बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

हे कृष्ण कन्हैया, नन्द लला! अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी !!



फ़ोटो वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी की फेसबुक वाल से उड़ाया








































हिंदुस्तान। ऐसा मुल्क जो तमाम विपरीत झंझावतों के अपने विविध रंगों में आज भी मुस्कुरा रहा है। बक़ौल इक़बाल, यूनान, मिस्र, रोमां सब मिट गए जहां से/ बकाई मगर है अब तक हिन्दुस्तां हमारा ! दरअसल इसकी आबोहवा ही ऐसी है कि हर कोई यहीं का होकर रह जाता है। बनारस की सुबह और लखनऊ की शाम किसे प्यारी न लगे! सबब यही है कि संत-कवि बुल्ले शाह कहता है, होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह! बात होली की हो तो मथुरा और बृन्दावन का ज़िक्र सहज ही आ जाता है। कृष्ण और राधा की प्रेम-कथा को एतिहासिक लोकप्रियता हासिल है। उनके दीवानों में ढेरों मुस्लिम कवि हुए हैं। युवा लेखक कश्यप किशोर मिश्र लिखते हैं,  'सूफीवाद में अमूर्त रूप से प्रेम के प्रतीक के रूप में कृष्ण खूब चित्रित हुए, चाहे वो मंझन रहे हो, या कुतुबन या फिर उस्मान, अगर उनकी कृतिया रसीली है, तो उसके मीठे का स्रोत कृष्ण रहे है |'
         

सैयद इब्राहीम उपनाम रसखान  कृष्ण भक्ति में सरे-फेहरिस्त हैं। उन्हें  रस की ख़ान ही कहा जाता है। इनके काव्य में भक्ति, श्रृगांर रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं।  मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों में रसखान की कृष्ण-भक्ति निश्चय ही सराहनीय, लोकप्रिय और निर्विवाद है। कृष्ण-भक्ति और काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से उनके काव्य-ग्रन्थ  'सुजान रसखान' और 'प्रेमवाटिका' को देखा जा सकता है। कृष्ण भक्तों में रसलीन रीति काल के प्रसिद्ध कवियों में से एक हैं। उनका मूल नाम 'सैयद ग़ुलाम नबी' था। उनके अलावा मालिक मोहम्मद जायसी, नवाब वाजिद अली शाह, नजीर अकबराबादी आदि अनगिनत रचनाकार उर्दू और हिंदी में हुए हैं, जिन्हें कृष्ण ने आकर्षित किया है।

 नजीर अकबराबादी  अपनी लंबी नज़्म में कृष्ण भक्ति में किस तरह लीन  हैं :

हे कृष्ण कन्हैया, नन्द लला !
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मुट्ठी भर चावल के बदले ।
दुख दर्द सुदामा के दूर किए ।
पल भर में बना क़तरा दरिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।
मन मोहिनी सूरत वाला था ।
न गोरा था न काला था ।
जिस रंग में चाहा देख लिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मुग़ल बादशाह  औरंगजेब  बदनाम -ज़माना है। लेकिन इधर उनकी  भतीजी ताज बेगम कृष्ण की मीरा बन बैठी।जिनका काल 1644 ई. माना जाता है,  उन का एक प्रसिद्ध पद है:

बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूं देवतों से न्यारा है।
माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जो है कान,
कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिर धारा है।
दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज,
चित्त में निहारे प्रन, प्रीति करन वारा है।
नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,
वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है।।
सुनो दिल जानी, मेरे दिल की कहानी तुम,
दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं।
देवपूजा ठानी मैं, नमाज हूं भुलानी,
तजे कलमा-कुरान साड़े गुननि गहूंगी मैं।।
नन्द के कुमार, कुरबान तेरी सुरत पै,
हूं तो मुगलानी, हिंदुआनी बन रहूंगी मैं।।

1694 ई  के दौर की  एक कवियत्री थी शेख, उनका पूरा नाम अज्ञात है। इनकी अधिकांश रचना एँ शृंगाररस की हैं, जिनमे से कुछ में कृष्ण से लौकिक प्रेम प्रदर्शन भी है:

मधुबन भयो मधु दानव विषम सौं
शेख कहै सारिका सिखंड खंजरीठ सुक
कमल कलेस कीन्हीं कालिंदी कदम सौं

रसखान का लहजा देखिये:
गावैं गुनि गनिका गंधरव औ नारद सेस सबै गुन गावत।
नाम अनंत गनंत ज्यौं ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत।
जोगी जती तपसी अरु सिध्द निरन्तर जाहि समाधि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।

हिन्दुस्तानी ज़बान के पहले कवि माने जाने वाले अमीर खुसरो। आप संत हज़रत निज़ाम उद्दीन के भक्त थे।  लेकिन जब उनके प्रेम में लिखते हैं, तो कान्हा उनके ज़ेहन में नृत्य कर रहे होते हैं:  

बहुत कठिन है डगर पनघट की।
कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी
मेरे अच्छे निजाम पिया।
पनिया भरन को मैं जो गई थी
छीन-झपट मोरी मटकी पटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की।
खुसरो निजाम के बल-बल जाइए
लाज राखी मेरे घूंघट पट की
कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की।




भास्कर के  28 अगस्त 2013 के अंक में (झारखंड के संस्करणों में प्रकाशित )       
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