कशमकश !!! किससे कहें हालेदिल ? कैसे करें दर्दे बयां ?
ज़बां मिली है मगर
हमज़बां नहीं मिलता यह मंच उन सभी का है, चकाचौंध से घबराते हैं और चांदनी की हल्की छुअन जिन्हें सराबोर कर देती है
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शुक्रवार, २७ नवम्बर २००९

'लव जिहाद' कट्टर दिमाग की उपज


काफी दिनों से मैं अंतरजाल से दूर रहा. इन दिनों पुरानी मेल्स देख रहा हूँयहाँ मुझे बिहार अंजुमन नामक एक ग्रुप की मेल मिल गई.पेशे से पत्रकार और सशक्त हिन्दी कवि संजय कुंदन की इस रपट को आप लोगों के सामने लाना ज़रूरी इसलिए कि क्या ऐसा भी मुमकिन है!!!-सं.




संजय कुंदन

पिछले कुछ दिनों से केरल में विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और श्रीराम सेना इस प्रचार में जुटी ह

ै कि मुस्लिम कट्टरपंथी राज्य के मुसलमान युवकों को इस बात के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि वे हिंदू लड़कियों से प्रेम-विवाह करें और उनका धर्म परिवर्तित करें। इसके लिए इन युवकों को देश के बाहर से पैसा उपलब्ध कराया जा रहा है। केरल कैथलिक बिशप काउंसिल ने भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि न सिर्फ हिंदू लड़कियों, बल्कि ईसाई लड़कियों को भी मुसलमान बनाने की साजिश रची जा रही है, ताकि केरल में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ सके। और इसके लिए बाकायदा 'लव जिहाद' और 'रोमियो जिहाद' नामक संगठन बनाया गया है।

लेकिन इस थिअरी के जनक कौन हैं? यह थिअरी दरअसल पुलिस की है। वहां यह सारा मामला शुरू हुआ दो शादियों से। शहंशाह नामक एक मुस्लिम युवक ने एक हिंदू लड़की से शादी की और उसके एक मित्र सिराजुद्दीन ने एक ईसाई लड़की से विवाह किया। इन लड़कियों ने अपना धर्म बदल लिया। उनके अभिभावक हाईकोर्ट में गए और उन्होंने आरोप लगाया किउनकी बेटियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया है। लेकिन लड़कियों ने कोर्ट में आकर साफ कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से मजहब बदला है और वे अपने पति के साथ ही रहेंगी। इस पर कोर्ट ने उन लड़कियों को सलाह दी कि वे कुछ दिन अपने अभिभावकों के साथ रहें और उन्हें यह बात समझाएं कि उन्होंने शादी और धर्म-परिवर्तन अपनी मर्जी से किया है।

कोर्ट के निर्देश पर दोनों लड़कियां अपने मां-बाप के घर चली गईं। कुछ दिनों बाद जब वे अगली सुनवाई पर आईं तो उन्होंने कोर्ट से कहा कि वे अब अपने पति की बजाय अपने पैरंट्स के साथ ही रहेंगी। उनके इस तरह पलट जाने पर पुलिस ने 'लव जिहाद' की एक थिअरी पेश कर दी। इस पर अदालत ने डीजीपी को पूरे मामले की जांच का आदेश दिया। और जांच के बाद डीजीपी ने जो रिपोर्ट दी उसमें लव जिहाद या रोमियो जिहाद जैसी किसी संस्था या किसी ट्रेंड के अस्तित्व से इनकार किया गया। यह जरूर कहा गया कि धर्मांतरण के कुछ मामले हुए हैं, जिनकी जांच चल रही है, लेकिन यह कहना गलत है कि यह सब बाकायदा किसी योजना के तहत हो रहा है।

सच तो यह है कि इस मामले में पुलिस भी कठघरे में नजर आई। शहंशाह का आरोप है कि उसकी पत्नी के एक रिश्तेदार ने, जो एक सीनियर पुलिस अफसर हैं, लव जिहाद की कहानी गढ़ी है। उधर, कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी लव जिहाद की सचाई की जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट डीजीपी की रिपोर्ट से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। उसने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वह रिपोर्ट के कुछ वाक्यों को स्पष्ट करें। दो समुदायों के बीच विवाह केरल या कर्नाटक के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन पिछले कुछ समय से इसमें बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक शिक्षा प्राप्त नई पीढ़ी जाति या धर्म की सीमाओं को नहीं मानती। उसने इन दायरों को तोड़ा है जिसे समाज के रूढ़िवादी तत्व पचा नहीं पा रहे हैं। उन्हें मंजूर नहीं कि समुदायों और जातियों के बीच की दीवारें टूटें, उनके बीच परस्पर सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर आदान-प्रदान बढ़े। इसलिए ये दो समुदायों के बीच विवाह को रोकने पर आमादा हैं। इन्होंने इसे जिहाद से जोड़कर सनसनी फैलाने की कोशिश की है।

यह एक ऐसा संवेदनशील मसला है जिस पर आसानी से लोगों को डराकर गोलबंद किया जा सकता है। अपना मकसद साधने के लिए इन्होंने तरह-तरह के दुष्प्रचार किया और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। कर्नाटक में इन्होंने आरोप लगाया कि लव जिहाद के तहत कुछ महिलाओं का अपहरण कर लिया गया है। हाल में पता चला कि उनमें से एक महिला दरअसल मोहन कुमार नामक उस शख्स का शिकार बनी है, जिसे 18 महिलाओं के कत्ल के इल्जाम में पकड़ा गया है।

आज हिंदूवादी ताकतें केरल और कर्नाटक में चिल्ला-चिल्लाकर कह रही हैं कि वे हिंदू लड़कियों को साजिश से बचाना चाहती हैं। लेकिन इन्हें हरियाणा जैसे राज्यों के उन हिंदू लड़के-लड़कियों की चिंता नहीं है, जिन्हें प्रेम विवाह करने के कारण अपने समाज की भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। हरियाणा में पिछले कुछ समय में एक ही गोत्र में विवाह के कई मामलों में या तो प्रेमी की हत्या कर दी गई या प्रेमी-प्रेमिका दोनों को मौत के घाट उतार दिया गया। राज्य में जाति या खाप पंचायतें किसी भी तरह से प्रेम विवाह को रोकने में जुटी हैं और वे इसके लिए तमाम नियम-कानूनों और मानवीयता की धज्जियां उड़ा रही हैं। लेकिन हिंदू हितों की बात करने वाले संगठन वहां चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं। जाहिर है, इन संगठनों और जाति पंचायतों में कोई खास फर्क नहीं हैं।

ये दोनों समाज में मध्यकालीन मूल्यों को बचाए रखना चाहते हैं। वैसे यह भी सच है कि इस तरह के लोग केवल एक धर्म या जाति तक सीमित नहीं हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि इस तरह का विचार रखने वाले तत्व सिर्फ धार्मिक-राजनीतिक संगठनों में ही नहीं, पुलिस-प्रशासन में भी हैं। पुलिस द्वारा मुसलमानों को आईएसआई एजेंट साबित कर देने या उनका संबंध किसी आतंकवादी गुट से जोड़ देने के कई झूठे मामले सामने आए हैं।

केरल और कर्नाटक में जिस तरह कुछ संगठनों ने कथित 'लव जिहाद' का हौवा खड़ा किया है, उससे एक बार फिर साफ हुआ कि हिंदूवादी ताकतें अपने सांप्रदायिक अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लगातार हाथ-पैर मार रही हैं, भले ही उनके तरीके अलग हों। उनका एक तबका मालेगांव और गोवा में विस्फोट कर रहा है तो दूसरा दुष्प्रचार में लगा है। संघ या बीजेपी के कुछ शीर्ष नेता भले ही कभी जिन्ना की तारीफ करके, देश के मुसलमानों की हालत पर चिंता जता करके , सेक्युलरिजम का गुणगान करके अपने उदार होने का भ्रम पैदा करें, पर सचाई यह है कि इन्होंने अपना हिंदू कार्ड छोड़ा नहीं है और इनके कार्यकर्ता मजहब के आधार पर नफरत की आग भड़काने का कहीं कोई मौका गंवाना नहीं चाहते। हैरत की बात यह है कि अक्सर इन्हीं का निशाना बनने वाला चर्च भी केरल में इनके साथ खड़ा नजर आया। यह इस बात का संकेत है कि धार्मिक संस्थाओं में असुरक्षा का भाव गहराया है और वे बदलते यथार्थ के साथ तालमेल बिठाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं।

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शुक्रवार, ६ नवम्बर २००९

ज़िन्दगी मौत न बन जाय संभालो यारो








शहर की बोलती इबारत
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फ़िल्म जागो के बहाने





मध्य- बिहार माओवादियों की हिंसक वारदातों के कारण हमेशा चर्चा में रहता है . शेरशाह सूरी मार्ग,जिसे अब एन.एच-2 कहा जाता है पर स्थित है मध्य -बिहार का प्राचीन शहर शेरघाटी.वैदिक काल में भी इसका ज़िक्र मिलता है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं.एतिहासिक सन्दर्भ मुग़ल काल के अवश्य मिलते हैं.किव्न्दंती है कि शेरशाह ने यहाँ एक वार से शेर के दो टुकड़े किए थे। जंगलों और टापुओं से घिरे इस इलाके को तभी से शेरघाटी कहा जाने लगा.शेरशाह ने यहाँ कई मस्जिदें , जेल , कचहरी और सराय भी बनवाया था.तब ये मगध संभाग का मुख्यालय था.संभवता बिहार-विभाजन तक यही दशा रही.कालांतर में धीरे-धीरे ये ब्लाक बनकर रह गया। 1983में इसे अनुमंडल बनाया गया.मुस्लिम संतों और विद्वानों की ये स्थली रही है. वहीँ प्राचीन शिवालयों से मुखरित ऋचाएं इसके सांस्कृतिक और अद्यात्मिक कथा को दुहराती रहती हैं। १८५७ के पहले विद्रोह से गाँधी जी के '४२ के असहयोग आन्दोलन में इलाके के लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी हैं.हिन्दी साहित्य में पंडित नर्मदेश्वर पाठक,यदु नंदनराम, विजय दत्त युवाओं में प्रदीप, सुभाष और उदय आदि की सक्रियता है लेकिन उर्दु अदब यहाँ का काफी उर्वर और संग्रहणीय है। ख्वाजा अब्दुल करीम से असलम सादीपुरी , ज़हीर tishna,सिराज शम्सी से आज के नुमान -उल -हक ,फर्दुल हसन तक लम्बी फेहरिस्त है.शहर से लगे हमजापुर में भी कई नामवर शायर-अदीब रहते हैं।

जब हम चड्डी पकड़ कर दौड़ा करते थे तो रिक्शे के पीछे चिपकी रंगीन तस्वीरें आकर्षण थीं.और ये रिक्शा कस्बे की पहली टाकीज भूषन का रहता.कुछ ही दिनों बाद ये हाल बंद हो गया.टूरिंग सिनेमा हाल के नाम पर बने राजहाल को तीन दशक हुए होंगे, करीब इतना ही कमोबेश यहाँ मंचित हुए किसी नाटक को हुआ.इप्टा यहाँ कभी सक्रीय नहीं रहा , न ही रामलीलाओं की ही परम्परा रही है.लेकिन ऐसी पृष्ठभुमी में भी कई प्रतिभाएं ऐसी हैं जो न सिर्फ़ चमत्कृत करती हैं बल्कि लबरेज़ अपनी संभावनाओं से अग्रिम पंक्ति में खड़े सूरमाओं को ललकारती भी हैं.इमरान अली भी इसमें एक hain .इक्कीसवीं सदी के इस उपभोक्तावादी दौर में आपादमस्तक समाज के लिए प्रतिबद्ध होना, निसंदेह जिंदादिली का काम है.इमरान में ऐसी ही खूबी है.स्थानीय समाचार चैनलों के लिए काम कर चुके सक्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता इमरान ने -जागो का निर्देशन कर अपनी तमन्ना को श्रम के बूते साकार किया, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने मिशन में सफल रहा यह युवा फिलहाल बहुरुप्या और शेरघाटी -गाथा नामक दो फिल्मों के लिए काम कर रहा है ।

दो शब्दों का युग्म जागो जहाँ आकर्षक और मोहक भी है वहीँ इस शब्द में उसकी गंभीरता भी निहित है। आम से लगते इस शब्द का इस फ़िल्म में निर्णायक अर्थों में इस्तेमाल हुआ है


ग्रामीण कस्बाई परिवेश और उसमें तीन स्कूली बच्चों के अपहरण के मामले से शुरू हुई यह फ़िल्म भ्रष्ट ,लचर प्रशासन , और आम-जन की असहाय स्थिति को सामने लाती है। यह बताती है कि अपराधियों की राजनीतिज्ञों के संग की जुगलबंदी किस तरह समाज के ताने-बाने को भंग कर रही है । स्थानिय बोली-भाषा में बनी इस फ़िल्म का विषय भले बिहार जैसे प्रांत के लिए चिर-परिचित हो लेकिन इसकी प्रस्तुति यह प्रश्न अवश्य खड़ा करती है कि आख़िर कब-तक यह सब देखा और सहा जायगा ?उपभोक्तावादी संस्कृति के रोज़ हावी होते जाने और असमानता की खाई चौड़ी से चौड़ी होते जाने के चलते समाज में उपजी रोजी-रोटी की हताशा और कही जाति तो कहीं वर्ग संघर्ष । और बेकार नवजवानों को प्रलोभन देकर अपराध के बीहड़ में उतार देना--संघर्ष नित्य नए आयाम ले रहा है.फ़िल्म की विशेषता स्थानीय कलाकारों (नवीन सिंह ,जे.पी.पाटली , विष्णुदेव प्रजापति , अमृत अग्रवाल , कंचन गुप्ता,कुंजन कुमार सिन्हा , रामस्वरूप स्वर्णकार, नवीन सिन्हा वंदना,चंद्रभूशन , सचिदानंद ठाकुर ),पत्रकारों (एस.अहमद, एस.के.उल्लाह, कौशलेन्द्र कुमार, मुहम्मद अली बैदावी, ), राजनेताओं (सुशील गुप्ता ,अजित सिंह , शाहिद इमाम ,लखन पासवान ) और कलमकारों (रज़ा शेरघाटवी , रामचंद्र यादव,नुमान-उल-हक,हिलाल हमज़ापुरी, इश्राक़ हमज़ापुरी ,समी-उर रहमान ) के अभिनय से और बढ़ गई है.यूँ तो भोजपुरी फिल्मों के धर्मेन्द्र यादव, बांगला रंगमंच के संजू और वालीवुड के अली खान जैसे नामचीनों ने भी अभिनीत पात्रों को जीवंत किया है.लेकिन बाल कलाकारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति हर फ्रेम में बरक़रार राखी है।

फ़िल्म अंत में यह संदेश अवश्य देती है कि अपराध को धर्म और जाति के खाने से हरगिज़ न देखा जाय। मौजूदा हालत के मद्देनज़र फ़िल्म सरफ़रोश के मशहूर गीत ज़िन्दगी मौत बन जाय , संभालो यारो....का इस्तेमाल बेहद सामयिक और महत्वपूर्ण हो जाता है.फ़िल्म में घटनाओं और स्थितियों का क्रमिक दृश्यांकन बहुत सहज लगता है। निर्देशक का श्रम बाल-कलाकारों अनम इमरान , सादिया एमाला और गौरव गुप्ता के अभिनय में कमाल होकर मुखर होता है.शेरघाटी के सिनेतिहास की इस पहली टेली -फ़िल्म में उर्दू के चर्चित शायर नदीम जाफरी aur लेखक- रंगकर्मी विजय दत्त ने भावप्रवण अभिनय किया है.


साजसज्जा ,संगीत और दूसरे पहलुओं में इतनी बारीकी और, भव्यता न बरती गई है.बावजूद व्यवसायिक फूहड़ता से फ़िल्म कोसों दूर है.फ़िल्म में संगीत पटना दूरदर्शन के कलाकार राजू लहरी ने और गया घराने के शास्त्रीय गायक राजेन्द्र सिजुवार ने प्रात: अलाप को स्वर दिया है।




रविवार, १ नवम्बर २००९

जागो ...शेरघाटी/ इमरान

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जागो-2

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जागो-3

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बुधवार, २८ अक्तूबर २००९

जागो-४

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जागो- फ़िल्म ५/ शेरघाटी /इमरान अली

जागो- फ़िल्म -5


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गुरुवार, ८ जनवरी २००९

गुन्जेश के मार्फ़त छाले की कथा.......




बीसवीं सदी की कहानियों का कई खंडों में संचयन करने के कारण चर्चित हुए, महेश दर्पण बहुत ही सुघड़ कथाकार भी हैं.गुन्जेश की कहानी पढ़ते हुए मुझे अनायास ही उनकी याद आ गयी.उनके कथा-तत्त्व भी कुछ इसी तरह के होते हैं.बिलकुल जाने हुए.लेकिन क्या ये कहानी भी हो सकती है , अक्सर लोग नज़र अंदाज़ कर जाते हैं.ऐसे कथा-लेखक नितांत साधारण लगने वाली असाधारण कहानी लिख रहे हैं.कमलेश्वर जी की कल्पना परिकथा के बीते सितम्बर-अक्टूबर अंक में गुन्जेश की ये कहानी शाया हुई थी.इस युवतर रचनाकार में असीम संभावनाएं हैं, ये कहानी तस्दीक करती है.सबसे खूबसूरत पहलू , शैली की सरलता और ज़बान की सहजता है .कोई बनाओ-सिंगार नहीं.हम जैसा बोलते हैं, उसी अंदाज़ में छाले का क़िस्सा भी सुनते जाते हैं।

कहानी पाठ के लिए कृपा कर क्लिक ज़रूर करें.









इस युवा साथी ने अंतरजाल पर भी इक घोंसला बनाया था, जहां वो गाहे-बगाहे अपनी चिंता और सरोकार के साथ कलम की जुगलबंदी किया करते थे.लेकिन उनका ये आशियाना अब खुद इनकी पहुँच से बाहर हो गया है.आप का प्रवेश वर्जित नहीं है.दर असल वो अपना कूटशब्द ही भूल गए .भूलने वाली बड़ों की बिमारी इन्हें भी होनी लाहक़ थी.खैर, इनका नया ठिकाना अभी-अभी बना है। यहाँ आप भी जाएँ.




सोमवार, ५ जनवरी २००९

कविता को लेकर फिरदौस भूल जाना चाहता है सुधांशु को.......


कविता का नया प्रेमी : सुधांशु फ़िरदौस


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कभी आपने कैलाश वाजपई की कविताओं को पढ़ा है.रहीम, खुसरो , जायसी और नानक के दोहों के साथ उतरे-डूबे हैं.यदि ऐसी पृष्ठ भूमि में मुक्तिबोध और निराला के दिग्दर्शन हो जाएँ तो है न कमाल! बंधुओं मैं उस कविता की बात कर रहा हूँ जिसे भाई सुधांशु फिरदौस ने अपनी ज़िंदगी बना ली है.अजब किस्म की बेचैनी मुझे उनके यहाँ मिलती है. उन्हें किसी तरह का कोई गुमान नहीं है.उनका बस विश्वास है बात बोलेगी हम नहीं । २ जनवरी १९८५ को निराला के समकालीनों में से वाहिद दुर्लभ रहे जानकी वल्लभ शास्त्री के शहर मुजफ्फरपुर में जन्मे सुधांशु ने बी.एच.यु. से गणित में स्नातक किया और फिलवक्त जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम्-एस-सी(टेक)कर रहे हैं.ख़ुद के बारे में ये युवा कवि कहता है:
.... कुछ ऐसा नहीं कि छुपाया जाये कुछ ऐसा भी खास नहीं कि बताया जाये...मेरे मित्र कहते है बोलने के प्रवाह मे बहुत ज्यादा बोल जाता हूँ और जब चुप होता हूँ तो उतना ही मौन.... आजकल, ज्ञानेन्द्रपति और तालस्ताय को पढ़ रहा हूँ...

अब आप उनकी ताज़ा रचना से रूबरू हों:
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चाह्ता
भूल जाऊं
उस प्यार को
जो किया था,तुमसे
सलामत नहीं वह भी
ज़माने की नजरों से,
इस समय कुछ-कुछ
मेरी दाढ़ी की तरह


चाहता
भूल जाऊं
बाटला हाउस की सुबह
जब सुनी थी
न सुनी जाने वाली आवाजें
देखी थी,
लोगों के चेहरे पे मौत सी चुप्पी!!

चाहता
भूल जाऊं
अखबार के पन्ने को
जिसमे छपी थी खबर
-"करोलबाग मे
गरीबी से तंग आकर
एक औरत पंखे से झूल गयी

चाहता
भूलजाऊं
साईनाथ की रिपोर्ट : इस
साल मे सोलह हजारसे
अधिक किसानो ने आत्महत्या की

चाहता
भूल जाऊँ
खबरिया चैनलों पर दीख रहे
ताज से निकलते धुएँ
जो राजनीति के रंग से लाल,
भगवा होते हुए
सुबह न जाने
किस रंग मे बदल जाये...

ख़बर का असर

भड़ास! नाम का एक ब्लॉग है और काफ़ी चर्चित भी.जिस किसी ने ये नाम रक्खा है कितना मौजूं है.दरअसल हम सब यहाँ अपनी-अपनी भड़ास ही तो निकालते हैं.जब कोई मंच न रह गया हो और अधिकाँश पत्र-पत्रिकाएं और चैनलों की रहबरी बाज़ार करे तो ये गूगेल महाराज की कृपा से ब्लॉग अच्छा माध्यम बन जाता है.कभी लघु-पत्रिकाओं ने अच्छा वैकल्पिक मंच उपलब्ध कराया था।
खैर। पिछले दिनों जब खुशबू की चर्चा करते समय उनकी अनदेखी किए जाने का सवाल उठाया था तो कहीं अंतरे-कोने में भी किंचित ये भान-गुमान न था कि लोग इस और ध्यान देंगे.लेकिन हमज़बान के बाद साप्ताहिक के बाद अब मासिक आवृति में प्रकाशित हो रही पत्रिका आउटलुक , नवम्बर २००८ का अंक देख कर अच्छा लगा.संपादक नीलाभ मिश्र ने अपना स्तम्भ खुशबू को ही केन्द्र में रख कर लिख रक्खा था.इसी अरसे में इंडिया टुडे (हिन्दी) के असोसिएट कॉपी एडिटर सुदीप ठाकुर का फ़ोन आ गया.भाई, खुशबू का नम्बर दो!! टुडे के विशेष अंक में उन पर स्टोरी करनी है.हमज़बान पर खुशबू के बारे में पढ़ा। मैं उनका फोन नम्बर कहीं नोट नहीं कर पाया था.तुंरत पत्रकार-मित्र उर्दू दैनिक हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के ब्यूरो- चीफ शिबली ने घंटे भर के अन्दर परेशानी दूर की और हमने इस तरह सुदीप जी को खुशबू का, उनके घर का फोन नम्बर मुहैय्या करा दिया.इंडिया टुडे के २६ नवम्बर के विशेषांक में आप चाँद को चूमती कामयाबी शीर्षक कथा -आलेख पृष्ठ २४ पर पढ़ सकते हैं.

गुरुवार, २३ अक्तूबर २००८

देशभक्तों ज़रा इधर भी देखो!




चाँद की फ़िज़ा में खुशबू

किसी एक मुसलमान के आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने पर पानी पीपी कर सारे मुसलामानों को आतंकवादी बताने वाले देशभक्तों क्या आपने कभी ऐसे लोगों पर भी नज़र-ऐ-इनायत की है।

पाठको, सम्भव है किसी भी खबरिया ने अमरोहा की खुशबू मिर्ज़ा पर कोई फीचर नहीं दिखाया होगा.हाँ मैं उस लड़की का ज़िक्र कर रहा हूँ जो चंद्रयान-१ के मिशन में शामिल बारह लोगों में एक है.खुशबू गत सालभर से इस टीम में है.उसका काम चंद्रयान की उड़ान भरने से पहले भी था और उसका काम चंद्रयान उपग्रह में लगने वाले विभिन्न पेलोड की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली की टेस्टिंग और मानिटरिंग है.इस समय वो हरिकोटा में ही है।

महज़ २३ साल की ये लड़की कमाल अमरोही के शहर के मोहल्ला चाहगौरी के स्व.सिकंदर मिर्जा की बेटी है.उसने अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय (जामिया मिल्लिया की तरह इसे भी आतंकवादियों की शरणस्थली बताया जाता रहा है!) से बीटेक इलेक्ट्रानिक्स की पढ़ाई की.९६ फीसदी अंक पाकर उसने गोल्ड मैडल हासिल किया.उसका चयन टीसीएम अकेंटरी और अडोब जैसी कंपनियों में भी हो गया था लेकिन उसने वहाँ जाने से इनकार कर दिया।

मुझको जाना है अभी ऊंचा हद-ऐ-परवाज़ से

नवम्बर २०६ में उसका चयन इसरो में बतौर वैज्ञानिक हो गया.और उसकी अम्मी फ़रहत मिर्ज़ा खुश हो हुईं।

वो अपनी कामयाबी का श्रेय अपनी अम्मी को ही देती है.साथ ही भाई और छोटी बहन की हौसला अफज़ाई को.