बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
ज़ुलेख़ा जबीं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज़ुलेख़ा जबीं लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 7 मार्च 2015

कब मिलेगा मुस्लिम औरतों को उनका हक़

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष













ज़ुलेख़ा जबीं की क़लम से


करीब 50 बरस पहले सारी दुनिया की औरतों ने जुल्म के खिलाफ और अपने हक हासिल करने की लड़ाई लड़ने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन की बुनियाद रखी. खवातीन के इस आंदोलन को ताकत मिली संयुक्त राष्ट्र के 1979 के कन्वेंशन फार एलीमिनेशन आफ डिस्क्रीमिनेशन अगेंस्ट वुमेन से. कंवेंशन में शामिल बहुत सारे मुल्कों ने इसे स्वीकार किया. उनसब की रजामंदी से कंवेंशन के बाद एक कमेटी बनाई गई-कमेटी फार एलीमिनेशन आफ डिस्क्रीमिनेशन अगेंस्ट वुमेन-सीडाॅअ. सीडाॅअ की मीटिंग साल में दो बार होती है यह जायजा लेने के लिए कि जिन मुल्कों ने कंवेंशन को रजामंदी दी है वे सब अपने देश में औरतों पे होने वाली जुल्मो ज़्यादती को रोकने के लिए और उनका,  उनके जाएज़ हक़ दिलवाने के लिए क्या कोशिशें कर रहे हैं. ज़ाहिर है इस अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन का गहरा असर दुनिया के दूसरे मुस्लिम मुल्कों और ख़़ासतौर पर मुस्लिम औरतों पे पड़ना ही था. ऐसे बहुत सारे मुसलमान जो अपने समाज में बदलाव चाहते हैं, जिनका मानना है कि मुस्लिम औरतों को पीछे रखने और उनके हक न देने के नतीजे में मुस्लिम समाज को बड़ा नुक़सान पहुंचा है-बड़ी तादाद में हैं.  ऐसे लोगों का यह भी मानना रहा है कि मुस्लिम औरतों की तरक़़्क़़ी के बग़़ैर पूरे मुस्लिम समाज की तरक़्क़ी नामुमकिन है जो सच भी है. आज ऐसी सोच रखनेवाले उलेमा, इस्लामिक स्कालर और बुद्धिजीवी दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं.
ग़ौरतलब है कि तरक़्क़ी करते हिंदोस्तानी समाज में सामाजिक ग़़ैर बराबरी की खाई चैड़ी होने के साथ ही, औरतों के साथ की जाने वाली जुल्मो-ज़्यादतियों में भी बढ़ोत्तरी होती जा रही है. आज बड़े पैमाने पर मुस्लिम समाज का पिछड़ापन दिखाई दे रहा है. जहां एक तरफ़ दुनिया लगातार तरक्क़ी की तरफ बढ़ रही है, नित नई टेक्नालाजी सामने आ रही है वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समाज बेतालीमी, बेरोज़गारी, झुग्गियों व गंदी बस्तियों (घेटोवाइजेशन) में रहने की वजह से गरीबी की ग़लाज़त में जीने को मजबूर हैं. यही नहीं देश और दुनिया में बढ़ रही आतंकी घटनाओं के मद्देनजर न सिर्फ मुसलमानों को मश्कूक निगाहों से देखा जा रहा है बल्कि सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक तौर पे मुस्लिम समाज ग़ैर महफूज़ भी होता जा रहा है. इस ग़ैर महफूज़ और सहमे हुए समाज की औरतों और बच्चियों की हालत जानवरों से भी बदतर दिखाई देती है.

औरतों की बराबरी की बात करने वाले अक्सर ये सवाल उठाते हैं क्या इस्लाम के दायरे में रहते हुए मुस्लिम औरतों को बराबर का हक़ मिलना मुमकिन है? इस बारे में मुसलमानों के बीच 3 तरह की सोच देखने को मिलती है. पहली सोच उन उलेमाओं की है जिनका दावा है कि इस्लाम दुनिया का पहला मज़हब है जिसने औरतों को इंसानी अधिकार दिए हैं. आज अगर इसमें कोई कमी नज़र आ रही है तो उसके लिए इस्लाम नहीं बल्कि मुसलमान ज़िम्मेदार हैं. दूसरी सोच कहती है कि इस्लाम में औरतों को बराबरी का अधिकार मिलना नामुमकिन है. ऐसी सोच रखने वाले मानते हैं कि औरतों को बराबरी का अधिकर सिर्फ सेक्यूलर-डेमोक्रेटिक समाज में ही मिल सकता है. इन सबके बीच एक तीसरी समझवाले भी हैं जिनका मानना है कि इस्लाम के बुनियादी उसूलों और सेक्यूलर-डेमोक्रेसी के बुनियादी उसूलों में कोई आपसी टकराव नहीं है. ऐसी सोच रखने वालों का मानना है कि इस्लाम की बुनियादी तालीम औरतों और मर्दो को बराबरी का हक़ देती है. दिक्क़त इस्लामी मज़हब में नहीं बल्कि मर्दवादी भारतीय सामाजिक व्यवस्था में रचे बसे उन लोगों की समझ में है जिन्होंने देश की भौगोलिक परंपराओं और रुढ़ियों को इस्लाम का लिबास पहना रखा है. तीसरी सोच रखने वाले मुसलमानों का मानना है कि आज ज़रुरत इस बात की है कि मुसलमान इन रवायती, औरत विरोधी ज़हनियत (मानसिकता) को ठुकराकर क़ुरआन और सुन्नत की उस तालीम को अपना लें जो औरतों को बराबरी के हक़ देने की हिमायत करती है.

कुरआन और सही हदीस में औरतों को पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, कानूनी, नागरिक और मज़हबी नेतृत्व के मामलों में जिस तरह बेहतर दर्जा दिया गया है वो दुनिया के किसी और मज़हबी किताब में लिखित तौर पर दिखलाई नहीं पड़ता. मगर अफसोस आज मुस्लिम औरतों को हर तरह के पिछड़ेपन का चैतरफा दबाव झेलने के साथ ही घरेलू, हिंसा, झगड़े, मारपीट, छेडखानी, अपनों के जरिए किए जा रहे बलात्कार, शौहर के एक से ज़्यादा औरतों के साथ रिश्ते, ज़बरदस्ती घर बिठा देने के डर के अलावा हर वक्त 3 तलाक़ की लटकती धारदार तलवार और कई तरह के ज़हनी व जिस्मानी ज़ुल्मों का शिकार होना पड़ रहा है. अत्तलाक़ो मर्रतान ‘‘तलाक सिर्फ 2 मर्तबा है’’ कहकर कुरआन ने एक बार में 3 तलाक़ कहने वाले अरबियों के महिला विरोधी रिवाज को सिरे से खारिज कर दिया है. साथ ही मुसलमान मर्दो के दो बार तलाक कहने में (एक-एक माह के अंतराल पे) सुलह और समझौते (रुजूअ) की राह भी फराहम कर दी गई है. लेकिन एकतरफा 3 तलाक का ग़ैर इस्लामी चलन इस्लाम के नाम पर आज भी भारतीय मुस्लिम समाज में क़ायम रखा गया है. जिसका ख़मियाज़ा ज्यादातर बेक़सूर औरतें और मासूम बच्चे भुगतने को मजबूर हैं. बिना किसी जायज़ वजह के एक से ज़्यादा निकाह (मर्दो द्वारा), मामूली सी बातों पे औरतों को ज़लील करके मायके बिठा देना, मायके वालों को मज़ा चखाने के नाम पे औरतों को तलाक़ न देकर अधर में लटकाए रखना, जरा सी बात पे 3 तलाक़ कहकर घरों से बाहर खदेड़ देना, बुढ़ापे में पहुंचते तक भी बीवी का मेहर अदा न करना, शौहर के जनाज़े पर ज़बरदस्ती मेहर माफ़ करवाना, किसी भी तरह का नान-नफ़्क़ा (भरणपोषण) अदा किए बग़ैर टेलीफोन,एस.एम.एस. और डाक से तलाक़ बोल/लिखकर भेज देना इस जैसी और भी न जाने कितनी ग़ैर इस्लामी, ग़ैर इंसानी रवायतें और रुढियां मुस्लिम मर्दो ने अपना ली है जिसका कुरआन, सही हदीसों और इस्लाम से दूर का वास्ता नहीं है. इनका ख़कतरनाक पहलू तब सामने आता है जब मर्दों की ऐसी ग़ैर कुरआनी, ग़ैर इंसानी करतूतों को कुछ कम इल्म लोग जायज़ ठहराते हैं और कुरआनो दीन के जानकार लोग छोटे-छोटे सियासी मफ़ाद (राजनीतिक स्वार्थ) की ख़ातिर अपनी ज़ुबान बंद रखते हैं.

इस्लाम में औरतों को इंसानी वजूद तस्लीम किया गया है इसीलिए कुरआन में कई जगहों पर उसकी ज़िंदगी के हर-हर पड़ाव में उसके वक़ार (डिग्नटी) का ख़्याल रखा गया है. वलाक़द करमना बिल्लज़ी बनी आदमा ’’हमने आदम की हर औलाद पे बराबर से करम बख़्शी है’’’’कह कर अल्लाह ने हर मुसलमान को दुनियां से बेटी और बेटे का भेद ख़त्म कर, बराबरी से, अच्छी परवरिश और जायदाद में वारिस बनाने का हुक्म दिया है. वलाहुन्ना मिसलुल लज़ी अलैहिन्ना ‘‘औरतों का वही हक़ है मर्दो पर जो मर्दो का दस्तूर के मुताबिक अपनी औरतों पर है’’ कहकर शादीशुदा ज़िंदगी के अंदर औरत के बराबरी के हक़ों की हिफ़ाज़त मर्दो के सुपुर्द कर दी गई है. पैदा होते ही बाप की जायदाद में हक़, निकाह के साथ ही शौहर की तरफ से मेहर, पारिवारिक ज़िंदगी में शौहर की तरफ से दिया जाने वाला हाथ खर्च (पाकेट मनी-माहवार एक मुश्त जो सहुलियत हो), उसके नवजात बच्चे को अपना दूध पिलाने पर हस्बे हैसीयत कीमती गिफ्ट देना, तलाक़ हो जाने पर नान-नफ़्क़ा (भरण-पोषण)व हैसियत के मुताबिक़ मताअ ( संपत्ति-पूंजी ) देकर ससम्मान रुख़्सत करना और फिर औरत को दूसरा निकाह (उसकी मर्ज़ी से) करने की आज़ादी देना जैसे हुक्म साफ़ लफ़्ज़ों में कुरआन के अंदर मर्दो को दिए गए हैं.

एक मुसलमान औरत जिसे उसके रब ने 1400 बरस पहले ही तमाम तरह के सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, राजनैतिक मामलों में बराबरी से नेतृत्वकारी मक़ाम और फ़ैसले लेने का हक़ देकर मर्द के साथ ही अशरफुल मख़लूक़ात (श्रेष्ठ मानुस)का दर्जा दे दिया है. वे ही मुसलमान औरतें आज इस मर्दवादी, गैर इस्लामी समाज की सड़ी-गली रूढ़ियों और परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ी, हर लेहाज़ से बेबस, माज़ूर, मजबूर (दीगर कौम की औरतें जो इंसानी हकूक से भी महरुम हैं-से भी) और बदतर नजर आ रही हैं. कुरआन में मौजूदा दौर और हालात के मुताबिक़ ग़ौरोफ़िक्र (विचारमंथन) के लिए काफ़ी गुंजाइश दी गई है. कुरआन की नजर में औरतें अछूत या दोयम दर्जे की वस्तु नहीं हैं- यहां औरतों के इंसानी वजूद को न सिर्फ तस्लीम किया गया
है बल्कि उनकी खुद्दारी, बावक़ार शख़्सियत और मानवीय अधिकारों के हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी उनके रिश्तेदार मर्दो (कुरआन में लिखित तौर पे) के सुपुर्द कर दी गई है. जो रहती दुनिया तक टलने वाली नहीं है.


ज़रुरत इस बात की है कि मुसलमान औरतें अपने घरों में रखी हुई उस किताबे हिदाया (राह दिखाने वाली) कुरआन को समझने और जानने की कोशिश करें कि उसमें लिख दिए गए उसके हक़ कौन और क्यों छीन रहा है? साथ ही कुरआन और सही हदीसों की रौशनी में अपने हक़ हासिल करें क्योंकि कुरआन उनके परिवार के जिम्मेदार मर्दो को साफ तौर पर हुक्म दे रहा है-‘‘जो कुछ उनका है उन्हें खुशी-खुशी दे दिया करो.’’ इसलिए भारतीय मुस्लिम औरतों की जिम्मेदारियां अब बढ़ गई है. उन्हें बहैसियत एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक अपने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, नागरिक, धार्मिक और मानवीय हक़ों को जानना होगा, पहचानना होगा और उन्हें संरक्षित करने के लिए सरकारों और अपने रिश्तेदार मर्दों को जगाना होगा. इसके लिए उन्हें संगठित होकर आगे बढ़ना होगा. महिला दिवस का यही अज़्म भी है और पैग़ाम भी.  क्योंकि-खुद बदल जाएगा सब ये सोचना बेकार है-सबकुछ बदल देने की अब शुरुआत करनी चाहिए....!

(लेखिका-परिचय:
जन्म :9 अगस्त 1977, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में
शिक्षा : अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा पत्रकारिता व जनसंचार में उपाधि
सृजन : मानवाधिकार पर प्रचुर लेखन-प्रकाशन, देशबंधु में कुछ वर्षों नियमित रिपोर्टिंग, कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित
संप्रति :  दिल्ली में रहकर कई प्रमुख महिला संगठनों में सक्रिय और स्वतंत्र लेखन
संपर्क : Jabi.Zulaikha@gmail.com)



लेखिका के और लेख  हमज़बान पर
read more...

बुधवार, 14 मई 2014

असग़र अली इंजीनियर के बिन एक बरस



गैर बराबरी के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा





 
















ज़ुलेख़ा जबीं की क़लम से


हमारा संघर्ष यही होना चाहिए कि दुनिया में सामाजिक न्याय हो, भेदभाव खत्म हो, सबके साथ इंसाफ हो, सबकी जरूरतें पूरी हों. और हमें इस लड़ााई को लड़ते रहना है, सभी के साथ मिलकर, लगातार. ऐसा नहीं कि मैं सिर्फ इस्लाम के नाम पर लडूं, आप सिर्फ हिंदू धर्म के नाम पर लडें़, कोई बौद्ध धर्म के नाम पर लड़े, नहीं।  हम सबको साथ आना चाहिए. क्योंकि हम, आप और बाक़ी बहुत सारे यही कह रहे हैं कि सामाजिक न्याय हो, बराबरी हो, गैर बराबरी खत्म हो, जो इस गैर बराबरी को बढ़ावा देने वाले हैं उन सभी के खिलाफ हमें एकजुट होकर लड़ना होगा. यही देश भक्ति है और सबसे बड़ी इबादत भी.
                                                                                     डॉ. असग़र अली इंजीनियर

दुनिया में कट््टरपन के खिलाफ सदभावना के लिए, मजहबी नफरत के खिलाफ अमन के लिए, सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ बहनापे और भाईचारे के लिए, सामाजिक अन्याय के खिलाफ इंसाफ के लिए आजीवन संघर्षरत डॉ. असग़र अली इंजीनियर को गुज़रे 14 मई को एक बरस हो गए . मगर इंसानी समाज में इंसानियत की स्थापना के लिए, मोहब्बत की जो मशाल उन्होंने जलाई है,  वो रहती दुनिया तक क़ायम और रौशन रहेगी. हर तरह के कटटरपन और सामंतवाद के खिलाफ  उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की है. अपनी कलम के जरिए, शिक्षण और प्रशिक्षण के जरिए, सभाओं, गोष्ठियों, सेमीनार, कार्यशालाओं के जरिए, आम जनता के नजदीक पहुंचने के हर संभव तरीकों और माध्यमों का इस्तेमाल वे अपने आखिरी दम तक करते रहे हैं.

जातिवादी नफरत के खिलाफ उनकी कलम की धार पीड़ितों के पक्ष में हमेशा तेज रही. डॉ. असग़र  हिंदोस्तानी गंगा-जमनी तहज़ीब, संप्रभुता और विविधता में एकता के जबरदस्त हामी रहे हैं. वे हमेशा कहा करते थे “बेशक आस्था जरूरी है मगर जब आस्था अंध विश्वास की शक्ल ओढ़ लेती है तब वह इंसानी समाज के लिए खतरनाक हो जाती है.” और यहीं से शुरू होती है वो जंग जिसका रास्ता और तरीक़ा असगर अली इंजीनियर ने हम सबको दिखाया  है.

सेंटर फार स्टडी आफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के प्रख्यात विदवान डॉ. असग़र अली इंजीनियर की पहचान मजहबी कटटरवाद के खिलाफ लगातार लड़ने वाले योद्धा के तौर पे मानी जाती रहेगी. उनका मानना था कि दुनियां में जहां पर भी इस्लाम के मानने वालों पर जुल्म हुआ है, वहां के लोग लड़ाई के लिए उठ खडे हुए हैं. वे मानते हैं कि
'कट्टरपंथ मजहब से नहीं सोसायटी से पैदा होता है'.  उनकी राय में 'भारतीय मुसलमान इसीलिए अतीतजीवी हैंे क्योंकि यहां के 90 फीसदी से ज्यादा मुसलमान पिछड़े हुए हैं और उनका सारा संघर्ष दो जून की रोटी के लिए है. इसलिए उनके भीतर भविष्य को लेकर कोई ललक नहीं है’. यही नहीं, हिंदू कट्टरपंथ की वजह बताते हुए वे कहते है कि 'जब दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों ने अपने हक मांगने शुरू किए तो ब्राहमणों को अपना पावर खतरे में नजर आया और उन्होंने मजहब का सहारा लिया, ताकि धर्म के नाम पर सबको साथ जोड़ लें, लेकिन ये सोच कामयाब होती नजर नहीं आ रही है.  इसलिए उनका कटटरपंथ और तेजी से बढता जा रहा है. ताकि वह जरूरी मुददों से लोगों का ध्यान हटाएं और हिंदू धर्म के नाम पर सबको एक करने की कोशिश करें. और यही इसकी बुनियादी वजह है’.
जब दुनिया में इस्लामी आतंकवाद का प्रोपेगंडा अपने चरम पे था, हमारे मुल्क के अंदर भी मुसलमानों को लेकर शक-ओ-शुबहा बढ़ने से बेगुनाहों पर सरकारी जुल्म बढने लगे और सांप्रदायिक दंगों में जानो माल का इकतरफा नुकसान, बेकुसूर नौजवानों की गिरफतारी, झूठे मुकदमे, फर्जी एनकाउंटर बढ़ने लगे, समाज में आपसी नफरत बढ़ने लगी और मुस्लिम समाज दहशत की वजह से खुद अपने में सिमटने लगा, और कुछ स्वार्थी राजनैतिक तत्वों के जरिए, सुनियोजित तरीके से फैलाई जा रही नफरत से निपटने के लिए, शिक्षण प्रशिक्षण के ज़रिए, समाज मेें समरसता, बहनापा, भाईचारा क़ायम करने डॉ. इंजीनियर ने आल इंडिया सेक्युलर फोरम (प्ैथ्) की शुरूआत की. जिसमें उनके अलावा देश की कई जानी पहचानी सेक्यूलर हस्तियां शामिल हुईं. इसके साथ ही देश में किए जा रहे सांप्रदायिक दंगों के पीछे की असलियत जानने के लिए उन्होंने खुद ही जांच दल गठित कर, घटनास्थलों में जाकर तफतीश की, रिपोर्ट तैयार की और संबंधित विभागों, राज्यपालों व केंद्र और राज्य सरकारों को सौंपी.

मुल्क में बढ़ती जा रही मजहबी कटटरता पे उनका स्पष्ट मानना रहा है कि कटटरपंथ मजहब से पैदा नहीं होता वह मौजूदा समाज से पैदा होता है. बडी बेतकल्लुफ़ी से वे बताते, आज से क़़़़रीब 70 बरस पहले देश में मुस्लिम लीग की मज़़़बूती के पीछे भी यही वजहें थीं. क्योंकि उस वक्त जो मुस्लिम एलीट वर्ग यूपी, बिहार वगैरह का था, उसको लगा कि आज़़़़़़़़़़ाद हिंदोस्तान में उसके हाथ से सत्ता निकल जाएगी . इसलिए वे मुस्लिम लीग में गए उन्हें लगा कि लीग उन्हें और उनके प्रभुत्व को बचा लेगी. और लीग ने पाकिस्तान बनवा डाला और यहां का एलीट क्लास ये सोचकर पाकिस्तान चला गया कि वहां उनका भविष्य महफूज़़़़ रहेगा. मगर वहां की हक़़़ीक़़त आज हमारे सामने है कि धार्मिक कटटरपंथ के एवज़ बने किसी देश का भविष्य कितना अंधकारमय होता है. यही हिंदू कटटरपंथियों के साथ हो रहा है. वे सोचते हैं कि अगर वे हिंदू धर्म का सहारा नहीं लेंगे तो ये दलित, पिछड़े, आदिवासी सब सत्ता में आ जाएंगे और इसीलिए इन सबको सत्ता के पावर से दूर रखने के लिए हिंदू धर्म की बात करते हैं. वे कटटरपंथ की बात मजहब का नाम लेकर करते हैं ताकि बहुसंख्यक जन उनके साथ जुड़ जाए.
डॉ. इंजीनियर लोकतंत्र में अटूट विश्वास रखने वालों में रहे हैं. वे कहते हैं 'चूंकि यहां लोकतंत्र है और दलित, पिछड़े भी इसे समझ रहे हैं कि वे लोकतांत्रिक तरीके से ही इसका मुकाबला कर सकते हैं. अगर आज लोकतंत्र न रहे और इस तरह की राजनीति बेखौफ बढती रहे तो वे सबको जेल में डाल देंगे, फांसी चढा देंगे, गोली मार देंगे, और फिर सब चुप हो जाएंगे तब तक के लिए, जबतक फिर से लोकतंत्र नहीं आ जाता..'
डॉ. इंजीनियर ने औरतों खासकर मुस्लिम औरतों के आर्थिक सामाजिक हालात सुधारने के लिए बहुत काम किया है. उन्होंने अपनी क़लम से मजहब के उन स्वयंभू ठेकेदारों के खिलाफ आवाज बुलंद की है जिन्होंने मुस्लिम औरतों के कुदरती, इंसानी हक़ मजहब के नाम पर दबा रखे हैं. इसके लिए उन्होंने  'क़ुरआन में औरतों के हक़’ नाम से एक किताब भी लिखी।  साथ ही इस विषय पे बाकायदा प्रशिक्षण शिविरों का भी आयोजन पूरे मुल्क में किया. डॉ. साहब चाहते थे कि मुस्लिम समुदाय में से ही उच्च शिक्षित खातून आगे बढ़ें और अरबी का ज्ञान हासिल करें ताकि क़ुरआन में दिए गए अपने हक़ूक़ मर्दवादी समाज से हासिल कर सकें. बतौर भाषा अरबी सीखने और सिखाने के लिए अंग्रेजी, उर्दूू और हिंदी का प्राइमर भी तैयार कर चुके थे और इसका इंतेजाम उन्होंने बांबे स्थित अपने आफिस में कर भी रखा था. ताकि बाहर से आई हुई कुछ चुनिंदा खातून इसमें महारत हासिल कर सकें. लेखिका को भी आपने अपनी मंशा से न सिर्फ अवगत कराया था बल्कि उनके पास रहकर अरबी की पढ़ाई पूरी करने का आफर भी दिया था. उनका ख्वाब था कि कुछ हिंदोस्तानी ख्वातीन सामाजिक न्याय, बराबरी और औरतों के हक़ुक़ से संबंधित कुरआन के रौशन पहलू को तर्जुमे के साथ आमजन तक पहुंचाने का जिम्मा उठाएं..

वे कहते हैं कि 'जब समाज हमेशा एक सा नहीं रह सकता बदल जाता है, तो उसके क़वानीन (क़ानून) एक से कैसे रहेंगे ? उन्हें भी समाज में होने वाले बदलाव के साथ बदलना ही होगा’. बेशक डॉ. इंजीनियर आज हमारे बीच नहीं रहे मगर इंसानी दुनिया से नफरत, गैर बराबरी और बेइंसाफी मिटाने के लिए, किए गए उनके तमाम काम और काविशों का बोलबाला कायम रखने के लिए, उनके छेडे़ गए जिहाद के बिगुल को सांस देेने की जरूरत है. यही डॉ.असग़र अली इंजीनियर को सच्ची ख़िराजे अक़ीदत (श्रद्धांजलि )होगी.



(लेखिका-परिचय:

जन्म:9 अगस्त 1977, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में

शिक्षा: अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा पत्रकारिता व जनसंचार में उपाधि

सृजन: मानवाधिकार पर प्रचुर लेखन-प्रकाशन, देशबंधु में कुछ वर्षों नियमित रिपोर्टिंग, कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित 

संप्रति: कई प्रमुख महिला संगठनों में सक्रिय और स्वतंत्र लेखन

संपर्क:Jabi.Zulaikha@gmail.com)



लेखिका का छत्तीसगढ़ पर लेख  हमज़बान पर ही

read more...
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)