बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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गुरुवार, 5 अगस्त 2010

मदरसा, आरक्षण और आधुनिक शिक्षा

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सैयद एस. क़मर की क़लम से

मुस्लिम सन्दर्भ में करीब दसेक साल से मदरसा और आरक्षण अक्सर संवाद के केंद्र में है.कुछ लोग इन दोनों यानी मदरसा और मुसलमानों के आरक्षण  [जो कि कुछ मिलता या मिलने की बात भी है तो पिछड़े दलित मुस्लिमों को ] को राष्ट्रद्रोहिता की श्रेणी में रखने के एक ज़िद तक हिमायती हैं.उधर  मुस्लिम मौलानाओं ने मदरसे की खिड़कियाँ और दरवाज़े बंद कर दिए हैं कि  कहीं हल्की भी बयार आधुनिक शिक्षा की न पहुँच जाय और इस्लाम खतरे में न पड़ जाय !! अब ज़्यादातर अनपढ़ मुस्लमान क्या करे!! मुसलमानों की सियासत करने वालों ने भी कभी इन्हें इन अंध-कूप से निकालने की कोशिश न की.समाज की निरक्षरता का फायदा उन्हें यह मिलता रहा कि उन्हें वरगलाना सुविधाजनक हुआ.जबकि बिना आधुनिक शिक्षा के विकास की बात बेमानी है.आरक्षण जैसी बैसाखी से आप कितनी दूर चल पायेंगे! खुद के पैर पर खड़े होने की कोशिश  कीजिये .आप सुन  रहे हैं:
 बेशक अल्लाह किसी कौम की हालत नहीं बदलता जब तक वह लोग तबदीली पैदा नहीं करते.[कुरआन:सूर:रअद १३:११ ]


मदरसे को बैर नहीं रहा आधुनिक शिक्षा से

पिदरम सुलतान बूद यानी पूर्वज हमारे सुलतान थे ऐसी खामख्याली से कब तक पेट भरा जा सकता है.मदरसे यानी स्कूल यानी शिक्षा केंद्र.और शिक्षा ज्ञान को न बांधा जा सकता है न सीमित  किया जा सकता है.भांति-भांति की शिक्षा दी जाती रही है मदरसों में.जामिया मिल्लिया या जामिया हमदर्द या जामिया अल अजहर ..ऐसे ढेरों नाम आपने सुने होंगे .क्यों नहीं यह ऐसे केंद्र हैं जहां से अनगिनत शख्सियतें  पढ़ कर निकली  हैं और देश, समाज , दुनिया को रौशन किया है.
जामिया यानी मदरसा और मस्जिद.दोनों साथ साथ भी हो सकता है और अलग अलग भी.दरअसल इस्लाम की पहचान के बाद मुसलमानों के बीच शिक्षण ज्ञान के ऐसे ही केंद्र थे.बाद में जब शिक्षा और ज्ञान के और रास्ते खुलते गए तो इसे विस्तार दिया जाता रहा और कालांतर में विश्व विद्यालय  के लिए जामिया का प्रचालन शुरू हुआ.

अल्लाह और रब के बाद सब से ज्यादा जो शब्द बार-बार कुरआन में आया है वह है ज्ञान, शिक्षा! और इसके लिए चीन तक जाने की वकालत पैगम्बर मोहम्मद ने भी की.इसलिए नहीं कि तब चीन बहुत बड़ा इस्लामिक केंद्र था!!! यहाँ आशय ज्ञान से था जो सांसारिक भी हो सकती है जिसकी ज़रुरत आपको पग-पग पर पड़ती है.जभी शुरुआत में मस्जिद को ऐसे केंद्र की शक्ल में विकसित किया गया.जहां धार्मिक शिक्षा के साथ राजनीती और सामाजिक शिक्षा भी दी जाती थी.मस्जिद के साथ  पुस्तकालय  की भी व्यवस्था होती थी.सन ६५३ में मदीना में,सन ७४४ में दमिश्क में और सन ९०० आते आते जहां भी मुस्लिम आबादी थी करीब हरेक मस्जिद में प्राथमिक शिक्षा दी जाती थी.और यहाँ लड़के और लडकियां दोनों के  पढने की व्यवस्था थी.अंकगणित भी एक विषय हुआ करता.प्राथमिक स्तर  के बाद उच्च शिक्षा  के लिए छात्र  बड़ी मस्जिदों [यानी मदरसों ] में भेजे जाते.यहाँ व्याकरण,तर्कशास्त्र ,बीजगणित, जीव विज्ञान,इतिहास,कानून और अध्यात्म की शिक्षा दी जाती थी.इन केन्द्रों में अध्ययन-अध्यापन के तरीके को हलाक़ा कहा जाता, जिसे हम हल्क़ा कहते हैं.यानी शिक्षक के चारों ओर एक वृत्त में छात्र बैठा करते.छात्रों को भी विमर्श में हिस्सा लेने का अधिकार होता.इतिहासकार इब्न बतूता,मेकेंसन ,भूगोलशास्त्री अल मुक़द्दसी और आज के ख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन तक ने ऐसे मदरसों के बारे में लिखा है.जब ज्ञान और शिक्षा का नया उजियाला फैला तो इन मदरसों को जामिया में तब्दील कर दिया गया.यानी विश्व विद्यालय! तब के विश्व विद्यालयों  में टुईनीशिया  का अल कारवां और अल ज़ैतुना, मिश्र का अल अजहर और अल करावियीन आज भी अपनी  सेवाएँ दे रहा है.डॉ. सलाह जाईमेक इस विषय पर अपने अध्ययन में आगे लिखते हैं कि मस्जिद स्कूलों में पढ़ चुके कुछ विख्यात विद्ववानों में स्पेन के इब्न रोवूद,इब्न अल सईद और इब्न बज्जा, बसरा के अल खलीली इब्न अहमद दर्शन की व्याख्या किया करते थे.इब्न अहमद के एक छात्र बाद में अरबी के विश्व विख्यात व्याकरणआचार्य हुए, जिनकी तूती आज भी बोलती है.अल करावियीन  में जिन्होंने पढ़ा और पढ़ाया उनमें एक इसाई गेर्बर्ट का भी नाम है जो बाद में पोप सिल्वेस्टर द्वितीय बने, और जिन्होंने यूरोप में अरबी संख्या की पहचान कराई. नौवीं सदी के मध्य में ही अल अजहर में अन्तरिक्ष विज्ञान,अभियांत्रिकी,और औषधिशास्त्र को कोर्स में शामिल किया जा चुका था.  मिश्र में ही अल इब्न तुलून जैसी मस्जिदें विश्व विद्यालय का आकार ग्रहण कर रही थीं. दरअसल पढने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही थी.अंग्रेजों का सूरज कहीं डूबता न था तब अल अजहर में ७६०० छात्र और २३० प्राध्यापक थे.बग़दाद में भी तब अन्तरिक्ष विज्ञान,अभियांत्रिकी,और औषधिशास्त्र की पढाई होती थी.यहाँ पढने के लिए हिन्दुस्तान समेत सीरिया और फ्रांस से भी छात्र आते थे.होस्टल को तब ख़ान या ख़ाना कहा जाता था,जहां छात्र रहते.


भारतीय सन्दर्भ

असग़र अली इंजिनियर लिखते हैं कि यह मदरसे ही मुग़ल शासन में धार्मिक के साथ उस समय के वैज्ञानिक ज्ञान [जिसे उलूम -ए -अक़लिया कहते थे  ] उपलब्ध कराते थे.इन शिक्षा केन्द्रों को राजाओं , नवाबों और जागीरदारों का संरक्षण प्राप्त था.इसलिए दर्स-ए-निज़ामिया के तौर पर पहचाने जाने वाले यह शिक्षा केंद्र धार्मिक और तत्कालीन प्राकृतिक विज्ञान के भी संयुक्त रूप थे.लेकिन मुग़ल शासन के पतन और ब्रिटिश हुकूमत की स्थापना के साथ ऐसे केंद्र तेज़ी से कम होते गए और संसाधनों के अभाव में  दम तोड़ते गए.अधिकाँश ज़मींदार, मुस्लिम भी  तब अंग्रेजों के पक्षधर थे.और अंग्रेजों  को ऐसे मुस्लिम केंद्र नापसंद थे.यूँ यहाँ देश के सभी बिरादरी के लोग पढ़ा करते थे.जिनमें बहु संख्यक हिन्दू भी थे.१८५७ के बाद लोगों ने फिर अपने प्रयासों से जगह जगह छोटे छोटे मदरसे खोलने शुरू किये.इसी दौर में  देवबंद का मदरसा बना.जिसके संस्थापकों में मौलाना क़ासिम नानौत्वी और मौलाना महमूद उल हसन अंग्रेजों के मुखालिफ और कांग्रेस के कट्टर समर्थक थे.इन्होने देश विभाजन का सख्त विरोध किया था.यहाँ संसाधनों की कमी थी .ऐसे मदरसे सिर्फ  धार्मिक शिक्षा ही देने लगे. मुसलमानों का अमीर तबका इसके खिलाफ था वहीँ कुछ लोग इसाइयत के प्रचार से खौफज़दा थे और उन्हें अपनी पहचान का संकट था.वहीँ नए नए बन रहे मुसलमानों  के लिए भी धार्मिक शिक्षा ज़रूरी थी.ऐसे केन्द्रों में मुफ्त पढाई होती  थी.लेकिन सर सैय्यद जैसे लोग आधुनिक शिक्षा चाहते थे.उन्हें धनिक मुस्लिमों ने साथ दिया और इस तरह अलीगढ कालेज की स्थापना हुई , जो आज अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय है. विभाजन के बाद यह धनिक तबका पाकिस्तान चला गया तो संकट और गंभीर हुआ.सरकार भी पूरी तरह स्थिर नहीं हो पायी थी.मदरसे में एक सुविधा यह भी थी कि  उनमें पढनेवाले लड़के किसी भी समय सुबह या  शाम को पढ़ आते और बाकी समय अपने परिवार के आर्थिक पोषण  के लिए कुछ काम कर लेते.मदरसा खोलने वाले आधुनिक शिक्षा के विरोधी  न थे .उनके सामने अर्थ  का संकट था और इस्लाम खतरे में नज़र आया था जबकि यह  ख्याल गलत ही था. अंग्रेजों यानी उनकी सत्ता से उनका विरोध था.भारत में इस तरह मदरसे से आधुनिक शिक्षा का खात्मा हुआ और मुसलमानों के बीच नए तर्ज़ के संस्थान सामने आते गए.
अब स्पष्ट है कि आधुनिक शिक्षा से मदरसे को कभी बैर नहीं रहा.सीतम ज़रीफी रही कि अर्थाभाव के कारण यह धार्मिक शिक्षण तक सीमित रह गए जबकि परंपरा ऐसी न थी.























आओ  कि फिर कारवां चले

अब फिर समय आ गया है कि मदरसे को उसकी पुरानी पहचान मिले.सरकार भी यत्नशील है.मुसलमानों !! गौर करो तुम्हारे पास यह ऐसा नेटवर्क है जिसके बूते तुम उसी दौर -ए -इब्न -बतूता में दाखिल हो सकते हो.बस आज फिर नित्य आ रहे शैक्षणिक परिवर्तनों से उसे रौशन करो.सरकार या आरक्षण जैसी बैसाखी तुम्हें उतनी मदद नहीं पहुंचा पायेगी.हाँ एक तिनका का सहारा ही उत्साह वर्द्धन  के लिए ज़रूरी है.लेकिन आगे आपको  खुद बढ़ना है.दिक्क़तें दरपेश है, सच है लेकिन जब हौसले बुलंद हों, आत्मविश्वास लबरेज़ हो तो इनकी क्या बिसात!

नशेमन दर नशेमन इस कद्र तामीर करता जा
कि बिजली गिरते गिरते खुदबखुद बेज़ार हो जाए !


 संस्थाओं के संचालन के लिए आय के स्रोत

सवाल ज़रूरी है कि आखिर बिना सरकार की आर्थिक  सहायता के मदरसों में आधुनिक शिक्षण की व्यवस्था  कैसे की जाय ! मुसलमान देश के दलितों से इस अर्थ में खुश किस्मत है कि उनके पास मुस्लिम राजाओं ,नवाबों  और  सामंतों की समाज हितार्थ दान की गयी ढेरों संपतियां हैं.जिन्हें वक्फ जायदाद कहते हैं.लगभग चार लाख एकड़ भूमि पर अवस्थित तीन लाख रजिस्टर्ड  संपत्तियां वक्फ की हैं.जिनकी आय हजारों करोड़ है.लेकिन आज इतना भी वक्फ बोर्ड को हासिल नहीं होता.और जो होता है उसका भी सही इस्तेमाल नहीं होता.यूँ  देश में पैंतीस वक्फ बोर्ड है.ढेरों वक्फ के सरकारी कानून हैं.जिनमें मुस्लिम वक्फ एक्ट १९१५,१९२३, आज़ादी केबाद बना वक्फ एक्ट १९५४, ज़रूरत के तिहत अलग -अलग राज्यों में बना दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट १९५६,जम्मू कश्मीर का वक्फ कानून,पं.बंगाल वक्फ एक्ट १९५२,उ.प्र. मुस्लिम एक्ट १९६४ प्रमुख है.लेकिन किसी का भी सही पालन नहीं किया जाता.राज्य सभा के डिपुटी चयरमैन के. रहमान ख़ान को जब वक्फ की संयुक्त संसदीय समीति का अध्यक्ष बनाया गया तो उन्होंने रपट सौपते हुए कहा था कि वक्फ जायदाद का अच्छी तरह प्रबंध किया जाय तो इसकी आय से मुसलमानों की ढेरों समस्याओं का समाधान किया जा सकता है.
दरअसल कुल वक्फ संपत्तियों में से सत्तर फीसदी पर अवैध कब्जा है या उसे किसी तरह बेच दिया गया है.शेष तीस फीसदी जो  है उसका भी दुरूपयोग ही हो रहा है.जबकि १९५४-५५ एक्ट स्पष्ट लिखता है कि केन्द्रीय सरकार राज्य सरकार को सम्पूर्ण अधिकार देती है कि वह वक्फ बोर्ड कायम करे,.उसे सही ढंग से चलाये और उसकी आय को मुसलमानों की प्रगति व उन्नति में खर्च किया जाए. लेकिन वक्फ बोर्ड पर काबिज़ लोग ऐसा होने देना नहीं चाहते .सरकार भी ढिलाई  करती है.होता यह है कि बोर्ड पर मुस्लिम समाज के कथित सूरमाओं को बैठा दिया जाता है.और यह हमारे क़ायद ही हमारा बेडा गर्क करने की मुहीम में जुट जाते हैं.आप हमें एकजुट होकर इनके कब्जे से जायदाद को निकलवाना होगा.सरकार से मांग करनी होगी कि वह सभी संपत्तियों की सही सूची सामने लाये.एक केन्द्रीय बोर्ड के तिहत सभी का सञ्चालन किया जाय.उन संपत्तियों पर बाज़ार के अनुकूल इमारतें ,होटल, अस्पताल,शिक्षण संस्थान खोले जाएँ.उसकी आय को इन्हीं मदरसों को दिया जाय जहां आधुनिक शिक्षा का यथोचित प्रबंध हो.





लेखक-परिचय

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