बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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गुरुवार, 22 मई 2014

घोड़े को जब हुआ नमोनिया














रवींद्र पांडेय का दो व्यंग्य

सब कुछ मोदियाइन-मोदियाइन हो गेलउ भइयवा

अइसनो लोकप्रिय हुआ जाता है कहीं! संसद से लेके नली-गली तक जने देखो तने खाली मोदियाइन-मोदियाइन टाइप के हो गया है। ईंटा तो ईंटा, भाई लोग बालुओ पर नमो-नमो लिखवा दिया है। गांवे से गोला पांड़े फोन किए थे। फोन का किए थे..., मिसकॉल मारे थे।
गोला पांड़े के मिसकॉल के जवाब न देबे के जुर्रत के करेगा भाई! उनका मिसकॉल तो मोदियो जी इगनोर नहीं करते हैं। एतना सीटवा अइसहीं थोड़े न जीत गए हैं। मोदियो जी को पता है कि बढिय़ा-बढिय़ा भाषण देबे और रैली में पसीना बहावे से कोई चुनाव नहीं जीत जाता।
उ तो गोला पांड़े के मेहनत, पुरुषार्थ अउर तपस्या के प्रभाव है कि मोदीजी आज पीएम बन गए। पिछला आठ महीना में एको दिन अइसा नहीं गुजरा होगा, जिस दिन गोला पांड़े सुबहे चार बजे उठ के गांव के शिवाला में न पहुंचे हों। रोज भोरहरिए में मंदिर में धो-पोंछ के एके प्रार्थना करते थे, 'हे अवघड़दानी भोलेनाथ! अबकी बार मोदी सरकार!' भोले बाबा भी का करते, सुननी ही पड़ी भक्त की पुकार।
भोले बाबा से फरियाद के बाद गोला पांड़े 'हर-हर मोदी' करते मंदिर से निकलते अउर 'नमो-नमो' करते पूरे गांव के राउंड पर जुट जाते। जिस-जिस गली से गुजरते कुत्ते उनके पीछे लग जाते। कुत्ते 'भौं-भौं' करते तो, उन्हें जोर से हड़काते, 'भाग ससुर! भौं-भौं कइले है।...नमो-नमो काहे नहीं करता है बे?' अउर मजे के बात इ कि चुनाव आवते-आवते ढेरे कुकुर 'भौं-भौं' छोड़ के 'नौं-नौं' करे लगा था।
गांव भर के चक्कर मारे के बाद गोला पांड़े नुक्कड़ के चाह दुकान पर पहुंचते। मोदी चाह बनवाते। पीते। फिर हर आवे-जाए वाला के समझाते, 'चिंता-फिकिर के जरूरत नय है। अच्छे दिन आनेवाले हैं। महंगाई के तो नामो निशान खत्म हो जाएगा। भ्रष्टाचार को लालटेन लेके खोजे पर भी नय मिलेगा। रोजगार के तो अइसा भरमार होएगा कि इंडिया के अमेरिका के लोग एने नोकरी करे वास्ते आएगा।... जे-जे बढिय़ा सोच सकते हैं, सब होने वाले हैं। आखिरकार अच्छे दिन आने वाले हैं. '
रिजल्टवा निकला, तो गोला पांड़े चहक उठे, 'देख लिए न! कांग्रेस के हाल देख के बराक ओबामा के भी चिंता बढ़ गइल है। सोच रहल हैं कि गुजरात वाला सुनमिया अभी दिल्ली पहुंचल है। उहां से कहीं अमेरिका की ओर बढ़ गवा तो का होवेगा?'


घोड़ों को तो बचा लीजिए

प्यारे बाबू का टेंशनियाया हुआ चेहरा देखते ही बुझा गया कि गाड़ी पटरी पर नहीं है। कुछ पूछने से पहले ही बोल बैठे, भइया जी, इस झारखंड का कभी भला नहीं होनेवाला। आदमी तो आदमी, अब यहां जानवर भी सुखी नहीं रहे। बताइए भला, बेजुबान घोड़ों पर तोहमत लगा दी। उन्हें बिकाऊ बता दिया। कहते हैं, बड़की एजेंसी से जांच कराएंगे। तो कराइए न, के मना कर रहा है। इहां काम-धाम थोड़े न कुछ होना है! खाली जांचे तो होनी है! आगे से काम चलता है, पीछे से जांच। न कामे पूरा होता है, न जांच। एतना दिन में केतना तो जांच कराए। कौन सी बड़की क्रांति कर लिए। बारह साल में अढ़ाइयो कोस तो नहीं चल पाए। जांच से पहिलहीं तो पूरी घोड़ा मंडी को बदनाम करके रख दिए। रेस का रिजल्ट रोक दिए। बेचारे घोड़ों की कितनी फजीहत हो रही है। कितना बढिय़ा तो ऊंट की तरह गर्दन ऊंची करके घूम रहे थे। अब मुंह छुपाने की जगह ढूंढ़ रहे हैं। उनके हाल पर गधे भी रूमाल में मुंह छुपाकर हंस रहे हैं। जैसे पूछ रहे हों, क्यों बड़े भाई, खाया-पीया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना।... भइया, हम तो इंसान हैं। एक-दूसरे से बतिया कर अपना मन हल्का कर लेते हैं। मगर ये घोड़े तो एक-दूसरे से सउंजा-सलाह भी नहीं कर सकते। दूरभाष पर दूर से बतियाएं, तो संकट। फोनवे टेप हो जा रहा है। कोई बीमार पड़ जाए और हाल-चाल पूछने नजदीक पहुंच जाएं, तो देश भर में हल्ला मच जाता है। सवाल पर सवाल। कहां गए थे? का करे गए थे? का बतियाए? कवनो नया समीकरण बन रहा है का? सरकार-उरकार तो नहीं न गिराइएगा? पांच मिनट किसी से मिले नहीं कि पचहत्तर गो सवाल फन काढ़ के डंसे ला तइयार है।... बड़ी आफत है। मुड़ी गड़ले-गड़ले गर्दन टेढ़ुआ गइल है। ऊपरे मुंह करते हैं, तो लोग कहता है कि सरकार बचावे ला भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। पछिम मुंह करें, तो लोग कहेगा, हां, अब तो दिल्लिए के असरा है। उत्तर मुंह करते हैं तो लोग को लगता है कि लालू यादव से मदद मांग रहे हैं।... सच्ची कहता हूं भइया, हमसे तो इन घोड़ों का दर्द नहीं देखा जाता। आंख तो आंख, दिल भी आंसू बहा रहा है। सच में अगर इन घोड़ों को न्याय नहीं मिला, तो बड़की कयामत आ जाएगी। जैसे भी हो, इन घोड़ों को दर्द से उबारिए भइया जी। हम इंसान हैं। दर्द सहना हमारी आदत में शामिल है। ये घोड़े हैं। इनके बर्दाश्त की हद बहुत छोटी होती है। इनसे नहीं तो कम से कम इनकी दुलत्ती से तो डरिए।

(लेखक -परिचय :

जन्म: 4 फ़रवरी 1971 को  रोहतास(बिहार) के कोथुआं गाँव में
शिक्षा: स्नातक की पढाई आरा से की
सृजन: ढेरों व्यंग्य देश के  प्रमुख पत्र -पत्रिकाओं में। व्यंग्य संग्रह 'सावधान कार्य प्रगति पर है'  प्रकाशित
संप्रति: दैनिक भास्कर  रांची संस्करण में मुख्य उप संपादक
संपर्क:ravindrarenu1@gmail.com)

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सोमवार, 9 दिसंबर 2013

सिर्फ़ आप ही नहीं, कर सकते हो तुसी भी कमाल!

फ़ोटो गूगल महाराज की कृपया से











हालिया चुनाव पर कुछ इस तरह भी तो सोच सकते हैं
तमाम तामझाम और बेशर्मी लांघती मीडिया रपटों के बावजूद लोकमानस को समझ पाने में हम लोग असमर्थ रहे. लेकिन ज़िद की लकीर का अहं अब भी मुंह नहीं चुरा  रहा है. दरअसल सेठों का पैसा दाव पर है. उसकी अपनी ज़रूरतें हैं. अपने निहितार्थ हैं. शहरों के मध्य-वित्त वर्ग को उसका चमकीला रैपर बहुत सुहाता है. और देश को इन्हीं के मार्फ़त चलाने की क़वायद रवां-दवाँ है. गांधी का गाँव कहीं  खो गया है. उसकी चिंता जभी होती है, जब सेठों को अपने उत्पाद की बिक्री करनी होती है. इसी बहाने सड़कें तो बन ही जाती हैं. लेकिन वहीँ तक बनती हैं जहां क्रय-शक्ति है. और उत्पाद छोटे पैक में भी बिक जाता  हो.  इधर व्यस्क होते  शहरी युवाओं की ऊर्जा और उत्साह का इस्तेमाल धर्म और जाति की सियासत करने वाले उन्हें वरगलाकर करते हैं. और अभी उसका फीसद अच्छा-खासा है. लेकिन क्या यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है कि हम गाँव में रहने वालों की अनदेखी कर दें.
लेकिन सच यह भी तो है कि जनता कार्पोरेट राजनीति और राजनीतिक कारोबार को कुछ-कुछ तो ज़रूर समझने लगी है. क्या ताज़ा चुनाव इसकी तस्दीक़ नहीं करता कि दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों से जन-मोह भंग हो रहा है. और इसकी शुरुआत तो बहुत पहले दक्षिण और पूर्वोत्तर में  हुई. बाद में उत्तर प्रदेश और बिहार-झारखंड  में उभरे इलाक़ाई दलों ने बखूबी महसूस  किया। तुरंता मिसाल दिल्ली की है. जहां आप  ने कमाल कर दिया। यदि दिल्ली की तरह ही राजस्थान,  छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कोई तीसरा विकल्प होता तो क्या परिणाम यही होते। गर पुण्य प्रसून  बाजपेयी जैसा पत्रकार यह कहता है कि   'कांग्रेस के खिलाफ गये चार राज्यों के जनादेश का सबसे बडा संकेत 2014 में एक नये विकल्प को खोजता देश है' तो गलत क्या है. यह विकल्प कांग्रेस या भाजपा से इतर तीसरी राह की और अग्रसर होगा।
समय है कि हर क्षेत्र की सियासी जमात अपनी खुन्नस त्याग कर  मज़बूत तीसरा मोर्चा तैयार करें तो इन बड़बोलों का गुब्बारा हवा हो जाए! तभी नमो जाप करने वाले नमो-नमो करने लगेंगे। क्योंकि वो सोच रहे हैं कि  कांग्रेस की नीतियों को लेकर बढ़ता आक्रोश उन्हें सत्तासीन कर देगा। यदि इन दोनों के अलावा तीसरा विकल्प सामने होगा तो जनता निसंदेह उसे ही तरजीह देगी। सच्चे लोकतंत्र की भी यही मांग है.  वर्ना तमाशा देखते रहिये।
 छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के खिलाफ लगभग 59 प्रतिशत मत पड़े लेकिन रमन सिंह महज़  41.4 प्रतिशत मत पाकर फिर ताज सम्भाल लेंगे ! जबकि सिर्फ एक प्रतिशत से भी कम मत लाने वाली कांग्रेस विपक्ष का स्वाद लेगी। हालांकि विकल्प न होने की स्थिति और नक्सली हिंसा में मारे गए नेताओं की हमदर्दी में ही उसे यह वोट मिल गया। तस्वीर तो यही है कि मतदाता देश में केंद्र सरकार से नाखुश थे. हर जगह कांग्रेस के विरोध में ही मत पड़े. गर कोई लहर रहती तो वोट का प्रतिशत भाजपा का दिल्ली और छत्तीसगढ़ में इतना कम न होता। हद तो यह है कि सरगुजा में जिस नक़ली लाल क़िले से नरेंद्र मोदी ने सभा संबोधित की थी, वहाँ ही कई विस से भाजपा का सूपड़ा साफ़ हो गया.    


      




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बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

पेड़ न्यूज़ : पुराना खेल, नयी चाल















आशीष कुमार ‘अंशु’ की कलम से


अधिक दिन नहीं हुए, जब दिल्ली के एक राष्ट्रीय अखबार के एमडी पत्रकारों को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि इस बार चुनाव में पेड न्यूज ना छापने के संकल्प की वजह से कंपनी को चालिस लाख रुपए का नुक्सान होगा। यह तो उस समय जब यह राष्ट्रीय कहा जाने वाला अखबार उन राज्यों में बिल्कुल नहीं बिकता या फिर कुछ जगह जाता भी है तो छीट-पुट संख्या में। ऐसे मे उन अखबारों के नुक्सान का हिसाब लगाइए जो इन राज्यों मे खुब बिकती है। ऐसे तीन-चार अखबार जरूर हैं। इसके बाद इनके नुक्सान का भी अंदाजा लगाइए। क्या यह करोड़ो में नहीं बैठेगा?


इस बार कुछ राष्ट्रीय अखबारों ने कुछ नई योजनाओं पर काम करना शुरू किया है। चुनाव आयोग को हमेशा प्रमाण चाहिए। प्रबंधकों ने पेड न्यूज के लिए बिल्कुल नई योजनाओं पर काम करना प्रारंभ कर दिया है। जिससे माल भी आ जाए और पेड न्यूज ना छापने की कसम भी ना टूटे। उतर प्रदेश के बड़े हिस्से में एक राष्ट्रीय अखबार ने दो पृष्ठों में मीडिया इनीसिएटिव के नाम से दो पेज का विज्ञापन छापा। वास्तव में मीडिया इनीसिएटिव ऊपर लिखा हो तो नीचे जो खबर छपी है, वह विज्ञापन बन जाता है, इस बात की समझ क्या इस अखबार ने अपने पाठकों में विकसित की है? वास्तव में विज्ञापन के नाम पर नीचे खबर ही छपी थी। सिर्फ मीडिया इनीसिएटिव लिख देने से अब अखबार पर पेड न्यूज का आरोप नहीं लगा सकते। यह तो प्रबंधन का एक छोटा सा खेल है।

यदि एक एक विधानसभा में खड़े होने वाले बीस प्रत्याशियों में सिर्फ चार या तीन या दो की ही खबरें अखबार में छप रहीं हैं तो इसका मतलब है कि वह अखबार बाकि के प्रत्याशियों को पहले से ही हारा हुआ मान रहा है। एक विधानसभा में अच्छे प्रसार संख्या वाले तीन से चार अखबार होते हैं। चुनाव के समय में विज्ञापन और प्रबंधन वाले छोटी-छोटी बातों के लिए चुनाव में खड़े होने वाले नेताओं से पैसे वसूलते हैं।
इस बार सुनने में आ रहा है कि कुछ बड़े अखबार अपने प्रबंधकों और मीडिया मैनेजरों की मदद से पेड न्यूज की आमदनी को विज्ञापन में तब्दील करने की जुगत में हैं। इसलिए अपनी पॉलिसी के तहत तस्वीरें वे कम से कम छाप रहे हैं। विज्ञापन में भी रसीद का कम का दिया जा रहा है, पैसे अधिक वसूले जा रहे हैं। लेकिन इसकी शिकायत कोई चुनाव आयोग से करे तो करे कैसे? इसके लिए पुख्ता सबूत जुटा पाना मुश्किल है और दूसरा समाज में रहकर कोई भी मीडिया से बैर नहीं लेना चाहता। चुनाव के विधानसभाओं में इस बार पर्चो की भी कीमत अखबार वाले लगा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में चुनाव वाले दिन अखबार में अमुकजी का छपा हुआ पर्चा ही जाएगा। उत्तर प्रदेश के कुछ विधानसभाओं में इसके लिए भी मोटी रकम ली गई है। इसके माने साफ हैं कि मैदान में अखबारों के अपने-अपने प्रतिनिधि होंगे। अ का पर्चा अमुक अखबार में डालकर बंटेगा और ब का पर्चा अमुक अखबार में। अब इसको तो चुनाव आयोग भी पेड न्यूज नहीं कह सकता क्योंकि जिनसे पैसे लिए गए हैं, अखबार उनके खिलाफ तो कम से कम नैतिकता के नाते चुनाव सम्पन्न होने तक कुछ नहीं छापेगा। क्या पैसे लेकर किसी खबर को नहीं छापना पेड न्यूज नहीं है? लेकिन चुनाव आयोग छपे पर सवाल कर सकता है, कि क्यों छापा, यह छापा तो कहीं यह पेड न्यूज तो नहीं है लेकिन जो छपा ही नहीं किसी अखबार में, उसपर आयोग कैसे कार्यवाही करेगा?

एक और उदाहरण, एक विधानसभा क्षेत्र से एबीसीडी ने अपना नामांकन एक ही दिन भरा, चारों महत्वपूर्ण नाम है अपने विधान सभा क्षेत्र के। किसी अखबार में यदि इस खबर का शीर्षक छपता है, ए के साथ तीन अन्य लोगों ने नामांकन दाखिल किया। इसका सीधा सा अर्थ है कि अखबार किसी एक व्यक्ति को प्रमुखता दे रहा है। इस प्रमुखता में पैसों का खेल नहीं है, यह कैसे साबित होगा?
यह सब उत्तर प्रदेश के अखबारों में काम कर रहे लगभग एक दर्जन पत्रकारों से बातचीत के बाद लिख रहा हूं। वे सभी पत्रकार पेड न्यूज के इस नए रंग से खुश नहीं है लेकिन नौकरी के बीच कुछ कर भी नहीं सकते। कमाल यह है कि पेड न्यूज के इस नए खेल को समझने के बाद भी साबित करना चुनाव आयोग के लिए भी टेढा काम होगा। इसका मतलब साफ है, पेड न्यूज का खेल चलता रहेगा, और हमारी भूमिका मूकदर्शक से अधिक कुछ भी नहीं होगी। ऐसे समय में अंतिम भरोसा पाठकों का ही है, वे अखबार की खबर को आंख बंद करके अंतिम सत्य समझ कर ना पढ़े और वह भी जानने की कोशिश करें जो अखबार में छपा नहीं है। उन प्रत्याशियों के नाम पर भी चर्चा करें, जिनका जिक्र अखबारों में नहीं है।

(लेखक परिचय:
जन्म: 24.12.84 को बेतिया पश्चमी चंपारण में
शिक्षा: स्नातकोत्तर डिग्री
सृजन: विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में सरोकारी लेखन
खासियत:
फिलहाल देश के वाहिद घुमंतू युवा पत्रकार
सम्प्रति:
दिल्ली में रहकर दुभाषिया पत्रिका 'सोपान'  से संबद्ध. साथ ही स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं
संपर्क: ashishkumaranshu@gmail.com
ब्लॉग: बतकही )
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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

बिहार: इस बार जीते हैं सबसे ज्यादा पढ़े लिखे मुस्लिम विधायक

 हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव ने साबित कर दिया है कि बिहार में बदलाव की लहर चल पड़ी है। इसकी तेज और मंद गति को लेकर बहस संभव है। लेकिन इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनकर आए 19 मुस्लिम विधायकों में से ज्यादातर उच्च शिक्षा प्राप्त हैं,साथ ही इनकी औसत उम्र 45 साल है। इनमें डॉक्टर, वकील और पीएचडी धारी भी हैं । 14 विधायक तो पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं ।

डॉ मोहम्मद जावेद ने गवर्मेंट कश्मीर युनिवर्सिटी,मेडिकल कालेज से एमबीबीएस किया है,तो डॉ दाऊद अली ने डीएच मेडिकल कालेज, दानापुर से डीएचएमएस की डिग्री हासिल की है। वहीं शाहिद अली खां ने बीबीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर,तो इज्हार अहमद ने मगध विश्वविद्यालय से एलएलबी किया है। अहमद पीएचडी भी हैं । फैयाज अहमद ने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा और अब्दुल गफूर ने पटना विश्व विद्यालयसे एमए और एलएलबी की पढ़ाई की है। जावेद इकबाल अंसारी ने रांची विश्वविद्यालय से पीएचडी की है । जबकि अख्तरुल ईमान और मोहम्मद आफाक आलम, एमए पास हैं,तो सबा जफर,नौशाद आलम,जाकिर हुसैन, सरफराज आलम और परवीन अमानउल्लाह स्नातक हैं।

पुराने समाजवादी और राजद से अली नगर से राजद विधायक अब्दुल बारी सिद्दीकी ने एएन कालेज ,पटना से तो अख्तरुल इस्लाम शाहीन ने एमएचकेजी कालेज , समस्तीपुर से आइएससी किया है। कल्याणपुर से जदयू की टिकट पर जीत कर आई रजिया खातून सिर्फ मैट्रिक हैं। इसके अलावा मोहम्मद तौसीफ आलम और शर्फउद्दीन ने मदरसे से तालीम हासिल की है।

सबसे कम उम्र के हैं

मो तौसीफ आलम और अख्तरुल शाहीन इस बार विस में पहुंचे सबसे जवान मुस्लिम विधायक हैं । इनकी उम्र 31 साल है।

सबसे जयादा उम्र वाले

सबसे उम्रदराज मुस्लिम विधायक हैं अब्दुल बारी सिद्दिीकी, 63 और रजिया खातून, 57।







भास्कर के लिए लिखा गया
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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

सुथरे भी हों और पारदर्शी भी..पर कैसे हो चुनाव !

 
 
 
 
शेली खत्री की क़लम से  

चुनाव प्रक्रिया मांग रहा सुधार
 
भारतीय राजनीति से नीति शब्द काफी पहले ही हट गया है।  मौजूदा राजनीति के लिए स्वार्थ  नीति, कुचक्र नीति आदि नाम दिए जाते हैं।  हालत यह है कि अच्छे लोग राजनीति से दूर रहना पसंद करते हैं। देश का युवा वर्ग राजनीति से अपना दामन बचाने की हर संभव कोशिश करता है। वोट के बदले नोट, संसद में रूपये उछालना आदि कुछ घटनाएं ऐसी हुई की राजनीति को शर्मिन्दा  होना पड़े ।
वस्तुत: राजनीति में सुधार की आवश्यकता पूरा देश महसूस कर रहा है। और निश्चय ही यह सुधार चुनाव प्रक्रिया से ही शुरू होना चाहिए तभी तो अच्छे लोग चुनकर आयेगें। चयन प्रक्रिया अच्छी हो, उम्मीदवर  अच्छे हों उसके बाद ही अच्छे काम की उम्मीद की जा सकती है। चुनाव के नाम पर देश के अरबों रूपये खर्च होते हैं। ये सोर रूपये यंू ही पार्टियों के प्रचार प्रसार और कार्य-कर्ताओं के खान- पान में खर्च होते हैं। इन से कोई सार्थक नहीं होना। गठबंधन सरकारों के बीच के अनबन या किसी अन्य मुद्दे के फसने पर अक्सर बिना कार्यकाल पूरा किए ही सरकार गिरती है और जनता के उपर एक और चुनाव का बोझ आ जाता है। नेताओं का क्या है। पर जो रूपये खर्च होते हैं  वो जनता की गाढ़ी कमाई के ही होते हैं। चुनाव आयोग के उपर भी एक जिम्मेदारी आ जाती है। चुनाव के कारण सारे प्रशासनिक कार्य प्रभावित होते हैं। पर इन का कोइ फल नहीं निकलता क्योंकि जनप्रतिनिधि के रूप में चुने गये अधिकतर लोग जनता की पसंद के नहीं होते। आपराधिक प्रवृति के लोग आकर अपराध को ही बढ़ावा देते हैं।
इससे बचने का रास्ता क्या है, सोचते हुए बात यहीं आकर ठहरती है कि चुनाव प्रकिया ही ऐसी हो जाए जिससे लोगों का लोकतंत्र में विश्वास बढ़े और चुनाव सार्थक हो। वर्ना देश में कई जगह तो बूथ कैप्चर जैसी समस्या आज भी कायम है। पूरे राजनीतिक परिदृश्य और चुनाव प्रक्रिया की खामियों का आलम यह है कि  हमारे यहां मुख्य मंत्री तक अनपढ़ लोग बन जाते हैं। ऐसे जन प्रतिनिधि जो शपथ पत्र भी न पढ़ सकें।उन्हें देश और दुनिया की कैसी समझ होगी, समझा जा सकता है। अपने नैतिक मूल्यों  के लिए जाने जाने वाले देश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं कि उनका थाह पाना मुश्किल है। ऐसा क्यों न हो, हमारे यहां बड़े- बड़े अपराधी ऍमएलए और सांसद पदों की शोभा बढ़ाते हैं। अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण भी मिलता है। यहां तो आदमी जेल से भी चुनाव लड़ लेता है। एक प्रकार से यह अपराध का महिमा मंडन ही हुआ न। इन्हें देख कर कौन पढ़ने- लिखने और ईमानदार बनने की प्रेरणा लेगा। अस्तु गंदगी का जो आलम है उसे साफ करने के लिए शुरूआत उपर से ही करनी होगी ।तभी आम नागरिक सुधर सकेंगे। कहा भी गया है कि सिढ़ियों पर झाडू उपर से ही लगती है।
 उपरोक्त बातों का आशय सिर्फ यह है कि जनप्रतिनिधियों के रूप में साफ चरित्र और बुद्धि  विवेक वाले लोग ही आयें। इसके लिए चुनाव प्रक्रिया ही सुधार मांगती है।
इस सुधार के लिए कुछ बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता होगी। चुनाव का पहला चरण है प्रत्याशियां को टिकट मिलना या उनका चुनाव में खड़ा होना।  व्यवस्था यह करनी होगी कि टिकट मिलने से पहले प्रत्याशी कोतय मानदंडों पर ख्ाड़ा उतरना होगा।  इन मानदंडों में पहला तो यह है कि कि उसका साक्षर नहीं अपितु शिक्षित होना तय हो। साथ ही उनके लिए योग्यता निर्धारित किया जाए।  चाहें तो इसमें भी कैटेगरी बांट सकते हैं। उदाहरण स्वरूप ऐसा किया जा सकता है कि मुखिया का चुनाव लड़ने वाले कि न्यूनतम योग्यता मैट्रिग होगी ही। लोक सभा चुनावों के लिए डिग्री के अलावा व्यकितत्व परिक्षण भी  हो। इन दिनों टीवी पर किसी चाय कंपनी का विज्ञापन आता है, जिसमें वोट मांगने गए उम्मीदवार से उसकी योग्यता पूछी जाती है। उस विज्ञापन को देख खीज भरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ जाती है। हमें व्यवहारिक जीवन में भी इसी प्रकार के मानदंड तय करने होंगे।  इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अपराधियों के चुनाव लड़ने पर हमेंशा के लिए रोक लगा दी जाए। जो भी व्यक्ति छह महीने की सजा काट आया हो या उसके खिलाफ कहीं कोई आपराधिक मामला आया हो। ऐसे व्यक्ति के राजनैतिक कैरियर पर उसी प्रकार रोक लगना चाहिए, जिस प्रकार हमारे यहां सरकारी नौकरीयों में है।  इन दिनों अक्सर सरकारी संस्थानों में योगा और मेडीटेशन के क्लास लगाएं जाते हैं। उसी प्रकार नेताओं के लिए समय- समय पर मोरल क्लास लगाएं जाएं। पढ़े - लिखे और योग्यता मानदंडों पर खड़े उतरे व्यक्ति को कम से कम अपनी जिम्मेदारी का एहसास तो होगा।
राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय और क्षेत्रिय सोच में  अंतर होता है, तीनों जगह की समस्याएं और काम करने का तरीका भी अलग ही होता है। लोकसभा चुनावों के माध्यम से चुने गये लोग पूरे राष्ट्र के लिए कल्याण्कारी सिद्ध हों। उसके लिए जरूरी है कि क्षेत्रिय दलों को लोकसभा का चुनाव न लड़ने दिया जाए।  इससे एक साथ् कई प्रकार की चुनावी जिटिलताओं से छुटकारा मिलेगा। दूसरी बात यह है कि क्षेत्रिय दल क्षेत्रिय भावना को ही प्रश्रय देते हैं और बढ़वा भी।
प्रत्याशियों के बाद नंबर आता है वोटिंग सिस्टम का, राजनीति की जो स्थिति है और वोट डालने से संबंधित जो अड़चनें है। उनको लेकर आधे लोग तो वोट डालने ही नहीं जाते। इसलिए इस दिशा में सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि वोटिंग अनिवार्य हो। हर भारतीय वयस्क के लिए वोटिंग अनिवार्य करने के बाद सबसे बड़ी दिक्कत यह आयेगी कि सभी लोग अपने गृह जिले में नहीं रहते। पढ़ाई , नौकरी आदि की मजबूरियां घर छुड़ा देती हैं सिर्फ वोट डालने के लिए घर आना हर किसी के लिए संभव नहीं होगा। इसलिए यह सिस्टम लागू करना होगा कि व्यक्ति देश में कहीं भी रहकर अपना वोट डाल सकता है। इससे सबसे पहला फायदा यह होगा कि फर्जी वोटिंग रूकेगी। , दूसरा वोट का प्रतिशत बढ़ेगा और तीसरा लोगों का लोकतंत्र में विश्वास लौटेगा।
इस दिशा में यह भी सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता होगी कि सभी वोटरों के पास फोटो पहचान पत्र अनिवार्य रूप से उपलब्ध हो। देश में इवीएम के जरिए वोटिंग प्रारंभ हो गई है। इसे देश के गांव - गांव तक पहुंचाने की आवयकता है। साथ ही इस संबंध में अमरीकी प°ति का अनुसरण ठीक रहेगा। हमें भी वोटिंग में किसी एक दल को वोट देने की बजाए ग्रेडिंग सिस्टम लागू करना चाहिए। साथ ही उसमें नन ऑफ दिज या इनमें से कोई भी नहीं का आप्शन भी होना चाहिए। इससे वोटिंग में पारदिर्शता रहेगी।
वोटिंग रूम में क्लोज सकिoट कैमरे भी होने चाहिए। इसके बाद बुथ कैप्चर की समस्या नहीं आयेगी। इन सुधारों के अलावा एक काम और होना चाहिए। देश में दलबदल की राजनीति, राजनीति की विकृति के रूप में उपस्थित है।  स्वस्थ्य राजनीति के लिए यह जरूरी है कि दल बदल पर रोक लगे। अगर यह संभव न हो तो कम से कम दलबदल के लिए पैमाना निश्चित किया जाए।
अगर चुनाव प्रक्रिया में उपरोक्त बातों पर अमल कर लिया जाए तो  चुनाव प्रक्रिया की सारी बाधाएं दूर हो जाएगी। अच्छे लोग चुनकर आयेंगे और भारतीय राजनीति पर छाए बादल छंट जायेंगे , लोक तंत्र का स्वर्णिम रूप सामने आयेगा।


लेखक-परिचय:
जन्म: १४ फरवरी,१९८४ पटना में
शिक्षा: एम. ए. हिन्दी
सृजन: वागर्थ,कादम्बनी, भास्कर ,नयी दुनिया जैसी कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख,रपट ,समिक्षा, कहानी,कविता आदि 
सम्प्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण से सम्बद्ध
संपर्क:shelleykhatri@yahoo.com
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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)