बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

शहीद राजेश शरण को सलाम!

हे वीर! तुझे आखिरी विदा







 








शहरोज़ की कलम से

मैं मुक्तिधाम हूं .रविवार (१२ फरवरी) सुबह से ही मेरे हाथ काँप रहे थे। मेरे आंगन के  बरगद, पीपल और नीम भी मौन थे। हरमू (नदी) की  हवाएं भी कानों के पास आकर बुक्का फाड़ रो पड़ी । अशुभ की आशंका हमें डरा रही थी। धूप का रंग भी गमों सा धूसर। जबकि नियति की  विडंबना ·कहिए, मेरी बाहें शवों का  दाह करती हैं।  पर दोपहर से पहले ही जैसे किसी ने मुझे झकझोरा अरे! मुक्तिधाम तू रोता है। देख तेरी बाहों में आज वीर आया है। हां। सीमा सुरक्षा बल के  सेकंड  इन कमांड राजेश शरण। नक्सलियों से लड़ते हुए वह शहीद हो गए। राम नाम सत्य है.....इसे सुनने के कान अभ्यस्त हैं। फिर राजेश शरण अमर रहे के नारे ने चौंकाया । शोक से लदा फंदा काफिला पहुंच ही गया। बीएसएफ और झारखंड पुलिस के जवान। पत्रकार लेखकों का हुजूम। शहर के आम नागरिक । मैं सामना नहीं कर सका । उनकी छलछलाती आंखों में महज बिछोह का दर्द नहीं था। उसमें कहीं प्रशासनिक  चूक, समाज व प्रबुद्ध जनों के दोहरे चरित्र भी नजर आए। मैंने आंखें मूंद लीं। लेकिन  अटल खड़े पेड़ों का साहस चूक गया। वे झर झर बहने लगे। आंगन में पतियां बिखर गईं। बाहें फैला दी मैंने। देश के लाल को सीने से लिपटा लिया। तिरंगे से लिपटे और फूलों से आच्छादित शहीद राजेश। जवानों ने कतारें लगाईं । शहीद को सशस्त्र सलामी दी।

होश मैंने 1913 में संभाला। ढेरों लोगों की अंत्येष्ठि हुई। लेकिन आज ऐसा क्यों। रह रह कर होंठों में कम्पन । पांव थरथराते। पापा....पापा...मेरे पापा को ला दो...पापा को उठा दो.....उस मासूम ईशान का क्रंदन। अपने मामा रीतेश की गोद में छटपटाता हुआ नन्हा बच्चा। मैंने भी चोरी चोरी कई आंखों में टटोला। किसी की  हिम्मत उस ओर देखने की  नहीं थी। उस अबोध के विलाप का जवाब कोई देगा। लेकिन हे प्रभु! मुझे क्षमा करना! शहर की तरह ही मेरी आंखें भी जार जार हैं। लेकिन छाती थोड़ा चौड़ी भी। उस जवान ने उग्रवादियों से लोहा लिया। उनसे संघर्ष करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। मैंने शोक का मौन ग्रहण कर लिया। राजेश के पापा प्रेमशरण सत्संगी की तरह। लेकिन जब भंग होगा तो....। स्वेटर पर बेतरतीब सा लटकता मफलर। कभी शून्य, तो कभी खुद से बतियाती उनकी आंखें। चेहरे की रेखाएं थोड़ी पिघली हुई। हे ईश्वर इस बुजुर्ग में ऐसा धैर्य। चिता सजा दी गई है। पार्थिव शरीर को  कन्धा देने सी होड़ । हर कोई अंतिम बार अपने जांबाज को देखना चाहता है। छोटे भाई राजेश शरण ने ईशान को गोद में लिया। मुखाग्रि दे दी। धीरे धीरे चिता की ज्चाला बढऩे के साथ ही भावनाओं के ज्वार ने सभी को घेरे में ले लिया। दर्द जब अतिरेक  पर हो तो अभिव्यक्त नहीं हो पाता। मासूम ईशान बुजुर्ग सा अभी चुप है। वहीं बुजुर्ग पिता के मासूम कदम डग डग....।


भास्कर के लिए लिखा गया






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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)