बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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शुक्रवार, 25 जून 2010

चम्बल के बीहड़ ...ज़िंदगी के रेतीले सफ़र





 







शाह आलम की क़लम से












 






बीहड़ कभी भी अपनी जगह नहीं बदलते पर बदल गए हैं बीहड़ों के रास्ते और उनकी उम्मीदें ! उम्मीदों पर ग्रहण है तो आशाओ पर पानी की गहरी धार.जिसमे से बिना सहारे के निकलना बीहड़ों के खातिर चुनौती भी है और जरुरी भी.कभी बीहड़ो की ओर रुख कीजिये तो उपेक्षा ही नज़र आएगी .
डकैतों के खात्मे के बाद विकास के नाम पर अरबों रुपयें मिले पर विकास आज भी उनसे मीलों  दूर है . रहन- सहन आदिम युग  का है .अपराधी यही पनपते है और भोगोलिक परिस्थितियाँ   उनका साथ देती है.बीहड़ मैं दस्यु समस्या अभी भी मुह फैलाये  खड़ी है.कभी पुलिस का आरोप तो कभी डकैतों  की  कारगुजारियो का दंश. शायद  यही बीहड़  का दुर्भाग्य बन गया है. विकास की बातों पर  ग़ौर  करें विकास में बीहड़ उपेक्षीत    है. क्योंकि विकास का पैकज  बुंदेलखंड के हिस्से में जाता  है और यहाँ विकास के दावे तक का अपहरण तरह-तरह के झंडे वालों द्वारा किया जाता रहा है. स्थानीय  नेता भी बीहड़ो का रुख नहीं करना चाहते,लिहाजा उनको बीहड़ो का दर्द नहीं  समझ  आता. बीहड़ के गावों के  विकास की खातिर " खेत का पानी खेत में और गाँव का पानी तालाब में " साथ ही अनेक भूमि सुधार  योजनाओ का लाभ महज  उन्ही जगहों  पर हुआ है जहाँ आला अधिकारियो  का दौरा  कराया जाना है ,बाकि के किसानो  के हाथ खाली ही रहे  हैं. बीहड़वासियों    के बूढी आँखों  में विकास के सपने तो पलते है पर हकीकत का रूप लेने से पहले ही  कईयों आँखें  बंद हो चुकी हैं उम्मीदों  पर ग्रहण है तो भविष्य गर्त में नज़र आता है. विकास के ठेकेदार रसूख वाले बन बेठे हैं. जिनको विकास के नाम पर हर पांच  साल बाद वोट लेना है. उन्हें इस बात से कुछ लेना देना नहीं है कि विकास की जमीनी  हकीकत क्या है ? कभी कोई बीहड़ो का रुख करता भी हैं तो बंजरो में कटीली झाड़ियो के बीच फिर से खुद को न उलझने का जज्बा लेकर जाता है. खबरिया संस्थाओं के लिए बीहड़  जभी खबर बनता है जब गोलियां चले तोप दागे जाएँ......उन्हें यहाँ दम तोड़ती..कोई बुधिया या तिल तिल दाने को तरसते लोग किसी प्रेमचंद कालीन उपन्यास के पात्र लगते हैं.






 











भोगोलिक परिस्थितियाँ  दस्यु समस्या के लिए ज्यादा जिम्मेदार रही हैं. डकैतों की भूमि  तो पहले भी चम्बल रहा है. बात करीब १९२० के आसपास की हैं जब ब्रह्मचारी  डकैत ने डकैती छोडकर आज़ादी के समर में कूदा था, पर  आज़ादी के इतिहास के समरगाथा से ब्रह्मचारी  डकैत  गायब हैं.बीहड़ न सिर्फ विकास में बल्कि इतिहास में भी उपेक्षा झेलता आया है. आज बीहड़ की पहचान उसकी बदनामी से ही होती है. निर्भेय गुर्जर,फक्कड़ ,कुशमा ,रज्जन ,जगजीवन आदि ऐसे नाम रहे
हैं जिन्होंने अपने दस्यु जीवन में बीहड़ों को अपने खौफ से उबरने दिया वहीँ दस्यु  सुन्दरी  सीमा परिहार के भाग्य का निर्णय मुम्बैया फ़िल्मी बाजार  तय नहीं कर सका.

बीहड़ में अवाम का सिनेमा

आज बीहड़ों का कसूर    क्या है ? क्या इस पर बदनुमा दाग बरकरार रहेगा ? या फिर सहयोग की खातिर हाँथ  बढाने में कोई झिझक है ! हमारा मानना है कि बीहड़ों का शानदार इतिहास दुनिया के सामने आये न कि इसका बदनुमा अतीत. बीहड़ो में कुछ दर्द है कुछ शिकायत हैं कुछ अपनापन है तो  कुछ पाने कि हसरत भी इन  बीहड़ों में छीपी है . बीहड़ों की  रवानी को दुनिया के सामने लाने की  हसरत ही फिल्म उत्सव आयोजन का मकसद बनी . उम्मीदों से परे यह फिल्म उत्सव उन बीहड़ गावो में आयोजित हुआ जो दस्युओ  से प्रभावित  रहे हैं. मार्च में औरैया, इटावा, मालवा, अम्बेडकर नगर, मऊ में फिल्म उत्सव का आयोजन किया गया . जिसमे खास तौर से जन सरोकारों पर केन्द्रित युवा फिल्मकारों की फिल्मो का प्रदर्शन करउन्हें प्रोत्साहन देना है. "अवाम का सिनेमा " के माध्यम से आम जन संवाद हो  . इसी क्रम में देश में फिल्म के बहाने युवा प्रतिरोध को स्वर दे सकेंगे , उम्मीद दिखती है.















सभी चित्र  शाह आलम द्वारा उपलब्ध.

 [ लेखक-परिचय :शाह आलम बस्ती जिले के रहने वाले हैं।
शिक्षा : समाज कार्य [social work]  में एम ए किया। 
फैजाबाद में विभिन्न सामाजिक कार्यों में संलग्न रहे। उसके बाद दिल्ली आ गए।
सम्प्रति :जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम फिल कर रहे हैं।]

साभार रंगनाथ सिंह का बना रहे बनारस 
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