बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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रविवार, 26 मई 2013

सुकमा के बहाने नक्सलियों की पड़ताल












ध्रुव गुप्ता की क़लम से 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं पर नक्सली हमले के बाद कुछ मित्रों के फ़ेसबुक स्टेटस देखकर ऐसा लगता है कि  नक्सलियों के बारे में उनका ज्ञान किताबों पर ज्यादा आधारित है जो उन्होंने महाश्वेता देवी और अरुन्धती राय जैसे आतंकवाद के समर्थक लेखकों से प्राप्त किया है। बिहार के कई नक्सल प्रभावित जिलों में अपने व्यक्तिगत अनुभव और कई नक्सली नेताओं से पूछताछ के आधार पर नक्सलियों के बारे में कुछ बहुप्रचलित भ्रमों का मैं बिन्दुवार निवारण करना चाहूंगा। मुझे पता है कि बहुत से मानवाधिकारवादी और वामपंथी मित्रों को यह नागवार गुज़रेगा, लेकिन सच तो सच ही होता है !

लुटेरों का है समूह 

यह आम धारणा है कि नक्सलवादी शोषक सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध युद्धरत हैं। हकीकत यह है कि यह वर्गसंघर्ष की आड़ में यहां अपराधियों और लूटेरों का एक समूह कार्यरत है जो पहले स्थानीय आदिवासियों और दलितों की मदद से पहले जंगलों, पहाड़ों और खेती के लिए उर्वर जमीनों पर अपना वर्चस्व स्थापित करता है, जिसके बाद आरंभ होता है वन पदाधिकारियों, कीमती लकड़ी और बीड़ी पत्ते के ठेकेदारों, सड़क या भवन निर्माण में लगी कंपनियों, बालू तथा पत्थर के ठेकेदारों और इलाके के किसानों से रंगदारी उगाहने का अंतहीन सिलसिला। लूटपाट की सुविधा के लिए उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र को एरिया और जोन में बांट रखा है। एक एक नक्सली जोन की कमाई करोड़ों में है। यह मत सोचिए कि यह कमाई क्षेत्र के आदिवासियों और दलितों की शिक्षा, रोजगार और कल्याण पर खर्च होता है । इसका आधा हिस्सा आंध्र प्रदेश और बंगाल में बैठे नक्सलवाद के आकाओं को भेजा जाता है और आधा स्थानीय नक्सलियों के हिस्से आता है। लगभग तमाम नक्सली नेताओं के पास महानगरों में आलीशान फ्लैट्स और भारी बैंक बैलेंस है। यक़ीन मानिए, इस लूट का कोई हिस्सा आदिवासियों या दलितों के पास नहीं जाता।

स्थानीय दलित-आदिवासियों के शोषक  
 
यह आम धारणा है कि नक्सलवाद के बैनर तले समाज का वंचित तबका - आदिवासी और दलित अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे है। शायद लोगों को पता नहीं कि किसी भी जोन का नेतृत्व आंध्र या बंगाल में बैठे आक़ा तय करते हैं। किसी जोन में नेता और हमलावर दस्ते के लोग आमतौर पर स्थानीय नहीं होते, बाहर से भेजे जाते हैं। हर जोन में ऐसे 10 से 20 लोग बाहर से पोस्ट किये जाते हैं जिनपर निर्णय और कार्रवाई की ज़िम्मेदारी होती है। स्थानीय लोगों की भूमिका महज़ हमलों के वक़्त संख्या बढ़ाने, नक्सलियों के हथियार ढोने और छुपाने, दस्तों के लिए आसपास के गावों से भोजन जुटाने और उनकी हवस के लिए अपने गांव-टोलों से लडकियां भेजने तक सीमित है। इतनी सेवा के बदले उन्हें सौ-पचास रूपये और कभी-कभी किसी किसान की जमीन पर कब्ज़ा कर खेतीबारी का आदेश मिलता है। किसी ऑपरेशन के बाद नक्सली नेता तो कुछ समय के लिए बड़े शहरों में छुपकर एय्याशी करते हैं, पुलिस के दमन का शिकार स्थानीय आदिवासियों और दलितों को होना पड़ता है। 

क्या निशाने पर पूंजीपति और सामंत भी!

ज्यादातर लोगों का मानना है कि नक्सलवाद एक राजनीतिक विचारधारा है जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हिंसा का सहारा लेती है। मित्रों, आप भ्रम में हैं। यदि इनका कोई विचार है तो वह कागजों में होगा। पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर चुनाव के पहले ये लोग पहले चुनावी वहिष्कार का नारा और कुछ छिटपुट घटनाओं को अंजाम देकर अपनी क़ीमत बढ़ाते हैं और फिर सबसे ज्यादा कीमत देने वाले किसी उम्मीदवार, चाहे वह कितना बड़ा शोषक और अनाचारी क्यों न हो, के पक्ष में फतवे ज़ारी करते है। आंकड़े एकत्र कर के देख लीजिये कि कितने सामंतों और पूंजीपतियों के विरुद्ध नक्सलियों ने हिंसात्मक कारवाई की है। आपको निराशा हाथ लगेगी। इनकी नृशंसहिंसा के शिकार हमेशा से निहत्थे ग्रामीण, गरीब सिपाही तथा छोटे और सीमांत किसान ही होते रहे हैं और होते रहेंगे !

(परिचय:
जन्म:पहली सितंबर 19 50 
शिक्षा: गोपालगंज से स्नातक और मुजफ्फरपुर से स्नातकोत्तरकिया 

भारतीय पुलिस सेवा में बड़े पदों पर रहे.  खगड़िया, सुपौल, बांका, मुंगेर, समस्तीपुर, मोतिहारी और सीतामढ़ी आदि के सीआईडी और पुलिस मुख्यालयों में रहे।  बाद में रिटायरमेंट ले लिया।  

सृजन: कविता और सामयिक आलेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित 
संप्रति: दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन 
संपर्क:dhruva.n.gupta@gmail.com )  

   
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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

स्विस बैंक में बंद रक्तक्रांति

 














आवेश की कलम से


माओवादी लीडरों  के अरबों  रूपए स्विस बैंक में जमा

 
पश्चिम बंगाल के लालगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ के लालबाग तक रक्तक्रांति की बदौलत सामाजिक क्रांति का दावा करनेवाले नक्सली संगठनों का एक नया चेहरा सामने आया है , आदिवासी-गिरिजनों की मसीहाई का दावा करने वाले कुछ एक माओवादी नेताओं के खाते स्विस बैंक में होने के पुख्ता सबूत मिले हैं | भारत के कतिपय माओवादी नेता  न सिर्फ अपने खातों का संचालन स्विस बैंक के माध्यम से कर रहे हैं ,बल्कि नेपाल के भी माओवादी नेताओं का धन भी हिंदुस्तान होता हुआ स्विस बैंक पहुँच रहा है | स्विस बैंक "क्रेडिट सुईस "के अधिकारी  हल्शी बाश ने अपने सनसनीखेज मेल में  खुलासा किया है कि बैंक में जामा राशि लाखो यूरो के बराबर हैं ,जो कि बैंकों को ,उनके  खाताधारकों का नाम गुप्त रखने के लिए प्रभावित करता है | कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि युरोपियन यूनियन के साथ साथ  चीन भी इन खातों के संचालन में माओवादी नेताओं की मदद कर रहा है  गौरतलब है कि हिंदुस्तान में माओवादियों द्वारा फिरौती के रूप में सालाना प्रतिवर्ष तीन से चार हजार करोड़  रूपए की वसूली की जा रही है ,अकेले छत्तीसगढ़ में हर वर्ष माओवादी ३५० -४५० करोड़ की वसूली करते हैं | ऐसा  नहीं है कि माओवादियों का आर्थिक स्रोत सिर्फ फिरौती की रकम है इसके अलावा  नेपाल ,बर्मा ,म्यांमार,बंगला देश आदि से भी माओवादियों  को भारी धन प्राप्त हो रहा है ,इतना ही नहीं देश में चल रहे कई एन,जी,ओ भी इन्हें फंडींग  कर रहे हैं | हालाँकि  सरकार माओवादियों को विदेशों से मिलनेवाले आर्थिक मदद की  बात से साफ़ इनकार करती रही है | अफ़सोस इस बात का है कि न सिर्फ केंद्र बल्कि राज्य सरकारें भी माओवादियों के आर्थिक तन्त्र को तोड़ पाने में विफल रही हैं ,नतीजा यह है कि  नक्सली उन्मूलन की सारी कार्यवाही बेमानी साबित हुई है |

स्विस बैंक क्रेडिट सुईस  के अधिकारी का 
सनसनीखेज खुलासा

तस्वीर के कई रूप हैं क्या आप यकीन करेंगे कि देश की मुख्यधारा से अलग-थलग कर दिए गए आदिवासी गिरिजनों को सब्ज बाग़ दिखाने वाले कई माओवादी नेता  रक्तक्रांति की आड़ में अपार धन की उगाही कर रहे हैं इनके स्विस बैंक में  खाते हैं   दिल्ली ,मुंबई ,कलकत्ता आदि महानगरों में आलिशान मकान हैं और उनके बच्चे बेहद महंगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं | पैसों की इस हवस का नतीजा यह  है  कि माओवादी संगठनों में मौजूदा समय में पैसे को लेकर कैडर आपस में ही लड़-भीड़ रहे हैं ,हत्याएं हो रही हैं , विद्रोह हो रहे हैं , विश्वासघात हो रहे हैं माओवादियों नेताओं द्वारा स्विस बैंक के खातों में जो पैसा ट्रान्सफर किया गया है उसको लेकर चौंका देने वाली  जानकारी मिली है माओवादियों ने स्विस बैंक में धन स्थानान्तरण से पहले देश के ही कई बैंकों में फर्जी खाते खुलवाये गए उसके बाद पैसों का स्थानांतरण एक बैंक से दूसरे बैंक में करके ,पहले वाले खाते को बंद कर दिया गया ,जिसे इस बात का पताया लगाया ही न जा सके कि ये पैसा आखिर किस जगह से आया | बैंक में सहायक प्रबंधक और "रोने लेन जेनेवा " के रहने वाले हल्शी  बाश का कहना है कि नेपाल के माओवादी नेताओं प्रचंड , हिशिला यामी,कृष्णा महारा के अलावा भारत  के जिन नेताओं के खाते स्विस बैंक में है ,उनमे से नियमित क्रम में धन का आहरण होता रहा है ,सूत्रों की माने तो नेपाल के माओवादियों का खाता हिंदुस्तान में छदम नामों से खोला जा रहा है ,भारत नेपाल सीमा पर स्थित कई बैंकों के अधिकारी  भी इस गडबडझाले में पूरी मदद करते रहे हैं |








नक्सली संगठनों में पैसे के इस पूरे खेल का सच बताने के लिए यही सच काफी है कि माओवादी संगठनों में फिरौती की  रकम के बंटवारे को लेकर पिछले छः माह  के दौरान ही  लगभग आधा दर्ज़न हत्याएं हुई हैं ,उत्तर प्रदेश और झारखण्ड में आतंक का पर्याय माने जाने वाले रामवृक्ष और शिव प्रकाश कुशवाहा को उनके ही साथियों ने मौत के घाट उतार दिया ,वहीँ ५० लाख की लेवी और बड़े पैमाने पर असलहे  लेकर फरार एम.सी.सी के बसंत यादव और उसके साथियों के खिलाफ मौत का फरमान जारी कर दिया , मौजूदा समय में एक ही बैनर के तले  काम करने वाले माओवादी अलग अलग गुटों में बंटकर ठेकेदारों और व्यवसाइयों से लेवियां वसूल कर रहे हैं जिसका परिणाम खूनी संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है | बताया जाता है कि पीपुल्स वार ग्रुप के सब जोनल कमांडर मुन्ना विश्वकर्मा ने ही लेवी की  रकम को लेकर  अपने वरिष्ठ रामवृक्ष की हत्या कर दी थी वहीँ कुछ दिनों बाद ही पीपुल्स वार ग्रुप से ही जुड़े 'सोन गंगा विन्ध्याचल कमेटी' के शिवप्रकाश की  भी हत्या इन्ही परिस्थितियों में हुई | उत्तर प्रदेश कैडर के  एक वरिष्ठ आई .पी एस  कहते हैं कि लेवी की रकम को लेकर नक्सली संगठनों में खून खराबे के मामले पिछले चार महीनो में बढे  हैं ,रामवृक्ष और मुन्ना विश्वकर्मा के बीच विवाद फिरौती की  रकम के बंटवारे को लेकर शुरू हुआ था ,कुछ समय बाद ही दोनों अलग अलग ग्रुपों में काम करने लगे | महत्वपूर्ण है कि  मौजूदा समय में अकेले बिहार ,झारखण्ड और उत्तर प्रदेश में लगभग १४ की संख्या में अलग अलग ग्रुप काम कर रहे हैं आश्चर्यजनक ये है कि ये नए  ग्रुप न सिर्फ सरकारी तंत्र के खिलाफ काम कर रहे हैं बल्कि एक दूसरे के  खिलाफ भी कर रहे हैं ,इसके पहले गढ़वा का रामस्वरूप दो करोड़ रूपए का सोना लेकर ही फरार हो गया |
माओवादियों के इस धनतंत्र से जुड़े सच को समझने के लिए उनके आर्थिक स्रोतों को भी समझना होगामाओवादियों द्वारा फिरौती के तौर पर  प्रतिवर्ष दो हजार करोड़ रूपए  की वसूली किये जाने  जाने की बात स्वीकार करते हुए आई .बी के संयुक्त निदेशक रंजन कहते हैं कि यह  सिर्फ कागजी आंकड़ा नहीं है यह  तथ्य माओवादियों की  धर पकड़ में मिले कैश बुक और अन्य दस्तावेजों पर आधारित है ,छत्तीसगढ़ के इस पूर्व डी.जी.पी का कहना है कि माओवादी जो भी पैसा अलग अलग स्रोतों  से प्राप्त कर रहे हैं उसके केवल १० फीसदी हिस्सा ही संगठन के निचले कैडर पर खर्च किया जाता है बाकी नब्बे फीसदी हिस्सा सी पी आई (एम् एल ) के बड़े कैडरों के जेब में जा रहा है | चौंका  देने वाला तथ्य यह  है कि माओवादियों को आर्थिक मदद  देने में नक्सल प्रभावित  राज्यों के बड़े औद्योगिक उपक्रम भी पीछे नहीं हैं ,सूत्रों की  माने तो छत्तीसगढ़ में मौजूद स्टील के एक बड़े कारखाने से ही माओवादी लीडरान को सालाना लगभग सौ करोड़ रूपए मिलते हैं | यही हाल झारखण्ड का है जहाँ  लेवी के रूप में सर्वाधिक वसूली की  जाती है ,जो जानकारी मिली है कि स्विस बैंकों के खातों में जिन माओवादी लीडरों के धन हैं वो  इन्ही दो राज्यों में से आते हैं | एक ऐसे वक़्त में जब भारी सुरक्षा बल लगाकर माओवाद के कथित तौर पर खात्मे कि कवायद की जा रही है यह  सवाल महत्वपूर्ण है कि  धनकुबेर  माओवादी लीडरों के राजफाश के बजाय दिन रात  बुनियादी जरूरतों के लिए कराह  रहे मजलूमों के खिलाफ ग्रीन हंट जैसे युद्ध छेड़ने का आखिर तर्क क्या है |

                                                                                                                                           
[लेखक-परिचय : बहुत ही आक्रामक-तीखे तेवर वाले इस युवा पत्रकार से आप  इनदिनों हर कहीं मिलते होंगे, ज़रूर.! हमज़बान के लिए  विकलांगता का अभिशाप झेलते आदिवासी से हमें रूबरू कराया था.आपका का ब्लॉग है कतरने.  लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। 
आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। ]

                                                                                                  
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