकार कर देते हैं।





(रचनाकार परिचय:
जन्म : 10 दिसंबर 1985 को सहसपुर, बिजनौर में।
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मास कॉम की उपाधि।
सृजन : कविताएं और कहानियां। छिटपुट प्रकाशन।
संप्रति : दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन और अध्ययन
संपर्क : seema.arif1@gmail.com )




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गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

शहर के बीच 22 सालों से लग रही पंचायत

सुलझाए गए भूमि विवाद, शादी और तलाक के डेढ़ हजार मामले























सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

रांची लेक रोड से जब देर रात आपका हिंदपीढ़ी की गली नंबर दो में गुजर हो, तो आधे सफर बाद आपको अक्सर भीड़ दिखाई दे जाएगी। जिसमें कोई वकील की तरह जिरह कर रहा होगा, तो बाकी लोग चुपचाप उसकी बातों पर गौर करने में तल्लीन। तभी दूसरा पक्ष कागजातों का पुलिंदा मेज पर फैला देता है। दरअसल यह पठान तंजीम का कार्यालय है। जहां शहर के लोग भूमि विवाद, शादी और तलाक के मामले लेकर इंसाफ की आस में पहुंचते हैं। यहां वैसे ही मामले सुलझाए जाते हैं, जिनमें केस थाना-पुलिस में दर्ज नहीं हो पाते या करवाए जाते हैं। कभी एक से दो घंटे, तो कभी कई दिनों तक पक्ष-विपक्ष पंचों के साथ बैठकें करते हैं। बहस-मुबाहिसे और कागजातों को देखने के बाद निर्णय सुनाया जाता है, जिसे दोनों पक्ष सहर्ष मंजूर करते हैं। शहर के बीच लगती इस पंचायत ने बारह वर्षों में डेढ़ हजार से अधिक मामले सुलझाए हैं। तंजीम की स्थापना 2003 के क्रिसमस के दिन इस संकल्प के साथ की गई थी कि हजरत ईसा मसीह के अमर वचन "न बुरा, देखो, न बुरा बोलो और न बुरा सोचो" पर अमल करते हुए समाज के उन पीड़ितों की मदद की जाएगी, जिनके पास कोर्ट-कचहरी के लिए पैसे नहीं होते। वहीं जो पंच परमेश्वर की परंपरा पर विश्वास करते हों।

मरहूम अधिवक्ता महमूदुल हसन, मो. रिजवान खान, सलीम इब्राहिम, नसीम खान आदि की मेहनत ने असर दिखाना शुरू किया, तो उनके जज्बे को परवान चढ़ाने युवाओं की कतार लग गई। अभी मो. शुएब खान राजू (अध्यक्ष), मो. शहजाद बबलू (सचिव), मो. नसीम (कोषाध्यक्ष) की अगुवाई में अनवर खान, मो. अनवर, नसीरउद्दीन, शाहिद जमाल और अलीम खान जैसे जुझारू हजारों लोग शांति, सद्भाव और शिक्षा जागरूकता के प्रचार-प्रसार में लगे हैं। ये लोग सरहुल, दशहरा, मुहर्रम, ईद मिलादुन्नबी और छठ के मौके पर चना, शर्बत और फलों का वितरण करते ही हैं। स्कॉलरशिप कैंप, मतदाता जगारूकता और नरेगा जागरूकता शिविर भी शहर से लेकर गांवों तक लगाते हैं। वंचितों के बीच रिक्शा, नि:शक्तों को ट्राई साइकिल देने और गरीब बेटियों की शादी में भी आर्थिक मदद करने में नहीं हिचकते।

केस-1 शंकर और फजल हुए एक

बंशी चौक स्थित श्रीशंकर और फजल बरसों से पड़ोसी हैं। उनके बीच के प्रेम और सद्भाव को थोड़ी सी जमीन अक्सर दरार डाल देती थी। एक पक्ष का आरोप था कि उसकी जमीन दूसरे पक्ष के कब्जे में है। चूंकि दोनों अच्छे पड़ोसी हैं, इसलिए कोर्ट-कचहरी जाना नहीं चाहते थे। मामला तंजीम के पास पहुंचा। दोनों पक्षों की बात सुनी गई। अमीन बुलवाकर जमीन की नाप-जोख हुई कागजात के मुताबिक। निर्णय हुआ, जिसे दोनों पक्षों ने माना।

केस-2 दोनों परिवार को मिला रास्ता

मो. इज्हार और जमीला बेगम के घर और जमीन के बीच आने-जाने के मार्ग को लेकर विवाद चला आ रहा था। प्राय: इनमें वाद-विवाद होता रहता। कुछ लोगों ने इन्हें मोहल्ले की बात मोहल्ले में ही सुलझा लेने की सलाह दी। इसके बाद दोनों परिवार ने अलग-अलग घरों के बड़ों से राय-मश्विरा किया। अंत में तंजीम के पास ये पहुंचे। वकील और बुद्धिजीवी की टीम की रिपोर्ट के बाद दोनों पक्षों की बात सुनी गई। आखिर दोनों की सहमति से दोनों को रास्ता मिल गया।

केस-3 लड़की को मिला 60 हजार हर्जाना

शाहीन और रमजान (नाम बदले हुए) ने प्रेम विवाह किया था। लेकिन उनमें बहुत दिनों तक प्रेम बचा नहीं रही। किसी न किसी बहाने इनके बीच खटपट होने लगी। एक दिन लड़की थाना पहुंच गई कि उसे सुसराल में जलाने का प्रयास किया गया। बिना केस दर्ज कराए लोगों के हस्तक्षेप से लड़की वापस तो आ गई, पर मायके चली गई। तंजीम की पंचायत में दोनों ने अलग रहने का निर्णय किया। लड़की को 60 हजार रुपए हर्जाना दिलवाया गया। इसमें आधे पैसे तंजीम ने दिए।

दैनिक भास्कर रांची के 17 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित




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मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

वंचित बच्चों के लिए रिज़वाना का मुफ़्त स्कूल


पांच शिफ्ट में 22 सालों से संचालित है तालीमी आशियाना
 





















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

पांच शिफ्ट में संचालित महज चार कमरे वाले किसी स्कूल के बारे में आपने शायद कम ही सुना होगा, जहां नर्सरी से लेकर मैट्रिक तक के स्टूडेंट्स पढ़ते हों। वो भी नि:शुल्क। ये वो बच्चे हैं, जो कहीं काम करते हैं, या उनके माता-पिता मजदूरी कर गुजर-बसर चलाते हैं। यहां से पढ़ चुके कई छात्र इंजीनियर और अधिकारी तक बन चुके हों। यह कहानी हिंदपीढ़ी मुजाहिद नगर की आजाद गली स्थित रिजवाना के केयूजी स्कूल की है। उनके साथ हैं छह टीचरों की टीम। सवाल उठना लाजिम है कि सब कुछ होता कैसे है। एमए और बीएड कर चुकीं रिजवाना कहती हैं कि वे देर रात तक संपन्न परिवारों के बच्चे को ट्यूशन पढ़ाती हैं, उससे प्राप्त आय से वह टीचरों को नाम मात्र का मुआवजा देती हैं। अलग-अलग शिफ्ट में अलग-अलग टीचर सेवा देती हैं। इसलिए बाकी समय वे दूसरे स्कूलों में पढ़ाने चली जाती हैं, ताकि उनका खर्च चल सके। वहीं इसी स्कूल की कभी स्टूडेंट रही ये टीचर रिजवाना के जज्बे को ऊर्जा देती हैं। बच्चों के इस तालीमी आशियाना की शुरुआत जून 1993 में की गई थी।

सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक पढ़ाई

सुबह होने के साथ ही गली में चहल-पहल शुरू हो जाती है। ये कक्षा नौवीं से दसवीं तक के छात्र हैं, जिनकी क्लास 06 बजे से 09 बजे तक चलती है। इसके बाद 09 से 11 बजे तक 5वीं से 8 वीं तक के बच्चे पढ़ते हैं। इसी तरह 11 से 01 बजे तक नर्सरी से चौथी, 02 बजे से 08 बजे रात तक फिर नौवीं से दसवीं और 08 बजे से 10 बजे रात तक 06 वीं से 07 वीं तक की कक्षाएं यहां संचालित होती हैं। कमरों की कमी के कारण कक्षाएं शिफ्ट में लगती हैं।

250 स्टुडेंट्स के लिए हैं 6 टीचर्स

रिजवाना के तालीमी हौसले को स्कूल की टीचर्स बढ़ावा देती हैं। स्कूल के 250 बच्चों को पढ़ाने के लिए नेहा परवीन, शबनम निसा, शबनम परवीन, रूबी परवीन, शमा परवीन और मो. अर्शद अपनी सेवा देते हैं। ये बतौर मुआवजा हजार रुपए से अधिक नहीं लेतीं। वहीं कुछ की ममता कभी-कभी इन बच्चों के लिए कॉपी-पेंसिल और टॉफी भी ले आती है। वहीं कुछ अभिभावक स्कूल की मदद के प्रति छात्र बतौर 20 रुपए मासिक शुल्क भी अदा कर देते हें।

एक किताब से पढ़ते हैं दो से तीन बच्चे

रिजवाना कहती हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत बच्चों के लिए किताब और कॉपी की उपलब्धता की है। इसलिए एक किताब से दो से तीन बच्चे पढ़ते हैं। कभी-कभार समर्पित फाउंडेशन और वीकर सोसायटी जैसी एक-दो संस्थाएं और संपन्न लोग बच्चों के लिए किताब-कॉपी स्कूल में आकर दे जाते हें। लेकिन सरकार की ओर से आज तक स्कूल या यहां पढ़ रहे बच्चों की कभी किसी तरह की सहायता नहीं मिली। दो कमरे बिना छत के थे। लोगों की मदद से उसे छा दिया गया है।


दैनिक भास्कर रांची के संस्करण में 15 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित



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गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

नाईगीरी करते हुए बने साहित्य के डॉक्टर

रांची में है अशरफ हुसैन का सैलून, उर्दू कहानीकारों पर की पी-एच. डी






 


















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से



कावे-कावे सख्त जानी, हाय तन्हाई न पूछ
सुब्ह करना, शाम का लाना है जू--शीर का

(सुबह से शाम तक फरहाद की तरह पहाड़ को काट कर नहर निकालने की तरह जिदंगी बीत रही है, मेरे दर्द और अकेलेपन की हालत मत पूछो)। अशरफ हुसैन ग्राहक की हजामत बनाते हुए जब उसके पूछने पर गालिब का यह शेर सुनाते हैं, तो उनकी आंखें आईना बन जाती हैं। जिसमें उनकी जद्दोजेहद को पढ़ा जा सकता है। उनका संघर्ष इस मिसाल को स्थापित करता है कि ईमानदारी और मेहनत के बल पर ही आप लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। दरअसल अशरफ रांची मेन रोड की फुटपाथ पर 1987 से नाई की दुकान चला रहे हैं। उनके जिम्मे उनके बच्चों के साथ दिवंगत भाई के बच्चों की जिम्मेवारी भी है। लेकिन विपरीत स्थितियों को उन्होंने अपने हौसले के बूते परास्त कर दिया है। नाईगीरी करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। चार साल पहले उन्होंने रांची विवि से उर्दू साहित्य में पी-एच डी भी कर लिया। उनके शोध्य का विषय था, झारखंड के उर्दू अफसानानिगारों का तुलनात्मक अध्ययन। इनदिनों वे डी. लिट की तैयारी में लगे हुए हैं।

पिता की मौत के बाद संभाली दुकान

मेन रोड में अशरफ के पिता का सैलून था। लेकिन बाद में आय कम होने लगी, तो उन्होंने उर्दू लाइब्रेरी के पास दुकान शिफ्ट कर ली। लेकिन 1987 में जब अशरफ ने मैट्रिक पास किया, पिता का देहांत हो गया। उसी साल अतिक्रमण हटाओ अभियान के तेहत प्रशासन ने दुकान तोड़ दिया। इसके बाद से उर्दू लाइब्रेरी की दीवार पर आईना टांग कर फुटपाथ पर ही अशरफ ग्राहकों की सेवा कर रहे हैं। दूसरों की हजामत बनाते हुए उन्होंने इंटर, बीए, एम और पी-एच. डी की डिग्री हासिल की। जबकि इस बीच उनके मंझले भाई का 2010 में निधन हो गया। भतीजों की शिक्षा-दीक्षा का दायित्व भी यह बखूबी निभा रहे हैं।

महिला लेखिकाओं पर किताब प्रकाशित

गालिब और इकबाल के शेर अशरफ को भले याद हों, लेकिन उनकी हसरत शायर नहीं, लेखक और आलोचक बनने की है। पी-एच. डी करते हुए उन्होंने झारखंड की उर्दू कथाकरों पर पुस्तक लिखने का विचार किया। इसका डॉ. गुलाम रब्बानी और सरवर साजिद ने समर्थन किया। उनकी हौसला अफजाई पर अशरफ की "झारखंड की नुमाइंदा ख्वातीन अफसानानिगार' शीर्षक किताब प्रकाशित हुई। यह सूबे की चार अहम महिला अफसानिगारों पर केंद्रित है। इसमें सबूही तारीक, शीरीं नियाजी, कहकशां परवीन और अनवरी बेगम की चुनिंदा कहानियां और उनपर अशरफ की आलोचनात्मक टिप्पणी संगृहित है।


दैनिक भास्कर के में 7 दिसंबर 2015 के अंक में प्रकाशित

(इसके बाद अंजुमन इस्लामिया के पदाधिकारियों ने अशरफ हुसैन को मौलाना आजाद कॉलेज में पढ़ाने का आमंत्रण दिया। अशरफ ने कॉलेज में क्लास लेना शुरू कर दिया है। फिलहाल उनकी तदर्थ नियुक्ति हुई है, प्रबंधन ने स्थायी करने का आश्वासन दिया है। भावुक लहजे में कहते हैं कि भास्कर और अंजुमन के प्रति वे आभारी हैं।)




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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

कौन लौटाएगा पल-पल घुटती सांसों के 56 दिन


कथित रूप से विस्फोटक के साथ पकड़े गए

इंतजार अली को जमानत मिलने के बाद 



फोटो- रमीज़
 



सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


यातना भरी 55 लंबी रातों के बाद लौटा उम्मीद का सूरज गुरुवार को हिंदपीढ़ी, निजाम नगर की अमन गली में उतरा, तो उससे सराबोर होने को महिलाएं, बूढ़े, बच्चे और जवान बेताब रहे। इसकी चमक से इंतजार अली के आंगन की उनिंदा आंखें सबसे अधिक आश्वस्त दिखीं। उन्हें अदालत पर यकीन पुख्ता था कि उनके घर का इकलौता कमाऊ सदस्य जरूर आएगा। लेकिन 20 अगस्त की शाम से शुरू पुलिसिया जुल्म की किस्त-दर-किस्त उन्हें हर रात सोते से जगाती रही। पलकें झुकाए जब इंतजार की पत्नी रिहाना खातून ने दरवाजा खोला, तो उन्होंने सबसे पहले मीडिया पर अपना बुखार उतारा। उसके बाद पुलिस बर्बरता के किस्से खामोशी से सुनाती रहीं। बोलीं, उस दिन यानी 20 अगस्त को जब चार बजे से उनके पति ने मोबाइल नहीं उठाया, तो वे परेशान हो गईं। शाम में वर्दी व सादे लिबास में पुलिस आ धमकी। बिना कुछ बताए घर का सामान तितर-बितर करने लगी। पुलिस के साथ आए सिविल ड्रेस के एक व्यक्ति अचानक डांटने-डपटने लगे। जब 12 साल की बड़ी बेटी ने कहा, अंकल अम्मी को क्यों डांट रहे हैं, तो वह व्यक्ति बोला, तुम जिंदगी भर पछताओगी, टीवी पर रोज पापा के बारे में सुनना कि वह आतंकवादी है।

इतना कहकर रिहाना बिलखने लगीं। पास बैठीं इंतजार की बहन शकीला बोल पड़ीं, बताईये मासूम से बच्चों पर क्या असर पड़ा होगा। पुलिस जाते-जाते कह गई, इंतजार बम के साथ पकड़ा गया है। रिहाना के गालों पर लुढ़क आया आंसू आंखों में लौट आक्रोश बना। बोलीं, अब अदालत ने बेल दे दी, इंशा अल्लाह केस भी खत्म हो जाएगा। लेकिन कौन लौटाएगा पल-पल घुटती सांसों के वे 56 दिन जिसने छोटकी की खोई मुस्कान छीन ली। किसने आखिर साजिश रच उसके पापा को जेल की सलाखों में कैद कर दिया। जिसे नींद ही पापा के पेट पर आती थी। पापा के न रहने पर हर दो दिन बाद उसे बुखार घेर लेती है।

बहुत देर तक कमरे में चुप्पी पसरी रही। इस बीच इंतजार की वही सबसे लाडली पांच वर्षीया छोटी बेटी आकर रिहाना से लिपट गई। अम्मी पापा कब आएंगे। उसके सवाल पर इंतजार के मित्र नदीम इकबाल ने उसे पास बुलाकर गाल थपथपाया। बोले, बेटा बस आ ही रहे हैं। उनके इतना कहते ही छोटकी फिर अम्मी से चिपक गई, हम बोले थे न मोहल्लम (मोहर्रम)में दलूल (जरूर)आएंगे पापा। अब मेली (मेरी)तबियत थीक (ठीक)हो जाएगी। उसकी तुतलाहट भरी मासूमियत ने माहौल जरा सामान्य किया। फिर रिहाना सिलसिलेवार कई सवाल दागती हैं। जैसे, एनआईए ने क्लिन चिट दे दी। कोई साक्ष्य नहीं मिला। वहीं कुछ अखबार वाले लगातार मेरे पति को आतंकवादी बताते रहे। पुलिस ने अदालती कार्रवाई में इतनी देरी क्यों की। बच्चे दस दिनों तक स्कूल नहीं गए। बेटी ने सहेलियों से मिलना-जुलना बंद कर दिया। कहती हैं कि बेटा वकील, तो बेटी अब चाहती है कि जज बने, ताकि कोई भी बेकसूर इसतरह तिल-तिल ताजा सांस लेने को न तरसे। बेटा अक्सर पूछता है आखिर पापा को किस बात के लिए पुलिस ने पकड़ा।

नोट: इंतजार अली को 20 अगस्त 2015 को पुलिस ने पकड़ा। बताया कि उनके पास विस्फोटक भरा थैला था। बाद में एनआई और सीआईडी ने दी क्लिन चीट। लेकिन पुलिस अहं के चक्कर में उसपर आरोप दर आरोप लगाती रही। आखिर अदालत ने 15 अक्टूबर को उसे जमानत दे दी।


भास्कर, रांची के 16 अक्टूबर 2015 के अंक में प्रकाशित




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बुधवार, 16 सितंबर 2015

हज सब्सिडी के नाम पर ठगना बंद करे सरकार

हज के नाम पर मुसलमानों से लिया जाता दोगुना पैसा


 




















सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


गैर-इस्लामिक बताते हुए हज सब्सिडी को समाप्त करने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 8 मई 2012 को दिया था। लेकिन तीन साल के बाद भी ऐसा नहीं हो सका। अब यह मांग झारखंड में बुलंद हो रही है। रांची एयरपोर्ट पर आप जाएं, तो इसका पता आजमीन--हज से मिलकर हो जाता है। अधिकतर लोगों का कहना है कि सरकार सब्सिडी के नाम पर मुसलमानों को बेवकूफ बना रही है। हज के नाम पर हर यात्री से करीब 50 से 60 हजार अतिरिक्त ले लिए जाते हैं। इस प्रकार हर साल उनकी जेब से हर साल 750 करोड़ सरकार ले लेती है। जबकि कहा जाता है कि आपको सरकार प्रतिवर्ष 600 करोड़ रुपए से ज्यादा रियायत दे रही है। गौरतलब है कि हज कमेटी की ओर से हर वर्ष हज पर जाने वाले सवा लाख लोगों को सब्सिडी मिलती है। इसका लाभ निजी ऑपरेटर के जरिये जाने वाले करीब 50 हजार लोगों को नहीं मिलता।


सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि दस सालों के भीतर हज सब्सिडी खत्म कर देनी चाहिए। सन् 2006 में विदेश परिवहन और पर्यटन पर बनी एक संसदीय समिति ने भी एक समय सीमा के भीतर इसे खत्म करने के सुझाव दिए थे।




बदनाम करने की कोशिश बंद हो

कैलाश मानसरोवर और ननकाना साहिब गुरुद्वारा की यात्रा के लिए भी सरकार सब्सिडी देती है। लेकिन हज सब्सिडी के नाम पर मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश बंद होनी चाहिए। कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए इसे बंद करना चाहिए।

नदीम इक़बाल, झाविमो अल्पसंख्यक मोर्चा


लगातार की जा रही हटाने की मांग

भारत में मुसलमानों ने कभी हज के लिए सब्सिडी की मांग की नहीं है। बल्कि इसे हटाने की मांग लगातार की जाती रही है। मुसलमानो को हज के लिए सब्सिडी नहीं चाहिए। यदि मुसलमानो के प्रति हमदर्दी तो उनमें शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए सार्थक योजना बने।

इरफ़ान आलम, युवा मुस्लिम मंच



सब्सिडी ऊंट के मुंह में जीरा

सरकार एयर इंडिया को हर साल 200 से 300 करोड़ देती है। लेकिन सच यह है कि हर आजमीन--हज को सब्सिडी के नाम पर मात्र दस हजार की ही छूट मिलती है। यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। सरकार इसे बंद करे और इसके बहाने होती सांप्रदायिक राजनीति पर रोक लगाए।

खुर्शीद हसन रूमी, प्रवक्ता, राज्य हज कमेटी


मूर्ख बनाना बंद करे सरकार

आम दिनों में हिंदुस्तान से मक्का-मदीना जाने वालों का खर्च 60 हजार से अधिक नहीं पड़ता। वे इतने ही खर्च में उमरा कर लौट आते हैं। लेकिन सरकार इसके लिए हज के समय तीन गुना पैसा वसूलती है। उस पर तुर्रा यह है कि सब्सिडी दी जा रही है। सरकार मूर्ख बनाना बंद करे।

ज़बीउल्लाह, हज वोलेंटियर्स ऑरगेनाइजेशन



शरीअत नहीं देती इजाजत
 

शरीअत के मुताबिक हज उसी पर फर्ज है, जो साहिब--निसाब हो। यानी जिसपर जकात फर्ज है। दूसरे लफ्जों में जिसकी आर्थिक हैसियत अच्छी हो। इसलिए हज के सफर में सब्सिडी के नाम पर किसी तरह की मदद की रकम हासिल करना सही नहीं है। इससे इबादत में खलल ही पैदा होगा।

क़ारी जान मोहम्म्द रज्वी, शहर क़ाज़ी, रांची


मदद नहीं, नाइंसाफी है

यदि कोई बिना सरकारी दखल के हज के लिए मक्का-मदीना का सफर करे, तो उसे एक लाख से ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ेगा। इसमें आने-जाने का किराया, वहां पंद्रह से बीस दिनों तक ठहरने और खाने-पीने का खर्च भी शामिल है। लेकिन सरकार इसी के लिए पौने दो से सवा दो लाख रुपए एक आजमीन--हज से वसूलती है। यह मदद नहीं, बल्कि सरासर नाइंसाफी है। लूट है।

मौलाना कुतुबुद्दीन रिजवी, नाजिम आला, एदारा--शरीआ

















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