बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 5 नवंबर 2014

खत को लेकर चोंच में यादें खड़ीं रहीं, किताबों के पन्ने खोल दिए डाकिया आ गया

आओ फिर से चिट्ठियाँ लिखें ....













विजेंद्र शर्मा की क़लम से

घर में कुछ मेहमान आये हुए थे उनके साथ चाय की चुस्कियों का लुत्फ़ लिया जा रहा था ! दसवीं जमात में पढ़ने वाली मेरी बेटी आयी और कहने लगी कि पापा कोई बेटियों पे शे'र लिखवा दो कल स्कूल में एक छोटा सा कार्यक्रम है मैं  सुनाऊंगी  ! मुझे पदम् श्री बशीर बद्र साहब का एक मतला याद आया और उसे सुनाया : 
वो शाख़ है न फूल अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियां न हों

इसी ग़ज़ल का मुझे एक और ख़ूबसूरत शे'र याद आ गया मैंने सोचा मेहमानों को ये भी सुनाया जाए :

मैं पूछता हूँ मेरी गली में वो आये क्यों
जिस डाकिये के पास तेरी चिट्ठियाँ न हो

शे'र सुनते ही मेहमान तो वाह -वाह करने लगे मगर बेटी ने एक सवाल दाग़ दिया " पापा ये डाकिया क्या होता है ? उसका ये सवाल मेरे ज़हन में न जाने कितने और सवाल पैदा कर गया ! मैंने उसे बताया कि बेटे पोस्ट मैन को डाकिया कह्ते है ,जो हमारी चिट्ठियाँ हम तक पहुंचाता है ,बेटी को बात आधी -अधूरी समझ आयी, उसका प्रश्न स्वाभाविक था जब से उसने होश सम्भाला घर में कौनसी चिट्ठियाँ आयी थी और मैंने भी तो एक मुद्दत से किसी को ख़त नहीं लिखा था !
बेटी का ये कहना कि "डाकिया क्या होता है" मेरे ज़हन में ऐसा शोर करने लगा जो शोर अख़बार के छपते वक़्त प्रिंटींग मशीन करती है ! मैं सोचने लगा कि आख़िर कौन- कौन से ऐसे तत्व हमारे जीवन में आ गये जिससे कि  हम हमारी ज़िंदगी के एक अहम किरदार "डाकिये"  को भी भूल गये ! मेरे ज़हन में फ़िक्र मश्क़ करने में लगी ही थी कि अचानक एक दोहे की शक्ल में मुझे इस सवाल का जवाब भी मिल गया :

मोबाइल ई - मेल ने , कैसा किया कमाल !
क्या होता है डाकिया ? बच्चे करें सवाल !!

हालांकि तकनीक में आयी क्रांति ने हमारे जीवन को बड़ा सुलभ बना दिया है  , दूर रह रहे अपनों से हम फट से बातें करने लगे हैं , बड़े-बड़े काग़ज़ात इक पल  में ई-मेल के ज़रिये एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे है जिन्हें डाक के ज़रिये  भेजने में कई दिन लग जाते थे ! दोस्ती , जान- पहचान , संबंधों और रिश्तों का पूरा सागर जैसा फैलाव सिकुड़ कर एक मोबाइल में क़ैद हो गया  है ! मुनव्वर राना ने इसे यूँ बयान किया है  :

अब फ़ासलों की कोई हक़ीक़त नहीं रही
दुनिया सिमट के छोटे से इक सिम में आ गई

मुझे लगता है कि नयेपन के चस्के और वक़्त से भी आगे निकलने के चक्कर में हम लोग उन चीज़ों को भी भुलाते जा रहें हैं जो हमारी ज़िंदगी का कभी अहम हिस्सा थी ! .ख़त और डाकिया दो ऐसी चीज़ें थी जो हमे इंतज़ार के लुत्फ़ से जुदा नहीं होने देती थीं ! हर उम्र की आँखों को चिट्ठी का इंतज़ार रहता था ! एक माँ को सरहद पे तैनात बेटे की चिट्ठी का , बहन को अपने भाई की खैर-ख़बर की चिट्ठी का , एक बीवी को रोटी की जुगत में परदेस गये शौहर की चिट्ठी का, एक बे-रोज़गार को किसी सरकारी महकमें से नौकरी के लिए आये बुलावे  और ज़माने की नज़रों से छुप कर मुहब्बत करने वालों को अपने मुहब्बत- नामे का इंतज़ार रहता था ! इंतज़ार की इस सियाही से लिखी तहरीर ( लिखावट ) को जो शख्स सबसे ज़ियादा पढ़ना जानता था, बड़ा अफ़सोस है कि अब वो डाकिया प्राय-प्राय लुप्त सा हो गया है !
ख़त, हमारी ज़िंदगी और हमारे अदब ( साहित्य ) का   हिस्सा थे  जिसे भुला कर हमने  अपनी तहज़ीब के दरख्त को ख़ुद अपने ही  हाथों से काट दिया !
मीर ओ ग़ालिब के ज़माने से ही ख़त और ख़त को पहुंचाने वाले डाकिये (क़ासिद, नामावर ) के बिना शाइरी अधूरी थी ! मीर ने तो ख़त और क़ासिद के हवाले से एक पूरी ग़ज़ल ही कह दी थी ! उस ग़ज़ल का मतला और एक शे'र मुलाहिज़ा हों :

न पढ़ा ख़त को या पढ़ा क़ासिद
आख़िरे -कार क्या कहा क़ासिद
है तिलस्मात उसका कूचा तो
जो गया सो वहीं रहा क़ासिद

उस ज़माने में ये आलम था कि ख़तों का सिलसिला  थमता ही नहीं था तभी तो ग़ालिब ने कहा कि :

क़ासिद के आते -आते ख़त इक और लिख रखूं
मैं  जानता  हूँ  जो   वह   लिखेंगे  जवाब  में

ग़ालिब शाइरी के साथ - साथ ख़त लिखने में भी बड़े माहिर थे उनके अहबाब ( मित्र ) उनसे अपने मुहब्बत-नामे (प्रेम-पत्र ) लिखवाने आते थे ! अपनी एक मक़बूल ग़ज़ल में ग़ालिब ने इसी लिए ये शे'र कहा :

मगर लिखवाये कोई उसको ख़त ,तो हम से लिखवाये
हुई सुबह , और घर से कान पर रखकर क़लम निकले
आज की नस्ल मोबाइल के एसएम्एस (SMS)की दीवानी है मगर ये एसएमएस और ई-मेल कोई सहेज के नहीं रखेगा,  ख़त सहेज के रखे जाते थे ग़ालिब ने जो ख़त लिखे लोग  आज उन पर शोध कर के पीएचडी कर रही है ! ख़त जिन्हें  अब हमने लिखने बन्द कर दिये हैं  वाकई  धरोहर होते है तभी तो ग़ालिब ने पहले ही लिख दिया था :
चंद   तस्वीर-ए-बुताँ , चंद हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मिरे घर से यह सामान निकला

  नौजवान शाइर  डॉ. विकास शर्मा  ख़तों को अपनी  पूंजी  समझते है और अगर  नई उम्र का  कोई शाइर इस ख़याल को शाइरी में ढालता है तो थोड़ी उम्मीद जगती है कि ख़ुतूत की क़ीमत हमारी नई - नस्ल को मालूम तो है ! डॉ .विकास शर्मा "राज " का ये मतला और शे'र सुनने के बाद उनके क़लाम को सलाम करने का मन करता है :

क़बीले से जुदा कर दे
मुहब्बत बावला कर दे
ख़तों को भी उठा ले जा
मुझे दिवालिया कर दे

ख़त होते ही ऐसे थे जिन्हें मुहब्बत करने वाले महबूब के दिये गुलाब  की तरह किताबों में संभाल के रखते थे आज की तरह नहीं कि  एस. एम् .एस पढ़ा ज़ियादा से ज़ियादा एक-दो  रोज़ रखा और डिलीट कर दिया ! हसरत मोहानी ने यूँ ही थोड़ी कहा :

 लिक्खा था अपने हाथ से तुमने जो एक बार
अब तक हमारे पास है वो यादगार ख़त

ख़तों के उस ज़माने में ऐसे - ऐसे ज़ावियों (कोण )  से शाइरों ने अपनी बात कही कि बस आह-वाह अपने - आप दिल से निकलने लगे, बशीर बद्र के ख़त लिखने का अंदाज़ सबसे मुख्तलिफ़ था :

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं

कई बार मुहब्बत में ऐसे भी मुकाम आते थे कि ख़त जला दिये जाते थे, मगर वे कोई आज के एसएमएस की तरह डिलीट नहीं होते थे उनकी तहरीर ज़िन्दा रहती थी ! बकौल वसीम बरेलवी  :

प्यार की फांस किसी तरह निकलती भी नहीं
ख़त जला डालिये तहरीर तो जलती भी नहीं 
 ख़त लिखने में कोई आंसुओं की सियाही काम में लेता था  तो कोई अपना लहू इसलिए न तो कोई इन्हें फाड़ता था ना ही कोई जलाता था ..हाँ मगर राजेंदर नाथ रहबर ने किसी के मुहब्बत भरे ख़त गंगा में ज़रूर बहाए :
तेरे खुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मैं गंगा मैं बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

मोबाइल के किसी एक मैसेज को आप दो -तीन बार से अधिक नहीं पढ़ते मगर जब - ख़तों का दौर था तो ख़त को कई - कई बार पढ़ने के बाद भी मन नहीं भरता था !
इसका कारण ये था कि ख़त लिखने वाला अपने जज़बात , अपने आंसू यहाँ तक कि अपने लहू तक को सियाही बना देता था ! जब आंसुओं की सियाही से कोई ख़त लिक्खा हो तो शाइर यहाँ तक तसव्वुर करता था :

 सियाही आँख से ले कर  ये नामा तुमको लिखता हूँ
कि तुम नामे को देखो और तुम्हे देखें मेरी ऑंखें
 
(नामा =ख़त )

 ये पाकीज़गी , ये शिद्दत क्या आज की  नस्ल समझ पाएगी , शायद नहीं क्यूंकि हमने उन्हें चिट्ठियों से दूर कर दिया है ! आज के बच्चे पुराने गानों से भी दूर होते जा रहें है अगर पुराने फ़िल्मी गीतों से भी उन्हें लगाव हो जाए तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि ख़त क्या होते है और डाकिये की क्या अहमियत होती है ! हमारे फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों ने ख़त को लेकर जो गीत लिखे वो मशहूर हुए और लोगों की ज़ुबान पे चढ़ गये !  इन्दीवर का लिखा ये गीत : 

फूल तुम्हे भेजा है ख़त में ,फूल नहीं मेरा दिल है
प्रियतम मेरे तुम भी लिखना क्या ये तुम्हारे काबिल है
प्यार छिपा है ख़त में इतना, जितने सागर में मोती
चूम ही लेता हाथ तुम्हारा पास जो मेरे तुम होती

नीरज जी का लिखा ये गीत :

फूलों के रंग से दिल की क़लम से तुझको लिखी रोज़ पाती
कैसे बताऊं किस किस तरह से पल पल मुझे तू सताती

"नाम" फिल्म के लिए आनंद बक्शी ने जब ये गीत लिखा तो जिसने भी सुना उसे अपने घर की दास्तान मालूम हुई , पंकज उदास के गाए इस गीत ने लोगों की सोई हुई संवेदनाओं को जगाया ,हमे अपने बच्चों को  ये गीत ज़रूर सुनाना चाहिए :

चिट्ठी आयी है आयी है चिट्ठी आयी है ....

फिल्म "बोर्डर" के लिए जब जावेद अख्तर की लिखी चिट्ठी " संदेशे आते है हमे तड़पाते है , के घर कब आओगे , लिखो कब आओगे .....को सोनू निगम ने गाया तो वो भी लोगों के दिलों में घर कर गयी ! ये सब चिट्ठी / ख़त के ही तो कमाल थे !
आनंद बक्शी ने भी सनम को ख़त लिखा त ऐसे लिखा :

हमने सनम को ख़त लिखा ख़त में लिखा .....
ऐ दिलरूबा दिल की गली शहरे वफ़ा ..
इसी गीत में ये मिसरा तो कमाल का लिखा
पहुंचे ये ख़त जाने कहाँ ,जाने बने क्या दास्ताँ
उस पर रकीबों का ये डर लग जाए उनके हाथ गर

जब ख़तों के दौर थे तब एक बात का अंदेशा हमेशा बना रहता था कि ख़त किसी के हाथ ना लग जाये ,ख़त को न जाने कहाँ - कहाँ छिपा के रखा जाता था कभी किताबों में , अलमारी में , संदूक में तो कभी दराजों में !  कैसर उल जाफरी ने इसे यूँ शाइरी बनाया :
 

ख़त में दिल की बातें लिखना ,अच्छी बात नहीं
घर में इतने लोग है , जाने किस के हाथ लगे

आज ना तो घरों में इतने लोग होते है ,ना अब घर घर रहें है ना अब वो पहले सी पर्दादारी रही है ! नई पीढ़ी की रफ़्तार देख के अब तो डर लगता है ! आज किसी को देखा , आज ही उस से सीधे - सीधे बात की और आज ही चले गये डेट पे , कहाँ गहराई आयेगी ऐसे प्यार में ! उस ज़माने में इज़हार करने और पहला ख़त लिखने की हिम्मत जुटाने में ही साल गुज़र जाते थे ! हस्ती मल हस्ती जी ग़लत थोड़े कह्ते हैं : 

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नए   परिंदों   को  उड़ने    में वक़्त   तो   लगता है
 
जब पहला ख़त लिख दिया जाता था और महबूब तक पहुँच जाता था तो फिर मुहब्बत परवान चढ़े बिना दम नहीं लेती थी ! ऐसा भी नहीं था कि सभी ख़तों के नसीब में महबूब तक पहुंचना लिखा हो  कुछ ख़त बस लिखे ही रह जाते थे ! कुंवर बैचैन साहब ने जो ख़त लिखे वो आज भी उनकी दराजों में है :
अब भी किसी दराज  में मिल जायेंगे तुम्हे
वो ख़त जो तुमको दे न सके लिख-लिखा   लिए

 बशीर बद्र साहब पे क्या गुज़री वो तो उन्होंने बताया नहीं हाँ ये ज़रूर कहा उन्होंने :

हम पे जो गुज़री बताया न बताएँगे कभी
कितने ख़त अब भी तेरे नाम लिखे रक्खे  है

कुछ ऐसे बदनसीब ख़त भी थे जिन्हें लिखने वाला उनसे भी बड़ा बदनसीब था :

मैंने जितने मुहब्बत भरे ख़त लिखे
सब पे अपने ही घर का पता लिख दिया

अगर ख़तों का सिलसिला  किसी वजह से थम जाता था  तो सिर्फ़ ख़त में ये लिखा हुआ आता था :

हमसे क्या ख़ता हो गयी कि ख़तों का आना बन्द है
आप ख़फ़ा  है हमसे या फिर डाक खाना बन्द है

ख़तो-ख़तावत से कोसों दूर हो चुकी हमारी नई पीढ़ी को ख़त लिखने के लिए हमे प्रेरित करना चाहिए ! ख़त लिखना भी शाइरी और कविता लिखने की तरह एक आर्ट है ! जो ख़ूबसूरत ख़त दुनिया के सामने आये है उन्हें पढ़ा जाए तो इन नए- चराग़ों  को पता चले कि  बिन बाती के जलने का हुनर क्या है ! अमृता प्रीतम  और इमरोज़ के ख़त पढ़कर महसूस किया जा सकता है कि मुहब्बत ऐसे होती थी वैसी  नहीं जो आज की नई उम्र की खुदमुख्तारियो ने समझ लिया है ! मिसाल के तौर पे अमृता और इमरोज़ के ख़तों के कुछ अंश आपको पढवाता हूँ :

"यह मेरा उम्र का ख़त व्यर्थ हो गया ! हमारे दिल ने जो महबूब का पता लिखा था ,वह हमारी क़िस्मत से पढ़ा न गया ..तुम्हारे नए सपनों का महल बनाने के लिए अगर मुझे अपनी ज़िंदगी खंडहर भी बनानी पड़े तो मुझे एतराज़ नहीं होगा ! जो चार दिन ज़िंदगी के दिये है ,उनमे से दो की जगह तीन आरज़ू में गुज़र गये है और बाकी बचा एक दिन सिर्फ़ इंतज़ार में ही न गुज़र जाए !अनहोनी को होनी बना लो मिर्ज़ा ..... 
तुम्हारी अमृता

इमरोज़ ये लिखते हैं :

मुझ पे और भरोसा करो , मेरे अपनत्व पे पूरा एतबार करो !  जीने की हद तक तुम्हारा ! ये अपने अतीत ,वर्तमान   और  भविष्य    का   पल्ला   तुम्हारे  आगे  फैलाता  हूँ  , इसमे  अपने अतीत , वर्तमान  और भविष्य  को  डाल  दो   जीतो  !.
तुम्हारा  इमरोज़

 ये था प्यार और खतों के ज़रिये इस तरह अपने दिल की बात पहुँचती थी ! हम फोन पे किसी को अपने दिल के जज़बात नहीं कह सकते ना ही उन्हें मोबाइल के मैसज में तब्दील किया जा सकता है ! दिल के जज़्बे तो अपने हाथ से ही काग़ज़ के सीने पे उकेरे जा सकते हैं !
ख़तों के दौर में लोगों का रुझान अदब ( साहित्य ) की तरफ़ ख़ुद ब ख़ुद हो जाता था ! ख़त तक़रीबन सभी लिखते थे और ख़त लिखना किसी अनुष्ठान से कम न था और जब मोहतरम डाकिया जी  गली में नज़र भर आ जाते थे तो  उत्सव का  सा नज़ारा हो जाता था ! ख़त में संबोधन क्या लिखना है ...इसकी शुरुआत किस लफ़्ज़  से की जाए वगैरा -  वगैरा उस वक़्त एक इम्तेहान की तरह होता था ! अपनी प्रेयसी को ख़त लिखते समय कुछ तो  ..मेरी ग़ज़ल , मेरी जाने जाँ , मेरी तरन्नुम , मेरी रूह , मेरे ख़्वाबों की मल्लिका आदी  संबोधन का इस्तेमाल करते थे ! आशिक के दिल  का जज़्बा क़लम में मिसरी  की डली की तरह घूल जाता था  जबकी आज ख़त लिखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता मैसज में लिखा जाता है hi स्वीटू ,hi जानू  जैसे संबोधन जो किसी भी कोण से   मुहब्बत की राह के मुसाफ़िर नज़र नहीं आते !

ख़त वाकई अमूल्य पूंजी थे , नेहरू जी के  पत्र  "भारत एक खोज " जैसा एतिहासिक दस्तावेज़ हो गया ! मेरे फ़िरोज़ पुर में एक मित्र है गौरव  भास्कर उनके वालिद स्व. श्री मोहन लाल भास्कर कवि थे उनके मरासिम  हरीवंश राय बच्चन  जी से बहुत अच्छे थे ! भास्कर साहब बदकिस्मती से पाकिस्तान में जासूसी के इल्ज़ाम में पकडे गये ! सात साल तक उन्होंने पाकिस्तान की जेलों में यातनाएं सही ! बच्चन जी तब विशेष मंत्रालय में थे उन्होंने भास्कर साहब की रिहाई में अहम रोल अदा किया ! उस दौरान उनमें ख़तों का बड़ा आदान - प्रदान हुआ ! गौरव भाई की माता जी ने उन सब ख़तों को सहेज के रखा ! किसी माध्यम से जब अमिताभ बच्चन साहब को पता चला कि बाबू जी के हाथ से लिखे ख़त फीरोज़पुर में किन्ही के पास है तो ख़बर की पूरी तस्दीक के बाद अमिताभ जी ने उन्हें सपरिवार मुंबई बुलवाया उस परिवार का सम्मान किया  और उन ख़तों की एक - एक प्रीति  ली  ,ये है ख़त की ताक़त !
अपने महकमे की बात करता हूँ , सरहद पे तैनात जवान के लिए ख़तों की बहुत  अहमियत होती थी   ! घर से बीवी - बच्चों के ख़तों  का सरहद के पहरेदारों को इंतज़ार रहता था ! बीवी लिखती थी कि आपके जाने के बाद   मन  नहीं लग रहा , जी बहुत घबराता है तो जवान भी ख़त के ज़रिये जवाब दे देते थे !
भाई जीतेन्द्र परवाज़ ने इसे  महसूस किया और लिखा :

तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है
तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर 

मगर जब से ख़तों की जगह मोबाइलों ने ले ली हमारे यहाँ समस्या कुछ गंभीर  हो गयी है !  पहले ख़त के आने में दस-पंद्रह  दिन लग जाते थे ! पीछे से जवान के घर में अगर कोई बात हो जाती या  सास - बहू की मामूली कहा - सुनी हो जाती तो जब तक बीवी ये सब ख़त में लिखती उस से पहले मुआमला शांत हो जाता था मगर अब  मोबाइल के दौर में जैसे ही घर में कोई बात होती है घर से फ़ौरन फोन आ जाता है जवान अपनी ड्यूटी पे एक दम परेशान हो जाता है और कई बार ऐसा भी हुआ  कि जवानों ने ख़ुदकुशी भी कर ली ! इस लिहाज़ से  ख़तों का ज़माना सरहद के प्रहरी के लिए ज़ियादा   बेहतर  था !
 एक ज़माना था जब ख़तों को पहुंचाने का काम कबूतर किया करते थे ! क़ासिद का किरदार कबूतरों ने बड़ी ख़ूबी से   निभाया वे इतने  मंझे हुए होते थे कि सीधा ख़त उसी को देते  जिसके लिए लिखा जाता था  ! अस्सी के दशक के आख़िर में आयी फिल्म " मैंने प्यार किया में " इस की मिसाल भी दी गयी , कबूतर जा जा जा कबूतर जा ...वाला गीत भी बड़ा प्रसिद्ध  हुआ ! जाने - माने शाइर राहत इन्दौरी ने भी इसी मफ़हूम से  शे'र निकाला  :--
 

अगर ख़याल भी आये कि तुझे ख़त लिखूं
तो घौसलों से कबूतर निकलने लगते हैं

आठों पहर मोबाइल से चिपके रहने वाली ये नस्ल कहाँ समझेगी कि ख़त क्या है, कबूतर क्या है और डाकिया क्या ! राजेश खन्ना अभिनीत एक फिल्म आयी "पलकों की छाँव में " उसके लिए गुलज़ार ने एक गीत लिखा  "डाकिया डाक लाया ....   राजेश खन्ना का खाकी वर्दी में साइकल पे फिल्माया  ये गीत हर आँख में डाकिये की  सच्ची  तस्वीर बनाता है मगर हमारे आज के बच्चे ऐसे गीत भी तो नहीं सुनते है जिससे  उन्हें पता चले कि डाकिया क्या होता है !
डाकिये की शान में निदा फाजली ने तो यहाँ तक लिखा :

सीधा - साधा डाकिया , जादू करे महान !
इक ही थैले में भरे , आंसू ओ मुस्कान !!

 चिट्ठी या डाक अपने गंतव्य तक जल्दी से जल्दी पहुंचे लोगों ने डाक महकमे की जगह कुरियर कंपनियों पे भरोसा करना शुरू किया मगर जब डाक ले के कुरियर कंपनी का कोई नुमाइंदा आता तो वो डाक तो दे के चला जाता पर वो  डाकिये जैसा मुहब्बत का रिश्ता नहीं बना पाया ! वक़्त के साथ - साथ ख़त लिखने का चलन कम होता गया  और ख़त लिखने की लोगों को ज़रूरत भी नहीं रही ! चिट्ठी के काम मोबाइल से होने लगे और डाकिया हमारे स्मृति पटल से गायब होने लगा मुझे आज भी याद है  शाम के वक़्त रोजाना डाकिया हमारे मोहल्ले में आता था ! मोहल्ले की औरतें एक दूसरे से  पूछती रहती थी कि डाकिया आया क्या , बगल वाली अम्मा को अपने बेटे के मनी -ऑर्डर का इंतज़ार रहता था ! बहुत से दरवाज़े बार - बार सिर्फ़ डाकिये की प्रतीक्षा में पलकें बिछाए रहते थे ! अब तो ये नज़ारा देखे बरसों हो गये तभी मैंने लिखा :

कब आवेगा डाकिया , पूछे कौन सवाल !
क़ासिद को देखे हुए , गुज़र गये है साल !!

बीकानेर के कलंदर सिफ़त शाइर शमीम बीकानेर से एक दिन इसी मौज़ू पे गुफ्तगू हो रही थी उन्होंने कहा कि विजेंदर भाई मैं ये प्रण करता  हूँ कि आज से ख़त लिखने का सिलसिला दोबारा शुरू करूंगा ! मेरी आप सब से भी  यही  गुज़ारिश है कि हम एक बार फिर से ख़त लिखने का सिलसिला शुरू करें  अगर कोई बहुत ज़ियादा आपात स्थिती ना हो तो हम सिर्फ़ ख़त लिखें और हो सकता है कि हमे देख कर  बच्चों को भी लगेगा कि वाकई ये मुआमलात इस मैसजबाज़ी  से बेहतर है ! ऐसा करने से हम फिर से अदब से जुड़ जायेंगे , इंतज़ार के लुत्फ़ से  फिर से मुखातिब होंगे  ,हमारी सूखी हुई क़लम में रोशनाई आ जायेगी और राह  भटकी हुई हमारी नई पीढ़ी फिर से तहज़ीब के फ्रेम में अपनी तस्वीर तलाश करने लगेगी !
 उम्मीद करता हूँ  कि  आप सब  भी  शमीम बीकानेरी की तरह ख़त लिखने  का सिलसिला फिर से शुरू करेंगे  और  ये अलख जगायेंगे  कि " आओ फिर से चिट्ठियाँ लिखें ...

 उदय प्रताप सिंह जी की इन्ही पंक्तियों के साथ विदा लेता हूँ   :

सब  फैसले होते  नहीं सिक्का उछाल के
 ये दिल का मुआमला है ज़रा देख भाल के

ये  कह के नई रौशनी रोयेगी एक दिन
अच्छे थे वही लोग पुराने ख़याल के 

मोबाइलों के दौर की नस्लों को क्या पता
रखते थे ख़त में  कैसे कलेजा निकाल के
 



(लेखक परिचय:
जन्म: 15 अगस्त 1972, हनुमान गढ़ (राजस्थान)
शिक्षा: विद्युत् इंजीनियरिंग में स्नातक एवं एमबीए
सृजन: गत पंद्रह  वर्षों से शायरी पर लेखन. दोहा  लेखन भी ...
           विभिन्न अखबारात के लिए साप्ताहिक कॉलम
संप्रति : सीमा सुरक्षा बल में  उप कमांडेंट, नई दिल्ली
संपर्क:  vijendra.vijen@gmail.com )





छत्तीसगढ़ रायपुर के  इतवारी अख़बार के 16 नवंबर 2014 के अंक में प्रकाशित
विजेंद्र शर्मा हमज़बान  में पहले भी

शीर्षक क़मर सादीपुरी का इक शेर
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रविवार, 16 दिसंबर 2012

ग़ज़ल इस्मत बचाए फिर रही है.......

एक भी  शे’र अगर हो जाए







 




विजेंद्र शर्मा की क़लम से 
इसमें कोई शक़ नहीं कि अदब की जितनी भी विधाएं हैं, उनमे सबसे मक़बूल ( प्रसिद्ध ) कोई विधा है, तो वो है ग़ज़ल ! दो मिसरों में पूरी सदी की दास्तान बयान करने की सिफ़त ख़ुदा ने सिर्फ़ और सिर्फ़ ग़ज़ल को अता की है ! यही वज्ह है कि जिसे देखो वही ग़ज़ल पे अपने हुनर की आज़माइश कर रहा है ! ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल कहने के लिए शाइर को उर्दू रस्मुल-ख़त (लिपि) आना ज़रूरी है मगर ग़ज़ल से सम्बंधित जो बुनियादी बातें है वे तो ग़ज़ल कहने वाले को पता होनी चाहिए ! ऐसे बहुत से शाइर है जो उर्दू रस्मुल-ख़त नहीं जानते पर उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें कही हैं और उनके क़लाम की उर्दू वालों ने भी पज़ीराई की है ! यहाँ एक बात ये भी कहना चाहूँगा कि अगर किसी ने ठान लिया है कि मैंने ग़ज़ल कहनी है तो उसे उर्दू रस्मुल-ख़त ज़रूर सीखना चाहिए क्यूंकि ग़ज़ल से मुतालिक बहुत सी ऐसी नाज़ुक चीज़ें हैं जिनके भीतर तक बिना उर्दू को जाने पहुंचना बड़ा दुश्वारतरीन है !

शाइरी ज़िंदगी जीने का एक सलीक़ा है और शे’र कहने की पहली शर्त है शाइर की तबीयत शाइराना होना ! कुछ ग़ज़लकार अदब के नक़्शे पे अपने होने का ज़बरदस्ती अहसास करवाना चाहते है उनकी ना तो तबीयत शाइराना है ना ही उनके मिज़ाज की सूरत किसी भी ज़ाविये (कोण) से  ग़ज़ल से मिलती है !

शाइरी की ज़ुबान में शे’र लिखे नहीं कहे जाते हैं ! इस तरह के नकली शाइरों की ज़बराना लिखी ग़ज़लें नए लोगों को ग़ज़ल से दूर कर रही है ! इन दिनों अदब के हर हलके में चाटुकारों की तादाद बढती जा रही है और ठीक उसी अनुपात में नए–नए ग़ज़लकार भी!

शकील जमाली की ताज़ा  ग़ज़ल का एक शे’र मुझे बरबस याद आ रहा है .. इस शे’र को सुनने के बाद ही ये मज़मून लिखने का मन हुआ :--

ग़ज़ल इस्मत बचाए फिर रही है

कई शाइर है बेचारी के पीछे ....

ग़ज़ल का अपना एक अरूज़ (व्याकरण/छंद-शास्त्र  ) होता है ! अरूज़ वो कसौटी है जिस पे ग़ज़ल परखी जाती है ! यहाँ मेरा मक़सद ग़ज़ल का अरूज़ सिखाना नहीं है मगर कुछ बुनियादी चीज़ें है जो ये तथाकथित सुख़नवर ना तो जानते हैं और ना ही जानना चाहतें हैं ! अल्लाह करे ये छोटी–छोटी बाते तो कम से कम शाइरी के साथ खिलवाड़ करने वालों के ज़हन में आ जाए !

ग़ज़ल के पैकर (स्वरुप) को देखें तो ग़ज़ल और नज़्म (कविता ) में बड़ा फर्क ये है कि ग़ज़ल का हर शे’र अपना अलग मफ़हूम (अर्थ) रखता है जबकि कविता शुरू से लेकर हर्फ़े आख़िर (अंतिम शब्द )  तक एक उन्वान (शीर्षक ) के इर्द-गिर्द ही रहती है !

ग़ज़ल कुछ शे’रों के समूह से बनती है ! शे’र लफ़्ज़ का मतलब है जानना  या किसी शै (चीज़ ) से वाकिफ़ होना ! एक शे’र में दो पंक्तियाँ होती हैं ! एक पंक्ति को मिसरा कहते है और  दो मिसरे मिलकर एक शे’र की तामीर (निर्माण )  करते हैं ! किसी शे’र के पहले मिसरे को मिसरा-ए -उला और दूसरे मिसरे को मिसरा ए सानी कहते हैं !किसी भी शे’र के दोनों मिसरों में रब्त (सम्बन्ध ) होना बहुत ज़रूरी है इसके बिना शे’र खारिज माना जाता है !

बहर  वो तराज़ू है जिसपे ग़ज़ल का वज़न तौला जाता है इसे वज़न भी कहते हैं ! बहर में शे’र कहना उतना आसान नहीं है जितना आजकल के कुछ फोटोस्टेट  शाइर समझते हैं ! मोटे तौर पे उन्नीस बहरें प्रचलन में हैं ! बहर को कुछ लोग मीटर भी कहते है ! जो शाइर बहर में शे’र नहीं कहते उन्हें बे-बहरा शाइर कहा जाता है और हमारे अहद का अलमिया (विडंबना ) ये है कि रोज़ ब रोज़ ऐसे शाइर बढ़ते जा रहें हैं ! बहर को समझना एक दिन का काम नहीं है और ना ही सिर्फ़ किताबें पढ़कर बहर की पटरी पे शाइरी की रेल चलाई जा सकती है ! बहर का मुआमला या तो शाइरी के प्रति जुनून से समझ में आता है या फिर बहर की समझ  कुछ शाइरों को ख़ुदा ने बतौर तोहफ़ा अता की है !

रदीफ़ :--शाइरी में हुस्न और ख़यालात में फैलाव के लिए ग़ज़ल में रदीफ़ रखा जाता है ! ग़ज़ल को लय में सजाने में रदीफ़ का अहम् रोल होता है ! मिसाल के तौर पे  मलिकज़ादा “जावेद” साहब का ये मतला और शे’र देखें :--

मुझे सच्चाई की आदत बहुत है !

मगर इस राह में दिक्कत बहुत है !!

किसी फूटपाथ से मुझको ख़रीदो !

मेरी शो रूम में क़ीमत बहुत है !!

इस ग़ज़ल में बहुत है रदीफ़ है जो बाद में ग़ज़ल के हर शे’र के दूसरे मिसरे यानी मिसरा ए सानी में बार – बार आता है

क़ाफ़िया :-- क़ाफ़िया ग़ज़ल का मत्वपूर्ण हिस्सा है बिना क़ाफ़िए के ग़ज़ल मुकम्मल नहीं हो सकती ! शे’र कहने से पहले शाइर के ज़हन में ख़याल आता है और  फिर वो उसे शाइरी बनाने के लिए  रदीफ़,क़ाफ़िए तलाश करता है ! क़ाफ़िए का इंतेखाब (चुनाव )शाइर को बड़ा सोच–समझ कर करना चाहिए ! ग़लत क़ाफ़िए का इस्तेमाल शाइर की मखौल उड़वा देता हैं ! राहत इन्दौरी का ये मतला और  शे’र देखें :--

अपने अहसास को पतवार भी कर सकता है !

हौसला हो तो नदी पार भी कर सकता है !!

जागते रहिये,  की  आवाज़ लगाने वाला !

लूटने वाले को होशियार भी कर सकता है !!

इसमें पतवार,पार,होशियार क़ाफ़िए हैं और “ भी कर सकता है”

रदीफ़ है !जिस शे’र में दोनों मिसरों में क़ाफ़िया आता हो उसे मतला कहते हैं ! किसी ग़ज़ल की आगे की राह मतला ही तय करता है ! मतले में शाइर जो क़ाफ़िए बाँध देता है  फिर उसी के अनुसार उसे आगे के शे’रों में क़ाफ़िए रखने पड़ते हैं ! जैसे किसी शाइर ने मतले में किनारों , बहारों का क़ाफ़िया बांधा है तो वह शाइर पाबन्द हो गया है कि आगे के शे’रों में आरों का ही क़ाफ़िया लगाए ना कि ओ का क़ाफ़िया  जैसे पहाड़ों , ख़यालों का क़ाफ़िया ! हिंदी ग़ज़ल के बड़े शाइर  दुष्यंत कुमार ने भी अपनी ग़ज़लात में ग़लत क़ाफ़िए बांधे और तनक़ीद कारों को बोलने का मौका दिया ! दुष्यंत कुमार की एक बड़ी मशहूर ग़ज़ल है :----

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए !

कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए !!

वे मुतमईन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता !

मैं बेक़रार हूँ आवाज़  में  असर  के लिए !!

इस ग़ज़ल के मतले में “घर” के साथ “शहर” का क़ाफ़िया जायज़ नहीं है ,दुष्यंत साहब जैसे शाइर ने फिर अगले शे’र में “असर” का क़ाफ़िया लगाया उसके बाद इसी ग़ज़ल में उन्होंने “नज़र” ,”बहर” ,”गुलमोहर” और “सफ़र” के क़ाफ़िए बांधे ! इस पूरी ग़ज़ल में शहर और बहर के क़ाफ़िए का इस्तेमाल दोषपूर्ण है ! दुष्यंत कुमार की इसके लिए बड़ी आलोचना भी हुई !

ग़लत क़ाफ़िए को शे’र में बरतना शाइर की मुआफ नहीं करने वाली ग़लती है ! ये सब बातें यूँ ही नहीं आती हैं इसके लिए अच्छा मुताला (अध्ययन) होना ज़रूरी है मगर लोगों को पढ़ने का तो वक़्त ही नहीं है बस क़लम और काग़ज़ पर कहर बरपा के सिर्फ़ छपने का शौक़ है ! स्वयंभू ग़ज़लकारों के अख़बारात और रिसालों में छपने की  इस हवस ने सबसे ज़ियादा नुक़सान शाइरी का किया है !

वापिस ग़ज़ल  पे आता हूँ .. शाइर अपने जिस उपनाम से जाना जाता है उसे ”तख़ल्लुस” कहते हैं और अपने तख़ल्लुस का जिस शे’र में शाइर इस्तेमाल करता  है वो शे’र  “मक़ता” कहलाता है !

मासूम परिंदों को आता ही नहीं “निकहत” !

आगाज़ से घबराना ,अंजाम से डर जाना !!

ये मक़ता डॉ.नसीम “निकहत” साहिबा का है, शाइरा ने इस शे’र में अपने तख़ल्लुस का इस्तेमाल किया है सो ये मक़ता हुआ !

ग़ज़ल से त-अल्लुक़  रखने वाली  जिन बातों का मैंने ज़िक्र किया, अपने ख़यालात को ग़ज़ल बनाने के लिए सिर्फ इतना जान लेना ही काफ़ी नहीं है ! ग़ज़ल कहने के लायक बनने  के लिए और भी बहुत से क़ायदे-क़ानून /ऐब - हुनर हैं जिन्हें एक शाइर को सीखना चाहिए !

शाइरी में कुछ ऐब है जिन्हें  शुरू – शुरू में हर शाइर नज़रंदाज़ करता है !ये ऐब अच्छे –भले शे’र और शाइर  को तनक़ीद वालों (आलोचकों ) के कटघरे में खड़ा कर देतें हैं !

शतुरगुरबा ऐब ..शतुर माने ऊंट और गुरबा माने बिल्ली यानी ऊंट –बिल्ली को एक साथ ले आना इस ऐब को जन्म देता है! ग़फ़लत में शाइर ये ग़लती कर जाता है ! जैसे पहले मिसरे में “आप” का इस्तेमाल हो और दूसरे में “तुम” का प्रयोग करे या यूँ कहें कि संबोधन में समानता ना हो तो शतुरगुरबा ऐब हो जाता है !

ग़ज़ल में कभी “ना” लफ़्ज़ का इस्तेमाल नहीं होता इसकी जगह सिर्फ़ “न” का ही प्रयोग किया जाता है ,”ना” का इस्तेमाल सिर्फ़ उस जगह किया जाता है जहां “ना“हाँ की सूरत में हो जैसे भाई पवन दीक्षित का ये शे’र :-

पारसाई न काम आई ना !

और कर ले शराब से तौबा !!

ज़म :-- कई बार शाइर ऐसा मिसरा लगा देते है जिसका अर्थ बहुत बेहूदा निकलता है ,या शाइर से  ऐसे लफ़्ज़ का अनजाने में इस्तेमाल हो जाता है  जिसके  मआनी फिर शाइरी की तहज़ीब से  मेल नहीं खाते ! ज़म के ऐब से शाइर को बचना चाहिए !

कई बार शाइर बहर के चक्कर में अब, ये, तो,भी,वो आदि लफ़्ज़ बिना वज्ह शे’र में डाल देता है जबकि कहन में उस लफ़्ज़ की कोई ज़रूरत नहीं होती ! शाइर को भर्ती के लफ़्ज़ों के इस्तेमाल से भी बचना चाहिए ! जहां तक शाइरी में ऐब का सवाल है और भी बहुत से ऐब है जिन्हें एक शाइर अध्ययन और मश्क़ कर- कर के अपने कहन से दूर कर सकता है !

शाइरी में ऐब इतने ढूंढें जा सकते है कि जिनकी गिनती करना मुश्किल है मगर जहां तक हुनर का सवाल है वो सिर्फ़ एक ही है और वो है “बात कहने का सलीक़ा” ! अपने ख़याल को काग़ज़ पे सलीक़े से उतारना आ जाए तो समझो उस शाइर को शाइरी का सबसे बड़ा हुनर आ गया है ! एक सलीक़ामंद शाइर बेजान मफ़हूम और गिरे पड़े लफ़्ज़ों को भी अपने इसी हुनर से ख़ूबसूरत शे’र में तब्दील कर सकता है ! ज़ोया साहब के ये मिसरे मेरी इस बात की पुरज़ोर वकालत कर सकते हैं :-

कट रही है ज़िंदगी रोते हुए !

और वो भी आपके होते हुए !!

इसी तरह शमीम बीकानेरी साहब का एक मतला और शे’र बतौर मिसाल अपनी बात को और पुख्ता करने के लिए पेश करता हूँ :--

रातों  के  सूनेपन  से  घबरायें क्या !

ख़्वाब आँखों से पूछते हैं, हम आयें क्या !!

बेवा का सा हुस्न है दुनिया का यारों !

मांग इसकी सिन्दूर से हम भर जायें क्या !!


मामूली से नज़र आने वाले लफ़्ज़ों को इस तरह के मेयारी  शे’रों की माला में मोती सा पिरो देने का कमाल एक दिन में नहीं आता इसके लिए बहुत तपस्या करनी पड़ती है,शाइरी की इबादत करनी पड़ती है और अपने बुज़ुर्गों के पाँव दबाने पड़ते हैं ! मुनव्वर राना ने यूँ ही थोड़ी कहा है :-

ख़ुद से चलकर नहीं ये तर्ज़े-सुख़न आया है !

पाँव दाबे हैं बुज़ुर्गों के तो फ़न आया है !!

ग़ज़ल कहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है आपके पास एक ख़ूबसूरत ख़याल का होना ! उसके बाद उस ख़याल को मिसरों में ढालने के लिए उसी मेयार के लफ़्ज़ भी होंने चाहिए ! लफ़्ज़ अकेले शाइरी में नहीं ढल सकते इसके लिए एक शाइर के पास अहसासात की दौलत होना बहुत ज़रूरी है !एक शाइर के पास अल्फ़ाज़ का ख़ज़ाना भी  इतना समृद्ध होना चाहिए कि उसके ज़हन में अगर कोई ख़याल आये तो उसे लफ़्ज़ों के अकाल के चलते मायूस ना लौटना पड़े !

ग़ज़ल का एक-एक शे’र शाइर से मश्क़ (मेहनत) माँगता है ! किसी शाइर का सिर्फ़ एक मिसरा सुनकर इस बात को बा-आसानी कहा जा सकता है कि इन साहब को शे’र कहने की सलाहियत है या नहीं !

एक और अहम् चीज़ शाइरी को संवारती है वो है इस्ल्लाह (सलाह-मशविरा ) ! कुछ ऐसे ग़ज़लकार हैं जो अपनी तख़लीक़ को ही सब कुछ समझते हैं ! किसी जानकार से सलाह लेना उन्हें अपनी अना के क़द को छोटा करने जैसा लगता है !  शाइरी में इन दिनों उस्ताद–शागिर्द की रिवायत का कम हो जाना भी शाइरी के मेयार के गिरने की एक बड़ी वज्ह है !

जिस शाइर में आईना देखने का हौसला है ,अपने क़लाम पे  हुई सच्ची तनक़ीद (समीक्षा ) को सुनने का मादा है तो उस शाइर का मुस्तक़बिल यक़ीनन सुनहरा है ! जो तथाकथित शाइर बिना मशकक़त किये बस छपने के फितूर में क़लम घिसे जा रहे हैं वे ग़ज़ल और पाठकों के साथ – साथ ख़ुद को भी धोखा दे रहें हैं !

छपास के शौक़ीनों ने ग़ज़लों के साथ–साथ दोहों पर भी कोई कम ज़ुल्म नहीं ढायें हैं ! दोहे का अरूज़ भी ग़ज़ल जैसा ही है ,ग़ज़ल उन्नीस बहरों में कही जाती है दोहे की बस एक ही बहर होती है ! सरगम सरगम सारगम,सरगम सरगम सार!

 ग़ज़ल कहने के लिए कम से कम आठ – दस क़ाफ़िए आपके ज़हन में होने चाहियें मगर दोहे में तो सिर्फ़ दो ही क़ाफ़ियों की ज़रूरत होती है तो भी अपने आप को मंझा हुआ दोहाकार कहने वाले ऐसे –ऐसे दोहे लिख रहें है जिनके बरते हुए क़ाफ़िए आपस में ही झगड़ते रहते हैं ! ऐसे दोहों से त्रस्त होकर मैंने एक दोहा लिखा था :---

दोहे में दो क़ाफ़िए , दोनों ही बे-मेल !

ना आवे जो खेलना ,क्यूँ खेलो वो खेल !!

ग़ज़ल के शे’र और दोहे छंद की मर्यादा में कहे जाते है! बिना बहर और छंद के इल्म के इन दोनों विधाओं पे हाथ आज़माना सिर्फ़ अपनी हंसी उड़वाना है ! ग़ज़ल के सर से दुपट्टा उतारने वाले ये क्यूँ नहीं समझते कि पाठक इतने बेवकूफ़ नहीं है जितना वे समझते हैं ! एक अलमिया ये भी है कि बहुत से जानकार लोग सब कुछ जानते हुए भी इनकी ग़ज़लों की तारीफ़ कर देते हैं जिससे इन नक़ली सुख़नवरों का हौसला और बढ़ जाता है ! अपने ज़ाती मरासिम (सम्बन्ध) बनाए रखने के लिए कुछ मोतबर शाइर भी ग़ज़ल के श्रंगार से छेड़- छाड़ करने वालों की शान में जब कसीदे पढ़ते है तो ऐसे अदीब (साहित्यकार) भी मुझे  ग़ज़ल के दुश्मन नज़र आते है !

मैं जानता हूँ ये मज़मून बहुत से लोगों के सीने पे सांप की तरह रेंगेगा मगर ये कड़वी बातें मैंने शाइरी के हित में ही लिखी हैं ! ग़ज़ल से बे-इन्तेहा मुहब्बत ने मुझे ये सब लिखने की हिम्मत दी है ! मैं जानता हूँ ज़ाती तौर पे मुझे इसका नुक़सान भी होगा , कुछ अदब के मुहाफ़िज़ नाराज़ भी हो जायेंगे खैर ये सच बोलने के इनआम हैं ! जब पहली मरतबा ये पुरस्कार मुझे मिला तो ये पंक्तियाँ  ख़ुद ब ख़ुद हो गयी थी  :--

इक सच बोला और फिर , देखा ऐसा हाल !

कुछ ने नज़रें फेर लीं , कुछ की आँखें लाल !!

ग़ज़ल का ये बड़प्पन है कि वो उनको भी अपना समझ लेती है जो उसके साथ चलने की तो छोडिये साथ खड़े होने के भी क़ाबिल नहीं हैं ! अपने आपको शाइर समझने वाले ग़ज़ल के ख़िदमतगारों से मेरी गुज़ारिश है कि ग़ज़ल कहने से पहले इसे कहने का हक़ रखने के लायक बने ! ग़ज़ल कहने से पहले उसके तमाम पेचो-ख़म के बारे में जाने ! शाइरों का काम आबरू ए ग़ज़ल की हिफ़ाज़त करना है ना कि ग़ज़ल को बे-लिबास करना ! केवल तुक मिलाने से सुख़नवर होने का सुख नहीं मिलता  जहां तक तुकबंदी का सवाल है तुकबंदी तो लखनऊ ,दिल्ली और लाहौर के तांगे वाले भी इन शाइरों से अच्छी कर लेते है ! ग़ज़ल से बिना मुहब्बत किये उसकी मांग भरने की ख़्वाहिश रखने वाले इन अदीबों से एक और इसरार (निवेदन) कि छपने और झूठी शुहरत के चस्के में ऐसा कुछ ना लिखें  जिससे जन्नत में आराम फरमा रही  मीर ओ ग़ालिब की रूहों का चैन और सुकून छीन जाए और यहाँ ज़मीन पे ग़ज़ल का दामन उनके आंसुओं  से तर हो जाए !

परवरदिगार से ग़ज़ल के हक़ में यही दुआ करता हूँ  कि ख़ुद को शाइर समझने का वहम पालने वाले ग़ज़ल को बेवा ना समझें ,ग़ज़ल कहने से पहले उसे कहने की सलाहियत, अपने जुनून, अपनी मेहनत, अपनी साधना से हासिल करें ताकि ग़ज़ल भी अदब के बाज़ार में इठलाती हुई चल सके और ख़ाकसार को अपने दिल पे ग़ज़ल की पीड़ा का टनों बोझ लेकर किसी शाइर को जो तथाकथित ग़ज़लकार कहना पड़ता है वो फिर से ना कहना पड़े ! आख़िर में तश्ना कानपुरी के इसी मतले के साथ इजाज़त चाहता हूँ ...

एक भी  शे’र अगर हो जाए !

अपने होने की ख़बर हो जाए !!

आमीन..!






(लेखक परिचय 
जन्म: 15 अगस्त 1972, हनुमान गढ़ (राजस्थान)
शिक्षा: विद्युत् इंजीनियरिंग में स्नातक एवं एमबीए
सृजन:
गत पंद्रह  वर्षों से शायरी पर लेखन. दोहा  लेखन भी ...
           विभिन्न अखबारात के लिए साप्ताहिक कॉलम
सम्प्रति:
सीमा सुरक्षा बल में सहायक कमांडेंट ( विद्युत् ), बीकानेर
संपर्क:  vijendra.vijen@gmail.com )



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