बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 3 मार्च 2015

... देर तक दिल ख़राब होते हैं


 










सुरेश  स्वप्निल  की ग़ज़लें

1.

न  नींद  आए  न  चैन  आए
तो  आशिक़  क्यूं  हुआ  जाए

लिया  तक़दीर  से  लोहा
बहारें  लूट  कर  लाए

हज़ारों  बार  दिल  जीते
हज़ारों  बार  पछताए

ज़ुबां  ख़ामोश  रह  लेगी
नज़र  को  कौन  समझाए

कहां  हम  थे,  कहां  दुनिया
न  आपस  में  निभा  पाए

रहे  रश्क़े-समंदर  हम
हमीं  कमज़र्फ़  कहलाए

चलो  माना,  ख़ुदा  भी  है
कभी  तो  शक्ल  दिखलाए  !

                                                
2.

वो अगर दोस्त कह गया होता
आपका  अज़्म  रह गया होता

ख़ून  होता कहीं  मिरे दिल में
चश्मे-नाज़ुक से बह गया होता

क़ैस    ख़ुद्दार था    मिरी तरहा
और भी  ज़ुल्म  सह गया होता

आप  गर  ख़्वाब में  नहीं आते
दर्द क्या  इस तरह  गया होता

शाह    तक़दीर का    सिकंदर है
वर्न:    आहों से  ढह  गया होता

शाह    दुश्मन  उसे समझ लेता
जो  हमारी  जगह  गया होता

तूर  पर    दीद    हो  गई होती
तू  अगर  हर सुबह गया होता !
                                                     

3.
 
मुफ़लिसों  ने  जहां  बदल  डाला
देख  लो,  आसमां  बदल  डाला

थी  हमें  भी  उमीद  जल्वों  की
'आप'ने  तो  समां  बदल  डाला

बढ़  गए  ज़ुल्म  जब  ग़रीबों  पर
क़ौम  ने  हुक्मरां  बदल  डाला

आहे-मज़्लूम  के  करिश्मे  ने
हर  भरम,  हर  गुमां  बदल  डाला

मंज़िलों  पर  निगाह  थी  जिनकी
वक़्त  पर  कारवां  बदल  डाला

आंधियों  का  कमाल  ही  कहिए
परचमों  का  निशां  बदल  डाला

तोड़  पाए  न  दिल  हमारा  जब
तो  ग़मों  ने  मकां  बदल  डाला !
 
 4.

तुम्हारे  हाथ  में  तलवार  कब  थी
अगर  थी,  तो  बदन  में  धार  कब  थी

बचाना  चाहते  थे  तुम  सफ़ीना
हमारे  सामने  मझधार  कब  थी

गवारा  हो  न  पाया  सर  झुकाना
मुहब्बत  थी,  मगर  लाचार  कब  थी

किए  थे  मुल्क  से  वादे  हज़ारों
अमल  में  शाह  के  रफ़्तार  कब  थी

ख़ुदा  जाने  किसी  ने  क्या  संवारा
हमें  इमदाद  की  दरकार  कब  थी

जिसे  मौक़ा  मिला  लूटा  उसी  ने
वतन  के  वास्ते  सरकार  कब  थी

वुज़ू  थी,  वज्ह  थी,  जामो-सुबू  थे
ख़ुदा  की  राह  में  दीवार  कब  थी  ?

                                                           
 5.

शायर  था,    दीवाना  था
छोड़ो  जी,  अफ़साना  था

तूफ़ानों  से  क्या  शिकवा
फ़ितरत  में  टकराना  था

दानिश्ता    दिल  दे    बैठे
आख़िर  क़र्ज़  चुकाना  था

सोचो,    तो  मजबूरी  थी
समझो,  तो  याराना  था

ख़ूब  लड़े,        जीते-हारे
मक़सद  जी  बहलाना  था

ख़ामोशी  से      टूट  गया
शायद  ख़्वाब  सुहाना  था

रब  से      कैसी      उम्मीदें
क्या  काफ़िर  कहलाना  था  ?!
 
6.

मर्ग  के  बाद    कोई  सितम    तो  न  हो
दिल  जले  तो  जले  रंजो-ग़म  तो  न  हो

क़ब्र  में    हो  सुकूं    अम्न  हो    सब्र  हो
बस  हमें  ज़िंदगी  का  वहम  तो  न  हो

दफ़्न  के  बाद  भी  दिल  धड़कता  रहे
इस  तरह  दोस्तों  का  करम  तो  न  हो

कल  सभी  जाएंगे  मुट्ठियां  खोल  कर
दांव  पर  आज  दीनो-धरम  तो  न  हो

ताजिरों  को    खुली  लूट  की    छूट  है
दुश्मने-आम  पर  यूं  रहम  तो  न  हो

मुल्क  में  मुफ़लिसी  बेबसी  सब  रहे
रिज़्क़  के  नाम  से  आंख  नम  तो  न  हो

है  ख़ुदा    गर  कहीं    तो    तग़ाफुल  करे
मोमिनों  पर  वफ़ा  की  क़सम  तो  न  हो  !

                                                                        
7.
वक़्त  की    ना-कामयाबी    देख  ली
हर  कहीं  दिल  की  ख़राबी  देख  ली

तोड़  डाला    पारसाई  का    गुमां
आईने  ने  बे-हिजाबी    देख  ली

पास    आते  ही    पशेमां    हो  गए
चश्मे-जां  की  इल्तिहाबी  देख  ली

यूं  हमें  रुस्वा  किया  मंहगाई  ने
शाह  ने  ख़ाली  रकाबी  देख  ली

याद  आती  है  किसी  की  रौशनी
तूर  की  रंगत  गुलाबी  देख  ली

रात  भर  बारिश  हुई  इख़लास  की
ख़ूने-दिल  की  इंसिबाबी  देख  ली

इक  अज़ां  पर  सामने  आ  ही  गए
आपकी  भी  इज़्तिराबी  देख  ली  !

                                                         
8.

शहर  के  इरादे  ग़लत  तो  नहीं  हैं  ?
कहीं  इश्क़ज़ादे  ग़लत  तो  नहीं  हैं  ?

बयाज़े-नज़र  में  बयां  कुछ  नहीं  है
ये:  सफ़हात  सादे  ग़लत  तो  नहीं  हैं  ?

यक़ीं  है  हमें  पर  तसल्ली  नहीं  है
ये:  पुरज़ोर  वादे  ग़लत तो  नहीं  हैं  ?

दिए  जा  रहे  हैं  जहां  को  नसीहत
ये:  भगवा  लबादे  ग़लत  तो  नहीं  हैं  ?

जहां  शाह  कह  दे  वहीं  जान  दे  दें
ये:  मजबूर  प्यादे  ग़लत  तो  नहीं  हैं ?

                                                                
 9.

शाह  जब    बे-नक़ाब    होते हैं
देर  तक  दिल  ख़राब  होते हैं

ख़ार  हम    बाज़ वक़्त  होते हैं
यूं    अमूमन    गुलाब    होते हैं

कौन  चाहत  करे  फ़रिश्तों  की
लोग    भी    लाजवाब    होते हैं

आप  आंखें  खुली  रखा  कीजे
ख़्वाब    ख़ाना-ख़राब    होते हैं

दर्दे-दिल  मुफ़्त  में  नहीं  मिलते
मन्नतों    का    जवाब    होते हैं

ताज  सर  पर  नहीं  रहा  करते
ज़ुल्म  जब  बे-हिसाब    होते हैं

कोई  बतलाए,  कब  करें  सज्दा
होश  में  कब    जनाब  होते हैं ?
 
10.

न  दिल  रहेगा, न  जां  रहेगी
रहेगी      तो    दास्तां  रहेगी

है  वक़्त  अब  भी  निबाह  कर  लें
तो  ज़िंदगी  मेह्रबां  रहेगी

तुम्हारे  आमाल  तय  करेंगे
कि  रूह  आख़िर  कहां  रहेगी

थमा  सफ़र  जो  कभी  हमारा
ग़ज़ल  हमारी  रवां  रहेगी

मिरे  मकां  का  तवाफ़  करना
कि  हर  तमन्ना  जवां  रहेगी

ये  दौरे-दहशत  तवील  होगा
जो  चुप  अभी  भी  ज़ुबां  रहेगी

उड़ेगी  जब  ख़ाक  ज़र्रा-ज़र्रा
फ़िज़ा  में  अपनी  अज़ाँ  रहेगी !

                                                       
(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 10 मार्च, 1958, झांसी, उप्र में। पालन-पोषण भोपाल में ।
शिक्षा: एम.ए.(हिन्दी साहित्य), एम.ए.(अर्थशास्त्र), बरकतउल्लाह  विश्वविद्यालय, भोपाल से; भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविज़न संस्थान (FTII), पुणे से फ़िल्म-निर्देशन में स्नातक।
सृजन : पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं, पहला ग़ज़ल-संग्रह  'सलीब तय है'  दख़ल प्रकाशन से प्रकाशित
ब्लॉग : ग़ज़लों के लिए साझा आसमान, जबकि कविता केंद्रित साझी धरती
संप्रति:  स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य
संपर्क: sureshswapnil50@gmail.com )
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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

समय की बेचैनियों से बनीं शाहनाज़ की कविताएँ
















राजेश जोशी की क़लम से
आँसुओं से भीगी ताज़ा लहू में डूबी कविता
लिखती हूँ काट देती हूँ फिर लिखती हूँ !

शाहनाज़ की ये कविताएँ गुस्से , खीज , गहरी करूणा ,स्मृतियों और हमारे समय की
बेचैनियों से बनी कविताएँ हैं। इनमें गहरी हताशा का स्वर है तो कहीं उसी के बीच से कौंधती उम्मीद की रौशनी भी मौजूद है। यहाँ रौशनी की एक बूंद को अपनी मुट्ठी में बंद कर लेने का खेल है तो यह प्रश्न भी कि आज़ाद चीजों को कै़द करने का ऐसा खेल क्यों होता है। यहाँ कभी न लौट सकने वाले बचपन की स्मृतियाँ है और यह दुख भी कि उस समय जब घर में सब होते थे मतलब दादा-दादी, नाना-नानी, बड़े पापा , चाचा, मामी , ख़ाला उस संयुक्त परिवार के हम आख़री गवाह है। तेजी से बदल रहे शहर, रिश्ते और गुम हो रही चीजें और चिट्ठियाँ हैं,  जिनका शायद कुछ आँखों को अभी भी इंतज़ार है। यह कविताएँ अपनी बात कहने के लिये किसी कविताई कौतुक, अलंकारिकता या भाषायी बंतुपन का आसरा नहीं ढूंढती। इनमें हिन्दी उर्दू की मिली-जुली जबान का वह स्वाद है जो शाहनाज़ को अपने शहर की बोलचाल से प्राप्त हुआ है । शाहनाज़ के पाँव अपनी ज़मीन को पहचानते हैं और अपने आसमान को भी ।
ये कविताएँ उन दृश्यों को सामने रखती है जो अतिपरिचित हैं, सबके देखेभाले हैं और शायद इसीलिए रचना में वो हमसे अक्सर अदेखे रह जाते हैं । वो हमारे एकदम आसपास बिखरे जीवन के दृश्य है। इनमें आँसू भी है और लहू भी। ये कविताएँ जीवन के बहुत ज़रूरी सवालों को बेलाग ढंग से और बेख़ौफ़ होकर उठाती है। इसमें किसी तरह का संकोच या हकलाहट नहीं। पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री की अस्मिता से जुड़े सवाल हों या अल्पसंख्यक समुदाय और तथाकथित सेक्यूलर राजनीति के कारनामे, कहीं भी शाहनाज़ विमर्श के सीमित दायरों में अपने को कैद नहीं रखती , वह उससे बाहर आकर उन सच्चाइयों को वर्गीय राजनीतिक समझ के साथ देखने की कोशिश करती हैं। इसलिए उसकी दृष्टि बहुत हद तक अस्मिताविमर्शवादियों से अलग भी है ।
हमारे समय की राजनीति जिसे हमेशा ही सिर्फ चुनाव के समय ही हाशिये से बाहर के लोग याद आते हैं पर ये कविताएँ विचलित कर देने वाले सवाल खड़े करती हैं। हमारे आसपास बिखरी सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विद्रूपताएँ इन कविताओं की उठी हुई उंगली की जद में हैं। यह ऐसी राजनीति है जिसे जब वोट मांगना होता है तब ही वह नाक पर रूमाल रखकर मुसलमानों के मोहल्ले में प्रवेश करती है । जहाँ जख़्मों से चूर ज़िन्दगी ख़ून सी छलकती है । यह एक ऐसा जीवन है जो स्टिललाइफ़ की तरह पिछले साठ सालों में ठहर-सा गया है । जिसे किसी न किसी बहाने से सरकारें बार बार भूल जाती हैं । आलोचना की सुई किसी एक ही तरफ ठहरी हुई नहीं है । इसी तरह उम्र बीस साल कविता में वह कहती है-

तुम्हारा परिचय भी हुआ होगा
हिंसा ,उत्पीड़न ,यातना ,अपमान जैसे शब्दों से
मौलवियों और उलेमाओं की इस दुनिया में
रोने पर पाबन्दी है और ज़ोर से हँसना मना है
तबलीग करने वाले सिर्फ फ़र्ज़ बताते हैं
और हक़ सिर्फ़ किताबों में लिखे जाते हैं ।
शाहनाज़ का यह पहला कविता संग्रह है। एक नये कवि को पढ़ते हुए पाठक यही ढूंढता है कि उसमें नया क्या है और कितना चौकन्ना है वह अपने समय और आसपास के जीवन को देखने, जानने बूझने के लिये। शाहनाज़ की ये कविताएँ अपने आसपास के प्रति सजग भी हैं और इनमें कई अलक्षित कोनों में झाकने और चीजों को नये तरह से देखने और कहने का कौशल भी है। इन कविताओं से किसी हिस्से को अलग करके उद्धृत करना मुश्किल है। वस्तुतः ये कविताएँ एक मुकम्मिल इकाई की तरह हैं। इसलिए उन्हें हिस्सों में नहीं पढ़ा जा सकता। कई बार तो किसी पंक्ति या पंक्तियों को अलग करके रखने में यह भी डर होता है कि संदर्भ से कट जाने पर उनका अर्थ ही न बदल जाये ।
शाहनाज़ सोचती है कि इन वर्कों पर कुछ और भी लिखा जा सकता था। जैसे:

एक सफ़र का क़िस्सा
जंग की भयावहता
डरावनी यादें
चूल्हे की आग ,छीनी गई रोटी
झील में उभरता सूरज
अकेली शाम की खामोशी
या तुम्हारी काली आँखें

पर आँसू और खुशी , गुस्से और नफ़रत , तकलीफ़ें और मोहब्बत लिखते हुए उसे लगता है कि ऐसा लिखना-कुछ ऐसा ही जैसे लिखना / खुद को बचाये रखने का रास्ता हो।
 

मुझे पूरा विश्वास है कि इस संग्रह को पढ़ने के बाद आप विचलित हुए बिना नहीं रह सकते और इस संग्रह की अनेक कविताएँ और अनेक पंक्तियाँ आपके मन में उतरकर आपकी स्मृति का हिस्सा हो जायेंगी ।


दख़ल से प्रकाशित शहनाज़ के कविता-संग्रह दृश्य के बाहर की भूमिका


शहनाज़ इमरानी की कविताएं पढ़ें



(लेखक-परिचय:
जन्म: 18 जुलाई 1946 को नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश में
प्रमुख कृतियाँ :     कविता-संग्रह- समरगाथा (लम्बी कविता), एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हँसी और दो पंक्तियों के बीच, दो कहानी संग्रह - सोमवार और अन्य कहानियाँ, कपिल का पेड़, तीन नाटक - जादू जंगल, अच्छे आदमी, टंकारा का गाना। इसके अतिरिक्त आलोचनात्मक टिप्पणियों की किताब - एक कवि की नोटबुक, पतलून पहना आदमी (मायकोवस्की की कविताओं का अनुवाद), धरती का कल्पतरु(भृतहरि की कविताओं का अनुवाद)
कुछ लघु फिल्मों के लिए पटकथा लेखन भी
सम्मान : शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान और माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार के साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार  से विभूषित। )
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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

अन्याय के ख़िलाफ़


 










शहनाज़ इमरानी की कविताएं

जंग अधूरी रह जाती है

कितना आसान है आगे बढ़ना
अगर सामने रास्ते है
मगर रास्ते सब के लिये कहाँ होते हैं
बाहर का सन्नाटा और अन्दर की खलबली में
कुछ लोग चुनौती को स्वीकारते है
खेतों, कारखानों में कई करोड़
किसान और मज़दूर
कई करोड़ बेरोज़गार युवा
जिनकी कोशिश जारी है
एक सम्पादक लिखता है
विद्रोह न्यायसंगत है
अन्याय के ख़िलाफ़
एक चित्रकार चित्रित करता है
किसान की खुदकशी
एक कवि लिखता है
धर्म के ठेकेदारों के षड्यंत्रों के विरुद्ध
कुछ लोग ढूँढ़ते हैं मसीहा
विचारहीन सम्मोहित भीड़ चल पड़ती है पीछे-पीछे
यह सिर्फ़ ज़बानी वादों का ज़माना है
ज़बान में बहुत ताक़त
कान तक पहुंची बात
क़लम से ज़्यादा असरदार है
जंग अधूरी रह जाती है
किसी और समय में कोई दूसरे
हथियारों के साथ पूरी होने के लिए।

रोज़ बदलती है तारीखें

कई सवाल हैं
कब ,क्यों , कैसे और किसलिए
सवाल जो कभी ख़त्म नही होते
हर आदमी अपने
सवालों के बोझ से दबा हुआ
रोज़ बदलती है तारीखें
बदलती हैं शताब्दियाँ
नहीं बदलते हैं सवाल
नहीं मिलते है जवाब
इतिहास में क़िस्से है राजाओं के
जंग और जीत के उत्थान और पतन के
कहाँ दर्ज है इतिहास भूख का, ग़रीबी का?
जिन्होंने बनाये क़िले और मक़बरे
मंदिरों और मस्जिदों को
उन हुनरमंद हाथों का, उन उँगलियों का?


मेरा शहर भोपाल

 शहर में भीड़ है
शहर में शोर है
शहर को खूबसूरत बनाया जा रहा है
पूंजीपतियों के सेवा ली जा रही है
ऊँचे वेतन और विशेषाधिकार
रिश्वत ,दलाली और कमीशन की मोटी रक़म
रौशनियों में डूबा शहर
जिसकी रात अब जागती है देर तक
फिर भी इसमें खुले आम लूटा जाता है इंसान
भीड़ में कोई पहचानी आवाज़ नहीं रोकती अब
सब कुछ समतल होता जाता है
मर चुकी संवेदनाओं दे साथ जीने लगा है शहर
अब बहुत तेज़ दौड़ने लगा है मेंरा शहर।

 
आत्महत्या

मुझे मालूम है
आत्महत्या पलायन है
मुझे मालूम है
मेरी चीख़ को तुम
चीखने का अभ्यास समझोगे
तुम्हारे लिए यह आशचर्य पैदा करने वाला तथ्य है
अपनी मुक्ति का भ्रम पालती रही हूँ झूठ ही
इस तरह तो कभी चुप्पी नहीं थी
निस्तब्धता तो ऐसी नहीं थी
काटती हूँ चिकोटी अपने आपको
पता नहीं इस प्रस्ताव पर सहमति हो या नहीं
पर नब्ज़ काट लेने दो मुझे
सरकारी तफ्तीशों में मेरी आत्महत्या
एक नैसर्गिक मौत मान ली जाएगी
कोई भी मृत्यु नैसर्गिक नहीं होती
घटना अगर स्मृति नहीं बनती
तो सिर्फ हादसा बन जाती है।

 इस जंग में

 लहू तपती रेत में जज़्ब हो गया
कुछ जीते जी मर गए
और कुछ को मार डाला गया

हड्डियां पत्थरों में मिलती जाती
धरती का तापमान बदल रहा
जिस्मों से लहू उबल रहा
दुनियां और देश की राजनीति में
हर पल इंसान मर रहा
कत्लगाह-ए-शहर में
आदम-ओ-हव्वा की औलादें
लहू में लथ-पथ

वे जिस्म जिनमें
ज़िन्दगी जीने का लालच था
ज़मींदोज़ हो गये
नफरत और जंग की हवा में
हज़ारों बेक़सूर मारे गए
जो बे-ख़ता वार करते हैं
लोगों को बग़ावत के लिए तैयार करते हैं

फैल रहा वहशत का जंगल
कोई नहीं है आग बुझाने वाला
जब वक़्त का फ़ैसला होगा
ज़ुल्म आखिरकार हद में आएगा
मज़हब और अक़ीदों के फ़लीते में
विस्फोट किया जा सकता है
तो लहू की आखरी बूँद को भी
आत्मा में बदला जा सकता है

हम लाश उठाने वाले लोग
हम कांधा देने वाले लोग
हमें भी तो लाशों के ढ़ेरो पर
एक लफ्ज़ नदामत लिखना है
इंसान के लिए इस ज़मीं पर
बाक़ी है मोहब्बत लिखना है।

 सभी नहीं जानते मौत के बारे में

फूल नहीं जानते मौत के बारे में
कौन ख़ामोश है कौन रो रहा है
वो तो मुस्कुराते रहते हैं
मछलियाँ नहीं जानतीं
समुन्द्र में कितने आँसू शामिल है
वो तैरती हैं बिना किसी वजह के
दरख़्त, परिंदे शायद जानते हों
जानती है हवा
चिताएँ जलती हैं रोज़ न जाने कितनी
जानती है ज़मीन
दफ़नाये जाते हैं हर पल ज़िस्म इसमें 
अब वयवस्था हुई जंगल और क़ानून बन्दूक़
मरने वाले की चीखों से
बहरे हुए हैं कान छिन गई हैं आवाज़ें

उफ़्फ़ के शब्द गले में ही अटके गए
ऐसी ही होती हैं सुबहें ऐसी ही हैं शामें
हम जानते हैं मौत को
जो आ जायेगी कभी भी
बिना बताये ख़ामोशी से।

पुराना डाकख़ाना

चौड़ी सड़कों में दबे
पानी के बाँध में समा गए
शहर की तरह एक दिन तुम भी
तमाम मुर्दा चीज़ों में शुमार हो जाओगे
वक़्त की चाबूक से छिल गई है राब्ते की पीठ
कुछ शब्दों को नकार दिया है
कुछ पुराने पड़ गए शब्दों को
मिट्टी में दबा दिया है
उखड़ी सड़क, झाड़-झंखाड़
और अकेले खड़े तुम
रोज़ अंदर-ही-अंदर का
खालीपन गहरा होता जाता है
पुराने धूल भरे कार्ड
पत्रिकायें, बेनाम चिट्ठियां
जाने कहाँ-कहाँ भटकी हैं
कुछ आँखें धुंधला गयी होंगी इंतज़ार में
कुछ आँखों से बहता होगा काजल
कुछ आँखें को आज भी इंतज़ार है
गुम हुई चिट्ठियों के मिलने का।

बातों के छोटे-छोटे टुकड़ों में

बहुत कुछ है
और बहुत कुछ नहीं है के बीच
बहुत सारी बेवकूफ़ियों के बाद भी
बची रहती है समझदारी
जैसे कुछ चीज़ों में
बचा रह जाता है अपनापन
अलमारी में रखा छोटा सा पर्स
पुरानी डायरी में
कविता की दो चार पंक्तियाँ
बातों के छोटे-छोटे टुकड़ों में
छुपी रहती है एक दुनियां
ज़िन्दगी में फ़ैला दर्द
जो तुम्हारी बातों में खो गया
मेरी सपाट दुनियां में
तुम्हारा होना
दिल से दिमाग़ के रास्ते पर
भटक जाती हूँ कई बार
लिखना चाहती हूँ एक कविता
प्यार, मौसम, बारिश, धूप, चाँद
सब कुछ होते हुए भी
न होने की आवाज़।

एक रात

सर्दी की रात में सहमा-सहमा पानी बरसता है
हवा दरख्तों को हलके से छू कर गुज़रती है
कुछ दैर शोर मचाते है पत्ते
करवट दर करवट वक़्त गुजरता है
रात के चहरे पर
खाली आँखों के दो कटोरे
दीवारों से फिसलते हुए
फर्श पर आ गिरते हैं
नींद बे आवाज़ आ कर कहती है
सोना नहीं है क्या ?


(रचनाकार-परिचय :
जन्म: भोपाल में
शिक्षा:  पुरातत्व  विज्ञानं (अर्कोलॉजी ) में स्नातकोत्तर
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। काव्य-संग्रह जल्द 
संप्रति: भोपाल में अध्यापिका
संपर्क: shahnaz.imrani@gmail.com  )


हमज़बान पर कवयित्री की और कविताएं भी पढ़ें    

 
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बुधवार, 26 मार्च 2014

गूंजती है हथोड़े सी आवाज़, औरत भी शामिल है इंसानो में




 






शहनाज़ इमरानी की कविताएं
 

हथोड़े की आवाज़ गूंजती है

एक वक़्त ऐसा भी था
जब दरख्त लोगों का
सारा सच सुनते थे
दरख्तों के तनों में बने
लकड़ी के कानों में
सब कहा करते थे
दरख्तों के पास अनगिनत
राज़ जमा हो गए थे
और वो कुल्हाड़ियों से नहीं डरते थे
उनकी जड़ें लोगों के ख़्वाबों में
हुआ करती थीं
और ख़्वाबों की चाबी
किसी ख़ुदा या भगवान के
हाथ में नहीं थी.

फिर समय ने कुछ रंग दिये 
दबे पाँव लोग मिट्टी से
बाहर निकल कर
अपनी पहचान में रंग भरने लगे
गाँव आदमी के तजुर्बों का
सबसे मुश्किल हिस्सा हो गया
लालसाओं के छुपे नाख़ून पंजों से बाहर निकले
सड़ते ज़हनों की बदबू फैलने लगी
चौराहों पर भ्रामक इश्तहारों की तरह
आश्वासनों से भरी
पीढ़ी गुज़रती गयी क़तार से
विकल्प की संभावना के हाथ कट गए
हर तरफ चेहरे ही चेहरे
दुखी, फ़ीके, उदास
भूखे, धूल खाये, बदहवास
ज़ख़्मी, गुस्साये, बौखलाए
बढ़ता गया अँधेरा और
परावर्तन के डर ने किरणों का प्रवेश बंद कर दिया
फासिस्टी कचरे और उन्माद की गंध से 
पूँजीवादी बिलों से निकले बेशुमार कीड़े
और दरख्तों के कानों में घुस कर
उनको बहरा कर दिया
कुछ दिन बाद दरख्तों ने
बिना मिलावट के सच उगल दिये
और एक-एक करके सारे दरख्त मरने लगे
कई ख्वाब टूटे कुछ पर लगा कर उड़ गये
कई हिस्सों में बंटा विरोध।

अब जुर्म कैसे साबित हो
लोग कीड़ों के साम्राज्य से डरते है
मिट्टी में रेडियोएक्टिव किटाणु अब भी
दरख्तों का बदन कुतरते रहते है
सन्नाटे में हथोड़े की आवाज़ें गूंजती है
लोग अभी भी कीड़ों को मार रहे हैं।

मोहबब्त फेयरीटेल्स नहीं है

पार्क  तो वही है
गहरी शाम ओढ़े हुये
कई लोग हैं सभी की आँखों की
इबारत अलग है
बेंच पर बूढा आदमी चेहरे पर
आखरी इंतज़ार लिए सो रहा है
एक बच्चा बॉल से खेल रहा है
सब कुछ भूल कर एक कोने में
एक लड़का और एक लड़की हाथ पकड़े बैठे हैं
पार्क में सब कुछ कल जैसा ही है
बदलाव भी अजीब होता है
शायद चीज़ें नहीं बदलतीं हैं
देखने का नज़रिया बदलता जाता है
मोहबब्त फेयरीटेल्स नहीं होती है
रिश्तों को एक ही पैटर्न पर चलते हुए पाते हैं
शुरुआती थ्रिल, ऊब, उपेक्षा और
तनाव फिर सब ख़त्म
मोहबब्त अनकंडीशनल क्यों नहीं होती !

चुनाव का माहोल

बदल जाता है सच
परिस्थतियों के साथ 
किस लफ्ज़ ने किस लफ्ज़ से
क्या कहा
सब अनसुना सा हो जाता है
फुल स्टाप के बाद
दिन मांगते हैं न्याय
अटकलों, संदेहों, और अंदेशों पर
लटका समय गुजरने के बाद
शुरू हो गई है खोखली बहस
जिसकी धार मर गयी है
देखने का नज़रिया कैसे बदले
नेता माँ बाप नहीं
जनता के नौकर हैं
जनता हाथ जोड़े खड़ी रहती है
लाठी किसी के भी हुक्म से चले
सहना जनता को पड़ता है
योजनाये बहुत हैं, करोड़ों का बजट है
पर सरकार खुशहाली का निवाला
कुबेरों को खिलाती है
बेशर्मी की चर्बी बढ़ती जाती है
बढ़ती जाती स्लम बस्तियाँ
खत्म हो रहा मध्यवर्ग
धर्म एक हथियार बना है
उन्माद से भरे हैं लोग
पुलिस बनी शिकारी कुत्ता
और जनता को दौड़ाती है
हविस, हिंसा, होड़
सारे विकल्पों को खुला रख कर
चुनाव का माहोल बना है।


एक लड़की है शबाना

सड़क किनारे खड़ी  होती है
वो लड़की शबाना
कस्टमर के इंतज़ार में
सुना है अपना घर और ज़मीन गाँव में
गिरवी रख कर आई है.

तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए था
उसने मुझसे कहा
एक कमरा मटमैले अँधेरे से घिरा हुआ
जिसकी दीवारों का रंग उड़ा हुआ था
आख़री बार पता नहीं पुताई कब हुई थी
दीवार में एक छोटा सा रोशनदान
जिससे धुँधली फ़ीकी
धूप गिर रही थी
एक पलंग पर सिलवटों से भरी
चादर बिछी थी और दो तकिये रखे थे
शराब की खाली बोतल पड़ी थी पलंग के नीचे
कोने में जल रही अगर बत्तियों में से
कुछ राख में बदल चुकी थीं.

सुना था तुम नज़रों का जाल बुनकर
लोगों को फँसाती हो
जो कुछ सुना था
उसके विपरीत हो तुम
निचोड़े गये नीबू जैसा जिस्म
उम्र की सारी बरसातें
बर्फ़ में बदल गयी हो जैसे
एक बेरंग दुनियाँ
लोग भी तो काली रातों के होगें
जिनके चेरहे दिन में पहचानना
बहुत मुश्किल है
तुम्हारी आवाज़ से मैं
चौंक गई तुम कह रही थी
यहाँ से चली जाओ
तुम्हे मेरे बारे में जानने की
इत्ती क्या पड़ी है
एक फ़ायदा भी हुआ है तुम्हारे आने से
मोहल्ले के लोग कुछ दिन मुझे
शरीफ़ लोगों में शामिल कर लेंगे
और जब पता चलेगा तो 
हमेंशा की तरह फिर जगह बदलना पड़ेगा
तुम्हारी बैचेनी का गवाह तुम्हारा चेहरा
भूख, बेरोज़गारी, ग़रीबी का आत्मविलाप
सोच रही थी सरकार ने
कई योजनायें बनायीं हैं
और एन.जी.ओ.वाले
कंडोम बाँट कर
मदद करते हैं तुम्हारी
तुम्हे एक नाम भी मिला है
सेक्स वरकर्स
आख़िर समाज की
सभ्यता बनाए रखने के लिए
तुम्हारी ज़रूरत है
कब तक खड़ी रहोगी तुम
सड़क के मोड़ों पर
पुलिस खदेड़ देगी या
और लड़कियों के साथ
भेड़ों की तरह पुलिस वैगन में
भर कर ले जायेगी 
और फिर हवालात।
 
गरीब की झोपड़ी में
साँप, बिच्छू या कोई भी
जानवर के आने पर पाबंदी नहीं होती
यह सब में तुमसे कहना चाहती थी
मगर पीली थकी बीमार हाँपती हुई
तुम्हारी आँखों में देख कर
खुद से नफरत की
आज शुरूआत हुई।



अब डर लगता है

जायज़ या नाजायज़ हालात
समय की पैदाइश हैं
ग़ायब हो चुके पार्क में
वो झूले याद आते है
तेज़ झूले का डर
छिपकलियों और कॉकरोचों से डर
परीक्षा में फ़ेल होने का डर
भूत, चुड़ैलों का डर.

डर भी कितने छोटे होते थे
शरारत और डांटों के बीच
डर अँधेरे के साथ ही रोज़ रात आता
डराता और सुबह होते चला जाता
साल-दर साल मेरे साथ-साथ
डर भी बड़े हुए
में तो एक हूँ यह अनन्त हुए.

अब डर लगता है
लोगों की चालाक मुस्कानो से
दोस्ती में छुपी चालों से
शतरंज की बिसातों से
नफरतों से चाहतों से
आतंक, विस्फोट, और इंसानी जिस्मों के टुकड़ों से
दंगाइयों से, आग से, लाठीचार्ज से
पुलिस, नेताओं, चुनाव और फसाद से
मस्जिद में अल्लाहो अकबर और
मंदिर में हर हर महादेव के नारों से
भीड़ में और बस में पास बैठे अजनबी के स्पर्श से
रास्ता चलते हुए जिस्म का जायज़ा लेती नज़रों से !


कानों में तेल डालने से पहले

कितना आसान होता है आगे बढ़ना
अगर सामने रास्ते होते है
मगर रास्ते सब के लिये कहाँ होते हैं
कुछ लोग चुनौती को स्वीकारते है
कभी -कभी शुरुआत मंज़िल से
पहले ही हार जाती है
फिर भी लोग
रास्ता तलाशने में लगे हैं
खेतों, कारखानों में कई करोड़
किसान और मज़दूर
कई करोड़ बेरोज़गार युवा
जिनकी कोशिश जारी है
एक सम्पादक लिखता है
विद्रोह न्यायसंगत है
अन्याय के ख़िलाफ़
एक चित्रकार चित्रित करता है
किसान की खुदकशी
एक कवि लिखता है
धर्म के ठेकेदारों के षड्यंत्रों के विरुद्ध
कुछ लोग ढूँढ़ते हैं मसीहा
विचारहीन सम्मोहित भीड़ चल पड़ती है
उसके पीछे-पीछे
क्या तानशाह का ह्रदय परिवर्तन हुआ है.

तुम्हारे कानों में तेल डालने से
पहले की बात है यह
गोधरा के बाद सत्ता द्वारा आयोजित नरसंहार
विधर्मियों को आग में झोंक कर
गुजरात में नरमेंघ यज्ञ
धर्म के ठेकेदारों के पास तुम्हारी
तकलीफों से रिहाई की कोई राह नहीं
और तुम्हारे पास ज़ंजीरों के
सिवा खोने को कुछ नहीं*।

* कॉल मार्क्स

वो आदमी

जिसे सब पागल कहते हैं।
पत्थर तो पहले से थे
पत्थरों से आग पैदा हुई
और फिर आग को बेचने वाले
वक़्त जितना गुज़र गया है
उतना ही ठहरा हुआ है
लोग बना रहे है अपना
आज, कल और परसों
उनकी तकलीफें
दूसरों का मनोरंजन
बुझे अलाव की मद्धिम सी आँच में
बूढ़े बरगद के नीचे
सड़क के कुत्तों के साथ
वो आदमी फिर सो गया है
उसे सब पागल कहते हैं।

 चटोरी गली
शाम को सूरज डूबने के बाद
चटोरी गली की रौनक़ बढ़ जाती है
यह एक अलग दुनियाँ है
उन्हें पता नहीं फाइव स्टार होटल और हाइजीनिक फ़ूड
उधड़ी सड़क, काला धुआँ दीवारों और चेहरो पर
टूटी-फूटी टेबल कुर्सियां और उन पर रखे मटमैले गिलास
सूरज तो सही वक़्त पर निकला था
और अँधेरा जब हुआ भूख की आवाज़ ऊँची होने लगी
रात ने कहा अगर सन्नाटे न टूटे तो
जमाई आती है
67 साल लम्बी उम्र होती है
एक आदमी बनियान में कमज़ोर सा , काला रंग
पसीने से शराबोर भट्टी पर
बड़ी-बड़ी रोटियां पकाता है
पान चबाता हुआ पीले-पीले बल्ब की उदास रौशनी
बड़े-बड़े काले तवों पर सिकते परांठे, शामी कबाब, मछली
मसाला लगे मुर्गे लटके हुए
नानवेज में सब कुछ मिलता है चटोरी गली में
जो अंदर बैठे है और जो बाहर खड़े हैं उनमें
आधे लोगों से ज़यादा पढ़ना नहीं जानते होंगे
किसी के मुहँ में पान है किसी के हाथ में बीड़ी है
मटमैले कपड़ों में होटल का मालिक गल्ले पर बैठा
हिसाब किताब में उलझा है 
दो लड़के बातें कर रहे है
अरे खां वो अपने धोनी की तो फिलिम उलझ गयी
क्या केरिये हो मियाँ
सच केरिया हूँ फिक्सिंग में नाम आ गिया है
लम्बे बालों वाला लड़का दूसरे से
अबे भूरे फिर क्या हुआ
जब साले अरशद ने तेरी सब्ज़ परी (पतंग का नाम )
पर लंगर डाल दिया था
अबे मैंने कोई कच्ची गोलियाँ थोड़ी खेली है
मैने भी छत पर ग़टटे (पत्थर) जमा कर लिए हैं
मिला-मिला के दिये साला चप्प्लें (चप्पल) छोड़कर भाग गिया
कुछ उम्र दराज़ लोग जो इस दुनियां से बहुत परेशान लगते है
उन्हें क्या खाना है किसी की दाढ़ में दर्द है
किसी का पेट खराब किसी के मुँह में छाले हैं
अरे मियाँ पीर सलीम मियाँ क्या पोह्ची हुई हस्ती है
दर्द से तड़प रिया था मेरा पोता
मियाँ ने ऊँगली पकड़ली और जो पड़ना शुरू किया
तो पिशाब करा दिया हाथ जोड़ने लगा
इमली वाला था बच्चे पे आ गिया था
क्यों खां तुम्हारी औरत घर आ गई
उन्ही में से एक शातिर सा दिखने वाला आदमी
सर में तेल और आँखों में सुरमा
हाथों में मेहँदी थोड़े साफ़ कपडे पहने हुए
एक मरियल बूढ़े से आदमी ने पीले दाँत निकाल कर पूछा
आएगी नहीं तो जायेगी कहाँ तुक (सीधा) कर दिया है
जब से भूत उतारा है (मारना बेहरहमी से)
इस इस्तेमे (इज्तिमा) में लड़की का निकाह करवा रिया हूँ
वो भी अपनी माँ की तरह लल्लो (ज़ुबान) चलाती है.

एक और मेज़ पर बिरयानी खाते हुए कुछ लोग
कुछ गालियां बक रहे है एक दूसरे को
ज़ोर-ज़ोर से हँसते हैं गंदे लतीफों पर
एक आदमी कहता है
भाई मियाँ शहर क़ाज़ी ने अच्छा किया
औरतो के बज़ार (बाज़ार) जाने पर पाबंदी लगा दी
रमज़ान के महीने में क्या धक्का-मुक्की होती है
उनमें से एक बोला
हमारी बीवी हर साल पैसे जोड़ती
और सब लूटा देती थी कपड़ों पर
अब ले लो सब हँसते हैं

एक आदमी साईकिल घसीटता हुआ
टूटी चप्पल जगह-जगह से फटे कपड़े 
एक कट (आधी ) चा (चाय) ला और दो तोस (टोस्ट) देना
यहाँ कोई टिप नहीं मिलता 
रात को कुछ औरतें बुर्क़ा ओढ़े
कुपोषित बच्चो को लिये आ जाती है
अल्लाह के नाम पर दे दो तुम्हारे बच्चों का सदक़ा
रात बढ़ती जाती है कुछ लोग इन औरतों को गाली देते है
कहते हैं इस तरह माँग कर मुसलमानों
का नाम ख़राब कर रही है
बाहर कुत्ते सूंघ-सूंघ कर खा रहे हैं
कुछ गुर्रा रहे हैं
रात और गहराने लगी है।
_________________

हम भी भारत वासी है

हम भी जीना चाहते है
हमें भी चाहिये
हमारे हिस्से की हवा
हमारे हिस्से की ज़मीन
हमारे हिस्से का आसमान
हमारे हिस्से का सब कुछ
ओ मेंरे वक़्त तुम सुनों
की ज़िन्दगी में
इन्सान मोहब्ब्तों के लिये
और चीज़ें इस्तमाल के लिये थीं
लेकिन हवस ने हमारी आत्मा
कि गठरी बना कर
एक गहरे काले समन्दर में
पत्थरों से बाँध कर फ़ेंक दिया
अब हम चीज़ों से मोहबब्त करते हैं
और इन्सानो का इस्तमाल करते हैं
अपनी तमाम अमानवीय क्रूरताओं के साथ
हर जगह क़ब्ज़ा करती जा रही है
बढ़ती ज़रूरतें और लालसायें।

 लकड़ी को जलने और जलाने में
मासूम चेहरा धुला-धुला सा तन-मन
आज दुनियाँ में जब चाँद पर घर और
अंतरिक्ष में फसल उगा रहे है
सब कुछ बदल रहा है
पर गाँव अब भी वैसा ही है
सुबह से लट्टू की तरह घूमती है
मोमबत्ती सी गलती लड़की
आँखों को जिंदगी दिखेगी कैसे
अगर आँखों में खारा पानी हो
भीगा चूल्हा गीली लकड़ी
कितनी तकलीफ है
लकड़ी को जलने और जलाने में
जैसे बुखार से भरी हुई नसें
आदिवासी स्त्रियों का शोक गीत
भूख की चमक का चढ़ता पारा
वो बतिया रही थी आग से
जल जा न कहे परेसान करती है।

औरत भी शामिल है इंसानो में

आज लोग ज़िन्दगी के बड़े से बड़े हादसे को
सोशल साइट के स्टेटस की तरह देखते हैं
हमारी बिगड़ती जा रही मानसिकता
या ख़त्म होती जा रही इन्सानियत
सतीत्व, शिष्टता, सौन्दर्य
इन शब्दों से नारी का चेहरा उभरता है
पुरुष का नहीं, और पुरुष शिष्ट नहीं हुआ तो क्या
हमारा समाज भी तो पुरूष प्रधान है
नारी को सम्पति मानने वाला पुरुष
नारी जब पूरे कपड़ों में ढँकी रहती हैं
फिर भी कई पुरूषों को नग्न नज़र आती हैं
नारी को उसके अंगों से हटकर सोचने की आदत
बहुत कम पुरूषों में होती है
बहुत छोटी उम्र में 
जब बीमार मानसिकता का पुरूष छूता है
स्कूल में जब शिक्षक महोदय
पीठ पर अजीब तरह से हाथ फेरते हैं
भीड़ भरे रास्ते, बस, ट्रेन
पड़ोस,  मुहल्‍ले, परिवार, रिश्तेदार
हर कहीं कुछ घटता है
और डरी हुई नारी जो
सामना, करना, लड़ना नहीं सीखती
इस भेद-भाव की क्रूरता और
समाज का असली चेहरा नहीं दिखाती
डरती हैं, पति से परिवार से समाज से
लड़की को डरा कर उसे दोषी ठहरती है
तुम्हारे कपड़े, तुम्हारा मेकअप
तुम्हारा हँसना, तुम्हारी दोस्त  
तुम कितनी देर तक बाहर रहती हो
उसके मन में अँधेरा भर देती है
उसे अपने ही जिस्म से डर लगने लगता है
और फिर सीख जाती है बलात्कृत होने के बाद
मुंह बंद रखने का सबक़
माँ ने लड़की को अपने जिस्म को पाकीज़ा
रखने और लड़की होने के कई सबक़ दिये
मगर लड़के को बलात्कार न करने का
और औरत को इंसान मानने का
कोई सबक़ नहीं दिया
संघर्ष से जूझती हुई हालात को टक्कर देती
खुद की तलाश गहरे अँधेरे में
बैचेनी छटपटाहट और कई
सवालिया निशान ?


वजहें बहुत सारी हैं

ख़याल बहुत खूबसूरत होते हैं
भूली नज़्म का न जाने कौन सा हिस्सा
इन ख्यालों की दुनिया भी अजीब होती है
कभी चाहकर भी कुछ नहीं
और कभी न चाहते हुए भी दिल के दरवाज़े पर
एक भीड़ सी लग जाती है
ख्यालों की दुनिया में दिमाग का कोई काम नहीं है
खयालो की एक तवील महक है
रोज सुबह कई मुखोटे डाल कर सब निकलते है
ओर दिन पर सच का मुलम्मा चढ़ाकर
रात की ओर धकेल देते है
और फिर खुद से नज़रे बचा कर उस पर
"दुनियादारी ' का बोर्ड लगा देते है
ख़यालों में जीना ऐसा ही है शायद
जैसे हादसों से भरे वक्त की चादर ओढ़े
आगे बढ़ते जाना
जो बिछड़ गए उनका इंतज़ार और जो साथ हैं
उनकी चहरे की चमक से आँखों की नमी तक  
एक उम्मीद सबसे खूबसुरत है
दुखों के गहरे कुंए में या रास्तों के जंगल में
खो गए लम्हों की यादें
एक दिन जिस्म के साथ ही बुझ जायेंगी
और इन सब के बीच ज़िन्दगी का
शुक्रिया अदा करने की वजहें बहुत सारी हैं।



( रचनाकार-परिचय :

जन्म: भोपाल में
शिक्षा:  पुरातत्व विज्ञान (अर्कोलॉजी ) में स्नातकोत्तर
सृजन: पहली बार कवितायेँ  "कृति ओर " के जनवरी अंक में छपी है।
संप्रति: भोपाल में  अध्यापिका
संपर्क: shahnaz.imrani@gmail.com )
साहित्यकार पिता मक़सूद इमरानी  स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे। )

हमज़बान में उनकी कुछ और कविताएं
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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

अदीब पिता की कवयित्री बिटिया

 
      
















शहनाज़ इमरानी की कविताएं
 
बूँद भर एक ख़्वाब

        बूँद भर एक ख़्वाब
        पलकों की रिहाइश छोड़ कर
        दरिया नहीं, नहर नहीं
        और न बंधता है किनारों में
        झरना होना चाहता है
        चट्टानें तोड़ कर
        पत्थरों के बीच फूट कर
        बहना चाहता है वो
        दुनियाँ को समेट कर।


हाशिये के बाहर

        वो जाते है
        नाक पर रूमाल रखकर
        मुसल्मानों के मोहल्ले में
        जब वोट बटोरना होता है
        खुली बदबूदार नालियाँ गड्डों में सड़ता पानी
        कचरे और गन्दगी का ढ़ेर
        मटमैले अँधेरे घर बकरियाँ,मुर्गियाँ, कुत्ते, बिल्लीयें
        काटे हुए मवेशियों कि दुर्गन्ध
        मुरझाए चहरे पतवारविहीन साँसे
        पंखविहीन सपने
        पेट की आग कुरेदती है
        तो भूख चाहती है
        झपटना चील कि तरह
        और झपटने में जब गिर गए हों
        चारो खाने चित्त
        कितनी शर्म आयी होगी उन्हें
        अब तकलीफें झेलने कि ताब है
        आसना और मुश्किल दिन एकसे हैं
        अब वे एक दूसरी दुनियाँ में हैं
        खिंच गयी एक लकीर हाशिये की
        जिस तरह भूल जाते हैं हम अमूमन
        कुछ-न-कुछ किसी बहाने
        भूलती गयीं सरकारें भी
        बेशक सरकार बनाने में
        यह अहम भूमिका निभाते आये है
        आज भी याद आ जाते है चुनाव के समय
        हाशिए से बारह के लोग।

   मेंरा शहर
       

        शहर में बहुत भीड़ है
        शहर  में खौलता शोर है
        शहर को खूबसूरत बनाया जा रहा है
        वो बारिश में भीगते है
        सर्दी में ठिठुरते हैं
        उनके सरों पर धूप है
        खुरदरी, पथरीली,नुकीली
        भूख की चुभन है
        बदहवास, हताश, परछाइयाँ हैं
        शहर में ज़िन्दा हैं तमाम जुर्म
        क़त्ल, बेईमानी, वारदात, नाइंसाफ़ी, भ्रष्टचार बलात्कार, खुली लूट
        बढ़ती जाती है रोज़-बा रोज़
        महँगाई, गरीबी, बेरोज़गारी और भूख 
        क़ानून उड़ने लगा है वर्कों से
        घुल रही हैं कड़वाहट हवाओं में
        मन में गहरा विषाद
        भूखे  आदमीयों के
        सवाल लगा रहे हैं ठहाके
        अँधेरे के नाख़ून खुरचते है
        बदसूरत ज़ख्मों को
        मर चुकी संवेदनाओं के साथ जी रहा है शहर
        अब बहुत तैज़ दौड़ने लगा है शहर।

      
ट्रैफिक सिंगनल

        ट्रैफिक सिंगनल  पर जब रूकती है कार
        उग आते हैं अनगिनत
        नन्हे-नन्हे हाथ
        किसी हाथ में अख़बार
        किसी में मेंहकता गजरा
        किसी में खिलौने
        किसी में भगवान
        कुछ हाथ खाली हैं
        जिनमें झाँकते हैं
        अनुत्तरित सवाल
        एक बच्चा
        क़मीज़ की आस्तीन से
        जल्दी-जल्दी कार के शीशे साफ़ करता है
        और नाक पोंछ कर कहता है
        कुछ दे दो न साब
        और साब का बच्चा कहता है
        पीछे हट तूने कार के ग्लास गंदे कर दिये।

  
एक ऊब

        घर इत्मीनान नींद और ख़्वाब
        सबके हिस्से में नहीं आते
        जैसे खाने की अच्छी चीज़ें
        सब को नसीब नहीं होतीं
        जीवन के अर्थ खोलने के लिए
        खुद पर चढ़ाई पर्तों को
        उतारना होता है
        पैदा होते ही एक पर्त चढ़ाई गई थी
        जो आसानी से नहीं उतरती है
        पर्त-दर-पर्त पर्तों का यह खोल
        उतरने में बहुत वक़्त लगता है
        बहुत कड़वा और कसेला सा एक तजुर्बा
        यह ऊब बाहर से अंदर नहीं आती है
        बल्कि अंदर से बाहर की तरफ़ गयी है
        कुछ बचा जाने की ख्वाहिश के टुकड़े
        कुछ यूँ कि उसे ठीक करने की कोशिश भी
        बेमानी लगती है.
        इसी अफरातफरी में इतना हो जाता है
        तयशुदा रास्ते पर चलते रहना
        मोहज़ब बने रहना बहुत मुश्किल है
        उम्र के दूसरे सिरे पर भी बचपन हँसता है
        गहरे जमीन में जाती जड़ें
        पानी का कतरा खोज कर शाख़ पर पहुँचाती हैं 
        शाख़ें अपनी खुशियाँ फूलों को सौंपती हैं
        फल सब कुछ खो देने के लिए पकता है
        जैसे जैसे पेड़ की उम्र होती जाती है
        इंसानी झुर्रियों जैसी पर्त-दर-पर्त उसका बाहरी हिस्सा बनता जाता है
        और फिर नाखूनों की तरह बेजान हो जाता है।


 ज़िंदा रहना एक फ़न है

        
        ज़िन्दगी में फिर लौट कर आना
        घने कोहरे को दरख्तों के बीच छटते देखना 
        धड़कन की रफ़्तार थोड़ी धीमी सही
        बेचैनी भी है
        पर लगातार जीने का माद्दा तो है
        कमरे में सारी किताबें क़रीने से लगी हैं
        किताबों कि क़तार देख कर सुकून मिलता है
        कितनी ज़िंदगियों का सच छुपा है इनमें
        इंसानों कि बनायीं हुई दुनियाँ में
        बहुत कुछ अच्छा और खूबसूरत बचा तो है
        पढ़ने को इतना कुछ, समझने को इतना कुछ
        जीने को इतना कुछ की एक पूरी ज़िन्दगी कम पढ़ती है
        कितने फलसफे हैं दुनियाँ में उन्हें समझने को
        पत्थर भी घिसे दीखते हैं 
        यूँ तो ख्वाहिशों का कोई आकार नहीं होता
        न उनकी कि गिनती
        अक्सर धुंध में ही तलाशती हूँ
        आखिर मुझे चाहिए क्या
        जैसे आर्टिस्ट खींचता है कैनवास पर पहली लकीर
        बस एक लम्हा ही तो मिलेगा उसे
        जैसे रौशनी ने ज़मीन का सफ़र किया हो
        जैसे भी हो
        ज़िंदा रहना एक फ़न है !




( रचनाकार-परिचय :

जन्म: भोपाल में
शिक्षा:  पुरातत्व विज्ञान (अर्कोलॉजी ) में स्नातकोत्तर
सृजन: पहली बार कवितायेँ "कृति ओर " के जनवरी अंक में छपी है।
संप्रति: भोपाल में  अध्यापिका
संपर्क: shahnaz.imrani@gmail.com )
साहित्यकार पिता मक़सूद इमरानी  स्वतंत्रता सैनानी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे।

 
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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

ओ रंगरेज़िये ! मेरा रंग दे बासंती चोला..


रंगरेज़ा, रंग मेरा मन, मेरा तन



 
 










 ममता व्यास की कलम से 


कल बाजार से गुजरते समय इक़ रंगरेज की दुकान पे नजर पड़ी | वो बड़े जतन से , हर कपड़े को रंग रहा था | बड़ी ही तन्मयता के साथ | हर कपड़े को उठा -उठा कर रंग में भिगो देना | फिर उसे सुखाने के लिए इक़ रस्सी पर लटका देना | लाल, नीले, हरे पीले, गुलाबी और जामुनी भी तो | सभी रंग कितने अच्छे और कितने कच्चे ....| ज़रा लापरवाही हुई नहीं कि इक़ का रंग दूजे पर चढ़ जाए | वो रंगरेज , अपने काम से थक के ज़रा आराम करने की नियत से लेट गया | और मैं चल दी | लेकिन तभी मैंने उस दुकान में कुछ आवाज़े सुनी | सभी , साड़ियाँ, दुपट्टे , और बहुत से कपड़े इक़  जगह  आकर इकट्ठे होकर बतिया रहे थे | मैं ठहर गयी तो सुना -- ---इक़ गुलाबी दुपट्टे ने बात शुरू की | इस रंगरेज से मैं बहुत परेशान हूँ | ये अपनी मर्जी से हमें क्यों रंग देता है ? मुझे गुलाबी, नहीं लाल रंग पसंद है | फिर इसने मुझे ये फीका गुलाबी रंग क्यों दिया ? जबकी मैं चटक लाल  हो जाना चाहता हूँ |  और वो देखो, देखो काली  साड़ी कितनी उदास है.  उसे हरा पसंद था | मेरा बस चले तो इक़ दिन इस रंगरेज की दुकान ही बंद करवा दूँ | 
अब तुम चुप हो जाओ | इक़ सफ़ेद कपड़ों की गठरी बोली | ये रंगरेज , इतना बुरा भी नहीं | अब मुझे देखो मैं कितनी बुरी लगती हूँ | रंगहीन | कल ये मुझे इक़ नए रंग में रंग देगा | फिर मैं बाजार में चली जाउगी | वहां मुझे खरीद के लोग अपनी मनपसंद ड्रेस बनवायेंगे | मेरा उपयोग होगा | दुनिया देखूंगी मैं | यहाँ घुट के मरने से बेहतर है, दुकान से बाहर चले जाना | ये रंगरेज ना हो तो क्या मोल है हमारा ? बोलो ? 
तभी, खूंटी पर सुखाने के लिए लटकाई गयी इक़ साड़ी बोली: इस रंगरेज को इतनी भी खबर नहीं कि  मैं कबसे इस खूंटी पर टंगी हुई हूँ | मेरी बारी कब आएगी कि  मैं हवा में खुल कर बिखर जाऊं ? उड़ जाऊं | तभी इक़ दर्द भरी आह निकली --और मुझे देखो मैं कबसे इस रंग के बर्तन में भीग रहा हूँ | मुझे बाहर नहीं निकालता वो रंगरेज | मैं दर्द से मर गया हूँ |  ये कितना निष्ठुर रंगरेज है | इसे किसी की कोई परवाह नहीं | ये बहरा है | जरुर ये कोई नशा करके सो जाता है रोज |और हमारी बात , जो हम कह नहीं सकते इससे | क्या , ये कभी समझ पायेगा ? 
मैं सोचने लगी | हम सब भी तो मात्र इक़  कोरे कपड़े ही हैं | ऊपर बैठा वो रंगरेज हमें जैसे चाहे रंग दे | उसके रंग कितने अच्छे कितने सच्चे | वो हम सभी को अलग -अलग रंगों में रंगता है | हम सभी , इक़ दूजे से कितने अलग | कोई किसी से मेल नहीं खाता | चेहरे अलग | फ़ितरत अलग | आवाज अलग | अंदाज अलग | किसी का रंग किसी से नहीं मिलता | किसी का ढंग किसी से नहीं मिलता | सभी विशेष | सभी अनोखे | क्या खूब बनाया | 
किसी के भीतर लोहा भर दिया | किसी के अन्दर मोम भर दिया | जो लोहा भर दिया तो वो मशीनी आदमी हो गया | अब वो मशीन की तरह काम करता है | मशीन की तरह प्रेम करता है | उसका दिल लोहे का जो टूटता नहीं | दर्द उसको होता नहीं | वो सिर्फ मशीनी है | उसकी देह भी इक़ मशीन हो गयी | वो कभी मोम नहीं हो सकता | और जो किसी में मोम भर दिया तो वो पल पल पिघलता ही रहता है | जहाँ ज़रा सी प्रेम की उष्मा मिली | पिघल गए | गर्मी ज्यादा मिली तो पिघल के शक्ल ही बदल बैठे | मोम  को शिकायत की ये लोहा उसकी कोमलता को नहीं समझता | इक़ झटके में उसे चूर -चूर कर देता है | लोहा , कहता है मोम का कोई केरेक्टर ही नहीं जब देखो पिघल गए | 
उस रंगरेज , ने किसी में खुश्बू भर दी तो वो जहाँ होता है अपनी महक भर देता है | तो किसी में बंजर कर देने के रसायन भर दिए | ऐसे जहर भर दिए की वो मनुष्य अपने जहरीले रसायनों से ना जाने कितने दिलो की धरती को हिरोशिमा नागासाकी बना बैठे | किसी में इतनी  उर्वरा शक्ति भर दी की उसने रेगिस्तानो में झरने बहा दिए | फूल खिला दिए | किसी में इतने शब्द भर दिए की शब्दों की क्यारियाँ बाना दी | | तो किसी के पास इक़ शब्द भी नहीं कहने के लिए | किसी में हरापन भर दिया तो किसी में वीराना | कोई अपने शब्दों से किसी के भीतर सृजन कर दे | कोई अपने शब्दों के तीर से किसी को बाँझ कर दे | कोई गौतम ऋषि अपने शब्दों से स्त्री को पत्थर बना दे | तो कोई राम उसे अपने स्पर्श से फिर स्त्री बना दे | 
कमाल का है वो रंगरेजा | उसे सब खबर है | किस को कहाँ जाना है | किसकी कहाँ मंजिल है | किसके भाग्य में कितने कांटे है | कितना हिस्सा ? कितना किस्सा ? कितनाकौन झूठा | कौन  कितना सच्चा | किसकी रेट कितनी बंजर होगीं | किसकी आखों में कितने रतजगे उसने लिखे वो ही जानता है | 
दर्द के समन्दरो में किसको कितना डुबाना है | किसको सावन में कितना जलाना है | किस को किस खूंटी पर उमर पर बांध के लटकाना है | किस को बाँध कर मोड़ कर कोने में रख देना है | कितने , रंग उसके पास | कितने ढंग उसके पास | कैसा संग उसका ? कैसा चलन उसका ? कौन जाने ? कितना जाने ? हाँ सभी कोरे कपड़े की गठरियाँ है | कब किसकी बारी आये वही जाने | हम जिस रंग के है उस रंग का कोई दूजा क्यों नहीं मिलता ? हम जिस ढंग के हैं वैसा कोई और क्यों नहीं दिखता ?  इस ऊपर बैठे रंगरेज से हम सभी इतने नाराज क्यों ? फिर भी उससे मिलने की आस क्यों ? वो दिखता नहीं फिर भी आसपास क्यों ? 
ओ , रंगरेज ..सुनो ना ...तुम खूब हो | तुम्हारे रंग भी बड़े खूब हैं | लेकिन ये बताओ क्या कभी कोई रंग तुम पर भी किसी का कोई रंग चढ़ा है ? तुम कभी किसी के रंग में रंगे हो ? क्या कभी तुम्हारे भीतर किसी का कोई रंग बहता है ? चलो मत बताओ ये तो बताओ की हम तुम्हे तुम्हारे इस मेहनताने की क्या कीमत दे ? क्या रंगाई है तुम्हारी ? 
जो , हम पर अपना रंग चढ़ा दे | जो हमें इक़ नए रूप में बदल दे | उस रंगरेज को कोई क्या दे भला ? देह हो या मन | दोनों तुम्हारी रचना | | इनमे से तुम जो चाहे वो ले सकते हो | या तो मन ? या देह ? या दोनों ? ये फैसला रंगरेज खुद करे | इक़ गीत की पंक्तियाँ हैं : रंगरेजा, रंग मेरा मन, मेरा तन | ये ले रंगाई चाहे मन ? चाहे तन.
 
समीक्षक की राय:शहबाज़ अली खान
रंगों के माध्यम से ममता जी ने आदमी के मुक़द्दर को जिस तरह से परिभाषित किया है वह बहुत ही खुबसूरत है, और मार्मिक भी .. हर रंग का अपना मुक़द्दर है. बल्कि हर चीज़ की अपनी नियति है.. बर्फ की नियति है पानी में जाकर मिल जाना.. आदमी की नियति है कि वो आज़ाद नहीं है... उसके पैरों में एक बेडी है जो अदृश्य है..लेकिन बेहद शक्तिशाली है....ग़ालिब कहते है : "नक्शे फरयादी है किस की शोखिये तहरीर का/ कागज़ी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का" तो इक़बाल कहते है कि "तेरे आज़ाद बन्दों की, न ये दुनिया न वो दुनिया/ यहाँ मरने की पाबन्दी, वहां जीने की पाबन्दी".... इस रंगरेज़ से लोग इसी चीज़ की शिकायत करते है कि  किसी को मोम बनाया, तो किसी को लोहा बना दिया.. मोम तुरंत बहने लगता है.. लोहा पिघलना तो दूर झुकता भी नहीं है.. इस रंगरेज ने किसी को बहार बख्शी तो किसी को बंजर ज़मीन दी.. किसी को दरया दिया  तो किसी को ओस की दो बूंद.... जो मिला उसको सहर्ष स्वीकार कर लेना.. और जीवन पूरी उत्फुल्लता से जीना.यही रंगरेज़ की खुश रंगत है.



(लेखक-परिचय:

जन्म: 31 जनवरी
शिक्षा:मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म , ऍम ए-क्लिनिकल साइकोलोजी |
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में छिटपुट लेखन-प्रकाशन
सम्प्रति: कुछ अखबारों में सम्बद्ध रहने के बाद स्वतंत्र लेखन
आत्म-कथ्य: मैं बहुत ही साधारण और  सामान्य हूँ | दिखावे से दूर | लिखने के कोई नियम और कानून नहीं मेरे पास | ना भारीभरकम शब्द और ना बात | ना कोई सामाजिक संदेश ना राजनीति | जो महसूस करता है मन | वही लिख देती हूँ |
सम्पर्क : कोटरा सुल्तानाबाद, भोपाल

 ब्लॉग : मनवा   )

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बुधवार, 23 जून 2010

अभिशप्त एक और भोपाल! एंडरसन भागा नहीं है !!!!

 










आवेश की  क़लम से

 बाँध में महल के साथ डूब गयी रानी रूपमती का क़िस्सा 













वारेन एंडरसन के भागे जाने पर हो हल्ला मचाने वाला मिडिया कैसे नए नए भोपाल पैदा कर रहा है. आइये हम आपको इसकी एक बानगी दिखाते हैं | हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की ! यह देश में हर जगह पैदा हो रहे भोपाल का क़िस्सा है . दरअसल यह हिंदुस्तान के स्विट्जरलेंड  की तबाही का क़िस्सा है . रिहंद बाँध में अपने महल के साथ डूब गयी रानी रूपमती का क़िस्सा है . यह मंजरी के डोले का क़िस्सा है और लोरिक की बलशाली भुजाओं को आज तक महसूस कर रहे चट्टानों का भी क़िस्सा है .
सोनभद्र हम इसे देश की उर्जा राजधानी भी कहते हैं ये क्षेत्र देश का सबसे बड़ा एनर्जी पार्क है सोनभद्र सिंगरौली पट्टी के लगभग ४० वर्ग किमी क्षेत्र में लगभग १८००० मेगावाट क्षमता के आधा दर्जन बिजलीघर मौजूद हैं जो देश के एक बड़े हिस्से को बिजली मुहैया करते हैं . अगले पांच वर्षों में यहाँ रिलायंस और एस्सार समेत निजी व् सार्वजानिक कंपनियों के लगभग २० हजार मेगावाट के अतिरिक्त बिजलीघर लगाये जायेंगे . बिरला जी का अल्युमिनियम और कार्बन , जेपी का सीमेंट और कनोडिया का रसायन कारखाना यहाँ पहले से मौजूद है .यह इलाका स्टोन माइनिंग के लिए भी पूरे देश में मशहूर है .

और हाँ ! यहाँ पांच लाख आदिवासी भी मौजूद हैं जिन्हें दो जून की रोटी भी आसानी से मयस्सर नहीं होती | सोनभद्र की एक और पहचान है यहाँ आठ नदियाँ भी हैं जिनका पानी पूरी तरह से जहरीला हो चुका है . यह इलाका देश में कुल कार्बन डाई ओक्साइड का १६ फीसदी अकेले उत्सर्जित करता है | सीधे सीधे कहें तो यहाँ चप्पे चप्पे पर यूनियन कार्बाइड जैसे दानव मौजूद हैं. इसके लिए सिर्फ सरकार और नौकरशाही तथा देश के उद्योगपतियों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए मची होड़ ही जिम्मेदार नहीं है ,सोनभद्र को जनपदोध्वंश के कगार पर पहुँचाने के लिए बड़े अखबारी घरानों और अखबारनवीसों का एक पूरा कुनबा भी जिम्मेदार है.


कनोडिया केमिकल देश में खतरनाक रसायनों का सबसे बड़ा उत्पादक है . कनोडिया के जहरीले कचड़े से प्रतिवर्ष औसतन ४० से ५० मौतें होती हैं . वहीँ हजारों की संख्या में लोग आंशिक या पूर्णकालिक विकलांगता के शिकार होते हैं मगर खबर नहीं बनाती क्यूंकि कनोडिया अख़बारों की जुबान बंद करने का तरीका जनता है ,पिछले वर्ष दिसंबर माह में उत्तर प्रदेश -बिहार सीमा पर अवस्थित सोनभद्र के कमारी डांड गाँव में कनोडिया द्वारा रिहंद बाँध में छोड़ा गया जहरीला पानी पीकर २० जाने चली गयी उसके पहले विषैले पानी की वजह से हजारों पशुओं की मौत भी हुई थी ,मगर अफ़सोस जनसत्ता को छोड़कर किसी भी अखबार ने खबर प्रकाशित नहीं कि जबकि जांच में ये साबित हो चुका था मौतें प्रदूषित जल से हुई है ,हाँ ये जरुर हुआ कि इन मौतों के बाद सभी अख़बारों ने कनोडिया के बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित किये थे ,ऐसा पहली बार नहीं हुआ था इसके पहले २००५ जनवरी में भी कनोडिया के अधिकारियों की लापरवाही से हुए जहरीली गैस के रिसाव से पांच मौतें हुई ,लेकिन मीडिया खामोश रहा |

मीडिया अब भी ख़ामोश है जब सोनभद्र के गाँव गाँव फ्लोरोसिस की चपेट में आकर विकलांग हो रहे हैं यहाँ के पडवा कोद्वारी ,कुसुम्हा इत्यादि गाँवों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो फ्लोरोसिस का शिकार न हो ,जांच से ये बात साबित हो चुकी है कि फ्लोराइड का ये प्रदूषण कनोडिया और आदित्य बिरला की हिंडाल्को द्वारा गैरजिम्मेदाराना तरीके से बहाए जा रहे अपशिष्टों की वजह से है |बिरला जी के इस बरजोरी के खिलाफ लिखने का साहस शायद किसी भी अखबार ने कभी नहीं किया ,हाँ वाराणसी से प्रकाशित गांडीव  ने एक बार हिंडाल्को द्वारा रिहंद बाँध में बहाए जा रहे कचड़े पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी | आखिर करता भी कैसे? जब दैनिक जागरण समेत अन्य अख़बारों में नौकरी भी हिंडाल्को के अधिकारियों के रहमोकरम पर टिकी होती है |
शायद और हाँ ! विश्वास करना कठिन हो मगर यह  सच है कि यहाँ के हिंदी दैनिकों ने अपने सोनभद्र के कार्यालयों पर सालाना विज्ञापन का लक्ष्य एक से डेढ़ करोड़ निर्धारित कर रखा है ,इनमे वो विज्ञापन शामिल नहीं हैं जो जेपी और हिंडाल्को समेत राज्य या केंद्र सरकार की कमानियां सीधे या एजेंसियों के माध्यम से देती हैं ,अगर इन सबको शामिल कर लिया जाए तो सोनभद्र से प्रत्येक अखबार को सालाना ८ से १० करोड़ रूपए का विज्ञापन मिलता है. इन अतिरिक्त विज्ञापनों का लक्ष्य यहाँ के गिट्टी बालू के खनन क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है .  खनन क्षेत्र जिन्हें “डेथ वेळी “कहते हैं और जो सरकार प्रायोजित भ्रष्टाचार और वायु एवं मृदा प्रदुषण का पूरे देश में सबसे बड़ा उदाहरण बने हुए हैं पर कोई भी अखबार कलम चलने का साहस नहीं करता जबकि यह अकाल मौतों की सबसे बड़ी वजह है . और तो और यहाँ की खदानों से निकलने वाली भस्सी ने हजारों एकड़ जमीन को बंजर बना डाला .
ख़बरें न छापने की वजह भी कम खौफनाक नहीं है . यह आश्चर्यजनक लेकिन सच है कि सोनभद्र में ज्यादातर पत्रकारों की अपनी खदाने और क्रशर्स हैं जिनकी नहीं हैं उनकी भी रोजी रोटी इन्ही की वजह से चल रही हैं . ख़बरें ना छापने की कीमत वसूलना अखबार भी जानते हैं ,पत्रकार भी |
सोनभद्र के बिजलीघरों से प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ टन पारा निकलता है . हालत यह हैं कि यहाँ के लोगों के बालों ,रक्त और यहाँ की फसलों तक में पारे के अंश पाए गए हैं ,इसका असर भी आम जन मानस पर साफ़ दीखता हैं . उड़न चिमनियों की धूल से सूरज की रोशनी छुप जाती है और शाम होते ही चारों और कोहरा छा जाता है . भारी प्रदुषण से न सिर्फ आम इंसान मर रहे हैं बल्कि गर्भस्थ शिशु भी  | मगर ख़बरें नदारद हैं .वजह साफ़ है, सभी अखबारों के पन्ने दर पन्ने प्रदेश के उर्जा विभाग के विज्ञापनों से पटें रहते है . सैकड़ों की संख्या में मझोले अखबार तो ऐसे हैं जो बिजली विभाग के विज्ञापनों की बदौलत चल रहे हैं . ये एक कड़वा सच है कि उत्तर प्रदेश सरकार के ओबरा और अनपरा बिजलीघरों को पिछले एक दशक से केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के अन्नापत्ति प्रमाणपत्र के बिना चलाया जा रहा है जबकि बोर्ड ने इन्हें बेहद खतरनाक बताते हुए बांड करने के आदेश दिए हैं.

क़िस्सा  इसलिए क्यूंकि हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं जहाँ मौजूद मीडिया को मुगालता है कि वो देश,समय,काल को बदलने का दमखम रखता है | मगर खबर नदारद है क्यूँकि वारेन एंडरसन हिंदुस्तान से भाग चुका है |
लेकिन क्या कर लेंगे आप
सोनभद्र का एंडरसन भागा नहीं है !!





[लेखक-परिचय : बहुत ही आक्रामक-तीखे तेवर वाले इस युवा पत्रकार से आप इनदिनों हर कहीं मिलते होंगे, ज़रूर.! .आपका का ब्लॉग है कतरने. लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। ]
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