बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता। इससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता। कई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
हर
काल में हर लेखक या कवि तेवरवाला
नहीं हुआ है। अव्यवस्था और
विपरीतताओं को लेकर आक्रमकता
की तलाश हर रचनाकार में ढूंढना
सही नहीं होगा। कबीर और गालिब
युग में एक ही होता है। हर दौर
में गोदान नहीं लिखा जा सकता।
हां यह जरूर है कि समय का दबाव
हर काल में रहा है, लेकिन
सृजन कभी मंद नहीं पड़ा। आज
निस्संदेह बाजार साहित्यकारों
को प्रभावित कर रहा है। कारपोरेट
संस्कृति से अछूता नहीं है।
बाजार और लेखकों के तेवर के
सवाल पर ये बातें मैथिली-हिंदी
के सुपरिचित कथाकार गौरीनाथ
ने कही। वे विद्यापति स्मृति
पर्व समारोह में शिरकत करने
रांची आए हुए थे। जहां मैथिली
मंच झारखंड ने उन्हें विदेह
सम्मान से नवाजा। भास्कर से
खास संवाद में गौरीनाथ कहते
हैं कि सत्ता से ज्यादा बाजारतंत्र
लेखकों को प्रभावित कर रहा
है। उसके शरीर और मन को बदल
रहा है। लेकिन लेखन पूरी तरह
शिथिल नहीं हुआ है।
जबतक
लौकिक परंपरा, विद्यापति
तबतक
मैथिली
कवि विद्यापति की प्रासंगिकता
पर गौरीनाथ बोले, महज
भक्तिकालीन कवि कहकर,
उनका मूल्यांकन
नहीं किया जा सकता। हिंदी
बेल्ट में लोकसंस्कृति के
बहाने कृषि आधारित समाज व्यवस्था
की वकालत वह बहुत पहले कर गए
थे। वे अपनी कविता में भगवान
शंकर से कहते हैं, त्रिशूल
को तोड़कर फल बनाएं और खेती
करें। विद्यापति के प्रेमगीत
जनकंठों में हैं। जन व्यवहार
में उनके गीतों की उपादेयता
है। जीवन की लौकिक परंपरा जब
तक रहेगी, विद्यापति
प्रासांगिक रहेंगे।
शहरों
की अपेक्षा भयावह ढंग से बदल
रहे गांव
बात
बाजार की चली, तो
गोदान के बहाने हम गांव भी
पहुंचे। संप्रति दिल्ली में
रह रहे मूलत: गांव
के गौरीनाथ कहते हैं,
सिर्फ शहर ही
नहीं बदल रहे, गांवों
में स्थिति और बदतर है। गांव
भयावह ढंग से बदल रहे हैं।
नैतिकता और अपनत्व का वहां
लोप हो रहा है। भाई, भाई
का हिस्सा हड़प रहा है। शहर
से अधिक अराजकता वहां है।
अपराध और हिंसा का ग्राफ शिखर
पर है। उपभोगतावादी अपसंस्कृति
अपनी समग्रता में गांव-जवार
में पैठ जमा रही है, जिससे
उसकी चौपाल और पंचायत से लेकर
रसोई और आंगन भी प्रभावित है।
प्रवासियों
में भाषा-संस्कृति
को लेकर ज्यादा ललक
बाबा
नागार्जुन मैथिली में यात्री
नाम से विख्यात हैं। गौरीनाथ
भी अनलकांत उपनाम से मैथिली
में लिखते हैं। पर उनका मानना
है कि भाषा और संस्कृति को
लेकर प्रवासियों में ललक अधिक
है। पटना के सम्मेलन में भीड़
भले कम दिखे, लेकिन
हैदराबाद, गोहाटी,
दिल्ली या
रांची में आयोजित किसी भी
समारोह मैथिली समाज काफी तादाद
में जुटता है। मैथिली में गौरी
हरिमोहन झा के बाद यात्री,
ललित और राजकमल
को प्रगतिशील परंपरा का वाहक
समझते हैं। मौजूदा समय पत्रिका
अंतिका की भूमिका उनकी दृष्टि
में महत्वपूर्ण है।
हिंदी
बया के साथ मैथिली पत्रिका
अंतिका का संपादन
हिंदी
अकादमी, दिल्ली,
भारतीय भाषा
परिषद, कोलकता
का युवा पुरस्कार समेत कई
पुरस्कारों से अलंकृत गौरीनाथ
का जन्म वर्ष 1969 में
मार्च की किसी तारीख में जनपद
सुपौल (बिहार)
के कालिकापुर
गांव में हुआ। 1991 ई.
से निरंतर
कहानियां और वैचारिक लेखन।
नाच के बाहर और मानुस मशहूर
कहानी संग्रह। मैथिली उपन्यास
दाग के लिए उन्हें विदेह सम्मान
मिला है। विभिन्न अखबारों
में नौकरी। करीब दशक भर हंस'
के सहायक संपादक
रहे। संप्रति हिंदी बया और
मैथिली त्रैमासिक अंतिका के
साथ अंतिका प्रकाशन का
संपादन-संचालन।
भास्कर
रांची के 26 दिसंबर
2015 के अंक
में प्रकाशित
पहली नज़्म पंद्रह साल में, मजमुआ छपा जब 22 की हुई
जब मैं पंद्रह साल की थी, तभी कालेज के दिनों में एक नज़्म लिखी थी. जिसको मेरे दोस्तों ने बहुत सराहा. दोस्तों की ही जिद़ पर मैंने यह नज़्म पाकिस्तान के उस ज़माने के मशहूर रिसाला ‘फूनून’ में छपने के लिए भेजा. जिसके संपादक मशहूर अफ़साना निगार व शायर अहमद नदीम क़ासमी थे. पहला संग्रह ‘पत्थर की ज़बान’ 1968 ईं. में छपा, तब मैं 22 साल की थी. मेरे शादी को सिर्फ दो महीने हुए थे.
28 जुलाई 1946 को मेरठ में जन्म
मैं 28 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में पैदा हुई. मेरे वालिद रियाजुद्दीन अहमद जदीद दौर के माहिरे तालीम थे. उन्होंने सिंध पाकिस्तान में इस सिलसिले में ज़बरदस्त काम किया. वह वहां जदीद तालीम के बानी माने जाते हैं. जब मैं चार साल की हुई तो वालिद साहब का इंतेक़ाल हो गया. वालिदा हुस्ना बेगम ने परवरिश की. उन्होंने बड़ी ही जद्दोजहद से हम लोगों को पढ़ाया. सिंधी और उर्दू मीडियम से मैंने पढ़ायी की और इन दोनों ज़बानों में शायरी भी. बाद में मैंने फ़ारसी और अंग्रेजी भी सीखी. कालेज के दिनों में ही मैं पाकिस्तान रेडियो मंे न्यूज कास्टर की हैसियत से काम करने लगी.
शुरुआती एक नज़्म
मेरी चमेली की नर्म खुश्बू
हवा के धारे पर बह रही है
हवा के हाथों में खेलती है
तेरा बदन ढूंढने चली है
मेरी चमेली की नर्म खुश्बू
मुझे तो ज़ंज़ीर कर चुकी है
उलझ गयी कलाईयों में
मेरे गले से लिपट गयी है
वह याद की कुहर में छुपी है
सियाह खुन्की में रच गयी है
घनेरे पत्तों में सरसराते
तेरा बदन ढूंढने चली है।
जामिया और जेनयु में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर
ग्रेजुएशन के बाद मेरी शादी हुई. एक बेटी हुई, कुछ सालों बाद तलाक़ हो गया. उस वक्त मैं बीबीसी उर्दू प्रोग्र्राम से मुंसलिक हो गयी थी. इसी दौरान मैंने फिल्म मेंकिग में डिग्री हासिल की. कराची में एक एडवरटाइजिंग एजेंसी खोली और एक उर्दू प्रकाशन ‘आवाज़’ नाम से शुरू किया. उन्हीं दिनों जफ़र अली उज़ान से मुलाक़ात हुई. वह एक लेफ्टिस्ट पॉलिटीकल कार्यकर्ता थे. हम लोगों ने एक दूसरे को पसंद किया और शादी कर लिया. इनसे दो बच्चे हुए वीरला अली उज़ान, कबीर अली उज़ान (मरहूम). हमारे पब्लिकेशन ‘आवाज़’ में लिबरल और राजनैतिक किताबों की खबर लोगों तक पहुंची. लोगों ने खूब बवाल मचाया और कई तरह के मुकदमे हम पर डाल दिए गए थे. मुक़दमे जफ़र पर भी थे. ब्रिटिश ऐक्ट 124ए के तहत मुकदमें चले. मैं आवाज़ की एडिटर और पब्लिशर थी. ज़फर जेल चले गये. हमें हमारे चाहने वालों ने जेल जाने से पहले ही जमानत पर रिहा करवाया और मैं अपने दो छोटे बच्चों और बहन के साथ हिन्दोस्तान आ गयी. बाद में जेल से छूटकर ज़फ़र भी हिन्दोस्तान आ गये. मैंने यहां सात साल गुज़ारे. इस दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर की हैसियत से काम किया.
पीएम बनते बेनज़ीर ने बुलवा लिया
फिर बेनज़ीर भुट्टों के शादी के मौके से हम लोग पाकिस्तान गए. जब बेनज़ीर भुट्टों पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो हमें नेशनल बुक फाउंडेशन का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया. नवाज़ शरीफ सरकार ने हमें हिन्दोस्तानी एजेंट और बहुत सारे इल्जाम से नवाज़ा. जब बेनजीर भुट्टों दूसरी बार वज़ीरे आज़म बनी तो मुझे क़ायदे आज़म एकेडमी का चार्ज दिया गया. इसी दौरान मेरा बेटा कबीर अक्टूबर 2007 ई. में अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने गया और स्विमिंग के दौरान हादसे का शिकार हुआ. 2008 में मैंने मौलाना रोमी की पचास नज़्मों का तर्जुमा फ़ारसी से उर्दू में किया. यह मसनवी मौलाना जलालुद्दीन रोमी ने अपने शेख शम्स तबरेज़ को डेडीकेट किया है. मैं 2000 से 2011ई. तक उर्दू शब्दकोश बोर्ड की मैनेजिंग डायरेक्टर भी रही. मैंने सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में भी काम किया. मैंने सिंध यूनिवर्सिटी में एम.ए के दौरान छात्र राजनीति में हिस्सा लिया. मैंने यूनिवर्सिटी संविधान के खिलाफ खूब लिखा. जनरल अयूब खां के जमाने में छात्र राजनीति पर पाबंदी लगा दी गई. जनरल ज़िया उल हक़ के ज़माने में हमें बहुत ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा.
पत्थर की ज़बान से हम रिकाब तक लम्बा सफ़र
जो मन में आता है लिख देती हूं. बाद में कई बार लोग बुरा-भला भी कहते हैं जिससे तकलीफ़ होती है. एक लड़की होना हमारे समाज में एक ऐसी चीज़ है जो समझ से परे है. लड़कियों को इंजॉय करने की समाज इजाज़त नहीं देता. मैं तो कुछ लिख भी देती हूं, लेकिन समाज अभी भी दकियानूसी दौर में जी रहा है. कई किताबें शाया हुईं . ‘बदन दरीदा’, पत्थर की जब़ान, ख़ते मरमूज़, गोदावरी नावेल, क्या तुम पूरा चांद न देखोगे, कराची, गुलाबी कबूतर, धूप, आदमी की ज़िन्दगी, खुले दरीचे से, हलक़ा मेरी जंजीरों का, अधूरा आदमी, पाकिस्तानी लिट्रेचर और सोसायटी, क़ाफिला परिंदो का, ये खाना-ए-आबो-गिल, दरीचा-ए-निगारिश, हम रिकाब आदि. इसमें शेरी मजमुए, नाविल, सफरनामे और तर्जुमें वग़ैरा शामिल है.
तब दंगों का बाज़ार गर्म था, आडवानी थे रथ यात्रा पर
परेशानी ही परेशानी थी, लेकिन यहां मेरे दोस्तों ने संभाला. खासतौर से जनवादियों ने डी.पी.त्रिपाठी साहब ने उस वक्त मेरी बहुत मदद की. पहले वह कम्यूनिस्ट पार्टी में थे. अब शायद पार्टी बदल ली है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक दंगों का बाज़ार गर्म था. आडवानी साहब रथ यात्रा निकाल रहे थे. गुलाम ख्बानी ताबां, डी.पी.त्रिपाठी और मैं पश्चिम उ.प्र. के दौरे पर गए. जिस तरह के खून खराबे से हम सिंधी मजबूर थे. उसी तरह के हालात पैदा हो गये थे.
ज़िन्दगी का सबसे मुश्किल दौर
मैं हिन्दोस्तान इसलिए आयी थी कि यह एक सेक्युलर मुल्क है, लेकिन यह सब ख्वाब था. मैंने यहां के सांप्रदायिक माहौल पर एक नज़्म ‘नया भारत’ लिखी। इस पर इतना बड़ा हंगामा हुआ कि पूछिये मत. दो दिन बाद मेरी फ्लाइट थी. मैं सोच नहीं पा रही थी कि क्या करूं. फिर मैं पाकिस्तान वापस चली गयी. वह नज़्म हमें कुछ कुछ याद आ रही है.
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई।
वह मुरखता वह घामड़पन,
जिसमें हमने सदियां गंवायी।
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे,
अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है,
कायम हिन्दू राज करोगे।
सारे उलटे काज करोगे,
अपना चमन ताराज़ करोगे।
तुम भी बैठे राज करोगे,
सोचा कौन है हिन्दू, कौन नहीं है।
तुम भी करोगे फ़तवा जारी,
अरे बधाई बहुत बधाई।
एक जाप सा करते जाओ,
बारम-बार यही दुहराओ।
कितना वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था भारत।
प्रेत धर्म का नाच रहा है
अरे बधाई बहुत बधाई
इस नज़्म को मेरे दोस्त खुशवंत सिंह जो एक सीनियर सहाफ़ी भी हैं (अब दिवंगत ) ने अंग्रेजी में तर्जुमा करके अंग्रेजी अख़बारात में प्रकाशित कराया.
पाकिस्तान में साहित्य ज़्यादा, पर कुछ कर रहे मज़हबी सियासत
पाकिस्तान में अदब में बहुत कुछ लिखा जा रहा है. मैं समझती हूं कि हिन्दोस्तान से ज़्यादा, क्योंकि वहां की ज़रूरत है. हिन्दोस्तान में जितनी आज़ादी औरतों को हासिल है, पाकिस्तान में नहीं है. मैंने समाजी, सियासी नाइंसाफी के खिलाफ़ खुलकर आवाज़ उठायी और बहुत कुछ लिखा. पाकिस्तान में मजहबी ग्रुप बहुत ज़्यादा हावी है. बार-बार फौज़ी हूकूमतें आ रही हैं, मार्शल ला लग रहा है, जम़हूरियत की धज्जियां बिखेरी जा रही है? हां! यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है. कुछ लोग है जिन्हें असल मज़हब के मायने नहीं पता है. इन लोगों को कौन बताये कि मज़हब लोगों को अलम करने के लिए नहीं है, बल्कि लोगों को जोड़ने के लिए आया है. यही सोच मार्क्स का भी है सांप्रदायिक सदभाव और मार्क्सवाद असल में एक ही चीज़ है. दोनों इन्सान को इन्सान बनाना सिखाता है और समाजी बराबरी की सीख देता है.
मज़हबी शायर की किताब का तर्जुमा
मार्कसी होने का मतलब नाज़ी के सारे फ़साने का ठुकराना हो ऐसा नहीं होना चाहिये. सज्जाद ज़हीर जब जेल में रखे गये तो उन्होंने ‘हाफ़िज़’ पर किताब लिखी, सरदार ने इक़बाल पर मैंने मौलाना रूमी पर लिखी तो कौन सी बुरी बात हुयी.
अदीबों की अमनो, अमान के लिए कोशिशें
अफगानिस्तान के हालात दूसरे हैं, अभी तो पाकिस्तान की ही हालत ठीक नहीं है. मजहबी ग्रुप हावी है. अफगानिस्तान में तालिबान की ज़ालिमाना हरक़त को पूरी दुनिया जानती है. उन्होंने वहां के तारीख को मिटाना चाहा. ‘बुद्ध’ जो शान्ति की अलामह है, उनकी मूर्ति को खाक में मिला दिया. इस पर मैंने एक नज़्म लिखी थी.
मोजस्सेमा गिरा
मगर ये दास्तां अभी तमाम तो नहीं हुयी
दिया कई बरस तैय हुये
लिखेगा दिन को आदमी
बरंगे आबो जुस्तजू
वह हुस्न की तलाश में
वह मुन्सफ़ी की आस में
खुली है सड़क खुल गयी दुकां में कितना माल है
दुकां में दिलबरी नहीं
मकां में मुन्सिफ़ी नहीं
अभी तो हर बला नयी
अभी है काफ़ले रवां
गुलों मेें नस्ब है निशा।
मुजस्सेमा गिरा मगरजमीं पे
ज़िन्दगी दुकां के नाम पर नहीं हुई
हमारी दास्तान अभी तमाम पर नहीं हुयी.
हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते
दोनों तरफ की अवाम अमन चाहती है. दोनों मुल्कों को चाहिये कि आसानी पैदा करें. कश्मीर तनाज़े का शांतिपूर्ण हल निकाला जाये. दोनों मुल्क अपने सैन्य वजह में कमी करके आम जनजीवन के लिए काम करें. दोनों मुल्कों को एक दूसरे की टेक्नोलाजी से फायदा उठाना चाहिये. अंतरराष्टीय अमन और एलाक़ाई अमन के लिए सार्क मुल्कों की आपसी मशविरे और गुफ़्तगू करके एक बड़़ा मजबूत ‘नो वार पैकेट एग्रीमेंट’ करें. तक़सीने हिन्द के बाद इलाके में रहने वाले लोगों के रिश्ते सरहद के उस पर बंट गये, उसकी बहाली की कोशिश करनी चाहिये.
( यह बातचीत नवंबर 2013 में हुई थी, जब फ़हमीदा दूसरी बार इलाहाबाद आयी थीं)
इमाम ज़ियाउल हक़ फ़ैज़ी ने कहा बम या गोली मसले का हल नहीं
मामला नाइंसाफी से जुड़ा हो या फौरी गुस्सा से उबली प्रतिक्रिया इस्लाम या अहले हदीस हिंसा की इजाजत नहीं देता। कुछ भटके हुए लोग जिहाद की गलत व्याख्या कर रहे हैं। जिहाद आतंकवाद नहीं होता। जिहाद तो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना है। बुराई से बचना है। आतंकवादी गतिविधियों में पकड़े गए लोग अपने बचाव में अहले हदीस का नाम लेकर उसे बदनाम कर रहे हैं। यह बातें रांची स्थित अहले हदीस की प्रमुख मस्जिद के इमाम व खतीब ज़ियाउल हक़ फ़ैज़ी ने सैयद शहरोज कमर से खास बातचीत में कही है। पेश है उसके प्रमुख अंश:
कहा जा रहा है कि अहले हदीस मुसलमानों के बीच कट्टरता के बीज बो रहा है?
नहीं। ऐसा हरगिज नहीं है। अहले हदीस सिर्फ कुरआन व हदीस की रोशनी में समाज की सलामती व ईमान की सुरक्षा का प्रचार--प्रसार करता है। इस्लाम अमनो-अमां की बात कहता है. हमारे नबी ने मस्जिद और बाज़ारों में हथियार ले जाने की मनाही की है.
फिर दहशतपसंदी के आरोप में अहले हदीस के लड़के ही क्यों पकड़े जा रहे हैं?
यह इत्तिफाक है कि पकड़े गए लोग अहले हदीस का नाम ले रहे हैं। यह हमारी जमायत के खिलाफ कोई साजिश भी हो सकती है।
इसे महज इत्तिफाक कैसे कह सकते हैं। जबकि हिरासत में लिए गए या इल्जाम में पकड़े गए लोगों का संबंध बजाब्ता अहले हदीस से रहा है?
हो सकता है। उनका झुकाव मेरी जमायत से रहा हो। लेकिन हमलोग ऐसी शिक्षा नहीं देते हैं। ट्रेनिंग की बात ही जुदा है। वे भटके हुए लोग हैं। मुमकिन है , बेरोजगार युवकों का किसी ने अहले हदीस को बदनाम करने और मुल्क में अशांति फैलाने के लिए इस्तेमाल किया हो। इससे इंकार नहीं कर सकते। अगर ऐसा होता तो, लक्खीसराय या झरिया से पकड़े गए लड़के गैरमुस्लिम नहीं होते।
कहा जाता है कि अहले हदीस को सऊदी अरब से फंडिंग होती है?
मैं बच्चों को ट़्युशन पढ़ाता हूं ताकि अपने बच्चों की ठीक से परवरिश कर सकूं। क्योंकि मुझे महज छह हजार रुपए ही तनख्वाह मिलती है। वहीं मस्जिद के खर्च के लिए चंदा किया जाता है। अगर सऊदी से मदद मिलती तो फिर न चंदा की जरूरत पड़ी, ना ही मैं ट्युशन करता।
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी की जान अहले हदीस क्यों लेना चाहता है?
यह सरासर इल्जाम है।
जितनी खबरें आ रही हैं या पटना ब्लास्ट मिसाल है।
मैंने पहले ही कहा कि ऐसी इजाजत न इस्लाम, ना ही अहले हदीस देता है। अगर किसी को मोदी से शिकायत है, तो जम्हूरियत है, उनका विरोध करें। उन्हें वोट न करें। सेकुलर मिज़ाज के लोगों को जिताएं।
गुजरात या हालिया मुजफ्फरनगर दंगे की प्रतिक्रिया हो या अन्याय के खिलाफ हो सकता है कि इन लड़कों को बरगला दिया गया हो?
हुजूर बहुत पहले कह गए हैं कि वतन से मुहब्बत करना ईमान का ही अंग है। अगर नाइंसाफी है, तो कानूनन लड़ाई करें। बम या गोली किसी मसले का हल नहीं है। उनकी मुख़ालिफ़त के नाम पर बेक़सूर बच्चों, औरतों, बुज़ुर्गों और नौजवानों को हलाक करना गुनाह है. ऐसा करने वालों की जगह इस्लाम में नरक ही है.
भास्कर के झारखंड संस्करण में 30 नवंबर 20 13 के अंक में प्रकाशित
रांची के सेंट जेवियर कॉलेज के छात्र रहे मनोज कुमार अब फ्रैंक हुज़ूर बन चुके हैं। लंदन में इनके लेखन के दीवानों की कमी नहीं हैं। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान पर लिखी उनकी किताब 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी' बेस्टसेलर हो चुकी है। पिछले वर्ष आई 'इमरान खान द फाइटर' भी अंग्रेजी जगत में खूब चर्चा में रही। यह युवा लेखक कभी 'हिटलर इन लव विद मडोना' नाटक के कारण विवादों में आया था। इन दिनों पोर्न सिनेमा पर केंद्रित अंग्रेजी व हिंदी में हिंदी युग्म से आई उनकी औपन्यासिक कृति 'सोहो : जिस्म से रूह तक का सफर' ने शोहरत की नई बुलंदी तय की है। इधर फोन पर उनसे लंबी बातचीत हुई। कहा कि रांची शहर उन्हें खूब याद आता है। सेंट जेवियर जैसा कॉलेज कैंपस उन्होंने कहीं नहीं देखा।
छह महीने के थे कि मां गुजर गईं: मां की गोद महज छह माह नसीब हुई। उसके बाद उनका देहांत हो गया। मां के ममत्व से छुटपन से ही वंचित रहा। इमरान वाली पहली किताब मां को ही समर्पित की है। पटना में रह रहे पिता से सालों साल मुलाकात नहीं हो पाती है। इधर के पांच वर्षों में मैं मुंबई, दिल्ली, लाहौर व लंदन में डोलता रहा हूं। पिता लेखक बनने के फैसले से असंतुष्ट थे। वह मुझे आईएस या आईपीएस देखना चाहते थे। लेकिन अब मेरे लेखन की अहमियत को समझने लगे हैं।
रांची में हुआ मैच्योर: 92 में पहली बार कविता लिखी, उसे याद करते हुए। शुरुआत से ही अभिव्यक्ति का माध्यम अंग्रेजी रहा।मनोज खान के नाम से इंग्लिश में कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में शाया हुई। लेकिन मुझे लगा कि अंदर में एक लेखक सांस ले रहा है, उसे तवज्जो देना चाहिए। जेवियर की रिच लाइब्रेरी ने मेरे मानस को गहरे तक प्रभावित किया। मैंने जमकर यहां की दुर्लभ किताबों का फायदा उठाया। सच कहूं, तो मेरा स्टंडर्ड यहीं मैच्योर हुआ।
हिटलर इन लव विद मैडोना पर मिली धमकियां: मेरे नाटक 'हिटलर इन लव विद मैडोना' को काफी पसंद किया गया। पर उसपर विवाद भी हुआ। मेरे पुतले जलाए गए। पुस्तक तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित कर दी गयी। दरअसल मैंने देश में मौजूद धार्मिक कट्टरता को दिखाने की कोशिश की थी। इस कट्टरता के पीछे एक राजनीतिक दल का हाथ रहा है। न सिर्फ मुझे बल्कि नाटक के कलाकारों को भी उस दल के कार्यकर्ताओं ने धमकियां दीं।
इमरान ही क्यों: बचपन से क्रिकेट का दीवाना रहा हूं। इमरान की जिंदगी ने प्रभावित किया। सियासत में आने के बाद भी आम जन के प्रति उनके सरोकारों को देख मैं चकित हुआ। दर्जनों बार इमरान व जेमिना से मिलने के लिए लंदन और पाकिस्तान के चक्कर लगाए। चार सौ पेज की फाल्कन एंड फाल्कन, लंदन से छपी ' इमरान वर्सेस इमरान' में इमरान की जिंदगी के बहाने पाक की वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक स्थितियों का भी चित्रण है। इसके उर्दू संस्करण की रिकार्ड बिक्री हुई। हिंदी में जल्द ही आने वाली है।
झारखंड पर भी लिखेंगे: सपा प्रमुख मुलायम सिंह पर लिखने का मन बना चुके हैं फ्रैंक। बिहार व झारखंड पर कहते हैं कि यहां विकास का जितना प्रचार है, हकीकत उतना नहीं। हां! बदलाव जरूर आया है। लेकिन विकास की सही तस्वीर बननी बाकी है। झारखंड व बिहार की बदहाली पर खूब ध्यान जाता है। बेचैनी भी होती है। कल के दिनों में इनपर भी जरूर लिखूंगा।
हिंदी के वाल्तेयर राजेंद्र यादव: उर्दू शायर फैज अहमद फैज बेहद पसंद हैं। हिंदी लेखकों में राजेंद्र यादव का लेखन खूब भाता है। राजेंद्र जी हिंदी के वाल्तेयर हैं। लेकिन अंग्रेजी साहित्य में गालिब की वुस्अत यानी विस्तार और फैलाव है। इंद्रधनुषी रंग है उसमें। ऑस्कर वाइल्ड और मार्कोज जैसा कल्पनाशील और धाकड़ रचनाकार हिंदी में नहीं हुआ। हिंदी समाज धर्म और जाति जैसे फिजुल बातों में बंटकर लेखन का बंटाधार कर रहा है। कुछ अपवाद सभी जगह हैं, उनमें एक हैं, राजेंद्र यादव।
खुशवंत का हास्य पसंद: मिड नाइट चिल्ड्रेन में सलमान रुश्दी की प्रतिभा तो दिखती है, पर सटैनिक वर्सेस में आकर वह डगमगा जाते हैं। अरुंधति राय निसंदेह गंभीर लेखक हैं। उनके लेखन व संघर्ष दोनों का मैं कायल और प्रशंसक हूं। खुशवंत सिंह भारतीय अंग्रेजी लेखन के अहम स्तंभ हैं। उनके हास्य-व्यंग्य का जवाब नहीं। चेतन भगत चमकते हुए भारत की तस्वीर दिखा रहे हैं। कैफे और कॉल सेंटर की जमात उनके पाठकों में है। जबकि समूचा देश इंडिया और भारत में बंटा हुआ है। महज दो फीसदी लोग उस चमकते चेहरे में शामिल हैं।
फ्रैंक हुजूर : परिचय जन्म: 21 जनवरी 1977 को बक्सर (बिहार) में शिक्षा: सेंट जेवियर कॉलेज रांची व दिल्ली से सृजन : नाटक 'हिटलर इन लव विद मडोना, बायोग्राफी 'इमरान वर्सेस इमरान: द अनटोल्ड स्टोरी, 'इमरान खान द फाइटर और औपन्यासिक कृति 'सोहा:जिस्म से रूह तक का सफर संप्रति: स्वतंत्र लेखन संपर्क: frankhuzur@gmail.com
(चर्चित युवा लेखक फ्रैंक हुज़ूर से शहरोज़ की बातचीत भास्कर के झारखंड संस्करणों में 23 अक्टूबर 2013 के अंक में प्रकाशित )
लेखक किसी किरदार को जीता है..उसे किसी चित्रकार सा कागज़ ए कैनवास पर
उतारता है..लेकिन लेखक ही उस किरदार को अपने अभिनय में डूबती आँखों जीवंत
कर दे ...कली सी मुस्कान दे..पहली बारिश सा भिगो दे..प्राय:ऐसे रचनाकार
इतिहास में मिलते हैं.लेकिन हिंदी व मैथिली में स्थापित विभा रानी ऐसी ही
नाट्यकर्मी और लेखक हैं. एकपात्रीय नाटकों को उन्होंने नई ज़िंदगी अता की
है. संजीव कुमार को तो वक्फा मिलता होगा ..कई रीटेक हुआ होगा..लेकिन एक ही
मंच पर समानांतर बच्चा, युवा और बुज़ुर्ग की अदायगी.आप विभा के अभिनय को देख
कर उंगली दबा लेंगे दांतों में...झारखंडी साहित्य संस्कृति अखडा की दावत
पर ६ जून को उन्होंने रांची में बुच्ची दाई का मंचन किया. दूसरी दोपहर अखडा
के दफ्तर में उनसे मिलना होता है..बिना किसी औपचारिकता के बात तरतीब पर
आती है. आइये उनसे बतियाते हैं.
रंगमंच की शुरुआत
स्कूली दिनों से ही। तब पांचवी या छठवीं में रही होगी। मां स्कूल हेडमास्टर
थीं। सन 1969 में महात्मा गांधी की सौवी जयंती मनाई जा रही थी। स्कूल में
हो रहे नाटक में मैं हिस्सा लेना चाहती थी। मां ने मना कर दिया। आखिर मेरी
जिद के आगे वह मान गईं। जब मैं एक सिपाही की भूमिका में मंच पर आई, तो अपना
संवाद ही भूल गई। मां ने पीछे से कहा, तो हड़बड़ी में अपना डॉयलाग
बोल पाई। तब एकांत और और भीड़ में बोलने का अंतर समझ में आया। दर्शकों का
सामना इतना आसान नहीं, जितना अपन समझते थे। इस सीख के बल पर इंटर में दस
लड़कियों के साथ कई कार्यक्रम किया। जब एमए में आई। दरभंगा रेडियो के लिए
कई नाटक किया। कई कार्यक्रम किये। बड़े मंच पर सन 1986 में पहली बार
राजाराम मोहन पुस्तकालय, कोलकाता में नाटक का मंचन किया। शिवमूर्ति की
कहानी कसाईबाड़ा का यह नाट्य रूपांतर था। खूब पसंद किया लोगों ने। उसके अगले ही वर्ष 1987 में मशहूर नाटककार एमएस विकल के दिल्ली
नाट्योत्सव में हिस्सा लिया। दुलारीबाई , सावधान पुरुरवा, पोस्टर,
कसाईबाड़ा आदि नाटकों में अभिनय किया। उन्हीं की टेली फिल्म चिट्ठी में काम
किया। फिर एक्टिव रंगमंच से पारिवारिक कारणों से किनारे रही। वर्ष 2007
में पुन: एक्टिव थिएटर में आई। मुंबई में मिस्टर जिन्ना नाटक किया। इसमें
फातिमा जिन्ना की भूमिका निभाई।
एकपात्रीय नाटक की ओर झुकाव
मुंबई में नाटकों के कई रंग हैं। ज्यादातर कमर्शियल नाटक होते हैं वहां।
उसमें कंटेंट नहीं होता। कुछ फिल्मी नाम होते हैं। टिकट बिक जाती है।
एकपात्रीय नाटक भी हो रहे हैं, लेकिन अच्छे नहीं। मेनस्ट्रीम में नहीं हैं।
मैं इंटर में सबसे पहेल एकपात्रीय नाटक कर चुकी थी। उसकी कहानी एक ऐसी
लड़की की थी, जो शादी में अपने घारवालों से दहेज की मांग करती है। मुंबई
में मैंने इसे आंदोलन के रूप में शुरू किया। लाइफ ए नॉट अ ड्रीम। यह मेरा
पहला मोनो प्ले था। फिनलैंड में इसे करना था। अंग्रेजी में लिखा और वहीं
2007 में अंग्रेजी में मंचन किया। मुंबई में भी चार शो इसके अंग्रेजी में
ही किए। हिंदी में इसे रायपुर के फेस्ट में 2008 में किया। उसके बाद
सिलसिला चल पड़ा। मुंबई के काला घोड़ा कला मंच के लिए हर साल एक मोनो प्ले
कर रही हूं। बालिका भ्रूण हत्या पर 2009 में बालचंदा, 2010 में
बिंब-प्रतिबिंब, 2011 में मैं कृष्णा कृष्ण की और इस वर्ष रवींद्र नाथ
टैगोर की कहानी पर आधारित भिखारिन का मंचन किया।
रंगमंच की मौजूदा स्थिति
गांव, कस्बे और शहरों में भी लोग सक्रिय हैं। अपने अपने स्तर से रंगमंच कर
रहे हैं। आप ऐसा नहीं कह सकते कि थिएटर दम तोड़ रहा है। यह स्थिति संतुष्ट
करती है। हां! यह जरूर कह सकते हैं कि रंगमंच को वैसी स्वीकृति अभी नहीं
मिली, जैसी और देशों में है। थिएटर को प्रश्रय नहीं दिया जाता है। उसे
प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। कई सुविधाएं मिलती भी हैं, तो इसका लाभ महज
बड़ लोग ही उठा पाते हैं।
कैदियों के बीच
कई ऐसे कैदी हैं। जिन पर आरोप साबित नहीं हुआ है। वे जेल में बंद इसलिए हैं
कि कोई उनका केस लडऩे वाला नहीं होता। कई महिलाएं हैं अपने छोटे बच्चों के
साथ। मेंने 2003 से उनके बीच काम करना शुरू किया। बेहद सकारात्मक असर
मिला। उनके बीच साहित्य, कला और रंगमंच की बातें की। उन्हीं के साथ मिलकर
नाटक किए। उनसे कहानी कविता लिखवाई। पेंटिग्स करवाई। मुंबई के कल्याण,
थाणे, भायखला और पुणे के यरवदा आदि जेलों में वर्कशाप भी किया। बहुत अच्छा
अनुभव मिला।
सामाजिक बदलाव में रंगमंच
रंगमंच ऐसा टूल है जो व्यक्ति को बदलता है। व्यक्ति समाजिक प्राणी ही है।
वह बदलता है, तो समाज में उसका असर होता है। दूसरे लोग भी बदलने का प्रयास
करते हैं। यह परिवर्ततन सकारात्मक है, तो स्वाभाविक है, उसका व्यापक असर
पड़ता है।
पहला नाटक कब लिखा
सन 1996 97 का सन रहा होगा। दूसरा आदमी, दूसरी औरत। इसका मंचन मुंबई में किया।
संतोष कहां, साहित्य या रंगमंच ?
दोनों का सुख अलग है। लेकिन सच कहूं तो निश्चित ही रंगमंच में मुझे अधिक
तसल्ली मिलती है। यहां आप हजारों लोगों से एक ही समय रूबरू होते हैं। अपनी
बात पहुंचाते हैं। उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत ही मिल जाती है। इसका सामाजिक
प्रभाव पड़ता है।
लेखन पहले मैथिली में या हिंदी में
कहानी हो या नाटक। दोनो भाषाओं में अलग अलग लिखती हूं। बुच्चीदाई पहले
मैथिली में ही लिखा। अंतिका में छपा था। बाद में
इसका हिंदी रूपांतरण नवनीत
में प्रकाशित हुआ।
नया नाटक
'आओ तनिक प्रेम करें' लिखा है। इसका मंचन अगस्त में हिसार में करने जा रही
हूं। इसकी कहानी दो ऐसे पति पत्नी की है, जिनकी उम्र अब साठ पर पहुंची है।
पति को अब सालता आता है कि प्रेम का अनुभव उसे तो हुआ ही नहीं।
नई किताब
'कर्फ्यू में दंगा' नामक कथा संग्रह अभी रेमाधव से छपकर आया है।
डॉ. रामविलास शर्मा जैसे शिखर सामाजिक, सांस्कृतिक और आलोचक का नवीनतम पाठ प्रस्तुत करने का आपको श्रेय दिया जाता है।
मुझे ऐसा कोई भ्रम नहीं। जब मैं सन 71 में लेखन साहित्य में सक्रीय हुआ,
रामविलास जी आलोचक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। उनकी सबसे बड़ी
विशेषता थी, जिस बात को सही समझना उसे निर्भीकता पूर्वक कहना। इस कारण
शुरुआत में वह विवादों के केंद्र में रहे। लेकिन आपात्तकाल के बाद
साहित्यकारों की नई पीढ़ी ने डॉ. शर्मा के महत्व को समझा। तब पूंजीवादी
प्रतिष्ठानों से लाभ उठाने वालों और श्रमिक जनता से हमदर्दी रखने वालों
के बीच सांस्कृतिक फासला अधिक उजागर हुआ। इसमें एक पक्ष डॉ. शर्मा
विरोधियों का था। शंभूनाथ, रविभूषण, कर्मेंदु शिशिर और प्रगति सक्सेना
जैसे समकालीन आलोचक उनके महत्व को स्वीकार करते हैं। अवसरवादी किस्म के
लोग उनके विरोधी रहे। उनकी स्थापनाओं की मुखालिफत करते रहे। इस प्रसंग
को सामाजक व राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखना व समझना चाहिए।
देश के कई महत्वपूर्ण कवि लेखको की जन्मशती मनाई जा रही है, लेकिन सिर्फ फोकस अज्ञेय पर ही अधिक क्यों?
अज्ञेय महत्वपूर्ण कवि हैं। इसमें संदेह नहीं। केशवदास भी महत्वपूर्ण कवि
हैं। लेकिन कबीर, जायसी, तुलसी और केशव में अंतर है। जिनके लिए कबीर व
तुलसी महत्वपूर्ण थे, केशव उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं। यही बात अज्ञेय,
नागार्जुन व केदार के बारे में समझनी चाहिए। अचानक अज्ञेय को लेकर बहुत से
विचारकों में आत्मग्लानि की भावना जाग उठी है। वे भूल सुधार करते हुए
अज्ञेय को अतिरंजित महत्व दे रहे हैं। लेकिन वे नहीं बताते कि भावी जन
सांस्कृतिक विकास में अज्ञेय किस रूप में सहायता करेंगे। समाज को बदलने का
लक्ष्य वामपंथी बुद्धिजीवियों के सामने भी नहीं बचा है। इसलिए वे अज्ञेय
को अधिक महत्व दे रहे हैं। मैं कामना करता हूं कि ये लोग कल नागार्जुन और
केदार का नाम लेने में शर्मिंदगी न महसूस करें।
लेखकों व कवियों का दक्षिणपंथियों के मंच पर जाना, उनके हाथों सम्मानित
होना, कितना सही है।( सन्दर्भ: मंगलेश डबराल का राकेश सिन्हा के आयोजन में
शिरकत और गत वर्ष उदय प्रकाश का कुख्यात सांसद से गोरखपुर में सम्मान
लेना.)
स्पष्ट कहूं तो पुरस्कार लेकर अपने विचारों को त्यागना अवसरवाद है। वहीं विरोधी मंच पर जाकर अपनी बात कहना गलत नहीं है।
कहा जाता है कि हिंदी लेखकों का जुडा़व जनता से नहीं है। हिंदी जगत में कोई अरुंधति राय नहीं है।
अच्छा है कि हिंदी में कोई अरुंधति राय नहीं है। उन्होंने यूरोपीय इच्छाओं
के अनुकुल भारत की बदशक्ल तस्वीर दुनिया को दिखाई। उन्होंने कहीं न कहीं
नक्सलियों का ही समर्थन किया। मैं नक्सलियों की गतिविधियों को जन आंदोलन
नहीं मान सकता। हां यह सही है कि हिंदी लेखक कवि जमीन से, अपनी जड़ों से
कट चुके हैं। जनता से उनका नाता टूट गया है। उनके नजरिये में जनता का हित
नहीं है, तो हर बात हवाई होगी। सिर्फ सड़क पर उतरना ही जनता के साथ होना
नहीं होता। आपकी रचनाओं में आदिवासी, दलित, स्त्री और आम जन की कितनी
पीड़ा और संवेदना है, यह अहम है। भारतीय समाज के हित की बात जहां होगी, मैं
उसका समर्थन करूंगा।
इन दिनों कहानियों में भाषायी बत्तंगड़ अधिक देखने को आता है
जब कहानीकार जनता से कटे होंगे, तो वे बाजार का ध्यान आकर्षित करेंगे ही।
इसलिए कहानी में विषय वस्तु की जगह वर्णन शैली प्रधान हो जाएगी। आज
कहानियों में यह बात सबसे अधिक दिखाई देती है। इसे एक तरह का रीतिवाद समझना
चाहिए। यही कारण है कि आरंभिक रचनाओं में ही सारी चमक दिखलाकर ये कहानीकार
चुक जाते हैं। फिर ध्यानाकर्षण के लिए और अधिक चमत्कृत भाषा का प्रयोग कर एक दुश्चक्र में उलझ जाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकाँश युवा कथाकारों के यहां ऐसा है। पंकज मित्र, नीलाक्षी सिंह, राजू शर्मा इत्यादि कुछ अच्छे कथाकार भी हैं, जिनके यहां विषय वस्तु मानव संबंधों के अध्ययन से आती है।
मौजूदा समय लेखक संगठनों की भूमिका किस तरह देखते हैं
दिलचस्प बात यह है कि दक्षिणपंथी पार्टियों के लेखक संगठन या तो हैं नहीं।
और हैं, तो लेखकों में उसकी साख नहीं है। इसलिए लेखक संगठनों की चर्चा
वामपंथी पार्टियों के के संदर्भ में होती है। पूंजीवादी संस्थाएं लेखकों
को बहुत से माध्यमों से अपने अनुकुल करती हैं। पुरस्कार, सेमिनार, फेलाशिप,
विदेश यात्राएं, सांस्थानिक सदस्यता आदि। व्यवस्था के बहुत से तरीके हैं।
कभी वामपंथी संगठन जन आंदोलनों से लेखकों को जोड़ते थे। यही उनकी शक्ति थी
और आकर्षण भी। आज वामपंथी पार्टियां जन आंदोलनों से दूर होकर पूंजीवादी
दायरे में सिमट गई हैं। उनके लेखक संगठन भी बुनियादी जिम्मेदारियों से दूर
हट गए हैं। जितना पतन वामपंथी सांस्कृतिक संगठनों का दिखाई देता है, वो
निराशाजनक तो है ही, सांस्कृतिक जीवन के लिए नुकसान देह भी है।
{दामुल और मृत्युदंड जैसी कई फिल्मों के लेखक और हिंदी के अनूठे रचनाकारशैवाल का मानना है कि आज की सबसे बड़ी खबर है नैतिकता बोध का खत्म हो जाना। अब हर आदमी अपने लिए जी रहा है। शैवाल पिछले दिनों रांची में थे। समाज, साहित्य और फिल्म पर शहरोज ने विस्तृत गुफ्तगु की। पेश है उसका संपादित अंश : यह भास्कर के अंक में प्रकाशित हुई.}
आदमखोर विकास का समय
शैवाल
हर सरकार आजकल विकास का ढींढोरा पीटती है
इन दस सालों में सभ्यता, संस्कृति और मनुष्यों के बीच कोई तारतम्य नहीं है। उनका आपसी लयात्मक सूत्र बदला है। जब लय टूटती है, तो विकास आदमखोर हो जाता है। यह समय उसी आदमखोर विकास का है। गांव का किसान बेटा रामप्रसाद मेहनत कर इंजीनियर बनता है। उसके बाद पैसा कमाते हुए महज 35 वर्ष की आयु में मर जाता है। एक ही मकसद धन संचय। उसके ढंग कैसे भी हों। नैतिकता स्वाहा। यही आदमखोर विकास है।
दामुल से मृत्युदंड तक कई मोर्चे पर आप प्रकाश झा साथ रहे। नाता टूटा कैसे? फिल्मों का लेकर उनके मिजाज में बदलाव आया। जबकि मैं सामाजिक सरोकारों से जुड़ी फिल्में लिखना चाहता हूं। फिल्मों का आपसी नाता जरूर ठहर गया है, लेकिन रिश्तों में वही मिठास है, जो कल थी। व्यक्तिगत संबंध और सामाजिक सरोकार दो अलग चीजें हैं। इसे एक दूसरे पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
नई फिल्म दास कैपीटल के बारे में कुछ
शाश्वत प्रश्नों को लेकर लिखी गई कहानियां सार्वकालिक महत्व की होती हैं। मेरी दो कहानी अकुअन का कोट और अर्थतंत्र पर आधारित फिल्म है दास कैपीटल। यह मार्क्स वाली नहीं है। इसका मतलब है गुलामों की राजधानी। नेट सर्फिंग के दौर में दुनिया के सिमट जाने की बात जरूर की जा रही है। जबकि वैश्विक संवेदनाओं का अकाल पैदा हुआ है। संबंध अर्थहीन हो रहे हैं। मध्यवर्गीय जीवन पर पूंजीतंत्र का दबाव बढ़ा है। इसी व्यवस्था ने कंकाल तंत्र विकसित किया है। यह सिस्टम आदमी को आखिरी किनारे पर ले जाकर मार देता है, फिर उसे कंकाल में रूपांतरित कर बेचता है। सवाल है कि समुदाय का जीवन बचेगा कैसे। फिल्म जवाब देती है कि अपने अंदर का प्रेम बचा लो पृथ्वी बच जाएगी।
आपके साथ और कौन कौन लोग हैं
इसकी स्क्रिप्ट में मेरे एमबीएधारी बेटा शुभंकर ने सहलेखन किया है। गोविंद निहलानी के भाई दयाल निहलानी ने इसका निर्देशन किया है, वहीं पत्रकार मुक्तिनाथ उपाध्याय इसके प्रोड्यूसर हैं। राजपाल यादव, केके रैना, यशपाल शर्मा, प्रतिभा और मनोज मेहता आदि ने अभिनय पक्ष संभाला है। इसे कांस फिल्म फेस्टीवल में भेजा गया है।
फिल्मों में आई नई पीढ़ी को किस तरह देखते हैं
नई पीढ़ी नए ढंग से चीजों को देख रही है। युवा अच्छा कर रहे हैं। अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया जैसे लोगों की फिल्में बहुत उम्दा हैं। ऐसा कहना गलत है कि युवा पीढ़ी पूरी तरह सरोकारों से दूर जा रही है।
संस्कृति संरक्षण में समकालीन लेखक का कितना योगदान है
आजकल संस्कृति संरक्षण के लिए लेखक इमारत बनवाता है। मठ बना लेता है। जबकि बाबा नागार्जुन को इसकी जरूरत नहीं पड़ी। वो थैला उठाए भारत भ्रमण के लिए निकल जाते थे। लेकिन अपवाद हर कहीं है। आज भी कुछ लोग जमीनी स्तर पर भी काम कर रहे हैं।
इन दिनों आलोचकों की सनद के लिए होड़ है
मेरी चाह कभी नहीं रही कि उनके पथ पर लोट जाऊं। उनसे कभी मिला तक नहीं। संपादकों से भी याराना संबंध नहीं बन पाया। पहले रविवार, धर्मयुग और अब हंस आदि पत्रिकाओं में जबदरदस्ती छपता रहा।
आपकी अपनी प्रिय कहानी
नाचीज शहर की गली है जहां फुकनबाबू की प्रेमीका रहती है। यह कहानी संभवत 1997 के आसपास हंस में छपी थी।
आपका इधर उपन्यास नहीं आया
पांच उपन्यास पर रह रह कर काम कर रहा हूं। चारित्रिक स्थितियों से संतुष्ट नहीं हूं। दशकभर भर बाद स्थितियां बदल जाती हैं। यथार्थ स्थितियों का व्यंग्यात्मक चित्रण करने की कोशिश करता हूं। दोनों समानांतर चलते हैं।
कविता कहां छूट गई
शुरुआत मेरी भी कविता से ही हुई। लेकिन संकलन प्रकाशन की हिम्मत नहीं हुई। अब कहानी में ही कविताई होती है। कविता से शुरू हुआ सफर कहानी, संपादन, पत्रकारिता होकर फिल्म तक पहुंचा है।
भारतीय फिल्मों में गांव कहां पाते हैं
अब फिल्मों से गांव लुप्त होते जा रहे हैं। पीपली लाइव की खूब चर्चा हुई। किसानों के दर्द की बात की गई। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। यह फिल्म किसानों का मजाक उड़ाती है। किसानों के दर्द व आंसू के गारे पर ऐसी इमारत खड़ी गई, जिसे अच्छे दामों पर बेचा जा सके। ग्राम्य जीवन स्थितियां उद्वेलित करती हैं। परेशान करती हैं। मखौल तो उसका हरगिज नहीं उड़ाया जा सकता।
भोजपुरी फिल्मों में तो गांव दिखता है
हां। दिखता है। यह फिल्मी गांव है। पहले की फिल्मों में गांव का सोंधापन होता था। अब फूहड़ संवाद और गीत संगीत से संस्कृति का निर्माण तो नहीं होता। भोजपुरी फिल्में हिंदी मसाला फिल्मों की नकल बन कर रह गई हैं। गांव के लोगों की समस्या वहां से गायब हैं। मल्टीप्लेक्स और भोजपुरी के बीच ऐसा सिनेमा होना चाहिए, जो आम लोगों का हो।
दामुल का लेखक आज गांव को किसी तरह देखता है
हालात में बहुत ज्यादा तब्दीली नहीं आई है। समस्याएं अब अधिक विकराल रूप में मौजूद हैं। महज किरदार के बदल जाने से फिजा नहीं बदल जाती। शोषण भी है। जातीय दंभ में इजाफा हुआ है। राजनीतिक चेतना आई तो है, लेकिन चुनाव में पैसा-खेल बढ़ा भी। सामंतवाद की शक्ल भर बदली है।
याद रहे कि 7 सितम्बर 2009 की बात है। चलती कार मेंकुलदीप जैसे युवा से एक शिखर बतिया रहा था.जैसे चौपाल में किसीबुज़ुर्ग की हौले-हौले किसी के कान में फुसफुसाहट. साथ थे पत्रकारिता के छात्र प्रशांत चहल भी.
हिंदुत्व एक ऐसी चीज़ है जिसको लोगों ने अपने अपने तरीके से परिभाषित किया है। कल मैं सोच रहा था तोमुझे तीन तरह के हिन्दू समझ आए। पहला, लौकिक हिन्दू, जो जन-व्यवहार के हिन्दू हैं, जिसे फर्क नहीं पड़ता किउसका वकील मुसलमान है या मालिक मुसलमान है। दूसरे, मदन मोहन मालवीय जैसे हिन्दू और तीसरे कांग्रेसी हिन्दू। आप भी हिंदुत्व की बात करते हैं लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं आपके लिए हिन्दू होने के मायने भाजपाऔर संघ से अलग हैं। तो आप स्वयं को उपरोक्त में से कौन सी श्रेणी में रखेंगे? देखो भाई, ये जो तीन श्रेणियां आपने बताई, इसमें सबसे ज्यादा तो मैं लौकिक हिन्दू हूँ। क्योंकि सामाजिक रूप से हिन्दू तो मैं लौकिक होकर ही रह सकता हूँ। और आध्यात्म में या आस्था में जो मेरा विश्वास है, उसके लिए मुझे हिन्दू होने की ज़रुरत नहीं है। क्योंकि इन मूल्यों के लिए आपको धार्मिक होना ज़रूरी नहीं है। आप आध्यात्मिक होकर भी अपनी आस्था को कायम रख सकते हैं। ये कतई जरूरी नहीं कि आप रोज़ मंदिर जाकर पूजा करें। मैं तो कभी किसी मंदिर में नहीं जाता। और रोज सवेरे उठकर कोई प्रार्थना भी नहीं करता। मेरी जब मरजी होती है तब मैं गीता पढता हूँ, जब मर्जी होती है मैं प्रार्थना करता हूँ। क्योंकि मैं अपने जीवन के उत्तर खोजने के लिए यह सब करता हूँ। इसलिए नहीं कि वह मेरे धर्म का कृत्य है।
यही बात शाहरुख खान ने कुछ दिनों पहले कही थी कि मैं अल्लाह के इस्लाम को मानता हूँ, मुल्लाओं केइस्लाम को नहीं। हाँ बिलकुल। मुल्ला जो है वो संगठित धर्म चलाता है और अल्लाह धर्म में मेरे विश्वास का नाम है। अल्लाह में मेरी आस्था स्वैच्छिक है लेकिन मुल्ला या पंडित का बताया हुआ रास्ता आपकी आत्मा या विवेक से मेल खाए यह ज़रूरी नहीं।
देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर क्या कहेंगे? देखिए मैं तो यह मानता हूँ कि कोई भी आदमी कोई भी धर्म मानकर अपना जीवन व्यतीत करने को स्वतंत्र है। और यह बात मैं कोई सरकारी धर्मनिरपेक्षता के कारण नहीं कह रहा हूँ। अपने ऋग्वेद में भी यही कहा गया है कि सत्य एक ही है जिसको अलग अलग लोग अलग अलग तरीकों से मानते हैं। अगर मैं कहूँ कि मेरा सत्य ही अंतिम सत्य है और तुम मेरे सत्य को मानो वरना मैं तलवार उठाऊंगा तो इस से बढ़कर गलत बात और कुछ नहीं हो सकती।
(इस बीच प्रभाष जी कुछ गुनगुनाने लगते हैं। फिर रूककर कहते हैं की अपने एक कवि हुए हैं-नीरज। मैंने कहा-जी, गोपाल दास नीरज।
"हाँ, नाम सुना होगा"। "उनकी एक कविता है - इस घाट क्यूँ न जाऊं, उस घाट क्यूँ न जाऊं,पानी पिया है मैंने गागर बदल बदल के। फिर 'नीरज' की ही चार लाइनें और सुनाईं- आदमी को आदमी बनाने के लिए, ज़िन्दगी में प्यार की कहानी चाहिए, और कहने के लिए कहानी प्यार की, स्याही नहीं आँखों वाला पानी चाहिए। बातचीत में प्रभाष जी को भी आनंद आने लगा था और हम तो अपने सपने को जी रहे थे। )
आपने कहा है कि 2012 के बाद आप कागद-कारे नहीं लिखेंगे. क्यों? क्योंकि 2012 में कागद-कारे के 20 वर्ष पूरे हो जायेंगे. अपन 75 (उम्र) तक सब निपटा देंगे.
(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)