बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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शुक्रवार, 2 मई 2014

न रह ख़ामोश ऐ औरत तू कुछ कहती तो अच्छा था



 









कल्याणी कबीर की क़लम से

क़लम  पहले  तो  मेरी  ही  ज़ुबानी  लिखना

क़लम  पहले  तो  मेरी  ही  ज़ुबानी  लिखना
फिर कभी और ज़माने  की  कहानी लिखना

जलन सीने  में अगर हो तो  आग लिख  देना
सुकून  दिल को मयस्सर हो तो पानी लिखना
.
जिसकी अस्मत को किया दाग़दार दुनिया ने
कफ़न मज़लूम का जैसा भी था धानी लिखना

आजमाईश में  मेरे ज़ब्त के चलेँ  खंज़र  
आज इसको भी वफ़ाओं की निशानी लिखना

 जिन्हें  रोटी की  तलब  थी, बारूद ले आये
राह भटकी कहाँ  जंगल में जवानी लिखना

बेबसी में जहाँ दम तोड़ रही उम्मीदें 
वहीं  आँखों में उजालों  की रवानी लिखना



2. 


मेरे अंदर की औरत डर न जाए कहीं
हौसलों से लिखा मज़मूं बदल न जाए कहीं 

परदे से सही पर बोलती तो हैं इस सरज़मीं की बुतें
राहों पे चीखता कारवाँ ठहर न जाए कहीं

कहाँ रुकते हैं रावण अब बड़ी होने तक सीता के
नन्हीं परियों के कानों तक खबर न जाये कहीं

ख्वाब देखना पर नींद से तुम प्यार मत करना
पहुँच के पाँव मंज़िल पर फिसल न जाए कहीं

बर्फ की सिल्लियों से हैं मेरे माँझी के गहरे ज़ख़्म
छुपा के रक्खा है एक दर्द , पिघल न जाए कहीं


3.

न रह खामोश ऐ औरत तू कुछ कहती तो अच्छा था
वतन के आधे नक़शे पे तू भी रहती तो अच्छा था

नहीं उम्मीद रख गैरों से तेरे अश्क़ पोछेंगे
तू अपने दर्द का मरहम खुद ही बनती तो अच्छा था

नज़र आती नहीं फ़सलें ज़मीं पे अब मुहब्बत की
तू बन के पावनी गंगा , यहाँ बहती तो अच्छा था

जो देते हैं सज़ा तुझको तेरे मासूम होने की
उनके शातिर गुनाहों को नहीं सहती तो अच्छा था

तुम्हें बाज़ार में बिकता खिलौना मानते हैं जो
ऐसे बीमार लोगों से नहीं डरती तो अच्छा था

अगर महफूज़ रखना है तुम्हें नामों-निशां अपना
थके-हारे हुए कदमों से भी चलती तो अच्छा था

4.

मेरी चूड़ी, मेरी बिंदी मेरी पहचान है साहिब
रहे आँचल सदा सर पे यही अरमान है साहिब

ना कह जंजीर तू इसको, ये है चाँदी की एक डोरी
मेरे पायल की रुनझुन पे, मुझे गुमान है साहिब

हमीं से जन्म लेते हैं जमीन पे रिश्तों के सरगम
मेरी ममता के आँचल मॆं शिशु का गान है साहिब

मिटा पाना नहीं आसां विदा कर के भी यादों को
अपने बाबुल की बगिया की हम ऐसी शान हैं साहिब

सभी सर को झुकाते हैं , सभी माता बुलाते हैं
वही दुर्गा , वही काली की हम संतान हैं साहिब

मेरे हाथों में है चाबी तुम्हारे दिल के ताले की
तुम्हारी नींद भी हम हैं , तुम्हारी जान हैं साहिब


5. मेरे हिस्से की थोड़ी सी ज़मीं

कब तक नहीं सीखोगे मेरे रुतबे का एहतराम करना
कब तक मेरी पहचान पर अपने नाम का मुहर लगाकर
लेते रहोगे मालिकाना हक़ सिरफिरे ज़मींदार की तरह

मत रौंदों हमारे ख्वाबों को अड़ियल घोड़े बनकर
कि दुखते हैं लब मेरे दर्द का बोझ ढ़ोते-ढ़ोते
मत भटको महज़ बदन की तंग गलियों के भूगोल में
मेरे ज़ज्बात के गणित को भी जरा गुनगुनाओ तुम
निकलो अब हवस की गंध युक्त झाड़ियों के जंगल से

लगाओ एक तुलसी इंसानियत के महक वाली
ताकि बदनाम न हो आदम और हव्वा का ये आदिम रिश्ता
मत मानो तुम हमें अपना मुकम्मल आसमाँ
पर दे दो मुझे मेरे हिस्से की थोड़ी सी ज़मीं
कि अब एक महफूज़ वतन में जीने को जी चाहता है


6. औरत का दिल पीर की कुटिया

धूप की बूँदें चुनकर-चुनकर
मैं चलती हूँ रूककर-गिरकर
ये जीवन है नदी की लहरें
बहती रहती छलछल-कलकल
औरत का दिल पीर की कुटिया
फेंको न तुम कंकड़-पत्थर
देते धोखा बनकर अपने
चलना उनसे बचकर-बचकर
उड़ने के हैं अपने खतरे
ज़मीं पे रहना डटकर-डटकर
जिन पन्नों में छिपे हैं आँसू
उनकी बातें मतकर, बंदकर

7. मेरा अस्त्तित्व


महज कुछ शब्दों की गठरी नहीं है
मेरा अस्त्तित्व
न ही ये हो हल्ला मचाने का एक जरिया भर है
ये है मेरी सोच का हस्ताक्षर
मेरे होने का प्रमाण -पत्र
मेरी जीवन राह् है ये, जो हलचल से नहीं डरती
न ही घबराती है अनवरत जगती रातों से
ये एक रोशनी है
जिसकी छांव मॆं सांस ले रही है सृष्टि सारी
मेरा वजूद मेरे गर्भ मॆं पल रहे शिशु की तरह है
जो पहचान है मेरे स्त्रीत्व की
और
जिसका जीवित रहना
मेरे जीवित रहने से भी ज्यादा जरूरी है

8. औरत ही नहीं गंगा भी हूँ

मैं तुम्हारे हिस्से की औरत ही नहीं गंगा भी हूँ
बैठो किनारे
बतियाओ मेरी छलछलाती लहरों से
रख दो मेरी सीप में अपने सारे ज़ख़्म
बदल दूँगी मैं जिन्हें मुस्कान की मोती में
पाओगे एक अहसास सुकून भरा
डूबोगे पूरे ईमान के साथ मेरे वजूद में


+++++++++++++++++++++

कवयित्री की और रचनाएं हमज़बान पर
       




(रचनाकार परिचय:
 जन्म: बिहार  के  मोकामा, बिहार में  ५ जनवरी  को जन्म
शिक्षा: रांची विश्विद्यालय से स्नातकोत्तर 
सृजन:   हिन्दुस्तान,  दैनिक जागरण,  दैनिक  भास्कऱ, प्रभात  खबर,  इस्पात मेल  आदि  में  रचनाएं। काव्य-संग्रह  गीली धूप  प्रकाशित 
संप्रति:  जमशेदपुर के एक स्कूल में  अध्यापिका के अलावा आकाशवाणी  में  आकस्मिक उद्घोषिका
ब्लॉग: kalyani@kabir
संपर्क: kalyani.kabir@gmail.com)


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गुरुवार, 6 जून 2013

राब्ता रखना ज़िंदगी के हर चेहरे से


 









कल्याणी कबीर की क़लम से

वो क़लम
जो उगलती है आग कागजों पे .
दिलाती है ये उम्मीद कि बाकी है इंसानियत
आतंक बोने वाले लकड़बग्घों पे चीखती है जो ,
देती है जवाब रज़िया के बदन पर फिसलती ओछी नज़र को .

वो कलम जो भूखी रहकर भी दूसरों की रोटी के लिए शोर करती है ,
वो कलम जो जंगलों में छिपी जिंदगियों में भोर करती है ,
जो घंटो जगा करती है , चला करती है
किसी पहरुए की तरह
उस कलम से
 प्यार है मुझे .


2. 

सोचती हूँ
और डरती हूँ
जब हौसलों के चेहरे पर पड़ जायेंगी झुर्रियाँ
मुझे रोटी के लिए तेरे दर की  तरफ देखना होगा
जब बुढापा रुलाएगा कदम दर कदम पे
तब महफूज़ छत की जरुरत होगी मेरी बूढी नींद को
गर दूंगी तेरे हाथों में दवाओं की कोई लिस्ट
तू भूल तो न जाएगा उन दवाओं को खरीदना
अभी तो चूमता है मुझको बेसबब घड़ी -घड़ी 
कहीं तरसेंगे तो नहीं हम तेरे हाथों की छुअन को
जाने कल के आईने में कैसे दिखेंगे हमारे रिश्ते
फिलवक्त तो यही सच है हमारे दरम्यान मेरे बच्चे.
'' मेरे जिस्म का टुकड़ा तू मेरी जान रहेगा
मेरे लिए हमेशा तू नादान रहेगा

 3. 


ज़िन्दगी के इशारों पर .
जब बजते हैं सितार दर्द के
तभी गुनगुनाती है ज़िन्दगी
खिलती है तभी वो एक गुलाब के मानिंद
जब घेरते हैं हालात नुकीले ख़ार की तरहI
आफताब बनकर चमकने से पहले ये ज़िन्दगी
हताशा की काली रात से गुजराती जरुर हैI
यह जलती है, तपती है धूप के झरने में हर रोज़
ताकि मुफलिसी में भी मुस्कुराती रहे किसी फ़क़ीर की तरह I
तभी तो ,,
राब्ता रखना ज़िन्दगी के हर चेहरे से मगर
मत झांकना कभी इसकी जादुई आँखों में I
मानकर इसे इस वक्त का सबसे बड़ा खुदा
जी लेना अपनी साँसें ज़िन्दगी के इशारों परI


(परिचय:
जन्म: ५ जनवरी को मोकामा ,बिहार में .
शिक्षा: स्नातकोत्तर रांची विश्वविद्यालय से, शोधार्थी - महाकाव्य विषय पर .
सृजन: स्थानीय साहित्यिक पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में रचनाएं प्रकाशित .
सम्प्रति: शिक्षिका .( जमशेदपुर )
जमशेदपुर आकाशवाणी में आकस्मिक उद्घोषिका
संपर्क:  kalyani.kabir@gmail.­com)



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मंगलवार, 21 मई 2013

कारखानों की प्यास बुझाते सूख गयीं जलथल नदियाँ














रश्‍मि शर्मा की क़लम से 


संदर्भ झारखंड उर्फ़ गाँव की गलियाँ 


नदि‍यां जीवनदायि‍नी हैं। हमारे अस्‍ति‍त्‍व की पहचान भी। सरकार कभी नदि‍यों को जोड़ने के फि‍राक में रहती है तो कभी बांटने के। नदि‍यों के बारे में मैं हाल का एक अपना नि‍जी अनुभव आप सबों को बताना चाहूंगी। परीक्षा के बाद हुई बच्‍चों की छ़ुटटि‍यां में मैं उन्‍हें अपने गांव लेकर गई....इस वादे के साथ कि‍ इस बार उन्‍हें अपने गांव की उस नदी में नहाने दूंगी, जि‍समें बचपन में मैं नहाया करती थी और उससे जुड़े सैकड़ों कि‍स्‍से उन्‍हें सुनाती थी। बच्‍चे उत्‍साहि‍त थे कि‍ कम से कम इस बार तो उन्‍हें गांव में नहाने का मौका मि‍लेगा। वादे के मुताबि‍क गांव पहुंचने के बाद मैं उन्‍हें अगले ही दि‍न नदी पर ले गई। यह क्‍या........जि‍स नदी से जुड़े अंतहीन कि‍स्‍से मेरी जेहन में कुलबुलाया करते थे...उसका तो कहीं अस्‍ति‍त्‍व ही नहीं बचा। मेरे गांव में फूलों से भरे-भरे पेड़ों के बीच छोटी-पतली सी, रम्‍य और साफ नदी बहती थी, जि‍से हम दोमुहानी नदी के नाम से जानते थे...उसका वजूद ही खत्‍म हो गया। उस नदी को बांध दि‍या गया है। और ऐसा बांधा गया कि‍  नदी अब नदी न लगकर ठहरे पानी की तरह हो गया था। जहां कलकल बहती साफ-स्‍वच्‍छ पानी  हुआ करता था....वह इतना गंदा नजर आ रहा था कि‍ मैंने बच्‍चों को उसे छूने की इजाजत भी नहीं दी। वह नदी जि‍सके पानी में मैं बचपन में घंटों छपाछप करती थी....खो गई।

बच्‍चे कहने लगे.....यही वो नदी है न मां..जहां तुम नहाया करती थी अपनी सहेलि‍यों के साथ....और छोटी-छोटी मछलि‍यां भी पकड़ा करती थी। कहां है कोई मछली...और छि:..इतने गंदे पानी से नहाती थी तुम...मैं नि‍रूतर हो गई। बड़ी मुश्‍कि‍ल से बच्‍चों को यकीन दि‍लाया कि.....हां ये वही नदी है, जि‍समें मैं तैरा करती थी....शाम को सखि‍यों संग ठंढी हवा का आनंद लेने के लि‍ए इसके कि‍नारे बैठा करती थी। अब तो...सब खत्‍म हो गया। बस उसका कि‍नारा वही है....जहां हम स्‍वच्‍छ हवा का आनंद ले सकते हैं क्‍योंकि‍ गांव का वातावरण उतना दूषि‍त नहीं हुआ है।
वाकई बहुत मलाल हुआ.....लगा..बचपन की खूबसूरत अनुभवों की कड़ी से एक कड़ी खत्‍म हो गई। उसे आज से जोड़कर देख पाना मुश्‍कि‍ल है। ऐसा नहीं कि‍ यह मेरे गांव के नदी की बात है। अब तो झारखंड की सभी नदि‍यां जहरीली होती जा रही है। स्वर्णरेखा, दामोदर, बराकर, करकरी, कोयल,अजय, कनहर, शंख  जैसी नदियां मृत होने की राह पर हैं। गर्मियों में तो यहां का पानी सूखने लगा है। लोग त्राहि‍माम करने लगते हैं। कई मील दूर जाकर पानी ढो कर लाना पड़ता है।  ऊपर से स्टील, पावर प्लांट और अन्य कारखानों की गंदगी को नदियों में छोड़ा जा रहा है। फलतः राज्य की सभी नदियां मृतप्राय होने पर हैं। नदियों के किनारे बालू निकालने के कारोबार ने तो नदियों की हालत और भी खराब कर दी है। लोग अंधाधुंध नदि‍यों को दोहन कर रहे हैं। कोई मात्रा तय नहीं कि‍ कि‍स नदी के कि‍नारे से कि‍तनी बालू ि‍नकाली जाए। फलस्‍वरूप नदि‍यां कटतीं जा रही है। जब पानी को रोककर, अपने अंदर समेटकर रखने वाले बालू ही नहीं बच रहे तो पानी का संचय कैसे होगा। उपर से जंगल का अस्‍ति‍त्‍व भी खतरे में हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। यहां तक ि‍क फोरलेन के नाम पर  अब तक प्राप्त सूचना के अनुसार 80,000 से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं। और कभी कटेंगे। बदले में पौधों का रोपण भी नहीं कि‍या जा रहा। बारि‍श के पानी के संचय की भी व्‍यवस्‍था सरकार नहीं कर पाई है अब तक।

 नदि‍यों में इतना प्रदूषण है कि‍ जि‍न नदि‍यों से पहले लोग पीने का पानी भी लाते थे.....अब नहाना भी कठि‍न हो गया है। और इसके कारण केवल हम है...हमारा स्‍वार्थ है। हमने नदि‍यों का उपयोग, उपभोग तो पूरा कि‍या..मगर न तो स्‍वच्‍छता का ख्‍याल रखा और न ही प्रदूषि‍त करने वाले हाथों को रोका। नदि‍यों में हर तरह के कूड़े-कचरे फेके जाते हैं। यहां तक कि‍ हम हिंदू लोग पूजा की वस्‍तुओं को भी नदी में प्रवाहि‍त करते हैं। यह भी तो गंदगी का ही रूप है। कल-कारखानों का कचरा सीधे नदी में गि‍रता है। 

जमशेदपुर इलाके के पानी का महत्वपूर्ण स्रोत सीतारामपुर बांध भी मिल के बिना उपचारित जल के बांध में जाने से प्रदूषित होता जा रहा है। झारखंड की उषा मार्टिन की स्टील निर्माण इकाई से फैलते प्रदूषण ने न केवल आसपास के निवासियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला है बल्कि समीपवर्ती कृषि भूमि को भी बंजर बना दिया है। उपर से कई जगह तो नदी के कि‍नारे ही बसेरा बनाकर उनका अस्‍ति‍त्‍व खत्‍म कि‍या जा रहा है। झारखंड की प्रमुख नदि‍यों...दामोदर और स्‍वर्णरेखा समेत छोटे-बड़े सभी तरह के नदी-नाले जहरीले हो गए हैं। उनमें आक्‍सीजन का स्‍तर शून्‍य हो चुका है।  फलत: जलजीवों का अस्‍ति‍त्‍व भी संकट में है। यहां तक कि‍ मछलि‍यां भी जहरीली हो रही हैं। इससे अप्रत्‍यक्ष रूप से मछुआरों की जीवि‍का पर भी असर पड़ रहा है और इसका सेवन काने वाले लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर भी। नदि‍यां भी अतिक्रमि‍त हो रही हैं। उन्‍हें कूड़ा-कचरा डालकर भरा जा रहा है। ऐसे तो कुछ वर्षों पश्‍चात उनकी पहचान ही गुम हो जाएगी। हालांकि‍ नदि‍यों को बचाने के लि‍ए स्‍थानीय स्‍तर पर प्रयास चल रहे हैं। मगर ये नाकाफी हैं। सरकार को और गंभीरता से इस पर वि‍चार करना चाहिए। झारखंड सरकार की प्रस्‍तावित जल नीति‍ में नदि‍यों के जल के इसतेमाल को लेकर मानक तय कि‍ए गए हैं। परंतु इसका सख्‍ती से अनुपालन नहीं कि‍या गया तो कोई खास परि‍णाम और सुधार  नजर नहीं आएंगे। और नदि‍यां इसी तरह मैली..जहरीली होती गई तो मानव अस्‍ति‍त्‍व को भी संकट में डाल सकती है।

ज्ञात रहे कि‍ नदि‍यां ही सभ्‍यता की पहचान होती है। इसलि‍ए हमारा दायि‍त्‍व है कि‍ हम नदि‍यों को प्रदूषि‍त होने से बचाएं। कारखानों के
कचरे के नि‍स्‍तारण के अन्‍य उपाय कि‍ए जाए न कि‍ उन्‍हें नदि‍यों में प्रवाहि‍त कि‍या जाए। जल संरक्षण कि‍या जाए। भूजल क्षरण और वनों की कटाई को रोकने का त्‍वरि‍त उपाय हो। ताकि‍ नदि‍यों का अस्‍ति‍त्‍व बरकरार और और आने वाली पीढ़ी सभी नदि‍यों का नाम सि‍र्फ पाठयपुस्‍तको में न देखे......वरन मौका मि‍लने पर उन्‍हें अपने आंखों से भी देखे।


(परिचय:
जन्म:2 अप्रैल, मेहसी थाना, मोतीहारी, बि‍हार में 

शिक्षा रांची वीमेंस कॉलेज से स्नातक, इतिहास में स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में स्नातक उपाधि  

लेखन की शुरूआत छात्र जीवन से ही। पत्रकारि‍ता  की तरफ रूझान स्‍नातक के दौरान । यह यात्रा प्रभात खबर से शुरू होते हुए कई पत्र-पत्रि‍काओं तक पहुंची डेढ़  दशक के दौरान नौकरी भी और स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता भी। साहि‍त्‍यि‍क पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों के लि‍ए लि‍खने-पढ़ने का सि‍लसि‍ला जारी ,अध्‍ययन और शोध में संलग्‍न। साथ ही इसी बीच रेडि‍यो व दूरदर्शन में सक्रि‍य भागेदारी, अति‍थि एवं उद़घोषि‍का दोनों रूपों में। 

सृजन: कवि‍ता संग आलेख का प्रकाशन देश के वि‍भि‍न्‍न अखबारों और पत्रि‍काओं  में।  समय-समय पर कवि‍ताओं का प्रसारण 
संप्रति:स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता एवं लेखन कार्य 
ब्लॉगजनवरी 2008 में रूप-अरूप  नाम से शुरू कि‍या 
संपर्कrashmiarashmi@gmail.com  ) 



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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

इवा का कुनबा यानी मुकम्मल भारत

सैयद एस क़मर की क़लम से

जमशेदपुर से लौटकर



जमशेदजी टाटा ने जब कोल्हान के  इस अनाम सी जगह में इस्पात काररखाने की  बुनियाद डाली तो हिदुस्तान के  कोने- कोने से लोग आये। बंगाली,मराठी,कन्नड़,तेलुगु,मलयाली,मुस्लिम,हिदू,सिख,ईसाई और पारसियों का कुनबा। रंग-बिरंगे फूलों की  चटख दूर तक  महसूस की  जाती थी। बीच में सन 54,79 और 92 में कुछ लोगों ने इस तेवर को  अवरुद्ध करने की  नाकाम कोशिशें की  ज़रूर लेकिन शहर की  गंगा-जमुनी स्प्रिट ने इस कुहासे को  चीर डाला। यह है टाटा शहर। लेकिन शहर में एक  घर ऐसा है,जिस गुलदस्ते में देश -विदेश के कई  खूबसूरत फूल सजे हैं। यहाँ सिर्फ टाटा ही नहीं मुकम्मल भारत बस्ता है। हम बात कर रहे हैं इवा बोयल उर्फ़ इवा शमीम के  कुनबे की ।


किस्सा गंगा-जमनी संस्कृति की  ताबीर का

यह किस्सा सिर्फ इवा का  नहीं है। किस्सा है मोहबबत का । किस्सा है कभी ना मिट सकने वाली गंगा-जमनी तहज़ीब का ,और सदियों पुरानी वसुधव कुटुम्बकम की  ताबीर का । आयरिश वंश की  ईसाई लड़की  पटना में मुंगेर के  रहने वाले एक  मुस्लिम डाक्टर  से दिल हार बैठती है। सातवें दशक की  शुरुआत  है। डॉ. मोहम्मद शमीम अहमद पटना मेडिकल कालेज में थे। इवा विमेंस कालेज में पढ़ती थी। चीन-भारत जंग हो चुकी  थी। लोगों से चंदे इ·ट्ठे किये जा रहे थे। इसी दरम्यान दो दर्दमंद खुशमिजाज की  मुलाकात होती है। और बकौल डॉ शमीम पहली नजऱ में...यानी वह इवा की  मेघा,तीक्ष्नता ,और खूबसूरती के  दीवाने हो जाते हैं। इवा की  कै फियत भी कुछ वैसी ही रहती है। सन 69 में टाटा आकर चर्च में शादी करने के  बाद दोनों निकाह कर लेते हैं।

डॉ शमीम की  बात पर एतबार न करने का  सवाल नहीं उठता। लेकिन तब समाज इतना गलोबल भी न था। इनहें विरोध का  सामना कम करना पड़ा। उनका तर्क  : इवा अहलेकिताब थी (यानी कुरआन  के  मुताबिक  बाइबल,तौरैत ,ज़ुबूर आदि आसमानी किताब के  माने वालों से शादी की  जा सकती है)। उनकी  मामी भी ईसाई थीं। कैथोलिक  परिवार की  इवा की  माँ काग्रेस के  आदि अध्यक्षों में से एक  सी बी बनर्जी के  परिवार से थीं। इवा की  बहन सिलि ने डॉ शमीम के  भाई डॉ नसीम से बयाह रचाया था। पांच बचचों को  जनम देने के  बाद दोनों का  एक  के  बाद एक  देहावसान हो गया। उनके  पांच बचचों के साथ इवा के  घर पर कुल आठ बचचों की  किलकारियां गूंजी। अब सभी पढ़-लिख चुके  हैं। कुनबे की  सद्भाव भरी परंपरा को  परवान चढ़ा रहे हैं।

अतिथी देवो भव: और गुमसुम लड़की

पुरलिया रोड स्थित जब हम उनके  घर पहुंचे। इवा हमें टैरेस  में ही खड़ी मिल गयीं। बिना समय लिए हमने दस्तक  दी थी। बावजूद उनहोंने बेहद गर्मजोशी के  साथ हमारा ख़ैर मकदम किया। भारत यानी अतिथि देवो भव: । ज़ीना चढ़ते हुए हम ग्रॉउंड फ्लोर पर पहुँच चुकु  थे। तेज़ी के  साथ वह आगे बढ़ चुकी  थीं। हम बेधड़क  एक  खुले दरवाज़े से कमरे में दाखिल हुए। एक  बचची के  संकेत पर। दूसरे कमरे से निली टीशर्ट धारी एक  गुमसुम लड़की  ने हमें दूसरे कमरे की  जानिब पहुंचाया। तस्वीर खींचने से पहले उसने चुन्नी ओढ़ ली थी। यह सालिहा है उनकी  छोटी बिटिया। डेंटिस्ट की  पढ़ाई कर  रही है। पति-पत्नी के  एकात के  बीच यही लड़की  सागर की  एक  बूंद है । हलचल संवाद की । इवा काग्रेस की  नेता हैं। चुनावी समर में भी जोर आश्माइश कर चुकी  हैं। खूब बतियाती हैं। अपनी मोहबबत,बचचों की  चुहल,उनके  अफ़साने,पारसियों की एकांतप्रियता। शहर, मुल्क के  समय, इतिहास और सन 64,79 और 92 की  खटास। विषय का  उनके  पास टोटा नहीं रहता।



वसुधैव कुटुंबकम

उनका  ब्रिटिश दामाद इस क्रिसमस पर टाटा आने वाला है। इस कुनबे की  निशात भी अपने पति के  साथ आयेगी। बेटा डॉ शकील ने सिख लड़की  डॉ ऋतू को  सहचरी चुना है। वहीं नियाज़ ने हिन्दू  मराठी लड़की  को संगिनी बनाया। एक  बहु बिहार के  दरभंगे की  है। मुस्लिम है। नितांत निजी इस सामाजिक  फैसले पर कहीं कोई खराश नहीं आयी। हाँ पड़ोसियों की  आँखें ज़रूर तरेरी हुयी दिखीं। पर इसका  असर गुलबुटों से लदबद इस कुनबे पर नहीं पड़ा। जबकि  आज इवा ने हज कर लिया है। बिहार के  एक  मुस्लिम संत की  शिष्या हैं। भारतीय इस्लाम के  बरेली मस्क की  समर्थक  हैं। जबकि  पति डॉ शमीम अहले हदीस के  पास -पास लगे।

परदे का  सवाल

परदे के  सवाल पर डॉ शमीम के  बोलते लब को  इवा ने रोक  दिया। कहने लगीं:हमारे चाहने के  बावजूद बचचे परदे को  नहीं मानते। परदे से इवा का  आशय कुरआन  में वर्णित  परदे से है। बुरका-नकाब से नहीं। नन सही ढंग से पर्दा करती हैं। भारत में भी परदे की  परम्परा रही है। उनहें बदलते समाज के  नए भोंडे फैशन से चिढ है। पाश्चात्य तौर-तरीके  हम भारतीयों के  लिए हर कहीं फिट नहीं हो सकते। बचचों की  आधुनिक जीवन शैली पर उन्होंने  तत्काल हस्तक्षेप करते हुए कहा:उनके  बचचे ड्रिंक  नहीं करते।



दंगा जो अब नासूर नहीं रहा

सन 79 के  दंगे की  स्मृतियाँ उनहें कचोटती ज़रूर हैं, लेकिन यह टीस नासूर सी नहीं है। जबकि  यह पति-पत्नी चश्मदीद रहे हैं। इसी इलाके  में रामनवीं जुलुस के  मार्ग को  ले·र दंगा फूट पड़ा था। उनके  घर पर ही पुलिस की  गोलियों के  शिकार कई लोग पहुंचे थे। जाते कहाँ ? डॉ शमीम का  घर कऱीब भी था और जाना-पहचाना । पांच लोगों ने इनके  कमरे में ही दम तोड़ दिया था। इवा ने कहा, इतना खून पहली और अंतिम बार देखा । उर्दू के  ख्यात प्रगतिशील लेखक  ज़कि  अनवर   साथियों के  साथ पास के  गांधी मैदान में शान्ति  के  लिए धरने पर बैठे थे। अपने ही घर में मार दिए गए। कुछ देर पहले उनहोंने पड़ोसी हिन्दू के   घर की  आग अपने कुए के  पानी से बुझाई थी। उसी कुए में उनकी  लाश कई दिनों बाद मिली। उनका  पोस्ट मार्टम डॉ शमीम ने ही किया। बेहद सहजता से बताते हैं, ज़कि साहब को  गहरी चोट लगी थी। लाठी,भाले और चाकू के निशान मिले थे।



गुमसुम लड़की  हुई मुखर; यह दंगा क्या होता है!

कोक की  चुसकियों  के  बीच जब हम चिप्स चुभला रहे थे कि  नब्ज़  पकडऩे की  कोशिशें हुईं। कभी जब शहर या देश में कहीं किसी संवेदनशील घटना की  आशंका  रहती या नौबत होती-होती, लोग घरों में राशन भर लिया करते थे। लेकिन अब जबकि  बरसों पुराने अयोध्या का  फैसला आने -आने को  है, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है। बचचे उसी तरह स्कूल  जा रहे हैं। काम पर जाने से पहले पत्नी उसी तरह उसे टिफिन सौंप रही है। खा लेने की  ताकीद के  साथ। ऐसा नहीं लगता कि  आज की  पीढ़ी के लिए दंगे -फसाद बेमानी हों चुके  हैं। हमलोगों की  बातें सुन रही सालिहा तुरंत मुखर होती है : यह दंगा क्या  होता है?यह पोलिटिकल खेल है। जिसे आज का  यंगस्टर जान और समझ चुका  है। फिजूल कामों के  लिए उसके  पास टाइम नहीं है। उसे पढऩा है। करियर बनाना है। आगे बढ़ना है।

चाहते हैं ज़िंदगी  शायराना

इस कुनबे में कोई शायर नहीं है। पर इनके  सलीके ,अंदाज़,पुरलुत्फ ज़िंदगी के  आदाब यही कहते हैं कि चाहते हैं ज़िंदगी  यह शायराना। न मज़हब की  दीवार, न ही जाति की  चौधराहट, न बोली-बानी की  भिनभिनाहट। अपनी स्वायत्ता में ठेठ डेमोक्रेटिक ।

(यह लेखन अयोध्या फैसले से ठीक एक दिन पहले का है.और भास्कर के  रांची संस्करण के पहले पेज पर फैसले के दिन छपा था  )
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सोमवार, 22 मार्च 2010

एक दंगे को याद करते हुए

इन दिनों भारत का ह्रदय प्रदेश कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में दंगों का मौसम है.लहलहाता हुआ! जब भी ऐसी ख़बरें आती हैं रूह लरज़ जाती है, जिस्म कांपने लगता है.कि  उर्दू के कहानीकार ज़की अनवर का चेहरा सामने आ जाता है, जिन्हें जमशेदपुर के फसाद में उन्हीं लोगों ने उन्हें मार डाला था जिसका घर कुछ देर पहले ज़की बुझाकर आये थे.तब काशिफ़ भाई छोटे थे.लेकिन उनके मानस पर अंकित कई जलते. लरज़ते चित्र घूम जाते हैं.उनके इस संस्मरण को पढना एक ऐसी अंधेरी सुरंग में जा घुसना है, जहां इंसानियत नंगी हो अट्हास करती है.-माडरेटर 


जमशेदपुर का दंगा १९७९ : जब मैं बहुत छोटा था 













काशिफ़-उल-हुदा की क़लम से


1979 के इसी अप्रैल महीने में, जमशेदपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे ने 108 लोगों की जानें ले ली थीं. मरने वालों की संख्या 114 भी हो सकती थी, लेकिन मैं और मेरे परिवार के लोग ज़िंदा बच गये, शायद इसलिए कि आज 30 साल बाद उस दिल दहला देने वाली घटना को बयान कर सकें. 

यह दुर्भाग्यपूर्ण हादसा तब हुआ था, जब मेरी उम्र केवल 5 साल थी. परन्तु इस हादसे की यादें मेरे मस्तिष्क में साफ-साफ उभरी हुई हैं और दुर्भाग्य से ये मेरी प्रारंभिक जीवन की चुनिंदा यादों में से है. इस बात को पूरे 30 साल गुजर चुके हैं लेकिन इस हादसे के भयानक दृश्य आज भी ताज़ा हैं.

 11 अप्रैल 1979 को उस दिन हवा में तनाव के कुछ भयानक संकेत थे. पता नहीं कैसे, मेरी माँ को यह संकेत समझ में आ गए और वो रामनवमी के दिन, अपने भाई और दो छोटी बहनों के साथ पास के मुसलमान इलाके, गोलमुरी में चली गयीं. मेरे पिताजी आदर्शवादी थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि कुछ नहीं होगा. यदि कुछ हो भी गया तो पिताजी ने एक हिन्दू व मुसलमान लोगों का संयुक्त रक्षा दल बनाया हुआ था और उन्हें उम्मीद थी कि यह दल हिन्दू और मुसलमान गुटों के आक्रमण से बचायेगा.

मैं और मेरा भाई, जो मुझसे 2 साल बड़ा है, पिताजी के साथ रुक गए और मेरी माताजी और बहनें सुबह को गोलमुरी चली गयीं. जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, वैसे-वैसे लोगों की भीड़ बाहर बढ़ने लगी. मेरा भाई कुछ परेशान होने लगा और दोपहर के खाने के समय तक हमने अपने पिताजी को मना लिया कि वो हम दोनों भाइयों को माँ के पास गोलमुरी छोड़ आयें. जब हम लोग गोलमुरी में अपने रिश्तेदार कमाल चाचा के यहाँ भोजन कर रहे थे, लोगों के चिल्लाने की आवाजें आयीं कि दंगा शुरु हो गया है.

यह देखने के लिए कि क्या हो रहा है, हम लोग जल्दी से बाहर गए और देखा कि कुछ ही दूरी पर धुआं उठ रहा था. इसके बाद की घटनाएं मुझे टुकड़े-टुकड़े में याद हैं. मुझे याद है कि हम जिस घर में रह रहे थे, वहाँ पर सिर्फ़ महिलाएं और बच्चे थे. मुझे यह याद है कि मैं खाना नहीं खाना चाहता था क्योंकि वह पूरी तरह से पका हुआ नहीं होता था. बहुत कम उम्र में ही बतौर शरणार्थी मेरे लिए जीवन का यह कड़वा अनुभव था.

मुझे याद है कि रात में हम छत के ऊपर जा कर देखते थे, जहाँ से देख कर लगता था जैसे पूरा शहर ही जल रहा हो. मुझे यह भी याद है कि कोई मुझे चेतावनी दे रहा था कि ऊपर छत पर नहीं जाना चाहिए क्योंकि हमें आसानी से गोली का निशाना बनाया जा सकता है. मुझे यह भी याद है कि मैं अपने पिताजी से बहुत ही कम मिल पाता था और बहुत सहमा हुआ रहता था.

कई सालों बाद पता लगा कि जमशेदपुर के टिनप्लेट इलाके में हमारा घर ही अनेकों स्थानीय मुसलमानों को शरण दिए हुआ था क्योंकि संयुक्त परिवारों में रहने वाले हिन्दू लोग धीरे-धीरे इस इलाके को छोड़ कर जा रहे थे.

उस दिन, मेरे पिताजी कुछ सामान देने के लिए गोलमुरी आए हुए थे परन्तु जब वो वापस जाने को हुए तब तक कर्फ्यू लग गया था. इसलिए वो वापस नहीं पहुंच सके थे.


उधर टिनप्लेट में रह रहे मुसलमानों ने देखा कि वो हर ओर से घिर रहे हैं, इसीलिए टिनप्लेट फैक्ट्री में वे लोग मदद मांगने गए. परन्तु वहाँ उन सब को उन्हीं के सहकर्मियों ने बर्बरतापूर्वक मार डाला. मेरे पिताजी सिर्फ़ इसलिए बच गए क्योंकि कर्फ्यू लग जाने की वजह से वो गोलमुरी से टिनप्लेट वापस नहीं जा सके थे.




हमारा घर तो लुट गया था पर हम लोग भाग्यशाली थे क्योंकि और लोगों का तो सब कुछ जला कर राख कर दिया गया था. महीनों बाद हम सब एक नए इलाके में रहने के लिए गए, जिसका नाम एग्रिको कालोनी था, जो मुसलमानों की एक अन्य कालोनी भालूबासा के सामने थी.

हालांकि इन घरों में नई पुती हुई सफेदी भी आग और लूट के दाग नहीं छुपा पा रही थी. हमें यह भी नहीं पता था कि इन घरों में किसी की हत्या हुई थी या नहीं, पर लूट के निशान सब तरफ साफ़ नजर आ रहे थे.

समय बीतता गया और मेरी ऐसे अनेक लोगों से मुलाकात हुई, जिन्होंने जमशेदपुर दंगे को झेला था. इनमें से हरेक के पास उनके हिस्से की दिल दहला देने वाली कहानी थी.


मुझे एक महिला याद है, जिसके शरीर पर जलने के निशान थे. यह महिला उस एंबुलेंस में भी बच गई थी, जिसको यह सोच कर जलाया गया था कि एंबुलेंस के साथ-साथ उसके भीतर बैठे सभी लोग भी जल जायेंगे.

इस दंगे के कई महीनों बाद रोज स्कूल जाते हुए हम उस जली हुई एंबुलेंस को देखते थे, जो पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ी कर दी गई थी.

मरने वाले जिन 108 लोगों का मैंने जिक्र किया, उसमें 79 मुसलमान थे और 25 हिंदू. बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे, जो घायल हुए थे. कुछ थे, जिनका सब कुछ खत्म हो गया था.


जमशेदपुर एक औद्योगिक शहर है, जहाँ टाटा की फैक्ट्रियां हैं. इस शहर में रहने वाले अधिकाँश लोग टाटा की इन्हीं फैक्ट्रियों में काम करते हैं. शहर का बहुत बड़ा हिस्सा टाटा की जागीर है, जिसके क्वार्टर में हर मजहब के लोग शांतिपूर्वक रहते आए हैं.

यह समझ से परे है कि ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण और बर्बर कृत्य इस शहर में आखिर कैसे हुआ, जहाँ हर धर्म के लोग सद्भावना के साथ रहते थे. यहां रहने वाले अधिकांश लोग अविभाजित बिहार या देश के दूसरे हिस्सों के थे और कंपनी में ईमानदारी से काम करते हुए अपने घर-परिवार के पालन पोषण में खुश थे. जमशेदपुर के दंगों में सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं मरे, बल्कि हिन्दू भी तो मरे थे- तो फिर इस दंगे का लाभ किसको मिला था?

जमशेदपुर के इस हादसे से कोई दस रोज पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख बाला साहेब देवरस ने जमशेदपुर का दौरा किया था और आह्वान किया था कि हिंदूओं को अपने हितों की रक्षा के लिए अब उठ खड़ा होना चाहिए. उसके बाद 11 अप्रैल 1979 को जमशेदपुर दंगों की आग में जलने लगा.

तीस साल पहले जमशेदपुर में जिस व्यक्ति ने शहर को बंधक बना लिया था, उसका नाम था दीनानाथ पांडेय. स्थानीय विधायक. जीतेंद्र नारायण कमीशन ने माना कि इस दंगे में आरएसएस के विधायक दीनानाथ पांडेय की भूमिका रही है. इस घटना के बाद भाजपा ने दो बार बिहार विधानसभा के चुनाव में पांडेय को टिकट दी और पांडेय ने इस जमशेदपुर सीट को भारतीय जनता पार्टी के लिए 'सुरक्षित' सीट बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

  जब हम लोग यह टिप्पणी करते हैं कि राजनीति में गुंडे या अपराधी पृष्ठभूमि के लोग आ गए हैं, तब हम यह भूल जाते है कि इन लोगों को राजनीति में वोट दे कर लाने के लिए भी हम लोग ही जिम्मेदार हैं. दीनानाथ पाण्डेय जैसे लोगों के लिए, जिन पर सामूहिक हत्या का आरोप है, राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार की टिकट काट कर कांग्रेस ने सराहनीय काम किया है, परन्तु यह वही पार्टी है, जिसके शासनकाल में आंध्र प्रदेश में युवा मुसलमानों को गैरकानूनी तरीकों से गिरफ्तार किया जा रहा था और पुलिस उनपर अमानवीय अत्याचार करते हुए ऐसे अपराधों की स्वीकरोक्ति चाहती थी, जिसके लिए वो जिम्मेवार ही नहीं थे. सरकार ने तब तक इस मामले में कार्रवाई नहीं कि जब तक लोगों ने सरकार के इस तरीके के खिलाफ आक्रोश नहीं जाहिर किया.

यदि पार्टियाँ समयोचित कदम लेने से कतरायेंगी और अपराधी पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनाव में उतारेंगी, तो ऐसे नफरत और वैमनस्यता से भरे हुए लोगों के लिए मतदान करना हमारे जैसी आम जनता के लिए संभव नहीं होगा और हमारे पास मतदान से इंकार के सिवा कोई चारा नहीं होगा.



इसी सन्दर्भ में जमशेदपुर के वरिष्ठ नागरीक एम्.जेड.हुदा सन १९६४ और १९७९ के फसाद को कुछ इस तरह ब्यान करते हैं.आप ज़रूर सुनें. 

[लेखक-परिचय: जमशेदपुर यानी झारखंड के इस्पात नगर टाटा में बचपन बीता.लखनऊ और मुजफ्फरपुर में भी रहे.सालों से कम्ब्रिज  में रहकर शोध्य-कार्य और पत्रकारिता.आप टू सर्किल नेट  के प्रबंध संपादक हैं.आपका अंग्रेजी में  ब्लॉग है Logging life.
आपसे  kashif@urdustan पर संपर्क किया जा सकता है.]
  
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