बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

फुटपाथ : बाजार एवं व्यापार की संवेदनहीनता

















सैयद एस.तौहीद की कलम से 


 'फुटपाथ'  व्यापार, मुनाफा एवम भ्रष्टाचार से बढ़कर गम्भीर कालाबाजारी की अमानवीय,मर्मविहीन समस्या पर सामयिक विमर्श है।पचास दशक में बनी यह फ़िल्म अपने विषय एवम प्रभाव में समकालीन समय एवम उससे काफ़ी आगे की थी।भ्रष्टाचार व कालाबाजार की चुनौती आज भी कायम है । उसका रुप पहले से हो सकता अलग हो गया हो।

देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी काट रही, फुटपाथ के लोगों की तक़दीर पहले से कोई बहुत ज्यादा नहीं बदली। महंगाई, भ्रष्टाचार व कालाबाजार का ताप सबसे ज्यादा निचली परत को को सदा से बर्दाश्त करना पड़ा है, फुटपाथो पर रहने वालो का सारा दिन जिंदा रहने में ही गुज़र जाता है। गरीबी, लाचारी और बेबसी  उन्हे हिंसक बना रही है।

आसमान छूती महंगाई के लिए कालाबाजार को बहुत हद तक जिम्मेदार माना जाना चाहिए।मुनाफा और सिर्फ मुनाफे के लिए खडी यह व्यवस्था अहम चीजों की सप्लाई को बाधित कर उनकी कीमतें आसमान पर ले जाती है।

लाभ का व्यापार करने वाले को आदमी के दुख से सम्वेदना नहीं होती,क्योंकि आपदा या दुख से भी मुनाफा कमाने का भारी अवसर मिलता  है। बाजार एवम व्यापार की इस सम्वेदनहीनता को परखने वाली फिल्मों में फुटपाथ ने पहल ली थी।सम्वेदनशील नज़र से देखें तो समझ आता है कि  भ्रष्टाचार तत्कालिक तौर पर मुनाफा ज़रूर लाता है, किंतु आदमी से सम्वेदना, भावना,सहयोग एवम समर्पण जैसे मूल्य भी  चुरा  लेता है। नतीजतन आदमी में आदमीयत खो जाती है। जबकि दूसरी ओर यह इंसान का आदमी होना भी दुश्वार कर देता है। तत्कालिक मुनाफे एवम बहुत अधिक मुनाफे की खराबी से समाज के हर तबके को आगे चलकर नुकसान उठाना पड़ता है। स्वीकार करना,ना करना अलग बात है.

व्यापार की मजबूरी है कि वो मुनाफे बगैर चल नहीं सकता,जिसका वो अक्सर फ़ायदा उठाता रहता है. लेकिन उसे नही पता कि मुनाफे के समुद्र की कामना अपराध है।  व्यापार का नुकसान बाज़ार बहुत कम उठाना जानता है, उसका असर उपभोक्ता अथवा खरीददार को उठाना है। जिसके पास बाजार से खरीदने की क़ीमत नहीं वो गरीब और भूखा रहने को मजबूर होता है, जिसके पास कीमत नहीं वो जीने से भी मज़बूर हो जाता है। यह नहीं तो फिर अपराधी बन जाना आम है। 
गरीब, मजबूर से उससे जीने का अधिकार छीन लेना।उसे अपराधी बनने को मज़बूर करना गुनाह है. गरीब को और गरीब बनाने वाले बाज़ार को  'कालाबाजार' नहीं कहें तो फिर क्या ?जिसका बचपन फुटपाथ पर गुजरे, उसके मन में व्यवस्था को लेकर ज़हर सा बन जाता है। गरीबी से भी बदतर जिंदगी काटने वाले फुटपाथ के गरीब बच्चे अपराधी बन जाते हैं, जो नहीं कर सकते वो महंगाई, गरीबी लाचारी,अत्याचार के ताप में दम तोड़ देते हैं। क्या कालाबाज़ार इन जवान मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं ? लहलहाते खेतो में यदि पैदावर कम बताई जाए,अनाज गोदामों में सडे और गरीब भुखमरी में आत्महत्या कर ले।  महंगाई आसमान पर हो, महामारी में दवाइयों की कीमतें कम होने बजाए दुगनी क़ीमत पर मिले, तो समझ लेना चहिए कि कालाबाजार काम पे लगा हुआ है।

'फुटपाथ'  महंगाई,भ्रष्टाचार,कालाबाजार एवम मुनाफाखोरी के गम्भीर विषयों को इंसानियत और इंसाफ के संदर्भ में देखने वाली महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी।

फुटपाथ है नोशू ( दिलीप कुमार ),माला (मीना कुमारी ),बानी मास्टर (रोमेश थापर),धरती अख़बार, फुटपाथ की कहानी. कहानी रामबाबू (अनवर हुसैन ) सरीखे मुनाफापरस्त द्बारा चलाए जा रहे  कालाबाजार की कहानी।फुटपाथ पर गरीबी,लाचारी,बेबसी की वंचित जिंदगी में बचपन खो रहे नोशू को अपना कर बानी ने बड़ा काम किया। बानी में उसे अपना बड़ा भाई मिल गया था। बानी  मास्टर उसे अपने भाई से बढ़कर मानता था।नोशू के बिलखते बचपन को फुटपाथ के अंधेरे और गुमनामी से उठा कर घर की रौनक में ले आया।विस्थापितों की पीड़ा का संज्ञान लेनी वाली फिल्मों में अग्रणी स्थान इसे दिया जाना चाहिए.

नौजवान नोशू ने अख़बार में काम पकड़ लिया कि भाई बानी का बोझ कम हो जाए। वो ख़ुदगर्ज नहीं था, लेकिन खुद कमाना चाहता था। खोजी खबरों का समर धरती अखबार आए दिन बंदी झेल रहा, किसी को भी बराबर तनख्वाह नहीं मिल रही।नोशू के हालात अब भी पहले जैसे थे।वो गरीबी,लाचारी और फुटपाथ को पीछे छोड़ देने का ख्वाब देख रहा था । अपने हालात से तंग आकर उसने जुर्म की पनाह लेकर कालेबाज़ार की ख़ुदगर्ज,अंधेरी बेशुमार दुनिया में चला आया। नोशू की  लाखों रुपए कमा कर अमीर बनने की चाहत यही आसानी पुरी कर सकता था !  रामबाबू ने यही बताया था.कालाबाजार की छांव में वो बड़ा आदमी बन गया, उसे नही मालूम कि चार दिन की चमक फीकी पड़ेगी।


ईमानदार बानी ने नोशू और उसकी दुनिया से नाता तोड़ लेता है। भ्रष्टाचार, कालाबाज़ार की काली दुनिया के बनावटी उजाले ने मुहब्बत की ' सच्ची रोशनी ' माला की आस भी ले ली,पुराने साथी बिखर गए, दिल का रिश्ता टूट गया..नोशू को वो  दुनिया सदा दे रही थी। दिल मे तूफान उठा और बुरा नोशू अमीरों से  गरीब,मजलूम,मजबूर लोगो का बदला लेने वाला मसीहा बन गया। खुद के गुनाह का उसे एहसास था कि दौलत की अंधी लालच ने उसे बहुत बुरा आदमी बना दिया..अनाज के काला बाज़ार का व्यापारी बना दिया।

ईमानदार, इंसानियत के फरिश्ते बानी को नोशू की दुनिया से सख्त नफरत थी .

नोशू को जेल हुई।नोशू के सभी साथी भी गिरफ्तार हो गए..कालाबाज़ार का पर्दाफाश हुआ।

नोशू जेल जा रहा, उधर माला मोनू से कह रही...रोओ  नहीं मोनू.वो दिन ज़रूर आएगा, जिसका तुम्हें इंतजार है..मुझे इंतजार है।

नोशु के किस्म किरदार से दुनिया बदल सकती है,लेकिन परेशानी यह कि कितने भ्रष्ट लोग,संवेदनाहीन व्यापार करने वाले कारोबारियों  को मुक्ति का यह मानवीय रास्ता नज़र भी सुहाए ? क्योंकि यह समर्पण  त्याग एवम इंसानियत और नैतिक  जिम्मेदारी की बेहतरीन मिसाल थी। स्वार्थ के अंधेरे में डूबे को समाज की पीडा नज़र नही आती। ऐसा भी नही कि दुनिया में भले लोग नहीं,लेकिन खुश रहने के वास्ते ग़ालिब यह ख़याल अच्छा है।

राजा का बेटा जग्गु दो दिन की भूख से रो रहा था ,तब उसी नोशू ने उसके दर्द को समझा..
क्या बात है मोनू जग्गु रो क्यों रहा ?इसके और इसके बाबा ने कल से खाना नही खाया है,जग्गु के हांथ मे रुपया देते हुए..जाकर खाना खा लेना। जग्गु के बाबा गरीब होकर भी बहुत खुददार आदमी थे, लेकिन गरीबी,लाचारी ने एक बाप के दिल को गहरा ज़ख्म दिया था। वो नोशू से कुछ अहम जवाब मांग रहा..मानो हाशिए का सारा दुख कह डाला..इतना समझाया था कि बेटा रोना नही, तेरे रोने से मेरी बदनामी होगी।दुनिया समझेगी मै शराबी हूं, जुआरी हूं, बदमाश हूं  जाने क्या हूं। मेरा एक ही बच्चा है, वो भी आए दिन भूखो मरता है। मै किस किस को समझाता फिरुंगा  कि जो तनख्वाह मिलती है उसमे गुज़र नही होती।
दिन रात मेहनत मज़दूरी करने के बाद भी हम भूखो नंगे हैं, अंदर बाहर से गल सड़ गए हैं।ना घर बार का ठिकाना है,ना दो टुकडे रोटी का  सहारा है।नोशू तुम तो समझदार आदमी हो तुम ही बताओ कि हमारे बच्चों की रोटी कौन छीनता है ? उन्हे रास्ते की ठोकरें खिलाते -खिलाते कौन मार डालता है ? इतनी आबाद दुनिया में हमारे बर्बाद होने के सामान कौन करता है ?बताओ  नोशू,बताओ क्या बात है ?क्या खेतों को आग लग गई..वहां अनाज नही रहा ?  दुनिया को क्या हो गया ? आदमी को क्या हो गया ?जग्गु मैं कुछ नही जानता, आदमी को क्या हो गया (झल्लाते हुए ) मेरी आंखो मे आंख डाल क्या देख रहे हो ?ज़माने में बर्बादी का बीज कोई मैने थोड़े ही बोया है। मै क्या जानता हूं...कुछ नही जानता।

राजा के सवाल नोशू को इसलिए झकझोर गए क्योंकि वो उसी संवेदनहीन दुनिया को पाने की चाहत में डूबा युवा था..इन चुभते हकीकत ने उसे एक बार दोबारा दोराहे पर ला दिया, उसे  एक कठोर फैसला लेना था...

माला आज मुझे एक बहूत बड़ा फैसला लेना करना है. बहुत बड़ा फैसला करना है। यह फैसला करना है कि जिंदगी भर इसी तरह गरीब रहना होगा, राजा और उसके बच्चों कि तरह भूखो रहना होगा,सपने उठाने होंगे या ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने की कोशिश करनी होगी। पैसे की कीमत कौन  नही जानता ! इसके बगैर क्या हो सकता है ?कुछ भी नही हो सकता। आपसे मेरा  रिश्ता भी तो नहीँ जुड़ सकता इसके बगैर।
लेकिन बानी की समझ में यह बात नहीँ आती।उसकी समझ में नहीँ आती, यह बात। इसलिए आज मैने घर छोड़ दिया। अब मै बानी के साथ नहीँ रहूंगा,कहीं और चला जाऊंगा, बानी के साथ नहीँ रहूंगा,नहीँ रहूंगा।जिंदगी भर मैने बानी का दिल दुखाने का कोई काम नहीँ किया। और गरीब रहकर जितना जलील हो सकता था,उतना जलील भी हुआ। दूसरे  नहीँ जानते लेकिन मैं जानता हूं कि इस फुटपाथ पर जग जग कितनी राते काटी हैं । इसकी मिट्टी में मेरी मजबूरियों के बेहिसाब आंसू शामिल हैं..माला अब मैं गरीब नहीँ रहना चाहता..मैने पैसा बनाने की एक सूरत ढूँढ निकाली है,और मैने बहुत अच्छा किया है। एक दिन आएगा कि सब मान जाएंगे कि मैने बहुत अच्छा किया।

माला नही चाहती थी कि नोशू की नासमझी से भाई-भाई का रिश्ता खराब हो..यही कह सकती हूं कि ऐसा न हो तो अच्छा है,फिर भी कौन जाने क्या होने वाला  है।

नोशू पैसे वाला आदमी बन गया था, वो एक आलीशान बंगला खरीद लेता है..वो उस घर में दाखिल होता है...पुरानी बात, बीता हुआ कल  बेकग्राउंड संगीत के साथ चलने लगा ' देख लेना नोशू अपने बानी मास्टर के लिए इतना बड़ा महल बनाएगा,इतना बड़ा महल बनाएगा कि हर दूसरे दिन बानी मास्टर को ढूंढना पड़ेगा कि कहां खो गए..।

जाहिर था कि नोशू को आज अपने भाई की बहुत याद आ रही थी। उसकी कही बातें दिल मे गूंज रही... तुम चले आओ बानी,तुम सचमुच चले आओ बानी,अपने नोशू के पास चले आओ,उस दुनिया को भी अपने साथ ले आओ जिसका मेरे दिल से,मेरी आत्मा से बहुत गहरा सम्बंध है,बानी।

उधर बानी की नौकरी जाती रही.. जिंदगी ईमानदार बानी का इम्तिहान ले रही थी, जिस तरह खुदा अपने अजीज बंदों का लिया करता है। वो परेशान ज़रूर था लेकिन टूटा नहीं।

देखिए बानी का हौसला...भगवान अगर है तो सबकुछ ठीक कर देगा, नहीँ है तो खुद ठीक कर लेंगे।लेकिन मीना मुश्किल घड़ी में पति का साथ देने बजाय मायके चली जाती है.क्योंकि उसे अपने सुख से काम था । बहुत दिनो से किराया ना चुकाने कारण बानी मास्टर सड़क पर आ गए।

एक दिन नोशू मोटर कार से अपनी उसी बस्ती  मे आया।अगल बगल के लोग उस पर कमेन्ट करने लगे...चार पैसे क्या आ गए तो भाई को छोड़ दिया।

परिवार -समाज के  तिरस्कार को  आदमी जयादा दिन बर्दाश्त कर नहीं सकता. लेकिन समाज का दबाव उसी आदमी को राह पर ला सकेगी,जिसे  उसकी परवाह हो. नोशू थोड़े देर के लिए बुरा आदमी ज़रूर था, लेकिन उसका किरदार नहीं मरा था..माला से उसकी यह बातचीत गौर करें..

लोगो की  बातों से उसके दिल को चोट नहीँ पहुंचती ? माला यह भी जानना चाहती थी कि उसके पास रुपया कहां से आता है ?
चोट खाने की आदत कुछ पुरानी सी हो गई है,माला ! आजकल मैं अपने दिमाग से काम लिया करता हूं।जिस दुनिया और जिस समाज मे हम आप रहते हैं, वहां पैसे की इज्जत करना जरूरी है,उससे मुहब्बत करना जरूरी है। यह जानना कोई जरूरी नहीँ कि पैसा कहां से और क्यों कर आता है...वाकई नोशू एक कड़वी हकीकत को कह रहा।
लेकिन माला जानना चाहती थी कि नोशू ने बानी जैसे भाई का साथ क्यों छोड़ दिया ?मैने कालेबाजार का धंधा शुरू किया है। बानी को इससे नफरत थी,इसलिए मुझे उससे अलग होना पड़ा।इस बात से माला को दुख हुआ. उसकी समझ में यही आया कि नोशू को अपनों से ज्यादा पैसा प्यारा है।आप भी यही सोचने लगी है क्या ? सचमुच... उसके बाद कुछ बाकी नहीं रहा, वैसे भी कालेबाजार का धंधा चोरी,जुए से काम बुरा नहीँ, लोग ठीक कहते है कि मै बहुत बुरा आदमी हूं, मै वाकई बहुत बुरा आदमी हूं। नोशू की कालेबाजार की दुनिया से माला भी मुंह मोड़ लेती है। बानी पहले से ही उससे बातचीत बंद कर चुका था..नोशू से उसके अपने पराए हुए जा रहे थे.भरी दुनिया में रुपए वाला होकर भी उससे  अपने ही किनारा कर रहे..अब बानी को ही देखें। 
बता सकते हो बानी, मैने तुम्हारा क्या छीन लिया ?मेरी दौलत ऐसी दौलत नहीँ, जिसको तू छीन सकेगा। मेरी दौलत मेरा दिल है। मेरा आदमी होना मेरी दौलत है, और यह कालेबाजार से नहीँ आई, चार दिन की छांव नहीँ है,समझे। जा..जा चला जा यहां से..मुझको काले दिल वालों से बात नहीँ करनी..यह कहकर उसने नोशू से मुंह मोड़ लिया।
 गरीबी और मुफलिसी से भागकर मैने पनाह क्यों ली ? मैने इतना बड़ा गुनाह क्यों किया ? मुहल्ले वालों की नफरत,माला की नफरत और तुम्हारी नफरत कुछ नहीँ है,बानी। कोई ऐसी ठोकर लगाओ कि भेजा फ़टकर बाहर निकल आए..और दुनिया वालो को पता चल जाए कि मैने क्या गुनाह किया! बानी की बात सुनिए समझ सकेंगे कि नोशू से क्या बड़ी भूल हुई थी..

र वो आदमी जो मजबूरो की लाशों पर अपना महल खड़ा करेगा,ठोकर ही खाएगा। यह मेरे दिल की आवाज़ है,जिसको तू नहीँ सुन सकेगा। इसलिए कि अब तू आदमी नहीँ रहा। गरीबों के बच्चे जब भूखो मर रहे थे तो तू इनके हिस्से का अनाज बेच बेचकर अपने खजाने भर रहा था,उस वक्त तेरा प्यार कहां था ? जा चला जा,हमारे पास आना होगा तो पुराना नोशू बन के आना।

नोशू को बानी के पास,अतीत मे लौटने के लिए त्याग करना था..ग़म की इस घड़ी में उसे कैफे की डांसर सुमन का साथ मिला.बानी  और माला के ठुकराए जाने बाद वो दुनिया मे एकदम सा अकेला पड़ गया।

उसे  एक दोस्त की ज़रूरत थी ,जिससे अपनी सब बाते कह सके... मुझको आज ऐसा मालूम होता है कि जैसे इस दुनिया अकेला हूं और यहां मेरा कोई नहीँ है.बिल्कुल ऐसा मालूम होता है मुझको।सुमन का मानना था कि रूपया पास हो तो आदमी सबकुछ खरीद सकता है !

नोशू अपना सबकुछ देने को तैयार था.. यह रूपया पैसा अपने लिए थोड़े ही जमा कर रहा हूं ! यह सब लोग इतनी सी बात समझते क्यों नहीँ है ? इतनी सी बात इनकी समझ कयों नहीँ आती, सुमन ? इस मुफलिसी से,इस जिल्लत से घबराते क्यों नहीँ ?इस गरीबी से डरते क्यों नहीँ हैं ? जिसमे दिन रात,सुबह शाम गलते -सड़ते रहते हैं.इतनी सी बात इन लोगो की समझ क्यों नहीँ आती ? क्या हुआ इन सबको ? 
व्यापार ने रुपया ज़रूर दिया लेकिन उससे इंसानियत का एहसास छीन लिया था, जिस फुटपाथ को कभी दिल मे बसाए फिरा करता था..भूल से उसी का बड़ा दुश्मन बन बैठा।

अपनी भूल को सुधारने नोशू वापस एक दिन अपने पुराने अख़बार 'धरती ' पर आया..उसमे  हृदय परिवर्तन हो चुका था। वो फ़िर से अखबार के लिए लिखना चाहता था...घोष बाबू नए नाम से फिर से लिखना शुरु करने का इरादा है।

लेकिन नए नाम से लिखने की क्या ज़रूरत थी  ? नोशू के इस जवाब का रूह से बहुत गहरा नाता था। आर्थिक युग में यह बातें बेमानी सी नज़र आएंगी, लेकिन ज़रा गौर करें...जब जेब खाली होती है, तो इंसान सीना तान के चलता है। जब सर पे दौलत का बोझ लद जाता है, तो गर्दन झुक जाती है। इंसान  बुजदिल हो जाता है। 
पैसे के धंधे में ऐसा ही होता है...जब दस मरते हैं तो एक जीता है। नोशू कालाबाजार के लोगों के खिलाफ लिखने लगा, उसकी जान खतरे में जान कर अखबार के सहयोगी घोष उसे लिखना बंद करने कि सलाह देते हैं। जवाब काबिले गौर।
जाने तो बहुतों की खतरे मैं हैं..शहर में बीमारी फैल रही है,और कालेबाज़ार वालों ने दवाईयों को बंद कर रखा है.जैसे -2 लोग मरेंगे, दवाइयों के दाम ऊंचे होंगे। इसलिए लिखना ही होगा. जाहिर था कि नोशू को बेकसूर लोगों की जान की फिक्र ज्यादा थी।
अस्पताल में मरीजों की तादाद बढ़ रही थी, बानी मास्टर भी अस्पताल में भर्ती हैं। उनकी हालत दिन गुजरने साथ बिगड़ती जा रही थी।

महामारी  की चपेट में आकर बिहारी बाबू की पहले ही मौत हो चुकी थी. उधर दवा का व्यापरी रामबाबू से दवा रीलिज करने का आग्रह करता है।ज्यादा मुनाफा पाने के लालच में सेठ बेशुमार बेकसूर लोगों की जान का दुश्मन बना हुआ था..

...मरने दो,मरना जीना तो किस्मत का खेल है..हम व्यापारी लोग हैं, अगर चार दिन बाद मुनाफा ज्यादा मिल सकता है,तो आज क्यों बेचे ? लारियों में दवाइयों को भरवा  कर रातों रात गंदे नाले में फेंकवा दिया।  इंसानियत के ऊपर मुनाफा,व्यापर हावी था।
उधर बानी मास्टर मर गए..नोशू को इसकी ख़बर रजवा से मिली..व्यापार एवम मुनाफा खोरी,कालाबाजारी ने कई इंसानों की जान ले ली। नोशू से उसका अजीज भाई छीन गया..दौलत की अंधी भूख में उसने बानी की जान ले ली थी. फुटपाथ अपने तकदीर पर मातम ना मनाए तो क्या करे ?  हाशिए के दुख की इंतेहा नहीं. बाज़ार क्या कभी  इंसान की कीमत समझ सकेगा ?



(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 2 अक्टूबर 1983 को पटना (बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।

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बुधवार, 8 अप्रैल 2015

बिमल राय का काबुलीवाला















सैयद एस.तौहीद की क़लम से
काबुलीवाले  के पात्र से परिचित होना एक नवीन अनुभव विकसित करता है। काबुली जैसे तिजारतगुज़ारों के ज़रिये  मानवीय रिश्तों को दिखाने का ख़ूबसूरत अंदाज़ फ़िल्म में था। तिजारत के वास्ते ख़ान काबुल से हिन्दुस्तान चला आया. था। उसे इसका इल्म था कि हिन्दुस्तान में तिजारत के ज़्यादा  अवसर थे। घर-परिवार ख़ास कर प्यारी संतान से दूर चला आया था। नई मंज़िलें उसे बुला रही थी। काबुलीवाले के हालात में तिजारत करने वाले ख़ानाबदॊश दूसरे लोगों की तक़दीर भी अनुभव की जा सकती है। ज़िन्दगी फ़लसफ़ों से हो ना मेल खाती हो,  लेकिन सिर्फ़  फ़लसफ़ों के सहारे चलती नहीं। व्यापार के लिए हमे अक्सर अपनों की  तरफ़ से  दिल कठोर करना होता है. या यूं कह लें कि रोज़गार  व अर्थ पाने के लिये लिए समझौते करने पड़ती हैं. घर से निकल आने के बाद बडे लोगों से ज़्यादा वहां छूटे मासुम बच्चों को लेकर दिल को तकलीफ़ होती है. वतन से परदेस चले आए काबुली को प्यारी मिनी में अपनी बिटिया अमीना का चेहरा  नज़र आता था. मिनी को देख अमीना की याद आती थी.

विघटन पहले मज़हब से नहीं जोड़े जाते थे
दुनिया की खराबियों से अलग काबुलीवाला एक ज़िम्मेदार ज़िंदगी गुज़ारनेवाला  ख़ानाबदॊश फेरीवाला था। वतन से दूर एक दूसरे  वतन हिन्दुस्तान को अपना वतन बना लेता है। बोली व काम में खरा काबुली गलत कामों से सख्त परहेज़ करने वाला  चरित्र था। उस समय की फिल्मों का मुसलमान पात्र आतंकी या सरगना गतिविधियों में संलिप्त नहीं  हुआ करता था। पोजिटिव बातों वाले  किरदार समाज में परस्पर विश्वास बरक़रार रखा करते थे. इस वजह से हीरो अक्सर पाप का अंत करने वाले मसीहा के किरदार में नज़र आए. विघटन की ताकतों को जाति अथवा मज़हब  से नकारात्मकरूप  से जोडने का काम नहीं था। वो अत्यंत  हिंसक  व स्वार्थ का देवता नही होता था. खलनायक का हृदय परिवर्तन भी  रखा जाता था. समाज को जोड़ने  वाली कथाओं  को लोग पसंद भी ज्यादा  करते.

परदेस का दर्द भी अपना सा लगे
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की यह कहानी मानचित्र की दूरियों को पाटने में कामयाब थी। एक दूसरे को लेकर नकारात्मक पूर्वाग्रहों  को ध्वस्त करने का काम भी किया था. काबुलीवाला सरीखा पात्र लेखक को हिन्दुस्तान में कहीं जरूर मिल जाता…लेकिन अफगानिस्तान के काबुल जाना लेखक की दूरदर्शिता व नयी सोंच को इंगित करता है। यह मिनी व काबुलीवाले के साथ हिन्दुस्तान-अफगानिस्तान  या यूं कह लें कि  वतन एवम  परदेस  को जोडने की भी कहानी थी। प्रेम एवम दुआओं की डोर सरहद को धूमिल कर आदमी को आदमी के क़रीब ले आती हैं. मिनी एवम उसके घर वालों  से काबुली का महज व्यापारी  नाता नहीँ था,बल्कि परिवार का रिश्ता था.जिस बच्ची का बचपन काबुली को  आंखो से प्यारा रहा..बरसो बाद उसे सुखी जीवन की दुआएं भी देने आया, जिस तरह अपनी अमीना को दिया होगा.

 
काबुली को हिन्दुस्तान में अपने परिवार की तरह एक परिवार मिल गया…मिनी की शक्ल में अमीना मिली। प्यारा सा रिश्ता वक्त के इम्तेहान को पार कर गया…जेल से रिहा होकर काबुली मिनी व उसके परिवार के पास जाता है। बरसों बाद भी उसे वही डोर वहां खीच लाती है। कहने को काबुली मिनी का सगा बाप नहीं था… लेकिन उसमें मिनी से कुछ वैसा ही रिश्ता नजर आया। काबुली (बलराज साहनी) अपनी बिटिया अमीना (बेबी फरीदा) के साथ काबुल में रहता है । वह तिजारत से घर चलाता है। लेकिन आर्थिक हालात दुरूस्त नहीं, जमीन और मकान हांथ से फिसल कर दूसरों की जागीर हो गए हैं । कर्ज के बोझ से निजात पाना फिलवक्त बहुत जरूरी हो गया है। क्योंकि कर्ज वक्त पर अदा ना होने से जमीन व मकान देनदारों के पास चले गए हैं। हालात को देखते हुए खान तिजारत के लिए हिन्दुस्तान जाने का मन बनाता है। परदेश में अपने वतन से बेहतर अवसर हैं, वहां आमदनी ज्यादा है। अमीना भी अब्बा के साथ जाने की जिद कर रही है। लेकिन खानाबदोश  इस सफर पर वह बच्चे को साथ  ना ले जाने के लिए मजबूर है.ज़िम्मेदारी का भी उसूल है कि बड़े अपने बच्चों को वक्त की ठोकरो से महफूज़ रखे.जल्द ही वापस लौटने के वायदे के साथ वह परदेश रवाना हो जाता है। अमीना को बुआ के जिम्मे कर वतन छोडकर चला आया। यहां तिजारत के लिए ऊनी कपडे और मेवे लेकर आया है।यहां वह रोजगार में लगा है ।
हिन्दुस्तान के शहर (कलकत्ता) को रोजगार का ठिकाना बनाए हुए है। इसी शहर में उसकी मुलाकात कहानी के अन्य पात्रों से होती है। सुत्रधार मिनी के पिता, मिनी की मां तथा भोला कथा को आधार दे रहे हैं । इस संवेदनशील पटकथा (विशराम बेडेकर व एस खलील) को पूर्णता प्रदान करने के लिए बेहतरीन गीतों को जगह दी गई। मिनी में काबुली अपनी बिटिया अमीना का अक्स देखता था। मिनी से उसका नाता रवीन्द्रनाथ टैगोर की लिखी कथा मे भी मुख्य आकर्षण था, फिल्म रूपांतरण में भी उसे कायम रखा गया । निर्देशक हेमेन गुप्ता व गुलजार (मुख्य सहायक) विमल राय (निर्माता) की उम्मीदों पर खरे उतरे थे । दर्शकों से भी सराहना मिली. अब्दुल जब कभी फेरी लगाता हुआ इस ओर आता मिनी ‘काबुलीवाला,काबुलीवाला’ पुकारती बाहर की ओर दौड पडती। मिनी को अपनी बिटिया मानने लगा था,बादाम-किसमिस-मेवे दिया करता । पांच साल की मिनी व चालीस बरस के काबुली की दोस्ती हर दिन के साथ ममत्व व स्नेह की मर्मस्पर्शी मिसाल बन गई । काबुली के प्रति मिनी की अभिलाषा भी देखने लायक थी। कथा के एक प्रसंग में काबुली के ना आने पर वह उसे मिठाई देने बाहर निकल जाती है । काबुली से मिलने बाहर निकली मिनी शहर की अनजान राहों में भटक कर गुम हो गई । घर के लोग मिनी के अचानक गुम हो जाने पर बेहद परेशान हैं ।

अए मेरे बिछड़े चमन तुझ पे दिल कुर्बान
बाबूजी व भोला उसकी तालाश में इधर-उधर भटक रहे हैं। वाकये के बारे में जानकर काबुली भी बच्ची का पता लगाने दूर तक निकल जाता है । मिनी उसे एक कंपाऊंड के रैन-बसेरा के पास बेखबर पडी मिली। उधर भोला (असित सेन) भी बच्ची को ढूंढते हुए उस ओर आया। मिनी को काबुली के कब्जे में देखकर उसे ही अपहरणकर्त्ता मानकर शोर करके आस-पास के लोगों को इकटठा कर लेता है । बच्ची को अगवा करने के आरोप में भीड अपना आपा खो ‘मसीहा’ को पीटने लगी। वहां पहुंचे मिनी के पिता बीच-बचाव को आए, लेकिन अब तक भीड ने काबुली को पीट कर घायल कर दिया था। काबुली का पक्ष जानकर मिनी के पिता भोला की करतूत पर बहुत लज्जित हैं । मायूस दिल लेकर काबुली वहां से चला जाता है। इधर बरसात से भींग कर मिनी को तेज बुखार आ जाता है। मिनी की तबीयत को लेकर वह अपने परवरदिगार से दुआ करता है । जिस रात बच्ची को तेज बुखार था,उसके ठीक हो जाने तक वहीं मिनी के अहाते में रूक कर रात भर इबादत करता रहा। मौला के दरबार में दुआएं कबूल होने साथ मिनी के हालत में सुधार हुआ। एक बार फिर से बच्ची को हंसता मुस्कुराता देखने बाद ही इस बंदानवाज़ को तसल्ली हुई। इस पूरे घटनाक्रम ने बता दिया कि काबुली मिनी में अपनी बिटिया ‘अमीना’ की छाया देखा करता था। उसके दिल में आज जज्बात का समुद्र सा है,पीछे छूटे वतन को स्मरण करते हुए उसका दर्द कुछ यूं बयान हुआ ‘अए मेरे प्यारे वतन,अए मेरे बिछडे चमन तुझ पे दिल कुर्बान। रुपांतरित कथा में इस रचनात्मक मोड के लिए फिल्म की प्रशंसा करने का मन होगा।

   
‘ससुर को मारता,पर क्या करूं ,हाथ बंधे हुए हैं’
अपने वतन को लौटने की इच्छा काबुली में बलवती हो चली है, जगह-जगह घूम कर माल पर बकाया रकम को पाने जा रहा है। इसी क्रम में वह रामभरोसे से उधार माल लेकर उसे पहचानने से मुकर गया। उसने रामपुरी चादरें खरीदने में बेईमानी की थी ,चादर खरीद कर रूपए देने से पलट गया । एक आदर्शवादी पठान भरोसे का कत्ल सहन न कर सका। दोनों में बात बढ गई। क्रोध में रामभरोसे पर छुरा चला दिया,जिससे वह मारा गया। हत्या के इल्जाम में पुलिस काबुली को हिरासत में ले जाती है। मुहल्ले की जिन गलियों में बेखौफ फेरी लगाया करता था,मुजरिम की शक्ल में जा रहा है । इतने में ‘काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला’ पुकारती हुई मिनी घर से निकल आई । अब्दुल का चेहरा पल भर के लिए खुशी से झूम उठा। उसके कांधे पर आज मेवों की झोली नहीं थी। उसे इस हालत में देखकर मिनी बरबस पूछ बैठी ‘ससुराल जाओगे? सर आन पड़ी मुश्किल घड़ी पर  पर्दा डालकर उसने मुस्कुराते हुए कहा, ‘हां वहीं तो जा रहा हूं’ । काबुली समझ गया कि उसका यह जवाब मिनी के मुखडे पर खुशी ला नहीं सका था । तब उसने बंधे हुए हांथ दिखाकर कहा ‘ससुर को मारता,पर क्या करूं ,हांथ बंधे हुए हैं’ । छूरा चलाने के जुर्म में ‘काबुलीवाले’ को लम्बी सजा होगी।

  
सत्यता  व ईमानदारी देखकर वकील ने पीटा माथा 
 बचाव पक्ष के लोग काबुली के लिए वकील करते हैं, वकील उनसे अदालत में रटा-रटाया बयान देने को कहता है। ऐसा करने पर उसे क़ैद से बचाया जा सकता था । लेकिन अदालत में घटनाक्रम को हू-ब-हू कह दिया काबुली ने। उसकी सादगी, सत्यता  व ईमानदारी देखकर बचाव का वकील माथा पीट लेता है । आज की दुनिया में खुद को ज्यादा ईमानदार  व सच्चा बता  कर मुसीबत मोल  नहीँ ली जाती.काबुली की सच्चाई को देखत हुए सुनवाई में उसे दस बरस की ही सजा मिली । बहरहाल क़ैद हो जाने से बिछ्डे रिश्तों के पास जाने की उत्कट इच्छा दिल में ही रह गई। अब अमीना व मिनी बिटिया के पास जेल से रिहा होने बाद ही जा सकता था । यह पूरी घटना कथा में नाटकीय मोड लाती है । उजाले दिनों के इंतजार में काबुली अंधेरों के दौर से गुजर रहा था।

 
मिनी ने अमीना के लिए दिए तोहफ़े
रिहा होने बाद पुराने लोगों ढूंढते हुए वह कलकत्ता के उसी मुहल्ले में पहुंचा,जहां कभी मिनी का घर हुआ करता था। वहीं  जहां  कभी  वो फेरी लगाने  अक्सर जाया करता था. उधर से गुजरते हुए उस घर पर उसकी नजर ठहर गई । आज यहां चहल-पहल का माहौल है,वह दरवाजे के पास चला आया, जहां बावूजी इंतजाम में लगे हुए हैं। बदले हुए हुलीए के कारण उसे एकदम पहचान पाना थोडा मुश्किल था,पर समझ आ गया कि यह आदमी वही ‘खान’ है। काबुली मिनी को देखने की इच्छा प्रकट करता है, जिस पर बावूजी यह कहते हुए ‘आज नहीं! बहुत काम है। बाद में आना’ उसे जाने को कह देते हैं, लेकिन अगले ही पल उन्हें काबुली के बुझे दिल का ख्याल हुआ। बाहर आने के लिए मिनी को आवाज देते हैं। उसकी आंखों में मिनी की वात्सल्य छाया अब भी शेष थी,जैसे आज भी उसी बच्ची को देखना चाहता था । आज भी 'काबुलीवाले...काबुलीवाले' पुकारते हुए मिनी दौड़ी बाहर आएगी. सयानी मिनी का आज उसका ब्याह  होने वाला है, काबुलीवाला ने उसे खुशहाली की दुआएं दी । बावूजी काबुली (खान) को अपने वतन काबुल भेजने के लिए रूपए का इंतजाम करते हैं।  मिनी के विवाह के मद से रूपए निकाल कर उसे देने का निर्णय लिया था। मिनी बावूजी के इस कदम से बहुत संतुष्ट है, वह कहती है ‘इस रूपए से चाचा अपनी बिटिया के पास लौट सकें, मेरे लिए इससे बडा आशीर्वाद क्या होगा? रूपए के साथ सौगात के रूप में वह बहन अमीना के लिए एक तोहफा भी देती है । पहले तो अब्दुल यह सब लेने को राजी नहीं था। लेकिन ‘प्यार में एहसान नहीं होता,प्यार में सिर्फ प्यार होता है। यह एक पिता का दूसरे पिता के लिए प्यार है’ कहते हुए बावूजी उसे सहायता स्वीकार करने को कहते हैं । खुशी के आंसुओं में काबुलीवाला अपने वतन काबुल रवाना हो जाता है। यात्रा के  सांकेतिक दृश्य के पार्श्व में ‘अए मेरे प्यारे वतन, अए मेरे बिछडे चमन’ की पंक्तियों में फिल्म का मार्मिक समापन हुआ ।

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(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 2 अक्टूबर 1983 को पटना (बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।
संपर्क : passion4pearl@gmail.com )

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सोमवार, 9 मार्च 2015

पहली ड्रीम गर्ल की सुरमई यादें

भारतीय सिनेमा की अग्रणी  नायिका देविका रानी 

चित्र: गूगल बाबा के सौजन्य से





 









सैयद एस.तौहीद की क़लम से 

देविका रानी (जन्म: 30 मार्च, 1908 निधन: 8 मार्च, 1994) का शुमार भारतीय सिनेमा की अग्रणी नायिकाओं के तौर पर होता है। बीस के दशक में रिलीज एक द्विभाषी फिल्म  से सिनेमा का रुख़ किया था। उसे उस समय के जाने-माने निर्माता हिमांशु राय ने एक विदेशी कंपनी  के साथ मिलकर बनाई थी। उस समय देविका लंदन में कला की शिक्षा ले रही थी। देविका की हिमांशु से पहली मुलाकात वहीं हुई। देविका का सिनेमा रुझान देखते हुए हिमांशु ने उन्हें काम करने का न्योता दिया। देविका ने उस फिल्म में मंच सज्जा की। किंतु उन्हें नामों की सूचि में नहीं स्थान मिला। इसके बाद दोनों एक साथ जर्मनी में एक तकनीकी प्रशिक्षण लेने गए। उस दौरान देविका ने अभिनय-वेशभूषा-मेक अप आदि को मन लगा कर सीखा। देविका-हिमांशु में बेहतरीन तालमेल हुआ करता था। दोनों ने फिल्म निर्माण को समर्पित एक टीम बनाई। जिसके बाद ‘कर्म’ का निर्माण हुआ।

कर्म से बॉम्बे टॉकीज़ तक 
देविका-हिमांशु ने इसमें लीड भूमिकाएं अदा की थी। फिल्म को समकालीन आलोचकों ने काफी महत्त्व दिया। ब्रिटेन के समाचार पत्रों में उसकी बेहतरीन समीक्षाएं लिखी गयीं। फिल्म की कामयाबी ने दोनों को आपसी रिश्ते मजबूत करने का बेहतरीन अवसर दिया। इस समझ से दोनों का विवाह  बेहतरीन निर्णय रहा। स्वदेश वापसी के उपरांत इस जोडी ने ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सफल स्थापना की। इस ख्वाब को शायद उन्होंने जर्मनी में देखा होगा। देविका इस फिल्म कंपनी का चेहरा बनी जबकि इसकी संचालन का कार्यभार हिमांशु राय के जिम्मे था। जिस किस्म से देविका की जिंदगी चल रही थी, उस प्रकाश में उनका सिनेमा में आना महज तक़दीर का खेल कहा जा सकता है। ब्रिटेन में कला व संगीत की शिक्षा लेने वाली युवती का फिल्मकार हिमांशु राय से मुलाकात होना संयोग था। हिमांशु को देविका की प्रतिभा को नवाजते हुए फिल्मों में काम करने का आफर दिया। दोनों ने एक साथ फिल्में की। पहली फिल्म ‘कर्म’ रिलीज हो जाने बाद वो स्वदेश चले आए थे।
आप जब भी मुंबई के नाना चौक पर आएं तो बॉम्बे टॉकीज़ का इतिहास झांकता मिलेगा। जहां कभी विशाल स्टुडियो प्रांगण हुआ करता था, वहां गगनचुंबी बहुमंजिला इमारतें खडी हैं। इसके मुहाने पर पुरानी-बेकार गाडियों का अंबार एक गराज की शक्ल अख्तियार कर चुका है। एक नायिका के रूप में देविका रानी का नाम हांलाकि कभी बहुत मशहूर हुआ करता था, फिर भी उस समय के निशान आज नहीं मिलते। जानता हूं कि किसी ने भुलाने  नहीं दिया, लेकिन वो फिर भी यादों के कारवां से बाहर रहीं। एक कडवा घूंट जिसे बीते जमाने के कलाकारों को ना चाहते हुए पीना पडा है। भूले-बिसरे लोगों के नाम किसी पुरस्कारों के माध्यम से मिला करते हैं।  देविका रानी का किस्सा इससे जुदा नहीं था।

‘अछूत कन्या’ का असर जब पड़ा लड़कियों पर 
सिनेमा के बदलते तेवर ने उन्हें इससे अलग होने को बाध्य किया था। भारतीय सिनेमा की प्रथम नायिकाओं में शुमार देविका के संन्यास को पदमश्री व दादासाहेब फाल्के पुरस्कारों ने कुछ समय के लिए जरूर तोडा, लेकिन सिनेमा की दुनिया में महज हवा के झोंके थे। उनके योगदान को मुड़कर देखें तो सिनेमा को एक कला का सम्मान अता करने को भुलाया नहीं जा सकता। फिल्मों को एलिट लोगों में लोकप्रिय बनाने की महान क्षमता भी उनमें थी। भारतीय सिनेमा के पुराने चलन में बदलाव इस मायने में भी आया कि देविका के बाद कथित सम्मानित परिवारों की लड़कियां फिल्मों में आने लगी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की करीबी रिश्तेदार व भारत के प्रथम सर्जन जनरल की बेटी का फिल्मों में आना क्रांतिकारी था । एक तरह से अछूत दुनिया को उन्होंने अपनाया था।  स्टुडियो की पहली फिल्म के बाद  देविका के सह-अभिनेता नजमुल हसन को बाहर होना पड़ा। बॉम्बे टॉकीज़ की अगली महत्वकांक्षी फिल्म ‘अछूत कन्या’ के लिए उपयुक्त अभिनेता की तालाश अशोक कुमार पर जाकर ठहरी।  सामाजिक असमानता-जातिवाद-प्रेम तत्वों को समेटे यह फिल्म भारतीय सिनेमा में गुणवत्ता की मिसाल थी। ऊंचे जाति के युवा का दलित युवती से प्रेम की कहानी थी। उस जमाने में इस किस्म की फिल्में बिल्कुल नहीं बनती थी।  सामाजिक विसंगतियों के ऊपर गंभीर व आवश्यक विमर्श शुरू  हो गया था। कहा जा सकता है कि फ़िल्म अपने समय से आगे थी। सिनेमा के सफर में मील का पत्थर। भारतीय नारी की स्थिति को दर्शाने वाली फिल्मों का सफर देविका ने जारी रखा। इस दरम्यान जीवन प्रभात-निर्मला-दुर्गा का निर्माण हुआ।
 
दलित युवती व  ब्राह्मण युवक का प्रेम कस्तुरी-प्रताप
बॉम्बे टॉकीज़ को शोहरत की बुलंदियों तक लाने के लिए ‘अछूत कन्या’ की सराहना करनी होगी। सामाजिक विसंगतियों पर चोट करनी वाली इस फिल्म बरसों पुरानी होकर भी प्रासंगिक है। फिल्म को सरस्वती देवी के गानों से भी ख्याति मिली। परंपरा के मुताबिक देविका-अशोक कुमार ने गीतों को आवाज दी। दलित युवती की स्मृति में स्थापित मंदिर का यहां साहसी प्रसंग आया था। फ्लैशबेक माध्यम से उस लड़की की कहानी को बताया गया। दलित किशोरी कस्तुरी (देविका रानी) ब्राह्मण किशोर प्रताप (अशोक कुमार) जातिवादी पूर्वाग्रहों
से दूर एक साथ गीत गाते रहते हैं।  शायद इसलिए भी क्योंकि प्रताप व कस्तुरी के पिता आपस में दोस्त थे। कस्तुरी के पिता दुखिया ने कभी मोहन (प्रताप के पिता) की जान बचाई थी। वे दोस्ती के ऊपर जातिगत मानसिकताओं को तिलांजलि  देकर जी रहे थे। कस्तुरी-प्रताप में भी एक दूसरे को लेकर प्रेम का भाव है। लेकिन क्या जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रसित समाज इस ‘पाप’ को स्वीकार करेगा? पूरे समाज में केवल दुखिया तथा मोहन को इन किशोरों की चिंता थी। लेकिन उन्हें समाज का समर्थन नहीं मिलने वाला था। दलित युवती
से बेटे की नजदिकियां मां को स्वीकार नहीं। कस्तुरी के उदार माता-पिता जातिवादी भेदभाव से दुखी होकर भी असहाय हैं। उधर प्रताप का रिश्ता अपनी ही जाति की मीरा से तय हो जाता है। 
प्रताप-कस्तुरी को धर्म के ठेकेदारों ने अलग करने की कसम खा रखी थी। इसी दरम्यान सख्त रूप से बीमार दुखिया को इलाज खातिर अपने घर लाने की गलती मोहन बाबू से हो गयी। क्या ऊंची जाति का कुनबा इसे सहन करेगा? मोहन बाबू को मारपीट कर घर में आग लगा दी जाती है। भलमनसाहत वाले लोग दोनों को किसी तरह वहां से बचा लेते हैं। मामले की जांच के लिए पुलिस गांव पहुंचती है। क्या पुलिस दोषियों को सजा देगी? एक मुश्किल बात थी। प्रताप- मीरा का रिश्ता एक बेमेल परिणाम निकला। दूसरा कस्तुरी में संभावना तलाश रहा था। कस्तुरी का रिश्ता तय हो गया। क्या प्रताप कस्तुरी व खुद को इस भंवर से निकाल सकेगा? वो कस्तुरी को साथ गांव छोड देने का प्रस्ताव देता है। पीडा देखिए कि प्रताप व कस्तुरी जैसे प्रेम कहानियों का आगे सुखद समापन हो…वर्त्तमान कुरबान हो गया। कस्तुरी का त्याग प्रताप में भी अपने वर्त्तमान (मीरा) को अपना लेने का भाव डाल गया। क्या कस्तुरी-प्रताप का त्याग जातिगत विषमताओं को समाप्त कर सका? जवाब हम सबको पता है।

चुंबन, हिमांशु और ग्लोबल सिनेमा
देविका रानी की एक अन्य फिल्म ‘कर्म’ की प्रशंसा में तब के एक नामी अखबार ने लिखा कि फिल्म भारतीय सिनेमा के परंपरा में मील का पत्थर होगी। भारतीय सिनेमा को क्षमताओं को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास। एक चुंबन एवं उससे उपजे चिरकालिक विवाद के अलावा फिल्म में बहुत कुछ था। यह द्विभाषी प्रस्तुति  अंग्रेजी व हिन्दी में रिलीज हुई थी। एक नायिका के तौर पर देविका की पहली फिल्म थी। हिमांशु राय ने कर्म के बाद अभिनय को छोड निर्माण में विशेषता बना ली। हिमांशु राय के सिलसिले में फिल्म को दुर्लभ भी कहा जा सकता है। आज के ग्लोबल सिनेमा में जहां अंतर-सांस्कृतिक एवं अंतराष्ट्रीय पैमाने की फिल्में बन रही, ऐसे वक्त में तीस दशक की ओर मुडकर देखना लाजिमी हो जाता है।  बीता जमाना आज को चुनौती देता दिखाई देता है। शांतिनिकेतन व ब्रिटेन में तालीम हासिल करने वाले हिमांशु हमारे सिनेमा को विश्व स्तर पर ले जाने का नेक मकसद ले कर चल रहे थे। इसकी कामयाबी ‘कर्म’ में फलीभूत हुई। निर्माण के ज्यादतर पहलू तकनीकी रूप से संपन्न विदेशी तकनीशियन देख रहे थे। मेहनत के फल को आप बेहतरीन समीक्षाओं में देख सकते हैं। समकालीन भारतीय परिवेश से प्रेरित होकर भी विश्व स्तर की अपील वाली एक फिल्म बनी थी। महलों व महाराजाओं में भारत की विलासिता झलक रही थी। राज पाठ की भव्यता के बीच एक प्रेम कहानी को आकार दिया गया।
कर्म में आस्था को इसका मर्म रखा गया, एशियाई लोगों के लिए यह आकर्षण का बिंदु बना। हालांकि हिमांशु स्वदेश में फिल्म सफल होगी? को लेकर घबराए हुए थे। बांबे में रिलीज होकर दिल्ली व मद्रास में भी लगी। फिल्म को सकारात्मक अपनत्व मिला। फिर भी ब्रिटेन की तुलना में यह कम था। हमने फिल्म की कहानी को पसंद किया। दो राजसी घरानों के वारिसों के बीच उभरते प्यार की दास्तान यह थी। लंदन व भारत में फिल्मायी गयी इस फिल्म में भारतीय राजाओं व उनके भव्य महलों की छटा देखने को मिली थी। भारतीय रेल व केंद्रीय प्रचार संस्था फिर राजसी  राज्यों व उन पावन मंदिरों के संचालकों को धन्यवाद कहना चाहिए।

जीवन की जीत में विश्वास बनाने वाली दास्तान
समकालीन भारतीय परिवेश से प्रेरित होकर भी विश्व स्तर की अपील वाली एक फिल्म बनी थी। महलों व महाराजओं में भारत की विलासिता झलक रही थी। राज पाठ की भव्यता के बीच एक प्रेम कहानी को आकार दिया गया। कर्म में आस्था को इसका मर्म रखा गया, एशियाई लोगों के लिए यह आकर्षण का बिंदु बना। हालांकि हिमांशु स्वदेश में फिल्म सफल होगी? को लेकर घबराए हुए थे। बांबे में रिलीज होकर दिल्ली व मद्रास में भी लगी। फिल्म को सकारात्मक अपनत्व मिला। फिर भी ब्रिटेन की तुलना में यह कम था। हमने फिल्म की कहानी को पसंद किया। दो राजशी घरानों के वारिसों के बीच उभरते प्यार की दास्तान यह थी। लंदन व भारत में फिल्मायी गयी इस फिल्म में भारतीय राजाओं व उनके भव्य महलों की छटा देखने को मिली थी। भारतीय रेल व केंद्रीय प्रचार संस्था फिर राजशी राज्यों व उन पावन मंदिरों के संचालकों को धन्यवाद कहना
चाहिए। सीतापुर की राजकुमारी ( देविका रानी) व जयनगर के राजकुमार (हिमांशु राय) की प्रेम कहानी में धर्म-आस्था-आखेट का रोचक तत्व शामिल था। सांप-सपेरों की रुचिकर दुनिया को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया। सांप के जहर से मृत्यु की रेखा पर पहुंचे राजकुमार को बचाने वाली राजकुमारी की कहानी। प्रेम व आस्था तथा जीवन की जीत में विश्वास बनाने वाली दास्तान।
एक संपन्न बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाली देविका का आज के विशाखापटनम से गहरा नाता था। वो इसी शहर के एक बंगाली परिवार से थी। देविका का जन्म एमएन चौधरी व लीला जी के परिवार में हुआ थ। स्कूल की पढाई पूरी होने बाद संगीत व रंगमंच की शिक्षा लेने ब्रिटेन के नामी रंगमंच एकेडमी ‘रंगमंच की रायल अकादमी’ एवं ‘संगीत की रायल अकादमी’ में दाखिला लिया। फिर आगे जाकर वास्तुकला व डिजायनिंग की भी तालीम हासिल की। इ्सी दरम्यान उनकी मुलाकात पटकथा लेखक निरंजन पाल से हुई। निरंजन ने देविका के लिए बहुत सी फिल्मों की पटकथाएं लिखीं। बांबे टाकीज के महान स्वपन को निरंजन पाल व फिल्मकार फ्रांज ओस्टेन के योगदानों ने भी पूरा किया। हिमांशु-देविका की इस कंपनी ने हिन्दी सिनेमा को इन दोनों के अतिरिक्त अशोक कुमार-मधुबाला-दिलीप कुमार सरीखा कलाकार दिया। हिमांशु राय के निधन उपरांत बांबे टाकीज के मालिकाना हक़ की लडाई को बडे हिम्मत से लडा। फिर भी फिल्मिस्तान के उदय को रोक नहीं सकी। समय के साथ बांबे टाकीज का नाम इतिहास के पन्नों तक सिमट गया। यही वो वक्त था जब पेंटर स्वेतलाव रोरिक़ उनकी जिंदगी में आए। सिनेमा से दूरी बनने लगी …क्योंकि शायद जीवन की प्राथमिकताएं बदल चुकी थी।  वो बंबई को छोड पति के शहर बेंगलोर आ गयी, बाक़ी जिंदगी वो यहीं रही।


(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 2 अक्टूबर 1983 को पटना (बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।
संपर्क : passion4pearl@gmail.com )

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बुधवार, 4 मार्च 2015

क्या आप नक्शब जारचवी को जानते हैं..

बड़ी  मुश्किल से दिल की बेक़रारी को क़रार आया

गूगल साभार



सैयद एस.तौहीद की क़लम से


बुलंदशहर का एक छोटा सा कस्बा जारचा. इसी कस्बे के नक्शानवीस हैदर अब्बास के घर गीतकार नक्शब जारचवी का जन्म हुआ था. भाई बहनों में नक्शब जारचवी तीसरे  नंबर पर थे. नक्शब का असल नाम अख्तर अब्बास था. आपका परिवार जारचा छोड़कर मेरठ आबाद हो गया. आपने हाई स्कूल तक वहीं पढाई  की. बचपन से ही शायरी क शौक रहा, शायरी को लेकर आपकी दीवानगी कालेज के दिनों से पलने लगी थी .नाम के साथ जारचवी तखल्लुस रखकर अलीगढ़ के दिनों से लिख रहे थे.  इसी जमाने में मुशायरों मे जाते  भी रहे. यह आगाज अमरोहा से हुआ जो आगे जाकर दिल्ली गया. दिल्ली के  एक मुशायरा जिसकी सदारत कुंवर सिंह बेदी कर रहे थे. नक्शब ने अपनी गज़ल पढी. गज़ल सुनने बाद बेदी साहब ने मशहूर फिल्मकार वी शांताराम के नाम नक्शब के लिए ख़त लिख दिया. ख़त लेकर आप बम्बई चले आए. शांताराम ने नक्शब को एक प्रगतिरत फिल्म के लिए गाने लिखने हेतु साइन कर लिया. इसके बाद आपने  और भी फिल्मों के गाने लिखे . आपके ताल्लुक से फिल्म 'जीनत' की कव्वाली ' आहें ना भरे शिकवे ना किए, कुछ भी न जुबान से काम लिया. हम दिल को पकड़कर बैठ गए, हांथो से कलेजा थाम लिया' काफी मशहूर हुई.  महिलाओं की आवाज़ मे रिकार्ड की जाने वाली  पहली कव्वाली कही जाती है. इसे  नूरजहां एवं साथियों ने आवाज़ दी संगीतकार हफीज खान ने लाजवाब धुन बनाई.

जीनत में ब्रेक मिलने बाद आपने राशिद अत्रे के साथ अनेक प्रोजेक्ट पर काम किया. बंटवारे की तात्कालिक हडबडी में पाकिस्तान तुरंत नहीं पलायन कर गए.  गए जरुर लेकिन एक दशक बाद सन अठावन में. नक्शब जारचवी के ताल्लुक नूरजहां व जोहराबाई अंबालेवाली सरीखे फनकारों से सजी फिल्म जीनत महत्वपूर्ण थी। शौकत  रिजवी की जीनत में नूरजहां ने एक महत्वपूर्ण किरदार भी निभाया था. नक्शब ने लिखे गीत मसलन आंधियां युं चली बाग उजड गए काफी मशहूर हुए.नक्शब के ताल्लुक कमाल अमरोही की मशहूर महल भी याद आती है. हिंदी सिनेमा में अशोक कुमार—मधुबाला की यह फिल्म रूचि—रहस्य कथाओं में रिफरेंस प्वांइट मानी जानी चाहिए. महल के सभी गीत नक्शब जारचवी ने लिखे. इसका  हर गाना अपनी जगह शाहकार बना. यह गाने अपनी खासियत की वजह से आज भी याद किए जाते हैं.

नक्शब का लिखा ‘आएगा आएगा आनेवाला’ बेहद मकबूल हुआ. नवोदित लता मंगेशकर को गायकी की दुनिया में मकबूल करने वाला यह गीत आज भी पुराना नहीं हुआ. खेमचंद प्रकाश का संगीत फिल्म की बडी खासियत थी. यही वो वह सुपर गीत रहा जिसने लता को एक मशहूर बना दिया . इसी फ़िल्म का लता का गाया दूसरा गाना..मुश्किल बहुत मुश्किल, चाहत का भुला देना भी हिट हुआ था. कहना लाजमी होगा कि  लता को परवाज़ नक्शब जारचवी की कलम से मिली थी.


चालीस दशक की देव आनंद व कामिनी कौशल अभिनीत फ़िल्म में मशहूर संगीतकार सी रामचंद्र साथ भी  नक्शब जारचवी ने काम किया. आपके लिखे गीतों को शमशाद बेगम व लता जी ने आवाज दी. शमशाद आपा का..जिया मोरा इसी फ़िल्म से था. पचास दशक में रिलीज ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘अनहोनी’ में संगीत था रोशन का तथा गीतकारों की  फ़ेहरिस्त में नक्शब  भी शामिल थे. अनहोनी राजकपूर व नर्गिस की यादगार फ़िल्म बनी. लता व नवोदित गायिका राजकुमारी द्वारा मिलकर गाया गीत ...जिंदगी बदली काफ़ी चला. 


पचास दशक की शुरुआत में नक्शब ने फ़िल्म नगरी  में अपना सिक्का जमा लिया था.  इसी दशक में गीत लिखते हुए फ़िल्म मेकिंग में चले आए. फिल्मकार के रूप में अशोक कुमार व नादिरा की नग़मा आपकी पहली फ़िल्म थी. फ़िल्म के गीत आप ने ही लिखे. धुनें मशहूर नौशाद ने  रखी ...बडी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करार आया. शमशाद आपा की आवाज़ से सजा यह गाना एक जमाने में जबरदस्त हिट था. इसी फ़िल्म का एक और सुपरहिट नगमा...जादूगर बलमा छोड़ मोरी.. अमीर बाई की आवाज़ व नक्शब के बोल आज भी कानों में गूंज रहे . पचास दशक के आखिर सालों में नक्शाब ने ज़िन्दगी या तूफ़ान का निर्माण किया. एक बार फ़िर धुनें नौशाद साहेब ने सजाई.  प्रदीप कुमार व नूतन अभिनीत इस फ़िल्म का गीत..तुमको करार आए काफी लोकप्रिय हुआ. सन अठावन में आप करांची पलायन कर गए. आपकी शादी बुलंदशहर की ही लड़की से हुयी. एक जानकारी के अनुसार तेरह साल के लम्बे करियर में नक्शब को ज़माने के नामचीन फ़नकारों  साथ काम करने का मौका मिला.
 नक्शब को शायर से ज्यादा फिल्मकार कहलाना भाता था. इस ताल्लुक से आपने बताया कि हमारे हल्के में किसी का शायर हो जाना आम बात..घर घर से शायर निकला करते हैं. इसलिए मुझे वो खास नही मालूम देता. हालांकि आपका काम ऐसा नही कहता कि आप फिल्मकार बेहतर थे! आपने केरियर में शायरी एवम गीत बहुत लिखे ,फिल्में कम बनाई. शायर शख्सियत पर नज़र डाले तो यही सच्ची पहचान मालूम पड़ती है.नहीँ भूलें कि कव्वाली आहें ना भरा...फ़िर महल का थीम गाना एवम नवबहार का 'भटके हुए मुसाफिर मंजिल को 'से नक्शब को जोड़कर आज तक देखा जाता है. संगीतकार खेमचंद प्रकाश की नायाब धुनों से सजा यह गीत आज भी आकर्षित करता है. सिर्फ यही नहीँ आपके लिखी ज़्यादातर गाने सराहनीय रहे. इस तरह आपको शायर ही कहना चाहिए.
इस जुझारू शख्सियत ने पाकिस्तान जाने का निर्णय किन हालात में किया? इस बारे में जानकारी नहीं मिलती. एक किताब में नक्शब के हवाले से लिखा गया... एक रात में  कोई जनाब आपके घर मुलाकात के लिए आए. अगली सुबह दरअसल वो जनाब विलायत जाने वाले थे. नक्शब आपको तोहफा देना चाहते थे...आधी रात पर भी जानेवाले के लिए वो तोहफा मंगवाया गया. एक किस्से के अनुसार आपका यह मानना.. एक बार नोट किसी के लिए बाहर निकला तो वह उसी का हो गया नक्शब की दरियादिली बताता है...ऐसे बहुत से किस्से ‘मेरा कोई माज़ी नहीं’ में संकलित हैं.

बम्बई के मुश्किल दिनो का जिक्र करते हुए लिखा
 ' उन दिनों जीनत के लिए गाने लिख रहा था. काम ख़त्म हुआ तो  दिल्ली चला आया. यहां रहते हुए मुझे ना जाने शहर से बहुत लगाव हो गया. सब्जी मंडी इलाके मे मामूली सा कमरा लेकर रहने लगा. दिल्ली मे एक मुकम्मल ठिकाना बनाने की ज़िद  में ज़मीन लेकर मकान की तामीर मे लग गया.मुशायरों एवम फिल्म से आई आमदनी से वो बन रहा था.बनकर पूरा ही हुआ था कि बंटवारे ने क़यामत कर दी. मकान से फ़ायदा उठाना मुझे नसीब नहीँ हुआ. इन हालात ने कड़े इम्तिहान में डाल दिया. खुदा के करम से उधर जीनत जबरदस्त हिट हो गयी'

आपकी लिखी कव्वाली ने जिंदगी को मझधार से पार लगा दिया. नक्शब कि जिंदगी का यही वो  मोड़ था जहां से आपके दिन तेजी से बदलने लगे. लिखे गानों के जरिए आमदनी में भारी इजाफा हुआ.लिखने वास्ते अपनी मर्जी कि फीस मिलने से यह मुम्क़िन हो सका.आपने फिल्मी गीतकारों कि कदर व क़ीमत बढ़ा दी. अापने लिखने के लिए फीस मुकर्रर कर रखी थी. आपसे पहले गीतकारों को मामूली फीस मिला करती थी.लेखन को प्रोफेशनल कारीगरी मे उसका हक मुनासिब दर्जा मिला.मुश्किल भरे दिन बीते ज़माने कि बात हो चली.













(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 2 अक्टूबर 1983 को पटना (बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।
संपर्क : passion4pearl@gmail.com )

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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

जांनिसार के नाम सफ़िया के ख़त

पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे













सैयद एस.तौहीद की पेशकश


नए विकल्पों की तलाश में जब जांनिसार अख़्तर  भोपाल से बंबई आए तो पत्नी सफ़िया वहीँ रुक गयी थी. आपके साथ आपके बच्चे सलमान एवं जावेद अख़्तर भी रह थे.  सफ़िया हमीदिया कालेज में दी जा रही सेवाओं को जारी रखना चाहती थी. आप वहां पढाया करती थी. आप जांनिसार से बराबर खतो-किताबत करती रहती थी. कभी-कभार तो हफ्ते में दो खत लिखना हो जाता था. इन ख़तो में जज्बा-ए-मुहब्बत एवं हिम्मत बढ़ाने का दम था. अभी जान साहेब को रवाना हुए एक बरस भी नहीं गुजरा था जब सफ़िया सख्त बीमारी की शिकार हो गई. आपको गठिया एवं कर्क ने घेर रखा था. बीमारी से न घबराते हुए सर पड़ी मुसीबत का डट कर सामना किया. भोपाल में रहते हुए आप पर कई इम्तिहान आए लेकिन हिम्मत नहीं हारी. मुश्किल भरे उन दिनों लेखा-जोखा इन खतों में मिलेगा. उनसे गुजरते हुए लिखने वाले की अदबी जबान का का कायल होना होगा .इसे गमगीन ही कहा जाएगा कि सफ़िया के खतो को सिर्फ निजी ग़मों व परेशानियों का आईना माना गया. सफ़िया सिराजुल हक चालीस दशक की पढ़ी लिखी सेक्युलर महिला थी.प्रगतिशील विचारधारा को लेकर चलने वाली साफिया ने अपनी मर्जी का हमसफर चुना. फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आप मजाज की बहन थी. अदब में खत-किताबत को ग़ालिब से शुरू माना जाएगा क्योंकि आपने खतों को रचना की शिद्दत से लिखा.इनमें शायरी एवं गज़ल की गहराई का एहसास होता है. खतों में फिराक एवं वस्ल के पहलू के साथ मुश्किलों का हिम्मत से सामना करने का जज्बा मिलता है. साफिया के उन खतों में से एक ख़त आपके लिए..

भोपाल
फरवरी 1952

बेशकीमत मुहब्बत

आपका ख़त मिला .मेरे बारे में इस कद्र फिक्र ना किया करें. आपने एक हिम्मत वाली ईरादे की पक्की लड़की को हमसफर चुना. तमाम इम्तिहान के बावजूद सफ़िया ने अब भी पुराना जज्बा नहीं खोया. हालांकि कभी कभी जिन परेशानियों से गुजर रही होती उनके बारे में बात निकल जाती है.जानती हूं आप भी परेशान हो जाते होंगे.लेकिन क्या करूं उन बातों को आपसे ने कहूं तो फिर किससे. दिसंबर में सेहत थोड़ी दुरुस्त थी .लेकिन अब तकलीफ फिर वही पहले की तरह आ रही. जितनी देरी तक मुमकिन होगा खुद से इन्हें संभाल कर चलूंगी.लेकिन इस सिलसिले में हमें कोई फैसला जल्द लेना होगा.इलाज की खातिर वक्त बे वक्त बराबर आपको आना होगा. कोई दूसरी सुरत नजर नहीं आती. आप ने कहा कि बम्बई छोड़कर आएंगे तो काफी नुक्सान होगा,रोजगार का सवाल खड़ा हो जाएगा. बेरोजगारी अपने साथ नई मुसीबतें लेकर आती है.उस चीज को लेकर आप जरूरत से ज्यादा फिक्रमंद हो जाते हैं. इन हालात में क्या कहना ? आप ही बताएं! कुल मिलाकर अब यही मालुम हो रहा कि इन हालातों से आपको समझौता करना होगा. मेरे खातिर जिस तरह आपके काम के साथ मुझे करना है. बच्चो की खातिर हमें मिलकर चलना होगा .हमें उनकी परवरिश में कमी नहीं रखनी.मां-बाप के नाते उनकी उम्मीदों साथ नाइंसाफी नही की जाएगी. इस 12 फरवरी तक आप यहां फुर्सत लेकर आएं ताकि हम परिवार के साथ थोडा ज्यादा वक्त गुजारें. दो हफ्ते
मुनासिब होंगे.


मिसदाक़ के आने पर जादू बहन से नोटबुक में एक कहानी लिखवाए बिना उसे रिहा नहीं करता.फिर वो उस लिखे के उपर अपनी बात रखता. कहानी को लेकर जादू की बातें मिसदाक़ को सोचने पर मजबूर कर जाती हैं. भाई की जहीन नवाजी के लिए उसके पास लफ्ज नहीं होते.अब तो जनाब ओवेस भी स्कुल जा रहे. जादू छोटे का खूब ख्याल रखा करता है. कल बीते दिन की बात सुनें कि ओवेस तीन गलतियों में उलझ गया था. एक जिसे समझाय जाना बेहद जरुरी था जिसमे वो स्कूल की घंटी बजने का मायने सिर्फ घर वापसी समझ रहा था. आपकी घर आमद की खबर को लेकर बच्चों में बेइंतेहा खुशी है. ऐसा क्या ख़्वाब दिखा दिया इन्हें कि रातों में नींद नहीं आती. हो सके तो एक खत इनके नाम भी लिख भेजिए. एक मरहले पर आपको इन बच्चों को भी लिखना चाहिए. अख्तर.. बीमारी को लेकर पूरी जनवरी परेशान रही.इंतेखाब की गहमा-गहमी ने अलग चिडचिडा बना दिया. बीमरी रह-रहकर तकलीफ का सबब हो रही. नहीं मालुम आगे क्या पेश आए. उस दिन का हमें मिलकर सामना करना है. इस वक्त कालेज में हूं तालिबों का आना जाना लगे होने से बातें छुट रही हैं. इसलिए सोचती हूं बाक़ी बाद के लिए मुनासिब होगा. घर पर इस तरह की परेशानी नहीं होगी.. बच्चे भी स्कुल में होंगे. सो वहीँ
पर इत्मिनान से आगे लिखूंगी. तब तक के लिए हजारों सलाम . भोपाल आमद की तारीख लिख भेजिए....

आपकी
सफ़िया


(रचनाकार-परिचय:
 जन्म: पटना बिहार
शिक्षा : जामिया मिल्लिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।
संपर्क : passion4pearl@gmail.com )

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मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

ख़्वाजा अहमद अब्बास को याद करते उनके नवासे

 आज़ाद  क़लम का  आख़िरी पन्ना














मंसूर रिज़वी की क़लम से
मेरी परवरिश बंबई के उसी घर में में हुई,जहां बाबा रहा करते थे। अब्बास साहब को हम मुहब्बत से ‘बाबा’ ही पुकारा करते थे । जुहु के उनके मकान में सन सत्तासी तक रहा, जोकि अफसोस से उनके इंतक़ाल का साल भी था। बाबा को हमेशा उस इंकलाबी शख्सियत के तौर पर याद करता हूं… जो लकवे का झटका बर्दाश्त कर भी पहली मुहब्बत क़लम पर कायम रहे। उन मुश्किल दिनों में आप साप्ताहिक बिलिट्ज़ के लिए हिंदी व अंग्रेजी मजमून लिख रहे थे। आप मरते वक्त तक वहां ‘आज़ाद  क़लम’  नाम से ‘आख़िरी पन्ना’ कालम लिख रहे थे। 
बहुत सी फीचर फिल्मों को बनाने के अलावा बाबा ने वतनपरस्ती जज्बे को जगाने वाली खास फिल्में भी बनाई। अब्बास साहेब वतन को लेकर बहुत गंभीरता से सोंचा करते थे। आप जज्बा-ए-वतन अर्थात देशभक्ति के जबरदस्त पैरोकार थे। आपकी लघु फिल्म ‘दो दोस्त’ में मेरे अलावा एक मजदूर के बेटे ने भी काम किया
था। कहानी में अमीर व  ग़रीब लडकों की तस्वीर-ए-जिंदगी के बरक्स पनप रही गहरी दोस्ती को विषय बनाया गया। इनकी प्यारी दोस्ती बन रही इमारत के पूरा हो जाने के  साथ जज़्बाती अंत को पा गयी। अम्मी आपको
मामूजान कहकर बुलाया करती थी। हम भी आपको कभी कभी मामूजान कहा करते थे। आप यकीन ना करें लेकिन अमिताभ भी अब्बास साहेब को इसी नाम से पुकारा करते। अमिताभ बच्चन से मिलना मुझे अब भी याद है। शहंशाह रिलीज होने की खुशी में एक महफिल जमा हुई थी। उन दिनों बाबा बहुत सख्त बीमारी से गुजर रहे थे। अमिताभ साहेब ने हमारी फिक्रों को साझा किया| आपको बताऊं कि अस्पताल के खर्च की जिम्मेदारी अमिताभ उठा रहे थे|
एकता के जज्बे को सलाम करते हुए बाबा ने ‘Naked Fakir’ डाक्युमेंट्री बनाई थी । महात्मा गांधी की इज्जत में सदर विंस्टन चर्चिल के इस्तकबाल ‘Naked Fakir’ के नाम से महात्मा गांधी पर फ़िल्म बनाई । बाबा परवरदिगार को अपनी इबादत व अकीदत अदा करने के लिए उसके किसी घर से परहेज नहीं करते थे । धर्म के संकीर्ण भेदभाव से विरोध का यह नायब तरीका था|

 काम की तालाश में आए फरियादी नौजवानों को आप अपने दर से खाली नहीं लौटाया करते थे। जिंदगी की राह में इनके जुनूं को जिंदा रखना जानते थे| फिल्मों में तक़दीर आजमाने आए इन युवाओं को शायद मालूम ही था कि बाबा ने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन  की तक़दीर बनाई। वो जाने अनजाने अमिताभ की किस्मत पा लेने की कोशिश में दीवाने से  थे। इंटरव्यु में इन लोगों से बाबा का सवाल रहता, आपने मेरी कौन सी फिल्में देखी? सबसे ज्यादा पसंद आने वाली फिल्म? इसका रटा रटाया जवाब ‘सात हिन्दुस्तानी’ हुआ करती थी। आगे बाबा इसी से जुडा हुआ सवाल रखते मसलन  आपको किस किरदार ने सबसे अधिक प्रभावित किया? इसका जवाब अक्सर अमिताभ बच्चन का किरदार ‘अनवर अली ‘ हुआ करता था। बहुत से लोग ऐसा ही जवाब देते तो बाबा उलटकर पूछ लेते कि सिर्फ अमिताभ ही क्यों? जवाब ...युवा इम्तिहान में लड़खड़ाने लगते| वहां मौजूद हमलोग तब हंसी रोक नहीं पाते थे! बाबा नेहरू के विचारों को कटटरता से मानने वालों में से थे। 
आप जवाहरलाल नेहरू के वक्त से नेहरू-गांधी खानदान से गहरे रूप से प्रभावित रहे। इस खानदान पर आपने बहुत सी किताबें भी लिखीं। फिर भी इमरजेंसी की वजह से इंदिरा गांधी की पालिसियों की जबरदस्त आलोचना करने से नहीं चूके । इंदिरा जी पर लिखी आपकी दो किताबें इस सिलसिले में अहम थी। एक बार बाबा मुझे आल इंडिया रेडियो की रिकाडिंग सिलसिले में साथ ले  गए थे। उन दिनों बचपन के लिहाज से दुनिया की हलचल से अनजान सा था। इंदिरा गांधी की हत्या की खबर लेकिन इस उस बच्चे को भी असर करने वाली थी| क़त्ल की खबर पर अब्बास साहेब के चेहरे की रंगत को बदलते जरूर देखा। 

हमें एक डिनर पर जाना था,लेकिन आपका मन गमगीन फिजा में डिनर की सोंच सकता था? आसपास का माहौल भी नाजुक हो चुका था। घर वापसी के रास्ते में कुछ इंतेहापसंद नौजवानों ने रास्ता रोककर इंदिरा के कातिलों को खत्म करने के लिए मदद मांगी। गाडी रोकर हमलोगों के हुलिए की छानबीन की गयी। उस वक्त उसमें अम्मी व चचीजान के अलावा मर्द की शक्ल में अब्बास साहेब भी सवार थे । इंतेहापसंद लोगों के सरों पर खून सवार था… लेकिन हमारी गाडी को पास कर दिया गया। क्योंकि एक लडके ने बाबा को पहचान लिया था..युवा अपनी धड़कन को भला नुकसान पहुंचा सकते थे ? सब बहिफाजत वापस घर में थे| बहरहाल ... खेलों में  बाबा को क्रिकेट में सबसे ज्यादा  दिलचस्पी थी। हिन्दुस्तान-पाक मुकाबलों के खासे दीवाने रहे। जानते हुए कि आपकी बहन को करांची ब्याहा गया था| यह जानने की कोशिश में कि बाबा किस टीम की हिमायत में? हम आपका पक्ष जानना चाहते थे। बाबा का जवाब दो टूक हुआ करता….कपिल देव का दीवाना हूं।
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(पेशकश सैयद एस.तौहीद)

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बुधवार, 26 नवंबर 2014

ख्वाजा अहमद अब्बास और अलीगढ़

 वसुधैव कुटुंबकम के सच्चे पैरोकार 












सैयद एस.तौहीद की क़लम से


ख्वाजा अहमद अब्बास इस सदी के मकबूल पत्रकार,कथाकार एवं फिल्मकार थे। आपको वाकिफ होगा कि अब्बास अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से ताल्लुक रखते हैं। अलीगढ से पढकर निकलने वाले महान विद्यार्थियों में आपका एक मुकाम था। अलीगढ को अब्बास सरीखा छात्रों पर नाज है।  अब्बास साहेब के परिवार का अलीगढ से एक पुराना रिश्ता रहा है। आपके परनाना ख्वाजा अल्ताफ हुसैन हाली जनाब सर सैयद अहमद के करीबी दोस्त थे। आपके नाना ख्वाजा सज्जाद का ताल्लुक अलीगढ की पहली नस्ल से था। ख्वाजा सज्जाद ने मोहम्मडन एंग्लो इंडियन कालेज से स्नातक किया था। अब्बास के पिता ख्वाजा गुलाम भी विश्वविद्यालय से जुडे रहे। विश्वविद्यालय रिकार्ड अनुसार अब्बास का जन्म हरियाणा के पानीपत में हुआ था। तीस के दशक में आप अलीगढ में शिक्षा ले रहे थे। आपके चचाज़ात भाई ख्वाजा अल सैयद भी अलीगढ के छात्र थे। बाद में जाकर आपके यह भाई वहीं प्रोफेसर भी नियुक्त हुए। 
अलीगढ में अब्बास पहली बार ख्वाजा सज्जाद संग सन पच्चीस के जुबली समारोह में आए । सामारोह में मुसलमानों के सबसे मशहूर नेता व शख्सियतें शामिल थी । इन शख्सियतों में मुहम्मद अली जिन्ना एवं इक़बाल तथा अली इमाम फिर आगा खान का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। मशहूर लीडर अली इमाम से आप पहली मर्तबा इसी सामारोह में मिले। विश्वविद्यालय के जुबली सामारोह व दिलकश फिजा ने अब्बास को बहुत प्रभावित किया। जुबली सामारोह में पेश वाद-विवाद प्रतियोगिता ने दिल जीत लिया था। शानदार इमारतों और जुबली के हंगामों के बीच वाद-विवाद का कार्यक्रम सबसे हटकर था। जुबली डिबेट कंपीटिशन में आपके चचाज़ात भाई हीरो बनकर उभरे। वो  घटना ने जिसने आपकी जिंदगी को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह यही डिबेट कंपीटिशन था । तकरीबन पांच हजार लोगों की भीड थी । मंच पर मुसलमानों के सबसे मशहूर नेता मौजूद थे। डिबेट का विषय ‘हिन्दुस्तान के मुसलमानों को क़ौमी सियासत में बाक़ी लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, अथवा अलग पार्टी भी बनानी चाहिए’।  पक्ष में  बात आपके भाई ने रखी जिसको वहां आए सभी मशहूर लोगों ने काटने की कोशिश की। आपके चचाज़ात भाई  ख्वाजा अल सैयद की तक़रीर अलीगढ के इतिहास में  यादगार है। इसने आपकी जिंदगी का रुख मोड दिया । तक़रीर खत्म होते ही पंडाल तालियों से गूंज उठा।  विपक्ष में बोलने वाले मिस्टर अली इमाम ने आपके विजेता भाई को गले लगा लिया था। इस पर उनके धडकते हुए दिल ने कहा ‘भाईजान ने बहुत खूबसुरत व काबिले तारीफ तक़रीर पेश की है, एक दिन मैं भी इनकी तरह बनूंगा। बडे भाई की तरह ओजस्वी तकरीरें दूंगा । लेकिन इसके लिए बहुत कुछ पढना-लिखना पढेगा, बडे आदमियों का मुक़ाबला करना पडेगा…सब करूंगा…सब करूंगा’। 
अब्बास अपने एक आलेख में लिखते हैं 
‘कभी इंजन ड्राईवर बनने का ख्वाब था, फिर जज बनना चाहता था, डाक्टर बनकर लोगों की खिदमत करने का दिल आया । डिप्टी कमीशनर होने का भी ख्वाब सजाया। इल्म ताल्लुक इस मंथन उपरांत पत्रकार, नेता व वक्ता बनने का सपना देखने लगा। इनके अलावा वो शख्सियत भी जिनसे मेरी उम्र के करोडों हिन्दुस्तानी प्रभावित हुए । जिनकी छाप हजारों युवाओं की जिंदगी व किरदार पर कायम रही । महात्मा गांधी…इनको पहली बार जब देखा तो उस वक्त मेरी उम्र पांच या छह बरस की थी ,लेकिन उस बचपन में भी उनकी महान शख्सियत ने मुझे प्रभावित किया। भगत सिंह जिनकी शहादत के दिन मैं और मेरे कालेज के बहुत से साथी इस तरह फूट-फूट कर रोए कि हमारा सगा भाई शहीद कर दिया गया है...।

इंटर कालेज के दिनों में एक रोज आप दोस्तों के साथ साइकल पर ताजमहल को चांदनी रात में देखने निकल पड़े । रास्ते में साइकल का टायर फट जाने की वजह से एक गांव में रुके। उस गांव के लोगों की आर्थिक बदहाली ने आपके दिल में पीडा व संवेदना का समुद्र जगा दिया। आप इसे ज़ाहिर  करने का जरिया तलाश करने लगे। इन हालातों ने आपको हांथ बांधे चुपचाप वक्त गुजारने नहीं दिया। तीस दशक में अलीगढ विश्वविद्यालय मुसलमानों की उभरती नस्ल का चिंतन स्थल एवं सांस्कृतिक केंद्र था। प्रगतिशील आंदोलन ने साहित्य को नया भविष्य दिया, अलीगढ आंदोलन का एक मुख्य स्रोत था।  अख्तर रायपुरी, ख्वाजा अहमद अब्बास, सआदत हसन मंटो, जानिसार अख्तर एवं मजाज तथा अली सरदार जाफरी सब अलीगढ के छात्र थे। कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक कुंवर अशरफ उस्तादों में से थे। उस जमाने में अलीगढ में कम्युनिज्म की लहर थी। छात्रों की कोशिश यह थी कि लहर की रफ्तार तेज कर दिया जाए। मुल्क को आज़ाद करने का हर जतन लोग दीवाने कर रहे थे। 
अलीगढ तराना के लेखक मजाज की बहन के अनुसार
 विश्वविद्यालय का हर जमाना प्रकाशवान जमाना था।  इसके क्षितिज पर जगमगाने वाले सितारों की रोशनी देश के हर कोने में पहुंची। शिक्षा साहित्य चिंतन व आंदोलन में अलीगढ के छात्रों का नाम था।  ऐसा मालूम होता था मानो यहां प्रेरणा की रोशनी फूट रही हो। अलीगढ के अहाते से आजादी के दीपक को खुराक मिल रही हो। कोई जोशीला सामाजिक कार्यकर्ता, कोई आजादी का दीवाना…कुछ युं फिजा रही जिसमें सब अपने-अपने शस्त्रों से विदेशी निजाम को जडों से उखाडने पर आमादा थे। एक नया सवेरा…एक नयी जिंदगी जन्म ले रही थी। उस वक्त अलीगढ में जोशीले युवाओं का दल उभर चुका था जिसके कार्यों को विश्वविद्यालय का इतिहास कभी भूला नहीं सकेगा।  पत्रकारिता के माध्यम से आंदोलन की पहल अख्तर रायपुरी ने की । आपने हांथ से लिखा साप्ताहिक अखबार निकाला। हांथ से लिखे इस अखबार की प्रतियों को हरेक हास्टल पर चिपकाया जाता था। इस हफ्तावार की खबरें व आलेख आज़ादी के जददोजहद के सरमाया था। सामग्री अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ तेवर की थी। अख्तर रायपुरी से सीख लेकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने भी हांथ से लिखा अखबार ‘अलीगढ मेल’  निकाला। अखबार अब्बास की पत्रकारिता का पहला तेजाब था।  वकालत की पढाई के दरम्यान आपने Aligarh Opinion नामक अखबार भी निकाला। 
शुक्रवार का आधा दिन व रविवार का आधा दिन इन उत्तरदायित्वों को संभालने में गुजर जाता था। इसके अलावे अब्बास विश्वविद्यालय से जुडी खबरों को खुफिया तरीके से Hindustan Times एवं Bombay Chronicle को भेजा करते थे। इन खबरों पर विश्वविद्यालय पर्दा डालने की कोशिश करता था।  खुफिया खबरों को प्रकाश में लाने के लिए प्रशासन की ओर से धमकियां भी मिलती थी। अखबार विश्वविद्यालय प्रशासन व शिक्षकों व अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ आम राय को प्रकाश में लाता था। अब्बास प्रशासन द्वारा बाग़ी करार दिए जाने लगे। अली सरदार जाफरी लिखते हैं…अलीगढ में तहरीक-ए-आजादी का तेजाब उठ रही थी। अब्बास ऐसे ही एक तेजाब थे। आप अपने जमाने के बेबाक वक्ता थे। अब्बास व मजाज तथा उनके साथी रात गए रेलवे प्लेटफार्म पर तफरीह करना पसंद था। प्राक्टर आफिस द्वारा लगाई गयी पाबंदियों को तोडने का मजा था ही साथ ही उम्मीद रहती कि हसीन लडकियों का दीदार होगा। जाडों की रातों में स्टेशन की गरम चाय में भी एक खास लुत्फ था। उन दिनों आप बाछु भाई के नाम विख्यात थे। अब्बास के हवाले से अलीगढ से ताल्लुक रखने वाले एक किस्से अनुसार अब्बास अपने जिगरी अंसार भाई को प्लेटफार्म गर्दी के लिए देर रात बुलाने आते थे। दोस्तों में तय था कि वो खिडकी पास आकर भौंकने की आवाज़ निकालेंगे और इस आवाज़ पर अंसार भाई खामोशी साथ बाहर निकलेंगे। एक मर्तबा रात प्लेटफार्म पर किसी रेलवे कर्मचारी से खबर मिली कि रेल से अलगे दिन जवाहर लाल नेहरू देहली से इलाहाबाद जाने वाले हैं। अब्बास और अंसार भाई दोनों ने ही तय किया कि खुर्जा पहुंचा जाए। अलीगढ में मेल दो मिनट के लिए रूकेगी। पुलिस एवं नगर के कांग्रेसियों का हुजूम होगा। पंडित जी का चेहरा भी मुश्किल से देखने को मिलेगी। यह सोंचकर दोनों दोस्त खुर्जा पहुंच गए। वो चलती गाडी में किसी तरह नेहरू जी के पहले दर्जा कंपार्टमेंट तक पहुंचने में सफल रहे। इनकी काली शेरवानियां अलीगढ की खास पहचान थी । आपने पंडित नेहरू से अलीगढ आने का आग्रह किया, जिसे नेहरू जी ने कुबूल किया।
एक मर्तबा डिबेट प्रतियोगिता सिलसिले में बंबई से भी छात्र अलीगढ आए। इन्होंने विश्वविद्यालय स्वीमिंग पूल पास रानी विक्टोरिया की तस्वीर टंगी देखने बाद कुछ युं कहा ‘हमने अपने यहां फाउंटेन पर बनी रानी की प्रतिमा की तोड दी। यहां के छात्र अब भी अंग्रेजपरस्त हैं।  अगली ही रात अब्बास व दोस्तो ने स्वीमिंग पर टंगी रानी की तस्वीर को फ्रेम से निकाल फेंका। प्रशासन ने समझदारी का तकाजा दिखाते हुए मामले को तूल नहीं दिया।  महान शख्सियतों में अब्बास महात्मा गांधी की विचारधारा से प्रभावित थे। अलीगढ में ग़ांधी जी से अपनी दूसरी मुलाकात के बारे में अब्बास ने लिखा…महात्मा गांधी विश्वविद्यालय छात्र युनियन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में तकरीर देने आए थे।  हाल हाऊसफुल था…लेकिन मैं डायस के फर्श पर गांधी जी के कदमों पास बैठने में कामयाब रहा। युनियन के प्रेसीडेंट के भाषण दौरान मेरा ध्यान गांधी जी तरफ था। बापू बेफिक्री से इधर-उधर देख रहे थे। कुछ युं जैसे यह बातें किसी दूसरे वयक्ति के बारे में कही जा रही हों। एक बार इक नजर मेरी ओर डाली तो उन्होंने शायद देखा कि यह युवा टकटकी बांधे इन्हें देख रहा। मेरा अंदाज देखकर वह मुस्कुराए,पहले तो मैं घबराया जैसे चोर पकडा गया हो। लेकिन शायद मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट उभर आई । गांधी जी मासूम मुस्कुराहट तो हरेक आदमी के लिए थी। यह अलग बात है कि हरेक यही समझता कि यह मुस्कुराहट…यह मां की ममता समान मुहब्बत सिर्फ उसके लिए है। फिर वो समय भी आया जब जनवरी तीस की शाम को बंबई के मरीन ड्राईव पर टहलते हुए किसी ने बताया कि किसी सिरफिरे ने महात्मा गांधी को गोलियां चलाकर मार डाला है। सुनकर ऐसा लगा कि चलती दुनिया रुक गयी…जिंदगी थम गयी है। अब्बास खुद को वतन एवं कौम की संतान तस्व्वुर करते थे। गांधीजी व पंडित नेहरू के परिवार को अपना परिवार समझते थे। इंसानियत व समाज के नजरिए से पूरी दुनिया को रिश्तेदार मानते थे।

















(रचनाकार-परिचय
 जन्म: 2 अक्टूबर 1983 को पटना( बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म रिव्युज
संप्रति : सिनेमा लेखन
संपर्क : passion4pearl@gmail.com )

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