बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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रविवार, 15 जून 2014

महिलाओं ने रचा केरल का इतिहास

विकास का मॉडल कुदुंबश्री  















मनोरमा सिंह क़लम से 


तरक्की और विकास की पहली शर्त है लोगों का जागरूक और शिक्षित होना, केरल की साक्षरता दर भारत के सभी राज्यों में सबसे अधिक रही है और यही वजह है कि यह भारत के सबसे विकसित राज्यों में से रहा है। देश का सबसे शहरीकृत राज्य होने के साथ केरल की शहरी और ग्रामीण जीवनशैली में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. राज्य के सभी जिलों की  हर पंचायत में कम से कम एक शैक्षणिक संस्थान और स्वास्थ्य केन्द्र जरूर होता है। लेकिन बेरोजगारी केरल की सबसे बड़ी समस्या रही है. 17वीं शताब्दी से ही यहां से  रोजगार की तलाश में प्रवास शुरू हो चुका था। लेकिन पिछले पंद्रह सालों में केरल में गरीबी हटाने और महिलाओं को सशक्त बनाने का काम जमीनी स्तर पर हुआ है जिसका असर अब दिखने लगा है।
कुदुम्बश्री के मार्फत केरल में न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं का अव्वल तरीके से क्रियान्वयन हुआ है बल्कि पंचायती राज की अवधारणा की जड़ें भी मजबूत हुई है। धान की खेती पर निर्भर यहां के गरीब और भूमिहीन किसानों को वैकल्पिक रोजगार मुहैया कराने के लिए अस्सी के दशक में उन्हें स्वसहायता समूह के बारे में बताया गया और माईक्रोफाईनांस योजनाओं को लागू करने की शुरुआत की गई। और अगले कुछ सालों में गरीबी को समझने के साथ गरीबी उन्मूलन के लिए भी एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित किया गया। 1994 में इन्हीं अनुभवों के आधार पर पहली बार केरल में सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए महिला आधारित सामुदायिक संरचना विकसित की गयी। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण की शुरूआत हुई व पंचायत और नगरनिगम जैसे स्थानीय स्वशासन निकाय मजबूत हुए। इसी दौरान 1998 में गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तीकरण के लिए सामुदायिक नेटवर्क के तौर पर कुदुंबश्री की शुरुआत  हुई, जिसका लक्ष्य स्थानीय स्वशासी निकायों के साथ मिलकर गरीबी उल्मूलन और महिला सशक्तीकरण  के लिए काम करना था। 1998 से अब तक कुदुंबश्री की लगातार कई उपलब्धियां रही हैं संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय अवार्ड इसे हासिल हुआ है। साथ ही इसे एशिया  का सबसे बडा महिला आंदोलन भी कहा जाता है।
दरअसल, कुदुंबश्री की खासियत रही है गरीबी हटाने की प्रक्रिया पर काम करना ना कि परियोजना पर। इसलिए 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, हर जिले की सभी पंचायतों के सभी वार्ड में इसकी पहुंच है। इसके तहत 1.87 लाख पड़ोस समूह हैं, सत्तरह हजार क्षेत्र विकास समाज या एडीसी हैं और 1,058 समुदाय विकास समाज या सीडीएस ग्रामीण व शहरी हैं। कुदुंबश्री के मार्फत पड़ोस समूह के सदस्यों में अब तक 2,818 करोड़ की राशि बतौर ऋण बांटी जा चुकी है। इसी का नतीजा है कि केरल में जमीन कम होने के बावजूद 47 हजार महिला किसान हैं जो लीज पर खेत लेकर धान की खेती करती हैं। पहले दस रूपए भी जिनके पास नहीं हुआ करते थे उनके अब खुद के पक्के मकान हैं। कुल सवा तीन लाख किसान इसके दायरे में हैं और लीज पर 65 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती की जा रही है, इसके कारण पलायन भी रुका है। कुदुंबश्री माॅडल की एक सफलता ये भी है कि सदस्य ऋृृण वापसी के मामले में नियमित और अनुशासित हैं इसलिए निरंतरता बनी रही है अतंतः जिसका फायदा सदस्यों को ही हो रहा है।
कुदुंबश्री के द्वारा केवल महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए ही काम नहीं किया गया है बल्कि युवाश्री जैसे विशेष रोजगार कार्यक्रम के जरिए साढ़े तीन सौ से ज्यादा सामुहिक और सवा तीन सौ के करीब निजी उद्यमों को शुरू किया गया। बेसहारा लोगों के लिए आश्रय कार्यक्रम को 745 स्थानीय निकायों में लागू किया गया और करीब साठ हजार बेघर बेसहारा लोगों का पुनर्वास किया गया। इसके अलावा भावनाश्री गृृह लोन योजना के तहत पैंतालीस हजार से ज्यादा गरीब लोगों को घर बनाने के लिए ऋृृण मुहैया कराया गया।  कुदुंबश्री के मार्फत केरल में केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बेहतरीन क्रियान्वयन के कारण दो साल पहले ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार मिशन ने इस माॅडल को पूरे देश में लागू किए जाने की सिफारिश की थी। फिलहाल पांच राज्यों में कुदुंबश्री माॅडल लागू किए जाने पर सहमति भी बनी है।
 


कुदुंबश्री की कार्यकारी निदेशक के बी वल्सला कुमारी से बातचीत

कुदुंबश्री के मार्फत केरल में काफी पहले से केरल में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। हाल के दिनों में और कौन-कौन सी शुरुआत की गयी है?
- पिछले पंद्रह सालों में कुदुंबश्री के मार्फत केरल में बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार देकर और आत्मनिर्भर बनने के मौके मुहैया कराकर उनका सशक्तीकरण किया गया है। करीब 40 लाख महिलाएं इसकी सदस्य हैं, जो चालीस लाख परिवारों को सशक्त बना रही हैं और साबुन निर्माण व खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक करीब पचास हजार लघु उद्यमों के मार्फत आर्थिक समृृद्धि की कहानी लिख रही हैं। कुदुंबश्री के खाद्य उद्योग को इसी साल दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला में स्वर्णपदक हासिल हुआ है। हाल ही में कुदुंबश्री की ओर से पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित टैक्सी सेवा शुरू की गई है,इससे पहले पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित कुदुंबश्री कैफे भी बहुत सफल रहा है. कुदुंबश्री कैफे का और विस्तार किये जाने की घोषणा हुई है। इसके अलावा हमने केरल वेटेरनरी एंड एनीमल साईंस यूनीवर्सिटी के साथ भी समझौता किया है. ताकि किसी कारण से पेशेवर उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर सकीं महिलाएं पशुपालन या इससे संबंधित विषयों में डिप्लोमा हासिल कर खुद अपना व्यवसाय कर सकें। दरअसल, कुदुंबश्री की दस्तक खेती से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी तक है और हर क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तीकरण में यह बेहद कारगर साबित हो रही है। पिछले डेढ़ साल से मै इससे जुड़ी हंू और मेरे लिए ये गर्व की बात है।

इस माॅडल की संरचना किस तरह की है?
-बिल्कुल जमीनी स्तर से हमारी पकड़ है, केरल की 62 फीसद से ज्यादा आबादी  इसके दायरे में हैं। सबसे पहले समुदाय के स्तर पर ग्रामीण या शहरी इलाकों में 10 से 20 महिलाएं जुड़कर आपस में समुदाय बनाती हैं, जिसे पड़ोस समूह कहा जाता है. इस समूह के द्वारा स्वबचत की शुरुआत होती है,ं फिर बैंकों से इन्हें जोड़ा जाता है और बैंक इन्हें इनके काम के लिए लोन देना शुरू करता है। एक पंचायत या नगरपालिका में कई पड़ोस समूह होते हैं जिसे एरिया डेवलपमेंट सोसाईटी या एडीएस कहते हैं, एडीएस के उपर सीडीएस होता है। सीडीएस दातव्य न्यास के तहत रजिस्टर्ड संस्था होती है और सामाजिक न्याय व पंचायत मंत्रायल के अधीन हैं।
गरीबी उन्मूलन के लिए केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं चलायी जा रही हैं, कुदुंबश्री उसी का विस्तार है?
-पूरी तरह से ऐसा नहीं है, केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की ओर से इसे फंड मिलता है पर ये एक अलग माॅडल है, केन्द्र सरकार की नारेगा और मनरेगा जैसी योजना लागू करने में केरल पूरे देश में अव्वल रहा हैं तो उसकी वजह कुदुंबश्री है, हम पंचायत स्तर पर लोगों को केन्द्र और राज्य सरकार की सभी योजनाओं की जानकारी देते हैं और उसे कैसे लागू कराना है इसमें मदद करते हैं। हालांकि आन्ध्र प्रदेश का गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम भी बहुत सफल हो रहा है पर वो दस हजार करोड़ की ऋृण राशि के साथ एक वित्तीय माॅडल है और कुदुंबश्री 7 सौ करोड़ ऋृण राशि के साथ एक सामाजिक माॅडल। इसके तहत केवल महिला सशक्तीकरण ही नहीं बच्चों, बुढ़ों, असहायों, बेघर बेसहारा सभी के लिए योजनांए हैं और उन्हें लागू भी किया गया है। पूरे राज्य के सभी जिलों के सभी पंचायतों में इसकी मौजूदगी है फिलहाल केवल दो प्रतिशत जनसंख्या ही इसके दायरे से बाहर है।    
कुदुंबश्री को इसी हफ्ते साल 2013-14 के हडको राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया गया ये एक और उपलब्धि है?
-बिल्कुल, यह सम्मान कुदुंबश्री को महिलाओं की आर्थिक दशा सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय काम करने के लिए मिला है। कुदुंबश्री ने आमदनी सुनिश्चित करने वाली सर्वोत्तम परियोजनाएं लागू करके यह लक्ष्य हासिल किया है। हमने निर्माण क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं के हुनर को तराशने और उनके लिए बेहतर संभावनाएं बनाने के लिए एरनाकूलम में कुदुंबश्री वुमैंस  कंस्ट्रक्शन ग्रुप परियोजना लागू किया, जिसे एक नयी शुरूआत कहा जा सकता है, इसके तहत निर्माण क्षेत्र में काम कर रही इंजीनियर, सुपरवाईजर और राजमिस्त्री का काम करने वाली महिलाओं को इसी क्षेत्र के अनुभवी लोगों के द्वारा विषेशज्ञ प्रशिक्षण मुहैया कराया गया। जिसका फायदा भी हुआ। फिलहाल इस समूह के पास 87 गृह निर्माण परियोजना का अनुबंध है।   यहां से उड़ाया


(रचनाकार परिचय:
 जन्म: 11 जनवरी 1974 को बेगुसराय (बिहार) में
शिक्षा: स्नातक, भूगोल, बीएचयू,  स्नातकोत्तर हिन्दी, दिल्ली  विश्वविद्यालय, जनसंचार और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा  इग्नू  से 
सृजन: ढेरों पत्र- पत्रिकाओं में लेख, रपट प्रकाशित
ब्लॉग: मनुलॉग   
संप्रति: सात-आठ साल दिल्ली में प्रिंट और एक टीवी प्रोडक्शन हॉउस की नौकरी करने के बाद फिलहाल बंगलूरु में रह कर   पब्लिक एजेंडा के लिये दक्षिण के चारों राज्यों की रिपोर्टिंग
संपर्क: manorma74@gmail.com) 
 
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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

केरला यानी यहाँ सब अल्लाह की ख़ैर है


समुद्र  नारियल के नमकीन मीठे जल की तरंग 























केरल से लौट कर शहबाज़ अली खान 

 

काफ्का ने अपनी कहानी  'चीन की दीवार' में बीजिंग के बारे में कहा है कि हमारा देश इतना विस्तृत है कि  इसके बारे में कोई भी किस्सा इसके साथ न्याय नहीं कर सकता. यहाँ तक कि इश्वर भी मुश्किल से इसकी पैमाइश कर सकता है. काफ्का ने शायद भारत नहीं देखा होगा वरना वह इश्वर के लिए इस देश की पैमाइश को मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन ही बता देते. ०७ को गाडी मथुरा से खुली. दो एक घंटे बाद ही कुदरती आबशारों से हम नहाते चले गए.कहीं सूरज की किरणें नर्म गिलाफों सा आ-आ कर लिपट जातीं.जिन-जिन राहों से हम गुज़रे अहसास शिद्दत की गिरफ्त में हुआ. हमारा देश कितना विस्तृत है... मध्यप्रदेश में लगातार होरहे खनन, पहाड़ों को काटती पिटती मशीनों और उडती धूलों, चम्बल के बीहड़ों, सामन्ती अवशेषों- मंदिरों और किलों, छतीसगढ़ के नक्सली इलाकों, महारष्ट्र के हरियल और पनियल इलाकों से गुजरते हुए जब गाड़ी कर्णाटक पहुंची तो हवाओं की नमकीन गंध और नारियल की अबोल-मीठ-फ़िज़ा ने दस्तक दे दी.अहा! अब केरल दूर नहीं! सड़कों के किनारे स्वागत करते नारियल के पेड़. उनके झुरमुटों से छन कर आती ठंडी हवाएं रात की स्याही को रौशन करती रहीं.

 
सुबह के साढ़े ५ के करीब हम केरल के कोझिकोडे (कालीकट) पहुंचे. बहार निकलते ही मेरी नज़र सबसे पहले जिस चीज़ पर पड़ी वह मार्क्स के तस्वीर की एक बड़ी सी होर्डिंग थी जिस पर सी.पी.आई.एम् के २० वें पार्टी कांग्रेस की तय्यरियाँ चल रहीं थीं.. भोर के धुंधलके में ही मुझे जंक्शन से लेकर अबू के घर तक हर जगह लाल ही लाल दिखाई दिया.. ये हलब्बी हलब्बी बैनर, होर्डिंग, कटआउट  वगैरह.. रास्ते लाल रंग के फीते हर जगह टंगे नज़र आयें.. दिन का नज़ारा न पूछिए.. अबू ने कहा कि ये अपने को सर्वहारा की पार्टी कहती है लेकिन इस मौके पर २० करोर से ज्यादा खर्च कर चुकी है. हालांकि मैंने इस तथ्य के बाबत कोई छानबीन नहीं की है लेकिन ये तो तय है कि कालीकट को देखकर ऐसा लगा कि मैं भारत के किसी शहर में नहीं बल्कि रूस के किसी शहर में हूँ.

केरल के पहले ही दृश्य ने मोहा मन

सूरज ज़रा ही उपर चढ़ा था कि हम अबू के घर पहुँच गये. अबू हमें अपने घर के आस पास के पेड़ पौधों को दिखाने लगा. काजू के पेड़, गुजराती लोगों का पसंदीदा सुपारी का पेड़, हमारी तरफ चलने वाले सुपारी (तामुल) का पेड़, कटहल, नारियल का तो पूछना ही क्या है, काफी के पेड़ आदि यह सब उसके घर के भीतर और उसके आस पास लगे थे.. फिर अबू हमें अपने घर के पिछवाड़े ले गया और वहाँ जो दृश्य मैंने देखा उसे भूल नहीं सकता. नारंगी सूरज ज़मीन कुछ इंच ऊपर था और उसमें सियाह बादलों की दो तीन धारियाँ कुछ यूँ लिपटी थीं जैसे माँ ने अपने बच्चे को नज़र से बचाने के लिए दो तीन नज़र की टीकाएं लगा दी हों. ज़मीन का गीलापन और काले बादलों में लिपटे सूरज का वह नारंगी रूप आह! क्या कहने उस दृश्य के. केरल ने अपने पहले ही दृश्य से मन मोह लिया... 


























और अम्मी ने मेरे तलवे को हौले से सहलाया

शाम को समन्दर देखने गये. रास्ते में सी.पी.आई.एम् के २० वें पार्टी कांग्रेस की लहरें अपने उफान पर थीं. इस से बचते बचाते हम वहाँ पहुंचें जिसे देखने की लालसा मेरे दिल में कई सालों से थीं.. जी हाँ मेरे सामने हहराता समन्दर था. २८ साल बाद नंगी आँखों से उसे देखना एक रोमांचकारी क्षण था. पल के लिए मैं डर गया.. इतना भव्य, विशाल, व्याकुल, अंतहीन, लहर दर लहर जोश से भरा हुआ. सब कुछ लीलने को तैयार बैठा हुआ. उस पर अम्मी की हिदायत ... तुम समन्दर के नजदीक मत जाना (उन्हें मालूम है बचपन से पानी से डरता हूँ). मैं अभी उधेड़बुन में ही था कि सारे दोस्त तुरंत पैंट-शैंट चढ़ा के, सैंडिल-जूता एक तरफ कर के घुटनों तक जा पहुंचें. कई छोटे बच्चे कूद-कूद कर उसमें नहा रहे थे. अम्मी की हिदायतों को समन्दर के आकर्षण ने परास्त कर दिया. मुझे याद नहीं, कब मैंने सैंडिल उतारी, पैंट चढ़ाई और उसके पास चला गया. लहरों ने मेरा पैर छुआ. लगा मैं अबोध शिशु हूँ और अम्मी ने मेरे तलवे को हौले से सहलाया हो! जितनी बार लहर आती मेरे पैरों के नीचे की रेत बहा ले जाती.... एक चुल्लू पानी भी पिया. लगा मानो एक चम्मच भरपूर नमक फांक लिया हो. समन्दर के भीतर नमक न होता तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल था. उस एक घूँट पानी ने मुझे यह अहसास कराया कि दुःख हमारे जीवन का एक ऐसा ही नमक है. जो हमारे जीवन को संतुलित करता है, नियंत्रित करता है. खूब ढेर सारी फोटो खीचा-खिचौअल के बाद आइस अचार का खट्टा-मीठा स्वाद का चटखारा! अब भी उसकी सोंधी डकार बरक़रार है. एक गोरखपुर के पान वाले से मीठा पान खाया. और अँधेरा होते होते वापस अपने कयाम गाह तक लौट आये...






 दुल्हन के घर से आई बरात 


अगले दिन बन-ठन के अबू के निकाह के लिए तैयार हुए.. पता चला कि केरला की एक बड़ी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष सैयद हैदर अली शहाब  थंगल अबू का निकाह पढ़ाएंगें. शहाब साहब जब आये तो उनके आगे पीछे कोई और गाड़ी नहीं थी. न ही भीड़-भड़क्का. चूँकि केरल की संस्कृति में सामन्ती अवशेष नहीं के बराबर हैं. वहाँ शादियों में लड़की वाले लड़के वालों के यहाँ आते हैं. वो भी एक दो नहीं पूरे सौ-दो सौ लोग. जितनी तेज़ी से आते हैं उतनी ही तेज़ी से वापस चले जाते हैं. बिलकुल शांत और सुरुचिपूर्ण तरीके से खाना पीना होता है. निकाह के बाद कोई हो-हल्ला नहीं.  बन्दूक-गोलियां नहीं चलती हैं. उनके रहनुमा भी इस संस्कृति का ही पालन करते हैं. सबका पहनावा लगभग एक था- लुंगी और शर्ट और पैर में सैंडिल.  शहाब साहब का भी. चलन इस कदर है कि पैंट पर भी लोग शर्ट इन नहीं करते हैं. ये पहनावा केरल का अपना ही है या वाम विचारधारा का प्रभाव, मुझे पता नहीं चल पाया (पिछले तेरह सालों से एक बड़े कामरेड प्रो. इरफ़ान हबीब को इसी पहनावे को पहनते देखा है, शर्ट बाहर, पैर में सैंडिल या चप्पल, और अभी भी साइकिल से चलना.).. निकाह बेहद सादगी से हुआ, कोई टीम-टाम नहीं, झट-पट. खाना तो खैर माशा अल्लाह था. खाने के बाद गर्म पानी, एक केला, और एक कप काढ़ा. यह सब हम लोगों के लिए बिलकुल नया था. खाने के बाद सभी तुरंत चले गये, लड़की वाले, अबू के रिश्तेदार भी.

वास्को डी गामा के क़दम जब पड़े 

निकाह बाद बचे सिर्फ हम लोग. फिर तय पाया गया कि हमें कापड बीच देखना चाहिए जहां पहली बार वास्को डी गामा के पैर पड़े थे. अँधेरा होने से थोड़ी ही देर पहले पहुंचे. यहाँ के चट्टान और समंदर, दोनों ही गवाही दे रहे थे कि कभी यहाँ दुनिया आकर मिलती रही होगी. हालांकि इन चट्टानों पर  सी.पी.आई. एम् के इश्तेहार दूर से ही नुमाया हो रहे थे. वास्को कभी यहाँ आया था उसकी कोई इबारत नहीं देखी. सिर्फ एक समंदर था जो यह चीख चीख कर कह रहा था कि मेरे सीने पर वास्को ने कभी नाव चला कर इस सर ज़मीन पर अपने पैर रखे थे. चट्टानों से गले मिलने को बेताब समंदर का जोर देखने लायक था. लेकिन बेदिल चट्टान हर बार उसकी बेताबी को झुठलाकर उसे वापस कर देता था. समंदर की बेताब लहरें आपस में खूब टकराती हैं लेकिन ऐसा लगता मानो कभी मिल नहीं पाती. हमारे दो दोस्तों ने सूरे रहमान की उस आयत का ज़िक्र किया जिसमें कहा गया है कि समंदर जब मिल रहे होते हैं तो उनके बीच में एक पर्दादारी होती है, जिसका वह अतिक्रमण नहीं कर पाते. सच aisa  hi लगा. सूरज जल-समाधि  के लिए अधीर हो रहा था. आध घंटे में उसने जब समाधि ली तो शोर कुछ थम सा गया. बारिश की आशंका ने भी हमें वहाँ से वापस होने पर मजबूर कर दिया.










 


















वाय्नार्ड के जंगलों में इतिहास का सूरज

 दो दिन समन्दरों के हहराते शोर और चंचल लहरों को देखने में गुज़रे. अगले दिन यह तय पाया कि अब हम कोझिकोडे से लगभग २०-३० किमी दूर वाय्नार्ड चलते हैं. वाय्नार्ड कर्नाटक और केरल को जोड़ता है. ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच से टीपू सुल्तान ने यह रास्ता खोजा था.  (कुछ का मानना है कि टीपू ने नहीं बल्कि हैदर अली ने इस रास्ते की खोज की थी) इन दोनों बाप-बेटों में से जिसने भी इस रास्ते की खोज की हो, इस रास्ते को देख कर मैं अपने देश के शासकों के सराहनीय योगदानों के प्रति अभिभूत हो गया. इस रास्ते पर चलते हुए दोस्तों ने शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित भारतीय सड़क व्यवस्था की भी चर्चा की. इन चर्चाओं के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि आखिर किस बात पर हम अंग्रेजों द्वारा माल्गोदामी व्यवस्था की सराहना करते हैं? किस आधार पर उन्होंने  यह कह दिया कि हमारा पिछला शासन अविकसित था. अगर कोई हिंदुस्तान को गौर से देखे तो उनकी बातें झूठी साबित हो जायेंगी. वाय्नार्द चारो और से पहाड़ों से घिरा है. यूँ ट्रेन के सफ़र में भागते पहाड़ों को देखा तो था लेकिन इतने नज़दीक से .. ओह् ह्ह इतना उदात्त, गंभीर, अविचल, मौन था कि उसको देख के कुछ सूझ ही न रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि यह समाधि में बैठा को कोई साधू है या आँखें तरेरता हुआ कोई दबंग है. . या ज़मीन में धंसी कोई कील है जिसने ज़मीन को पकड़ रखा है.(एक दोस्त ने बताया कि अल्लाह कुरआन  में पहाड़ों के बारे में कहता है कि हमने इसे कील की तरह ज़मीन में ठोंक दिया है.. ताकि ज़मीन हिल न सके) पहाड़ों को देख के न जाने दिल में क्या-क्या आया वह बता पाना मुश्किल है, कितने कवियों की पहाड़ पर लिखी कवितायें याद आयीं. लेकिन  "तुझको देखूं की तुझसे बात करूँ" वाली स्थिति मेरी थी. 



























पहाड़ के आह से उपजी नदी

वाय्नार्द के जंगलों के आस पास बसी आदिवासियों की बस्ती उतनी ही खुबसूरत सुरम्य. वहां की एक झील का आनंद लेने के बाद हमने कुरुवा द्वीप में फिसलन भरे पत्थरों और चट्टानों के बीच कल-कल बहते नीर के साथ थोड़ी सी मस्ती की. उससे थोड़ी दूर पूकोट्टू झील के पास पहुंचे जो भारत के नक्शे की तरह बसा था...हमने यहाँ बोटिंग की. बोटिंग कराने वाले ने हमें उस झील की गहराई और उससे जुड़े कुछ और तथ्यों के बाबत जानकारी दी. उसने हम लोगों की तस्वीर भी खींची. केरल वासी सौम्य और सुलझे तथा कितने सभ्य हैं उस एक आदमी से बात करके यह बात और भी पुख्ता होगयी. लौटते वक्त ट्रेन में पैंट्री कार के एक वेंडर ने मोहम्मद जलाल या जमाल, जो की सीलनपुर का था, ने भी इस की तस्दीक की. पूकोट्टू में हमने लकड़ी से बने कुछ सामान खरीदे. और लौट पड़े. शाम अब बेहद गहरा गयी थी. चारो और एक धुंध सी थी. पहाड़ धुएं से लिपटे हुए थें. तब मेरे ज़ेहन में यह आया कि पहाड़ साधू या हो दबंग हो, असल वह एक वियोगी है. एक दुःख से भरा प्रेमी है.  जैसे-जैसे रात होती है, उसका दिल जलता है, इक धुंआ-सा उठता है.... इतना धुंआ उठता है कि दूर से देखने पर लगता है नदी बह रही हो. यह पहाड़ के आह से उपजी नदी थी जो सिर्फ रात के अँधेरे में ही बहा करती है. 
































रिश्ता रंग बिरंगे प्यार के धागे से बुना

केरल का हमारा प्रवास चौथे दिन अपनी समाप्ति की ओर आ गया. अबू के घर मिली इतनी मोहब्बत और स्नेह हम भूल नहीं सकते. हमारे और अबू के घर वालों के बीच भाषा की दीवार थी. हमारे एक मित्र हफीज ने इस दीवार को गिरा दिया था. वह कर्नाटक के मैंगलूर के वासी हैं, केरल में शिक्षा प्राप्त की है, अभी अलीगढ से अरबिक से पीएच. डी कर रहे हैं. ६ भाषाओँ के जानकार हैं. उन्होनें ट्रांसलेटर की भूमिका बहुत शानदार ढंग से निभायी. उनके बिना टूर अधूरा होता. यूँ तो हर दोस्त अपने में ख़ास था लेकिन उनका महत्त्व रेखांकित करने योग्य है... जाने से पहले मैंने कहा था कि यूँ तो केरल के टूर पर जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. लेकिन मेरे लिए एक केरलवासी दोस्त अबू की शादी में शिरकत करना बहुत अहमियत रखता है. मेरे लिए यह उस हिन्दुस्तानी तहजीब की बेमिसाल रिवायतों में से एक है कि यहाँ तमाम तहजीबों के बीच एक रिश्ता रंग बिरंगे प्यार के धागे से बुना होता है. यह धागा तोड़े से भी नहीं टूटता है. दूरियों को ये एक क़दम में नाप लेता है. अजनबियत को चुटकी में बाँध कर किसी दरिया में डाल देता है. और यह धागा किसी दुकान पर नहीं, बल्कि हमारे दिलों में मिलता है. हिन्दुस्तान इसी मायने में अपने भीतर हमेशा जिंदा रहता है....






 
























वहां से आते वक्त दिल में बस इतना ही कहा कि वाकई यहाँ सब अल्लाह की खैर है.*

*केरला के नामकरण एक पीछे एक कारण यह बताया जाता है की जब पहली बार अरब यहाँ पहुंचें तो उन्होंने इसकी खुश हाली देख कर कहा था कि यहाँ खैरुलाह! यानी सब अल्लाह की खैर है....खैरुलाह बाद में घिसट कर केरला हो गया.

(लेखक-परिचय:
जन्म: १८ मई, १९८४, बहराइच में
शिक्षा: अलीगढ मुस्लिम विवि से राही मासूम राजा पर पी-एच डी कर रहे हैं
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट. फेसबुक के चहीते रचनाकार
संपर्क:alikhan.shahbaz@gmail.com)


हमज़बान पर उनकी पहली पोस्ट
शहरयार की याद पढ़ें 


 
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