बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

दाढ़ी? तुम आतंकवादी हो सकते हो!!!




बहनो! ड्रेस कोड की तलवार महज़ आप पर ही नहीं लटकती, भाई की नौकरी तक चली जाती है। तुमने दाढ़ी क्यों रखी? वामपंथी कहे जानेवाले कई कवि, पत्रकार, कथाकार और संपादक साथियों के इस सवाल से मुझे भी कई बार कोफ़्त हुई है। वरिष्ठ सहकर्मियों ने बार-बार सताया है और तंग आकर एक बड़े प्रकाशन की नौकरी मुझे छोड़नी पड़ी है। उस कमल का राज मैं नही भोग पाया। दो साल होने को आए तब से बेरोज़गार हूं। लोग कहते हैं कि नौकरी हासिल करने में  मेरी दाढ़ी बाधक है!
क्या कोई व्यक्ति अपनी पहचान के साथ या अपनी मर्ज़ी से नही रह सकता?
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र संदीप के साथ जो हुआ उसकी वाहिद वजह रही, उसकी दाढ़ी। उसकी आपबीती से आप भी रूबरू हों।-shahroz

दाढ़ी का ख़मियाज़ा
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संदीप कुमार मील


                  
अयोध्याहमेशा से इस देश के राजनीतिक गलियारों में फुटबाल की तरह उछाला जाता है। साम्प्रदायिक ताकतों ने जिस तरह से अयोध्या को लेकर अपने तुच्छ स्वार्थों की रोटी सेकी है, वो हमारे देश की धर्मनिरपेक्षता पर ही सवाल खड़ा कर देती है। अभी लिब्राहन आयोग की रिर्पोट ने फिर से इस आग को हवा देने का काम किया है। इसी वक्त संयोग से अयोध्या जाना हो गया। अयोध्या व फैजाबाद के कुछ साथी अमर शहीद अशफाक उल्ला खाँ व प. रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत पर पिछले तीन सालों से हर साल एक फिल्म समारोह का आयोजन करते आ रहे है।
अमर शहीद अशफाक उल्ला व राम प्रसाद बिस्मिल ने धर्म से ऊपर उठकर जिस प्रकार से अग्रेंजी हुकुमत से संघर्ष किया था, उसी सांझी विरासत को कायम करने और धार्मिक सौहार्द व भाईचारे को बढावा देने के लिए आयोजित तीसरे अयोध्या फिल्म उत्सव में मुझे भी जाने का सुयोग मिला।

फिल्म उत्सव के उदघाटनीय सत्र की समाप्ति के बाद मैंने दोस्तों से विवादित स्थल को देखने की इच्छा जताई । साथी गुफरान भाई ने अपनी मोटर साईकिल पर बैठाकर मुझे महंत युगलकिशोर शास्त्री जी के पास लाये और कहा कि उनका जाना ठीक नहीं है, मैं अकेला ही शास्त्री जी के किसी आदमी के साथ दर्शन कर आऊं । शास्त्री जी ने एक आदमी को मेरे साथ कर दिया कि इन्हें दर्शन करा दीजिये। मैं, गुफरान भाई और शास्त्री जी के मित्र तीनों, शास्त्री जी के घर से कुछ ही कदम चले थे, कि पीछे से दो लोगों ने आकर  हमें रोक लिया । गुफरान भाई ने अपना नाम बताया और वह फैजाबाद के रहने वाले हैं । एक व्यक्ति ने मेरी तरफ इशारा करके कहा, ‘तब तो यह जरूर कश्मीर के होंगे ।मैंने पूछा, ‘आप kaun हुए इस तरह हमारे बारे में पूछने वाले । उनका जवाबः हम इंटेलिजेंस के आदमी है।दूसरे ने तुरन्त पुछा कि , ‘तुम्हारा नाम क्या है?’जब संदीपनाम सुना तो उनका शक और गहरा हुआ । मेरी दाढ़ी में उन्हें पता नही क्या क्या दिखने लगा। कई उल्टे-पुल्टे सवाल करने लगे।

जब से दाढ़ी आयी है मुझे रखने का शौक रहा है । मगर आज अहसास हुआ कि दाढ़ी रखने से आम आदमी ही नहीं इंटेलिजेंस वाले भी शक की निगाहों से देखने लग जाते है। घर का पता , फोन नम्बर से लेकर अन्य कई जानकारियां उन्होंने मुझसे ली। काफी तलाशी ली लेकिन मेरे पास ऐसा कोई लिखित दस्तावेज  ही नहीं था कि जो उनके लिए प्रमाण बनता। 

जिस में लिखा हो कि मैं आंतकवादी नहीं हूं। तुरन्त मेरी पहचान को लेकर जांच शुरू हो गई। अयोध्या आने से लेकर ठहरने तक के स्थानों की जांच पडताल । फिर मुझे विवादित जगह पर जाने के लिए तो बोल दिया मगर इंटेलिजेंस वाले 100 कदम की दूरी पर पीछे-पीछे चल रहे थे । हर पुलिस वाला मुझे नजर गड़ाकर देख रहा था। जब विवादित जगह पहंचा तो सबकी थोड़ी- बहुत जांच हो रही थी, मगर दाढ़ी को देखकर मेरी आधा घण्टे गेट पर ही पूरी जन्मपत्री खंखाली गई। जब गेट से आगे पहुंचा तो फिर पुलिस ने मुझे एक तरफ ले जाकर पूछताछ शुरू कर दी । मेरा पर्स निकाल कर तमाम कांटेक्ट नम्बरों को सर्च किया गया और मुझे सवाल किया कि इन सब का एक ही कारण था- दाढ़ी । मेरे जेब से एक पुरानी रसीद निकली। शर्ट के साथ धुलने के कारण उस पर कुछ लकीर सी दिख रही थी। एक पुलिस वाला बोला, ’यह किसका नक्शा है।मैंने बताया कि कोई रसीद है जो शर्ट के साथ धुल गई। उस पुलिस वाले से मैंने प्रतिप्रश्न किया, ‘आखिर आप मुझे इतना चेक क्यों कर रहे है?’ उत्तर वही था कि तुम्हारी दाढ़ी है और तुम आंतकवादी हो सकते हो। जिन्दगी में पहली  बार मुझे दाढ़ी के महत्व का अहसास हो रहा था। किसी आम आदमी ने मुझसे दाढ़ी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं किया। लेकिन पुलिस ने तीन घण्टे तक एक ही सवाल में उलझाया रखा कि ये दाढ़ी क्यों है?’ अब मैं उन्हें कैसे समझाता कि भाई साहब । यह मेरा शौक है और आजाद भारत में कोई भी आदमी दाढ़ी बढा़ कर घूम सकता है।
जब विवादित ढांचे पर पंहुचा तो पण्डित भी प्रसाद देते हुए मुझे गौर से देख रहा था। प्रसाद लेकर मैं बाहर निकल रहा था कि अचानक बन्दर ने मेरे हाथ से प्रसाद छीन लिया । 
दिल में आया कि भाई बन्दर ! ये दाढ़ी भी दो-चार घण्टे के लिए तुम छीन कर ले जाओ तो इस मुसीबत से तो छुटकारा मिले। सुरक्षा के नाम पर सरकार 8 करोड़ रुपये हर महीने अयोध्या में खर्च करती है मगर वहां के विकास का स्तर देख कर सब समझ में आ जाता है। खैर, सरकार जाने, उसकी सुरक्षा जाने पर मेरी दाढ़ी पर तो कम से कम मेरा हक है कि मैं कटाऊँ या फिर बढ़ाऊँ। विवादित स्थल से बाहर निकले तो इंटेलिजेंस वाले तैयार खड़े थे, बोले, ‘अब क्या प्लान है, सब जानकारी दो।मैने कहा,‘भाई! सीधा दिल्ली जाऊंगा।
गुफरान भाई ने बताया कि स्थिति बहुत भयानक है, धर्म के ठेकेदारों के साथ-साथ पुलिस भी हिटलरशाही के रंग में रंगी हुई है। शाम को जब ट्रेन से वापस लौट रहा था तब विदा करते समय गुफरान भाई ने कहा था,‘ संदीप भाई! दाढ़ी बनवा लेना यार ..................... 


       

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गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

सलीम खान का नारी-विमर्श

सिक्के का  एक पहलू  बेशक बहुत अच्छा, चमकीला और संतोषजनक है. लेकिन जिस तरह सिक्के के दुसरे पहलू को देखे बिना यह फ़ैसला नहीं किया जा सकता है कि वह खरा है या खोटा. हमें औरत के हैसियत के बारे में कोई फ़ैसला करना भी उसी वक़्त ठीक होगा जब हम उसका दूसरा रुख़ भी ठीक से, गंभीरता से, ईमानदारी से देखें. अगर ऐसा नहीं किया और दूसरा पहलू देखे बिना कोई फ़ैसला कर लिया जाये तो नुक्सान का दायरा ख़ुद औरत से शुरू होकर समाज, व्यवस्था और पूरे विश्व तक पहुँच जायेगा.
आधुनिक वैश्विय सभ्यता में प्राचीन काल में नारी की दशा एवम् स्तिथियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप नारी की गतिशीलता अतिवादी के हत्थे चढ़ गयी. नारी को आज़ादी दी गयी, तो बिलकुल ही आजाद कर दिया गया. पुरुष से समानता दी गयी तो उसे पुरुष ही बना दिया गया. पुरुषों के कर्तव्यों का बोझ भी उस पर डाल दिया गया. उसे अधिकार बहुत दिए गए मगर उसका नारीत्व छीन कर. इस सबके बीच उसे सौभ्ग्य्वाश कुछ अच्छे अवसर भी मिले. अब यह कहा जा सकता है की पिछले डेढ़ सदी में औरत ने बहुत कुछ पाया है, बहुत तरक्की की है, बहुत सशक्त हुई है. उसे बहुत सारे अधिकार प्राप्त हुए हैं. कौमों और राष्ट्रों के उत्थान में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा है जो आज देख कर आसानी से पता चलता है.
आईये देखें सिक्के का दूसरा पहलू...

उजाले और चकाचौंध के भीतर खौफ़नाक अँधेरे

 
नारी जाति के वर्तमान उपलब्धियां- शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनैतिक सशक्तिकरण आदि यक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय और सराहनीय है. लेकिन नारी स्वयं देखे कि इन उपलब्धियों के एवज़ में नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे और मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी कीमत चुकाई है. जो कुछ कितना कुछ उसने पाया उसके बदले में उसने कितना गंवाया है. नई तहजीब की जिस राह पर वह बड़े जोश और ख़रोश से चल पड़ी- बल्कि दौड़ पड़ी है- उस पर कितने कांटे, कितने विषैले और हिंसक जीव-जंतु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने खतरे, कितने लूटेरे, कितने राहजन और कितने धूर्त मौजूद हैं.

आईये देखते हैं कि आधुनिक सभ्यता ने नारी को क्या क्या दिया

व्यापक अपमान


  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में रोज़ाना औरतों के नंगे, अध्-नंगे, बल्कि पूरे नंगे जिस्म का अपमानजनक प्रकाशन.
  • सौन्दर्य-प्रतियोगिता... अब तो विशेष अंग प्रतियोगिता भी... तथा
  • फैशन शो/ रैंप शो के कैट-वाक् में अश्लीलता का प्रदर्शन और टीवी चैनल द्वारा ग्लोबली प्रसारण
  • कारपोरेट बिज़नेस और सामान्य व्यापारियों/उत्पादकों द्वारा संचालित विज्ञापन प्रणाली में औरत का बिकाऊ नारीत्व.
  • सिनेमा टीवी के परदों पर करोडों-अरबों लोगों को औरत की अभद्र मुद्राओं में परोसे जाने वाले चल-चित्र, दिन-प्रतिदिन और रात-दिन.
  • इन्टरनेट पर पॉर्नसाइट्स. लाखों वेब-पृष्ठों पे औरत के 'इस्तेमाल' के घिनावने और बेहूदा चित्र
  • फ्रेंडशिप क्लब्स, फ़ोन सर्विस द्वारा दोस्ती.
यौन शोषण (Sexual Exploitation)
  • देह व्यापार, गेस्ट हाउसों, सितारा होटलों में अपनी 'सेवाएँ' अर्पित करने वाली संपन्न व अल्ट्रामाडर्न कॉलगर्ल्स.
  • रेड लाइट एरियाज़ में अपनी सामाजिक बेटीओं-बहनों की ख़रीद-फ़रोख्त. वेश्यालयों को समाज और क़ानून या प्रशासन की ओर से मंजूरी.
  • सेक्स-वर्कर, सेक्स-ट्रेड, सेक्स-इंडस्ट्री जैसे आधुनिक नामों से नारी-शोषण तंत्र की इज्ज़त-अफ़ज़ाई व सम्मानिकरण.
  • नाईट क्लब और डिस्कोथेक में औरतों और युवतियों के वस्त्रहीन अश्लील डांस, इसके छोटे रूप में सामाजिक संगठनों के रंगरंज कार्यक्रमों में लड़कियों के द्वारा रंगा-रंग कार्यक्रम को 'नृत्य-साधना' का नाम देकर हौसला-अफ़ज़ाई.
  • हाई-सोसाईटी गर्ल्स, बार-गर्ल्स के रूप में नारी यौवन व सौंदय्र की शर्मनाक दुर्गति.

यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)

  • फब्तियों की बेशुमार घटनाएँ.
  • छेड़खानी की असंख्य घटनाएँ, जिनकी रिपोर्ट नहीं होती. देश में सिर्फ दो वर्षों में (2005-06) 36,617 घटनाएँ.
  • कार्य-स्थल पर यौन उत्पीड़न. (Women unsafe at work place)
  • सड़कों, गलियों, बाज़ारों, दफ़्तरों, अस्पतालों, चलती कारों, दौड़ती बसों आदि में औरत असुरक्षित. (Women unsafe in the city)
  • ऑफिस में नौकरी बहाल रहने के लिए या प्रमोशन के लिए बॉस द्वारा महिला कर्मचारी का यौन शोषण
  • टीचर या ट्यूटर द्वारा छात्राओं का यौन उत्पीड़न.
  • नर्सिंग होम/अस्पतालों में मरीज़ महिलाओं का यौन-उत्पीड़न.

यौन-अपराध

  • बलात्कार- दो वर्ष की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा से- ऐसा नैतिक अपराध, जिसकी ख़बर अख़बारों में पढ़कर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.मानों किसी गाड़ी से कुचल कर कोई चुहिया मर गयी हो.
  • 'सामूहिक बलात्-दुष्कर्म' इतने आम हो गएँ हैं की समाज ने ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर पढ़-सुन कर बेहिसी और बेफ़िक्री का खुद को आदि बना लिया है.
  • युवतियों, बालिकाओं, किशोरियों का अपहरण, उनके साथ हवास्नाक ज़्यादती, सामूहिक ज्यात्दी और हत्या भी...
  • सिर्फ़ दो वर्षों (2005-06) आबुरेज़ी (बलात्कार) की 35,195 वाक़ियात. अनरिपोर्टेड घटनाएँ शायेद दस गुना ज़्यादा हों.
  • सेक्स-माफिया द्वारा औरतों के बड़े-बड़े संगठित कारोबार. यहाँ तक कि विधवा आश्रम की विधवा भी सुरक्षित नहीं.
  • विवाहित स्त्रियों का पराये मर्द से सम्बन्ध (Extra Marital Relations) इससे जुड़े अन्य अपराध हत्याएं और परिवार का टूटना-बिखरना आदि.

औरतों पर पारिवारिक यौन अत्याचार (कुटुम्बकीय व्यभिचार) व अन्य ज्यातादियाँ

  • बाप-बेटी, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते भी अपमानित.
  • आंकडों के अनुसार बलात-दुष्कर्म में लगभग पचास प्रतिशत निकट सम्बन्धी आरोपी.
  • दहेज़-सम्बन्धी अत्याचार व उत्पीड़न. जलने, हत्या कर देने आत्म-हत्या पर मजबूर कर देने, सताने, बदसुलूकी करने, मानसिक यातना देने की बेशुम्मार घटनाएँ. कई बहनों का एक साथ सामूहिक आत्महत्या दहेज़ के दानव की देन है.

कन्या भ्रूण-हत्या (Female Foeticide) और कन्या वध (Female Infanticide)

  • बच्ची का क़त्ल उसके पैदा होने से पहले माँ के पेट में ही. कारण: दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र.
  • पूर्वी भारत में एक इलाके में यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा 'फीस' के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी. कारण: वही दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र और शादी के नाकाबिले बर्दाश्त खर्चे.
  • कन्या वध के इस रिवाज़ के प्रति नारी-सम्मान के ध्वजावाहकों की उदासीनता.

समाधान:

नारी कि उपरोक्त दशा हमें सोचने पर मजबूर करती है और आत्म-ग्लानी होती है कि हम मूक-दर्शक बने बैठे हैं. यह ग्लानिपूर्ण दुखद चर्चा हमारे भारतीय समाज और आधुनिक तहज़ीब को अपनी अक्ल से तौलने के लिए तो है ही साथ ही नारी को स्वयं यह चुनना होगा कि गरीमा पूर्ण जीवन जीना है या जिल्लत से.

नारी जाति की उपरोक्त दयनीय, शोचनीय, दर्दनाक व भयावह स्थिति के किसी सफल समाधान तथा मौजूदा संस्कृति सभ्यता की मूलभूत कमजोरियों के निवारण पर गंभीरता, सूझबूझ और इमानदारी के साथ सोच-विचार और अमल करने के आव्हान के भूमिका-स्वरुप है.

लेकिन इस आव्हान से पहले संक्षेप में यह देखते चले कि नारी दुर्गति, नारी-अपमान, नारी-शोषण के समाधान अब तक किये जा रहे हैं वे क्या हैं? मौजूदा भौतिकवादी, विलास्वादी, सेकुलर (धर्म-उदासीन व ईश्वर विमुख) जीवन-व्यवस्था ने उन्हें सफल होने दिया है या असफल. क्या वास्तव में इस तहज़ीब के मूल-तत्वों में इतना दम, सामर्थ्य व सक्षमता है कि चमकते उजालों और रंग-बिरंगी तेज़ रोशनियों की बारीक परतों में लिपटे गहरे, भयावह, व्यापक और जालिम अंधेरों से नारी जाति को मुक्त करा सकें??? 

[हर लेखक या हर आम से लेकर ख़ास व्यक्ति के अपने-अपने विचार और अभियक्ति के पैमाने होते हैं.सहमती और असहमति के भी अंदाज़ और आंकलन तथा पठान-पाठन के भी अपने आग्रह-पूर्वाग्रह हैं.पाठक कृपया कर आलेख को पढने के बाद ही अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करें.फ़िज़ूल की बहस में अपना समय नष्ट न करें.समाज के निर्माण में कहीं न कहीं हमारा भी योगदान शामिल रहता है.भा सलीम का आभार लेख हमज़बान  में देने के लिए ..सं.]
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बुधवार, 16 दिसंबर 2009

आदमी को खा गयी औरत


ज़िन्दगी में आ गयी औरत

आदमी को खा गयी औरत

कौन है माँ-बाप.. भूले सब
इस तरह से छा गयी औरत

आदमी कमज़ोर है कितना
हां पता यह पा गयी औरत

चाह कर वो छूट न पाया
आ गयी फिर ना गयी औरत

रूप की ताकत समझती है.
बस यहीं उलझा गयी औरत

एक दिन जादू उतरता है
बन गयी अब माँ गयी औरत

--गिरीश पंकज

( कवि की आत्म-स्विकिर्ति मै औरतों का बहुत सम्मान करता हूँ. अच्छी औरतो से भरी है यह दुनिया. लेकिन उपर्युक्त ग़ज़ल में घरफोडू औरतो के सन्दर्भ में कुछ शेर कहने की कोशिश की गयी है. इसे स्त्री -विरोधी विचार न समझा जाये. रचना के मर्म को सुधी पाठक समझेंगे ही, ऐसा विश्वास है. )

इसी सन्दर्भ में अभी-अभी एक अखबारनवीस से बतियाते हुए ख्यात लेखिका सुधा अरोड़ा ने कहा : पुरुष हतप्रभ है ऐसी स्त्री को तो पहले कभी उसने देखा नहीं था.यह नए किस्म की स्त्री ही, जो अपने करियर के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है .माफ़ करें, यह नयी स्त्री पारिवारिक जीवन के लिए खतरा बन गयी है ...सं.

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शनिवार, 12 दिसंबर 2009

सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान



[माँ जैसा सुंदर और महत्वपूर्ण शब्द आज तक न हुआ. किसी फिल्म का संवाद मेरे पास माँ है! सब कुछ कह जाता है.यूँ तो इस विषय पर बहुत कुछ लिखा गया है और लिखा जाता रहेगा.लेकिन कवि कुलवंत सिंह की ये छंदबद्ध रचना अपनी बनावट और शिल्प में ध्यान अवश्य खींचती है.उन्हों ने हमज़बान के लिए कविता दी, आभार !-सं. ]

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कवि-परिचय

जन्म : 11 January
रूड़की, उत्तरांचल

शिक्षा :
प्राथमिक एवं माध्यमिक : करनैलगंज, गोण्डा (उ. प्र.)
उच्च शिक्षा : अभियांत्रिकी, आई आई टी रुड़की (रजत पदक एवं 3 अन्य पदक)

सृजन : निकुंज (काव्य संग्रह), परमाणु एवं विकास (अनुवाद) प्रकाशित और कण - क्षेपण (प्रकाशनाधीन)
सम्मान : काव्य, लेख, विज्ञान लेखों, विभागीय हिंदी सेवाओं के लिए विभिन्न संस्थाओं
द्वारा पुरस्कृत
संप्रति : वैज्ञानिक अधिकारी, पदार्थ संसाधन प्रभाग, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र
मुंबई - 400085
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अमृत प्यार

माँ के प्यार की महिमा का, करता हूँ गुणगान,
कभी कमी न प्यार में होती, कैसी है यह खान ।
कष्ट जन्म का सहती है, फिर भी लुटाती जान,
सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान ।

छाती से दूध पिलाती है, देती है वरदान,
पाकर आंचल की छांव, मिलता है सुख बड़ा महान।
इसके प्यार की महिमा का, कोई नही उपमान,
अपनी संतति को सुख देना ही इसका अरमान ।

अंतस्तल में भरा हुआ है, ममता का भंडार,
संतानों पे खूब लुटाती, खत्म न होता प्यार ।
ले बलाएं वह संतति की, दे खुशियों का संसार,
छू न पाए संतानों को, कष्टों का अंगार ।

दुख संतति का आंख में बहता, बन कर अश्रुधार,
हर लेती वह पीड़ा सुत की, कैसा हो विकार ।
संकट आएं कितने भारी, खुद पर ले हर बार,
भाग्य बड़े हैं जिनको मिलता, माँ का अमृत प्यार ।
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गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

खून से लिखा हुआ भी बे-असर होता है अब

[आजकल सलीम खान नामक सज्जन से ढेरों लोग नाराज़ हैं!! भाई अविनाश ने तो महल्ला से ही उन्हें खारिज कर दिया! लेकिन उनका दर्द क्या है। एक शे'र ज़ेहन में उतर ता है:

तुमको मालूम नहीं है दिल को दुखाने वाले
यह जो मज़लूम हैं आहों में असर रखते हैं!

उनकी एक मेल मिली , जिसे पढ़कर मित्र-शायर 'अन्क़ा बरयारपुरी का शे'र बरबस याद आया:

जातिगत आधार पर छपती हैं रचनाएं यहाँ
यह नहीं उम्मीद थी इस दौर के अखबार से!

इस पीड़ा से कई गुज़रे हैं.हज़ार बार गुज़रे हैं।

मैं नदीम की मेल यहाँ साभार पेश कर रहा हूँ.जबकि उन्हों ने भी पोस्ट किया है.लेकिन ये सलाह ज़रूर दूँगा कि वोह नाहक़ परीशान न हों।

खून से लिखा हुआ भी बे-असर होता है अब
आप तो यूँ ही परेशां हैं स्याही के लिए

-शहरोज़ ]




एक बार एक बकरी किसी जगह फंस गयी थी और बहुत परेशान थी तभी वहां एक शेर आ गया. उस शेर को देखकर बकरी घबरा गयी और समझ गयी कि एक तो मैं मुसीबत में मुब्तिला हूँ, मुझे एक रक्षक की ज़रुरत थी लेकिन यह तो भक्षक आ गया! लेकिन शेर जब बकरी के नज़दीक पहुंचा तो उसने बकरी से कहा कि - बहन ! मैं तुम्हारी मदद करने आया हूँ. और इस तरह से उस शेर ने उस बकरी को उस जगह से निकाल लिया और अपनी पीठ पर बैठा कर उचित स्थान पर पहुंचा दिया.

इस पूरे घटनाक्रम को दूर बैठी एक चील देख रही थी उस चील को बहुत ज़्यादा आश्चर्य हुआ. वह सोचने लगी कि एक शेर जिसे उस बकरी को खा जाना चाहिए वह उसे खाने के बजाये उसकी मदद की! वह बकरी के पास पहुंची और शेर के द्वारा की गयी मदद का कारण जानना चाहा. बकरी ने कहा- उस शेर ने मेरी मदद इसलिए की क्यूंकि एक बार उसकी शेरनी ढूधमुहें बच्चे को छोड़ कर मर गयी थी और मैंने उस के बच्चे को ढूध पिलाया था!!! उस शेर को मेरा वह एहसान याद था जिसके बदले उसने मेरी आज जान बचाई.
चील को यह सब देख और सुन कर बड़ा अजीब लगा लेकिन वह इस घटनाक्रम से बहुत प्रभावित हुई और उसने भी अब यह सोच लिया कि वह भी ऐसा ही अब करेगी...
एक बार एक खेत में नहर का बाँध टूट जाने से उसमें पानी आ गया और उसमें से बहुत से चूहे बिलों में से निकल निकल कर अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे थे। ऊँची जगह पर बैठी चील यह सब देख रही थी उसे उन चूहों पर बहुत दया आई और वह अपनी चोंच में उन्हें दबा कर ऊँची जगह पर ले आई। इस तरह से चील ने उन मरते हुए चूहों की मदद की लेकिन वे चूहे पानी में पूरी तरह भीग चुके थे, और काँप रहे थे यह देख चील ने उन्हें अपने दोनों पंखों के अन्दर ले लिया और उन्हें गर्मी देने लगी. कुछ देर में ही चूहे ठण्ड से निजात पा चुके थे. अब वह अपने स्वभावानुसार अन्दर ही अन्दर उस चील के पंख को काटने लगे और कुछ ही देर में उन्होंने उस चील को पंखहीन कर दिया.
फ़लस्वरूप चील अब उड़ने लायक़ भी नहीं रही और वहां से किसी तरह अपनी जान बचा कर उस बकरी के पास गयी और सारा माजरा सुनाया और उससे पूछा कि तुमने उस शेर पर एहसान किया था जिसके बदले में उसने तुम्हारी जान बचाई थी लेकिन मैंने उन चूहों की जान बचाई तो वे तो मेरी ही जान के दुश्मन बन गए!!!???

"एहसान भी ज़ात देख कर की जाती है"
बकरी का जवाब था

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

'लव जिहाद' कट्टर दिमाग की उपज


काफी दिनों से मैं अंतरजाल से दूर रहा. इन दिनों पुरानी मेल्स देख रहा हूँयहाँ मुझे बिहार अंजुमन नामक एक ग्रुप की मेल मिल गई.पेशे से पत्रकार और सशक्त हिन्दी कवि संजय कुंदन की इस रपट को आप लोगों के सामने लाना ज़रूरी इसलिए कि क्या ऐसा भी मुमकिन है!!!-सं.




संजय कुंदन

पिछले कुछ दिनों से केरल में विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और श्रीराम सेना इस प्रचार में जुटी ह

ै कि मुस्लिम कट्टरपंथी राज्य के मुसलमान युवकों को इस बात के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि वे हिंदू लड़कियों से प्रेम-विवाह करें और उनका धर्म परिवर्तित करें। इसके लिए इन युवकों को देश के बाहर से पैसा उपलब्ध कराया जा रहा है। केरल कैथलिक बिशप काउंसिल ने भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि न सिर्फ हिंदू लड़कियों, बल्कि ईसाई लड़कियों को भी मुसलमान बनाने की साजिश रची जा रही है, ताकि केरल में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ सके। और इसके लिए बाकायदा 'लव जिहाद' और 'रोमियो जिहाद' नामक संगठन बनाया गया है।

लेकिन इस थिअरी के जनक कौन हैं? यह थिअरी दरअसल पुलिस की है। वहां यह सारा मामला शुरू हुआ दो शादियों से। शहंशाह नामक एक मुस्लिम युवक ने एक हिंदू लड़की से शादी की और उसके एक मित्र सिराजुद्दीन ने एक ईसाई लड़की से विवाह किया। इन लड़कियों ने अपना धर्म बदल लिया। उनके अभिभावक हाईकोर्ट में गए और उन्होंने आरोप लगाया किउनकी बेटियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया है। लेकिन लड़कियों ने कोर्ट में आकर साफ कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से मजहब बदला है और वे अपने पति के साथ ही रहेंगी। इस पर कोर्ट ने उन लड़कियों को सलाह दी कि वे कुछ दिन अपने अभिभावकों के साथ रहें और उन्हें यह बात समझाएं कि उन्होंने शादी और धर्म-परिवर्तन अपनी मर्जी से किया है।

कोर्ट के निर्देश पर दोनों लड़कियां अपने मां-बाप के घर चली गईं। कुछ दिनों बाद जब वे अगली सुनवाई पर आईं तो उन्होंने कोर्ट से कहा कि वे अब अपने पति की बजाय अपने पैरंट्स के साथ ही रहेंगी। उनके इस तरह पलट जाने पर पुलिस ने 'लव जिहाद' की एक थिअरी पेश कर दी। इस पर अदालत ने डीजीपी को पूरे मामले की जांच का आदेश दिया। और जांच के बाद डीजीपी ने जो रिपोर्ट दी उसमें लव जिहाद या रोमियो जिहाद जैसी किसी संस्था या किसी ट्रेंड के अस्तित्व से इनकार किया गया। यह जरूर कहा गया कि धर्मांतरण के कुछ मामले हुए हैं, जिनकी जांच चल रही है, लेकिन यह कहना गलत है कि यह सब बाकायदा किसी योजना के तहत हो रहा है।

सच तो यह है कि इस मामले में पुलिस भी कठघरे में नजर आई। शहंशाह का आरोप है कि उसकी पत्नी के एक रिश्तेदार ने, जो एक सीनियर पुलिस अफसर हैं, लव जिहाद की कहानी गढ़ी है। उधर, कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी लव जिहाद की सचाई की जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट डीजीपी की रिपोर्ट से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। उसने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वह रिपोर्ट के कुछ वाक्यों को स्पष्ट करें। दो समुदायों के बीच विवाह केरल या कर्नाटक के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन पिछले कुछ समय से इसमें बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त नई पीढ़ी जाति या धर्म की सीमाओं को नहीं मानती। उसने इन दायरों को तोड़ा है जिसे समाज के रूढ़िवादी तत्व पचा नहीं पा रहे हैं। उन्हें मंजूर नहीं कि समुदायों और जातियों के बीच की दीवारें टूटें, उनके बीच परस्पर सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर आदान-प्रदान बढ़े। इसलिए ये दो समुदायों के बीच विवाह को रोकने पर आमादा हैं। इन्होंने इसे जिहाद से जोड़कर सनसनी फैलाने की कोशिश की है।

यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है जिस पर आसानी से लोगों को डराकर गोलबंद किया जा सकता है। अपना मकसद साधने के लिए इन्होंने तरह-तरह के दुष्प्रचार किया और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। कर्नाटक में इन्होंने आरोप लगाया कि लव जिहाद के तहत कुछ महिलाओं का अपहरण कर लिया गया है। हाल में पता चला कि उनमें से एक महिला दरअसल मोहन कुमार नामक उस शख्स का शिकार बनी है, जिसे 18 महिलाओं के कत्ल के इल्जाम में पकड़ा गया है।

आज हिंदूवादी ताकतें केरल और कर्नाटक में चिल्ला-चिल्लाकर कह रही हैं कि वे हिंदू लड़कियों को साजिश से बचाना चाहती हैं। लेकिन इन्हें हरियाणा जैसे राज्यों के उन हिंदू लड़के-लड़कियों की चिंता नहीं है, जिन्हें प्रेम विवाह करने के कारण अपने समाज की भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। हरियाणा में पिछले कुछ समय में एक ही गोत्र में विवाह के कई मामलों में या तो प्रेमी की हत्या कर दी गई या प्रेमी-प्रेमिका दोनों को मौत के घाट उतार दिया गया। राज्य में जाति या खाप पंचायतें किसी भी तरह से प्रेम विवाह को रोकने में जुटी हैं और वे इसके लिए तमाम नियम-कानूनों और मानवीयता की धज्जियां उड़ा रही हैं। लेकिन हिंदू हितों की बात करने वाले संगठन वहां चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं। जाहिर है, इन संगठनों और जाति पंचायतों में कोई खास फर्क नहीं हैं।

ये दोनों समाज में मध्यकालीन मूल्यों को बचाए रखना चाहते हैं। वैसे यह भी सच है कि इस तरह के लोग केवल एक धर्म या जाति तक सीमित नहीं हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि इस तरह का विचार रखने वाले तत्व सिर्फ धार्मिक-राजनीतिक संगठनों में ही नहीं, पुलिस-प्रशासन में भी हैं। पुलिस द्वारा मुसलमानों को आईएसआई एजेंट साबित कर देने या उनका संबंध किसी आतंकवादी गुट से जोड़ देने के कई झूठे मामले सामने आए हैं।

केरल और कर्नाटक में जिस तरह कुछ संगठनों ने कथित 'लव जिहाद' का हौवा खड़ा किया है, उससे एक बार फिर साफ हुआ कि हिंदूवादी ताकतें अपने सांप्रदायिक अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लगातार हाथ-पैर मार रही हैं, भले ही उनके तरीके अलग हों। उनका एक तबका मालेगांव और गोवा में विस्फोट कर रहा है तो दूसरा दुष्प्रचार में लगा है। संघ या बीजेपी के कुछ शीर्ष नेता भले ही कभी जिन्ना की तारीफ करके, देश के मुसलमानों की हालत पर चिंता जता करके , सेक्युलरिजम का गुणगान करके अपने उदार होने का भ्रम पैदा करें, पर सचाई यह है कि इन्होंने अपना हिंदू कार्ड छोड़ा नहीं है और इनके कार्यकर्ता मजहब के आधार पर नफरत की आग भड़काने का कहीं कोई मौका गंवाना नहीं चाहते। हैरत की बात यह है कि अक्सर इन्हीं का निशाना बनने वाला चर्च भी केरल में इनके साथ खड़ा नजर आया। यह इस बात का संकेत है कि धार्मिक संस्थाओं में असुरक्षा का भाव गहराया है और वे बदलते यथार्थ के साथ तालमेल बिठाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं।

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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

ज़िन्दगी मौत न बन जाय संभालो यारो








शहर की बोलती इबारत
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फ़िल्म जागो के बहाने





मध्य- बिहार माओवादियों की हिंसक वारदातों के कारण हमेशा चर्चा में रहता है . शेरशाह सूरी मार्ग,जिसे अब एन.एच-2 कहा जाता है पर स्थित है मध्य -बिहार का प्राचीन शहर शेरघाटी.वैदिक काल में भी इसका ज़िक्र मिलता है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं.एतिहासिक सन्दर्भ मुग़ल काल के अवश्य मिलते हैं.किव्न्दंती है कि शेरशाह ने यहाँ एक वार से शेर के दो टुकड़े किए थे। जंगलों और टापुओं से घिरे इस इलाके को तभी से शेरघाटी कहा जाने लगा.शेरशाह ने यहाँ कई मस्जिदें , जेल , कचहरी और सराय भी बनवाया था.तब ये मगध संभाग का मुख्यालय था.संभवता बिहार-विभाजन तक यही दशा रही.कालांतर में धीरे-धीरे ये ब्लाक बनकर रह गया। 1983में इसे अनुमंडल बनाया गया.मुस्लिम संतों और विद्वानों की ये स्थली रही है. वहीँ प्राचीन शिवालयों से मुखरित ऋचाएं इसके सांस्कृतिक और अद्यात्मिक कथा को दुहराती रहती हैं। १८५७ के पहले विद्रोह से गाँधी जी के '४२ के असहयोग आन्दोलन में इलाके के लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी हैं.हिन्दी साहित्य में पंडित नर्मदेश्वर पाठक,यदु नंदनराम, विजय दत्त युवाओं में प्रदीप, सुभाष और उदय आदि की सक्रियता है लेकिन उर्दु अदब यहाँ का काफी उर्वर और संग्रहणीय है। ख्वाजा अब्दुल करीम से असलम सादीपुरी , ज़हीर tishna,सिराज शम्सी से आज के नुमान -उल -हक ,फर्दुल हसन तक लम्बी फेहरिस्त है.शहर से लगे हमजापुर में भी कई नामवर शायर-अदीब रहते हैं।

जब हम चड्डी पकड़ कर दौड़ा करते थे तो रिक्शे के पीछे चिपकी रंगीन तस्वीरें आकर्षण थीं.और ये रिक्शा कस्बे की पहली टाकीज भूषन का रहता.कुछ ही दिनों बाद ये हाल बंद हो गया.टूरिंग सिनेमा हाल के नाम पर बने राजहाल को तीन दशक हुए होंगे, करीब इतना ही कमोबेश यहाँ मंचित हुए किसी नाटक को हुआ.इप्टा यहाँ कभी सक्रीय नहीं रहा , न ही रामलीलाओं की ही परम्परा रही है.लेकिन ऐसी पृष्ठभुमी में भी कई प्रतिभाएं ऐसी हैं जो न सिर्फ़ चमत्कृत करती हैं बल्कि लबरेज़ अपनी संभावनाओं से अग्रिम पंक्ति में खड़े सूरमाओं को ललकारती भी हैं.इमरान अली भी इसमें एक hain .इक्कीसवीं सदी के इस उपभोक्तावादी दौर में आपादमस्तक समाज के लिए प्रतिबद्ध होना, निसंदेह जिंदादिली का काम है.इमरान में ऐसी ही खूबी है.स्थानीय समाचार चैनलों के लिए काम कर चुके सक्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता इमरान ने -जागो का निर्देशन कर अपनी तमन्ना को श्रम के बूते साकार किया, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने मिशन में सफल रहा यह युवा फिलहाल बहुरुप्या और शेरघाटी -गाथा नामक दो फिल्मों के लिए काम कर रहा है ।

दो शब्दों का युग्म जागो जहाँ आकर्षक और मोहक भी है वहीँ इस शब्द में उसकी गंभीरता भी निहित है। आम से लगते इस शब्द का इस फ़िल्म में निर्णायक अर्थों में इस्तेमाल हुआ है ।


ग्रामीण कस्बाई परिवेश और उसमें तीन स्कूली बच्चों के अपहरण के मामले से शुरू हुई यह फ़िल्म भ्रष्ट ,लचर प्रशासन , और आम-जन की असहाय स्थिति को सामने लाती है। यह बताती है कि अपराधियों की राजनीतिज्ञों के संग की जुगलबंदी किस तरह समाज के ताने-बाने को भंग कर रही है । स्थानिय बोली-भाषा में बनी इस फ़िल्म का विषय भले बिहार जैसे प्रांत के लिए चिर-परिचित हो लेकिन इसकी प्रस्तुति यह प्रश्न अवश्य खड़ा करती है कि आख़िर कब-तक यह सब देखा और सहा जायगा ?उपभोक्तावादी संस्कृति के रोज़ हावी होते जाने और असमानता की खाई चौड़ी से चौड़ी होते जाने के चलते समाज में उपजी रोजी-रोटी की हताशा और कही जाति तो कहीं वर्ग संघर्ष । और बेकार नवजवानों को प्रलोभन देकर अपराध के बीहड़ में उतार देना--संघर्ष नित्य नए आयाम ले रहा है.फ़िल्म की विशेषता स्थानीय कलाकारों (नवीन सिंह ,जे.पी.पाटली , विष्णुदेव प्रजापति , अमृत अग्रवाल , कंचन गुप्ता,कुंजन कुमार सिन्हा , रामस्वरूप स्वर्णकार, नवीन सिन्हा वंदना,चंद्रभूशन , सचिदानंद ठाकुर ),पत्रकारों (एस.अहमद, एस.के.उल्लाह, कौशलेन्द्र कुमार, मुहम्मद अली बैदावी, ), राजनेताओं (सुशील गुप्ता ,अजित सिंह , शाहिद इमाम ,लखन पासवान ) और कलमकारों (रज़ा शेरघाटवी , रामचंद्र यादव,नुमान-उल-हक,हिलाल हमज़ापुरी, इश्राक़ हमज़ापुरी ,समी-उर रहमान ) के अभिनय से और बढ़ गई है.यूँ तो भोजपुरी फिल्मों के धर्मेन्द्र यादव, बांगला रंगमंच के संजू और वालीवुड के अली खान जैसे नामचीनों ने भी अभिनीत पात्रों को जीवंत किया है.लेकिन बाल कलाकारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति हर फ्रेम में बरक़रार राखी है।

फ़िल्म अंत में यह संदेश अवश्य देती है कि अपराध को धर्म और जाति के खाने से हरगिज़ न देखा जाय। मौजूदा हालत के मद्देनज़र फ़िल्म सरफ़रोश के मशहूर गीत ज़िन्दगी मौत बन जाय , संभालो यारो....का इस्तेमाल बेहद सामयिक और महत्वपूर्ण हो जाता है.फ़िल्म में घटनाओं और स्थितियों का क्रमिक दृश्यांकन बहुत सहज लगता है। निर्देशक का श्रम बाल-कलाकारों अनम इमरान , सादिया एमाला और गौरव गुप्ता के अभिनय में कमाल होकर मुखर होता है.शेरघाटी के सिनेतिहास की इस पहली टेली -फ़िल्म में उर्दू के चर्चित शायर नदीम जाफरी aur लेखक- रंगकर्मी विजय दत्त ने भावप्रवण अभिनय किया है.


साजसज्जा ,संगीत और दूसरे पहलुओं में इतनी बारीकी और, भव्यता न बरती गई है.बावजूद व्यवसायिक फूहड़ता से फ़िल्म कोसों दूर है.फ़िल्म में संगीत पटना दूरदर्शन के कलाकार राजू लहरी ने और गया घराने के शास्त्रीय गायक राजेन्द्र सिजुवार ने प्रात: अलाप को स्वर दिया है।
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रविवार, 1 नवंबर 2009

जागो ...

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जागो-2

जागो-2

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जागो-3

जागो-3
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बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

जागो-४

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जागो- फ़िल्म ५

जागो- फ़िल्म -5


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गुरुवार, 8 जनवरी 2009

गुंजेश के मार्फ़त छाले की कथा.......




बीसवीं सदी की कहानियों का कई खंडों में संचयन करने के कारण चर्चित हुए, महेश दर्पण बहुत ही सुघड़ कथाकार भी हैं.गुन्जेश की कहानी पढ़ते हुए मुझे अनायास ही उनकी याद आ गयी.उनके कथा-तत्त्व भी कुछ इसी तरह के होते हैं.बिलकुल जाने हुए.लेकिन क्या ये कहानी भी हो सकती है , अक्सर लोग नज़र अंदाज़ कर जाते हैं.ऐसे कथा-लेखक नितांत साधारण लगने वाली असाधारण कहानी लिख रहे हैं.कमलेश्वर जी की कल्पना परिकथा के बीते सितम्बर-अक्टूबर अंक में गुन्जेश की ये कहानी शाया हुई थी.इस युवतर रचनाकार में असीम संभावनाएं हैं, ये कहानी तस्दीक करती है.सबसे खूबसूरत पहलू , शैली की सरलता और ज़बान की सहजता है .कोई बनाओ-सिंगार नहीं.हम जैसा बोलते हैं, उसी अंदाज़ में छाले का क़िस्सा भी सुनते जाते हैं।

कहानी पाठ के लिए कृपा कर क्लिक ज़रूर करें.









इस युवा साथी ने अंतरजाल पर भी इक घोंसला बनाया था, जहां वो गाहे-बगाहे अपनी चिंता और सरोकार के साथ कलम की जुगलबंदी किया करते थे.लेकिन उनका ये आशियाना अब खुद इनकी पहुँच से बाहर हो गया है.आप का प्रवेश वर्जित नहीं है.दर असल वो अपना कूटशब्द ही भूल गए .भूलने वाली बड़ों की बिमारी इन्हें भी होनी लाहक़ थी.खैर, इनका नया ठिकाना अभी-अभी बना है। यहाँ आप भी जाएँ.




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सोमवार, 5 जनवरी 2009

कविता को लेकर फ़िरदौस भूल जाना चाहता है सुधांशु को.......


कविता का नया प्रेमी : सुधांशु फ़िरदौस


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कभी आपने कैलाश वाजपई की कविताओं को पढ़ा है.रहीम, खुसरो , जायसी और नानक के दोहों के साथ उतरे-डूबे हैं.यदि ऐसी पृष्ठ भूमि में मुक्तिबोध और निराला के दिग्दर्शन हो जाएँ तो है न कमाल! बंधुओं मैं उस कविता की बात कर रहा हूँ जिसे भाई सुधांशु फिरदौस ने अपनी ज़िंदगी बना ली है.अजब किस्म की बेचैनी मुझे उनके यहाँ मिलती है. उन्हें किसी तरह का कोई गुमान नहीं है.उनका बस विश्वास है बात बोलेगी हम नहीं । २ जनवरी १९८५ को निराला के समकालीनों में से वाहिद दुर्लभ रहे जानकी वल्लभ शास्त्री के शहर मुजफ्फरपुर में जन्मे सुधांशु ने बी.एच.यु. से गणित में स्नातक किया और फिलवक्त जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम्-एस-सी(टेक)कर रहे हैं.ख़ुद के बारे में ये युवा कवि कहता है:
.... कुछ ऐसा नहीं कि छुपाया जाये कुछ ऐसा भी खास नहीं कि बताया जाये...मेरे मित्र कहते है बोलने के प्रवाह मे बहुत ज्यादा बोल जाता हूँ और जब चुप होता हूँ तो उतना ही मौन.... आजकल, ज्ञानेन्द्रपति और तालस्ताय को पढ़ रहा हूँ...

अब आप उनकी ताज़ा रचना से रूबरू हों:
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चाह्ता
भूल जाऊं
उस प्यार को
जो किया था,तुमसे
सलामत नहीं वह भी
ज़माने की नजरों से,
इस समय कुछ-कुछ
मेरी दाढ़ी की तरह


चाहता
भूल जाऊं
बाटला हाउस की सुबह
जब सुनी थी
न सुनी जाने वाली आवाजें
देखी थी,
लोगों के चेहरे पे मौत सी चुप्पी!!

चाहता
भूल जाऊं
अखबार के पन्ने को
जिसमे छपी थी खबर
-"करोलबाग मे
गरीबी से तंग आकर
एक औरत पंखे से झूल गयी

चाहता
भूलजाऊं
साईनाथ की रिपोर्ट : इस
साल मे सोलह हजारसे
अधिक किसानो ने आत्महत्या की

चाहता
भूल जाऊँ
खबरिया चैनलों पर दीख रहे
ताज से निकलते धुएँ
जो राजनीति के रंग से लाल,
भगवा होते हुए
सुबह न जाने
किस रंग मे बदल जाये...

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ख़बर का असर

भड़ास! नाम का एक ब्लॉग है और काफ़ी चर्चित भी.जिस किसी ने ये नाम रक्खा है कितना मौजूं है.दरअसल हम सब यहाँ अपनी-अपनी भड़ास ही तो निकालते हैं.जब कोई मंच न रह गया हो और अधिकाँश पत्र-पत्रिकाएं और चैनलों की रहबरी बाज़ार करे तो ये गूगेल महाराज की कृपा से ब्लॉग अच्छा माध्यम बन जाता है.कभी लघु-पत्रिकाओं ने अच्छा वैकल्पिक मंच उपलब्ध कराया था।
खैर। पिछले दिनों जब खुशबू की चर्चा करते समय उनकी अनदेखी किए जाने का सवाल उठाया था तो कहीं अंतरे-कोने में भी किंचित ये भान-गुमान न था कि लोग इस और ध्यान देंगे.लेकिन हमज़बान के बाद साप्ताहिक के बाद अब मासिक आवृति में प्रकाशित हो रही पत्रिका आउटलुक , नवम्बर २००८ का अंक देख कर अच्छा लगा.संपादक नीलाभ मिश्र ने अपना स्तम्भ खुशबू को ही केन्द्र में रख कर लिख रक्खा था.इसी अरसे में इंडिया टुडे (हिन्दी) के असोसिएट कॉपी एडिटर सुदीप ठाकुर का फ़ोन आ गया.भाई, खुशबू का नम्बर दो!! टुडे के विशेष अंक में उन पर स्टोरी करनी है.हमज़बान पर खुशबू के बारे में पढ़ा। मैं उनका फोन नम्बर कहीं नोट नहीं कर पाया था.तुंरत पत्रकार-मित्र उर्दू दैनिक हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के ब्यूरो- चीफ शिबली ने घंटे भर के अन्दर परेशानी दूर की और हमने इस तरह सुदीप जी को खुशबू का, उनके घर का फोन नम्बर मुहैय्या करा दिया.इंडिया टुडे के २६ नवम्बर के विशेषांक में आप चाँद को चूमती कामयाबी शीर्षक कथा -आलेख पृष्ठ २४ पर पढ़ सकते हैं.
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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)