नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों और दलितों को उनकी ज़मीन से बेदखल करने के लिए सरकार ने कमर कस ली है और इसके लिए बजाप्ता सेना की मदद ली जा रही है.इसे ग्रीन हंट नाम दिया गया है.अंग्रेज़ी की एक लेखिका और इधर एक्टिविस्ट के नाते ज़्यादा चर्चित अरुंधती राय की एक
पत्रिका में छपी रपट को पढने के बाद वेब पत्रिका
रविवार में पिछले वर्ष की शुरुआत में प्रकाशित छत्तीसगढ़ के जुझारू-प्रतिबद्ध पत्रकार साथी
आलोक प्रकाश पुतुल की इस आँखिन-देखी रिपोर्ताज को पढना सकते में डाल देता है.लेकिन आज स्थिति जितनी भयावह दिखती है कल इस से किसी भी मायने में कम नहीं थी खौफनाक!
लेकिन सवाल अब भी ज्यों का त्यों है कि आखिर इन मासूम आदिवासियों की गलती क्या है?
साहित्य में दखल रखने वाले जैसा वह खुद को मानते हैं छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन का यह कहना कि सब झूठ है तो सच क्या है?
और सच यह नहीं कि बेक़सूर आदिवासियों को पूँजी के खेल में लाश और हथियार बनाया जा रहा है.
यहाँ हम उस लम्बी रपट का सिर्फ कुछ अंश दे रहे हैं उनके आभार सहित जिसमें उस आश्रम और उसके संचालक नारायण राव का ज़िक्र है जो इसी महीने आश्रम के बच्चों को बेचने के आरोप में अब जेल में है..माडरेटर
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अथः बस्तर वध कथा
आलोक प्रकाश पुतुल की क़लम से
सुकमा में खबर मिलती है कि दोरनापाल राहत शिविर में लोगों को खाने के लिए चावल नहीं मिल रहा है. घंटे भर बाद ही खबर मिलती है कि दोरनापाल नदी रोड पर एक घर में चावल छुपा कर रखा गया है. उसे उड़ीसा के व्यापारी को बेचा जाना है.
दोरनापाल के बिज्जे कहते हैं- “ हमलोगों ने पुलिस को खबर दी है और पुलिस ने एक घर से 100 बोरा चावल जब्त किया है. सलवा जुड़ूम कैंपों में राहत के नाम पर यही हो रहा है और हर ओर केवल बंदरबांट चल रही है.”
लेकिन पुलिस औऱ सलवा जुड़ूम समर्थकों के रहमो करम पर जीने वाले लोग इन सबके बारे में बात करने से बचते हैं. बांस की खमाचियों से टोकरी बनाने में व्यस्त माड़वी उंगा बार-बार पूछने के बाद भी अपनी नज़र नहीं उठाते. फिर आहिस्ता से कहते हैं- “ यहां सब अच्छा है. खराब होगा तो भी आप क्या कर लेंगे.”
कैंपों में रह रहे आदिवासियों के लिए हाथकरघा वस्त्र बुनाई हेतु करघे (लूम) प्रदान किये गये थे लेकिन हाथकरघा विभाग के उप संचालक की राय में सारे लूम बेहद खराब क्वालिटी के थे. फिलहाल इस खराब लूम के वितरण को लेकर जांच चल रही है.
पिछले कुछ समय से नक्सल मुद्दों पर काम कर रहे रायपुर के एक वरिष्ठ पत्रकार इस तरह की जांच को गैरजरुरी बताते हुए कहते हैं- “ ऐसे सैकड़ों मामले बस्तर में हैं, जिन्हें जांच के नाम पर रफा-दफा कर दिया जाता है. सरकार अगर राहत शिविरों में परेशानियों को लेकर जांच करना चाहती है तो सबसे पहले उसे कैंपों में आदिवासियों को उपमानव की तरह रखे जाने और उनके हर तरह के शोषण को लेकर जांच करनी चाहिए. अन्यथा मन और देह से टूटे आदिवासियों को अपनी ओर खिंचने में लगे नक्सलियों का काम और भी सरल हो जाएगा.”
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि कैंपों में महिलाओं का शारीरिक शोषण होता है और उनके साथ मारपीट की जाती है. इसके अलावा कई कम उम्र लड़कियों के गर्भवती होने पर सलवा जुड़ूम समर्थकों और एसपीओ द्वारा उनका गर्भपात भी कराया गया है.
योजना आयोग की एक टीम और ह्युमन राइट्स वॉच ने बस्तर के इलाकों में दौरा करने के बाद माना कि सलवा जुड़ूम हत्या, आगजनी और बलात्कार की घटनाओं में शामिल है. |
लेकिन पुलिस थानों में ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं है. जाहिर है, राहत शिविरों में पुलिस से घिरे आदिवासी किसी पत्रकार के सामने भी अपना मुंह नहीं खोलते क्योंकि उन्हें इन्हीं एसपीओ, सलवा जुड़ूम के नेताओं और पुलिस के घेरे में रहना है. आखिर वे जाएं भी तो कहां जाएं. सब जगह तो एक जैसा हाल है.
अथः बस्तर वध कथा
दो
कोंटा में दक्षिण की ओर जैसे-जैसे आप बढ़ेंगे, विकास के सारे दृश्य कमज़ोर पड़ते चले जाते हैं. सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा... और दिल्ली में बैठी सरकार जिन मूलभुत सुविधाओं की बात करती है, उसका सच इन इलाकों में बेहतर समझा जा सकता है, जहां या तो पुलिस आती है या नक्सली. सुकमा हो या कोंटा, इंजरम हो या दोरनापाल, इन इलाकों में विकास की कहानी एक जैसी है. और कोंटा ही क्यों बीजापुर के गंगालूर से लेकर बासागुड़ा तक हालात एक जैसे हैं. सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद इन इलाकों में जीवन की संभावनाएं ही खत्म कर दी गयीं.
सरकारी आंकड़ों की मानें तो जून 2005 में नक्सलियों से मुकाबले के लिए जब सलवा जुड़ूम अभियान चलाया गया तो दंतेवाड़ा के 1220 गांवों में से आधे से अधिक कुल 644 गांव खाली करा लिये गये. 82 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाले इस इलाके के 455 गांवों में केवल आदिवासी बसते हैं, उसके अलावा 458 गांवों में भी 90 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की ही है. केवल 76 गांव ऐसे हैं, जिनमें आदिवासी जनसंख्या 50 प्रतिशत से कम है. सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद दंतेवाड़ा-बीजापुर के आदिवासी गांव चुन-चुन कर निशाना बनाये गये.
भारत के इतिहास में पहली बार बस्तर के आदिवासियों को उनके गांव से बेदखल किया गया. सलवा जुड़ूम चलाने वालों ने गांव खाली कराने के लिए लोगों के घर लूटे, उनमें आग लगा दी, लोगों को मारा-पीटा. यहां तक की लोगों की हत्यायें भी की. यह सिलसिला गांव से लेकर सरकार द्वारा बसाये गये कैंपों तक चला. पहले गांवों में सलवा जुड़ूम, एसपीओ और पुलिस का कहर और फिर सरकारी राहत शिविरों में भी इनका आतंक.
बलात्कार, आगजनी और हत्या की खबरों के बाद नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने दिसंबर 2007 में एक जांच दल दंतेवाड़ी भेजी. दल में शामिल प्रोफेसर शांता सिन्हा, भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे एम लिंगदोह और वैंकट रेड्डी ने अपने गांवों से विस्थापित लोगों के लिए बनाए गए सरकारी कैंपों के अलावा चेरला ल किरंदुल में आयोजित जन सुनवाई में भी भाग लिया.
इस जांच दल की रिपोर्ट कहती है-“कई लोगों ने सलवा जुड़ूम के लोगों द्वारा अपने परिजनों की हत्या और महिलाओं के साथ बलात्कार की बातें साझा की. उसी तरह सलवा जुड़ूम का प्रतिरोध करने वाले कई लोगों के परिजनों को मार डाला गया.”
2008 में योजना आयोग की एक टीम और ह्युमन राइट्स वॉच ने बस्तर के इलाकों में दौरा करने के बाद माना कि सलवा जुड़ूम हत्या, आगजनी और बलात्कार की घटनाओं में शामिल है. सलवा जुड़ूम से संबद्ध लोग हथियारबंद तरीके से जो कुछ कर रहे हैं, उससे नकस्ली समस्या से नहीं निपटा जा सकता. योजना आयोग और ह्युमन राइट्स वॉच के सदस्यों ने स्पेशल पुलिस फोर्स के नाम पर बच्चों को हथियार थमाए जाने पर भी गहरी चिंता जताई.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी माना कि बड़ी संख्या में सलवा जुड़ूम के लोगों ने आदिवासियों को जबरदस्ती कैंपों में रहने या फिर अपने गांवों से भाग कर जंगल या आंध्र के इलाकों में भागने के लिए मजबूर कर दिया. आयोग के अनुसार जिन गांवों में सलवा जुड़ूम की बैठकें हुई, वहां बैठक से पहले ही गांव वाले जंगलों में या पड़ोसी इलाके में भाग गए.
आयोग के अनुसार “जिन स्थानों पर गांव वालों ने विरोध किया, वहां सलवा जुड़ूम के लोगों ने लोगों को मारने और घरों को जलाने जैसे वारदात किए. जिन लोगों ने सलवा जुड़ूम का समर्थन नहीं किया, उन पर नक्सली होने का आरोप मढ़ दिया गया.”
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अथः बस्तर वध कथा
तीन
सरकारी आंकड़ों की मानें तो जब बस्तर में सलवा जुड़ूम शुरु हुआ तो सरकार ने 23 राहत शिविर बनाये जिनमें 19766 परिवारों के 56 हजार 925 लोगों को रखा गया. पुलिस अधिकारी बताते हैं कि इन राहत शिविरों से लोगों का आना-जाना लगा रहता है, इसलिए इनकी वर्तमान में ठीक-ठीक संख्या बता पाना मुश्किल है. राज्य सरकार ने दसवीं कक्षा के लिये तैयार किये गये समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में नक्सल समस्या पर भी एक चैप्टर रखा है. इस चैप्टर के अनुसार सरकार द्वारा चलाये जा रहे राहत शिविरों में 70 हजार लोग रखे गये हैं.
हालांकि राज्य के मानवाधिकार संगठन और इस इलाके में सक्रिय कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं का दावा है कि इन शिविरों में सरकारी आंकड़ों से आधे लोग भी नहीं रहते और इनके नाम पर केवल सरकारी राशन की बंदरबांट होती है. सरकारी राहत शिविर में रहने वालों के नाम पर केवल सुविधायें ली जाती हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता दंतेवाड़ा में आदिवासी आबाजी के आंकड़ों को ही शक के दायरे में रखते हैं. उनका सवाल है कि 7.91 लाख की आबादी वाले दंतेवाड़ा-बीजापुर के आधे से अधिक गांव खाली करा लिये गये. यानी आधी से अधिक आबादी गांवों से निर्वासित होने को मज़बूर हुई. ऐसे में सवाल यही उठता है कि सरकारी कैंपों में रहने वाले 56 हजार 925 के अलावा लाखों दूसरे आदिवासी कहां गये ?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक जांच दल की रिपोर्ट कहती है- “ बड़ी संख्या में लोग लापता है. उनके बारे में स्पष्ट नहीं है कि वे नक्सलियों के साथ मिल गये, जंगलों में छुप गये, छत्तीसगढ़ से बाहर भाग गये या कि फिर वे मारे गये.”
हालांकि फोरम फॉर फैक्ट फाइंडिग डाक्यूमेंटेशन एंड एडवोकेसी के सुभाष महापात्रा सलवा जुड़ूम को गैरजरुरी मानते हुए पूछते हैं- “ सरकार ने जिस नक्सली हिंसा को खत्म करने के नाम पर सलवा जुड़ूम की शुरुवात की क्या उस पर कोई काबू पाया जा सका ?”
जाहिर है, सुभाष के सवाल का जवाब नहीं में है. सरकार ने सलवा जुड़ूम की शुरुवात भले नक्सलियों से मुकाबले के नाम पर की हो लेकिन सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद से बस्तर के इलाके में नक्सली वारदात में बेतहाशा वृद्धि हुई है. जबकि इसकी तुलना में नक्सलवादियों का गढ़ समझे जाने वाले आंध्र प्रदेश में हताहतों की तादाद में काफी कमी आई है. 2003 में आंध्र में 577 नक्सली घटनाएं हुई थीं, जिनमें 140 लोगों की जानें गई थीं. 2007 में घटनाओं की संख्या घटकर 138 हो चुकी थी और मरने वालों की तादाद भी 45 रह गई थी. लेकिन छत्तीसगढ़ में हालात सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ते चले गये. 2003 में यहां केवल 256 नक्सली वारदातों में 74 लोगों की जान गई थी. लेकिन 2007 में नक्सलियो ने 582 वारदात को अंजाम दिया, जिनमें कम से कम 369 लोग मारे गये.
राज्य के गृहमंत्री ननकी राम कंवर के अनुसार एक अप्रैल 2007 से 15 जनवरी 2009 तक नक्सलियों ने कुल 1190 वारदातों को अंजाम दिया है और इन दो सालों में नक्सलियों ने 277 नागरिकों समेत 480 लोगों की हत्या की है. इनमें 49 विशेष पुलिस अधिकारी और 154 पुलिसकर्मी हैं. उनका दावा है कि पिछले एक साल में ही पुलिस ने 82 नक्सलियों को मार गिराया है. हालांकि इनमें से एक तिहाई मामले ऐसे हैं, जिन्हें मानवाधिकार संगठन फर्जी मुठभेड़ मानते हैं और जिनसे संबंधित मामले उच्च न्यायालय में हैं.
सुभाष माहापात्रा चिंता जताते हुए कहते हैं कि बस्तर में यह आदिवासियों का एक ऐसा जनसंहार है, जिसमें आदिवासी ही आदिवासी के दुश्मन बने. कई मामलों में बस्तर में पुलिस और एसपीओ ने सलवा जुड़ूम का साथ नहीं देने वालों को फर्जी मुठभेड़ में मार डाला.
सुभाष के अनुसार सरकारी राहत शिविरों में रहने वाले नौजवान आदिवासियों ने नक्सलियों से नाराज हो कर या रोजगार की उम्मीद में सरकार का हाथ थामा और सरकार ने बड़ी संख्या में ऐसे नौजवानों को बंदूक थमा दी. इन्हें ओहदा दिया गया विशेष पुलिस अधिकारी यानी एसपीओ का. ये आदिवासी अकुशल मज़दूरों से भी काफी कम 1500 रुपये की मासिक पगार पर सलवा जुड़ूम चलाने वालों के लिये ऐसे मोहरे बने, जिन्हें लगातार अपनी जान गंवानी पड़ी.
आश्चर्य नहीं कि रोजगार की तलाश में सरकार का हाथ थामने वाले इन एसपीओ ने इन सरकारी कैंपों और आसपास के इलाकों में अपनी सत्ता कायम कर ली और अपने तरीके से कानून की नयी परिभाषा गढ़ी. इन कैंप और इलाकों में इनका जंगल राज कायम हो गया. हालांकि राज्य के गृहमंत्री ननकी राम कंवर इस बात से इंकार करते हैं कि एसपीओ ने किसी तरह से कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश की है.
लेकिन सरकारी आंकड़े ही उनकी पोल खोलते नजर आते हैं. भर्ती किये गये लगभग आधे एसपीओ को तो सरकार ने गंभीर आरोपों के कारण बर्खास्त किया है. गृह विभाग के आंकड़ों के अनुसार दंतेवाड़ा में कुल 3800 एसपीओ की भर्ती की गई. लेकिन इनमें से अधिकांश ने मनमाने तरीके से अपने पद औऱ अधिकार का दुरुपयोग किया. दर्जन भर एसपीओ तो अब भी जेल में हैं.
लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सरकार एक बार फिर नये सिरे से एसपीओ की भर्ती करने की योजना पर काम कर रही है. सलवा जुड़ूम समर्थक नये सिरे से अभियान शुरु करने की तैयारी में जुटे हैं. राज्य के पुलिस महकमे में भी नये सिरे से योजनायें तैयार हो रही हैं और सलवा जुड़ूम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दुहराते हुए राज्य के गृहमंत्री ननकी राम कंवर कहते हैं- जो सलवा जुड़ूम के साथ नहीं हैं, वे नक्सलियों के साथ हैं.
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यह 14वीं शताब्दी की बात है.
बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव तब पुरी की तीर्थयात्रा पर गये थे. जाहिर है, राजा के साथ आदिवासियों का एक बड़ा लाव लश्कर भी था. लेकिन जब महाराजा लौटे तो उनके साथ गये आदिवासी बदल चुके थे. पुरी के दर्शन करने वाले आदिवासियों को महाराजा ने पवित्र घोषित कर दिया था और अब ये सारे आदिवासी हिंदू थे. आदिवासी देवी-देवताओं के बजाय भगवान जगन्नाथ, शुभद्रा और बलभद्र उनके अराध्य देव थे.
आश्चर्य नहीं है कि बस्तर के बेहद लोकप्रिय दशहरा पर्व में राम-रावण का कहीं अता-पता नहीं होता और दशहरा के लिये पुरी की ही तर्ज पर बस्तर में भी रथयात्रा निकाली जाती है.
ऐतिहासिक संदर्भों को देखें तो पता चलता है कि आदिवासियों के हिंदूकरण की यह पहली शुरुवात थी. पुरुषोत्तम देव के बाद आदिवासियों को हिंदू बनाने की सफल-असफल कोशिशें चलती रहीं. 600 साल बाद चपका में बाबा बिहारी दास ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों को कंठीमाला दे कर पर हिंदू बनाने का सिलसिला शुरु किया. संदर्भों को देखें तो बस्तर में 7-7 रुपये लेकर आदिवासियों को जनेउ बांटे गये और उन्हें हिंदू यहां तक की ब्राह्मण भी बनाया गया. फिर संघ परिवार और गायत्री परिवार ने इन इलाकों में “हिंदू अलख” जगाने की शुरुआत की.
14वीं शताब्दी में शुरु हुआ राजा पुरुषोत्तम देव का धर्मांतरण 21वीं शताब्दी में मर्यादा पुरुषोत्तम राम तक पहुंचता है. आप चाहें तो इसकी गवाही माड़वी हिड़मा से ले सकते हैं. लेकिन अब उसका नाम अब माड़वी हिड़मा नहीं है. वह कहता है- “ मेरा नाम नितिन है.”
बस्तर के आखरी छोर में बसा है कोंटा और इसी कोंटा के बटेर गांव का है माड़वी हिड़मा. 14 साल का यह मुरिया आदिवासी जब तक आपके सामने मुंह न खोले, तब तक आप यही समझेंगे कि यह किसी ब्राह्मण परिवार का लड़का है. सुबह पांच बजे उठना और उठते ही नहा-धो कर महाआरती, फिर घंटे भर तक योगा, फिर नाश्ता और थोड़ी पढ़ाई के बाद फिर शिव, लक्ष्मी, दुर्गा की पूजा. शाम को भी घंटे भर तक आरती, भजन और पूजा-पाठ.

माड़वी हिड़मा को बताया गया है कि हिंदू इस दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म है और अब हिंदू रीति रिवाज उसके जीवन के अभिन्न अंग बन गये हैं. उसे सारे हिंदू देवी-देवताओं के नाम पता हैं, उनकी प्रार्थनायें याद हैं, आरती कैसे करनी है और आदिवासी कैसे सभ्य होंगे. और यह भी कि मोक्ष कैसे मिलेगा. यह सब कुछ.
आज से दो साल पहले तक वह यह सब नहीं जानता था. बटेर और कोंटा तक उसकी दुनिया थी और गोंडी उसकी भाषा. फिर रातों रात सब कुछ बदल गया.
हिड़मा बताता है कि दो साल पहले नक्सलियों ने उसके पिता और भाई की हत्या कर दी. इसके बाद सलवा जुड़ूम चलाने वाले उसकी मां और बड़े भाई के साथ उसे भी कोंटा में चलने वाले सरकारी कैंप में ले आये. तब से वह वहीं था.
इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती, गायत्री शक्ति पीठ, गुरुकुल जैसे संगठनों ने राज्य की भाजपा सरकार के साथ मिल कर इन आदिवासी बच्चों को गोद लेना शुरु किया. हिड़मा को भी गुरुकुल आश्रम ने गोद लिया और पिछले 2 सालों से वह रायपुर गुरुकुल आश्रम में रह रहा है.
सबसे पहले हिड़मा का नाम बदला, फिर रोज की दिनचर्या, फिर वह सब कुछ, जिसके कारण उसे आदिवासी कहा जा सके. गुरुकुल में उसे हिंदूत्व की दीक्षा मिली और अब वह कट्टर हिंदू है.
मुरलीगुड़ा गांव का नामपोड़ियम लच्चू अब अपने गांव में नहीं रहता. सरकार द्वारा चलाये जाने वाले कैंप में भी नहीं. हां, कोंटा बेस कैंप में आप चाहें तो लच्चू के भाई से जरुर मिल सकते हैं. हालांकि लच्चू के भाई को नहीं पता कि उसका छोटा भाई कहां है. कोई आश्रम वाले उसे ले गये, इतनी जानकारी तो उसके पास है लेकिन कहां, यह उसे नहीं पता. पता चले भी तो कैसे ? 11 साल का नामपोड़ियम लच्चू का तो अब नाम भी बदल गया. अब वह आकाश है.
छत्तीसगढ़ जन कल्याण संघ नामक एक स्वयंसेवी संस्था के गुरुकुल में रहने वाला लच्चु नामपोड़ियम बड़ा हो कर क्या बनना चाहता है, यह तो उसे नहीं पता लेकिन धार्मिक कार्यों में उसकी बहुत रुचि है. आदिवासी देवी-देवताओं को पूजने वाले लच्चु का भाई चौंक जाएगा, अगर उसे पता चले कि लच्चु हनुमान जी और मर्यादा पुरुषोत्तम राम का भक्त है. उसका दोस्त रवि भी उसके ही जैसा है.
चिंता कोंटा के पंडरुम यानी इस गुरुकल के रवि ने अपनी पढ़ाई छठवीं तक बस्तर के कोंटा में की. पिता बीमार हो कर मर गये और जब सलवा जुड़ूम चला कर उनका गांव खाली कराया गया तो वह अपनी मां के साथ कोंटा सरकारी शिविर में ले आया गया. यहां उसकी मां कहीं और चली गई और पंडरुम अकेला हो गया.
पंडरुम को अपने स्कूल के सारे साथी याद हैं. तालाब में नहाना और दिन-दिन भर दोस्तों के साथ मस्ती. जंगल-जंगल घुमना और तरह-तरह की आवाज निकाल पर जंगल के जानवर और पंक्षियों को मूर्ख बनाना. और हां, सल्फी के पेड़ पर सरपट चढ़ जाना भी. कई बार जब रात को उसे अपने गांव और घर की याद आती है तो वह गुरुकुल के महाराज द्वारा बताये गये भजन गुनगुनाने लगता है और अपने मन को धार्मिक तौर-तरीके से समझाने की कोशिश करता है.

इस आश्रम के संचालक यानी गुरु महाराज नारायण राव एक कॉलेज में लैब टेक्नीशियन हैं. वे आश्रम में नहीं रहते क्योंकि आश्रम राजधानी रायपुर से दूर जंगल वाले इलाके में है. राव कहते हैं-“ हम सरकार और जन सहायता से यह आश्रम चला रहे हैं और हम चाहते हैं कि बच्चों में नैतिकता आये, वे धार्मिक भाव से ओतप्रोत रहें.”
नक्सलियों से प्रभावित 25 आदिवासी बच्चे इस गुरुकुल में रखे गये हैं और उनकी परवरिश का जिम्मा अब गुरुकुल पर है. नारायण राव के अनुसार उन्हें गुरुकुल चलाने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह से आर्थिक सहायता मिली थी और दूसरे सामाजिक लोग भी अब दान देने लगे है. अब श्री राव इस गुरुकुल को हिंदू आदर्श का केंद्र बनाना चाहते हैं. उड़ीसा के इलाकों में भी इस तरह के गुरुकुल खेलने की तैयारी चल रही है.
नारायण राव आश्रम की खाली जमीन की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि यहां मोक्ष भवन बनाया जायेगा. इसके अलावा नाग-नागिन का एक मंदिर अलग से शिवलिंग के साथ बनाने की योजना है. एक ओर रुद्राक्ष के बाग, दूसरी ओर दुनिया भर में पाई जाने वाली पवित्र तुलसी के पौधों की बगिया, फिर गौ परिक्रमा...फिर.

अपने हाथ को पीछे बांध कर जमीन की ओर देखते हुए राव दार्शनिक अंदाज में कहते हैं-“हम संस्कारहीन आदिवासी बच्चों को संस्कारवान बनाना चाहते हैं. ”
और कट्टर हिंदू भी ?
राव कहते हैं-“ आदिवासी तो हिंदू ही हैं. यह तो हम शहरी लोगों का भ्रम है कि उनकी अपनी धार्मिक परंपरा या मान्यता है. वह आपसे-हमसे ज्यादा हिंदू हैं.”
मध्य भारत के आदिवासी समाज पर पिछले 50 सालों से काम कर रहे निरंजन महावर कहते हैं- “ छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में कई सालों से आदिवासियों पर हिंदू रीति रिवाज थोपने का काम चल रहा है. और अब सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद इन बच्चों को सरकारी संरक्षण में संघ संचालित या संघ समर्थक संस्थाओं में डाल कर आदिवासी संस्कृति और परंपरा में हिंदू घुसपैठ को और तगड़ा बनाया जा रहा है.”
जगदलपुर में हिंदी के एक पत्रकार आंकड़ों के साथ बताते हैं कि जिस बस्तर में 80 फिसदी आबादी आदिवासियों की थी, वहां अब जनगणना के आंकड़े बदल रहे हैं और अब आंकड़ों में भी हिंदू जनसंख्या बढ़ रही है.
जाहिर है, अपनी आदिवासी पहचान खो चुके नितिन, रवि और आकाश आने वाले दिनों में इसी जनसंख्या में शुमार होंगे और उनकी आदिवासी संस्कृति और परंपरा केवल स्मृतियों का हिस्सा होगी. जैसे अब बस्तर है, उनके गांव है, घर है, सल्फी के पेड़ हैं.
[लेखक-परिचय : पिछले 20 सालों से पत्रकारिता के पेशे में। ग्रामीण पत्रकारिता और नक्सल आंदोलन में कुछ शोधपरक काम. कविताई कभी-कभार. ज्यादातर छद्म नामों से कवितायेँ प्रकाशित .
कुछ पत्रिकाओं, अखबारों, संदर्भ ग्रंथों का संपादन,देशबंधु ,अक्षरपर्व और सन्दर्भ छत्तीसगढ़ आदि . वृत्तचित्रों में भी सक्रिय. बीबीसी समेत कई देशी-विदेशी मीडिया संस्थानों के लिए कार्य. कभी-कभी विश्वविद्यालयों में अध्यापन. कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान, पुरस्कार और फेलोशीप.
सम्प्रतिः वेब पत्रिका रविवार का संपादन.
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