बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

फुटपाथ : बाजार एवं व्यापार की संवेदनहीनता

















सैयद एस.तौहीद की कलम से 


 'फुटपाथ'  व्यापार, मुनाफा एवम भ्रष्टाचार से बढ़कर गम्भीर कालाबाजारी की अमानवीय,मर्मविहीन समस्या पर सामयिक विमर्श है।पचास दशक में बनी यह फ़िल्म अपने विषय एवम प्रभाव में समकालीन समय एवम उससे काफ़ी आगे की थी।भ्रष्टाचार व कालाबाजार की चुनौती आज भी कायम है । उसका रुप पहले से हो सकता अलग हो गया हो।

देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी काट रही, फुटपाथ के लोगों की तक़दीर पहले से कोई बहुत ज्यादा नहीं बदली। महंगाई, भ्रष्टाचार व कालाबाजार का ताप सबसे ज्यादा निचली परत को को सदा से बर्दाश्त करना पड़ा है, फुटपाथो पर रहने वालो का सारा दिन जिंदा रहने में ही गुज़र जाता है। गरीबी, लाचारी और बेबसी  उन्हे हिंसक बना रही है।

आसमान छूती महंगाई के लिए कालाबाजार को बहुत हद तक जिम्मेदार माना जाना चाहिए।मुनाफा और सिर्फ मुनाफे के लिए खडी यह व्यवस्था अहम चीजों की सप्लाई को बाधित कर उनकी कीमतें आसमान पर ले जाती है।

लाभ का व्यापार करने वाले को आदमी के दुख से सम्वेदना नहीं होती,क्योंकि आपदा या दुख से भी मुनाफा कमाने का भारी अवसर मिलता  है। बाजार एवम व्यापार की इस सम्वेदनहीनता को परखने वाली फिल्मों में फुटपाथ ने पहल ली थी।सम्वेदनशील नज़र से देखें तो समझ आता है कि  भ्रष्टाचार तत्कालिक तौर पर मुनाफा ज़रूर लाता है, किंतु आदमी से सम्वेदना, भावना,सहयोग एवम समर्पण जैसे मूल्य भी  चुरा  लेता है। नतीजतन आदमी में आदमीयत खो जाती है। जबकि दूसरी ओर यह इंसान का आदमी होना भी दुश्वार कर देता है। तत्कालिक मुनाफे एवम बहुत अधिक मुनाफे की खराबी से समाज के हर तबके को आगे चलकर नुकसान उठाना पड़ता है। स्वीकार करना,ना करना अलग बात है.

व्यापार की मजबूरी है कि वो मुनाफे बगैर चल नहीं सकता,जिसका वो अक्सर फ़ायदा उठाता रहता है. लेकिन उसे नही पता कि मुनाफे के समुद्र की कामना अपराध है।  व्यापार का नुकसान बाज़ार बहुत कम उठाना जानता है, उसका असर उपभोक्ता अथवा खरीददार को उठाना है। जिसके पास बाजार से खरीदने की क़ीमत नहीं वो गरीब और भूखा रहने को मजबूर होता है, जिसके पास कीमत नहीं वो जीने से भी मज़बूर हो जाता है। यह नहीं तो फिर अपराधी बन जाना आम है। 
गरीब, मजबूर से उससे जीने का अधिकार छीन लेना।उसे अपराधी बनने को मज़बूर करना गुनाह है. गरीब को और गरीब बनाने वाले बाज़ार को  'कालाबाजार' नहीं कहें तो फिर क्या ?जिसका बचपन फुटपाथ पर गुजरे, उसके मन में व्यवस्था को लेकर ज़हर सा बन जाता है। गरीबी से भी बदतर जिंदगी काटने वाले फुटपाथ के गरीब बच्चे अपराधी बन जाते हैं, जो नहीं कर सकते वो महंगाई, गरीबी लाचारी,अत्याचार के ताप में दम तोड़ देते हैं। क्या कालाबाज़ार इन जवान मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं ? लहलहाते खेतो में यदि पैदावर कम बताई जाए,अनाज गोदामों में सडे और गरीब भुखमरी में आत्महत्या कर ले।  महंगाई आसमान पर हो, महामारी में दवाइयों की कीमतें कम होने बजाए दुगनी क़ीमत पर मिले, तो समझ लेना चहिए कि कालाबाजार काम पे लगा हुआ है।

'फुटपाथ'  महंगाई,भ्रष्टाचार,कालाबाजार एवम मुनाफाखोरी के गम्भीर विषयों को इंसानियत और इंसाफ के संदर्भ में देखने वाली महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी।

फुटपाथ है नोशू ( दिलीप कुमार ),माला (मीना कुमारी ),बानी मास्टर (रोमेश थापर),धरती अख़बार, फुटपाथ की कहानी. कहानी रामबाबू (अनवर हुसैन ) सरीखे मुनाफापरस्त द्बारा चलाए जा रहे  कालाबाजार की कहानी।फुटपाथ पर गरीबी,लाचारी,बेबसी की वंचित जिंदगी में बचपन खो रहे नोशू को अपना कर बानी ने बड़ा काम किया। बानी में उसे अपना बड़ा भाई मिल गया था। बानी  मास्टर उसे अपने भाई से बढ़कर मानता था।नोशू के बिलखते बचपन को फुटपाथ के अंधेरे और गुमनामी से उठा कर घर की रौनक में ले आया।विस्थापितों की पीड़ा का संज्ञान लेनी वाली फिल्मों में अग्रणी स्थान इसे दिया जाना चाहिए.

नौजवान नोशू ने अख़बार में काम पकड़ लिया कि भाई बानी का बोझ कम हो जाए। वो ख़ुदगर्ज नहीं था, लेकिन खुद कमाना चाहता था। खोजी खबरों का समर धरती अखबार आए दिन बंदी झेल रहा, किसी को भी बराबर तनख्वाह नहीं मिल रही।नोशू के हालात अब भी पहले जैसे थे।वो गरीबी,लाचारी और फुटपाथ को पीछे छोड़ देने का ख्वाब देख रहा था । अपने हालात से तंग आकर उसने जुर्म की पनाह लेकर कालेबाज़ार की ख़ुदगर्ज,अंधेरी बेशुमार दुनिया में चला आया। नोशू की  लाखों रुपए कमा कर अमीर बनने की चाहत यही आसानी पुरी कर सकता था !  रामबाबू ने यही बताया था.कालाबाजार की छांव में वो बड़ा आदमी बन गया, उसे नही मालूम कि चार दिन की चमक फीकी पड़ेगी।


ईमानदार बानी ने नोशू और उसकी दुनिया से नाता तोड़ लेता है। भ्रष्टाचार, कालाबाज़ार की काली दुनिया के बनावटी उजाले ने मुहब्बत की ' सच्ची रोशनी ' माला की आस भी ले ली,पुराने साथी बिखर गए, दिल का रिश्ता टूट गया..नोशू को वो  दुनिया सदा दे रही थी। दिल मे तूफान उठा और बुरा नोशू अमीरों से  गरीब,मजलूम,मजबूर लोगो का बदला लेने वाला मसीहा बन गया। खुद के गुनाह का उसे एहसास था कि दौलत की अंधी लालच ने उसे बहुत बुरा आदमी बना दिया..अनाज के काला बाज़ार का व्यापारी बना दिया।

ईमानदार, इंसानियत के फरिश्ते बानी को नोशू की दुनिया से सख्त नफरत थी .

नोशू को जेल हुई।नोशू के सभी साथी भी गिरफ्तार हो गए..कालाबाज़ार का पर्दाफाश हुआ।

नोशू जेल जा रहा, उधर माला मोनू से कह रही...रोओ  नहीं मोनू.वो दिन ज़रूर आएगा, जिसका तुम्हें इंतजार है..मुझे इंतजार है।

नोशु के किस्म किरदार से दुनिया बदल सकती है,लेकिन परेशानी यह कि कितने भ्रष्ट लोग,संवेदनाहीन व्यापार करने वाले कारोबारियों  को मुक्ति का यह मानवीय रास्ता नज़र भी सुहाए ? क्योंकि यह समर्पण  त्याग एवम इंसानियत और नैतिक  जिम्मेदारी की बेहतरीन मिसाल थी। स्वार्थ के अंधेरे में डूबे को समाज की पीडा नज़र नही आती। ऐसा भी नही कि दुनिया में भले लोग नहीं,लेकिन खुश रहने के वास्ते ग़ालिब यह ख़याल अच्छा है।

राजा का बेटा जग्गु दो दिन की भूख से रो रहा था ,तब उसी नोशू ने उसके दर्द को समझा..
क्या बात है मोनू जग्गु रो क्यों रहा ?इसके और इसके बाबा ने कल से खाना नही खाया है,जग्गु के हांथ मे रुपया देते हुए..जाकर खाना खा लेना। जग्गु के बाबा गरीब होकर भी बहुत खुददार आदमी थे, लेकिन गरीबी,लाचारी ने एक बाप के दिल को गहरा ज़ख्म दिया था। वो नोशू से कुछ अहम जवाब मांग रहा..मानो हाशिए का सारा दुख कह डाला..इतना समझाया था कि बेटा रोना नही, तेरे रोने से मेरी बदनामी होगी।दुनिया समझेगी मै शराबी हूं, जुआरी हूं, बदमाश हूं  जाने क्या हूं। मेरा एक ही बच्चा है, वो भी आए दिन भूखो मरता है। मै किस किस को समझाता फिरुंगा  कि जो तनख्वाह मिलती है उसमे गुज़र नही होती।
दिन रात मेहनत मज़दूरी करने के बाद भी हम भूखो नंगे हैं, अंदर बाहर से गल सड़ गए हैं।ना घर बार का ठिकाना है,ना दो टुकडे रोटी का  सहारा है।नोशू तुम तो समझदार आदमी हो तुम ही बताओ कि हमारे बच्चों की रोटी कौन छीनता है ? उन्हे रास्ते की ठोकरें खिलाते -खिलाते कौन मार डालता है ? इतनी आबाद दुनिया में हमारे बर्बाद होने के सामान कौन करता है ?बताओ  नोशू,बताओ क्या बात है ?क्या खेतों को आग लग गई..वहां अनाज नही रहा ?  दुनिया को क्या हो गया ? आदमी को क्या हो गया ?जग्गु मैं कुछ नही जानता, आदमी को क्या हो गया (झल्लाते हुए ) मेरी आंखो मे आंख डाल क्या देख रहे हो ?ज़माने में बर्बादी का बीज कोई मैने थोड़े ही बोया है। मै क्या जानता हूं...कुछ नही जानता।

राजा के सवाल नोशू को इसलिए झकझोर गए क्योंकि वो उसी संवेदनहीन दुनिया को पाने की चाहत में डूबा युवा था..इन चुभते हकीकत ने उसे एक बार दोबारा दोराहे पर ला दिया, उसे  एक कठोर फैसला लेना था...

माला आज मुझे एक बहूत बड़ा फैसला लेना करना है. बहुत बड़ा फैसला करना है। यह फैसला करना है कि जिंदगी भर इसी तरह गरीब रहना होगा, राजा और उसके बच्चों कि तरह भूखो रहना होगा,सपने उठाने होंगे या ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने की कोशिश करनी होगी। पैसे की कीमत कौन  नही जानता ! इसके बगैर क्या हो सकता है ?कुछ भी नही हो सकता। आपसे मेरा  रिश्ता भी तो नहीँ जुड़ सकता इसके बगैर।
लेकिन बानी की समझ में यह बात नहीँ आती।उसकी समझ में नहीँ आती, यह बात। इसलिए आज मैने घर छोड़ दिया। अब मै बानी के साथ नहीँ रहूंगा,कहीं और चला जाऊंगा, बानी के साथ नहीँ रहूंगा,नहीँ रहूंगा।जिंदगी भर मैने बानी का दिल दुखाने का कोई काम नहीँ किया। और गरीब रहकर जितना जलील हो सकता था,उतना जलील भी हुआ। दूसरे  नहीँ जानते लेकिन मैं जानता हूं कि इस फुटपाथ पर जग जग कितनी राते काटी हैं । इसकी मिट्टी में मेरी मजबूरियों के बेहिसाब आंसू शामिल हैं..माला अब मैं गरीब नहीँ रहना चाहता..मैने पैसा बनाने की एक सूरत ढूँढ निकाली है,और मैने बहुत अच्छा किया है। एक दिन आएगा कि सब मान जाएंगे कि मैने बहुत अच्छा किया।

माला नही चाहती थी कि नोशू की नासमझी से भाई-भाई का रिश्ता खराब हो..यही कह सकती हूं कि ऐसा न हो तो अच्छा है,फिर भी कौन जाने क्या होने वाला  है।

नोशू पैसे वाला आदमी बन गया था, वो एक आलीशान बंगला खरीद लेता है..वो उस घर में दाखिल होता है...पुरानी बात, बीता हुआ कल  बेकग्राउंड संगीत के साथ चलने लगा ' देख लेना नोशू अपने बानी मास्टर के लिए इतना बड़ा महल बनाएगा,इतना बड़ा महल बनाएगा कि हर दूसरे दिन बानी मास्टर को ढूंढना पड़ेगा कि कहां खो गए..।

जाहिर था कि नोशू को आज अपने भाई की बहुत याद आ रही थी। उसकी कही बातें दिल मे गूंज रही... तुम चले आओ बानी,तुम सचमुच चले आओ बानी,अपने नोशू के पास चले आओ,उस दुनिया को भी अपने साथ ले आओ जिसका मेरे दिल से,मेरी आत्मा से बहुत गहरा सम्बंध है,बानी।

उधर बानी की नौकरी जाती रही.. जिंदगी ईमानदार बानी का इम्तिहान ले रही थी, जिस तरह खुदा अपने अजीज बंदों का लिया करता है। वो परेशान ज़रूर था लेकिन टूटा नहीं।

देखिए बानी का हौसला...भगवान अगर है तो सबकुछ ठीक कर देगा, नहीँ है तो खुद ठीक कर लेंगे।लेकिन मीना मुश्किल घड़ी में पति का साथ देने बजाय मायके चली जाती है.क्योंकि उसे अपने सुख से काम था । बहुत दिनो से किराया ना चुकाने कारण बानी मास्टर सड़क पर आ गए।

एक दिन नोशू मोटर कार से अपनी उसी बस्ती  मे आया।अगल बगल के लोग उस पर कमेन्ट करने लगे...चार पैसे क्या आ गए तो भाई को छोड़ दिया।

परिवार -समाज के  तिरस्कार को  आदमी जयादा दिन बर्दाश्त कर नहीं सकता. लेकिन समाज का दबाव उसी आदमी को राह पर ला सकेगी,जिसे  उसकी परवाह हो. नोशू थोड़े देर के लिए बुरा आदमी ज़रूर था, लेकिन उसका किरदार नहीं मरा था..माला से उसकी यह बातचीत गौर करें..

लोगो की  बातों से उसके दिल को चोट नहीँ पहुंचती ? माला यह भी जानना चाहती थी कि उसके पास रुपया कहां से आता है ?
चोट खाने की आदत कुछ पुरानी सी हो गई है,माला ! आजकल मैं अपने दिमाग से काम लिया करता हूं।जिस दुनिया और जिस समाज मे हम आप रहते हैं, वहां पैसे की इज्जत करना जरूरी है,उससे मुहब्बत करना जरूरी है। यह जानना कोई जरूरी नहीँ कि पैसा कहां से और क्यों कर आता है...वाकई नोशू एक कड़वी हकीकत को कह रहा।
लेकिन माला जानना चाहती थी कि नोशू ने बानी जैसे भाई का साथ क्यों छोड़ दिया ?मैने कालेबाजार का धंधा शुरू किया है। बानी को इससे नफरत थी,इसलिए मुझे उससे अलग होना पड़ा।इस बात से माला को दुख हुआ. उसकी समझ में यही आया कि नोशू को अपनों से ज्यादा पैसा प्यारा है।आप भी यही सोचने लगी है क्या ? सचमुच... उसके बाद कुछ बाकी नहीं रहा, वैसे भी कालेबाजार का धंधा चोरी,जुए से काम बुरा नहीँ, लोग ठीक कहते है कि मै बहुत बुरा आदमी हूं, मै वाकई बहुत बुरा आदमी हूं। नोशू की कालेबाजार की दुनिया से माला भी मुंह मोड़ लेती है। बानी पहले से ही उससे बातचीत बंद कर चुका था..नोशू से उसके अपने पराए हुए जा रहे थे.भरी दुनिया में रुपए वाला होकर भी उससे  अपने ही किनारा कर रहे..अब बानी को ही देखें। 
बता सकते हो बानी, मैने तुम्हारा क्या छीन लिया ?मेरी दौलत ऐसी दौलत नहीँ, जिसको तू छीन सकेगा। मेरी दौलत मेरा दिल है। मेरा आदमी होना मेरी दौलत है, और यह कालेबाजार से नहीँ आई, चार दिन की छांव नहीँ है,समझे। जा..जा चला जा यहां से..मुझको काले दिल वालों से बात नहीँ करनी..यह कहकर उसने नोशू से मुंह मोड़ लिया।
 गरीबी और मुफलिसी से भागकर मैने पनाह क्यों ली ? मैने इतना बड़ा गुनाह क्यों किया ? मुहल्ले वालों की नफरत,माला की नफरत और तुम्हारी नफरत कुछ नहीँ है,बानी। कोई ऐसी ठोकर लगाओ कि भेजा फ़टकर बाहर निकल आए..और दुनिया वालो को पता चल जाए कि मैने क्या गुनाह किया! बानी की बात सुनिए समझ सकेंगे कि नोशू से क्या बड़ी भूल हुई थी..

र वो आदमी जो मजबूरो की लाशों पर अपना महल खड़ा करेगा,ठोकर ही खाएगा। यह मेरे दिल की आवाज़ है,जिसको तू नहीँ सुन सकेगा। इसलिए कि अब तू आदमी नहीँ रहा। गरीबों के बच्चे जब भूखो मर रहे थे तो तू इनके हिस्से का अनाज बेच बेचकर अपने खजाने भर रहा था,उस वक्त तेरा प्यार कहां था ? जा चला जा,हमारे पास आना होगा तो पुराना नोशू बन के आना।

नोशू को बानी के पास,अतीत मे लौटने के लिए त्याग करना था..ग़म की इस घड़ी में उसे कैफे की डांसर सुमन का साथ मिला.बानी  और माला के ठुकराए जाने बाद वो दुनिया मे एकदम सा अकेला पड़ गया।

उसे  एक दोस्त की ज़रूरत थी ,जिससे अपनी सब बाते कह सके... मुझको आज ऐसा मालूम होता है कि जैसे इस दुनिया अकेला हूं और यहां मेरा कोई नहीँ है.बिल्कुल ऐसा मालूम होता है मुझको।सुमन का मानना था कि रूपया पास हो तो आदमी सबकुछ खरीद सकता है !

नोशू अपना सबकुछ देने को तैयार था.. यह रूपया पैसा अपने लिए थोड़े ही जमा कर रहा हूं ! यह सब लोग इतनी सी बात समझते क्यों नहीँ है ? इतनी सी बात इनकी समझ कयों नहीँ आती, सुमन ? इस मुफलिसी से,इस जिल्लत से घबराते क्यों नहीँ ?इस गरीबी से डरते क्यों नहीँ हैं ? जिसमे दिन रात,सुबह शाम गलते -सड़ते रहते हैं.इतनी सी बात इन लोगो की समझ क्यों नहीँ आती ? क्या हुआ इन सबको ? 
व्यापार ने रुपया ज़रूर दिया लेकिन उससे इंसानियत का एहसास छीन लिया था, जिस फुटपाथ को कभी दिल मे बसाए फिरा करता था..भूल से उसी का बड़ा दुश्मन बन बैठा।

अपनी भूल को सुधारने नोशू वापस एक दिन अपने पुराने अख़बार 'धरती ' पर आया..उसमे  हृदय परिवर्तन हो चुका था। वो फ़िर से अखबार के लिए लिखना चाहता था...घोष बाबू नए नाम से फिर से लिखना शुरु करने का इरादा है।

लेकिन नए नाम से लिखने की क्या ज़रूरत थी  ? नोशू के इस जवाब का रूह से बहुत गहरा नाता था। आर्थिक युग में यह बातें बेमानी सी नज़र आएंगी, लेकिन ज़रा गौर करें...जब जेब खाली होती है, तो इंसान सीना तान के चलता है। जब सर पे दौलत का बोझ लद जाता है, तो गर्दन झुक जाती है। इंसान  बुजदिल हो जाता है। 
पैसे के धंधे में ऐसा ही होता है...जब दस मरते हैं तो एक जीता है। नोशू कालाबाजार के लोगों के खिलाफ लिखने लगा, उसकी जान खतरे में जान कर अखबार के सहयोगी घोष उसे लिखना बंद करने कि सलाह देते हैं। जवाब काबिले गौर।
जाने तो बहुतों की खतरे मैं हैं..शहर में बीमारी फैल रही है,और कालेबाज़ार वालों ने दवाईयों को बंद कर रखा है.जैसे -2 लोग मरेंगे, दवाइयों के दाम ऊंचे होंगे। इसलिए लिखना ही होगा. जाहिर था कि नोशू को बेकसूर लोगों की जान की फिक्र ज्यादा थी।
अस्पताल में मरीजों की तादाद बढ़ रही थी, बानी मास्टर भी अस्पताल में भर्ती हैं। उनकी हालत दिन गुजरने साथ बिगड़ती जा रही थी।

महामारी  की चपेट में आकर बिहारी बाबू की पहले ही मौत हो चुकी थी. उधर दवा का व्यापरी रामबाबू से दवा रीलिज करने का आग्रह करता है।ज्यादा मुनाफा पाने के लालच में सेठ बेशुमार बेकसूर लोगों की जान का दुश्मन बना हुआ था..

...मरने दो,मरना जीना तो किस्मत का खेल है..हम व्यापारी लोग हैं, अगर चार दिन बाद मुनाफा ज्यादा मिल सकता है,तो आज क्यों बेचे ? लारियों में दवाइयों को भरवा  कर रातों रात गंदे नाले में फेंकवा दिया।  इंसानियत के ऊपर मुनाफा,व्यापर हावी था।
उधर बानी मास्टर मर गए..नोशू को इसकी ख़बर रजवा से मिली..व्यापार एवम मुनाफा खोरी,कालाबाजारी ने कई इंसानों की जान ले ली। नोशू से उसका अजीज भाई छीन गया..दौलत की अंधी भूख में उसने बानी की जान ले ली थी. फुटपाथ अपने तकदीर पर मातम ना मनाए तो क्या करे ?  हाशिए के दुख की इंतेहा नहीं. बाज़ार क्या कभी  इंसान की कीमत समझ सकेगा ?



(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 2 अक्टूबर 1983 को पटना (बिहार) में
शिक्षा : जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उच्च शिक्षा
सृजन : सिनेमा पर अनेक लेख . फ़िल्म समीक्षाएं
संप्रति :  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन।


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हमको आइना दिखाना है, दिखा देते हैं.
- अल्लामा जमील मज़हरी

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