बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

माँ कहती थी






 









सी.सुमन की कविताएँ




मुश्किल राहो को करना हो आसां
तो दर्द किसी को ना देना .
माँ कहती थी
.

माँ कहती थी
शाम होते ही घर लौट आना
बाहर दरिंदगी बहुत है
दिन मे अपनों का चेहरा
पहचान नहीं पाते है
तो रात का एतबार कौन करे 
.

माँ कहती थी
अपनों के बीच जब पराया महसूस करे
भीड़ में रह कर भी अकेला हो
तो सजदे में चले जाना
सुकून होगा शांति होगी

 

माँ कहती थी
याद आये कभी मेरी
जाने के बाद
जीना मुश्किल लगे या
उठ जाये कभी किसी से  एतबार
 
लेना हो जिंदगी में किसी फैसले का जवाब
तो बक्से में बंद एल्बम से तस्वीर निकालना
जिसमे ऊँगली पकड़ चलाया था तुझे पहली बार .




[कवयित्री-परिचय 
                                  
जन्म: किसी वर्ष  १८ दिसंबर को बीकानेर में.
शिक्षा: विज्ञानं एव शिक्षा में स्नातकोतर
आकाशवाणी बीकानेर से विज्ञानं वार्ताए प्रसारित, उदघोषक के रूप में कार्य , 
सामूहिक चर्चाओ  में भागीदारी .विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में लेखन, लघु फिल्म निर्माण में सक्रिय .
बारह वर्षो से जीव विज्ञानं व्याख्याता के रूप में अध्यापन
सम्प्रति: वनस्थली विद्यापीठ विश्वविद्यालय(निवाई),टोंक-राजस्थान में कार्यरत . 
संपर्क: suman18gaur@gmail.com ]                            

 

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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)