बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
महिला दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महिला दिवस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 9 मार्च 2015

पहली ड्रीम गर्ल की सुरमई यादें

भारतीय सिनेमा की अग्रणी  नायिका देविका रानी 

चित्र: गूगल बाबा के सौजन्य से





 









सैयद एस.तौहीद की क़लम से 

देविका रानी (जन्म: 30 मार्च, 1908 निधन: 8 मार्च, 1994) का शुमार भारतीय सिनेमा की अग्रणी नायिकाओं के तौर पर होता है। बीस के दशक में रिलीज एक द्विभाषी फिल्म  से सिनेमा का रुख़ किया था। उसे उस समय के जाने-माने निर्माता हिमांशु राय ने एक विदेशी कंपनी  के साथ मिलकर बनाई थी। उस समय देविका लंदन में कला की शिक्षा ले रही थी। देविका की हिमांशु से पहली मुलाकात वहीं हुई। देविका का सिनेमा रुझान देखते हुए हिमांशु ने उन्हें काम करने का न्योता दिया। देविका ने उस फिल्म में मंच सज्जा की। किंतु उन्हें नामों की सूचि में नहीं स्थान मिला। इसके बाद दोनों एक साथ जर्मनी में एक तकनीकी प्रशिक्षण लेने गए। उस दौरान देविका ने अभिनय-वेशभूषा-मेक अप आदि को मन लगा कर सीखा। देविका-हिमांशु में बेहतरीन तालमेल हुआ करता था। दोनों ने फिल्म निर्माण को समर्पित एक टीम बनाई। जिसके बाद ‘कर्म’ का निर्माण हुआ।

कर्म से बॉम्बे टॉकीज़ तक 
देविका-हिमांशु ने इसमें लीड भूमिकाएं अदा की थी। फिल्म को समकालीन आलोचकों ने काफी महत्त्व दिया। ब्रिटेन के समाचार पत्रों में उसकी बेहतरीन समीक्षाएं लिखी गयीं। फिल्म की कामयाबी ने दोनों को आपसी रिश्ते मजबूत करने का बेहतरीन अवसर दिया। इस समझ से दोनों का विवाह  बेहतरीन निर्णय रहा। स्वदेश वापसी के उपरांत इस जोडी ने ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सफल स्थापना की। इस ख्वाब को शायद उन्होंने जर्मनी में देखा होगा। देविका इस फिल्म कंपनी का चेहरा बनी जबकि इसकी संचालन का कार्यभार हिमांशु राय के जिम्मे था। जिस किस्म से देविका की जिंदगी चल रही थी, उस प्रकाश में उनका सिनेमा में आना महज तक़दीर का खेल कहा जा सकता है। ब्रिटेन में कला व संगीत की शिक्षा लेने वाली युवती का फिल्मकार हिमांशु राय से मुलाकात होना संयोग था। हिमांशु को देविका की प्रतिभा को नवाजते हुए फिल्मों में काम करने का आफर दिया। दोनों ने एक साथ फिल्में की। पहली फिल्म ‘कर्म’ रिलीज हो जाने बाद वो स्वदेश चले आए थे।
आप जब भी मुंबई के नाना चौक पर आएं तो बॉम्बे टॉकीज़ का इतिहास झांकता मिलेगा। जहां कभी विशाल स्टुडियो प्रांगण हुआ करता था, वहां गगनचुंबी बहुमंजिला इमारतें खडी हैं। इसके मुहाने पर पुरानी-बेकार गाडियों का अंबार एक गराज की शक्ल अख्तियार कर चुका है। एक नायिका के रूप में देविका रानी का नाम हांलाकि कभी बहुत मशहूर हुआ करता था, फिर भी उस समय के निशान आज नहीं मिलते। जानता हूं कि किसी ने भुलाने  नहीं दिया, लेकिन वो फिर भी यादों के कारवां से बाहर रहीं। एक कडवा घूंट जिसे बीते जमाने के कलाकारों को ना चाहते हुए पीना पडा है। भूले-बिसरे लोगों के नाम किसी पुरस्कारों के माध्यम से मिला करते हैं।  देविका रानी का किस्सा इससे जुदा नहीं था।

‘अछूत कन्या’ का असर जब पड़ा लड़कियों पर 
सिनेमा के बदलते तेवर ने उन्हें इससे अलग होने को बाध्य किया था। भारतीय सिनेमा की प्रथम नायिकाओं में शुमार देविका के संन्यास को पदमश्री व दादासाहेब फाल्के पुरस्कारों ने कुछ समय के लिए जरूर तोडा, लेकिन सिनेमा की दुनिया में महज हवा के झोंके थे। उनके योगदान को मुड़कर देखें तो सिनेमा को एक कला का सम्मान अता करने को भुलाया नहीं जा सकता। फिल्मों को एलिट लोगों में लोकप्रिय बनाने की महान क्षमता भी उनमें थी। भारतीय सिनेमा के पुराने चलन में बदलाव इस मायने में भी आया कि देविका के बाद कथित सम्मानित परिवारों की लड़कियां फिल्मों में आने लगी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की करीबी रिश्तेदार व भारत के प्रथम सर्जन जनरल की बेटी का फिल्मों में आना क्रांतिकारी था । एक तरह से अछूत दुनिया को उन्होंने अपनाया था।  स्टुडियो की पहली फिल्म के बाद  देविका के सह-अभिनेता नजमुल हसन को बाहर होना पड़ा। बॉम्बे टॉकीज़ की अगली महत्वकांक्षी फिल्म ‘अछूत कन्या’ के लिए उपयुक्त अभिनेता की तालाश अशोक कुमार पर जाकर ठहरी।  सामाजिक असमानता-जातिवाद-प्रेम तत्वों को समेटे यह फिल्म भारतीय सिनेमा में गुणवत्ता की मिसाल थी। ऊंचे जाति के युवा का दलित युवती से प्रेम की कहानी थी। उस जमाने में इस किस्म की फिल्में बिल्कुल नहीं बनती थी।  सामाजिक विसंगतियों के ऊपर गंभीर व आवश्यक विमर्श शुरू  हो गया था। कहा जा सकता है कि फ़िल्म अपने समय से आगे थी। सिनेमा के सफर में मील का पत्थर। भारतीय नारी की स्थिति को दर्शाने वाली फिल्मों का सफर देविका ने जारी रखा। इस दरम्यान जीवन प्रभात-निर्मला-दुर्गा का निर्माण हुआ।
 
दलित युवती व  ब्राह्मण युवक का प्रेम कस्तुरी-प्रताप
बॉम्बे टॉकीज़ को शोहरत की बुलंदियों तक लाने के लिए ‘अछूत कन्या’ की सराहना करनी होगी। सामाजिक विसंगतियों पर चोट करनी वाली इस फिल्म बरसों पुरानी होकर भी प्रासंगिक है। फिल्म को सरस्वती देवी के गानों से भी ख्याति मिली। परंपरा के मुताबिक देविका-अशोक कुमार ने गीतों को आवाज दी। दलित युवती की स्मृति में स्थापित मंदिर का यहां साहसी प्रसंग आया था। फ्लैशबेक माध्यम से उस लड़की की कहानी को बताया गया। दलित किशोरी कस्तुरी (देविका रानी) ब्राह्मण किशोर प्रताप (अशोक कुमार) जातिवादी पूर्वाग्रहों
से दूर एक साथ गीत गाते रहते हैं।  शायद इसलिए भी क्योंकि प्रताप व कस्तुरी के पिता आपस में दोस्त थे। कस्तुरी के पिता दुखिया ने कभी मोहन (प्रताप के पिता) की जान बचाई थी। वे दोस्ती के ऊपर जातिगत मानसिकताओं को तिलांजलि  देकर जी रहे थे। कस्तुरी-प्रताप में भी एक दूसरे को लेकर प्रेम का भाव है। लेकिन क्या जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रसित समाज इस ‘पाप’ को स्वीकार करेगा? पूरे समाज में केवल दुखिया तथा मोहन को इन किशोरों की चिंता थी। लेकिन उन्हें समाज का समर्थन नहीं मिलने वाला था। दलित युवती
से बेटे की नजदिकियां मां को स्वीकार नहीं। कस्तुरी के उदार माता-पिता जातिवादी भेदभाव से दुखी होकर भी असहाय हैं। उधर प्रताप का रिश्ता अपनी ही जाति की मीरा से तय हो जाता है। 
प्रताप-कस्तुरी को धर्म के ठेकेदारों ने अलग करने की कसम खा रखी थी। इसी दरम्यान सख्त रूप से बीमार दुखिया को इलाज खातिर अपने घर लाने की गलती मोहन बाबू से हो गयी। क्या ऊंची जाति का कुनबा इसे सहन करेगा? मोहन बाबू को मारपीट कर घर में आग लगा दी जाती है। भलमनसाहत वाले लोग दोनों को किसी तरह वहां से बचा लेते हैं। मामले की जांच के लिए पुलिस गांव पहुंचती है। क्या पुलिस दोषियों को सजा देगी? एक मुश्किल बात थी। प्रताप- मीरा का रिश्ता एक बेमेल परिणाम निकला। दूसरा कस्तुरी में संभावना तलाश रहा था। कस्तुरी का रिश्ता तय हो गया। क्या प्रताप कस्तुरी व खुद को इस भंवर से निकाल सकेगा? वो कस्तुरी को साथ गांव छोड देने का प्रस्ताव देता है। पीडा देखिए कि प्रताप व कस्तुरी जैसे प्रेम कहानियों का आगे सुखद समापन हो…वर्त्तमान कुरबान हो गया। कस्तुरी का त्याग प्रताप में भी अपने वर्त्तमान (मीरा) को अपना लेने का भाव डाल गया। क्या कस्तुरी-प्रताप का त्याग जातिगत विषमताओं को समाप्त कर सका? जवाब हम सबको पता है।

चुंबन, हिमांशु और ग्लोबल सिनेमा
देविका रानी की एक अन्य फिल्म ‘कर्म’ की प्रशंसा में तब के एक नामी अखबार ने लिखा कि फिल्म भारतीय सिनेमा के परंपरा में मील का पत्थर होगी। भारतीय सिनेमा को क्षमताओं को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास। एक चुंबन एवं उससे उपजे चिरकालिक विवाद के अलावा फिल्म में बहुत कुछ था। यह द्विभाषी प्रस्तुति  अंग्रेजी व हिन्दी में रिलीज हुई थी। एक नायिका के तौर पर देविका की पहली फिल्म थी। हिमांशु राय ने कर्म के बाद अभिनय को छोड निर्माण में विशेषता बना ली। हिमांशु राय के सिलसिले में फिल्म को दुर्लभ भी कहा जा सकता है। आज के ग्लोबल सिनेमा में जहां अंतर-सांस्कृतिक एवं अंतराष्ट्रीय पैमाने की फिल्में बन रही, ऐसे वक्त में तीस दशक की ओर मुडकर देखना लाजिमी हो जाता है।  बीता जमाना आज को चुनौती देता दिखाई देता है। शांतिनिकेतन व ब्रिटेन में तालीम हासिल करने वाले हिमांशु हमारे सिनेमा को विश्व स्तर पर ले जाने का नेक मकसद ले कर चल रहे थे। इसकी कामयाबी ‘कर्म’ में फलीभूत हुई। निर्माण के ज्यादतर पहलू तकनीकी रूप से संपन्न विदेशी तकनीशियन देख रहे थे। मेहनत के फल को आप बेहतरीन समीक्षाओं में देख सकते हैं। समकालीन भारतीय परिवेश से प्रेरित होकर भी विश्व स्तर की अपील वाली एक फिल्म बनी थी। महलों व महाराजाओं में भारत की विलासिता झलक रही थी। राज पाठ की भव्यता के बीच एक प्रेम कहानी को आकार दिया गया।
कर्म में आस्था को इसका मर्म रखा गया, एशियाई लोगों के लिए यह आकर्षण का बिंदु बना। हालांकि हिमांशु स्वदेश में फिल्म सफल होगी? को लेकर घबराए हुए थे। बांबे में रिलीज होकर दिल्ली व मद्रास में भी लगी। फिल्म को सकारात्मक अपनत्व मिला। फिर भी ब्रिटेन की तुलना में यह कम था। हमने फिल्म की कहानी को पसंद किया। दो राजसी घरानों के वारिसों के बीच उभरते प्यार की दास्तान यह थी। लंदन व भारत में फिल्मायी गयी इस फिल्म में भारतीय राजाओं व उनके भव्य महलों की छटा देखने को मिली थी। भारतीय रेल व केंद्रीय प्रचार संस्था फिर राजसी  राज्यों व उन पावन मंदिरों के संचालकों को धन्यवाद कहना चाहिए।

जीवन की जीत में विश्वास बनाने वाली दास्तान
समकालीन भारतीय परिवेश से प्रेरित होकर भी विश्व स्तर की अपील वाली एक फिल्म बनी थी। महलों व महाराजओं में भारत की विलासिता झलक रही थी। राज पाठ की भव्यता के बीच एक प्रेम कहानी को आकार दिया गया। कर्म में आस्था को इसका मर्म रखा गया, एशियाई लोगों के लिए यह आकर्षण का बिंदु बना। हालांकि हिमांशु स्वदेश में फिल्म सफल होगी? को लेकर घबराए हुए थे। बांबे में रिलीज होकर दिल्ली व मद्रास में भी लगी। फिल्म को सकारात्मक अपनत्व मिला। फिर भी ब्रिटेन की तुलना में यह कम था। हमने फिल्म की कहानी को पसंद किया। दो राजशी घरानों के वारिसों के बीच उभरते प्यार की दास्तान यह थी। लंदन व भारत में फिल्मायी गयी इस फिल्म में भारतीय राजाओं व उनके भव्य महलों की छटा देखने को मिली थी। भारतीय रेल व केंद्रीय प्रचार संस्था फिर राजशी राज्यों व उन पावन मंदिरों के संचालकों को धन्यवाद कहना
चाहिए। सीतापुर की राजकुमारी ( देविका रानी) व जयनगर के राजकुमार (हिमांशु राय) की प्रेम कहानी में धर्म-आस्था-आखेट का रोचक तत्व शामिल था। सांप-सपेरों की रुचिकर दुनिया को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया। सांप के जहर से मृत्यु की रेखा पर पहुंचे राजकुमार को बचाने वाली राजकुमारी की कहानी। प्रेम व आस्था तथा जीवन की जीत में विश्वास बनाने वाली दास्तान।
एक संपन्न बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाली देविका का आज के विशाखापटनम से गहरा नाता था। वो इसी शहर के एक बंगाली परिवार से थी। देविका का जन्म एमएन चौधरी व लीला जी के परिवार में हुआ थ। स्कूल की पढाई पूरी होने बाद संगीत व रंगमंच की शिक्षा लेने ब्रिटेन के नामी रंगमंच एकेडमी ‘रंगमंच की रायल अकादमी’ एवं ‘संगीत की रायल अकादमी’ में दाखिला लिया। फिर आगे जाकर वास्तुकला व डिजायनिंग की भी तालीम हासिल की। इ्सी दरम्यान उनकी मुलाकात पटकथा लेखक निरंजन पाल से हुई। निरंजन ने देविका के लिए बहुत सी फिल्मों की पटकथाएं लिखीं। बांबे टाकीज के महान स्वपन को निरंजन पाल व फिल्मकार फ्रांज ओस्टेन के योगदानों ने भी पूरा किया। हिमांशु-देविका की इस कंपनी ने हिन्दी सिनेमा को इन दोनों के अतिरिक्त अशोक कुमार-मधुबाला-दिलीप कुमार सरीखा कलाकार दिया। हिमांशु राय के निधन उपरांत बांबे टाकीज के मालिकाना हक़ की लडाई को बडे हिम्मत से लडा। फिर भी फिल्मिस्तान के उदय को रोक नहीं सकी। समय के साथ बांबे टाकीज का नाम इतिहास के पन्नों तक सिमट गया। यही वो वक्त था जब पेंटर स्वेतलाव रोरिक़ उनकी जिंदगी में आए। सिनेमा से दूरी बनने लगी …क्योंकि शायद जीवन की प्राथमिकताएं बदल चुकी थी।  वो बंबई को छोड पति के शहर बेंगलोर आ गयी, बाक़ी जिंदगी वो यहीं रही।


(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 2 अक्टूबर 1983 को पटना (बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।
संपर्क : passion4pearl@gmail.com )

सैयद एस. तौहीद को  हमज़बान पर पढ़ें
read more...

शनिवार, 7 मार्च 2015

कब मिलेगा मुस्लिम औरतों को उनका हक़

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष













ज़ुलेख़ा जबीं की क़लम से


करीब 50 बरस पहले सारी दुनिया की औरतों ने जुल्म के खिलाफ और अपने हक हासिल करने की लड़ाई लड़ने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन की बुनियाद रखी. खवातीन के इस आंदोलन को ताकत मिली संयुक्त राष्ट्र के 1979 के कन्वेंशन फार एलीमिनेशन आफ डिस्क्रीमिनेशन अगेंस्ट वुमेन से. कंवेंशन में शामिल बहुत सारे मुल्कों ने इसे स्वीकार किया. उनसब की रजामंदी से कंवेंशन के बाद एक कमेटी बनाई गई-कमेटी फार एलीमिनेशन आफ डिस्क्रीमिनेशन अगेंस्ट वुमेन-सीडाॅअ. सीडाॅअ की मीटिंग साल में दो बार होती है यह जायजा लेने के लिए कि जिन मुल्कों ने कंवेंशन को रजामंदी दी है वे सब अपने देश में औरतों पे होने वाली जुल्मो ज़्यादती को रोकने के लिए और उनका,  उनके जाएज़ हक़ दिलवाने के लिए क्या कोशिशें कर रहे हैं. ज़ाहिर है इस अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन का गहरा असर दुनिया के दूसरे मुस्लिम मुल्कों और ख़़ासतौर पर मुस्लिम औरतों पे पड़ना ही था. ऐसे बहुत सारे मुसलमान जो अपने समाज में बदलाव चाहते हैं, जिनका मानना है कि मुस्लिम औरतों को पीछे रखने और उनके हक न देने के नतीजे में मुस्लिम समाज को बड़ा नुक़सान पहुंचा है-बड़ी तादाद में हैं.  ऐसे लोगों का यह भी मानना रहा है कि मुस्लिम औरतों की तरक़़्क़़ी के बग़़ैर पूरे मुस्लिम समाज की तरक़्क़ी नामुमकिन है जो सच भी है. आज ऐसी सोच रखनेवाले उलेमा, इस्लामिक स्कालर और बुद्धिजीवी दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं.
ग़ौरतलब है कि तरक़्क़ी करते हिंदोस्तानी समाज में सामाजिक ग़़ैर बराबरी की खाई चैड़ी होने के साथ ही, औरतों के साथ की जाने वाली जुल्मो-ज़्यादतियों में भी बढ़ोत्तरी होती जा रही है. आज बड़े पैमाने पर मुस्लिम समाज का पिछड़ापन दिखाई दे रहा है. जहां एक तरफ़ दुनिया लगातार तरक्क़ी की तरफ बढ़ रही है, नित नई टेक्नालाजी सामने आ रही है वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समाज बेतालीमी, बेरोज़गारी, झुग्गियों व गंदी बस्तियों (घेटोवाइजेशन) में रहने की वजह से गरीबी की ग़लाज़त में जीने को मजबूर हैं. यही नहीं देश और दुनिया में बढ़ रही आतंकी घटनाओं के मद्देनजर न सिर्फ मुसलमानों को मश्कूक निगाहों से देखा जा रहा है बल्कि सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक तौर पे मुस्लिम समाज ग़ैर महफूज़ भी होता जा रहा है. इस ग़ैर महफूज़ और सहमे हुए समाज की औरतों और बच्चियों की हालत जानवरों से भी बदतर दिखाई देती है.

औरतों की बराबरी की बात करने वाले अक्सर ये सवाल उठाते हैं क्या इस्लाम के दायरे में रहते हुए मुस्लिम औरतों को बराबर का हक़ मिलना मुमकिन है? इस बारे में मुसलमानों के बीच 3 तरह की सोच देखने को मिलती है. पहली सोच उन उलेमाओं की है जिनका दावा है कि इस्लाम दुनिया का पहला मज़हब है जिसने औरतों को इंसानी अधिकार दिए हैं. आज अगर इसमें कोई कमी नज़र आ रही है तो उसके लिए इस्लाम नहीं बल्कि मुसलमान ज़िम्मेदार हैं. दूसरी सोच कहती है कि इस्लाम में औरतों को बराबरी का अधिकार मिलना नामुमकिन है. ऐसी सोच रखने वाले मानते हैं कि औरतों को बराबरी का अधिकर सिर्फ सेक्यूलर-डेमोक्रेटिक समाज में ही मिल सकता है. इन सबके बीच एक तीसरी समझवाले भी हैं जिनका मानना है कि इस्लाम के बुनियादी उसूलों और सेक्यूलर-डेमोक्रेसी के बुनियादी उसूलों में कोई आपसी टकराव नहीं है. ऐसी सोच रखने वालों का मानना है कि इस्लाम की बुनियादी तालीम औरतों और मर्दो को बराबरी का हक़ देती है. दिक्क़त इस्लामी मज़हब में नहीं बल्कि मर्दवादी भारतीय सामाजिक व्यवस्था में रचे बसे उन लोगों की समझ में है जिन्होंने देश की भौगोलिक परंपराओं और रुढ़ियों को इस्लाम का लिबास पहना रखा है. तीसरी सोच रखने वाले मुसलमानों का मानना है कि आज ज़रुरत इस बात की है कि मुसलमान इन रवायती, औरत विरोधी ज़हनियत (मानसिकता) को ठुकराकर क़ुरआन और सुन्नत की उस तालीम को अपना लें जो औरतों को बराबरी के हक़ देने की हिमायत करती है.

कुरआन और सही हदीस में औरतों को पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, कानूनी, नागरिक और मज़हबी नेतृत्व के मामलों में जिस तरह बेहतर दर्जा दिया गया है वो दुनिया के किसी और मज़हबी किताब में लिखित तौर पर दिखलाई नहीं पड़ता. मगर अफसोस आज मुस्लिम औरतों को हर तरह के पिछड़ेपन का चैतरफा दबाव झेलने के साथ ही घरेलू, हिंसा, झगड़े, मारपीट, छेडखानी, अपनों के जरिए किए जा रहे बलात्कार, शौहर के एक से ज़्यादा औरतों के साथ रिश्ते, ज़बरदस्ती घर बिठा देने के डर के अलावा हर वक्त 3 तलाक़ की लटकती धारदार तलवार और कई तरह के ज़हनी व जिस्मानी ज़ुल्मों का शिकार होना पड़ रहा है. अत्तलाक़ो मर्रतान ‘‘तलाक सिर्फ 2 मर्तबा है’’ कहकर कुरआन ने एक बार में 3 तलाक़ कहने वाले अरबियों के महिला विरोधी रिवाज को सिरे से खारिज कर दिया है. साथ ही मुसलमान मर्दो के दो बार तलाक कहने में (एक-एक माह के अंतराल पे) सुलह और समझौते (रुजूअ) की राह भी फराहम कर दी गई है. लेकिन एकतरफा 3 तलाक का ग़ैर इस्लामी चलन इस्लाम के नाम पर आज भी भारतीय मुस्लिम समाज में क़ायम रखा गया है. जिसका ख़मियाज़ा ज्यादातर बेक़सूर औरतें और मासूम बच्चे भुगतने को मजबूर हैं. बिना किसी जायज़ वजह के एक से ज़्यादा निकाह (मर्दो द्वारा), मामूली सी बातों पे औरतों को ज़लील करके मायके बिठा देना, मायके वालों को मज़ा चखाने के नाम पे औरतों को तलाक़ न देकर अधर में लटकाए रखना, जरा सी बात पे 3 तलाक़ कहकर घरों से बाहर खदेड़ देना, बुढ़ापे में पहुंचते तक भी बीवी का मेहर अदा न करना, शौहर के जनाज़े पर ज़बरदस्ती मेहर माफ़ करवाना, किसी भी तरह का नान-नफ़्क़ा (भरणपोषण) अदा किए बग़ैर टेलीफोन,एस.एम.एस. और डाक से तलाक़ बोल/लिखकर भेज देना इस जैसी और भी न जाने कितनी ग़ैर इस्लामी, ग़ैर इंसानी रवायतें और रुढियां मुस्लिम मर्दो ने अपना ली है जिसका कुरआन, सही हदीसों और इस्लाम से दूर का वास्ता नहीं है. इनका ख़कतरनाक पहलू तब सामने आता है जब मर्दों की ऐसी ग़ैर कुरआनी, ग़ैर इंसानी करतूतों को कुछ कम इल्म लोग जायज़ ठहराते हैं और कुरआनो दीन के जानकार लोग छोटे-छोटे सियासी मफ़ाद (राजनीतिक स्वार्थ) की ख़ातिर अपनी ज़ुबान बंद रखते हैं.

इस्लाम में औरतों को इंसानी वजूद तस्लीम किया गया है इसीलिए कुरआन में कई जगहों पर उसकी ज़िंदगी के हर-हर पड़ाव में उसके वक़ार (डिग्नटी) का ख़्याल रखा गया है. वलाक़द करमना बिल्लज़ी बनी आदमा ’’हमने आदम की हर औलाद पे बराबर से करम बख़्शी है’’’’कह कर अल्लाह ने हर मुसलमान को दुनियां से बेटी और बेटे का भेद ख़त्म कर, बराबरी से, अच्छी परवरिश और जायदाद में वारिस बनाने का हुक्म दिया है. वलाहुन्ना मिसलुल लज़ी अलैहिन्ना ‘‘औरतों का वही हक़ है मर्दो पर जो मर्दो का दस्तूर के मुताबिक अपनी औरतों पर है’’ कहकर शादीशुदा ज़िंदगी के अंदर औरत के बराबरी के हक़ों की हिफ़ाज़त मर्दो के सुपुर्द कर दी गई है. पैदा होते ही बाप की जायदाद में हक़, निकाह के साथ ही शौहर की तरफ से मेहर, पारिवारिक ज़िंदगी में शौहर की तरफ से दिया जाने वाला हाथ खर्च (पाकेट मनी-माहवार एक मुश्त जो सहुलियत हो), उसके नवजात बच्चे को अपना दूध पिलाने पर हस्बे हैसीयत कीमती गिफ्ट देना, तलाक़ हो जाने पर नान-नफ़्क़ा (भरण-पोषण)व हैसियत के मुताबिक़ मताअ ( संपत्ति-पूंजी ) देकर ससम्मान रुख़्सत करना और फिर औरत को दूसरा निकाह (उसकी मर्ज़ी से) करने की आज़ादी देना जैसे हुक्म साफ़ लफ़्ज़ों में कुरआन के अंदर मर्दो को दिए गए हैं.

एक मुसलमान औरत जिसे उसके रब ने 1400 बरस पहले ही तमाम तरह के सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, राजनैतिक मामलों में बराबरी से नेतृत्वकारी मक़ाम और फ़ैसले लेने का हक़ देकर मर्द के साथ ही अशरफुल मख़लूक़ात (श्रेष्ठ मानुस)का दर्जा दे दिया है. वे ही मुसलमान औरतें आज इस मर्दवादी, गैर इस्लामी समाज की सड़ी-गली रूढ़ियों और परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ी, हर लेहाज़ से बेबस, माज़ूर, मजबूर (दीगर कौम की औरतें जो इंसानी हकूक से भी महरुम हैं-से भी) और बदतर नजर आ रही हैं. कुरआन में मौजूदा दौर और हालात के मुताबिक़ ग़ौरोफ़िक्र (विचारमंथन) के लिए काफ़ी गुंजाइश दी गई है. कुरआन की नजर में औरतें अछूत या दोयम दर्जे की वस्तु नहीं हैं- यहां औरतों के इंसानी वजूद को न सिर्फ तस्लीम किया गया
है बल्कि उनकी खुद्दारी, बावक़ार शख़्सियत और मानवीय अधिकारों के हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी उनके रिश्तेदार मर्दो (कुरआन में लिखित तौर पे) के सुपुर्द कर दी गई है. जो रहती दुनिया तक टलने वाली नहीं है.


ज़रुरत इस बात की है कि मुसलमान औरतें अपने घरों में रखी हुई उस किताबे हिदाया (राह दिखाने वाली) कुरआन को समझने और जानने की कोशिश करें कि उसमें लिख दिए गए उसके हक़ कौन और क्यों छीन रहा है? साथ ही कुरआन और सही हदीसों की रौशनी में अपने हक़ हासिल करें क्योंकि कुरआन उनके परिवार के जिम्मेदार मर्दो को साफ तौर पर हुक्म दे रहा है-‘‘जो कुछ उनका है उन्हें खुशी-खुशी दे दिया करो.’’ इसलिए भारतीय मुस्लिम औरतों की जिम्मेदारियां अब बढ़ गई है. उन्हें बहैसियत एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक अपने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, नागरिक, धार्मिक और मानवीय हक़ों को जानना होगा, पहचानना होगा और उन्हें संरक्षित करने के लिए सरकारों और अपने रिश्तेदार मर्दों को जगाना होगा. इसके लिए उन्हें संगठित होकर आगे बढ़ना होगा. महिला दिवस का यही अज़्म भी है और पैग़ाम भी.  क्योंकि-खुद बदल जाएगा सब ये सोचना बेकार है-सबकुछ बदल देने की अब शुरुआत करनी चाहिए....!

(लेखिका-परिचय:
जन्म :9 अगस्त 1977, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में
शिक्षा : अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा पत्रकारिता व जनसंचार में उपाधि
सृजन : मानवाधिकार पर प्रचुर लेखन-प्रकाशन, देशबंधु में कुछ वर्षों नियमित रिपोर्टिंग, कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित
संप्रति :  दिल्ली में रहकर कई प्रमुख महिला संगठनों में सक्रिय और स्वतंत्र लेखन
संपर्क : Jabi.Zulaikha@gmail.com)



लेखिका के और लेख  हमज़बान पर
read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)