बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 25 जून 2014

इस्लाम में कंडोम !














शहरोज़ की क़लम से 
चौंकिए मत ! मुझे कह लेने दीजिये कि इस्लाम परिवार कल्याण की अनुमति देता है.यानी कंडोम का इस्तेमाल इस सिलसिले में प्रतिबंधित नहीं है.पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद के समय अज़्ल की खूब परम्परा रही है.यह अज़्ल कंडोम का ही पर्याय है.अज़्ल यानी वीर्य का बाह्य स्खलन,रोक,गर्भ की सुरक्षा.मिश्र में एक बहुत ही प्राचीन विश्वविद्यालय है जिसकी मुस्लिम जगत में मान्य प्रतिष्ठा है जामा [जामिया ] अल अज़हर ,यहाँ के ख्यात इस्लामी चिन्तक शेख जादउल हक़ अली कहते हैं:
कुरआन की तमाम आयतों के गहरे अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इसमें से ऐसी कोई आयत नहीं है जो गर्भ रोकने या बच्चों की संख्या को कम करने को हराम क़रार देती हो.

अन्यथा हरगिज़ न लें तो इस तरफ ध्यान दिलाने की गुस्ताखी करूँगा कि कहने का अर्थ कतई यह नहीं है कि भारत मे बढ़ती जनसंख्या के पीछे मुस्लिम समुदाय का योगदान खूब तर है.सच तो यह है, अब तक के तमाम सर्वे ने इस झूठ की कलई खोल दी है.जहां निरक्षरता है, उस समाज में परिवार कल्याण को लेकर जाग्रति नहीं है.ऐसा मुस्लिम समेत अन्य समुदायों में भी देखने को मिलता है.बहुविवाह को लेकर व्याप्त भ्रांतियों को भी अनगिनत शोध्य ने गलत साबित किया .बहुविवाह का मुस्लिमों की अपेक्षा दूसरे समाज में अधिक चलन है.अब तो ढेरों हिन्दू भी कई शादियाँ कर रहे हैं. यह दीगर है कि इसके लिए इस्लाम का सहारा लेते हैं.खैर विषय से ज़रा इतर भाग रहे अपने घोड़े को यहीं विराम देता हूँ.
तो मैं कह रहा था कि मुस्लिम समाज में अक्सर धर्म को हर मर्ज़ की दवा बताये जाने की परम्परा है.लेकिन ऐसा कहने वाले खुद अपने धर्म के मूल स्वर या उसकी गूढ़ बातों से अनजान रहते हैं.मुल्लाओं के बतलाये मार्ग पर चलना ही तब इन्हें श्रेयस्कर लगता है.और इसका खामियाजा यह होता है कि मुस्लिम विरोधी शक्तियां सीधे इस्लाम पर ही आक्रमण करने लगती हैं.कुरआन की अपने अपने ढंग से समझने और अपने मुताबिक तोड़ मरोड़ कर आयतों के इस्तेमाल की कुपरम्परा रही है.ऐसा मुस्लिम विरोधी अक्सर करते हैं.और कभी कभी कई वर्गों में विभक्त मुस्लिम समाज के धर्म गुरुओं ने भी किया है.कईयों ने गहन अध्ययन मनन के बाद निष्कर्ष निकालने के सार्थक यास भी किये हैं.कुरआन और हदीस में किसी बात का समाधान न हो तो इस तरह के कोशिशों के लिए इज्तीहाद के परम्परा रही है.

यूँ तो हर समूह ने परिवार कल्याण के समर्थन और विरोध में कुरआन और हदीस का ही हवाला दिया है.इसके विरोध में प्राय यह कहा जाता है कि किसी जिव को जिंदा दर्गोर करना गुनाह है.कुरआन की कुछ आयतें :

अपनी औलाद को गरीबी के डर से क़त्ल न करो.हम तुम्हें रोज़ी देते हैं उन्हें भी देंगे.
[अल अनआम-६]

और जब जीवित गाडी गयी लडकी से पूछा जाएगा कि उसकी ह्त्या किस गुनाह के कारण की गयी.
[अत तक्वीर ८-9]

परिवार कल्याण के विरोध में कुछ लोग ऐसी ही आयतों को सामने रखते हैं.उन्हीं यह बखूबी ज़ेहन में रखना चाहिए कि इस्लाम से पूर्व समाज में लड़कियों को जिंदा ही ज़मीन में दफन करने की गलत परम्परा थी.मुफलिसी के कारण भी लोग संतानों को मार दिया करते थे.यह आयतें उस गलत चलन के विरोध में है.इस सिलसिले में अपन आगे और स्पष्ट करेंगे.लेकिन परिवार कल्याण के विरोधी जन इस बात को स्वीकार करते हैं कि अज़्ल या गर्भ निरोध यानी गर्भ धारण रोकने के विरुद्ध कुरआन में कोई स्पष्ट प्रतिबंध का ज़िक्र नहीं है. इसमें कोई संदेह नहीं कि पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद के समय अज़्ल का चलन था.और मुसलमान इस से अछूते न थे.और कुछ सहाबियों पैग़म्बर के समकालीन उनके शिष्यों ने ऐसा परिवार कल्याण यानी गर्भ रोकने के ध्येय से भी किया.इसकी जानकारी पैग़म्बर को भी थी लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना नहीं किया.जबकि उस समय कुरआन नाजिल हो रही थी बावजूद इसके प्रतिबंध का प्रश्न खड़ा नहीं हुआ.
कुछ हदीसों से:
एक सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्लाह ने कहा कि रसूल अल्लाह के समय हम अज़्ल किया करते थे और कुरआन नाजिल हो रहा था.
[मुस्लिम,तिरमिज़ी,इब्न माजा]

आप आगे कहते हैं हवाला मुस्लिम हदीस कि रसूल अल्लाह को इस बात का पता चला तो उन्होंने हमें इस से मना नहीं फरमाया.
एक हदीस के सूत्रधार हज़रत सुफियान कहते हैं कि [जब कुरआन नाजिल हो रहा था ]यदि यह प्रतिबंधित होता तो कुरआन हमें रोक देता .

ताबायीन [सहाबियों के शिष्यों को कहा जाता है.] के समय भी अज़्ल का चलन रहा.और गर्भ धारण रोकने के लिए ऐसा किया जाता रहा.पैग़म्बर के देहावसान के काफी बाद तक ऐसी परम्परा रही.मुसलामानों के चार प्रमुख इमामों में से एक इमाम हज़रत मालिक ने भी अज़्ल को जायज़ क़रार दिया है.हाँ ! यह सही है कि पहले खलीफा हज़रत अबू बकर, हज़रत उम्र,हज़रत उस्मान बिन अफ्फान, हज़रत अब्दुल्लाह बिन उम्र आदी सहबियों और खलीफाओं ने अज़्ल को नापसंद ज़रूर किया है.लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि अज़्ल हराम है.
कईयों को शंका हो सकती है किअज्ल के बाद भी तो गर्भ जिसे ठहरना हो , आप रोक नहीं सकते.इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है जैसा कि मशहूर हदीस है कि पहले ऊँट को बाँध दो फिर अल्लाह पर भरोसा करो.यानी अपनी तरफ से बचाओ के उपाय अवश्य करो , नियति में जो लिखा है वो तो होंकर रहेगा,चिंता मत करें.लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि सुरक्षा न की जाय! अबू सईद से रिवायत है ,आपने कहा रसूल अल्लाह से पुछा गया तो आपने फरमाया : हर पानी से बच्चा पैदा नहीं होता और जब अल्लाह किसी चीज़ को पैदा करना चाहता है तो उसे ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता .[मुस्लिम]
मुस्लिम,इब्न माजा,इब्न हम्बल. दारमी और इब्न शेबा जैसे हदीसों के जानकारों ने हवाले से लिखा है कि पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने गर्भ रोकने के लिए अज़्ल को बताया.
कशानी ने रसूल अल्लाह के हवाले से कहा कि आपने फरमाया औरतों से अज़्ल करो या न करो जब अल्लाह किसी को पैदा करना चाहता है तो वह उसे पैदा करेगा.

कुरआन की सूरत बक़रा की एक आयत का हवाला खूब दिया जाता है.
और स्त्री-विरोध के नाते.लेकिन इसका अर्थ इधर खुला.आयत है:
तुम्हारी बीवियां तुम्हारी खेतियाँ हैं बस अपने खेतों में जैसे चाहो, आओ.

इस आयत का अर्थ इमाम अबू हनीफा के हवाले अहकामुल कुरआन में इस तरह है :चाहो तो अज़्ल करो , चाहो तो अज़्ल न करो.
और हाँ इस सम्बन्ध में पत्नी की रज़ामंदी को वरीयता दी गयी है.अबू हुरैरा से रिवायत है कि रसूल ने फरमाया पत्नी की सहमती से ही अज़्ल किया जाय.
[अबू दाऊद, अबन माजा और हम्बल ]
एक और हदीस में आया है कि जब स्त्री स्तन पान करा रही हो यानी अपने बच्चे को यानी उसका बच्चा छोटा हो तब भी अज़्ल किया जाय.

गर्भ-निरोध उपाय के सम्बन्ध में अक्सर लोग तर्क देते हैं कि ऐसा करना हत्या के बराबर है.इस सम्बन्ध में कई हदीसें हैं.सिर्फ एकाध की मिसाल ही फिलवक्त पर्याप्त है.
हज़रत अबू हुरैरा ने कहा कि रसूल अल्लाह से सहाबियों ने पूछा कि यहूदी तो अज़्ल को छोटा क़त्ल कहते हैं.तो अल्लाह के रसूल ने कहा ,वह झूठ बोलते हैं. [बेहक़ी,अबू दूद,इब्न हम्बल]

बेहक़ी और निसाई में भी दर्ज है कि हज़रत अली ने भी इसे हत्या मानने से इनकार कियाहै.जब तक कि यह सात मंजिल तय न कर ले.हज़रत अली ने सूरत अल मोमीनून का भी ज़िक्र किया.

मैं इस्लाम का मान्य विश्लेषक या विद्वान् नहीं हूँ.बस जो अध्ययन में सामने आया उसी के हवाले से अपनी बात रखने की कोशिश की है,कहाँ तक सफल रहा हूँ..यह निर्णय पाठक कर सकते हैं.वैचारिक मतभेद भी संभव है, लेकिन इतनी गुजारिश ज़रूर है कि तर्कों के साथ आप अपनी बात रखें.कुतर्क से बात का बतनगड़ तो हो सकता है कोई सार्थक संवाद कतई नहीं.

और हाँ यह भी सूचना बता देना अहम समझता हूँ कि तुर्की, मिश्र,इराक,पाकिस्तान, बँगला देश,इंडोनेशिया समेत सोवियत रूस से विभक्त आधा दर्जन मुल्कों सहित ढेरों मुस्लिम देशों में परिवार कल्याण योजना को स्वीकृति हासिल है.
और अपने मुल्क में भी पढ़ा लिखा मुस्लिम तबक़ा इसका पालन करता है.जैसे जैसे शिक्षा का उजास फैलेगा लोग कुरआन,हदीस और विज्ञान के प्रकाश में दीन और दुनिया को देखेंगे .

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यह लेख हमने अपने ब्लॉग पर 6 जुलाई 2010 को पोस्ट किया था. तब अमर्यादित टिप्पणियों को छोड़ आई यह कुछ प्रतिक्रियाएं।
वॉयस ऑफ द पीपुल :इस्लाम मैं अज्ल रिजक के खौफ से मना है, क्योंकि रिजक देने वाला अल्लाह है. इसमें बीवी की रजामंदी ज़रूरी है. इस्लाम मैं मुस्तकिल तौर पे (नसबंदी) औलाद का होना रोकना मना है. 7 जुलाई 2010 को 12:37 am

टीएम ज़ियाउल हक़ :हम आपको कई बार कह चुके की मज़हबी मामले में ज़रा सूझ बूझ कर लिखा करें। 7 जुलाई 2010 को 2:02 am

शहनवाज़ सिद्दीक़ी: किसी भी मुद्दे पर कोई फतवा तो केवल आलिम ही दे सकता है....... बात अगर विचार की जाए तो मेरे विचार से बच्चों को पालने की चिंता से परिवार नियोजन के तरीके इस्तेमाल करना बेहद गलत है. अल्लाह कुरआन में फरमाता है कि (अर्थ की व्याख्या) "रोज़ी का ज़िम्मेदार तो वह है". हाँ किसी परेशानी अथवा बच्चों की उम्र में अंतर के लिए परिवार नियोजन के तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. 7 जुलाई 2010 2:24 am
सहसपुरिया: आपने अपने नज़रिए से बात कही है,मेरे ख़याल से इस मुद्दे पर आलिमो की राय भी ली जाए तो अच्छा होगा. इस बारे में कई बार बहस भी हो चुकी है. अज़हर यूनिवर्सिटी के आलिमो ने इस बारे में बहुत खोज बीन की है.सभी से गुज़ारिश है इस मसले पर तर्क से बात करें. शहरोज़ साहब की बात को समझ कर ही कॉमेंट दें.
7 जुलाई 2010 3:14 am

राकेश पाठक: bhaiya Isalam par kuch bhi likhne se pahle himmat honi chahiye....aapne wo himmat dikhayi.dhanyad..Par bhaiya agar aapne ye himat naam kamane ke liye dikhayi hai to mai ise thik nahi manta....lekin agar aap ise ek budhjiwi ki tarah dharm ka darpan dikhya hai to thik hai .... aapke samrthan me kitne haath uthte hai ab ye dekhna hai . 7 जुलाई 2010 5:54 am


ख़ालिद ए अहमद : saroj ji ne is mude par ke behesh ki surwat ki hai aur is aap aur baat honi chahiye ......kuch islamik jankaro ki bhi raye ki jarurat hai
7 जुलाई 2010 7 :26   am
डॉ अनवर जमाल ख़ान: शहरोज़ भाई ने अच्छी जानकारी दी . ये बात सही है कि इस्लाम में नसबंदी करना हरम है और परिवार कल्याण वाजिब है . परिवार का कल्याण होता है कुरआन पाक कि तालीम पर चलने से . वक्ती ज़रूरत के तहत आदमी अज़ल कर सकता है . लेकिन आजकल तो ज़िनाकारी / व्यभिचार के लिए बिक रहे है कंडोम . लोग ज़कात देने लगें तो फिर परिवार का पूरा ही कल्याण हो जायेगा। कन्या भ्रूण-हत्या आज गूगल में देख रहा था कि हिंदी दुनिया में क्या चल रहा है ? इसी दरमियान इस लेख पर नज़र पड़ गयी और मैं इसे उठा लाया आपके लिए, http://vedquran.blogspot.com/2010/07/islam-is-saviour-of-girlchild.html 
7 जुलाई 2010 7 :29  am

अविनाश वाचस्पति : मानवहितकारी विषयों पर सार्थक विमर्श सदैव होते रहने चाहिएं। इस प्रकार के विमर्श के उपरांत ही सही नतीजे प्राप्‍त होते हैं। इन्‍हें जाति इत्‍यादि के बंधनों में बांधकर गरीब नहीं बनाना चाहिए।7 जुलाई 2010 6:32 am
रंजना ठाकुर: आपका यह पुनीत प्रयास सराहनीय वन्दनीय है....शत प्रतिशत सहमत हूँ आपके विचारों से..दिग्भ्रमिता की यह स्थिति सभी धर्मो पंथों के अनुयायियों बीच है...और इसका समाधान निस्संदेह शिक्षा तथा जागरूकता ही है... 31 जुलाई 2010 3:13 am
नदीम अख्तर : शहरोज जी ने जो बात रखी है, उसका सीधा का संदेश है कि क्या मुसलमान परिवार नियोजन कर सकता है या नहीं। इसमें मिर्चई लगने का मतलब समझ में नहीं आता है। इतने सरल से विषय को पगलैती करके दूसरा मोड़ दे देना जहालत ही है।13 जुलाई 2012 12:35 am 
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सोमवार, 23 जून 2014

तीन तलाक़ कितना हलाल








शहरोज़ की क़लम से 

 तलाक़ दे तो रहे हो, ग़ुरूर-व-क़हर के साथ
मेरा शबाब भी लौटा दो, मेरे मेहर के साथ.
तलाक़ को लेकर भोपाल रियासत के नवाब ख़ानदान की एक अनाम विदुषी शायरा का यह शेर बहुत मक़बूल है. हालाँकि कुछ लोग मीना कुमारी को रचयिता मानते हैं. इस शेर में शादीशुदा महिला अपने पति से कहती है कि पुरुषत्व के घमंड में क्रूर-आक्रामकता के साथ उसने उसे तलाक़ दे तो दी है, तो उसके मेहर के साथ उसका यौवन भी लौटा दे. क्या ऐसा संभव है. शायद यही वजह है कि तलाक़ को बहुत बुरा बताया गया है. ' अल्लाह के लिए उन सभी चीज़ों में से, जिनकी आज्ञा दी गयी है, तलाक़ सबसे ज़्यादा नापसंद-दीदा है' (क़ुरआन सूर: 65 ). लेकिन क़ुरआन और इस्लाम की मूल भावना समझे बगैर पुरुष दाल में नमक कम क्यों? जैसी फ़िज़ूल बातों को लेकर भी अपनी औरतों के सर पर तलवार लटकाए फिरते हैं. तलाक़ के मामले में स्त्रियों के साथ विशेष कर भारत में सदियों से असमान बर्ताव किया जाता रहा है.  ताज्जुब की बात है कि मुल्ला-मौलवियों ने, न तो इसकी वाजिब और मान्य व्याख्या की और न ही इसके उचित रूप को प्रचलित किया। इसके उलट जब प्रगतिशील तबक़ा समझ भरी बातें तर्कों के साथ लेकर उपस्थित  होता है, तो उसे क़ुरआन और हदीस में दख़ल मानकर उसे ख़ारिज कर दिया जाता है. जबकि एक बैठक में तीन तलाक़ और हलाला की इजाज़त न क़ुरआन देता है, न ही सही हदीस।

मुसलमानों को यह ध्यान में रखना होगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ ही शरीयत नहीं है. और इस लॉ में पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम मुल्कों में संशोधन हो चुका है। वहीं शरीयत को लेकर भी हनफ़ी, मालिकी, शाफ़ई, हंबली विचार धारा में एक मत नहीं है. सुन्नी और शिया में भी इसकी व्याख्याऍं भी अलग-अलग हैं. अल्लामा इक़बाल ने अपनी मशहूर किताब ‘दि रिकन्सट्रक्शन ऑफ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम’ में साफ़-साफ़ लिखा है कि शरीया की इन व्याख्याओं को अटल नहीं माना जा सकता है| क्या मित्रों ! समय नहीं है कि मुस्लिम उलमा इज्तिहाद से काम लेकर पर्सनल लॉ में कई ज़रूरी संशोधन करें ताकि एक बैठक में तीन तलाक़ की रिवायत ख़त्म हो. वही मेहर की ऐसी रक़म तय हो जो पति की वार्षिक आय हो.

क़रीब दो दशक पहले एक बैठक में तीन तलाक़ जैसी स्त्री -विरोधी कुप्रथा की मुख़ालिफ़त अहले हदीस के तीन विद्वान मुफ़्तियों शेख़ उबैदुर रहमान, शेख़ आताउररहमान मदनी और शेख़ जमील अहमद कर चुके हैं. हंबली और  शिया के यहां भी इस पर प्रतिबंध है. इस बात पर आम सहमति है कि यह बिदाहः (पाप) है. पैंगबर  ने तलाक के इस तरीके को बिलकुल गलत क़रार दिया था. यह तरीका, इस्लाम से पहले प्रचलित था. इस्लाम के आरंभिक दौर में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को जब एक बार में तीन तलाक़ कह दी, तो पैग़म्बर मोहम्मद गुस्से से सुर्ख़ हो गए. बोले मेरा वश चलता तो मैं उसका क़त्ल कर देता। बावजूद इसके प्यारे नबी का दामन नहीं छोड़ेंगे का नारा लगाने वाले इस परंपरा को जारी रखे हुए हैं.
इस्लाम में शादी दो वयस्क स्त्री-पुरुष के बीच साथ जीवन गुज़ारने के लिए हुआ समझौता है, जिसे निकाह कहते हैं. इसे तोड़ने की प्रक्रिया तलाक़ कही जाती है. इस्लाम ने मर्द को तलाक़ का अधिकार अवश्य दिया है, मगर इस शर्त के साथ कि कम से कम तीन महीने की मुहलत ज़रूरी है, लेकिन दूसरी तरफ़ इसे अप्रिय भी कहा है. यदि किसी कारण वश आपसी कलह से दांपत्य जीवन नरक बन जाए और साथ रहना असंभव लगे, तो फिर ऐसे दांपत्य जीवन से बेहतर है कि पति-पत्नी सम्बन्ध -विच्छेद कर नए सिरे से अपना-अपना नया दांपत्य जीवन शुरू करें।
मुस्लिम महिला भी तलाक़ ले सकती है, इसे 'खुलाअ' कहा जाता है. वह कुछ विशेष आधारों पर अपने पति से संबंध -विच्छेद कर सकती है. (2:229). ख्यात चिंतक डॉ. असगर अली इंजीनियर लिखते हैं कि 'पवित्र पैगम्बर ने भी अपनी पत्नी जमीला का 'खुलाअ' स्वीकार किया था, क्योंकि वे उनके साथ रहना नहीं चाहती थीं. हालांकि पैगम्बर साहब, जमीला से बहुत स्नेह करते थे और उन्हें पूरा सम्मान देते थे. उन्होंने जमीला से केवल इतना कहा कि वे उस बाग को उन्हें लौटा दें जो उन्होंने जमीला को मेहर के तौर पर दिया था. इस हदीस से स्पष्ट है कि पत्नियों का खुलूअ का अधिकार संपूर्ण है और इसमें कोई शर्त नहीं लगाई जा सकती. खुलूअ के लिए पति की सहमति की आवश्यकता नहीं है.'
हिन्दुस्तान में शाफ़ई, हंबली, मालिकी और अहले हदीस विचार धारा के मुसलमानों की आबादी नगण्य है. भारतीय उपमहाद्वीप में हनफ़ी मुसलमानों की आबादी ज़्यादा। इनमें भी देवबंदी (तब्लीग़ी जमात), बरेलवी (कछौछवी, दावत-ए-इस्लामी ) और जमात इस्लामी जैसी गुटबंदियां हैं. शियाओं  के यहां भी आग़ा खानी और बोहरा स्कूल है. भारत में क़रीब नब्बे फ़ीसदी मुसलमान हनफ़ी हैं, जिन्हें सुन्नी कहा जाता है.  इनपर आधिपत्य के लिए  सर-फूड़व्वल जारी है. 

भारतीय सुन्नी मुसलमान एक बैठक में तीन तलाक़ को भले सही माने, जॉर्डन के सुन्नी मुसलमान इसे ख़ारिज कर चुके हैं. भारत में भी शरीयत पर सुन्नी विद्वानों के 1973 में हुए एक सेमिनार में तीन तलाक़ की आलोचना हो चुकी है. तब अहमदाबाद में मौलाना मुफ़्ती अतीक़ुर्रहमान उस्मानी की अध्यक्षता में यह सेमिनार हुआ था. इसमें शिरकत कर रहे तमाम मुफ्तियों और मौलानाओं ने अपने-अपने पेपर में क़ुरआन और हदीस के हवाले से एक साथ तीन तलाक़ को अवैध क़रार दिया था. बाद में सेमिनार के निष्कर्षों पर आधारित एक पुस्तक का भी प्रकाशन हुआ.             

18 वीं सदी के मशहूर सूफ़ी-संत शाह वली उल्लाह भी शरीयत के उस मार्ग के हिमायती थे जिसमें प्रचलित चारों विचार धाराओं हनफ़ी, मालिकी, शाफ़ई और हंबली के मतों को समान मान्यता मिले और एक व्यवहारिक पद्धति का निर्माण हो. ज़रुरत आज इसी की है.
आख़िर ऐसा क्यों हैं कि जिस बात की अनुमति क़ुरआन और हदीस नहीं देता, भारत में ही एक साथ तीन तलाक़ जैसी कुप्रथा लागू है.  दरअसल इसकी सुरक्षा यहां का मुस्लिम पर्सनल लॉ करता है. लेकिन जिस लॉ को शरीयत मान मुस्लिम समुदाय सबसे पवित्र दस्तावेज़ समझ रहा है, क्या ऐसी मान्यता हर काल और परिस्थिति में रही है ? 
पर्सनल लॉ को परिभाषित करने का पहला अवसर 1937 में तब आया, जब ब्रिटिश सरकार ने शरीयत एक्ट बनाने का निश्चय किया। ज़रुरत इसलिए पड़ी कि अदालतों में मुसलमानों के तलाक़, विवाह, संपत्ति और विरासत आदि से सम्बंधित मामलों की क़तार गयी. जब पर्सनल लॉ के अलग स्वरूप की चर्चा शुरू हुई तो समकालीन विद्वानों ने इसका मुखर विरोध भी आरम्भ कर दिया। इनमें मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिना और जमात इस्लामी के संस्थापक मौलाना सैयद अबुलउला मौदूदी अग्रणी थे. कथित मुस्लिम हितचिंतक होने  बावजूद जिना के विरोध का यही मतलब है कि उनकी दृष्टि में मुस्लिम समाज के लिए यह लाभप्रद नहीं था. मौलाना मौदूदी की राय थी कि मुसलमानों के दो तिहाई परिवारों में इस शरीयत एक्ट की वजह से बर्बादी आई है. यदि आप मुसलमानों का ज़रा भी भला चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें पर्सनल लॉ से आज़ाद कर दीजिये।   
इन बहसों का विदेशी हुक्मरानों पर कोई असर न हुआ.  17 मार्च 1939 को मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम बना लिया गया. लेकिन यह आज़ादी के बाद ही लागू हो सका. इस अधिनियम की धारा दो मुस्लिम महिलाओं को नौ विभिन्न आधारों तलाक़ लेने का अधिकार देती है. 1986 में मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण अधिनियम बना.


दरअसल भारतीय मुसलमानों की बड़ी समस्या अशिक्षा है. जिसकी वजह से कठ मुल्लाओं के सम्मुख वो नतमस्तक होता आया है. जबकि मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने क़ुरआन का अनुवाद करते हुए स्पष्ट लिखा कि इस्लाम ने तेरह सौ साल पहले क्रांतिकारी क़दम उठाते हुए महिला-पुरुष के बीच अधिकारों का समान वितरण किया था. लेकिन दुःख की बात है कि रूढ़िवादी सामंती समाज के असर में मुस्लिम समाज धर्म की मूल  आत्मा को न समझ सका. इस्लामी क़ानून विशेषज्ञ अय्यूब सैयद कहते हैं कि मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन का कारण इस्लामी क़ानून नहीं, बल्कि कट्टर पंथियों द्वारा उसकी गलत व्याख्या और समय के साथ अपने को न बदलने की ज़िद है. 

मुस्लिम पर्सनल लॉ का विवाद दरअसल उदार और कट्टरवादी व्यवस्था का टकराव है. एक समूह महिलाओं लिए मानववादी नज़रिये का समर्थक है,  शरीयत को आधुनिक समाज के निकट लाने का यत्न करता है, जबकि दूसरा पक्ष समय की मांग के अनुरूप अपने आपको बदलने के लिए तैयार है और समाज को पुरातन वादी मान्यताओं-परंपराओं से जकड़े रखना चाहता है. यही सबब है कि इमाम मुफ़्ती मुकर्रम तीन तलाक़ को कोई मसला नहीं मानते। वहीँ बिहार और उड़ीसा के शरई मामले के निष्पादन के लिए बनी संस्था इमारत -ए -शरिया पिछले कई वर्षों से तीन तलाक़ के अधिकांश मामले को नज़र अंदाज़ करती आई है.

एक बैठक में तीन तलाक़ और हलाला जैसी कुरीतियों से  ढेरों इस्लामी विद्वान सहमत नहीं हैं. वहीं पढ़े-लिखे ढेरों मित्रों का भी सुझाव इस मामले में संशोधन का है. कुछ इज्मा, तो कुछ इज्तिहाद की वकालत करते हैं.  इज्तिहाद यानी कुऱआन और हदीस का आदेश साफ़ पता न चले तो अपनी सोच-सामर्थ्य से सही रास्ता निकालना। डॉ. रफ़ीक़ ज़करिया लिखते हैं कि इज्तिहाद स्वतन्त्र चिंतन का ऐसा मान्य माध्यम है, जिसके ज़रिये ज़रूरी सुधारों को लागू किया जा सकता है.और अतीत में अनेक गणमान्य न्यायविदों और धर्म वेत्ताओं ने मुख्य रूप से इसका उपयोग किया भी है. कुछ लोग इसे इज्मा कहते हैं. पर अब इज्मा की रिवायत भी क्षीण हो गई प्रतीत होती है. वरना एक बैठक में तीन तलाक़, हलाला और शौहर के लापता हो जाने पर ज़िन्दगी भर इंतज़ार करना जैसे स्त्री-विरोधी चलन पर ज़रूर लगाम लगती, पर इसे पर्सनल लॉ की सुरक्षा मिली हुई है. हमें ज़ेहन से यह निकालना होगा कि पर्सनल लॉ पूरी तरह क़ुरआन पर आधारित है. जबकि हक़ीक़त यह है कि यह 'मोहम्मडन लॉ' (अंग्रेज़ों ने यही लिखा और कहा) लार्ड मैकाले के निर्देश पर इस्लामी विद्वानों की एक टोली की व्याख्याओं पर बनाया गया था.
डॉ. असगर अली इंजीनियर ने अपने एक लेख में लिखा था कि पूरी इस्लामिक दुनिया में मुस्लिम महिलाएं विभिन्न समस्याओं का सामना कर रही हैं. भारत में उलेमा की ज़िद के चलते, मुस्लिम महिलाएं वे अधिकार भी नहीं पा सकी हैं, जो क़ुरआन उन्हें देती है. भारत, दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ उलेमा, पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किए जाने तक का विरोध कर रहे हैं. संहिताबद्ध होने से कानूनों में कोई परिवर्तन नहीं होगा बल्कि उन्हें ठीक ढंग से, पूरे देश में एक समान प्रावधानों के साथ लागू किया जा सकेगा. बहर-कैफ़ मुस्लिम आलिमों को लॉ में ज़रूरी संशोधन से एतराज़ नहीं करना चाहिए। कई मुस्लिम मुल्कों जैसे तंज़ानिया, किनिया, तुर्की, टयूनिशिया, मोरक़्क़ो, इराक़, मलेशिया, इंडोनेशिया, मॉरिशश, ईरान, जॉर्डन और मालद्वीप ने भी अपने क़ायदे-क़ानूनों में बदलाव किया है. इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान ने भी 1961 में शरीयत क़ानून में ज़रूरी सुधार किये।   

शरीयत या मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप या देवबंदी-बरेलवी विवाद से परे यह देखना ज़रूरी होगा कि विश्व भर के मुसलमानों  की जिस ग्रंथ पर सर्वाधिक श्रद्धा-आस्था है, वह क़ुरआन तलाक़ के संबंध में क्या कहता है:
तलाक़शुदा औरतें अपने आपको तीन मासिक धर्मों के इंतज़ार में रोकें और उसके लिए जाएज़ नहीं है कि वह उसे छिपाएं, जो अल्लाह ने उनके गर्भ में पैदा किया है.। इस अवधि में उनके पति उनको वापस लेने के लिए ज़्यादा हक़दार हैं, अगर वह सुलह चाहें। (सूरा -2 बक़रा - 228 )

तलाक़ दो बार है। फिर (तीसरी बार ) उसे अच्छे तरीक़े से विदा करना है. या भले तरीक़े से रख भी सकते हैं. (वही, आयत-229 )


(इद्दत के समय) न तुम उन्हें उनके घर से निकालो, और न वह खुद निकलें, सिवा इसके कि वह खुद बेहयाई में पड़ गयी हों...फिर जब वह अपनी इद्दत की समाप्ति पर पहुँचने लगें, तो भले तरीक़े से (अपने निकाह में) रोके रखो या भले तरीक़े से एक दूसरे से जुदा हो जाओ. (सूरा -65तलाक़-2)

क़ुरआन के साफ़ निर्देश की भी अवहेलना करना पता नहीं यह समाज किस ज़ोम में कर रहा है. इसके अलावा भी कई आलिमों ने लिखा है कि अगर पति-पत्नी के ज़ेहन में कभी संबंध-विच्छेद का ख्याल आये तो उन्हें पहले बातचीत बंद कर देनी चाहिए। लेकिन इस दौरान यह सोचते रहें कि हमें अलग हो जाना चाहिए या साथ रह सकते हैं. गर साथ का रुझान न दिखे तो एक ही बिस्तर पर करवट बदल कर सोएं। दैहिक रिश्ते से परहेज़ करें। इस समय भी साथ या अलग रहने पर विचार करते रहें। जवाब नहीं में हो, तो फिर एक ही घर में अलग-अलग कमरे में रहना शुरू करें। तब भी अलग ही रहने की सोच प्रबल हो तो पत्नी को कुछ दिनों के लिए उसके मायके भेज दें. वहाँ से यदि पत्नी आ जाये तो पुन: विचार कर लें क्या तलाक़ ज़रूरी है तो पहली तलाक़ दें. उसके बाद क़ुरआन के मुताबिक़ दोनों अलग-अलग हो जाएँ। मेहर अगर पहले न दी हो तो उसे दे दें.  खुलाअ का भी यही तरीक़ा है.  लेकिन अगर उसके बाद आप दोनों को लगे कि तलाक़ देकर या खुलाअ लेकर अच्छा नहीं किया तो आप दोनों नयी मेहर के साथ नया निकाह कर सकते हैं. इसके लिए हलाला की कोई ज़रुरत नहीं, डॉ असग़र अली इंजीनियर और डॉ ज़ाकिर नायक भी यही कहते हैं. क्योंकि क़ुरआन में हलाला का कहीं भी ज़िक्र नहीं मिलता। न ही कोई हदीस इसके समर्थन में है. लेकिन कबीलाई और सामंती मानसिकता के तहत आज भी स्त्री-विरोधी कुप्रथा जारी है.  हलाला के हिमायती तर्क देते हैं कि यह  सज़ा है कि तलाक़ कितनी बुरी चीज़ है. क्योंकि तलाक़ के बाद अपनी पत्नी से दुबारा शादी चाहते हो तो उस औरत को पहले किसी और से निकाह  करना होगा। एक रात उसके साथ गुज़ारनी होगी। यदि अपनी इच्छा से वह दूसरा पति तलाक़ दे  तो इद्दत अवधि गुज़ारने के बाद औरत पहले पति से निकाह कर सकती है. इसे ही हलाला कहते हैं. आप ही बताएं तलाक़ दी पुरुष ने दंड स्त्री को क्यों? बहनों तुम चुप क्यों हो.

इद्दत = पहले तलाक़ के बाद चार माह की अवधि               
            



 
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