बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 25 मई 2016

आईआईटीयन चंद्रशेखर बने स्वामी पशुपतिनाथ


















 सैयद शहरोज़ क़मर की क़मर से

सनातन परंपरा की अलौकिकता के महाकुंभ सिंहस्थ उज्जैन में देश-दुनिया की विभिन्न रंगत अकार ले रही है। श्रद्धालुओं से घिरे साधु-संतों में कई ऐसे हैं, जो कभी बिजनेस मेन रहे, तो कोई बड़े सरकारी अफसर। सिद्धवट मंगलनाथ के पास बेतरतीब बढ़ी हुई दाढ़ी में भगवावस्त्र धारे एक युवा से भेंट होती है, जो स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं के बीच अप दीपो भव: का प्रचार-प्रसार कर रहे थे। बीच-बीच में जब उन्होंने धाराप्रवाह अंग्रेजी में समाज और राजनीति पर टीका-टिप्पणी की, तो उनकी विद्वता का पता चला। पता यह भी चला कि आईआईटी कानपुर से 2003 में पासआउट यह चंद्रशेखर राजपुरोहित हैं। जिनका नया परिचय है स्वामी पशुपतिनाथ, पता देश-दुनिया का कोई भी कोना, जहां धर्म की भेड़चाल से तंग लोग अध्यात्मिक शांति तलाश रहे हों। बहुत ही मिन्नत के बाद यह युवा संन्यासी धीमे-धीमे लहजे में अपने बारे में बताना शुरू करता है। संकोच के इस दायरे में भी कई ऐसी बातें ज्ञात होती हैं, जो भौतिकवादी अंधकार में धवल मार्ग प्रशस्त करती हैं। वह युवा पीढ़ी से निराश नहीं। कहते हैं, अध्यात्मिक प्रगति समय के साथ परवान चढ़ती है। ईश्वरज्योति से आलोकित इस युवा संन्यासी का शेष समय नाभिकीय संरचना पर केंद्रित पुस्तक लिखने में गुजरता है। यूं उन्हें सियासत की वर्तमान उग्रता से बहुत चिढ़ है। खासकर धर्म के नाम पर विश्व में हो रही हिंसक घटनाएं उन्हें विचलित करती हैं। भारतीय संदर्भ में उन्होंने संघ पर आरोप लगाया है कि वो हिंदुओं की कई समाजिक और समाजिक संस्थाओं को खत्म करने पर तुला है। पर उन्हें विश्वास है कि उसके कट्‌टरवादी हिंदुत्व का जवाब आम भारतीय ही जल्द देंगे।

चित्तौड़गढ़ के राजपुरोहित रहे पूवर्ज
चंद्रशेखर उर्फ स्वामी पशुपतिनाथ के पूवर्ज चित्तौड़गढ़ राजघराने के राजपुरोहित रहे हैं। लेकिन चंद्रशेखर ने आईआईटी कानपुर से बीटेक इंजीनियरिंग की। शुरुआती पढ़ाई गुजरात के बड़ौदा और राजस्थान के पाली से की। जौधपुर से इंटर करने के बाद इनका चयन आईआईटी कानपुर के लिए हो गया। कानपुर से इंजीनियरिंग करने के बाद चंद्रशेखर ने इंडस्ट्रीयल पाटर्स के इंपोर्ट-एक्सपोर्ट का बिजनेस शुरू किया।

2006 में बनाई राजनीतिक पार्टी
मानस में उमड़ते-घूमड़ते समाजिक परिवर्तन के ज्वार के कारण चंद्रशेखर का मन व्यवसाय से उचाट हो गया। इस बीच उनकी मुलाकात मुंबई और कानपुर के पांच आईआईटीयंस अजित शुक्ला, अमित बिसेन, संघगोपालन वासुदेव, धीरज कुंभाटा और तन्मय राजपुरोहित से हुई। सभी ने मिलकर 2006 में लोक परित्राण नामक राजनीतिक दल का गठन किया। तमिलनाडु में विस चुनाव भी लड़े, पर हार गए।
अंत में अध्यात्म ही बना आश्रय
चंद्रशेखर सदैव शांति की खोज में लगे रहे। अचानक देश-भ्रमण पर निकल गए। कहते हैं कि उन्हें कोई सच्चा गुरु नहीं मिला। उन्होंने पशुपतिनाथ को ही अपना गुरु स्वीकार कर तपस्वी का भेष धारण कर लिया। उनका कहना है कि उन्होंने भैरवनाथ का साक्षात दर्शन किया है। वह सभी कुंभों के अलावा देश के नगर-कस्बों का भ्रमण करते रहते हैं। उद्देश्य एक ही है, युवाओं का अध्यात्म से परिचय कराना।


भास्कर के लिए लिखा गया







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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

तिल-तिल आस्था, रोम-रोम राममय


 रांची में हर्ष-आस्था का रंग 


फोटो : माणिक बोस




सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

वही "नवमी तिथि मधुमास पुनीता' यानी चैत्र महीना की नौवीं तारीख। मौसम भी मध्यान्ह में वही "शीतल मंद सुरभि बह बाऊ।' हर्ष-उल्लास की बानगी भी वही, बस तब अयोध्या नगरी थी, शुक्रवार को हमारी रांची। जिसके हर घर-आंगन, गली-चौबारे और सड़कें-चौक रामलला के जन्मोत्सव के आनंद में आकंठ डूबे थे। आस्था और उमंग का अद्भुत ज्वार किसी भाटे की तरह रांचीवासियों को सराबोर किए रहा। श्रद्धा जब गांव-शहर तक प्रकाश की तरह बिखरी, तो हर चेहरा दीप्त और झिलमिल हुआ। वहीं आंखों में पनियल मिठास लिए माताओं ने रामलला के भेषधारे अपने बच्चों का कौशल्या समान बलैया लिया। नन्हे कदम चहकने ही नहीं, फुदकने लगे। उस पिता की छाती सबसे बड़ी पताका से भी चौड़ी हुई, जिसके कंधे पर बालक हनुमान मंद-मंद मुस्कुराए जा रहे थे।
चलिए बात शहर की ढाई सौ वर्ष प्राचीन तपोवन मंदिर से करते हैं। क्योंकि बिना इसके दर्शन किए रामनवी की पूजा-अर्चना पूरी नहीं होती। जब पहली बार 1929 में कृष्णा साहू की अगुवाई में राजधानी में शोभायात्रा निकली थी, तो उसके अखाड़े भी यहीं पहुंचे थे। पौ फटने के बाद शंखनाद और मंत्रोच्चार के बीच सबसे पहली पूजा यहीं हुई। इसके बाद सजे-सजाए शहर के दूसरे मंदिरों में भी श्रद्धालुओं ने माथा टेका। इसके बाद "भए प्रकट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी' के मंगल गीतों के मध्य महावीरी अखाड़े शहर के कोन-कोने से निकलने लगे। वहीं नेत्रों के माध्यम से हृदय में घर करती जातीं ढेरों झांकियों ने अयोध्याकाल की उन स्मृतियों को जीवंत किया, जिनका होना उर्दू कवि इकबाल के अनुसार "हिंदुस्तां को नाज' (गर्व) से भर देता है। इनमें भोले बाबा, श्रीराम, लक्ष्मण और मां सीता बने नन्हे-मुन्नों का ठुमकना मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री तक को आशीष देने पर विवश कर गया।

गफ्फार के परिवार कीे बनाई अधिकतर पताकाएं फहरातीं दिखीं, तो अलबर्ट एक्का चौक की बेला इंद्रधनुषी हो उठी। कहीं गेरुआ, कहीं लाल, कहीं पीली, कहीं सतरंजी, कहीं बैग्नी, कहीं गुलाबी, कहीं हरी, कहीं कत्थई पताकाएं। मोरहाबादी के घोल के छोटे-छोटे ध्वज सरसों के फूलाें जैसे जगमगाए, तो मंचों पर खड़े बड़े-बड़े लोग भी उसका स्पर्श करना नहीं चूके। पारंपरिक शस्त्राें-अस्त्रों से सुसज्जित टोलियां के करतबों की प्रतीक्षा में छतों, मंचों, फुटपाथों पर श्रद्धालु थे ही कि उनकी आंखें चौंधिया गईं। अरे ये क्या? 35 तल के मंदिर बुर्ज पर घ्वज भगवा। अद्भुत। रांची महावीर मंडल की पताका कुछ ऐसी थी ही। इसके सम्मोहन को मनोकामना समिति, चडरी और श्रीरामसेना के गगनचुंबी ध्वज ने और बढ़ाया। जबकि गगन भी भक्ति में लीन रामभक्तों को सूर्य की उग्रता से बादलों से बचाता रहा।

भक्तों का समूह पंक्तिबद्ध होकर जब भजन करने लगे, "श्रीरामजानकी बैठे हैं मेरे सीने में' तभी आकाश से पुष्पवर्षा (हेलिकॉप्टर से) होने लगी। महिलाएं, बच्चे इसके बाद गुलाल उड़ाते ग्लाइडर देखने उमड़े, तो महावीर अखाड़े के रामभक्त कार्यकर्ताओं ने पुलिस कर्मियों के संग सैलाब को अनुशासित किया। नियंत्रित किया, तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परहित चिंतन परंपरा साकार हुई। मेन रोड से लेकर राजेंद्र चौक तक स्थान-स्थान पर लगे स्वागत शिविरों में तैनात युवाओं ने भगवनश्रीराम के सदाचार को चरीतार्थ किया। संध्या हौले-हौले रात्रि में परवर्तित क्या हुई, रामनवी दीपवली में बदल गई। रंग-बिरंगियों रौशनियों में मटकते- ठुमकते, गाते-गुनगुनाते रामभक्तों की रेल कहीं छुक-छुक, कहीं राजधानी बन तपोवन पहुंची। लेकिन जब इन्होंने विराम लिया, तो ड्रोन कैमरे भी लाखों की भीड़ को कैद करने में नाकाम रहे। मध्यरात्रि तक ढोल-बैंजों की संगीत लहरियां युवा करतबबाजों को झुमाती रहीं। देर रात्रि तक ये क्रम चला। फिर शनै: शनै: अखाड़े अपने-अपने गंतव्य को प्रस्थान कर गए।

दैनिक भास्कर के रांची अंक में 16 अप्रैल को प्रकाशित



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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

कौन लौटाएगा पल-पल घुटती सांसों के 56 दिन


कथित रूप से विस्फोटक के साथ पकड़े गए

इंतजार अली को जमानत मिलने के बाद 



फोटो- रमीज़
 



सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से


यातना भरी 55 लंबी रातों के बाद लौटा उम्मीद का सूरज गुरुवार को हिंदपीढ़ी, निजाम नगर की अमन गली में उतरा, तो उससे सराबोर होने को महिलाएं, बूढ़े, बच्चे और जवान बेताब रहे। इसकी चमक से इंतजार अली के आंगन की उनिंदा आंखें सबसे अधिक आश्वस्त दिखीं। उन्हें अदालत पर यकीन पुख्ता था कि उनके घर का इकलौता कमाऊ सदस्य जरूर आएगा। लेकिन 20 अगस्त की शाम से शुरू पुलिसिया जुल्म की किस्त-दर-किस्त उन्हें हर रात सोते से जगाती रही। पलकें झुकाए जब इंतजार की पत्नी रिहाना खातून ने दरवाजा खोला, तो उन्होंने सबसे पहले मीडिया पर अपना बुखार उतारा। उसके बाद पुलिस बर्बरता के किस्से खामोशी से सुनाती रहीं। बोलीं, उस दिन यानी 20 अगस्त को जब चार बजे से उनके पति ने मोबाइल नहीं उठाया, तो वे परेशान हो गईं। शाम में वर्दी व सादे लिबास में पुलिस आ धमकी। बिना कुछ बताए घर का सामान तितर-बितर करने लगी। पुलिस के साथ आए सिविल ड्रेस के एक व्यक्ति अचानक डांटने-डपटने लगे। जब 12 साल की बड़ी बेटी ने कहा, अंकल अम्मी को क्यों डांट रहे हैं, तो वह व्यक्ति बोला, तुम जिंदगी भर पछताओगी, टीवी पर रोज पापा के बारे में सुनना कि वह आतंकवादी है।

इतना कहकर रिहाना बिलखने लगीं। पास बैठीं इंतजार की बहन शकीला बोल पड़ीं, बताईये मासूम से बच्चों पर क्या असर पड़ा होगा। पुलिस जाते-जाते कह गई, इंतजार बम के साथ पकड़ा गया है। रिहाना के गालों पर लुढ़क आया आंसू आंखों में लौट आक्रोश बना। बोलीं, अब अदालत ने बेल दे दी, इंशा अल्लाह केस भी खत्म हो जाएगा। लेकिन कौन लौटाएगा पल-पल घुटती सांसों के वे 56 दिन जिसने छोटकी की खोई मुस्कान छीन ली। किसने आखिर साजिश रच उसके पापा को जेल की सलाखों में कैद कर दिया। जिसे नींद ही पापा के पेट पर आती थी। पापा के न रहने पर हर दो दिन बाद उसे बुखार घेर लेती है।

बहुत देर तक कमरे में चुप्पी पसरी रही। इस बीच इंतजार की वही सबसे लाडली पांच वर्षीया छोटी बेटी आकर रिहाना से लिपट गई। अम्मी पापा कब आएंगे। उसके सवाल पर इंतजार के मित्र नदीम इकबाल ने उसे पास बुलाकर गाल थपथपाया। बोले, बेटा बस आ ही रहे हैं। उनके इतना कहते ही छोटकी फिर अम्मी से चिपक गई, हम बोले थे न मोहल्लम (मोहर्रम)में दलूल (जरूर)आएंगे पापा। अब मेली (मेरी)तबियत थीक (ठीक)हो जाएगी। उसकी तुतलाहट भरी मासूमियत ने माहौल जरा सामान्य किया। फिर रिहाना सिलसिलेवार कई सवाल दागती हैं। जैसे, एनआईए ने क्लिन चिट दे दी। कोई साक्ष्य नहीं मिला। वहीं कुछ अखबार वाले लगातार मेरे पति को आतंकवादी बताते रहे। पुलिस ने अदालती कार्रवाई में इतनी देरी क्यों की। बच्चे दस दिनों तक स्कूल नहीं गए। बेटी ने सहेलियों से मिलना-जुलना बंद कर दिया। कहती हैं कि बेटा वकील, तो बेटी अब चाहती है कि जज बने, ताकि कोई भी बेकसूर इसतरह तिल-तिल ताजा सांस लेने को न तरसे। बेटा अक्सर पूछता है आखिर पापा को किस बात के लिए पुलिस ने पकड़ा।

नोट: इंतजार अली को 20 अगस्त 2015 को पुलिस ने पकड़ा। बताया कि उनके पास विस्फोटक भरा थैला था। बाद में एनआई और सीआईडी ने दी क्लिन चीट। लेकिन पुलिस अहं के चक्कर में उसपर आरोप दर आरोप लगाती रही। आखिर अदालत ने 15 अक्टूबर को उसे जमानत दे दी।


भास्कर, रांची के 16 अक्टूबर 2015 के अंक में प्रकाशित




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सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

हौसला फिर से कश्मीर को बना रहा जन्नत

 फोटो रमीज़


श्रीनगर से सैयद शहरोज़ क़मर

लाल चौक धूप में भले चटक रहा हो, लेकिन फुटपाथ पर दुकानों से सामान निकालकर बेचने वालों और खरीदारों के चेहरे से रौनक गायब है. जबकि नाम के अनुरूप ही श्रीनगर के इस दिल की लालिमा निशात बाग़ की तरह ही खुश बाग़ हुआ करती थी. जबकि डेढ़ माह पहले समूचा शहर ही डल झील हो चुका था। डल पर बसी चालीस हजार आबादी अपने चौदह हजार शिकारे के साथ नहर बनी सड़कों पर आ चुकी थी। इनके साथ ही मुन्ना भाई, वसीम, करतार और उमर जैसे युवाओं की टोलियां। इन सबने हौसले की कश्ती से लाखों लोगों की जानें बचाईं। वहीं लतीफ खान जैसों ने अपने होटल में लंगर खोल दिया।
यह 7 सितम्बर की बात है. फ़िज़ा में शोर व खौफ था. बीस से चौबीस फ़ीट पानी में डूबे घरों से निकलने की हड़बड़ाहट का प्रवाह झेलम से भी तेज़ था. मजहूर नगर के गगन दीप कोहली सुबह जल्दी उठ गए थे। उन्हें गुरुद्वारा में अरदास के बाद लाल चौक अपनी जूतों की दूकान खोलनी थी. लेकिन खिड़की से झाँका तो उनके पैरों तले ज़मीन न थी. बस था पानी-पानी। बाहर शिकारे लिए मोहल्ले के युवा। गगन ने माँ, पत्नी और दो बच्चे को लिया और उस पर बैठ गये. लेकिन कुछ दूर पर ही नाव पलट गयी. सभी सवार को बचा तो लिया गया. पर गगन को ही धरती ने समो लिया। लाल चौक स्थित कोहली एंड संस धन तेरस पर खुली है। इसे संभाल रही हैं, अरविंदर कौर और जिंदर। इनकी आंखों में रह -रह कर सैलाब उमड़ पड़ता है।  गगन दीप कोहली का शोक इन महिलाओं के चेहरों पर अयां है। मां जिंदर तो कभी-कभार पहले भी दुकान आ जाया करती रही हैं। पर गगन की पत्नी अरविंदर पहली बार साहस बटोर रही हैं। दुकान के सारे जूते-चप्पल पानी में होम हुए। गगन के भाई दिल्ली से नया माल लेकर आए। वहीं हिम्मत ने शोक को हवा किया। 















इधर, जम्मू एंड कश्मीर बैंक की कार्गो शाखा दफ्तर पहुंची काशिफा नज़ीर की उंगलियां की-पेड पर कांपती हैं, लेकिन यह कंपन 7 सितंबर से काफी कम है, लेकिन उनकी आँखों में उतरी झेलम डेढ़ माह पहले ठहरी। उसका असर उनके गालों पर ज़र्द हुआ जाता है. उनकी ललाट पर खिल-खिलाती उनकी बच्चियां। जल-प्रलय की चपेट में आया रविवार का दिन था. काशिफा आसिफ सरवाल ने बच्चों के साथ चश्म शाही जाने का इरादा किया था. लेकिन वे कुछ समझ और संभल पाते कि इससे पहले अचानक ही राज बाग़ जैसे उनके इलाक़े में चारों तरफ तबाही फैल चुकी थी.

उनके घर के पास भी लोग शिकारे लेकर पहुंचे। आसिफ ने उस पर काशिफा के साथ तीन छोटी बच्चियों और माँ हाजरा बेगम को बैठा दिया। पर कुछ देर बाद यह नाव भी पानी का वेग न संभाल सकी। दादी की गोद में सात माह की राहत, तो काशिफा ने ढाई साल की सर्वत का हाथ थामा। बड़ी बिटिया तरावत खुद पानी में. इधर, आसिफ जब कुछ देर बाद दूसरी नाव से सुरक्षित जगह पहुंचे तो पत्नी, माँ और बच्चियों को न पाकर बेचैन हो गए. घंटे भर बाद भी जब उनका पता न चला तो उनकी बेज़ारी बढ़ गयी. काशिफ़ा जब तरावत के साथ पहुंची तो लिपट कर सुबकने लगी. दूध मुँही बच्ची समेत सर्वत और माँ के डूबने की खबर ने आसिफ को चिनार के पत्तों की तरह बिखेर दिया.    


लेकिन कहते हैं कि तमसो मा ज्योतिर्गमय। आसिफ हो काशिफ़ा, अरविंदर हों राजिंदर या राजा खान के परिजन। और ऐसे ढेरों लोग जिनके घरों के चिराग हमेश के लिए बुझ गए। लेकिन अब इन्होने बिखरे तिनकों को इकठ्ठा कर ज़िन्दगी को नयी रौशनी दी है। बक़ौल कश्मीरी कवि लल दह आमे पन रस नाए छस लमान कच्चे धागे की मदद से काशिफा, आरिफा, मदीहा और गुरप्रीत अपनी किश्ती को खींच रही हैं। मदीहा एनआईटी से मेकेनिकल इंजीनियरिंग कर रही हैं। उनका घर पूरी तरह तबाह हो गया। मामू के घर से फिलहाल इंस्टीच्यूट आना-जाना करती हैं। शीतरा शाही का गुरप्रीत का घर भी कहां रहा। दीवारों के साथ उस ऑटो को भी तो गिरी छत ने लील लिया, जिसे उनके पति कँवल नैन सिंह चलते थे। भास्कर टीम जब पहुंची तो पूरा परिवार घरों के बिखरे तिनकों को इकट्ठा कर रहा था। उनकी बेटी सिमरन का आत्मविश्वास बोलता है, रब्बा ने दर्द दिया वही दवा देगा। अब ज़िन्दगी है. यही हौसला मुन्ना भाई में नज़र आया। मलवे में दबी दुकानों से किसी तरह सामान निकाल कर धोने और चमकाने में लगे हैं। उनका जज़्बे का तेज शहीद गंज पुलिया पर दौड़ती ज़िन्दगी में भी अकार पाता है। झेलम की नहर पर बनी इस पुलिया ने भी तो साथ छोड़ दिया था। पर लोगों ने आपसी मदद से उसे बना डाला, न वक़्त रुकता है , न ही हवा-बवंडर लेकिन इंसानी हिम्मत चिर युवा होती है। इसका एहसास जवाहर श्रीनगर से अनंत नाग तक दिखा। फ़िदा हुसैन के तीन भाई हैं, सभी ने साथ-साथ एक जगह आशियाने बनाये। पर अब बचा है तो सिर्फ ईंट और गारे का ढेर। फ़िदा जब बिना यूनिफार्म के अपनी बेटियों को स्कूल छोड़ने के लिए निकले तो उनकी माँ की आँखें से चश्मा (झरना) तारी हो गया, जिसे उनका चश्मा (ऐनक ) न छुपा सका। सारे कपड़ों और सामानों के साथ यूनिफार्म और किताबें भी तो नष्ट हो गयीं। लेकिन उड़ान निसंदेह हौसले में होती है, यही हौसला कश्मीर को फिर से जन्नत बना रहा है।  


फोटो रमीज़     



भास्कर के कई संस्करणों में 26 अक्टूबर 2014 के अंक में प्रकाशित

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सोमवार, 23 जून 2014

तीन तलाक़ कितना हलाल








शहरोज़ की क़लम से 

 तलाक़ दे तो रहे हो, ग़ुरूर-व-क़हर के साथ
मेरा शबाब भी लौटा दो, मेरे मेहर के साथ.
तलाक़ को लेकर भोपाल रियासत के नवाब ख़ानदान की एक अनाम विदुषी शायरा का यह शेर बहुत मक़बूल है. हालाँकि कुछ लोग मीना कुमारी को रचयिता मानते हैं. इस शेर में शादीशुदा महिला अपने पति से कहती है कि पुरुषत्व के घमंड में क्रूर-आक्रामकता के साथ उसने उसे तलाक़ दे तो दी है, तो उसके मेहर के साथ उसका यौवन भी लौटा दे. क्या ऐसा संभव है. शायद यही वजह है कि तलाक़ को बहुत बुरा बताया गया है. ' अल्लाह के लिए उन सभी चीज़ों में से, जिनकी आज्ञा दी गयी है, तलाक़ सबसे ज़्यादा नापसंद-दीदा है' (क़ुरआन सूर: 65 ). लेकिन क़ुरआन और इस्लाम की मूल भावना समझे बगैर पुरुष दाल में नमक कम क्यों? जैसी फ़िज़ूल बातों को लेकर भी अपनी औरतों के सर पर तलवार लटकाए फिरते हैं. तलाक़ के मामले में स्त्रियों के साथ विशेष कर भारत में सदियों से असमान बर्ताव किया जाता रहा है.  ताज्जुब की बात है कि मुल्ला-मौलवियों ने, न तो इसकी वाजिब और मान्य व्याख्या की और न ही इसके उचित रूप को प्रचलित किया। इसके उलट जब प्रगतिशील तबक़ा समझ भरी बातें तर्कों के साथ लेकर उपस्थित  होता है, तो उसे क़ुरआन और हदीस में दख़ल मानकर उसे ख़ारिज कर दिया जाता है. जबकि एक बैठक में तीन तलाक़ और हलाला की इजाज़त न क़ुरआन देता है, न ही सही हदीस।

मुसलमानों को यह ध्यान में रखना होगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ ही शरीयत नहीं है. और इस लॉ में पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम मुल्कों में संशोधन हो चुका है। वहीं शरीयत को लेकर भी हनफ़ी, मालिकी, शाफ़ई, हंबली विचार धारा में एक मत नहीं है. सुन्नी और शिया में भी इसकी व्याख्याऍं भी अलग-अलग हैं. अल्लामा इक़बाल ने अपनी मशहूर किताब ‘दि रिकन्सट्रक्शन ऑफ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम’ में साफ़-साफ़ लिखा है कि शरीया की इन व्याख्याओं को अटल नहीं माना जा सकता है| क्या मित्रों ! समय नहीं है कि मुस्लिम उलमा इज्तिहाद से काम लेकर पर्सनल लॉ में कई ज़रूरी संशोधन करें ताकि एक बैठक में तीन तलाक़ की रिवायत ख़त्म हो. वही मेहर की ऐसी रक़म तय हो जो पति की वार्षिक आय हो.

क़रीब दो दशक पहले एक बैठक में तीन तलाक़ जैसी स्त्री -विरोधी कुप्रथा की मुख़ालिफ़त अहले हदीस के तीन विद्वान मुफ़्तियों शेख़ उबैदुर रहमान, शेख़ आताउररहमान मदनी और शेख़ जमील अहमद कर चुके हैं. हंबली और  शिया के यहां भी इस पर प्रतिबंध है. इस बात पर आम सहमति है कि यह बिदाहः (पाप) है. पैंगबर  ने तलाक के इस तरीके को बिलकुल गलत क़रार दिया था. यह तरीका, इस्लाम से पहले प्रचलित था. इस्लाम के आरंभिक दौर में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को जब एक बार में तीन तलाक़ कह दी, तो पैग़म्बर मोहम्मद गुस्से से सुर्ख़ हो गए. बोले मेरा वश चलता तो मैं उसका क़त्ल कर देता। बावजूद इसके प्यारे नबी का दामन नहीं छोड़ेंगे का नारा लगाने वाले इस परंपरा को जारी रखे हुए हैं.
इस्लाम में शादी दो वयस्क स्त्री-पुरुष के बीच साथ जीवन गुज़ारने के लिए हुआ समझौता है, जिसे निकाह कहते हैं. इसे तोड़ने की प्रक्रिया तलाक़ कही जाती है. इस्लाम ने मर्द को तलाक़ का अधिकार अवश्य दिया है, मगर इस शर्त के साथ कि कम से कम तीन महीने की मुहलत ज़रूरी है, लेकिन दूसरी तरफ़ इसे अप्रिय भी कहा है. यदि किसी कारण वश आपसी कलह से दांपत्य जीवन नरक बन जाए और साथ रहना असंभव लगे, तो फिर ऐसे दांपत्य जीवन से बेहतर है कि पति-पत्नी सम्बन्ध -विच्छेद कर नए सिरे से अपना-अपना नया दांपत्य जीवन शुरू करें।
मुस्लिम महिला भी तलाक़ ले सकती है, इसे 'खुलाअ' कहा जाता है. वह कुछ विशेष आधारों पर अपने पति से संबंध -विच्छेद कर सकती है. (2:229). ख्यात चिंतक डॉ. असगर अली इंजीनियर लिखते हैं कि 'पवित्र पैगम्बर ने भी अपनी पत्नी जमीला का 'खुलाअ' स्वीकार किया था, क्योंकि वे उनके साथ रहना नहीं चाहती थीं. हालांकि पैगम्बर साहब, जमीला से बहुत स्नेह करते थे और उन्हें पूरा सम्मान देते थे. उन्होंने जमीला से केवल इतना कहा कि वे उस बाग को उन्हें लौटा दें जो उन्होंने जमीला को मेहर के तौर पर दिया था. इस हदीस से स्पष्ट है कि पत्नियों का खुलूअ का अधिकार संपूर्ण है और इसमें कोई शर्त नहीं लगाई जा सकती. खुलूअ के लिए पति की सहमति की आवश्यकता नहीं है.'
हिन्दुस्तान में शाफ़ई, हंबली, मालिकी और अहले हदीस विचार धारा के मुसलमानों की आबादी नगण्य है. भारतीय उपमहाद्वीप में हनफ़ी मुसलमानों की आबादी ज़्यादा। इनमें भी देवबंदी (तब्लीग़ी जमात), बरेलवी (कछौछवी, दावत-ए-इस्लामी ) और जमात इस्लामी जैसी गुटबंदियां हैं. शियाओं  के यहां भी आग़ा खानी और बोहरा स्कूल है. भारत में क़रीब नब्बे फ़ीसदी मुसलमान हनफ़ी हैं, जिन्हें सुन्नी कहा जाता है.  इनपर आधिपत्य के लिए  सर-फूड़व्वल जारी है. 

भारतीय सुन्नी मुसलमान एक बैठक में तीन तलाक़ को भले सही माने, जॉर्डन के सुन्नी मुसलमान इसे ख़ारिज कर चुके हैं. भारत में भी शरीयत पर सुन्नी विद्वानों के 1973 में हुए एक सेमिनार में तीन तलाक़ की आलोचना हो चुकी है. तब अहमदाबाद में मौलाना मुफ़्ती अतीक़ुर्रहमान उस्मानी की अध्यक्षता में यह सेमिनार हुआ था. इसमें शिरकत कर रहे तमाम मुफ्तियों और मौलानाओं ने अपने-अपने पेपर में क़ुरआन और हदीस के हवाले से एक साथ तीन तलाक़ को अवैध क़रार दिया था. बाद में सेमिनार के निष्कर्षों पर आधारित एक पुस्तक का भी प्रकाशन हुआ.             

18 वीं सदी के मशहूर सूफ़ी-संत शाह वली उल्लाह भी शरीयत के उस मार्ग के हिमायती थे जिसमें प्रचलित चारों विचार धाराओं हनफ़ी, मालिकी, शाफ़ई और हंबली के मतों को समान मान्यता मिले और एक व्यवहारिक पद्धति का निर्माण हो. ज़रुरत आज इसी की है.
आख़िर ऐसा क्यों हैं कि जिस बात की अनुमति क़ुरआन और हदीस नहीं देता, भारत में ही एक साथ तीन तलाक़ जैसी कुप्रथा लागू है.  दरअसल इसकी सुरक्षा यहां का मुस्लिम पर्सनल लॉ करता है. लेकिन जिस लॉ को शरीयत मान मुस्लिम समुदाय सबसे पवित्र दस्तावेज़ समझ रहा है, क्या ऐसी मान्यता हर काल और परिस्थिति में रही है ? 
पर्सनल लॉ को परिभाषित करने का पहला अवसर 1937 में तब आया, जब ब्रिटिश सरकार ने शरीयत एक्ट बनाने का निश्चय किया। ज़रुरत इसलिए पड़ी कि अदालतों में मुसलमानों के तलाक़, विवाह, संपत्ति और विरासत आदि से सम्बंधित मामलों की क़तार गयी. जब पर्सनल लॉ के अलग स्वरूप की चर्चा शुरू हुई तो समकालीन विद्वानों ने इसका मुखर विरोध भी आरम्भ कर दिया। इनमें मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिना और जमात इस्लामी के संस्थापक मौलाना सैयद अबुलउला मौदूदी अग्रणी थे. कथित मुस्लिम हितचिंतक होने  बावजूद जिना के विरोध का यही मतलब है कि उनकी दृष्टि में मुस्लिम समाज के लिए यह लाभप्रद नहीं था. मौलाना मौदूदी की राय थी कि मुसलमानों के दो तिहाई परिवारों में इस शरीयत एक्ट की वजह से बर्बादी आई है. यदि आप मुसलमानों का ज़रा भी भला चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें पर्सनल लॉ से आज़ाद कर दीजिये।   
इन बहसों का विदेशी हुक्मरानों पर कोई असर न हुआ.  17 मार्च 1939 को मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम बना लिया गया. लेकिन यह आज़ादी के बाद ही लागू हो सका. इस अधिनियम की धारा दो मुस्लिम महिलाओं को नौ विभिन्न आधारों तलाक़ लेने का अधिकार देती है. 1986 में मुस्लिम महिला विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण अधिनियम बना.


दरअसल भारतीय मुसलमानों की बड़ी समस्या अशिक्षा है. जिसकी वजह से कठ मुल्लाओं के सम्मुख वो नतमस्तक होता आया है. जबकि मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने क़ुरआन का अनुवाद करते हुए स्पष्ट लिखा कि इस्लाम ने तेरह सौ साल पहले क्रांतिकारी क़दम उठाते हुए महिला-पुरुष के बीच अधिकारों का समान वितरण किया था. लेकिन दुःख की बात है कि रूढ़िवादी सामंती समाज के असर में मुस्लिम समाज धर्म की मूल  आत्मा को न समझ सका. इस्लामी क़ानून विशेषज्ञ अय्यूब सैयद कहते हैं कि मुस्लिम औरतों के पिछड़ेपन का कारण इस्लामी क़ानून नहीं, बल्कि कट्टर पंथियों द्वारा उसकी गलत व्याख्या और समय के साथ अपने को न बदलने की ज़िद है. 

मुस्लिम पर्सनल लॉ का विवाद दरअसल उदार और कट्टरवादी व्यवस्था का टकराव है. एक समूह महिलाओं लिए मानववादी नज़रिये का समर्थक है,  शरीयत को आधुनिक समाज के निकट लाने का यत्न करता है, जबकि दूसरा पक्ष समय की मांग के अनुरूप अपने आपको बदलने के लिए तैयार है और समाज को पुरातन वादी मान्यताओं-परंपराओं से जकड़े रखना चाहता है. यही सबब है कि इमाम मुफ़्ती मुकर्रम तीन तलाक़ को कोई मसला नहीं मानते। वहीँ बिहार और उड़ीसा के शरई मामले के निष्पादन के लिए बनी संस्था इमारत -ए -शरिया पिछले कई वर्षों से तीन तलाक़ के अधिकांश मामले को नज़र अंदाज़ करती आई है.

एक बैठक में तीन तलाक़ और हलाला जैसी कुरीतियों से  ढेरों इस्लामी विद्वान सहमत नहीं हैं. वहीं पढ़े-लिखे ढेरों मित्रों का भी सुझाव इस मामले में संशोधन का है. कुछ इज्मा, तो कुछ इज्तिहाद की वकालत करते हैं.  इज्तिहाद यानी कुऱआन और हदीस का आदेश साफ़ पता न चले तो अपनी सोच-सामर्थ्य से सही रास्ता निकालना। डॉ. रफ़ीक़ ज़करिया लिखते हैं कि इज्तिहाद स्वतन्त्र चिंतन का ऐसा मान्य माध्यम है, जिसके ज़रिये ज़रूरी सुधारों को लागू किया जा सकता है.और अतीत में अनेक गणमान्य न्यायविदों और धर्म वेत्ताओं ने मुख्य रूप से इसका उपयोग किया भी है. कुछ लोग इसे इज्मा कहते हैं. पर अब इज्मा की रिवायत भी क्षीण हो गई प्रतीत होती है. वरना एक बैठक में तीन तलाक़, हलाला और शौहर के लापता हो जाने पर ज़िन्दगी भर इंतज़ार करना जैसे स्त्री-विरोधी चलन पर ज़रूर लगाम लगती, पर इसे पर्सनल लॉ की सुरक्षा मिली हुई है. हमें ज़ेहन से यह निकालना होगा कि पर्सनल लॉ पूरी तरह क़ुरआन पर आधारित है. जबकि हक़ीक़त यह है कि यह 'मोहम्मडन लॉ' (अंग्रेज़ों ने यही लिखा और कहा) लार्ड मैकाले के निर्देश पर इस्लामी विद्वानों की एक टोली की व्याख्याओं पर बनाया गया था.
डॉ. असगर अली इंजीनियर ने अपने एक लेख में लिखा था कि पूरी इस्लामिक दुनिया में मुस्लिम महिलाएं विभिन्न समस्याओं का सामना कर रही हैं. भारत में उलेमा की ज़िद के चलते, मुस्लिम महिलाएं वे अधिकार भी नहीं पा सकी हैं, जो क़ुरआन उन्हें देती है. भारत, दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ उलेमा, पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किए जाने तक का विरोध कर रहे हैं. संहिताबद्ध होने से कानूनों में कोई परिवर्तन नहीं होगा बल्कि उन्हें ठीक ढंग से, पूरे देश में एक समान प्रावधानों के साथ लागू किया जा सकेगा. बहर-कैफ़ मुस्लिम आलिमों को लॉ में ज़रूरी संशोधन से एतराज़ नहीं करना चाहिए। कई मुस्लिम मुल्कों जैसे तंज़ानिया, किनिया, तुर्की, टयूनिशिया, मोरक़्क़ो, इराक़, मलेशिया, इंडोनेशिया, मॉरिशश, ईरान, जॉर्डन और मालद्वीप ने भी अपने क़ायदे-क़ानूनों में बदलाव किया है. इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान ने भी 1961 में शरीयत क़ानून में ज़रूरी सुधार किये।   

शरीयत या मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप या देवबंदी-बरेलवी विवाद से परे यह देखना ज़रूरी होगा कि विश्व भर के मुसलमानों  की जिस ग्रंथ पर सर्वाधिक श्रद्धा-आस्था है, वह क़ुरआन तलाक़ के संबंध में क्या कहता है:
तलाक़शुदा औरतें अपने आपको तीन मासिक धर्मों के इंतज़ार में रोकें और उसके लिए जाएज़ नहीं है कि वह उसे छिपाएं, जो अल्लाह ने उनके गर्भ में पैदा किया है.। इस अवधि में उनके पति उनको वापस लेने के लिए ज़्यादा हक़दार हैं, अगर वह सुलह चाहें। (सूरा -2 बक़रा - 228 )

तलाक़ दो बार है। फिर (तीसरी बार ) उसे अच्छे तरीक़े से विदा करना है. या भले तरीक़े से रख भी सकते हैं. (वही, आयत-229 )


(इद्दत के समय) न तुम उन्हें उनके घर से निकालो, और न वह खुद निकलें, सिवा इसके कि वह खुद बेहयाई में पड़ गयी हों...फिर जब वह अपनी इद्दत की समाप्ति पर पहुँचने लगें, तो भले तरीक़े से (अपने निकाह में) रोके रखो या भले तरीक़े से एक दूसरे से जुदा हो जाओ. (सूरा -65तलाक़-2)

क़ुरआन के साफ़ निर्देश की भी अवहेलना करना पता नहीं यह समाज किस ज़ोम में कर रहा है. इसके अलावा भी कई आलिमों ने लिखा है कि अगर पति-पत्नी के ज़ेहन में कभी संबंध-विच्छेद का ख्याल आये तो उन्हें पहले बातचीत बंद कर देनी चाहिए। लेकिन इस दौरान यह सोचते रहें कि हमें अलग हो जाना चाहिए या साथ रह सकते हैं. गर साथ का रुझान न दिखे तो एक ही बिस्तर पर करवट बदल कर सोएं। दैहिक रिश्ते से परहेज़ करें। इस समय भी साथ या अलग रहने पर विचार करते रहें। जवाब नहीं में हो, तो फिर एक ही घर में अलग-अलग कमरे में रहना शुरू करें। तब भी अलग ही रहने की सोच प्रबल हो तो पत्नी को कुछ दिनों के लिए उसके मायके भेज दें. वहाँ से यदि पत्नी आ जाये तो पुन: विचार कर लें क्या तलाक़ ज़रूरी है तो पहली तलाक़ दें. उसके बाद क़ुरआन के मुताबिक़ दोनों अलग-अलग हो जाएँ। मेहर अगर पहले न दी हो तो उसे दे दें.  खुलाअ का भी यही तरीक़ा है.  लेकिन अगर उसके बाद आप दोनों को लगे कि तलाक़ देकर या खुलाअ लेकर अच्छा नहीं किया तो आप दोनों नयी मेहर के साथ नया निकाह कर सकते हैं. इसके लिए हलाला की कोई ज़रुरत नहीं, डॉ असग़र अली इंजीनियर और डॉ ज़ाकिर नायक भी यही कहते हैं. क्योंकि क़ुरआन में हलाला का कहीं भी ज़िक्र नहीं मिलता। न ही कोई हदीस इसके समर्थन में है. लेकिन कबीलाई और सामंती मानसिकता के तहत आज भी स्त्री-विरोधी कुप्रथा जारी है.  हलाला के हिमायती तर्क देते हैं कि यह  सज़ा है कि तलाक़ कितनी बुरी चीज़ है. क्योंकि तलाक़ के बाद अपनी पत्नी से दुबारा शादी चाहते हो तो उस औरत को पहले किसी और से निकाह  करना होगा। एक रात उसके साथ गुज़ारनी होगी। यदि अपनी इच्छा से वह दूसरा पति तलाक़ दे  तो इद्दत अवधि गुज़ारने के बाद औरत पहले पति से निकाह कर सकती है. इसे ही हलाला कहते हैं. आप ही बताएं तलाक़ दी पुरुष ने दंड स्त्री को क्यों? बहनों तुम चुप क्यों हो.

इद्दत = पहले तलाक़ के बाद चार माह की अवधि               
            



 
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बुधवार, 11 जून 2014

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है: बिस्मिल अज़ीमाबादी













 

سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے

دیکھنا ہے زور کتنا بازو ے قاتل میں ہے

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू -ए-क़ातिल में है।


Sarfaroshi ki Tamanna Ab Hamare Dil Me Hai
Dekhna Hai Zor Kitna Bazu-E-Qatil Me Hai






यह शेर बिस्मिल अज़ीमाबादी का है. लेकिन आज़ादी के दौरान इसके असर ने यूँ हंगामा बरपा किया कि  हर जुबां पर यह नारा बन गया. ख्यात क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने खुद इस ज़मीन पर नज़्म कही. बस यहीं से यह शेर उनके नाम मंसूब हो गया। इस संबंध में विस्तृत लेख यहां पढ़ें।


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बुधवार, 28 मई 2014

सुनो ! देश-दुनिया के नेताओं सुनो



चित्र गूगल कृपा

(प्रिय पाठकों ! विनम्र आग्रह है कि लेख को पूरा पढ़ें , तभी अपनी कोई राय बनाएं। आतंकवाद से हर देश और हर व्यक्ति प्रभावित है. इसको नष्ट करने के लिए सभी के ईमानदार साथ की ज़रूरत है. )




शहरोज़ की क़लम से

 "11 साल जेल में आतंकवादी बनकर जिस कोठरी में रहा, वह इस घर से बड़ी थी लेकिन वहां मैं एक ज़िंदा लाश था और सिर्फ़ इस उम्मीद पर ज़िंदा था कि जिस देश का मैं नागरिक हूं, उसका क़ानून पूरी तरह अंधा नहीं है और मुझे इन्साफ मिलेगा." यह कहना है आदम सुलेमान अजमेरी का जो 17 मई, 2014 को जेल से बाहर आए हैं. उन पर अक्षरधाम मंदिर हमले में शामिल  होने का आरोप था और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन पर लगे सभी आरोप ख़ारिज कर दिए और उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर दिया. उनके साथ इस मामले में इनके समेत छह लोग रिहा हुए  हैं. ग़ौरतलब है कि  24 सितंबर, 2002 को दो हमलावरों ने अक्षरधाम मंदिर के भीतर एके-56 राइफल से गोलियां बरसाकर 30 लोगों की जान ले ली थी, जबकि लगभग 80 को बुरी तरह ज़ख्मी हो गए थे.

अब सवाल क्या मौज़ूं नहीं कि दोषी को हम अब तक क्यों नहीं पकड़ सके. हमारा तंत्र इतना बौना क्यों हो गया. इधर,  पुलिस ने वाह-वाही बटोरने के चक्कर में इन लोगों की ताबड़ तोड़ गिरफ़्तारी की. और इन्हें प्रताड़ित कर इनसे जबरन अपने अनुकूल बयान ले लिए.  इन्हें लश्कर-ए-तय्यबा का खूंख्वार आतंकवादी घोषित कर दिया। इसके बाद शुरू हुई इन बेकसूरों के घर वालों की परेशानी। बच्चे को घर से बहार निकलना छूट गया. उनकी  पढ़ाई छूट गयी. माँ बिलखते-बिलखते चल  बसी.  अब जब देश की सर्वोच्च अदालत ने इन्हें बा इज़्ज़त रिहा कर दिया, तो इनकी प्रताड़ना,  मानहानि, रोज़गार छूटना, बच्चों की पढाई और इस दरम्यान अपनों की मौत इसका हर्जाना कौन देगा। ऐसे मामलों  में मीडिया वाले भी कम दोषी  नहीं हैं.   ऐसी ख़बरों को पुलिस के हवाले से नमक-मिर्च लगा लगाकर छापते हैं. रोज़ नए-से-नए खुलासे करने में टीवी एंकर अपनी गर्दनें फुलाते हैं. आरोपी को तुरंत ही आतंकवादी बना देना। जबकि यह पत्रकारीय मूल्यों के विरुद्ध है.
आतंक ने विश्व में लाखों निर्दोष बुज़ुर्ग, स्त्री और बच्चे, युवाओं को हलाक किया है. भारत और पाकिस्तान भी इसकी हिंसा से दो-चार है. भले, हमारा सुरक्षा अमला सही दोषियों को नहीं दबोच सका हो(अधिकतर मामले में ऐसे आरोपी कोर्ट से रिहा हो चुके हैं ). लेकिन नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति नवाज़ शरीफ़ ने जिस गर्मजोशी के साथ मुलाक़ात की. आतंकवाद के ख़ात्मे का संकल्प लिया। महाद्वीप  के दोनों दिग्गजों से यह गुज़ारिश है कि यह संकल्प धरा पर भी उतरे।

नवाज़ से गुज़ारिश
नवाज़ साहब! कोई बहाना मत कीजियेगा। सब जानते हैं कि भारतीय उप महाद्वीप में लश्कर-ए-तय्यबा और तालीबानी ग्रुप आतंक को अंजाम दे रहा है. पाक को अपने यहां के कैंप को ध्वस्त करना चाहिए। आपको अपने यहां लोकतंत्र को मज़बूत करना होगा ताकि सरकारी काम-काज में फ़ौजी दख़ल कम हो. क्योंकि कई बार ख़बरें मिली हैं कि कश्मीर के बहाने आपकी फ़ौज आतंकवादियों की मदद लेती है.  आतंकवाद को मटियामेट करने के बाद ही हम अच्छे पड़ोसी बन सकते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी विरासत साझा है.

 मोदी से आग्रह
मुल्क के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह है कि आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए बेहद ईमानदारी से प्रयास किये जाएँ। दहशतगर्दी फैलाने वालों को सख्त से सख्त सज़ा मिले। लेकिन सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि इसमें निर्दोष युवा बलि का बकरा न बने. यदि संदेह के आधार पर पुलिस किसी को हिरासत में ले या गिरफ़्तार करे तो मीडिया तुरंत उसे आतंकवादी या मास्टर माइंड बतलाने की हड़बड़ी न दिखाए।

 हम जैसे ढेरों लोग भारत-पाक की दोस्ती के हिमायती हैं. हमें आस है कि आप दोनों जल्द ही साझी रणनीति बनाकर आतंकवाद के बनते गढ़ों को ज़मींदोज़ कर  देंगे।  

अरब के शेख़ों कान तुम्हारे भी खुलें
संसार में इस्लाम के नाम पर जहाँ-जहाँ भी आपके कथित जिहादी खूंरेज़ी कर रहे हैं, उनमें सभी अहल-ए -हदीस विचारधारा के समर्थक हैं. यह कोई ढंकी-छुपी बात नहीं रह गयी कि आप अपने गुनाहों को ढंकने के लिए इनकी आर्थिक मदद करते हैं. आपके यह जिहादी हमारे पढ़ने वाले युवाओं को वर्गला कर जन्नत का ख्वाब दिखाते हैं. फिर उसके पासपोर्ट वीज़ा की शक्ल में उस मासूम की कमर में खुदकश बम बाँध देते हैं. इससे वह भले जन्नत में न जाते हों, लेकिन कई नस्लों को जहन्नुम के हवाले ज़रूर कर जाते हैं. तो शेख साहब! अब अय्याशी छोड़िये। तेल के कुंए  ज़्यादा दिन काम नहीं आएंगे। बच्चों को पढ़ाइये। हमारे बच्चों को भी पढ़ने दीजिये। इस्लाम की गलत व्याख्या कर फ़िज़ूल ख्वाब मत दिखाईये।

अंकल सैम कब होगी चौधराहट कम
अफगानिस्तान से रूस की दखल कम करने के लिए आपने अरब और पाकिस्तान के गुरगुओं की बदौलत दहशतगर्दों को जन्म दिया। उसे  खुराक देनी शुरू की. उसे हथियार देने के साथ ट्रेनिंग भी दी. अब जब रूसी फौजी अफगानिस्तान से चले गए तो वहाँ की बदहाली शुरू हो गयी. समाज कूपमंडूक होने लगा. हँसते बच्चे, खिलखिलाते युवाओं का स्कूल- कालेज जाना बंद हो गया. लडकियां क़ैद कर दी गयीं। आपके परवरिश से परवान चढ़े तालिबानी आपस में ही मरने-कटने लगे. जब आपने रसद बंद कर दी, पाक ने हमदर्दी, तो ज़ाहिर है, उसने आपको ही डसने को फन काढ़ लिया। ट्विन टावर नेस्ट नाबूद होने के बाद आपने मिटटी के बुर्ज़ों को ढहाना शुरू किया। अनगिनत बेक़सूर बमबारी के ग्रास बने. फिर लाशों को रोटियां खिलाने की क़वायद।
अंत में आपने लोकतंत्र के नाम पर हामिद करज़ई की कठपुतली सरकार बनवायी। खैर! क़िस्साकोताह यह है कि इराक़, लीबिया, वियतनाम और अफगानिस्तान में आपको लोकतंत्र की याद आती है. आपका मानवाधिकार अरब पहुँच कर क्यों सजदे करने लगता है. यहां एक वंश की बादशाहत आपकी नींद ख़राब क्यों नहीं करती। और आपकी खुफिया यह भी तो जानती है कि शिक्षा संस्थानों के नाम पर यहां के शेख इन आतंकवादियों को रक़म भी मुहैय्या कराते हैं. विश्व मुखिया बनने के लिए इन्साफ पसंद बनना होगा। ऐसी चौधराहट तुम्हारी ज़्यादा दिनों तक नहीं  चलने वाली, अभी भी चेत जाओ.       
    
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शनिवार, 3 मई 2014

जंगल से शहर पहुंचा जानवर



 
कार्टून इरफ़ान जनसत्ता से साभार





 शहरोज़ की दो अख़बारी फुलझड़ी  


गिरगिट भी हुआ पानी-पानी
जंगल से शहर पहुंचा कोई भी जानवर कहते हैं कि बौखलाहट में और भी खूंख्वहार हो जाता है। दरअसल उसको  संसार की चालाकियां और धूर्त्तताएं भी आ जाती हैं। और जब जंगल का राजा शेर ही अपनी मांद से निकलकर आ जाए। तो कहानी यही है कि अपने इलाक़े  के  कुत्तों को खा और चबा  जाने के बाद महाराज अब नगर-नगर भ्रमण कर रहे हैं। हालांकि  उन्होंने अपने जंगल में गाय, बकरी और भैंसों का सीधे-सीधे कोई अहित नहीं किया। बल्कि  कुत्ते के पिल्लों को  मरवाने में इन्हीं की मदद ली। अब प्रचार भी कर रहे हैं कि उनके राज में बकरी और शेर एक ही घाट पर पानी पीते हैं। लेकिन उन्हें क्या पता था कि  इस संसार में भांति-भांति के जीव-जंतु सदियों से समरसता से रहते आ रहे हैं। वे वसुधैव कुटुंबकम का पालन करते हैं। पर यह शेर इस सूत्र वाक्य को  मानते हुए भी नेता की तरह अपने-अपने ही राज बल का राग गुर्रा रहा है। वह दक्षिण गया तो बोल दिया, हम शेर-वेर नहीं हैं। आप ही के  जैसे पिछड़े वर्ग के हैं। हां राजा बनना चाहते हैं, पर हम पिछड़ो को कोई आगे बढऩे ही नहीं देता। इनकी गुर्राहट कभी झूठ होती नहीं। फिर भी लोग हुआं-हुआं करने लग जाते हैं। यह तो गुस्से में उसकी चमड़े की जबान फिसल जाती है। अब देखिए, दक्षिण में जो बोले, उसे पूरब में आकर बदल दिए। उनके अंदर की  महत्वकांक्षा ने उबाल मार दिया। गुर्राए, साथियो! अब चारा खा व चबा जाने वाली गायें और भैसें भी राजा बनना चाह रही हैं। लेकिन अब जब यही चारा गुट की एक भैंस उनकी  मंडली में शामिल हो गई। तो एक सिंह ने बैर-भाव भुलाकर  एक नेता की तरह उनका फूलमालाओं से स्वागत कर डाला। मालापहनाने वालों को गोबर भर गरियाने वाली भैंस भी तुरंत ही सब कुछ भूल बैठी। इन दोनों का बदलता रंग देखकर गिरगिट भी पानी-पानी हो गया।

श्वान उवाच
शहर में इनदिनों भौकने की आवाज़ हर रात और दोपहर के सन्नाटे को तोड़ती है. जब आप गौर से सुनें, तो इसके कर्कश स्वर विदेशी पॉप सा भान कराएंगे। दरअसल इस वसंत में कुत्ते भी दीवाने हो रहे हैं. हर मजनूँ की तरह यह कुत्ते अपनी लैला की खोज में गली-गली टहलते मिलेंगे। गर लैला न मिली तो उनका कंठ ऐसा फूटता है कि  समझ लीजिये बैजू ही बावरा हुआ जाता है।  वहीँ इनके साथियों का कोरस चौकीदारों की सीटी में अद्भुत मीठास पैदा कर देता है. लेकिन शहर के निगम को कौन समझाए। ख्वाह मख्वाह एंटी रेबीज टीम कुत्तों को पकड़ने में लगी है. जबकि उनकी गर्दन में जैसे ही लोहे की ज़ंजीर पड़ती है, उनका रुदन ढेरों रागों को तुरंता पेश कर देता है. अखबारों में मोटे अक्षरों में खबर छप रही है कि शहर में कुत्तों का आतंक। कई लोगों को काटा! मैं कला प्रिय व्यक्ति यह खबर पढ़ कर परेशान हो गया. मुझे तो उस फलां राँचवी नाम के उस शायर की आवाज़ से अच्छी इन श्वानों के स्वर में कविता लगती है. खैर सोचा कि उनके साथियों से पता किया जाए कि आखिर माजरा क्या है. देर रात जब आवारा गर्दी के बाद घर लौटा तो मेरी बाइक के आगे-पीछे कई श्वानों ने धमाचौकड़ी शुरू कर दी. सभी बेहद उदास थे. मैंने सख्त लहजे में पूछा, तुम सभी आजकल इंसानों को क्यों काटने  लगे हो. किसी नेता की तरह थुलथुल एक श्वान आगे आया. बोला, मौसम का असर हम जानवरों पर भी पड़ता है. लेकिन हैम सिर्फ इसी मौसम में किसी को काट लेते हैं. वो भी जब कोई हमें छेड़ता है तब. लेकिन अभी के चुनावी मौसम में राजनीतिक दलों के लोग हर घर जाकर मिश्री घोलते हैं. आप सभी उनकी बातों से ऐसा मोहित हैं मानों अबकी बार यह नेता जी जीत कर आपकी सारी समस्याओं का समाधान कर देंगे। आप उनका जाप करने लगते हैं. लेकिन जब चुनाव बाद यही नेता पांच वर्षों तक आपको किसी न किसी बहाने काटना शुरू कर देते हैं, तो आपकी बोलती क्यों बंद हो जाती है? बोलिये!  
   भास्कर के  5/11/2014  के अंक में प्रकाशित

  
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गुरुवार, 13 मार्च 2014

चुनावी बुखार की गुलेल गोली


अभिषेक तिवारी का कार्टून साभार

 शहरोज़  की दो अख़बारी फूलझड़ी
 कहीं सच तुम बदल तो नहीं जाओगे
भैया की धडक़नें इनदिनों शहर के  मौसम की तरह  बदल रही हैं। दरअसल उनकी प्रेयसी पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। इसके  लिए भाप तो बहुत पहले से ही उठने लगे थे। जब अंगीठी जलाई गई थी। इसके  ताप को बढ़ाने के  लिए खंड-खंड होते या  किए जा रहे झार-झंखाड़ से कोयले मंगाए जाने लगे थे। भैया को  यूं तो मुंशी-गुमाश्ते  कमी न रही, पर उनके  झक्क  सफेद कुरते पर पता नहीं कैसे कालिख लग गई। हालांकि  इसको  छुड़ाने के  जतन इतना  किये कि  राजधानी एक्सप्रेस हो गए। लेकिन उनके  चेहरे की  हवाई जहाज भी नहीं उड़ा सका । मठ से दरगाह तक  की  जियारत-परिक्रमा कर डाली। पर कमबख्त फिल्म 'दाग'  थी कि परदे से उतरने का नाम नहीं ले रही थी। असर यह हुआ कि सियासी ताप अफवाह सा बढऩे ही लगा। इसके  गुबार से दिल्ली तक  छींक  गई। जाहिर है, ताप बढ़ा, तो वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई। अब यही वाष्प बादल बनकर उनके  ईर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा है। कभी वह ऐसा ही चक्कर इसी प्रेयसी को हासिल करने के लिए लगाया करते थे। खैर! अब बादल है कि  घुमड़ते-घुमड़ते बरस जाने को बावरा हुआ जा रहा है।


ई कइसा लहरिया बाबू
होशियार ! खबरदार!! बड़का भोंपू से ई बात सुनकर मंगरू चा अपनी गठरी पोटली में बाँधने लगे. हम जब तक उनके पास पहुँचते उन्होंने वहाँ से लत्ती ले ली. हम भी उनके पीछे ऐसा भागे मानो पेट  खराब हो, और कहीं जाकर जल्दी ही निर्वृत हो लूं. हमरे पुकारने पर चच्चा बोले, तुम काहे हमरा पीछा कर रहे हो. तुमको भी का कोई लाल कपड़ा दिखा दिया है.  ऊ कौने फेके वा है जिसको कजरारे वाला नचवा लाल कपड़ा सा बुझा रहा है. और रह-रह के ऊ इधर-उधर बौखलाहट में का-का अनाप-शनाप बोल रहा है. टीविया मा इहो सुने हैं कि उसका कुर्सी बनाने में बड़का-बड़का लोग मदद कर रहा है. अभियो पंडित जी बतात रहींन।  ऊ अभी कासी से ही आये हैं सुनकर!   हम बोले, न मंगरू चा! हम तो आपके भागे के देख दौड़ लगा दिए. आप काहे खिसक लिए ई जगह से? 'लो सुन आउ  देख नहीं रहे हो. होशियार!खबरदार!!'  पता न का आफत है.' अरे कोनो आफत-वाफत न है चच्चा। इ कोई खेल हॉवे वाला है. पर खिलाड़ी चुनबे  न किये कप्तान का घोषणा कर दिए. आउ बोल रहे हैं कि ई बार तो कप्वा हमहीं जीतेंगे! अरे भैया कौन मना  कर रहा है, पर खिलाड़ी चूने मा काहे देरी कर रह हो। जबकि दुसरका टीम का खिलाडी सब प्रेक्टीसो करने लगा है, अपना- अपना मैदान में. औउ ई कप्तनवा सोच रहा है कि सभे मैदान का मैच अकेलिये खेल लेंगे। हमरी बात को सुन अभी -अभी पहुंचे  पंडित जी मुस्कुराए, 'बाबू ई कप्तनवा तो अपना ही मैदान छोड़ कर दुस्सर मैदान देख रहा है. अब भला भांग के आगे कासी में ढोकला चलिहें का.'  
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सोमवार, 25 नवंबर 2013

ईंट उठाने वाली मज़दूर बनी यूनिवर्सिटी टॉपर


गोल्ड मेडल पाकर  कहा, नौकरी मिल जायेगी न!

पदक पाकर मुन्नावती रो पड़ी   चित्र: रमीज़ जावेद




शहरोज़
 @  मुन्नावती


बरसों रेजा मजदूरी करते बचपन से युवा होने तक जो सपना देखा था, उसके साकार होने में मात्र कुछ ही घंटे बचे थे। मन में अजब हलचल थी  कि आज मुझे ईंटें नहीं उठानी, बल्कि सोने का तमगा गले में पहनना है। मुझे यह पदक कोई और नहीं देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे स्वयं देंगे। आखिर क्यों नहीं? मैंने संस्कृत में यूनिवर्सिटी जो टॉप किया है। सूरज बाबा ने चहुं ओर अंजोर कर दिया है। सोमवार को दिन के 10 बजे हैं। मैं छोटे भैया हरख  के साथ रांची विवि पहुंची, तो अवाक् रह गई। सड़क की दोनों ओर गाडिय़ों का काफिला। फूल सी चहकती छात्राएं। छात्रों के झुंड का तेज भी जुदा-जुदा सा। दीक्षांत मंडप पहुंचते-पहुंचते मुझे गांव के आसपास लगने वाले मेले याद आने लगे। उस मेले में जाने का अवसर भी भला कहां नसीब हो पाता था। दिन-भर हाथ-गोड़ तोड़ू श्रम करने के बाद शाम को थकी-मांदी अपने गांव दोलैंचया पहुंचती थी। फिर रसोई निबटाकर पढऩे बैठ जाती। गालों पर लुढक आए आंसूओं को पोंछते मैंने मंडप में प्रवेश किया। काले-लाल गाउन में दमकती हमउम्र लड़कियों को पास देख खुशी दोहरी हुई। साथ ही ज्योतिमर्य डुंगडुंग, कुमारी अनुपमा, गुफराना फिरदौस, शमा परवीन, नुपुर , शहनवाज को करीब पाकर दिल ने जोर से कहा, जय हिंद!  हरख भैया मुझे बैठाकर इधर-उधर टहलने लगे। उनकी आंखें की पलकें भी उचक-उचक कर यहां उतर आए खुशरंग व खुशपल को निहारने लगीं। सीट पर बैठते ही पत्रकारों ने घेर लिया। हर कोई मेरी गरीबी को जानना चाहता है। लेकिन मैं हरेक से अपनी गरीबी दूर करने की विनती करती हूं। मुझे अब नौकरी मिल जाएगी न?

मेरे ठीक सामने बड़ा सा मंच है। लग रहा है कि लापुंग का खेल मैदान हो। मंच पर सजे रंगबिरंगे फूल मुझे गांव के फुटबाल(गेंदा)फूल का स्मरण कराते हैं। मंडप में भीड़ है। खुशियों का मेला है। इससे पहले इतनी भीड़ अपने गांव से चार-पांच किमी दूर डुरू जतरा में देखी थी। अचानक घोषण होती है कि अब शोभायात्रा आएगी। समय 11 बजे का है। मखमली गाउन में गुरुओं व अतिथियों का झुंड। मार्च की अगुवाई कर रहे हैं, रजिस्ट्रार डॉ. अमर कुमार चौधरी। उनके साथ राज्यपाल डॉ. सैयद अहमद, केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव, वीसी व प्रोवीसी, डीन, सिंडीकेट, सीनेट। उनके मंचासीन होने के बाद ही राष्ट्रगान के लिए सभी खड़े हो गए। समवेत स्वर में जन  गण मन से गाते ही रोम-रोम सिहर गया। उसके बाद जय-जय गुरुकुल जय रांची विवि के कुलगीत ने स्वाभिमान की ऊर्जा भर दी।

रजिस्ट्रार साहब के भाषण के बाद अतिथियों को सम्मानित किया गया। कुलपति ने अंग्रेजी में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। उसके बाद गोल्ड मेडल पाने वाले छात्र-छात्राओं को सामने आने को कहा गया। मेरी धड़कनें धौकनी की तरह चलने लगीं। मंच की  बायीं ओर  हम सभी करीब लगगभ 29 विद्यार्थी पंक्तिबद्ध खड़े हो गए। इनमें 19 लड़कियां थीं। सबसे पहले मंच से संजय कुमार के नाम की घोषणा होते ही तालियों ने शोर का संग दिया। आठवें क्रम में मेरा नाम पुकारा गया। साहस बटोरते हुए मैं मंच पर पहुंची। केंद्रीय मंत्री के हाथों गोल्ड मेडल व प्रमाण पत्र पाते ही लगा कि मैं घोल जीत गई। बचपन में जतरा में अक्सर मैं घोल में हार जाती थी। मंच से उतरते ही दोनों भैया  हरख व गोवद्र्धन साहू का चरण छुआ। मेरी मजदूरी के साथ इनकी मेहनत व साथ के बल पर ही तो मेरे गले मे यह सोने का तमगा चमका है। पदक वितरण के बाद अतिथियों ने भाषण दिया। शिंदे जी की बात ने बहुत प्रेरित किया। उन्होंने भी अभाव को अपनी मेहनत व ईमानदारी से परास्त किया है। पदक को भैया बार-बार छू कर देखने लगे। मैंने किसी से पूछा, भैया यह सोना ही है ना या कि केवल पानी चढ़ा  हुआ है। यहां से मैं विभाग जाउंगी  गुरुओं का आशीष लेने। अस्पताल जाकर बीमार मां की चरणधूलि से माथे पर टीका लगाउंगी। बाबा देवीदयाल होते, तो किता खुश होते। तब इन आंखों का बादल सिर्फ हर्ष का ही होता।

भास्कर रांची के 26 नवंबर 2013 के अंक में प्रकाशित 

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बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

हिंदी साहित्य को जाति व धर्म से निकलना होगा














फ्रैंक हुज़ूर @ शहरोज़




रांची के सेंट जेवियर कॉलेज के छात्र रहे मनोज कुमार  अब फ्रैंक हुज़ूर बन चुके हैं। लंदन में इनके लेखन के दीवानों की कमी नहीं हैं। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान पर लिखी उनकी किताब 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी' बेस्टसेलर हो चुकी है। पिछले वर्ष आई 'इमरान खान द फाइटर' भी अंग्रेजी जगत में खूब चर्चा में रही। यह युवा लेखक कभी 'हिटलर इन लव विद मडोना' नाटक के कारण विवादों में आया था। इन दिनों पोर्न सिनेमा पर केंद्रित अंग्रेजी व हिंदी में हिंदी युग्म  से आई उनकी औपन्यासिक कृति 'सोहो : जिस्म से रूह तक का सफर' ने शोहरत की नई बुलंदी तय की है। इधर फोन पर उनसे लंबी बातचीत हुई। कहा कि रांची शहर उन्हें खूब याद आता है। सेंट जेवियर जैसा कॉलेज कैंपस उन्होंने कहीं नहीं देखा।

छह महीने के थे कि मां गुजर गईं: मां की गोद महज छह माह नसीब हुई। उसके बाद उनका देहांत हो गया। मां के ममत्व से छुटपन से ही वंचित रहा। इमरान वाली पहली किताब मां को ही समर्पित की है। पटना में रह रहे पिता से सालों साल मुलाकात नहीं हो पाती है। इधर के पांच वर्षों में मैं मुंबई, दिल्ली, लाहौर व लंदन में डोलता रहा हूं। पिता लेखक बनने के फैसले से असंतुष्ट थे। वह मुझे आईएस या आईपीएस देखना चाहते थे। लेकिन अब मेरे लेखन की अहमियत को समझने लगे हैं।

रांची में हुआ मैच्योर: 92 में पहली बार कविता लिखी, उसे याद करते हुए। शुरुआत से ही अभिव्यक्ति का माध्यम अंग्रेजी रहा।मनोज खान के नाम से इंग्लिश में कविताएँ  पत्र-पत्रिकाओं में शाया हुई। लेकिन मुझे लगा कि अंदर में एक लेखक सांस ले रहा है, उसे तवज्जो देना चाहिए। जेवियर की रिच लाइब्रेरी ने मेरे मानस को गहरे तक प्रभावित किया। मैंने जमकर यहां की दुर्लभ किताबों का फायदा उठाया। सच कहूं, तो मेरा स्टंडर्ड यहीं मैच्योर हुआ।

हिटलर इन लव विद मैडोना पर मिली धमकियां: मेरे नाटक 'हिटलर इन लव विद मैडोना' को काफी पसंद किया गया। पर उसपर विवाद भी  हुआ। मेरे पुतले जलाए गए।  पुस्तक तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित कर दी गयी।  दरअसल मैंने देश में मौजूद धार्मिक कट्टरता को दिखाने की कोशिश की थी। इस कट्टरता के पीछे एक राजनीतिक दल का हाथ रहा है। न सिर्फ मुझे बल्कि नाटक के कलाकारों को भी उस दल के कार्यकर्ताओं ने धमकियां दीं।

इमरान ही क्यों:  बचपन से क्रिकेट का दीवाना रहा हूं। इमरान की जिंदगी ने प्रभावित किया। सियासत में आने के बाद भी आम जन के प्रति उनके सरोकारों को देख मैं चकित हुआ। दर्जनों बार इमरान व जेमिना से मिलने के लिए लंदन और पाकिस्तान के चक्कर लगाए। चार सौ पेज की फाल्कन एंड फाल्कन, लंदन से छपी ' इमरान वर्सेस इमरान' में इमरान की जिंदगी के बहाने पाक की वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक स्थितियों का भी चित्रण है। इसके उर्दू संस्करण की रिकार्ड बिक्री हुई। हिंदी में जल्द ही आने वाली है।

झारखंड पर भी लिखेंगे: सपा प्रमुख मुलायम सिंह पर लिखने का मन बना चुके हैं फ्रैंक। बिहार व झारखंड पर कहते हैं कि यहां विकास का जितना प्रचार है, हकीकत उतना नहीं। हां! बदलाव जरूर आया है। लेकिन विकास की सही तस्वीर बननी बाकी है। झारखंड व बिहार की बदहाली पर खूब ध्यान जाता है। बेचैनी भी होती है। कल के दिनों में इनपर भी जरूर लिखूंगा।

हिंदी के वाल्तेयर राजेंद्र यादव: उर्दू शायर फैज अहमद फैज बेहद पसंद हैं। हिंदी लेखकों में राजेंद्र यादव का लेखन खूब भाता है। राजेंद्र जी हिंदी के वाल्तेयर हैं। लेकिन अंग्रेजी साहित्य में गालिब की वुस्अत यानी विस्तार और फैलाव है। इंद्रधनुषी रंग है उसमें। ऑस्कर वाइल्ड और मार्कोज जैसा कल्पनाशील और धाकड़ रचनाकार हिंदी में नहीं हुआ। हिंदी समाज धर्म और जाति जैसे फिजुल बातों में बंटकर लेखन का बंटाधार कर रहा है। कुछ अपवाद सभी जगह हैं, उनमें एक हैं, राजेंद्र यादव।

खुशवंत का हास्य पसंद: मिड नाइट चिल्ड्रेन में सलमान रुश्दी की प्रतिभा तो दिखती है, पर सटैनिक वर्सेस में आकर वह डगमगा जाते हैं। अरुंधति राय निसंदेह गंभीर लेखक हैं। उनके लेखन व संघर्ष दोनों का मैं कायल और प्रशंसक हूं। खुशवंत सिंह भारतीय अंग्रेजी लेखन के अहम स्तंभ हैं। उनके हास्य-व्यंग्य  का जवाब नहीं। चेतन भगत चमकते हुए भारत की तस्वीर दिखा रहे हैं। कैफे और कॉल सेंटर की जमात उनके पाठकों में है। जबकि समूचा देश इंडिया और भारत में बंटा हुआ है। महज दो फीसदी लोग उस चमकते चेहरे में शामिल हैं।



 फ्रैंक हुजूर : परिचय
जन्म: 21 जनवरी 1977 को बक्सर (बिहार) में
शिक्षा: सेंट जेवियर कॉलेज रांची व दिल्ली से
सृजन : नाटक 'हिटलर इन लव विद मडोना, बायोग्राफी 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी, 'इमरान खान द फाइटर और औपन्यासिक कृति 'सोहा:जिस्म से रूह तक का सफर
संप्रति: स्वतंत्र लेखन
संपर्क:  frankhuzur@gmail.com 

(चर्चित युवा लेखक फ्रैंक हुज़ूर  से शहरोज़ की बातचीत भास्कर के झारखंड संस्करणों में 23 अक्टूबर 2013 के अंक में प्रकाशित )   







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सोमवार, 17 जून 2013

गाती हुई नदी का रुदन


फोटो  संजय कपरदार

चार किमी की नदी यात्रा ने बताया कैसे राँची को कभी नमी देने वाली नदी हरमू हो रही है अब गुम 




सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से 



मां कभी अपने बच्चों के लिए बददुआ नहीं कह सकती। भले, उनके लाडले उनका ध्यान न रखें। अपने स्वार्थ के लिए उसे तार-तार तक कर डालें। मैं भी तो मां हूं, न! कुदरत के अनमोल धरोहर झारखंड के कभी 40 किलोमीटर के दायरे में कल-कल, छल-छल करने वाली मैं आज अपने जार-जार आंचल को देख सुबकने बैठती हूं, तो आंसू भी नसीब नहीं हो पाता। 40 फ़ीट चौड़ा मेरा आंचल अब इतना सिकुड़ गया है कि लाज भी बचाना मुश्किल है। मेरे लाडले! मैंने तो हमेशा तुम्हारा भला चाहा। तुम्हें और तुम्हारे खेत-खलिहानों, बाग-बगिचों को सींचा। तुमने मेरे आसपास हरियाते पेड़-पौधों को भी नहीं बख्शा। अब मैं कैसे तुझे अपने आंचल में छुपाकर समय की तपशि से झुलसने से बचाऊं! हर जगह तुमने अतिक्रमण कर घर-दुकानों से पाट दिया है। शहर की सारी गंदगी मेरी ही गोद में डाल देते हो। वहीं पॉलीथीन का ढेर मेरे माथे पर रह-रह कर काँटा बन चुभता है। (भास्कर के 5  जून 20 1 3 के अंक में प्रकाशित  )

मेरे प्रिय नागरिको!

पहले बहुत पहले से दो दशक पूर्व  तक  मैं हरमू नदी की  जल धारा मधुर सा गान सुनाती हुई बढ़ती रही। मुंडारी में मुझे लोग ‘दुरंग दह’ कहते थे. यानी ‘गाती हुई नदी’. मैं गांव से ऊंचे पर्वतों से उतर झरनों के  संग छोटे-छोटे पत्थरों से बतियाती सुंदर राग सुनाती थी। हर मुसीबत और संकट को झेलते हुए मैं आगे बढ़ती रही। इधर,
तुम अपने कार्य में लगे रहो। कभी शाम-सवेरे मेरे आंचल में कभी सुबकते, हंसते गुनगुनाते रहे। बिना किसी भेदभाव के  हर एक  को  स्नेह, प्रेम बांटती रही। तुम मेरे आंगन में उतर कर अर्घ्य  देते रहे। किसी ने मेरे जल से वुजू किया, तो किसी ने मंदिर में चढ़ाया। लेकिन मेरी पावनता का  तिलक कहो, तो सही। अब कैसे  अपने माथे पर लगाओगे। मेरा कल-कल निनाद प्रदूषण की  गुफा  में आकर लुप्त हो गया। हरितिमा के  झुरमुटों को  पॉलिथिन ने लील लिया है। बाइपास हरमू से नीचे की  ओर मेरा तट भले चौड़ा है। पर ड्रेनेज और डस्टबीन बतौर मेरा इस्तेमाल यहां भी है। जब आप यहां से आगे बढ़ें, तो एएजी कॉलोनी  और नदी टोला, इदरीसिया कॉलोनी  के  बीच तुमने कचरे, पालीथीन  और अतिक्रमण  से मेरी धार  मंद कर दी। मेरा जब कंठ  ही प्यास  से सूखा है। पास की बच्चियों  को  डेढ़ किमी से पानी लाते कैसे  रोक लूं। यहां से चंद गज के फ़ासले पर मुझे अतिक्रमण  ने दबोच कर महज 5 फीट  कर दिया। आजादी के  दीवाने और धर्म  के  परवानों -का आश्रय  रहा  मेरा आंचल अब सि-कुड  चुका  है। धीरे-धीरे  मेरे साथ चलो, तो जान पाओगे। क डरू, निवारणपुर और खेत मोहल्ला के  दरमयान भी मेरी आबरू को  तुमने कितनी बार तार-तार किया है। कहीं अपना शौचालय बना दिया, कहीं खटाल। कहीं मेरी नाजुक  रही उंगलियों को  कंकरीट वॉल से कुचल डाला। लाजपत स्कूल  के  पास मैं सिसकते हुए, दुबक -दुबक  आगे बढ़ी। यहां ठहर सांस ली। तुम्हें  भी यहां मेरे आसपास हरियाते पेड़-पौधे को  देख अच्छा  लगा होगा। लेकिन मेरा खिलखिलाना तुम्हें  रास नहीं आया। रेडिसन ब्लू  की  पुलिया के पास उसे तुमने पॉलीथिन के  अंबारों से रोक  दिया। मेरे साथ चलते हुए तुम्हारा  रूमाल से नाक  ढंकना अब बुरा नहीं लगता। हंसी आती है। और गुस्सा भी। बजबजाती नलियों और नाले में मुझे किसने तब्दील कर दिया। बिल्कुल  शांत, नीरव तुम्हारे घर -आंगन, बाग-बगिचे से दूर तट से हरहराती मेरी धार को  गंदगी और पॉलीथिन से अवरुद्ध कि सने किया। तुम्हारे  इस विनाश रूपी विकास को  देख मेरा अब रोम-रोम भीगता नहीं, लरजता है। नदियों को  आराध्य  व पावन मानने वाले तुम मुझे टुकड़ों में बांट कर कैसे  खामोशी की चादर तान लेते हो! मुझे तुमने निचोड़ जरूर लिया है। लेकिन मैं पूरी तरह सूखी नहीं हूं। तुम्हारी  करतूतों से मेरा रंग काला पड़ गया। मेरी सांसें किसी कुम्हार  की धौंकनी की  तरह अब भी कहती हैं, बचा लो मुझे। धरती के  गर्भ में समा जाना नहीं चाहती मैं निस्पंद, निर्विकार! तुम भूल गए कि पत्थर  भी मेरे साथ इठला चहक कर चलते थे। उसके गुंजन से सारा वातावरण  प्रकृति रस में मदहोश हो जाता। मैंने कभी बहती मिट्टी, पत्थर , जलकुम्भी किसी को  भी नहीं रोका । तुम तो मेरे फूल  हो! मेरा न सही , अपना तो ख्याल करो। कैसा शहर छोड़ जाओगे तुम आने वाले कल के लिए !

(भास्कर के 1 1 जून 20 1 3 के अंक में प्रकाशित) 


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रविवार, 13 जनवरी 2013

हुगली किनारे विवेक का आनंद

फोटो:संदीप नाग
बेलुर मठ का रंग अजूबा 

सैयद शहरोज़ कमर की क़लम से

हुगली में सूरज डूब रहा है। उसकी ज़र्दी  ने स्नेहा  चौधरी की सांवली  रंगत को और  सुनहरा बना  दिया है। स्नेहा स्वामी विवेकानंद के कमरे के सामने ध्यान मग्न है। यह ज़र्दी उनके बिस्तर की चादर पर भी पसरी है। सिरहाने तकिये के सहारे टिकी स्वामी की तस्वीर को टुक देखती स्नेहा की श्रद्धा और उल्लास को दायें-बांये गुलदान में सजे ताज़ा फूल मोअत्तर कर देते हैं। यह खुशबू दुनिया के सारे युवाओं को यहाँ खींच लाती है। स्नेहा गुहावटी से हैं। डॉ कविता और दिनेश वर्मा देहरादून से आये हैं। वहीँ एनिमेशन फ़िल्म बनाने वाले अबीर धनबाद से।

इस भवन में सदी के महापुरुष स्वामी विवेकानंद 1898 से अपनी अंतिम समाधि 4 जुलाई 1902 तक रहे। भवन के सामने आम्र-वृक्ष के नीचे आगंतुकों से मिलते थे।  महज़ एक खाट  ही उनका आसन  होता था। इस पेड़ को अभी ईंट के तीन स्तंभ ने संभाले रखा है। यह दरख्त तुरंत युवा नरेन के विशाल व्यक्तित्व की तरह  उभरता है। और विश्व के युवाओं को अच्छादित कर देता है। जबकि यह तीन पिलर स्वामी के परिवर्तन कारी  विचारों को रौशन। इसकी दमक बेल्लुर मठ द्वार खुलने के इंतज़ार में खड़ी नौजवानों की असंख्य भीड़ में साफ़ दीखती है। उठो, जागो और तब तक रुको नहीं, जब तक तुम्हीं मजिल न मिल जाए। उनके इसी त्रिदृष्टि ने देस-दुनिया के युवाओं के चेहरे-मोहरे बदल दिए।
स्नेहा दिल्ली विवि से मॉस कॉम कर रही हैं, उन्हें स्वामी जी का यह कथन हर समय प्रेरित करता है,अपने आप में विशवास करो, जो खुद को नहीं जानता वो ही नास्तिक है।
डॉ कविता दून में मेडिकल प्रैक्टिस करती हैं, कहती हैं, विवेकानंद कहते थे: असफलताओं की चिंता मत करो।यह होना है, लेकिन जीवन का सौन्दर्य यही तो है। स्वामी के हवाले से बोलती हैं, जीवन में संघर्ष नहीं तो बेकार है। कामयाबी तभी मिलती है। इसी सूत्र ने विपरीत हालातों में भी उन्हें हतोत्साहित नहीं किया। उनकी पढाई के सामने आर्थिक  अडचनें पार होती गयीं। वहीँ, धनबाद के अबीर कहते हैं, उन्होंने स्वामी की एक बात गांठ बाँध ली है। वो कभी कमजोरी की चिंता नहीं करते। हमेशा शक्ति का विचार करते हैं। 
उत्सव सेनगुप्ता खड़गपुर से आये हैं। रामकृष्ण परमहंस के प्राचीन मंदिर की सीढियां उतरते हुए, उनके पग में विश्वस्त तेज है। इस मंदिर में परमहंस ने 1899 तक पूजा की। यहीं शारदा देवी और विवेकानंद ने भी धुनी रमाई थी। उत्सव विवेकानंद को दोहराते हैं, स्नायु को मज़बूत बनाओ। अपने पैर पर खड़े होने में ही कल्याण है।
हुगली किनारे दो नाव आकर रूकती है। वहीँ मुख्य द्वार से फिर एक रेला अध्यात्म की चाह में मठ परिसर में प्रवेश करता है। यह लहर सिर्फ हुगली की नहीं है, न ही महज़ धर्म का प्रवाह है। यहाँ आने वाले गुरु-शिष्य परम्परा के एतिहासिक उदाहरण को नमन करने आये हैं।  मुख्य मठ में पूजा शुरू हो गयी है। सुबह पहली पूजा में स्थानीय भक्त होते हैं। लेकिन अब तो पंजाब, बिहार और केरल के लोग भी हैं। इससे पहले माँ शारदा और ओम के मंदिर में मत्था टेकना श्रद्धालु नहीं भूलते। 
मोनिशा मंडल, बीए को गिला है कि  युवाओ के आदर्श विवेकानंद को समुचित ढंग से न समझा गया, न ही प्रचारित किया गया। उन्होंने कहा कि स्वामी ने दलित संस्कृति-समाज को अहमियत दी। वे हर चीज़ को तर्क की कसौटी से परखते थे। मोनिशा भी मिथ्या आचरणों और आडम्बरों का विरोध करती हैं। आसनसोल की शर्मिष्ठा घोष बीकॉम में हैं। उनके लिए विवेकानंद रोल मोडल हैं। कहती हैं, करो अपने मन की। अपनी इच्छा की। शनिवार की सुबह यहाँ स्कूली बच्चों का जमावडा  होगा। परिसर के अन्दर सड़कों की मरम्मत की जा रही है। संग्रहालय के बाहर इसके सबब भीड़ है। रांची के ऋषभ को किसी तरह जगह मिल गयी है। वो हर वर्ष यहाँ आते हैं। उन्होंने विवेकानंद को पढ़ा ही नहीं, गुना भी है। इसका प्रभाव उनकी शिष्टता में साफ़ झिलमिलाता है। बी-टेक के छात्र ऋषभ आनंद को स्वामी का विदेश में दिया पहला व्याख्यान शब्दश: याद है। प्रियंका शाह भी बी-टेक कर रही हैं। सिलीगुड़ी में रहती हैं। उन्हें स्वामी जी की गुरु निष्ठा यहाँ खींच लाती है। उन्हीं के शहर के नावेशेंदु पाल ने कुछ साहित्य खरीदा है। कहते हैं कि देश को जानने के लिए ज़रूरी है। (बेलुर मठ से )

युवा दिवस पर दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में प्रकाशित 12.01.13


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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बदलती रहेगी तो बहती रहेगी हिंदी


हिंदी के संवेदनशील जानकार चाहिए


 




















सैयद शहरोज़ क़मर की कलम से


समय के साथ संस्कृति, समाज और भाषा में बदलाव आता है। परंपरा यही है। लेकिन कुछ लोगों की जिद इन परिवर्तनों पर नाहक  नाक  भौं सिकोड़ लेती है। अपने अनूठे संस्मरणों के लिए मशहूर लेखक  कांति कुमार जैन का लेख -इधर हिंदी नई चाल में ढल रही है- पढ़ा जाना चाहिए। लेख का अंत वह इस पक्ति से करते हैं, हमें आज हिंदी के शुद्धतावादी दीवाने नहीं, हिंदी के संवेदनशील जानकार चाहिए। वह लिखते हैं, अंग्रेजी में हर दस साल बाद शब्द कोशों के  नये संस्करण प्रकाशित करने की परंपरा है। वैयाकरणों, समाजशास्त्रियों, मीडिया विशेषज्ञों, पत्रकारों, मनोवैज्ञानिंको का  एक दल निरंतर अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले नये शब्दों की टोह लेता रहता है। यही कारण है कि  पंडित, आत्मा, कच्छा, झुग्गी, समोसा, दोसा, योग जैसे शब्द अंग्रेजी के  शब्द कोशों की शोभा बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में कोई शुद्ध अंग्रेजी की बात नहीं करता। संप्रेषणीय अंग्रेजी की, अच्छी अंग्रेजी की बात करता है। अंग्रेजी भाषा की विश्व व्यापी ग्राह्यता का यही कारण है कि वह निरंतर नये शब्दों का स्वागत करने में संकोच नहीं करती। हाल ही में आक्सफोड एडवांस्ड लर्न्र्स डिक्शनरी का नया संस्करण जारी हुआ है। इसमें विश्व की विभिन्न भाषाओं के  करीब तीन हजार शब्द शामिल ·िकये गये हैं। बंदोबस्त, बनिया, जंगली, गोदाम जैसे ठेठ भारतीय भाषाओं के शब्द हैं, पर वे अंग्रेजी के शब्दकोश में हैं क्योंिक  अंग्रेजी भाषी उनका प्रयोग करते हैं।

दरअसल किसी भाषा का  विकास उसके बोलने या लिखने वालों पर निर्भर करता है। अगर उनका ध्यान रखा जाता है, तो निश्चय ही ऐसी भाषा सरल, सहज और बोधगम्य बनती है। अंग्रेजी में ग्रीक, लैटिन, फ्रांसीसी और अरबी के शब्द मौजूद हैं। अब उसके नए कोश में चीनी, जापानी और हिंदी आदि दूसरे भाषायी समाज के शब्द भी शामिल किए गए हैं। वहीं अरबी वालों ने तुर्की, यूनानी, फारसी और इबरानी आदि के शब्द लिए। ऐसा नहीं कि हिंदी को  दूसरी भाषा से बैर हो। हिंदी और उर्दू का जन्म ही समान स्थितियों और काल की देन है। जाहिर है, बाद में अलग अलग पहचानी गई इन जबानों में तुर्की, अरबी, अंग्रेजी, फारसी, अवधी, बुंदेली, बांग्ला, संस्कृत आदि देशी विदेशी शब्दों की भरमार है। लेकिन बाद में हिंदी के शुद्धतावादियों ने धीरे धीरे बाहरी शब्दों से परहेज करना शुरू किया। तत्सम का प्रयोग आम हुआ। न ही तत्सम और न ही अन्य भाषायी शब्दों का इस्तेमाल गलत है। गलत है, ऐसे शब्दों को प्रचलन में जबरदस्ती लाने की  कोशिश करना। हां! यदि चलन में शब्द हैं, तो उसे आत्मसात करना जरूरी है। लेखक, कवियों और अब टीवी चैनलों व फिल्मों में प्रयुक्त शब्दों को स्वीकार करने में हिंदी का विकास ही है। जैसे, प्रेमचंद ने गोधुली शब्द का इस्तेमाल किया तो लोगों ने सहज लिया। पंजाबी शब्द कुड़माई कहानी उसने कहा था के  कारण कितना खूबसूरत बना। संजय दत्त की  फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में आया गांधीगीरी शब्द हर की जबान पर चढ़ गया। अरुण कमल ने अपनी कविता में चुक्कू मुक्कू लिखा, तो उसका इस्तेमाल करने में किसी को  कोई गुरेज नहीं हुआ। सुधीश पचौरी जब न्यूज चैनलों के लिए खबरिया लिखने लगे, तो पहले परहेज किया गया। लेकिन बाद में उसकी सहर्ष स्वीकृति मिल गई।
हिंदी और उर्दू के शब्दों को परस्पर जबानों से अलग करने की बहुधा कोशिशें की गईं। लेकिन हुआ उल्टा ही। आम लोगों के बीच गजलों, गानों और फिल्मों से उसे दुगुनी चाल से बढ़त मिली। आदि लेखकों में शुमार भारतेंदु हरिश्चंद्र के बकौल हिंदी नई चाल में ढलती गई। उर्दू और अंग्रेजी के शब्द शर्बत में चीनी की तरह घुल चुके हैं। तभी तो मिठास है। हिंदी में करीब 1 लाख, 37 हजार शब्द दूसरी भाषा के हैं। यह अब हमारी विरासत है।
दूसरी भाषा से आए शब्दों की कुछ मिसालें देखिए:
फल, मिठाई संबंधी: अनार, अंगूर, अंजीर या इंजीर, आलूबुखारा, कद्दू, किशमिश, नाशपाती, खरबूजा, तरबूज, सेब, बादाम, पिस्ता, अखरोट, हलवा, रसगुल्ला, कलाकंद, बिरयानी और कबाब आदि।
शृंगार संबंधी: साबुन, आईना, शीशा, इत्र आदि।
पत्र संबंधी: पता, खत, लिफाफा, डाकिया, मुहर, कलमबंद, कलम, दवात, कागज, पोस्ट ऑफिस, डाक खाना, आदि।
व्यवसाय संबंधी: दुकान, कारोबार, कारीगर, बिजनेस, शेयर, मार्केट, दर्जी, बावर्ची, हलवाई आदि।
धर्म संबंधी: ईमान, बेईमान, कफऩ, जनाज़ा, खुदा, मज़ार आदि।
बीमार संबंधी: बीमार, डॉक्टर, अस्पताल, हॉस्पीटल, नर्स, दवा, हकीम, सर्दी ज़ुकाम, बुखार, पेचीश, हैज़ा आदि
परिधान: पोशाक, कमीज, शर्ट, पैंट, आस्तीन, जेब, दामन, पाजामा, शलवार, जींस, दस्ताना आदि।
कानून व शासन संबंधी: चपरासी, वकील, सरकार, सिपाही, जवान, दारोगा, चौकीदार, जमादार, अदालत, सज़ा, मुजरिम, कैद, जेल आदि।

वहीं हिंदी में आए उर्दू के उपसर्ग व प्रत्यय के कुछ नमूने:

हर, बदनाम, बदसूरत, बदबू, बदमाश, बदरंग, बदहवास। गैरवाजिब, गैरजिम्मेवार, गैरजिम्मेदार, गैर हाजिर। बिलानागा। दादागिरी, गांधीगिरी, उठाईगिरी। आदमख़ोर, घूसखोर, रिश्वतखोर। असरदार, उहदेदार, चौकीदार, थानेदार। घड़ीसाज़, रंगसाज़।
इसके अलावा अनगिनत उर्दू शब्दों ने हिंदी शब्दकोश को समृद्ध बनाया है। आनंद नारायण मुल्ला का शेर बरबस याद आता है:

उर्दू और हिंदी में फर्क सिर्फ़ है इतना
हम देखते हैं ख्वाब, वह देखते हैं सपना।

प्रेमचंद आज भी चाव से पढे जाते हैं। उन्हें क्लासिक का दर्जा हासिल है। वहीं बोधगम्यता की बात चली तो, राजेंद्र यादव का सारा आकाश, श्रीलाल शुक्ल का रागदरबारी, धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता, सुरेंद्र वर्मा का मुझे चांद चाहिए, शानी का कालाजल और अब्दुल बिस्मिल्लाह का झीनी झीनी बिनी चदरिया का तुरंत ही स्मरण होता है। इन उपन्यासों की लाखों प्रतियां अब तक बिक चुकीं। आज भी लोग इसे पढऩा पसंद करते हैं। इसलिए कि इसकी भाषा बहुत ही सहज व सरल है। वहीं नामवर सिंह की किताब दूसरी परंपरा की खोज आलोचना जैसे सूखे विषय के बावजूद भाषायी प्रवाह के  कारण पढ़ी जाती है। रवींद्र कालिया की संस्मरणात्मक  पुस्तक  गालिब छुटी शराब खूब पढ़ी गई। जबकि काशीनाथ सिंह की काशी का अस्सी कम नहीं पढ़ी गई। लेकिन अस्सी में तत्सम अधिक पढऩे को मिला। वहीं गालिब....में ठेठ हिंदुस्तानी का लहजा परवान चढ़ा। इस शब्द पर अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध याद आए। उन्होंने किसी के कहने पर उपन्यास लिखा था, ठेठ हिंदी का ठाट। जिसमें हिंदी के ठाठ को बरकरार रखने का प्रयास किया गया था। लेकिन हरिऔध जी खुद ही असमंजस में थे।  30-3-1899 में उपन्यास की भूमिका में वह लिखते हैं, लखनऊ के प्रसिद्ध कवि इंशा अल्लाह खां की बनाई कहानी ठेठ हिंदी है। जो मेरा यह विचार ठीक है, और मैं भूलता नहीं हूँ, तो कहा जा सकता है कि मेरा ठेठ हिंदी का ठाट नामक  यह उपन्यास ठेठ हिंदी का दूसरा ग्रन्थ है।.........
भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की बनाई हिंदी भाषा नाम की पुस्तिका है, उसमें जो उन्होंने नंबर 3 की शुद्ध हिंदी का नमूना दिया है, वही ठेठ हिंदी है। शुद्ध और ठेठ शब्द का अर्थ लगभग एक ही है। वह नमूना यह है:

पर मेरे प्रीतम अब तक घर न आये, क्या उस देश में बरसात नहीं होती, या किसी सौत के फंदे में पड़ गये, कि इधर की सुध ही भूल गये। कहां तो वह प्यार की बातें कहां एक संग ऐसा भूल जाना कि चिट्ठी  भी न भिजवाना, हा! मैं कहां जाऊं कैसी करूं, मेरी तो ऐसी कोई मुंहबोली, सहेली भी नहीं कि उससे दुखड़ा रो सुनाऊं, कुछ इधर-उधर की बातों ही से जी बहलाऊं ।

इन कतिपय पंक्तियों पर दृष्टि देने से जान पड़ता है कि जितने शब्द इन में आये हैं, वह सब प्राय: अपभ्रंश संस्कृत शब्द हैं, प्रीतम शब्द भी शुद्ध संस्कृत शब्द प्रियतम का अपभ्रंश है। विदेशी भाषा का कोई शब्द वाक्य भर में नहीं है, हां! कि शब्द फारसी है, जो इस वाक्य में आ गया है, पर यह किसी विवाद के सम्मुख न उपस्थित होने के कारण, असावधानी से प्रयुक्त हो गया है।

करीब डेढ़ सौ साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद ने लेख लिखा था, हिंदी नई चाल में ढली । उसका चलना आज भी जारी है। रहना भी चाहिए।



हिंदी दिवस पर 14 सितम्बर 2012,  भास्कर के विशेष अंक में संपादित अंश प्रकाशित
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रविवार, 24 जून 2012

क़लम की मजदूरी करने वाला निपनिया का किसान उर्फ़ अरुण प्रकाश



हर फ़िक्र को धुएं में उडाता चला गया....




























सैयद शहरोज़ क़मर की क़लम से

सितम्बर की कोई तारीख. साल २००८.रायपुर को मैं अलविदा कर चुका था. देशबंधु के प्रबंधन से ऊब थी, वहीँ दिल्ली आकर कुछ अलग कर गुजरने का ज्वार रह-रह कर उबल रहा था. 'भासा' के राजेश व उसके साथियो की तरह दिल्ली अपन भी फतह करना चाहते थे. दोपहर ढल आई थी. पंडित जी (कथादेश के संपादक हरिनारायण जी) कनाट प्लेस के दफ्तर गए थे. उनके एक अफसर मित्र की पत्नी ज्योतिष की पत्रिका निकालती थीं. जिसका दफ्तर एक बड़ी इमारत में था. वहीँ कथादेश को एक कोना नसीब हो गया था. दोपहर बाद पंडित जी वहीँ चले जाते. पन्त जी (लक्ष्मी प्रसाद पन्त , सम्प्रति भास्कर जयपुर में सम्पादक) ने कथादेश को बाय कर दिया था. विश्वनाथ त्रिपाठी की बदौलत मार्फ़त विष्णु चन्द्र शर्मा  जी उनकी जगह मैंने ले ली थी. खैर! दस्तक हुई दरवाज़े पर!  दिलशाद गार्डेन का सूना पहर. मैंने झांकर देखा. लहीम शहीम एक शख्स  बाहर खडा है. सरों पर हलकी सुफैदी ..बदन पर लंबा सा कुर्ता और पाजामा. भदेस सज्जन जान मैंने दरवाज़ा खोला. नमस्कार किया. शाइस्तगी  से लबरेज़ जवाब पाकर मेरी झुर-झुरी कम हुई.
आप नए आये हैं..
जी.....
कहाँ के हैं...
बिहार..
वहाँ कहाँ के..
..गया.
..अरे वाह! मैं बेगुसराय का एक किसान हूँ. कलम की मजदूरी करता हूँ.
 इस मासूमियत पर कौन न मर मिटे! हिचकते हुए नाम पूछ बैठा...अरुण प्रकाश! सुनते ही मैं खिल उठा. उनकी कुछ कहानियां,  उन जैसे ही किरदारों का कोलाज़ झिलमिलाने लगा. इस अनूठे लेखक से यह हमारा पहला साबका था. बाद में लोगों से उनके आत्मकेंद्रित रहने, बहुत कम खुलने.. की बात मैं आज तक नहीं हज़म कर पाया..उनकी अपनी सी लगती कहानियों का मैं दीवाना तो पहले से ही था. पहली मुलाक़ात ने लव इन फर्स्ट साईट सा जादुई असर किया था. जिसका यथार्थ मेरे लिए कभी कटु न रहा.

पहले अरुण जी, फिर भाई साहब उन्हें कहने लगा.वो कब मेरे भैया बन गए मुझे पता ही न चला. दिल्ली के इस दूसरे प्रवास में करीब दस बारह सालों तक कंक्रीट के जंगलों में मुझे बेतहाशा गुज़ारने पड़े. कभी कहीं ठौर मिली. कहीं चाँद गोद में भी आया. इस अवधि में अरुण जी से मिलना कई बार हुआ. महेश दर्पण जी के बाद मैंने उन्हें सबसे ज्यादा श्रम करते देखा. मुझे लगता है कि वह संभवत चार से पांच घंटे ही विश्राम ले पाते होंगे. सुबह उठ कर टहलने निकल जाते. इस प्रात:भ्रमण में उनके साथ रहते विश्वनाथ त्रिपाठी जी. युवा व्यंग्यकार रवींद्र पाण्डेय, उन्हीं की तरह दूसरे मसिजीवी रमेश आज़ाद आदि. सूरज के ज़रा परदे से निकल आते ही उनका घर आना होता. फिर हलके नाश्ते के बाद जो अपनी स्टडी( तब बालकोनी को ही घेर कर उन्होंने अपना अध्ययन कक्ष बना लिया था) में जाते. फिर लिखना,  लिखना और लिखना. कागजों पर जो उतरता जाता. उसमें किसी अहम किताब का अनुवाद होता. किसी सीरयल की पटकथा होती. संवाद होता..या नई कहानी का पुनर्लेखन.

ग़ज़ल का तगज्जुल

ग़ज़ल गो रामनारायण स्वामी( तब वो अन्क़ा नहीं हुए थे) के पहले ग़ज़ल संग्रह रौशनी की धुंध की चर्चा के लिए सादतपुर में महफ़िल जमी.  वीरेंद्र जी (जैन) के यहाँ हुई उस दोपहरी गोष्ठी में  स्वामी जी की गजलों पर आधार आलेख मैंने ही पढ़ा. सादतपुर के लेखकों के अलावा अरूण जी, जानकी प्रसाद जी, इंडिया टुडे वाले अशोक जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद, कुबेर जी आदि ढेरों लोग थे. लेकिन अरुण जी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने कहा, ग़ज़ल पर यदि शहरोज़ जी न कहते तो उसकी तगज्जुल न रहती. या खुदा! इतने बड़े बड़े दक्काक के रहते इन्हें क्या हुआ..जबकि हिंदी समाज में उर्दू के प्रमाणिक शख्स जानकी जी मौजूद हैं. अरूण जी ने जिस सहजता से मेरी बातों को सराहा, असहमति भी जतलाई. ऐसे लोग मुझे दिल्ली में कम ही मिले. बमुश्किल दो-चार नाम ऐसे स्मरण में हैं. सर्दी की एक दोपहर हम सभी कृषक जी की छत पर जमा हुए. यहाँ भी दिलशाद से अरूण जी, विश्वनाथ जी, रमेश आज़ाद पहुंचे.  मेरी 'अकाल और बच्ची' कविता उन्होंने दो बार सुनी. इस कविता में अकाल के इलाके से रोज़गार की तलाश में परिवार दिल्ली आया है. उस परिवार की बच्ची के बचपन को मैंने शब्द देने की कोशिश  की है. ये अकारण नहीं हुआ होगा. दिल्ली हो, कोलकता या मुंबई उनके साथ उनका गाँव निपनिया हर दम साथ रहा. उनकी कहानियों में भी यह ज़मीनी सोंधापन मिलता है. हिंदी में ऐसे कथाकार आज़ादी के बाद कम हुए,  जिन्होंने हाशिये के लोगों को अपना केंद्र बनाया हो. उनकी अधिकाँश कथाओं में घर से बेघर नयी जगह में आसरा तलाश करते लोगों की ज़िंदगी को उन्वान मिला है. भैया एक्सप्रेस हो, या मझदार,विषम राग हो या नहान, भासा आदि कहानियां गौरतलब हैं.

शेरघाटी पर उपन्यास लिखो
कथादेश के पहले युवांक में मेरी पहली कहानी 'पेंडोलम' छपी. मैं राजकमल में था. उनका फोन आया.
यार! कहानी भी लिखते हो..बताया ही नहीं कभी! 
जी..भैया ..
दूसरी लिखो तो बताना. यूँ इस कहानी को विस्तार दो. आप (तुम कहते कहते वो आप बोल जाते..) अपने घर- कस्बे शेरघाटी को केंद्र में रख कर एक उपन्यास प्लान कीजिये. मुस्लिम जीवन अब हिन्दी में न के बराबर आ रहे हैं. आपसे उम्मीदें हैं.
जी! कोशिश करूँगा..
लेकिन ग़म-ए-रोज़गार ने इतनी मोहलत ही न दी कि मैं उपन्यास कलम बंद करता. यूँ उन्होंने एक-दो बार याद भी कराया, 'शहरोज़ जी क्या हुआ..कुछ बात बनी.' मेरे नफी में सर हिलाने पर थोडा तुनक भी जाते..'पहचान सिर्फ एक कहानी से नहीं बनती..'

गया गया मिल गया
प्रेमचंद जी की जयन्ती पर हंस द्वारा सामयिक विषय पर कई सालों से गंभीर विमर्श का आयोजन होता आया है. राजेन्द्र जी जिसके कर्ताधर्ता हों, उस मजमे में भीड़ न जुटे. मैं उन दिनों रमणिका जी की पत्रिका युद्धरत आम आदमी से जुड़ा हुआ था. वहाँ से निकलते निकलते थोड़ा विलम्ब हो गया. जैसे ही राजेन्द्र भवन पहुंचा. संजय सहाय पर नज़र पडी तो मैं उधर ही लपक गया. उन्होंने दोनों हाथ फैला दिए. और हम यूँ मिले जैसे बिछुड़े हुए हों. मुद्दत बाद मिलना भी हो रहा था.
'गया गया मिल गया!' जानी पहचानी आवाज़ से हम अलग हुए. अरुण जी पास मुस्कुरा रहे थे. उनकी यही मुस्कान दूसरों की ज़िंदगी बख्शती रही. उनकी जीवटता से हम उर्जस्वित होते रहे. बाद में उनसे बहुत कम मिलना हुआ. दिनों बाद फोन पर बात हुई. लेकिन उन्होंने एहसास ही न होने दिया की वो बेहद अस्वस्थ हैं. जबकि गौरीनाथ से उनकी दिनों दिन बदतर होती तबियत का मुझे इल्म हो गया था.आज ढेरों कह रहे हैं कि काश  सिगरेट छूट जाती तो शायद उनकी उम्र ....



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