बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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सोमवार, 6 अप्रैल 2015

अल्लाह क़सम ! अब तो सबसे बोलेंगे

नई पौध के तहत 5 कविताएं






 










नाज़िश अंसारी की क़लम से

आम आदमी की आम सी कविता

आंखें छत से बतियाती हैं देर तक
बनाती हैं स्केचेज़
कच्चे पक्के से
झूठे सच्चे से

किसी स्केच में तुम
सिमटे हो नींद की गोद में
और मैं सिरहाने सिर टिकाकर
देखती हूं तुम्हें एकटक
कभी उसी मासूमियत पर
टपक जाती है थोडी गीली हरारत
तुम्हारे गालों पर
कभी मेरे बचपने में चढ़ जाती एक कहानी
शुरुआत  में ही जिसकी
मर जाते 'राजा-रानी '

उफ्फ्फफ़ ... ये ख़्वाब भी ना !
अपनी औक़ात नहीं देखते
ये नहीं समझते
आम सी ज़िंदगी में ख़्वाब की जगह नहीं होती
काव्य की जगह नहीं होती
स्केचेज़ में रंग भर नहीं पाते
दरअसल वे बन ही नहीं पाते
घड़ी की ठकाठक
हथौङे सी लगती है उस वक़्त
याद दिलाती है डेली रूटीन
जिसमें राशन है, ईंधन है
टिफिन, ब्रेकफास्ट, लंच है
बीमा पालिसी, बैंक, लोन
अम्मा बाऊ जीकी दवाओ का वक़्त है
सत्तर तरीक़े के बिल
पचहत्तर तरीक़े की ज़रूरतें
और बैलेंस निल है

यही सच आम सी ज़िंदगी का
ढीठ सा
कर्कश सा
और कर्कश हैं खर्राटे भी तुम्हारे
बिखरा देते हैं रंग सारे
आंखें फ़िर भी बनाती हैं स्केचेज़
कच्चे पक्के से
झूठे सच्चे से

आम लोगों की आंखें ज़िद्दी होती हैं
दिल कमबख़्त
और ज़िंदगी बेहया
क्या कीजियेगा ! !
___________________

सौतन चुप्पी

इससे पहले कि
फ़र्श पर रेंगता सन्नाटा
डंक मार दे आंखों में हमारी
हम सच में हो जाएं पत्थर के
काल्पनिक कहानियों की तरह
और ये डायन बेरहम ख़ामोशी
कतर डाले महीन-महीन
हमारे बीच का रेशम
और खुल जाए
हर सीवन हर बखिया
उस लफ़्ज़ की
जिसे हम दोनों ने
एक ही वक़्त में दोहराया था
तीन दफ़ा...

बस भी करो
मुस्कुरा दो ना ज़रा !

कि जान छूटे इस सौतन चुप्पी से !!
______________

तीसरी आंख

तुमने बांट लिये थे सपने
अपनी दोनों काली पुतलियों  में
एक बडे भाई के नाम किया
एक पे छोटे का हक़ था
मैं कहीं नहीं थी...कहीं भी नहीं
क्युंकि तुम्हें "तीसरी आंख" नहीं थी
फ़िर भी जाने
किस आंख से देखते रहे तुम
उम्र से आगे
वक़्त से पहले
बढता हुआ मेरा बेढब शरीर

और फ़िर थकने लगी
तुम्हारी ज़िम्मेदार पीठ
मेरे स्त्रीलिंग के बोझ से
रोज़ टांगने  लगे नींद तुम
ज़ीरो वाट के मुर्दा उजाले में
वो जलता रहा...
तुम्हारी आंखें टहलती रहीं
तलाशती रहीं कुछ
"शरीफ़", "इज़ज़तदार", "ख़ानदानी " सा कुछ

तुम घर के बाहर थे
फलाने श्री कभी ढमाके जी
तुम हमेशा घर के बाहर थे
कभी घर के भीतर देखते
मेरे भीतर देखते..

कभी पूछते तो बताती
अब नहीं है ज़रूरत
फ़िर से तुम्हारे शुक्राणुओं को
गर्भ जैसी कोठरी की
उग आये हैं उनके हाथ-पांव
उग आया है उनसे बेढंगा शरीर
और अधपके विचार भी
तुम पूछते तो बताती
तुम्हारी उंगलियों के बाद
मैं नहीं चाहती कोई हथेली
जो रौंदती रहे मेरे सपने
अन्धेरे किसी कमरे में
मैं नहीं चाहती
संरक्षण के भुलावे में  मिला बंधन
जहां बेडियों के नाम पर हो पाजेब
हथकडियों की तरह कंगन

देखते तो दिख जाता तुम्हें
बिना दो नंबर चश्मे के भी कि
मैं मिटा देना चाहती हूं सारी थकान
तुम्हारी अकडी पीठ की
और उठा लेना चाहती हूं
अपने शरीर का बोझ..
तुम्हारी सारी ज़िम्मेदारिया..
सारी चिंताएं..
अपने पैरों पर

कभी तो मेरे भीतर देखते
ज़रा सी फ़ुर्सत निकालकर
"सामाजिक प्राणी" की तरह नहीं
खालिस पिता बनकर
ज़रा सी मां बनकर....
___________________________

मेरा गला दबा दो मां !

एक मध्यवर्गीय परिवार
जहां आमदनी या हैसियत से नहीं
सपने तय होते हैं
कुछ फटी-पुरानी परंपराओं से
कुछ चलताऊ पूर्वधारणाओं से
और फ़िर बंट जाते हैं लिंगों में
दो आंखों की दो पुतलियों में

तुम्हारी पुतली के एक कोने में
मेरा भी हिस्सा होगा
बंट गया होगा वो भी मगर
किसी " सुशील वर"  के नाम पर

मैं जानती हूं मुझे जाना है
जीना है उस वर के साथ
मुसकुराना है और मुस्कुराते ही रहना है
ताकि तुम मेरी मौन आंखों में
उसी "वर" को सुशील पा सको
और सो सको रात में सुख से.. चिंता रहित...

यहाँ मेरे जिस्म के रेशे भी उधड़ते रहें
और बिखरते रहें फर्श पर
कुछ पागल सपनें ...
कुछ लुच्चे अरमान...
कुछ लफ़ंगी ख्वाहिशे...
और डसा जाता रहे शरीर मेरा
रात भर..
मैं मान लूं दिल कुछ नहीं
एक पम्प के सिवाय
बंद कर लूं आंखें और
सी लूं अपने होंठ
कि तेज़ दर्द में भी नीले शरीर को
हरकत की इजाज़त नहीं

याद आ रही है तुम्हारी सांत्वना
जिसमे एक राजकुमार है
और मैं एक फूल...
याद आ रहा है तुम्हारी कमर का दर्द
तुम्हारी बढी हुई शुगर
याद आ रहा है रंग
बैंक की पासबुक का
पिता के माथे की शिकन
और करवट बदलती पीठ
सब याद आ रहा है सिवाय उस दवा के नाम के
जिससे नींद आती है

इससे पहले कि
बेसाख़्ता एक चीख़ से
खुल जाएं सीवन मेरे होंठ के
अपनी आवाज़ का हाथ पकड़ा  दो ना !
कि आज़ाद हो जाऊँ मैं
अन्धेरे कमरे की धीमी रोशनी से
धीमी रोशनी के काले दलदल से
जिस महल में तुम चुन गई हो मुझे
उसे तुड़वा दो ना !
तुम निभाओ आदर्श पत्नी का धर्म
सीती रहो फटी परंपरा
उससे पहले मगर

"मेरा गला दबा दो मां !! "
___________________________

अल्लाह क़सम ! हम नहीं कहेंगे किसी

अल्लाह क़सम
हम नहीं कहेंगे
नहीं कहेंगे किसी से

कितनी चालाकी से नोच लिये थे आपने
हमारी पानी वाली आंखों से
डूबते-उतराते उजले सतरंगी सपने
फ़िर कितने मीठे तरीक़ों से
कुरेद कर खुरचा उन्हें
उन्हीं पारम्परिक सामाजिक नाखूनो से

आपने काट दीये थे हमारे डैने
"मुझे चांद चाहिये" कहने से पहले
हमने देखना चाहा आकाश
आपने दिखा दी मंडराती हुई चीलें
फ़िर घुसेड दिया
घर के भीतर वाले सबसे अंधेरे कमरे में
जो सङांध मारती आज़ादी की क़ब्र पे खड़ा था

हम नहीं कहेंगे किसी से
कब कितनी
रिश्तेदारी की झक्क सफ़ेद पोशाकों में
विशालकाय मर्दानी आकृतियाँ
कमरे में आती रही
हमें पुचकारती रहीं
यहां-वहां सहलाती रहीं

हम नहीं बताएंगे किसी को
कि चौराहे का पान वाला
और चाय वाला भी
रोज़ आंखों से चुन्नी सरकाकर
झांक लेता है भीतर तलक
और नाप लेता है मन ही मन
जिस्म की हर उठान गिरान

हम नहीं पूछेंगे किसी से
खुदा से भी नहीं
शुचिता की सब परिभाषाएं
पवित्रता के सारे प्रमाण पत्र
सिर्फ हमारे ही शरीर पर आकर क्यों रुके रहें
क्यों हमारे विचार कूडे की तरह dustbin में फेंके गये
और जिस्मों की सब गुलाबी मुलामियत
और मासूमियत
क्यों अंधेरे नीले कमरो में बेचे गये

मगर हम नहीं पूछेंगे किसी से
नहीं कहेंगे किसी से
कि यहां बोलने पर तेज़ाब है
सर उठाचलने पर बलात्कार

फ़िर भी हमारी हिम्मत (बेशर्मी ?) देखिये
जियेंगे हम सौ-सौ बार
और जिला ले जाएंगे अपने बेहया सपने
पूरे सम्मान के साथ पूरा करके उन्हें
दे देंगे सारा श्रेय आपको
___________________________


(रचनाकार-परिचय :

जन्म: पहली जून 1987 को अवध में
शिक्षा: लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज, गोंडा से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर
सृजन :  कुछ पोर्टल पर कविताएं और लेख
संप्रति : लखनऊ में रहकर स्वतंत्र लेखन
संपर्क :  nazish.ansari2011@gmail.com )




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सोमवार, 25 मार्च 2013

हवा में उड़ते खुश्क ज़र्द पत्ते की तरह



 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
ख़ालिद ए ख़ान  की क़लम से 

यूँ ही आई तुम
हमेशा की तरह
हवा में उड़ते
खुश्क  ज़र्द  पत्ते की  तरह
अनायास !

ओठों पर वही
बेतरतीब सी ठहरी हंसी
कुछ दरकी हुई 
नामालूम सी उलझी आँखे !
 
तुम्हारे आने ने
चौकाया
मुझे
पहले की तरह !
 
आते ही उलझ जाना
तुम्हारा कमरे से
और बासी फूल
में खुशबु ढूंढने की
नाकाम सी कोशिश
कितनी खीज
पैदा करती है !
 
एक सिरे से छूती हुई
मुक्तिबोध,,नरूदा   अलोक धन्‍वा,शमशेर
पाश,ग़ालिब,
मीर, पर रूकी
तुम्हारी उंगलियां !
ना जाने कितना वक़्त
बह गया
अब तक
मैं पकड़ न सका !
 
और फिर
हौले से बैठ
जाना पायताने
तुम्हारा !
 
तुम्हारी
गहरी उजली बेबाक
आँखों के किनारे
बैठा मैं !

देख रहा हूँ
लहरों की
सूरज को डुबोने  की
जिद को
खामोशी से !
 
 
 मैं
गुमनाम सफ़ीने सा
भटक जाता हूँ
तुममे ही  कही !
 
तुमने रेत पर लिखा
कुछ
अपनी उंगलियों से
लहरों ने आगोश में ले लिया
मैं पढ़ न सका !
 
कुछ कहा भी
पर हवा ने
चुरा लिया कि
एक हर्फ़ भी ना
आया हाथ
 
हमारे बीच की ज़मीं सिमट गई खुद में
और रात ने लपेट लिया  एक ही चादर में हमें !

उफ़ ये
तुम्हरी साँसों
की तपिश में
 
मेरा जिस्म
बर्फ की  मानिंद 
पिघल रहा  है
 
 
तुम्हारी लहरें
किनारों की तरह
काट रही है मुझे
मैं रेत की  तरह
घुल रहा हूँ तुममे !
 
तुम्हारी
ठहरी साफ़ आँखें
जहां छोड़ आया था
अपना गाँव
अपने खेत
अपने जंगल

और
वो काली पंतग
जो लटकी है अभी भी
उस बरगद की टहनी पर 
जहाँ  अब भी 
नहीं पहुचते मेरे हाथ !
 
क्या
खेत वही है
अब भी
जहा
धान की रुपाई करती
आधी भीगी हुई
 औरतें  गीत गाती थी
जो समझ में
ना आने पर भी
कितना  मीठा
लगता था !
 
क्या
दीखते है  जंगल
पहली बारिश में नहाये हुये
तुम्हारी आँखों में
वैसे अब भी हैं !
 
ये दम तोडती
ख़ामोशी तुम्‍हारी
ये तुम्‍हारा
अजनबीपन
और बेवजह छोड़कर जाना
कितने सवाल छोड़ जाता है
पीछे
और छोड़ जाता
घना निर्वात !


उनके खाली बजते पेटो को
 भर दिया गया
दुनिया के सबसे  महगे लोहे से 
उनका रक्त बहा दिया गया
उस जमीन पर 
जिसे उन्होंने  
प्यार किया था

उन्होंने  
प्यार किया था

जंगल को जंगल की  तरह 
पड़ों को पड़ों की  तरह
नदियों को नदियों की  तरह
पहाड़ों को पहाड़ों की तरह
उन्होंने  प्यार किया था
जिसे खुद से भी ज़्यादा
जब सरकारी बूट
जंगल को नंगा करके
कर रहे थे उसका बलत्कार
तो तुमने भी
अपने कपडे उतर दिए
तुम ऐसे  चीखी
जैसे उस रात चीखी थी
जब एक थुथला बुढा शरीर
खुरच रहा था
किसी गाव से खरीदी
गयी बच्ची का शरीर !
थकी हुई रात
सड़क के किनारे
अधेरे में लिपटी देह
 उनकी  सांस के सहारे
उतर जाना तुम्हारा
पक्की ,दुर्गन्ध ,जलते
हुए रक्त की सडन
कारखानों के  धुएं
से भरी  घुप अधेरी  सड़कें पर !

मशीनों,ह्थोड़ो
का बहरा करता शोर
यहां ख्वाब नहीं मिलते
लाख ढूंढने पर भी
बस यंत्र की तरह
लगते हैं
यह जिस्म
जाने कब बदल गए 
हथौडे, बेलचे, मशीन में !

अंधी, बहरी, अभिशिप्त
गलियों में
तुम अषाढ के पानी
की तरह घुसी
और जर्जर दीवारों
पर सीलन की तरह
उभर आई

जहा एक थकी देह
दरवाजा खुलने और बंद
होने के बीच में
कर रही अपनी साँसो को 
व्यवस्थित


उसे देह पर पड़ने
वाले घाव, धक्के
तुम खुद पर झेलती रही 
अनवरत....
देर से  लौटी  तुम
उजड़ी, बोराई आँखे लिए
कुछ  बडबडाते हुवे 
आई और कुर्सी
पर उकडूँ  बैठ गई
तुम्हारी बड़बड़ाहट
कमरे को हिलाती
इन ऊंची  इमारतो को नचाती
गाव जगलो को बेसुरा करते
खदानों में
बासुरी की तरह
लौट रही थी
अनुतरित
नहीं नहीं
ये कविता नहीं है
ये कविता की भाषा नहीं है
ये भाषा राख की  है
जले हुए  घरौंदों की।
ये भाषा रक्त की  है
खेत में फैले हुये रक्त की।
ये भाषा

हल की भाषा है
जिनकी फसले पकने से पहले
गोदामों में पहुँचा  दी जाती है
ये भाषा थके हुवे हाथो  की  है
जब जाने कब से खाली है
ये भाषा पेटों की है
जिनकी रोटियाँ
हवा में उछाल देते हो
और देखते हो तमाशा
ये भाषा उन अनाम मासूम
बच्चो की है
जिन्हें  तुम गाँव से खरीद
लाते हो और
अजीब-अजीब नामो से
पुकारते हो 
ये भाषा उनकी है
जिसे  तुम्हरे सभ्य समाज
ने  बनाया 
फिर कर दिया बहिष्कृत
ये भाषा उनकी है
जिनके कपडे उतार कर
सजा देते हो महलो की दीवारों पर
ये भाषा उनकी भी है
जिनकी फ़रियाद दब जाती है
मंदिर की घंटियों
मस्जिद की अजानो के शोर में 
ये भाषा उनकी तो है ही
जिनकी चीखो को
फाइलओ में दबा कर
फेक देतो हो
अधेरे  गोदाम में
ये भाषा न
किसी देश
किसी जाति
किसी कौम की है
जानता हूँ
तुम इस भाषा से
डरे और काँपे हुए हो
तुम इस को गुंगा बना देना
चाहते  हो या 
ख़त्म  कर  देना चाहेते हो
पर
ये भाषा
दूब की भाषा है 
जो तुम्हारी
हर तबाही के बाद
बचा लेती है
अपने अन्दर
थोड़ी सी हरितमा
तुम इस भाषा को
मिटा नहीं सकते हो
देख सकते हो
तो देखो
तुम्हारे
महलो, कगुरे.बुर्जो
की दरारों में
ये अब अकार ले रही है

देख सकते हो तो देखो
फैली दूब के नीचे
न जाने  कितने तख़्त
कितने ताज  दफन है
देख सकते हो
तो देखो
तुम !

(कवि-परिचय:
जन्म: 13 दिसम्बर 1983 को सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में।
शिक्षा: लखनऊ से वाणिज्य स्नातक। उसके बाद कंप्यूटर डिजाइनिंग का कोर्स किया।
सृजन: कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
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सम्प्रति: डाटा गोल्ड में वेब डिजाइनर
संपर्क: khalida.khan2@gmail.com)


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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)