बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

शम्भु यादव की कविताएँ


















 नौ साल का रामरतन
गुल्ली पर टुल लगाने की उम्र में
मैदानों को दौड़-दौड़ थका देने की उम्र में
स्कूल में पहाड़े सुनाते वक्त
सबसे तेज हो सकती थी उसकी आवाज 

अपने गांव से कोसो दूर
दिल्ली की एक दूकान पर
गोल-गोल बिलता बचपन
नौ साल का रामरतन
 
आग उगलती भट्ठियां 
वह मट्ठियां बेलता
मालिक की घुड़की है-
‘सुन बे ओए बिहारी ’  
एक मासूम मन है गलता

कुछ नन्हें सुख है
परिवार की भूख में उलझे ।

बाजार की लगभग हर दूकान पर बने ऐसे दृश्य में
एक लेबर इन्सपेक्टर घूम रहा है लगातार
अपने बच्चों के लिए मिठाई मांगता 
बच्चों से मजदूरी करवाने के एवज़ में अपना इनाम।


वे संभालते दुनिया

दिन भर कमरा खाली रहता है
शाम को अपना दरवाज़ा खोल हो जाता है आबाद

चौदह-बाय्-दस का वह कमरा
उसके हिस्से में आठ जन हैं

स्टोव पर पक रहा है हँसी-ठहाका
थकान की जकड़न से मुक्त साँसें
आँखों में आँखों का झाँकना
सुखद इच्छाओं का तेज़ प्रवाह
बाँगड़ जीवन पर फैलना चाहता

गाँव की कई याद कई तहें
इस कमरे में
उन तहों को ऊपर नीचे करते वे आठ जन
बतियाते हुए गपियाते हुए
अपनी आदतों में
अपनी नींद में
अपने सपनों में

रिश्तों की गरमाहट लिए सुबह में
उन्हें फिर छितर जाना हैं इधर-उधर

वे संभालते दुनिया..............


 ‘क्लोज-अप’ हसीना के चमकते दाँत से इतर
 

 वहाँ पनपीले मुख पर अट्टहास
‘क्लोज-अप’ हसीना के चमकते दाँत

यहाँ करोड़ों का संताप
सदियों से कार्यरत हथौड़े की ‘ठक-ठक’
सभ्यता के निर्माण परोधा व्यस्त।

यहाँ जीवन कोल्हू में पिला
हाट-बाज़ार बिका
ख्वाब एक बसेरे भर का
आत्मा में वेदना

वहाँ शरीरी अटरिया पर गमकता है तेल
माया का विलास खे़ल
आनंद का तिकड़म
चाँदी की आत्मा सोने का खोल।

वहाँ उज्जवल-कलश लुभावन
‘उन्नति के भव्य दीप यही’
भ्रामक शोर प्रसारित प्रचारित

सत्ता के गलियारे में
केंचुल छोड़ता इंद्रजालिक व्यापारी

यहाँ अधलिखे उपन्यास का क्षोभ
जिसके केन्द्रीय संवेदन में तीखी पुकार
मनुष्य के बेहतर जीवन की

सुबह की लहरों में गेहूँ की बालों पर
ओस की चमकदार बूंदें
मिट्टी की सौंध यहाँ।

एक उदास स्वर

दवाइयों के सहारे
बीमारी के डर से तो बच जाऊँगा
परन्तु कैसे बचा पाऊँगा इस शहर को
खंजर के खौफ से
बम के विस्फोट से

कोई भी घड़ी दे सकती है धोखा
जीवन के किसी भी क्षण पर
बेमुरौवत आरी चल सकती है
कभी भी उजड़ सकता है बागवां

किसी महाकाव्य का दौर नहीं है यह

अपूर्ण भाव में
सूरज का संवारक रूप कहाँ!?

किस अग्नि में तपकर शुद्ध होगी घोषणाएं

पिछड़े जाते है तेज अंधड़ में
आँखों में भर रही है किरकिरी

व्याकुल है पीली घास
आस लिए मन में
हरी-भरी हो जाने को

दुख सूखे ठूंठ पर गड़ा कीला
जो कुछ भी सुख है
उस पर जमी है
थकान की झाई

 बहरूपिया

केंचुल उतार गया सांप 
और दबा भी नहीं
पहले से ज्यादा चमका है निखर

अपनी पूंछ को घूमा
तीन सौ साठ डिग्री वाली चौकड़ी मार बैठा है
तरह तरह से अपने फन को लहराता
दिखता है प्रफुल्ल

‘नाग का काटा पानी भी नहीं मांगता’
अपने चरित्र की इस विषेशता को अर्थ देने में लगा
हज़म करता निरीह कीड़ों-मकोड़ों को

गदगद है धर्म के कटोरे में दुग्धपान से 

व्यवस्था की बीन-धुन पर
दिखावे का सदभावना नाच
अपने ही मोह में धुत्त बहरूपिया।

सौदागर-कलन्दर

महानगर में फैली है भूल-भूलैया सड़कें
सड़कों पर भठयारा सा आदमी
आदमी में फैले हैं सपनें
सपनों पर काला जादू छुमन्तर।

पृथ्वी का यह छोर या वह छोर
मनुष्य की इच्छाओं की खाद-बीज-पौध
सब कुछ काले जादू की गुफा अन्दर

गुफा का अधिश सौदागर कलन्दर।

शहर के बीचो-बीच बसा लूटियन जोन
लूटियन में शाही बिराजा है सुप्रीमों कलन्दर

स्काचॅ की मस्ती में
इंटरनेट पर पोर्नो देखना
उसका प्रिय शगल।
 
(कवि-परिचय:
जन्म :     11 मार्च 1965  को जिला महेन्द्रगढ़ (हरियाणा ) के गाँव बड़कौदा में
शिक्षा :     प्राथमिक शिक्षा गाँव में, उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविधालय से हिंदी में  स्नातकोत्तर
सृजन  :  एक कविता संग्रह  ' नया एक आख्यान' (2013 ) प्रकाशित
                विभिन्न पत्रिकाओं और इंटरनेट  ब्लाग्स पर कविताएं
संप्रति: दिल्ली में व्यवसाय व रहकर स्वतन्त्र लेखन
 संपर्क :    shambhuyadav65@gmail.com)





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शनिवार, 21 सितंबर 2013

कहानी: इयररिंग...












डॉ. अमिता नीरव की क़लम से 




रविवार का दिन था, स्कूल की छुट्टी। सरकारी स्कूलों में यूँ भी होमवर्क-फोमवर्क जैसा कुछ हुआ नहीं करता था। इसलिए दिन भर उसके फुदकने-खेलने के लिए था। वो यूँ ही घर में ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर के चक्कर लगा रही थी। पता नहीं क्यों, उसके बहुत दोस्त नहीं थे। पिता सब्जी लेकर अभी-अभी लौटे थे और वो उस जादू के थैले में से अपने काम की चीजें टटोल रही थी। अरे वाह...! आज तो बहुत कुछ था उस थैले में... सर्दियों के दिन थे – गाजर, मटर और हाँ... बेर भी...। उसने अपनी फ्रॉक को झोलीनुमा बनाया और उसमें अपनी छोटी-छोटी मुट्ठी में भरकर मटर और बेर डालने लगी... जब लगा कि अभी गाजर रखने की जगह बचानी है तो दो-तीन बड़ी-बड़ी गाजर उठाकर अपनी झोली में रख ली और गली के मुहाने पर जहाँ तीन-चार रास्ते गुजरते हैं और इस वजह से वहाँ एक मैदान सा बना है, वहाँ पहुँच गई।
ये वही जगह है, जहाँ आसपास के गलियों में रहने वाले सारे बच्चे शाम को खेलने आते हैं। वहीं एक पत्थर पर वो बैठ गई। मैदान सुनसान था वक्त हुआ होगा कोई 10-11 बजे का (सुबह)। उसने इत्मीनान से अपने दोनों पैरों को फैलाकर अपने फ्रॉक की झोली को सहेजकर व्यवस्थित कर लिया। गाजर खाना शुरू किया, फिर मटर... तभी उसके सामने एक 25-27 साल का युवक आकर खड़ा हो गया। उसने सामने वाली गली की तरफ इशारा कर कहा – उधर गली में 10 पैसे पड़े हैं, चल लेकर आते हैं...। उस 7-8 साल की बच्ची ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा...उसके मन में सवाल आया कि गली में 10 पैसे कैसे पड़े होंगे...? औऱ पड़े हैं तो उसने कैसे देखें? और उसने देखें तो फिर उसने खुद क्यों नहीं उठाएँ, ये उसे क्यों बता रहा है? लेकिन उसने उससे कोई सवाल नहीं किया। उसने देखा कि उस लड़के ने नीले रंग की पेंट पर बहुत सारे खूबसूरत और चटख रंगों का लाइनिंग वाला कोट पहना हुआ था। बच्ची को उसका कोट बहुत पसंद आया...।
उस लड़के ने फिर से अपनी बात दोहराई। बच्ची ने कहा – नहीं, मुझे नहीं चाहिए और उसने अपनी झोली में से बेर उठाकर उसकी टोपी काटी। वो लड़का थोड़ी देर असमंजस में खड़ा रहा। फिर उसने कहा – अच्छा, ये तेरे इयररिंग मुझे बहुत अच्छे लगे... मैं ले लूँ!
बच्ची ने बेर की गुठली चूसते हुए हाँ में सिर हिला दिया। उसने बच्ची के कानों की बालियाँ उतारी और लेकर चला गया। वो वहाँ वैसे ही अकेले बैठी रही। गाजर और मटर पहले ही खत्म हो चुकी थी, सारे बेर खत्म किए और खड़े होकर अपनी फ्रॉक झाड़ी...। थोड़ी देर यूँ ही बैठी रही और फिर घर लौट आई। माँ ने खाने के लिए कहा तो वो अपनी छोटी थाली लेकर बैठ गई। माँ थाली में रोटी रख रही थी तो उसने जोर-जोर से सिर हिलाकर इंकार किया, पता नहीं कैसे माँ की नजर उसके कानों पर गई। तेरी बालियाँ कहाँ गई? – माँ ने जोर देकर पूछा।
उसने बहुत निस्संगता से दाल-चावल का कोर बनाते हुए बताया – वो एक अंकल ले गए।
अब माँ घबराई... – कौन अंकल?
वो अंकल जो वहाँ मैदान में मिले थे...। उसे समझ नहीं आ रहा था कि माँ क्यों घबरा रही थी!  अबकी माँ खड़ी हो गई और उसका हाथ पकड़कर घर के आँगन में ले आई। पिता, ताऊ-ताई सबके सामने उन्होंने सारी बात बताई। और फिर सारे लोग उसे उस जगह ले गए। उससे पूछा – तूने देखा वो अंकल किस तरफ गए हैं?
उसने भी हाथ के इशारे से बाँई और जाती गली बता दी... लेकिन वो सोचने लगी कि आखिर बालियाँ तो उसकी गई है ये सारे लोग इतना क्यों घबरा रहे हैं? उसे अक्सर बड़ों की दुनिया बड़ी रहस्यमयी लगती थी, लेकिन रहस्यों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उस दुनिया में उसने झाँकने की कभी कोशिश भी नहीं की। ताई ने पूछा – कित्ती देर पहले की बात है?
उसने बहुत लापरवाही से कंधे उचका कर कहा – बहुत देर हो गई।
इतना सुनते ही सारे लोग निराश हो गए... अब तक तो पता नहीं कहाँ का कहाँ पहुँच गया होगा। हुआ क्या था? अब ये सवाल उठा। उस बच्ची ने सारी घटना सिलसिलेवार सुना दी। अरे... ! 10 पैसे के लालच में इसने अपने इयररिंग गवाँ दिए...। – माँ ने कहा तो उसने तुरंत प्रतिवाद किया – नहीं पैसे के लालच में नहीं...। लेकिन उसकी बात अनसुनी कर दी गई...।
फिर कई तरह की बातें हुई – अच्छा ही हुआ जो इसने इंकार नहीं किया, क्या पता गला ही दबा देता या फिर उठाकर ही ले जाता। धीरे-धीरे जो हुआ उसे होनी मानकर और उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाया ये सोचकर घरवालों ने उस घटना को भुला दिया। बाद में कई बार अलग-अलग लोगों के सामने या फिर अतीत को याद करते हुए इस घटना को दोहराया गया और हर बार वो ये सुनकर प्रतिवाद करती कि – ‘10 पैसे के लालच में इसने अपने इयररिंग गवाँ दिए।’ बाद के दिनों ने जब कभी इस घटना को दोहराया जाता और ‘लालच’ वाली बात बोली जाती तो उसे लगता कि क्यों नहीं उसने उस गली में जाकर देखा और वो 10 पैसे उठाकर ले आई... कम-से-कम ये ‘लालच’ ही कर लेती तो उसे इतना बुरा तो नहीं लगता। फिर घरवालों ने उसे सोना पहनाना बंद कर दिया, बड़े होने पर उसने खुद ही सोने से दूरी बना ली। बड़े हो जाने के बाद इस घटना की दो चीजें उसे शिद्दत से याद रही – एक उस लड़के का सुंदर कोट और दूसरा उस दिन उसने 10 पैसे का लालच नहीं किया था।

इस घटना के बाद सोना (gold) उसके जीवन की ग्रंथि बन गया। शौक से खरीदती, लेकिन ना उसे पहनने की इच्छा होती और ना ही हिम्मत...। हाँ लेकिन एक चीज जो उसने जानी ये कि वो आज भी वो किसी चीज के लिए इंकार नहीं कर पाती है। पता नहीं ये अच्छा है या बुरा...!


(रचनाकार परिचय:
जन्म:  उज्जैन (मध्यप्रदेश), मार्च १९७१ में
शिक्षा: एम. ए., एम. फिल्.(राजनीति-विज्ञान), 'सार्त्र और कामू के अस्तित्ववादी विचारों का तुलनात्मक अध्ययन' पर पीएच. डी.
सृजन:  पाखी, गुंजन, वंशिका, साहित्य nest और किस्सा में कहानियां प्रकाशित, नईदुनिया, दैनिक भास्कर और प्रथम प्रवक्ता में समसामयिक विषयों पर लेख, परिंदे और सहारा समय में यात्रा संस्मरण और समीक्षाएँ, वेब-पत्रिकाओं में जैसे सृजनगाथा, हिंदीकुंज, अभिव्यक्ति, नव्या में कहानियों का प्रकाशन और हिंदी समय, सृजनगाथा और जनसत्ता के अतिरिक्त कई अखबारों में ब्लॉग्स का प्रकाशन। लेख और कहानियों का प्रकाशन,  ब्लॉग का विभिन्न अखबारों में प्रकाशन।
ब्लॉग: अस्तित्व  
संप्रति: इंदौर से प्रकाशित दैनिक अखबार नईदुनिया के फीचर विभाग में कार्यरत
संपर्क: amita.neerav@gmail.com)
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रविवार, 24 जून 2012

क़लम की मजदूरी करने वाला निपनिया का किसान उर्फ़ अरुण प्रकाश



हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला गया....




























सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

सितम्बर की कोई तारीख. साल २००८.रायपुर को मैं अलविदा कर चुका था. देशबंधु के प्रबंधन से ऊब थी, वहीँ दिल्ली आकर कुछ अलग कर गुजरने का ज्वार रह-रह कर उबल रहा था. 'भासा' के राजेश व उसके साथियो की तरह दिल्ली अपन भी फतह करना चाहते थे. दोपहर ढल आई थी. पंडित जी (कथादेश के संपादक हरिनारायण जी) कनाट प्लेस के दफ्तर गए थे. उनके एक अफसर मित्र की पत्नी ज्योतिष की पत्रिका निकालती थीं. जिसका दफ्तर एक बड़ी इमारत में था. वहीँ कथादेश को एक कोना नसीब हो गया था. दोपहर बाद पंडित जी वहीँ चले जाते. पन्त जी (लक्ष्मी प्रसाद पन्त , सम्प्रति भास्कर जयपुर में सम्पादक) ने कथादेश को बाय कर दिया था. विश्वनाथ त्रिपाठी की बदौलत मार्फ़त विष्णु चन्द्र शर्मा  जी उनकी जगह मैंने ले ली थी. खैर! दस्तक हुई दरवाज़े पर!  दिलशाद गार्डेन का सूना पहर. मैंने झांकर देखा. लहीम शहीम एक शख्स  बाहर खडा है. सरों पर हलकी सुफैदी ..बदन पर लंबा सा कुर्ता और पाजामा. भदेस सज्जन जान मैंने दरवाज़ा खोला. नमस्कार किया. शाइस्तगी  से लबरेज़ जवाब पाकर मेरी झुर-झुरी कम हुई.
आप नए आये हैं..
जी.....
कहाँ के हैं...
बिहार..
वहाँ कहाँ के..
..गया.
..अरे वाह! मैं बेगुसराय का एक किसान हूँ. कलम की मजदूरी करता हूँ.
 इस मासूमियत पर कौन न मर मिटे! हिचकते हुए नाम पूछ बैठा...अरुण प्रकाश! सुनते ही मैं खिल उठा. उनकी कुछ कहानियां,  उन जैसे ही किरदारों का कोलाज़ झिलमिलाने लगा. इस अनूठे लेखक से यह हमारा पहला साबका था. बाद में लोगों से उनके आत्मकेंद्रित रहने, बहुत कम खुलने.. की बात मैं आज तक नहीं हज़म कर पाया..उनकी अपनी सी लगती कहानियों का मैं दीवाना तो पहले से ही था. पहली मुलाक़ात ने लव इन फर्स्ट साईट सा जादुई असर किया था. जिसका यथार्थ मेरे लिए कभी कटु न रहा.

पहले अरुण जी, फिर भाई साहब उन्हें कहने लगा.वो कब मेरे भैया बन गए मुझे पता ही न चला. दिल्ली के इस दूसरे प्रवास में करीब दस बारह सालों तक कंक्रीट के जंगलों में मुझे बेतहाशा गुज़ारने पड़े. कभी कहीं ठौर मिली. कहीं चाँद गोद में भी आया. इस अवधि में अरुण जी से मिलना कई बार हुआ. महेश दर्पण जी के बाद मैंने उन्हें सबसे ज्यादा श्रम करते देखा. मुझे लगता है कि वह संभवत चार से पांच घंटे ही विश्राम ले पाते होंगे. सुबह उठ कर टहलने निकल जाते. इस प्रात:भ्रमण में उनके साथ रहते विश्वनाथ त्रिपाठी जी. युवा व्यंग्यकार रवींद्र पाण्डेय, उन्हीं की तरह दूसरे मसिजीवी रमेश आज़ाद आदि. सूरज के ज़रा परदे से निकल आते ही उनका घर आना होता. फिर हलके नाश्ते के बाद जो अपनी स्टडी( तब बालकोनी को ही घेर कर उन्होंने अपना अध्ययन कक्ष बना लिया था) में जाते. फिर लिखना,  लिखना और लिखना. कागजों पर जो उतरता जाता. उसमें किसी अहम किताब का अनुवाद होता. किसी सीरयल की पटकथा होती. संवाद होता..या नई कहानी का पुनर्लेखन.

ग़ज़ल का तगज्जुल

ग़ज़ल गो रामनारायण स्वामी( तब वो अन्क़ा नहीं हुए थे) के पहले ग़ज़ल संग्रह रौशनी की धुंध की चर्चा के लिए सादतपुर में महफ़िल जमी.  वीरेंद्र जी (जैन) के यहाँ हुई उस दोपहरी गोष्ठी में  स्वामी जी की गजलों पर आधार आलेख मैंने ही पढ़ा. सादतपुर के लेखकों के अलावा अरूण जी, जानकी प्रसाद जी, इंडिया टुडे वाले अशोक जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद, कुबेर जी आदि ढेरों लोग थे. लेकिन अरुण जी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा, ग़ज़ल पर यदि शहरोज़ जी न कहते तो उसकी तगज्जुल न रहती. या खुदा! इतने बड़े बड़े दक्काक के रहते इन्हें क्या हुआ..जबकि हिंदी समाज में उर्दू के प्रमाणिक शख्स जानकी जी मौजूद हैं. अरूण जी ने जिस सहजता से मेरी बातों को सराहा, असहमति भी जतलाई. ऐसे लोग मुझे दिल्ली में कम ही मिले. बमुश्किल दो-चार नाम ऐसे स्मरण में हैं. सर्दी की एक दोपहर हम सभी कृषक जी की छत पर जमा हुए. यहाँ भी दिलशाद से अरूण जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद पहुंचे.  मेरी 'अकाल और बच्ची' कविता उन्होंने दो बार सुनी. इस कविता में अकाल के इलाके से रोज़गार की तलाश में परिवार दिल्ली आया है. उस परिवार की बच्ची के बचपन को मैंने शब्द देने की कोशिश  की है. ये अकारण नहीं हुआ होगा. दिल्ली हो, कोलकता या मुंबई उनके साथ उनका गाँव निपनिया हर दम साथ रहा. उनकी कहानियों में भी यह ज़मीनी सोंधापन मिलता है. हिंदी में ऐसे कथाकार आज़ादी के बाद कम हुए,  जिन्होंने हाशिये के लोगों को अपना केंद्र बनाया हो. उनकी अधिकाँश कथाओं में घर से बेघर नयी जगह में आसरा तलाश करते लोगों की ज़िंदगी को उन्वान मिला है. भैया एक्सप्रेस हो, या मझदार,विषम राग हो या नहान, भासा आदि कहानियां गौरतलब हैं.

शेरघाटी पर उपन्यास लिखो
कथादेश के पहले युवांक में मेरी पहली कहानी 'पेंडोलम' छपी. मैं राजकमल में था. उनका फोन आया.
यार! कहानी भी लिखते हो..बताया ही नहीं कभी! 
जी..भैया ..
दूसरी लिखो तो बताना. यूँ इस कहानी को विस्तार दो. आप (तुम कहते कहते वो आप बोल जाते..) अपने घर- कस्बे शेरघाटी को केंद्र में रख कर एक उपन्यास प्लान कीजिये. मुस्लिम जीवन अब हिन्दी में न के बराबर आ रहे हैं. आपसे उम्मीदें हैं.
जी! कोशिश करूँगा..
लेकिन ग़म-ए-रोज़गार ने इतनी मोहलत ही न दी कि मैं उपन्यास कलम बंद करता. यूँ उन्होंने एक-दो बार याद भी कराया, 'शहरोज़ जी क्या हुआ..कुछ बात बनी.' मेरे नफी में सर हिलाने पर थोडा तुनक भी जाते..'पहचान सिर्फ एक कहानी से नहीं बनती..'

गया गया मिल गया
प्रेमचंद जी की जयन्ती पर हंस द्वारा सामयिक विषय पर कई सालों से गंभीर विमर्श का आयोजन होता आया है. राजेन्द्र जी जिसके कर्ताधर्ता हों, उस मजमे में भीड़ न जुटे. मैं उन दिनों रमणिका जी की पत्रिका युद्धरत आम आदमी से जुड़ा हुआ था. वहाँ से निकलते निकलते थोड़ा विलम्ब हो गया. जैसे ही राजेन्द्र भवन पहुंचा. संजय सहाय पर नज़र पडी तो मैं उधर ही लपक गया. उन्होंने दोनों हाथ फैला दिए. और हम यूँ मिले जैसे बिछुड़े हुए हों. मुद्दत बाद मिलना भी हो रहा था.
'गया गया मिल गया!' जानी पहचानी आवाज़ से हम अलग हुए. अरुण जी पास मुस्कुरा रहे थे. उनकी यही मुस्कान दूसरों की ज़िंदगी बख्शती रही. उनकी जीवटता से हम उर्जस्वित होते रहे. बाद में उनसे बहुत कम मिलना हुआ. दिनों बाद फोन पर बात हुई. लेकिन उन्होंने एहसास ही न होने दिया की वो बेहद अस्वस्थ हैं. जबकि गौरीनाथ से उनकी दिनों दिन बदतर होती तबियत का मुझे इल्म हो गया था.आज ढेरों कह रहे हैं कि काश  सिगरेट छूट जाती तो शायद उनकी उम्र ....



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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

केरला यानी यहाँ सब अल्लाह की ख़ैर है


समुद्र  नारियल के नमकीन मीठे जल की तरंग 























केरल से लौट कर शहबाज़ अली खान 

 

काफ्का ने अपनी कहानी  'चीन की दीवार' में बीजिंग के बारे में कहा है कि हमारा देश इतना विस्तृत है कि  इसके बारे में कोई भी किस्सा इसके साथ न्याय नहीं कर सकता. यहाँ तक कि इश्वर भी मुश्किल से इसकी पैमाइश कर सकता है. काफ्का ने शायद भारत नहीं देखा होगा वरना वह इश्वर के लिए इस देश की पैमाइश को मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन ही बता देते. ०७ को गाडी मथुरा से खुली. दो एक घंटे बाद ही कुदरती आबशारों से हम नहाते चले गए.कहीं सूरज की किरणें नर्म गिलाफों सा आ-आ कर लिपट जातीं.जिन-जिन राहों से हम गुज़रे अहसास शिद्दत की गिरफ्त में हुआ. हमारा देश कितना विस्तृत है... मध्यप्रदेश में लगातार होरहे खनन, पहाड़ों को काटती पिटती मशीनों और उडती धूलों, चम्बल के बीहड़ों, सामन्ती अवशेषों- मंदिरों और किलों, छतीसगढ़ के नक्सली इलाकों, महारष्ट्र के हरियल और पनियल इलाकों से गुजरते हुए जब गाड़ी कर्णाटक पहुंची तो हवाओं की नमकीन गंध और नारियल की अबोल-मीठ-फ़िज़ा ने दस्तक दे दी.अहा! अब केरल दूर नहीं! सड़कों के किनारे स्वागत करते नारियल के पेड़. उनके झुरमुटों से छन कर आती ठंडी हवाएं रात की स्याही को रौशन करती रहीं.

 
सुबह के साढ़े ५ के करीब हम केरल के कोझिकोडे (कालीकट) पहुंचे. बहार निकलते ही मेरी नज़र सबसे पहले जिस चीज़ पर पड़ी वह मार्क्स के तस्वीर की एक बड़ी सी होर्डिंग थी जिस पर सी.पी.आई.एम् के २० वें पार्टी कांग्रेस की तय्यरियाँ चल रहीं थीं.. भोर के धुंधलके में ही मुझे जंक्शन से लेकर अबू के घर तक हर जगह लाल ही लाल दिखाई दिया.. ये हलब्बी हलब्बी बैनर, होर्डिंग, कटआउट  वगैरह.. रास्ते लाल रंग के फीते हर जगह टंगे नज़र आयें.. दिन का नज़ारा न पूछिए.. अबू ने कहा कि ये अपने को सर्वहारा की पार्टी कहती है लेकिन इस मौके पर २० करोर से ज्यादा खर्च कर चुकी है. हालांकि मैंने इस तथ्य के बाबत कोई छानबीन नहीं की है लेकिन ये तो तय है कि कालीकट को देखकर ऐसा लगा कि मैं भारत के किसी शहर में नहीं बल्कि रूस के किसी शहर में हूँ.

केरल के पहले ही दृश्य ने मोहा मन

सूरज ज़रा ही उपर चढ़ा था कि हम अबू के घर पहुँच गये. अबू हमें अपने घर के आस पास के पेड़ पौधों को दिखाने लगा. काजू के पेड़, गुजराती लोगों का पसंदीदा सुपारी का पेड़, हमारी तरफ चलने वाले सुपारी (तामुल) का पेड़, कटहल, नारियल का तो पूछना ही क्या है, काफी के पेड़ आदि यह सब उसके घर के भीतर और उसके आस पास लगे थे.. फिर अबू हमें अपने घर के पिछवाड़े ले गया और वहाँ जो दृश्य मैंने देखा उसे भूल नहीं सकता. नारंगी सूरज ज़मीन कुछ इंच ऊपर था और उसमें सियाह बादलों की दो तीन धारियाँ कुछ यूँ लिपटी थीं जैसे माँ ने अपने बच्चे को नज़र से बचाने के लिए दो तीन नज़र की टीकाएं लगा दी हों. ज़मीन का गीलापन और काले बादलों में लिपटे सूरज का वह नारंगी रूप आह! क्या कहने उस दृश्य के. केरल ने अपने पहले ही दृश्य से मन मोह लिया... 


























और अम्मी ने मेरे तलवे को हौले से सहलाया

शाम को समन्दर देखने गये. रास्ते में सी.पी.आई.एम् के २० वें पार्टी कांग्रेस की लहरें अपने उफान पर थीं. इस से बचते बचाते हम वहाँ पहुंचें जिसे देखने की लालसा मेरे दिल में कई सालों से थीं.. जी हाँ मेरे सामने हहराता समन्दर था. २८ साल बाद नंगी आँखों से उसे देखना एक रोमांचकारी क्षण था. पल के लिए मैं डर गया.. इतना भव्य, विशाल, व्याकुल, अंतहीन, लहर दर लहर जोश से भरा हुआ. सब कुछ लीलने को तैयार बैठा हुआ. उस पर अम्मी की हिदायत ... तुम समन्दर के नजदीक मत जाना (उन्हें मालूम है बचपन से पानी से डरता हूँ). मैं अभी उधेड़बुन में ही था कि सारे दोस्त तुरंत पैंट-शैंट चढ़ा के, सैंडिल-जूता एक तरफ कर के घुटनों तक जा पहुंचें. कई छोटे बच्चे कूद-कूद कर उसमें नहा रहे थे. अम्मी की हिदायतों को समन्दर के आकर्षण ने परास्त कर दिया. मुझे याद नहीं, कब मैंने सैंडिल उतारी, पैंट चढ़ाई और उसके पास चला गया. लहरों ने मेरा पैर छुआ. लगा मैं अबोध शिशु हूँ और अम्मी ने मेरे तलवे को हौले से सहलाया हो! जितनी बार लहर आती मेरे पैरों के नीचे की रेत बहा ले जाती.... एक चुल्लू पानी भी पिया. लगा मानो एक चम्मच भरपूर नमक फांक लिया हो. समन्दर के भीतर नमक न होता तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल था. उस एक घूँट पानी ने मुझे यह अहसास कराया कि दुःख हमारे जीवन का एक ऐसा ही नमक है. जो हमारे जीवन को संतुलित करता है, नियंत्रित करता है. खूब ढेर सारी फोटो खीचा-खिचौअल के बाद आइस अचार का खट्टा-मीठा स्वाद का चटखारा! अब भी उसकी सोंधी डकार बरक़रार है. एक गोरखपुर के पान वाले से मीठा पान खाया. और अँधेरा होते होते वापस अपने कयाम गाह तक लौट आये...






 दुल्हन के घर से आई बरात 


अगले दिन बन-ठन के अबू के निकाह के लिए तैयार हुए.. पता चला कि केरला की एक बड़ी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष सैयद हैदर अली शहाब  थंगल अबू का निकाह पढ़ाएंगें. शहाब साहब जब आये तो उनके आगे पीछे कोई और गाड़ी नहीं थी. न ही भीड़-भड़क्का. चूँकि केरल की संस्कृति में सामन्ती अवशेष नहीं के बराबर हैं. वहाँ शादियों में लड़की वाले लड़के वालों के यहाँ आते हैं. वो भी एक दो नहीं पूरे सौ-दो सौ लोग. जितनी तेज़ी से आते हैं उतनी ही तेज़ी से वापस चले जाते हैं. बिलकुल शांत और सुरुचिपूर्ण तरीके से खाना पीना होता है. निकाह के बाद कोई हो-हल्ला नहीं.  बन्दूक-गोलियां नहीं चलती हैं. उनके रहनुमा भी इस संस्कृति का ही पालन करते हैं. सबका पहनावा लगभग एक था- लुंगी और शर्ट और पैर में सैंडिल.  शहाब साहब का भी. चलन इस कदर है कि पैंट पर भी लोग शर्ट इन नहीं करते हैं. ये पहनावा केरल का अपना ही है या वाम विचारधारा का प्रभाव, मुझे पता नहीं चल पाया (पिछले तेरह सालों से एक बड़े कामरेड प्रो. इरफ़ान हबीब को इसी पहनावे को पहनते देखा है, शर्ट बाहर, पैर में सैंडिल या चप्पल, और अभी भी साइकिल से चलना.).. निकाह बेहद सादगी से हुआ, कोई टीम-टाम नहीं, झट-पट. खाना तो खैर माशा अल्लाह था. खाने के बाद गर्म पानी, एक केला, और एक कप काढ़ा. यह सब हम लोगों के लिए बिलकुल नया था. खाने के बाद सभी तुरंत चले गये, लड़की वाले, अबू के रिश्तेदार भी.

वास्को डी गामा के क़दम जब पड़े 

निकाह बाद बचे सिर्फ हम लोग. फिर तय पाया गया कि हमें कापड बीच देखना चाहिए जहां पहली बार वास्को डी गामा के पैर पड़े थे. अँधेरा होने से थोड़ी ही देर पहले पहुंचे. यहाँ के चट्टान और समंदर, दोनों ही गवाही दे रहे थे कि कभी यहाँ दुनिया आकर मिलती रही होगी. हालांकि इन चट्टानों पर  सी.पी.आई. एम् के इश्तेहार दूर से ही नुमाया हो रहे थे. वास्को कभी यहाँ आया था उसकी कोई इबारत नहीं देखी. सिर्फ एक समंदर था जो यह चीख चीख कर कह रहा था कि मेरे सीने पर वास्को ने कभी नाव चला कर इस सर ज़मीन पर अपने पैर रखे थे. चट्टानों से गले मिलने को बेताब समंदर का जोर देखने लायक था. लेकिन बेदिल चट्टान हर बार उसकी बेताबी को झुठलाकर उसे वापस कर देता था. समंदर की बेताब लहरें आपस में खूब टकराती हैं लेकिन ऐसा लगता मानो कभी मिल नहीं पाती. हमारे दो दोस्तों ने सूरे रहमान की उस आयत का ज़िक्र किया जिसमें कहा गया है कि समंदर जब मिल रहे होते हैं तो उनके बीच में एक पर्दादारी होती है, जिसका वह अतिक्रमण नहीं कर पाते. सच aisa  hi लगा. सूरज जल-समाधि  के लिए अधीर हो रहा था. आध घंटे में उसने जब समाधि ली तो शोर कुछ थम सा गया. बारिश की आशंका ने भी हमें वहाँ से वापस होने पर मजबूर कर दिया.










 


















वाय्नार्ड के जंगलों में इतिहास का सूरज

 दो दिन समन्दरों के हहराते शोर और चंचल लहरों को देखने में गुज़रे. अगले दिन यह तय पाया कि अब हम कोझिकोडे से लगभग २०-३० किमी दूर वाय्नार्ड चलते हैं. वाय्नार्ड कर्नाटक और केरल को जोड़ता है. ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच से टीपू सुल्तान ने यह रास्ता खोजा था.  (कुछ का मानना है कि टीपू ने नहीं बल्कि हैदर अली ने इस रास्ते की खोज की थी) इन दोनों बाप-बेटों में से जिसने भी इस रास्ते की खोज की हो, इस रास्ते को देख कर मैं अपने देश के शासकों के सराहनीय योगदानों के प्रति अभिभूत हो गया. इस रास्ते पर चलते हुए दोस्तों ने शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित भारतीय सड़क व्यवस्था की भी चर्चा की. इन चर्चाओं के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि आखिर किस बात पर हम अंग्रेजों द्वारा माल्गोदामी व्यवस्था की सराहना करते हैं? किस आधार पर उन्होंने  यह कह दिया कि हमारा पिछला शासन अविकसित था. अगर कोई हिंदुस्तान को गौर से देखे तो उनकी बातें झूठी साबित हो जायेंगी. वाय्नार्द चारो और से पहाड़ों से घिरा है. यूँ ट्रेन के सफ़र में भागते पहाड़ों को देखा तो था लेकिन इतने नज़दीक से .. ओह् ह्ह इतना उदात्त, गंभीर, अविचल, मौन था कि उसको देख के कुछ सूझ ही न रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि यह समाधि में बैठा को कोई साधू है या आँखें तरेरता हुआ कोई दबंग है. . या ज़मीन में धंसी कोई कील है जिसने ज़मीन को पकड़ रखा है.(एक दोस्त ने बताया कि अल्लाह कुरआन  में पहाड़ों के बारे में कहता है कि हमने इसे कील की तरह ज़मीन में ठोंक दिया है.. ताकि ज़मीन हिल न सके) पहाड़ों को देख के न जाने दिल में क्या-क्या आया वह बता पाना मुश्किल है, कितने कवियों की पहाड़ पर लिखी कवितायें याद आयीं. लेकिन  "तुझको देखूं की तुझसे बात करूँ" वाली स्थिति मेरी थी. 



























पहाड़ के आह से उपजी नदी

वाय्नार्द के जंगलों के आस पास बसी आदिवासियों की बस्ती उतनी ही खुबसूरत सुरम्य. वहां की एक झील का आनंद लेने के बाद हमने कुरुवा द्वीप में फिसलन भरे पत्थरों और चट्टानों के बीच कल-कल बहते नीर के साथ थोड़ी सी मस्ती की. उससे थोड़ी दूर पूकोट्टू झील के पास पहुंचे जो भारत के नक्शे की तरह बसा था...हमने यहाँ बोटिंग की. बोटिंग कराने वाले ने हमें उस झील की गहराई और उससे जुड़े कुछ और तथ्यों के बाबत जानकारी दी. उसने हम लोगों की तस्वीर भी खींची. केरल वासी सौम्य और सुलझे तथा कितने सभ्य हैं उस एक आदमी से बात करके यह बात और भी पुख्ता होगयी. लौटते वक्त ट्रेन में पैंट्री कार के एक वेंडर ने मोहम्मद जलाल या जमाल, जो की सीलनपुर का था, ने भी इस की तस्दीक की. पूकोट्टू में हमने लकड़ी से बने कुछ सामान खरीदे. और लौट पड़े. शाम अब बेहद गहरा गयी थी. चारो और एक धुंध सी थी. पहाड़ धुएं से लिपटे हुए थें. तब मेरे ज़ेहन में यह आया कि पहाड़ साधू या हो दबंग हो, असल वह एक वियोगी है. एक दुःख से भरा प्रेमी है.  जैसे-जैसे रात होती है, उसका दिल जलता है, इक धुंआ-सा उठता है.... इतना धुंआ उठता है कि दूर से देखने पर लगता है नदी बह रही हो. यह पहाड़ के आह से उपजी नदी थी जो सिर्फ रात के अँधेरे में ही बहा करती है. 
































रिश्ता रंग बिरंगे प्यार के धागे से बुना

केरल का हमारा प्रवास चौथे दिन अपनी समाप्ति की ओर आ गया. अबू के घर मिली इतनी मोहब्बत और स्नेह हम भूल नहीं सकते. हमारे और अबू के घर वालों के बीच भाषा की दीवार थी. हमारे एक मित्र हफीज ने इस दीवार को गिरा दिया था. वह कर्नाटक के मैंगलूर के वासी हैं, केरल में शिक्षा प्राप्त की है, अभी अलीगढ से अरबिक से पीएच. डी कर रहे हैं. ६ भाषाओँ के जानकार हैं. उन्होनें ट्रांसलेटर की भूमिका बहुत शानदार ढंग से निभायी. उनके बिना टूर अधूरा होता. यूँ तो हर दोस्त अपने में ख़ास था लेकिन उनका महत्त्व रेखांकित करने योग्य है... जाने से पहले मैंने कहा था कि यूँ तो केरल के टूर पर जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. लेकिन मेरे लिए एक केरलवासी दोस्त अबू की शादी में शिरकत करना बहुत अहमियत रखता है. मेरे लिए यह उस हिन्दुस्तानी तहजीब की बेमिसाल रिवायतों में से एक है कि यहाँ तमाम तहजीबों के बीच एक रिश्ता रंग बिरंगे प्यार के धागे से बुना होता है. यह धागा तोड़े से भी नहीं टूटता है. दूरियों को ये एक क़दम में नाप लेता है. अजनबियत को चुटकी में बाँध कर किसी दरिया में डाल देता है. और यह धागा किसी दुकान पर नहीं, बल्कि हमारे दिलों में मिलता है. हिन्दुस्तान इसी मायने में अपने भीतर हमेशा जिंदा रहता है....






 
























वहां से आते वक्त दिल में बस इतना ही कहा कि वाकई यहाँ सब अल्लाह की खैर है.*

*केरला के नामकरण एक पीछे एक कारण यह बताया जाता है की जब पहली बार अरब यहाँ पहुंचें तो उन्होंने इसकी खुश हाली देख कर कहा था कि यहाँ खैरुलाह! यानी सब अल्लाह की खैर है....खैरुलाह बाद में घिसट कर केरला हो गया.

(लेखक-परिचय:
जन्म: १८ मई, १९८४, बहराइच में
शिक्षा: अलीगढ मुस्लिम विवि से राही मासूम राजा पर पी-एच डी कर रहे हैं
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट. फेसबुक के चहीते रचनाकार
संपर्क:alikhan.shahbaz@gmail.com)


हमज़बान पर उनकी पहली पोस्ट
शहरयार की याद पढ़ें 


 
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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

ओ रंगरेज़िये ! मेरा रंग दे बासंती चोला..


रंगरेज़ा, रंग मेरा मन, मेरा तन



 
 










 ममता व्यास की कलम से 


कल बाजार से गुजरते समय इक़ रंगरेज की दुकान पे नजर पड़ी | वो बड़े जतन से , हर कपड़े को रंग रहा था | बड़ी ही तन्मयता के साथ | हर कपड़े को उठा -उठा कर रंग में भिगो देना | फिर उसे सुखाने के लिए इक़ रस्सी पर लटका देना | लाल, नीले, हरे पीले, गुलाबी और जामुनी भी तो | सभी रंग कितने अच्छे और कितने कच्चे ....| ज़रा लापरवाही हुई नहीं कि इक़ का रंग दूजे पर चढ़ जाए | वो रंगरेज , अपने काम से थक के ज़रा आराम करने की नियत से लेट गया | और मैं चल दी | लेकिन तभी मैंने उस दुकान में कुछ आवाज़े सुनी | सभी , साड़ियाँ, दुपट्टे , और बहुत से कपड़े इक़  जगह  आकर इकट्ठे होकर बतिया रहे थे | मैं ठहर गयी तो सुना -- ---इक़ गुलाबी दुपट्टे ने बात शुरू की | इस रंगरेज से मैं बहुत परेशान हूँ | ये अपनी मर्जी से हमें क्यों रंग देता है ? मुझे गुलाबी, नहीं लाल रंग पसंद है | फिर इसने मुझे ये फीका गुलाबी रंग क्यों दिया ? जबकी मैं चटक लाल  हो जाना चाहता हूँ |  और वो देखो, देखो काली  साड़ी कितनी उदास है.  उसे हरा पसंद था | मेरा बस चले तो इक़ दिन इस रंगरेज की दुकान ही बंद करवा दूँ | 
अब तुम चुप हो जाओ | इक़ सफ़ेद कपड़ों की गठरी बोली | ये रंगरेज , इतना बुरा भी नहीं | अब मुझे देखो मैं कितनी बुरी लगती हूँ | रंगहीन | कल ये मुझे इक़ नए रंग में रंग देगा | फिर मैं बाजार में चली जाउगी | वहां मुझे खरीद के लोग अपनी मनपसंद ड्रेस बनवायेंगे | मेरा उपयोग होगा | दुनिया देखूंगी मैं | यहाँ घुट के मरने से बेहतर है, दुकान से बाहर चले जाना | ये रंगरेज ना हो तो क्या मोल है हमारा ? बोलो ? 
तभी, खूंटी पर सुखाने के लिए लटकाई गयी इक़ साड़ी बोली: इस रंगरेज को इतनी भी खबर नहीं कि  मैं कबसे इस खूंटी पर टंगी हुई हूँ | मेरी बारी कब आएगी कि  मैं हवा में खुल कर बिखर जाऊं ? उड़ जाऊं | तभी इक़ दर्द भरी आह निकली --और मुझे देखो मैं कबसे इस रंग के बर्तन में भीग रहा हूँ | मुझे बाहर नहीं निकालता वो रंगरेज | मैं दर्द से मर गया हूँ |  ये कितना निष्ठुर रंगरेज है | इसे किसी की कोई परवाह नहीं | ये बहरा है | जरुर ये कोई नशा करके सो जाता है रोज |और हमारी बात , जो हम कह नहीं सकते इससे | क्या , ये कभी समझ पायेगा ? 
मैं सोचने लगी | हम सब भी तो मात्र इक़  कोरे कपड़े ही हैं | ऊपर बैठा वो रंगरेज हमें जैसे चाहे रंग दे | उसके रंग कितने अच्छे कितने सच्चे | वो हम सभी को अलग -अलग रंगों में रंगता है | हम सभी , इक़ दूजे से कितने अलग | कोई किसी से मेल नहीं खाता | चेहरे अलग | फ़ितरत अलग | आवाज अलग | अंदाज अलग | किसी का रंग किसी से नहीं मिलता | किसी का ढंग किसी से नहीं मिलता | सभी विशेष | सभी अनोखे | क्या खूब बनाया | 
किसी के भीतर लोहा भर दिया | किसी के अन्दर मोम भर दिया | जो लोहा भर दिया तो वो मशीनी आदमी हो गया | अब वो मशीन की तरह काम करता है | मशीन की तरह प्रेम करता है | उसका दिल लोहे का जो टूटता नहीं | दर्द उसको होता नहीं | वो सिर्फ मशीनी है | उसकी देह भी इक़ मशीन हो गयी | वो कभी मोम नहीं हो सकता | और जो किसी में मोम भर दिया तो वो पल पल पिघलता ही रहता है | जहाँ ज़रा सी प्रेम की उष्मा मिली | पिघल गए | गर्मी ज्यादा मिली तो पिघल के शक्ल ही बदल बैठे | मोम  को शिकायत की ये लोहा उसकी कोमलता को नहीं समझता | इक़ झटके में उसे चूर -चूर कर देता है | लोहा , कहता है मोम का कोई केरेक्टर ही नहीं जब देखो पिघल गए | 
उस रंगरेज , ने किसी में खुश्बू भर दी तो वो जहाँ होता है अपनी महक भर देता है | तो किसी में बंजर कर देने के रसायन भर दिए | ऐसे जहर भर दिए की वो मनुष्य अपने जहरीले रसायनों से ना जाने कितने दिलो की धरती को हिरोशिमा नागासाकी बना बैठे | किसी में इतनी  उर्वरा शक्ति भर दी की उसने रेगिस्तानो में झरने बहा दिए | फूल खिला दिए | किसी में इतने शब्द भर दिए की शब्दों की क्यारियाँ बाना दी | | तो किसी के पास इक़ शब्द भी नहीं कहने के लिए | किसी में हरापन भर दिया तो किसी में वीराना | कोई अपने शब्दों से किसी के भीतर सृजन कर दे | कोई अपने शब्दों के तीर से किसी को बाँझ कर दे | कोई गौतम ऋषि अपने शब्दों से स्त्री को पत्थर बना दे | तो कोई राम उसे अपने स्पर्श से फिर स्त्री बना दे | 
कमाल का है वो रंगरेजा | उसे सब खबर है | किस को कहाँ जाना है | किसकी कहाँ मंजिल है | किसके भाग्य में कितने कांटे है | कितना हिस्सा ? कितना किस्सा ? कितनाकौन झूठा | कौन  कितना सच्चा | किसकी रेट कितनी बंजर होगीं | किसकी आखों में कितने रतजगे उसने लिखे वो ही जानता है | 
दर्द के समन्दरो में किसको कितना डुबाना है | किसको सावन में कितना जलाना है | किस को किस खूंटी पर उमर पर बांध के लटकाना है | किस को बाँध कर मोड़ कर कोने में रख देना है | कितने , रंग उसके पास | कितने ढंग उसके पास | कैसा संग उसका ? कैसा चलन उसका ? कौन जाने ? कितना जाने ? हाँ सभी कोरे कपड़े की गठरियाँ है | कब किसकी बारी आये वही जाने | हम जिस रंग के है उस रंग का कोई दूजा क्यों नहीं मिलता ? हम जिस ढंग के हैं वैसा कोई और क्यों नहीं दिखता ?  इस ऊपर बैठे रंगरेज से हम सभी इतने नाराज क्यों ? फिर भी उससे मिलने की आस क्यों ? वो दिखता नहीं फिर भी आसपास क्यों ? 
ओ , रंगरेज ..सुनो ना ...तुम खूब हो | तुम्हारे रंग भी बड़े खूब हैं | लेकिन ये बताओ क्या कभी कोई रंग तुम पर भी किसी का कोई रंग चढ़ा है ? तुम कभी किसी के रंग में रंगे हो ? क्या कभी तुम्हारे भीतर किसी का कोई रंग बहता है ? चलो मत बताओ ये तो बताओ की हम तुम्हे तुम्हारे इस मेहनताने की क्या कीमत दे ? क्या रंगाई है तुम्हारी ? 
जो , हम पर अपना रंग चढ़ा दे | जो हमें इक़ नए रूप में बदल दे | उस रंगरेज को कोई क्या दे भला ? देह हो या मन | दोनों तुम्हारी रचना | | इनमे से तुम जो चाहे वो ले सकते हो | या तो मन ? या देह ? या दोनों ? ये फैसला रंगरेज खुद करे | इक़ गीत की पंक्तियाँ हैं : रंगरेजा, रंग मेरा मन, मेरा तन | ये ले रंगाई चाहे मन ? चाहे तन.
 
समीक्षक की राय:शहबाज़ अली खान
रंगों के माध्यम से ममता जी ने आदमी के मुक़द्दर को जिस तरह से परिभाषित किया है वह बहुत ही खुबसूरत है, और मार्मिक भी .. हर रंग का अपना मुक़द्दर है. बल्कि हर चीज़ की अपनी नियति है.. बर्फ की नियति है पानी में जाकर मिल जाना.. आदमी की नियति है कि वो आज़ाद नहीं है... उसके पैरों में एक बेडी है जो अदृश्य है..लेकिन बेहद शक्तिशाली है....ग़ालिब कहते है : "नक्शे फरयादी है किस की शोखिये तहरीर का/ कागज़ी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का" तो इक़बाल कहते है कि "तेरे आज़ाद बन्दों की, न ये दुनिया न वो दुनिया/ यहाँ मरने की पाबन्दी, वहां जीने की पाबन्दी".... इस रंगरेज़ से लोग इसी चीज़ की शिकायत करते है कि  किसी को मोम बनाया, तो किसी को लोहा बना दिया.. मोम तुरंत बहने लगता है.. लोहा पिघलना तो दूर झुकता भी नहीं है.. इस रंगरेज ने किसी को बहार बख्शी तो किसी को बंजर ज़मीन दी.. किसी को दरया दिया  तो किसी को ओस की दो बूंद.... जो मिला उसको सहर्ष स्वीकार कर लेना.. और जीवन पूरी उत्फुल्लता से जीना.यही रंगरेज़ की खुश रंगत है.



(लेखक-परिचय:

जन्म: 31 जनवरी
शिक्षा:मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म , ऍम ए-क्लिनिकल साइकोलोजी |
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट लेखन-प्रकाशन
सम्प्रति: कुछ अखबारों में सम्बद्ध रहने के बाद स्वतंत्र लेखन
आत्म-कथ्य: मैं बहुत ही साधारण और  सामान्य हूँ | दिखावे से दूर | लिखने के कोई नियम और कानून नहीं मेरे पास | ना भारीभरकम शब्द और ना बात | ना कोई सामाजिक संदेश ना राजनीति | जो महसूस करता है मन | वही लिख देती हूँ |
सम्पर्क : कोटरा सुल्तानाबाद, भोपाल

 ब्लॉग : मनवा   )

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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क-ए-आब हुई........... शहरयार को याद करते हुए

मौत तो जीती मगर वो हारा नहीं 



















शहबाज़ अली खान  की क़लम से  



यूँ तो घर में (ननिहाल में) जब से आँख खुली तबसे उर्दू के ही शायरों मीर, ग़ालिब, दर्द, सौदा और न जाने कितने उर्दू शायरों/ अदीबों का हीज़िक्र सुन सुन कर बड़ा हुआ... लेकिन एक शायर का नाम और उसकी शख्सियत का ज़िक्र कुछ अलग ही था.. वो नाम था शहरयार साहबका... क्यूंकि वो एक आधुनिक उर्दू कविता के एक अज़ीम शायर होने के साथ साथ नाना के क्लासमेट भी थें.... और मामू के उस्ताद भी थें..नाना अक्सर कहा करते थे कि जब अलीगढ में फर्स्ट डिविजन लाना टेढ़ी खीर साबित हुआ करता था.. तब  उन दिनों में एम. ए में सिर्फ दोलोगों, नाना और शहरयार साहब ने ही फर्स्ट डिविजन पाया था.... मामू उनकी एक ग़ज़ल  " पहले नहाई ओस में, फिर आंसुओं में रात, यूँ बूँदबूँद उतरी हमारे घरों में रात" को ख़ास तौर पे उर्दू ग़ज़ल में मील का पत्थर कहा करते थे. घर में उन दिनों (नाना के वक्त) के अलीगढ के  उनतमाम अदीब हस्तियों मसलन शहरयार, राही, खलीलुर रहमान आज़मी, मो. हसन वगैरह के नाम सुन सुन कर अलीगढ आने का खवाब मैं भीदेखने लगा था.. हालाँकि बचपन से घर पर भले ही मुझे उर्दू पढाई गयी लेकिन नाना ने मुझे हिंदी और संस्कृत कि पारंपरिक शिक्षा दिलवाई..उनका कहना था कि घर में सबने उर्दू इंग्लिश कि तालीम हासिल कि मैं चाहता हूँ कि तुम हिंदी संस्कृत कि तालीम हासिल करो.. इस तरह सेमुझे एक दूसरी लाइन पर डाला गया लेकिन विरासत में उर्दू का मिला मिज़ाज मेरा पीछा छोड़ने को राज़ी न हुआ.. अलीगढ आने के बाद भीमेरी दिलचस्पी खास तौर से उर्दू शायरी में बनी रही..

ज़ाहिर सी बात है यहाँ आकर मेरे इस मिज़ाज को एक भरा पूरा माहौल मिला.. जब मैं यहाँ आया तो तब जिन नामों को मैं सुनता आया थाउनमें शहरयार साहब ही अकेले थें जो बा हयात थें.. और जिनसे मिला मिलाया जा सकता था..  २००६ तक मैं कभी उनसे मिला नहीं, मुशायरोंऔर कुछ एक सेमिनारों में उनको सुना, देखा. लेकिन २००६ में जब मैं आदरणीय गुरुवर प्रो. के.पी.सिंह के सानिध्य में गया तब मैंने पाया किवो अमूमन वहाँ आते रहते थे....एक दिन उन्होनें सर से मेरे बारे में पूछा में तो सर ने कहा कि अपना तआर्रुफ़ करवाओ.. फिर जब में उन्हेंबताया कि मैं आपके क्लासमेट मो. इरशाद खान का नवासा हूँ तो सच कहता हूँ एकदम खिल उठे और तुरंत मुझसे नाना का फोन नंबर माँगाऔर  अपने मोबाइल से तुरंत मिलाया.. लगभग ३०- ४० साल बाद उन दोनों सहपाठियों की बातचीत हुयी..  बात करने के बाद बेहद ख़ुशी केसाथ उन्होंने सर से  कहा कि के. पी  पूरे क्लास में हमीं दो मर्द थें.. हम दोनों की ही फर्स्ट डिविजन आई थी.. उन दिनों को याद करते हुए बेहदखुश हुए.. वो मेरे लिए एक बड़ा दिन था..लेकिन उससे बड़ा दिन अभी आना था..

इस बातचीत और मुलाक़ात हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन गुरुवर ने कहा कि तुम शहरयार साहब के पास जाकर वर्तमान साहित्यके नए अंक के लिए दो नई ग़ज़ल ले आओ.. मैं गया. उन्होंने बिठाया, बात चीत करते रहे.. फैमिली के बारे में पूछते रहे.. और दो नयी ग़ज़लमेरी डायरी पर अपने हाथों से लिखी. फिर मेरे इसरार पर उन्होंने "पहली नहाई ओस में" वाली पूरी ग़ज़ल लिखी... और उसपर लिखा एक पुरानी ग़ज़ल शाहबाज़ के लिए..(फोटो डायरी के उसी पेज का है).. ये मेरे लिए बेशक एक और बेहद बड़ा दिन था... उस लम्बी चौड़ी बेहदसुंदर सी डायरी में  कुल तीन पेज ही लिखे हैं आजतक.. वही  तीन पेज जो उन्होनें अपने हाथ से लिखे.. बस वही तीन! लेकिन मेरे लिए येकिसी असंख्य पृष्ठों वाली महान ग्रथों से भी बढ़ कर है.. ये मेरी संपत्ति है.. हाँ मेरी संपत्ति है..

उस दिन  उनकी और नाना कि वो आखिरी बात थी क्यूंकि इसके दिन के कुछ महीने बाद ही नाना का इंतकाल होगया..... जब ये बात उन्हेंपता चली तो बेहद उदास हुए.. और कुछ नहीं बोले.. नाना के नहीं रहने के बाद मैं भी ज़िन्दगी की कशमकश में फंस गया और गुरुवर कासानिध्य भी छूट सा गया..उनसे रूबरू  होने वाली  मुलाकातें छूट गयीं..हालाँकि सेमिनारों में मुलाकातें तो होती रहीं. कभी कभी मौक़ा निकलकर सामने पहुँच जाता तो हाल चाल पूछते....

मैं उनकी शायरी का दीवाना हूँ.. बहुत लोग दीवाने हैं.. लेकिन उनकी शायरी पर मैं कुछ कहूं मैं इस लायक नहीं हूँ.. दीवाना  कब किसी लायकहुआ है... मैं बस ये कहना चाहता हूँ.. मुझे एक अज़ीम शायर  के चले जाने का बेहद अफ़सोस है लेकिन उससे ज़यादा मुझे उस ज़माने के चलेजाने का अफ़सोस है जिस को सुन सुन कर मैं बड़ा हुआ था.. ..एक पूरी परम्परा के चले जाने का अफ़सोस है..  उनके  न रहने कि खबर सुनकर बस जुबां पे यही आया कि

कहता है कोई दिल गया, दिलबर चला गया
पुकारता है साहिल समंदर चला गया...(कभी किसी ये शेर सुना था... जाने किसका है)

* गुरुवर प्रो. के.पी.सिंह सर की मृत्यु पर लिखी नज़्म की एक पंक्ति...











शहबाज़ की डाइरी में महफूज़ शहरयार की तहरीर में उनकी मशहूर ग़ज़ल


(लेखक-परिचय :
जन्म:१८ मई १९८४, बहराइच में
शिक्षा: अलीगढ मुस्लिम विवि से राही मासूम  रज़ा पर पीएचडी कर रहे हैं

सृजन: छिटपुट पत्र पत्रिकाओं में लेख कवितायें प्रकाशित ,फेसबुक के चहीते लेखक

संपर्क:alikhan.shahbaz@gmail.com)






दैनिक भास्कर के जमशेदपुर और धनबाद संस्करण में १५ .२.२०१२ को प्रकाशित


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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)