बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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गुरुवार, 6 जून 2013

राब्ता रखना ज़िंदगी के हर चेहरे से


 









कल्याणी कबीर की क़लम से

वो क़लम
जो उगलती है आग कागजों पे .
दिलाती है ये उम्मीद कि बाकी है इंसानियत
आतंक बोने वाले लकड़बग्घों पे चीखती है जो ,
देती है जवाब रज़िया के बदन पर फिसलती ओछी नज़र को .

वो कलम जो भूखी रहकर भी दूसरों की रोटी के लिए शोर करती है ,
वो कलम जो जंगलों में छिपी जिंदगियों में भोर करती है ,
जो घंटो जगा करती है , चला करती है
किसी पहरुए की तरह
उस कलम से
 प्यार है मुझे .


2. 

सोचती हूँ
और डरती हूँ
जब हौसलों के चेहरे पर पड़ जायेंगी झुर्रियाँ
मुझे रोटी के लिए तेरे दर की  तरफ देखना होगा
जब बुढापा रुलाएगा कदम दर कदम पे
तब महफूज़ छत की जरुरत होगी मेरी बूढी नींद को
गर दूंगी तेरे हाथों में दवाओं की कोई लिस्ट
तू भूल तो न जाएगा उन दवाओं को खरीदना
अभी तो चूमता है मुझको बेसबब घड़ी -घड़ी 
कहीं तरसेंगे तो नहीं हम तेरे हाथों की छुअन को
जाने कल के आईने में कैसे दिखेंगे हमारे रिश्ते
फिलवक्त तो यही सच है हमारे दरम्यान मेरे बच्चे.
'' मेरे जिस्म का टुकड़ा तू मेरी जान रहेगा
मेरे लिए हमेशा तू नादान रहेगा

 3. 


ज़िन्दगी के इशारों पर .
जब बजते हैं सितार दर्द के
तभी गुनगुनाती है ज़िन्दगी
खिलती है तभी वो एक गुलाब के मानिंद
जब घेरते हैं हालात नुकीले ख़ार की तरहI
आफताब बनकर चमकने से पहले ये ज़िन्दगी
हताशा की काली रात से गुजराती जरुर हैI
यह जलती है, तपती है धूप के झरने में हर रोज़
ताकि मुफलिसी में भी मुस्कुराती रहे किसी फ़क़ीर की तरह I
तभी तो ,,
राब्ता रखना ज़िन्दगी के हर चेहरे से मगर
मत झांकना कभी इसकी जादुई आँखों में I
मानकर इसे इस वक्त का सबसे बड़ा खुदा
जी लेना अपनी साँसें ज़िन्दगी के इशारों परI


(परिचय:
जन्म: ५ जनवरी को मोकामा ,बिहार में .
शिक्षा: स्नातकोत्तर रांची विश्वविद्यालय से, शोधार्थी - महाकाव्य विषय पर .
सृजन: स्थानीय साहित्यिक पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में रचनाएं प्रकाशित .
सम्प्रति: शिक्षिका .( जमशेदपुर )
जमशेदपुर आकाशवाणी में आकस्मिक उद्घोषिका
संपर्क:  kalyani.kabir@gmail.­com)



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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)