बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 26 मार्च 2014

गूंजती है हथोड़े सी आवाज़, औरत भी शामिल है इंसानो में




 






शहनाज़ इमरानी की कविताएं
 

हथोड़े की आवाज़ गूंजती है

एक वक़्त ऐसा भी था
जब दरख्त लोगों का
सारा सच सुनते थे
दरख्तों के तनों में बने
लकड़ी के कानों में
सब कहा करते थे
दरख्तों के पास अनगिनत
राज़ जमा हो गए थे
और वो कुल्हाड़ियों से नहीं डरते थे
उनकी जड़ें लोगों के ख़्वाबों में
हुआ करती थीं
और ख़्वाबों की चाबी
किसी ख़ुदा या भगवान के
हाथ में नहीं थी.

फिर समय ने कुछ रंग दिये 
दबे पाँव लोग मिट्टी से
बाहर निकल कर
अपनी पहचान में रंग भरने लगे
गाँव आदमी के तजुर्बों का
सबसे मुश्किल हिस्सा हो गया
लालसाओं के छुपे नाख़ून पंजों से बाहर निकले
सड़ते ज़हनों की बदबू फैलने लगी
चौराहों पर भ्रामक इश्तहारों की तरह
आश्वासनों से भरी
पीढ़ी गुज़रती गयी क़तार से
विकल्प की संभावना के हाथ कट गए
हर तरफ चेहरे ही चेहरे
दुखी, फ़ीके, उदास
भूखे, धूल खाये, बदहवास
ज़ख़्मी, गुस्साये, बौखलाए
बढ़ता गया अँधेरा और
परावर्तन के डर ने किरणों का प्रवेश बंद कर दिया
फासिस्टी कचरे और उन्माद की गंध से 
पूँजीवादी बिलों से निकले बेशुमार कीड़े
और दरख्तों के कानों में घुस कर
उनको बहरा कर दिया
कुछ दिन बाद दरख्तों ने
बिना मिलावट के सच उगल दिये
और एक-एक करके सारे दरख्त मरने लगे
कई ख्वाब टूटे कुछ पर लगा कर उड़ गये
कई हिस्सों में बंटा विरोध।

अब जुर्म कैसे साबित हो
लोग कीड़ों के साम्राज्य से डरते है
मिट्टी में रेडियोएक्टिव किटाणु अब भी
दरख्तों का बदन कुतरते रहते है
सन्नाटे में हथोड़े की आवाज़ें गूंजती है
लोग अभी भी कीड़ों को मार रहे हैं।

मोहबब्त फेयरीटेल्स नहीं है

पार्क  तो वही है
गहरी शाम ओढ़े हुये
कई लोग हैं सभी की आँखों की
इबारत अलग है
बेंच पर बूढा आदमी चेहरे पर
आखरी इंतज़ार लिए सो रहा है
एक बच्चा बॉल से खेल रहा है
सब कुछ भूल कर एक कोने में
एक लड़का और एक लड़की हाथ पकड़े बैठे हैं
पार्क में सब कुछ कल जैसा ही है
बदलाव भी अजीब होता है
शायद चीज़ें नहीं बदलतीं हैं
देखने का नज़रिया बदलता जाता है
मोहबब्त फेयरीटेल्स नहीं होती है
रिश्तों को एक ही पैटर्न पर चलते हुए पाते हैं
शुरुआती थ्रिल, ऊब, उपेक्षा और
तनाव फिर सब ख़त्म
मोहबब्त अनकंडीशनल क्यों नहीं होती !

चुनाव का माहोल

बदल जाता है सच
परिस्थतियों के साथ 
किस लफ्ज़ ने किस लफ्ज़ से
क्या कहा
सब अनसुना सा हो जाता है
फुल स्टाप के बाद
दिन मांगते हैं न्याय
अटकलों, संदेहों, और अंदेशों पर
लटका समय गुजरने के बाद
शुरू हो गई है खोखली बहस
जिसकी धार मर गयी है
देखने का नज़रिया कैसे बदले
नेता माँ बाप नहीं
जनता के नौकर हैं
जनता हाथ जोड़े खड़ी रहती है
लाठी किसी के भी हुक्म से चले
सहना जनता को पड़ता है
योजनाये बहुत हैं, करोड़ों का बजट है
पर सरकार खुशहाली का निवाला
कुबेरों को खिलाती है
बेशर्मी की चर्बी बढ़ती जाती है
बढ़ती जाती स्लम बस्तियाँ
खत्म हो रहा मध्यवर्ग
धर्म एक हथियार बना है
उन्माद से भरे हैं लोग
पुलिस बनी शिकारी कुत्ता
और जनता को दौड़ाती है
हविस, हिंसा, होड़
सारे विकल्पों को खुला रख कर
चुनाव का माहोल बना है।


एक लड़की है शबाना

सड़क किनारे खड़ी  होती है
वो लड़की शबाना
कस्टमर के इंतज़ार में
सुना है अपना घर और ज़मीन गाँव में
गिरवी रख कर आई है.

तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए था
उसने मुझसे कहा
एक कमरा मटमैले अँधेरे से घिरा हुआ
जिसकी दीवारों का रंग उड़ा हुआ था
आख़री बार पता नहीं पुताई कब हुई थी
दीवार में एक छोटा सा रोशनदान
जिससे धुँधली फ़ीकी
धूप गिर रही थी
एक पलंग पर सिलवटों से भरी
चादर बिछी थी और दो तकिये रखे थे
शराब की खाली बोतल पड़ी थी पलंग के नीचे
कोने में जल रही अगर बत्तियों में से
कुछ राख में बदल चुकी थीं.

सुना था तुम नज़रों का जाल बुनकर
लोगों को फँसाती हो
जो कुछ सुना था
उसके विपरीत हो तुम
निचोड़े गये नीबू जैसा जिस्म
उम्र की सारी बरसातें
बर्फ़ में बदल गयी हो जैसे
एक बेरंग दुनियाँ
लोग भी तो काली रातों के होगें
जिनके चेरहे दिन में पहचानना
बहुत मुश्किल है
तुम्हारी आवाज़ से मैं
चौंक गई तुम कह रही थी
यहाँ से चली जाओ
तुम्हे मेरे बारे में जानने की
इत्ती क्या पड़ी है
एक फ़ायदा भी हुआ है तुम्हारे आने से
मोहल्ले के लोग कुछ दिन मुझे
शरीफ़ लोगों में शामिल कर लेंगे
और जब पता चलेगा तो 
हमेंशा की तरह फिर जगह बदलना पड़ेगा
तुम्हारी बैचेनी का गवाह तुम्हारा चेहरा
भूख, बेरोज़गारी, ग़रीबी का आत्मविलाप
सोच रही थी सरकार ने
कई योजनायें बनायीं हैं
और एन.जी.ओ.वाले
कंडोम बाँट कर
मदद करते हैं तुम्हारी
तुम्हे एक नाम भी मिला है
सेक्स वरकर्स
आख़िर समाज की
सभ्यता बनाए रखने के लिए
तुम्हारी ज़रूरत है
कब तक खड़ी रहोगी तुम
सड़क के मोड़ों पर
पुलिस खदेड़ देगी या
और लड़कियों के साथ
भेड़ों की तरह पुलिस वैगन में
भर कर ले जायेगी 
और फिर हवालात।
 
गरीब की झोपड़ी में
साँप, बिच्छू या कोई भी
जानवर के आने पर पाबंदी नहीं होती
यह सब में तुमसे कहना चाहती थी
मगर पीली थकी बीमार हाँपती हुई
तुम्हारी आँखों में देख कर
खुद से नफरत की
आज शुरूआत हुई।



अब डर लगता है

जायज़ या नाजायज़ हालात
समय की पैदाइश हैं
ग़ायब हो चुके पार्क में
वो झूले याद आते है
तेज़ झूले का डर
छिपकलियों और कॉकरोचों से डर
परीक्षा में फ़ेल होने का डर
भूत, चुड़ैलों का डर.

डर भी कितने छोटे होते थे
शरारत और डांटों के बीच
डर अँधेरे के साथ ही रोज़ रात आता
डराता और सुबह होते चला जाता
साल-दर साल मेरे साथ-साथ
डर भी बड़े हुए
में तो एक हूँ यह अनन्त हुए.

अब डर लगता है
लोगों की चालाक मुस्कानो से
दोस्ती में छुपी चालों से
शतरंज की बिसातों से
नफरतों से चाहतों से
आतंक, विस्फोट, और इंसानी जिस्मों के टुकड़ों से
दंगाइयों से, आग से, लाठीचार्ज से
पुलिस, नेताओं, चुनाव और फसाद से
मस्जिद में अल्लाहो अकबर और
मंदिर में हर हर महादेव के नारों से
भीड़ में और बस में पास बैठे अजनबी के स्पर्श से
रास्ता चलते हुए जिस्म का जायज़ा लेती नज़रों से !


कानों में तेल डालने से पहले

कितना आसान होता है आगे बढ़ना
अगर सामने रास्ते होते है
मगर रास्ते सब के लिये कहाँ होते हैं
कुछ लोग चुनौती को स्वीकारते है
कभी -कभी शुरुआत मंज़िल से
पहले ही हार जाती है
फिर भी लोग
रास्ता तलाशने में लगे हैं
खेतों, कारखानों में कई करोड़
किसान और मज़दूर
कई करोड़ बेरोज़गार युवा
जिनकी कोशिश जारी है
एक सम्पादक लिखता है
विद्रोह न्यायसंगत है
अन्याय के ख़िलाफ़
एक चित्रकार चित्रित करता है
किसान की खुदकशी
एक कवि लिखता है
धर्म के ठेकेदारों के षड्यंत्रों के विरुद्ध
कुछ लोग ढूँढ़ते हैं मसीहा
विचारहीन सम्मोहित भीड़ चल पड़ती है
उसके पीछे-पीछे
क्या तानशाह का ह्रदय परिवर्तन हुआ है.

तुम्हारे कानों में तेल डालने से
पहले की बात है यह
गोधरा के बाद सत्ता द्वारा आयोजित नरसंहार
विधर्मियों को आग में झोंक कर
गुजरात में नरमेंघ यज्ञ
धर्म के ठेकेदारों के पास तुम्हारी
तकलीफों से रिहाई की कोई राह नहीं
और तुम्हारे पास ज़ंजीरों के
सिवा खोने को कुछ नहीं*।

* कॉल मार्क्स

वो आदमी

जिसे सब पागल कहते हैं।
पत्थर तो पहले से थे
पत्थरों से आग पैदा हुई
और फिर आग को बेचने वाले
वक़्त जितना गुज़र गया है
उतना ही ठहरा हुआ है
लोग बना रहे है अपना
आज, कल और परसों
उनकी तकलीफें
दूसरों का मनोरंजन
बुझे अलाव की मद्धिम सी आँच में
बूढ़े बरगद के नीचे
सड़क के कुत्तों के साथ
वो आदमी फिर सो गया है
उसे सब पागल कहते हैं।

 चटोरी गली
शाम को सूरज डूबने के बाद
चटोरी गली की रौनक़ बढ़ जाती है
यह एक अलग दुनियाँ है
उन्हें पता नहीं फाइव स्टार होटल और हाइजीनिक फ़ूड
उधड़ी सड़क, काला धुआँ दीवारों और चेहरो पर
टूटी-फूटी टेबल कुर्सियां और उन पर रखे मटमैले गिलास
सूरज तो सही वक़्त पर निकला था
और अँधेरा जब हुआ भूख की आवाज़ ऊँची होने लगी
रात ने कहा अगर सन्नाटे न टूटे तो
जमाई आती है
67 साल लम्बी उम्र होती है
एक आदमी बनियान में कमज़ोर सा , काला रंग
पसीने से शराबोर भट्टी पर
बड़ी-बड़ी रोटियां पकाता है
पान चबाता हुआ पीले-पीले बल्ब की उदास रौशनी
बड़े-बड़े काले तवों पर सिकते परांठे, शामी कबाब, मछली
मसाला लगे मुर्गे लटके हुए
नानवेज में सब कुछ मिलता है चटोरी गली में
जो अंदर बैठे है और जो बाहर खड़े हैं उनमें
आधे लोगों से ज़यादा पढ़ना नहीं जानते होंगे
किसी के मुहँ में पान है किसी के हाथ में बीड़ी है
मटमैले कपड़ों में होटल का मालिक गल्ले पर बैठा
हिसाब किताब में उलझा है 
दो लड़के बातें कर रहे है
अरे खां वो अपने धोनी की तो फिलिम उलझ गयी
क्या केरिये हो मियाँ
सच केरिया हूँ फिक्सिंग में नाम आ गिया है
लम्बे बालों वाला लड़का दूसरे से
अबे भूरे फिर क्या हुआ
जब साले अरशद ने तेरी सब्ज़ परी (पतंग का नाम )
पर लंगर डाल दिया था
अबे मैंने कोई कच्ची गोलियाँ थोड़ी खेली है
मैने भी छत पर ग़टटे (पत्थर) जमा कर लिए हैं
मिला-मिला के दिये साला चप्प्लें (चप्पल) छोड़कर भाग गिया
कुछ उम्र दराज़ लोग जो इस दुनियां से बहुत परेशान लगते है
उन्हें क्या खाना है किसी की दाढ़ में दर्द है
किसी का पेट खराब किसी के मुँह में छाले हैं
अरे मियाँ पीर सलीम मियाँ क्या पोह्ची हुई हस्ती है
दर्द से तड़प रिया था मेरा पोता
मियाँ ने ऊँगली पकड़ली और जो पड़ना शुरू किया
तो पिशाब करा दिया हाथ जोड़ने लगा
इमली वाला था बच्चे पे आ गिया था
क्यों खां तुम्हारी औरत घर आ गई
उन्ही में से एक शातिर सा दिखने वाला आदमी
सर में तेल और आँखों में सुरमा
हाथों में मेहँदी थोड़े साफ़ कपडे पहने हुए
एक मरियल बूढ़े से आदमी ने पीले दाँत निकाल कर पूछा
आएगी नहीं तो जायेगी कहाँ तुक (सीधा) कर दिया है
जब से भूत उतारा है (मारना बेहरहमी से)
इस इस्तेमे (इज्तिमा) में लड़की का निकाह करवा रिया हूँ
वो भी अपनी माँ की तरह लल्लो (ज़ुबान) चलाती है.

एक और मेज़ पर बिरयानी खाते हुए कुछ लोग
कुछ गालियां बक रहे है एक दूसरे को
ज़ोर-ज़ोर से हँसते हैं गंदे लतीफों पर
एक आदमी कहता है
भाई मियाँ शहर क़ाज़ी ने अच्छा किया
औरतो के बज़ार (बाज़ार) जाने पर पाबंदी लगा दी
रमज़ान के महीने में क्या धक्का-मुक्की होती है
उनमें से एक बोला
हमारी बीवी हर साल पैसे जोड़ती
और सब लूटा देती थी कपड़ों पर
अब ले लो सब हँसते हैं

एक आदमी साईकिल घसीटता हुआ
टूटी चप्पल जगह-जगह से फटे कपड़े 
एक कट (आधी ) चा (चाय) ला और दो तोस (टोस्ट) देना
यहाँ कोई टिप नहीं मिलता 
रात को कुछ औरतें बुर्क़ा ओढ़े
कुपोषित बच्चो को लिये आ जाती है
अल्लाह के नाम पर दे दो तुम्हारे बच्चों का सदक़ा
रात बढ़ती जाती है कुछ लोग इन औरतों को गाली देते है
कहते हैं इस तरह माँग कर मुसलमानों
का नाम ख़राब कर रही है
बाहर कुत्ते सूंघ-सूंघ कर खा रहे हैं
कुछ गुर्रा रहे हैं
रात और गहराने लगी है।
_________________

हम भी भारत वासी है

हम भी जीना चाहते है
हमें भी चाहिये
हमारे हिस्से की हवा
हमारे हिस्से की ज़मीन
हमारे हिस्से का आसमान
हमारे हिस्से का सब कुछ
ओ मेंरे वक़्त तुम सुनों
की ज़िन्दगी में
इन्सान मोहब्ब्तों के लिये
और चीज़ें इस्तमाल के लिये थीं
लेकिन हवस ने हमारी आत्मा
कि गठरी बना कर
एक गहरे काले समन्दर में
पत्थरों से बाँध कर फ़ेंक दिया
अब हम चीज़ों से मोहबब्त करते हैं
और इन्सानो का इस्तमाल करते हैं
अपनी तमाम अमानवीय क्रूरताओं के साथ
हर जगह क़ब्ज़ा करती जा रही है
बढ़ती ज़रूरतें और लालसायें।

 लकड़ी को जलने और जलाने में
मासूम चेहरा धुला-धुला सा तन-मन
आज दुनियाँ में जब चाँद पर घर और
अंतरिक्ष में फसल उगा रहे है
सब कुछ बदल रहा है
पर गाँव अब भी वैसा ही है
सुबह से लट्टू की तरह घूमती है
मोमबत्ती सी गलती लड़की
आँखों को जिंदगी दिखेगी कैसे
अगर आँखों में खारा पानी हो
भीगा चूल्हा गीली लकड़ी
कितनी तकलीफ है
लकड़ी को जलने और जलाने में
जैसे बुखार से भरी हुई नसें
आदिवासी स्त्रियों का शोक गीत
भूख की चमक का चढ़ता पारा
वो बतिया रही थी आग से
जल जा न कहे परेसान करती है।

औरत भी शामिल है इंसानो में

आज लोग ज़िन्दगी के बड़े से बड़े हादसे को
सोशल साइट के स्टेटस की तरह देखते हैं
हमारी बिगड़ती जा रही मानसिकता
या ख़त्म होती जा रही इन्सानियत
सतीत्व, शिष्टता, सौन्दर्य
इन शब्दों से नारी का चेहरा उभरता है
पुरुष का नहीं, और पुरुष शिष्ट नहीं हुआ तो क्या
हमारा समाज भी तो पुरूष प्रधान है
नारी को सम्पति मानने वाला पुरुष
नारी जब पूरे कपड़ों में ढँकी रहती हैं
फिर भी कई पुरूषों को नग्न नज़र आती हैं
नारी को उसके अंगों से हटकर सोचने की आदत
बहुत कम पुरूषों में होती है
बहुत छोटी उम्र में 
जब बीमार मानसिकता का पुरूष छूता है
स्कूल में जब शिक्षक महोदय
पीठ पर अजीब तरह से हाथ फेरते हैं
भीड़ भरे रास्ते, बस, ट्रेन
पड़ोस,  मुहल्‍ले, परिवार, रिश्तेदार
हर कहीं कुछ घटता है
और डरी हुई नारी जो
सामना, करना, लड़ना नहीं सीखती
इस भेद-भाव की क्रूरता और
समाज का असली चेहरा नहीं दिखाती
डरती हैं, पति से परिवार से समाज से
लड़की को डरा कर उसे दोषी ठहरती है
तुम्हारे कपड़े, तुम्हारा मेकअप
तुम्हारा हँसना, तुम्हारी दोस्त  
तुम कितनी देर तक बाहर रहती हो
उसके मन में अँधेरा भर देती है
उसे अपने ही जिस्म से डर लगने लगता है
और फिर सीख जाती है बलात्कृत होने के बाद
मुंह बंद रखने का सबक़
माँ ने लड़की को अपने जिस्म को पाकीज़ा
रखने और लड़की होने के कई सबक़ दिये
मगर लड़के को बलात्कार न करने का
और औरत को इंसान मानने का
कोई सबक़ नहीं दिया
संघर्ष से जूझती हुई हालात को टक्कर देती
खुद की तलाश गहरे अँधेरे में
बैचेनी छटपटाहट और कई
सवालिया निशान ?


वजहें बहुत सारी हैं

ख़याल बहुत खूबसूरत होते हैं
भूली नज़्म का न जाने कौन सा हिस्सा
इन ख्यालों की दुनिया भी अजीब होती है
कभी चाहकर भी कुछ नहीं
और कभी न चाहते हुए भी दिल के दरवाज़े पर
एक भीड़ सी लग जाती है
ख्यालों की दुनिया में दिमाग का कोई काम नहीं है
खयालो की एक तवील महक है
रोज सुबह कई मुखोटे डाल कर सब निकलते है
ओर दिन पर सच का मुलम्मा चढ़ाकर
रात की ओर धकेल देते है
और फिर खुद से नज़रे बचा कर उस पर
"दुनियादारी ' का बोर्ड लगा देते है
ख़यालों में जीना ऐसा ही है शायद
जैसे हादसों से भरे वक्त की चादर ओढ़े
आगे बढ़ते जाना
जो बिछड़ गए उनका इंतज़ार और जो साथ हैं
उनकी चहरे की चमक से आँखों की नमी तक  
एक उम्मीद सबसे खूबसुरत है
दुखों के गहरे कुंए में या रास्तों के जंगल में
खो गए लम्हों की यादें
एक दिन जिस्म के साथ ही बुझ जायेंगी
और इन सब के बीच ज़िन्दगी का
शुक्रिया अदा करने की वजहें बहुत सारी हैं।



( रचनाकार-परिचय :

जन्म: भोपाल में
शिक्षा:  पुरातत्व विज्ञान (अर्कोलॉजी ) में स्नातकोत्तर
सृजन: पहली बार कवितायेँ  "कृति ओर " के जनवरी अंक में छपी है।
संप्रति: भोपाल में  अध्यापिका
संपर्क: shahnaz.imrani@gmail.com )
साहित्यकार पिता मक़सूद इमरानी  स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे। )

हमज़बान में उनकी कुछ और कविताएं
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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

अदीब पिता की कवयित्री बिटिया

 
      
















शहनाज़ इमरानी की कविताएं
 
बूँद भर एक ख़्वाब

        बूँद भर एक ख़्वाब
        पलकों की रिहाइश छोड़ कर
        दरिया नहीं, नहर नहीं
        और न बंधता है किनारों में
        झरना होना चाहता है
        चट्टानें तोड़ कर
        पत्थरों के बीच फूट कर
        बहना चाहता है वो
        दुनियाँ को समेट कर।


हाशिये के बाहर

        वो जाते है
        नाक पर रूमाल रखकर
        मुसल्मानों के मोहल्ले में
        जब वोट बटोरना होता है
        खुली बदबूदार नालियाँ गड्डों में सड़ता पानी
        कचरे और गन्दगी का ढ़ेर
        मटमैले अँधेरे घर बकरियाँ,मुर्गियाँ, कुत्ते, बिल्लीयें
        काटे हुए मवेशियों कि दुर्गन्ध
        मुरझाए चहरे पतवारविहीन साँसे
        पंखविहीन सपने
        पेट की आग कुरेदती है
        तो भूख चाहती है
        झपटना चील कि तरह
        और झपटने में जब गिर गए हों
        चारो खाने चित्त
        कितनी शर्म आयी होगी उन्हें
        अब तकलीफें झेलने कि ताब है
        आसना और मुश्किल दिन एकसे हैं
        अब वे एक दूसरी दुनियाँ में हैं
        खिंच गयी एक लकीर हाशिये की
        जिस तरह भूल जाते हैं हम अमूमन
        कुछ-न-कुछ किसी बहाने
        भूलती गयीं सरकारें भी
        बेशक सरकार बनाने में
        यह अहम भूमिका निभाते आये है
        आज भी याद आ जाते है चुनाव के समय
        हाशिए से बारह के लोग।

   मेंरा शहर
       

        शहर में बहुत भीड़ है
        शहर  में खौलता शोर है
        शहर को खूबसूरत बनाया जा रहा है
        वो बारिश में भीगते है
        सर्दी में ठिठुरते हैं
        उनके सरों पर धूप है
        खुरदरी, पथरीली,नुकीली
        भूख की चुभन है
        बदहवास, हताश, परछाइयाँ हैं
        शहर में ज़िन्दा हैं तमाम जुर्म
        क़त्ल, बेईमानी, वारदात, नाइंसाफ़ी, भ्रष्टचार बलात्कार, खुली लूट
        बढ़ती जाती है रोज़-बा रोज़
        महँगाई, गरीबी, बेरोज़गारी और भूख 
        क़ानून उड़ने लगा है वर्कों से
        घुल रही हैं कड़वाहट हवाओं में
        मन में गहरा विषाद
        भूखे  आदमीयों के
        सवाल लगा रहे हैं ठहाके
        अँधेरे के नाख़ून खुरचते है
        बदसूरत ज़ख्मों को
        मर चुकी संवेदनाओं के साथ जी रहा है शहर
        अब बहुत तैज़ दौड़ने लगा है शहर।

      
ट्रैफिक सिंगनल

        ट्रैफिक सिंगनल  पर जब रूकती है कार
        उग आते हैं अनगिनत
        नन्हे-नन्हे हाथ
        किसी हाथ में अख़बार
        किसी में मेंहकता गजरा
        किसी में खिलौने
        किसी में भगवान
        कुछ हाथ खाली हैं
        जिनमें झाँकते हैं
        अनुत्तरित सवाल
        एक बच्चा
        क़मीज़ की आस्तीन से
        जल्दी-जल्दी कार के शीशे साफ़ करता है
        और नाक पोंछ कर कहता है
        कुछ दे दो न साब
        और साब का बच्चा कहता है
        पीछे हट तूने कार के ग्लास गंदे कर दिये।

  
एक ऊब

        घर इत्मीनान नींद और ख़्वाब
        सबके हिस्से में नहीं आते
        जैसे खाने की अच्छी चीज़ें
        सब को नसीब नहीं होतीं
        जीवन के अर्थ खोलने के लिए
        खुद पर चढ़ाई पर्तों को
        उतारना होता है
        पैदा होते ही एक पर्त चढ़ाई गई थी
        जो आसानी से नहीं उतरती है
        पर्त-दर-पर्त पर्तों का यह खोल
        उतरने में बहुत वक़्त लगता है
        बहुत कड़वा और कसेला सा एक तजुर्बा
        यह ऊब बाहर से अंदर नहीं आती है
        बल्कि अंदर से बाहर की तरफ़ गयी है
        कुछ बचा जाने की ख्वाहिश के टुकड़े
        कुछ यूँ कि उसे ठीक करने की कोशिश भी
        बेमानी लगती है.
        इसी अफरातफरी में इतना हो जाता है
        तयशुदा रास्ते पर चलते रहना
        मोहज़ब बने रहना बहुत मुश्किल है
        उम्र के दूसरे सिरे पर भी बचपन हँसता है
        गहरे जमीन में जाती जड़ें
        पानी का कतरा खोज कर शाख़ पर पहुँचाती हैं 
        शाख़ें अपनी खुशियाँ फूलों को सौंपती हैं
        फल सब कुछ खो देने के लिए पकता है
        जैसे जैसे पेड़ की उम्र होती जाती है
        इंसानी झुर्रियों जैसी पर्त-दर-पर्त उसका बाहरी हिस्सा बनता जाता है
        और फिर नाखूनों की तरह बेजान हो जाता है।


 ज़िंदा रहना एक फ़न है

        
        ज़िन्दगी में फिर लौट कर आना
        घने कोहरे को दरख्तों के बीच छटते देखना 
        धड़कन की रफ़्तार थोड़ी धीमी सही
        बेचैनी भी है
        पर लगातार जीने का माद्दा तो है
        कमरे में सारी किताबें क़रीने से लगी हैं
        किताबों कि क़तार देख कर सुकून मिलता है
        कितनी ज़िंदगियों का सच छुपा है इनमें
        इंसानों कि बनायीं हुई दुनियाँ में
        बहुत कुछ अच्छा और खूबसूरत बचा तो है
        पढ़ने को इतना कुछ, समझने को इतना कुछ
        जीने को इतना कुछ की एक पूरी ज़िन्दगी कम पढ़ती है
        कितने फलसफे हैं दुनियाँ में उन्हें समझने को
        पत्थर भी घिसे दीखते हैं 
        यूँ तो ख्वाहिशों का कोई आकार नहीं होता
        न उनकी कि गिनती
        अक्सर धुंध में ही तलाशती हूँ
        आखिर मुझे चाहिए क्या
        जैसे आर्टिस्ट खींचता है कैनवास पर पहली लकीर
        बस एक लम्हा ही तो मिलेगा उसे
        जैसे रौशनी ने ज़मीन का सफ़र किया हो
        जैसे भी हो
        ज़िंदा रहना एक फ़न है !




( रचनाकार-परिचय :

जन्म: भोपाल में
शिक्षा:  पुरातत्व विज्ञान (अर्कोलॉजी ) में स्नातकोत्तर
सृजन: पहली बार कवितायेँ "कृति ओर " के जनवरी अंक में छपी है।
संप्रति: भोपाल में  अध्यापिका
संपर्क: shahnaz.imrani@gmail.com )
साहित्यकार पिता मक़सूद इमरानी  स्वतंत्रता सैनानी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे।

 
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रविवार, 8 अगस्त 2010

ख़ामोशी के ख़िलाफ़











शाहिद अख्तर की कविताएँ



तितलियां

रात सोने के बाद
तकिए के नीचे से सरकती हुई
आती हैं यादों की ति‍तलियां
तितलियां पंख फड़फड़ाती हैं
कभी छुआ है तुमने इन तितलियों को
उनके खुबसूरत पंखों को
मीठा मीठा से लमस हैं उनमें
एक सुलगता सा एहसास
जो गीली कर जाते हैं मेरी आंखें

तितलियां पंख फड़फड़ती हैं
तितलियां उड़ जाती हैं
तितलियां वक्‍त की तरह हैं
यादें छोड़ जाती हैं
खुद याद बन जाती हैं

तितलियां बचपन की तरह हैं
मासूम खिलखिलाती
हमें अपनी मासुमियत की याद दिलाती हैं
जिसे हम खो बैठे हैं जाने अनजाने
चंद रोटियों के खातिर
जीवन के महासमर में...
हर रात नींद की आगोश में
जीवन के टूटते बिखरते सपनों के बीच
मैं खोजता हूं
अपने तकिये के नीचे
कुछ पल बचपन के, कुछ मासूम तितलियां...


'हाई टी' और 'डिनर' के बाद

कभी देखा है तुमने
देश की तकदीर लिखने वालों ने
क्‍या क्‍या ना बनाया है हमारे लिए
आग उगलती, जान निगलती
हजारों मील दूर मार करने वाली मिसाइलें हैं
हम एटमी ताकत हैं अब
किसकी मजाल जो हमें डराए धमकाए
अंतरिक्ष पर जगमगा रहे हैं
हमारे दर्जनों उपग्रह
चांद पर कदम रखने की
हम कर रहे हैं तैयारियां
और दुनिया मान रही है हमारा लोहा
हम उभरती ताकत है
अमेरिका भी कह रहा है यह बात
हां, यह बात दीगर है
कि भूख और प्‍यास के मामले में
हम थोड़ा पीछे चल रहे हैं
लेकिन परेशान ना हों
'हाई टी' और 'डिनर' के बाद
नीति-निर्माताओं की इसपर भी पड़ेगी निगाह

यादों के फूल 


...और बरसों बाद
जब मैंने वह किताब खोली
वहां अब भी बचे थे
उस फूल के कूछ जर्द पड़े हिस्से
जो तुमने कालेज से लौटते हुए
मुझे दिया था

हां, बरसों बीत गए
लेकिन मेरे लिए तो
अब भी वहीं थमा है  वक्‍त
अब भी बाकी है
तुम्हारी यादों की तरह
इस फूल की खुशबू

अब भी ताजा है
इन जर्द पंखुडि़यों पर
तुम्हारे मरमरीं हाथों का
वह हसीं लम्‍स
उससे झांकता है
तुम्‍हारा अक्‍स

वक्त के चेहरे पे
गहराती झुर्रियों के बीच
मैं चुनता रहता हूं
तुम्‍हारा लम्‍स
तुम्‍हारा अक्‍स
तुम्हारी यादों के फूल

कभी आओ तो दिखाएं
दिल के हर गोशे में
मौजूद हो तुम
हर तरफ गूंजती है
बस तुम्‍हारी यादों की सदा
बरसों बाद जब मैंने ...


ख़ामोशी के ख़िलाफ़


दर्द हो तो
मदावा भी होगा
हमारी खामोशी
जुर्म होगी
अपने खिलाफ
और हम भुगत रहे हैं
इसकी ही सजा
लब खोलो
कुछ बोलो
कोई नारा, कोई सदा
उछालो जुल्‍मत की इस रात में
आवाजों के बम और बारूद
ढह जाएंगे इन से
जालिमों के किले
(14.01.09: गाजा पर इस्राइली हमले के खिलाफ लिखी कविता)

 





[ कवि-परिचय:
पूरा नाम: मोहम्‍मद शाहिद अख्‍तर
जन्‍म: 21 मार्च 1962,गौतम बुद्ध की नगरी, गया में
शिक्षा: बीआईटी, सिंदरी, धनबाद से केमिकल इं‍जीनियरिंग में बी. ई.

छात्र जीवन में  वामपंथी राजनीति से जुड़ाव । इंजीनियर के बतौर कैयिर शुरू करने की जगह एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए । बंबई (अब मुंबई) के शहरी गरीबों, झुग्‍गीवासियों और श्रमिकों के बीच काम किया। बंबई के इस अनुभव ने उन्हें जीवन के कई अहम पहलुओं को निकट से देखने का मौका दिया। 

सृजन-प्रकाशनगार्डन टी पार्टी और अन्‍य कहानियां-कैथरीन मैन्‍सफील्‍ड [राजकमल प्रकाशन] तथा प्राचीन और मध्‍यकालीन समाजिक संरचना और संस्‍कृतियां-अमर फारूकी [ग्रंथशिल्‍पी] का अनुवाद ,समकालीन जनमत, पटना में विभिन्‍न समसामयिक मुद्दों पर लेखन, अंग्रेजी और उर्दू में महिलाओं की स्थिति, खास कर मु‍स्लिम महिलाओं की स्थिति पर कई लेख प्रकाशित

सम्प्रति : प्रेस ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) की हिंदी सेवा 'भाषा' में वरिष्‍ठ पत्रकार ।
नेशनल बुक ट्रस्‍ट के लिए भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के तीसरे अध्‍यक्ष (1887), बदरूद्दीन तैयबजी के लेखों के संकलन और उनकी जीवनरेखा पर कार्य 
संपर्क: shazul@gmail.कॉम ]






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बुधवार, 4 अगस्त 2010

शहर आया कवि गाँव की गोद में















कमाल अहमद की कवितायें


शाम नहीं बन जाती है माँ
माँ को सबकुछ याद रहता है
ठीक मेरी नानी की तरह...

देखता हूँ की वह अपनी यादों की बची हुई
रोटियां रख आती है चाँद की रोशनी में
...
और चुपचाप करवटें बदलती
सुबह बन जाती है

मेरी ओर देखती हुई
पल्लू से अपने पसीने को पोंछती
पैर के दर्द की टीस को
अपने चेहरे से छुपाकर
वह मुस्कुरा रही होती है
सुबह सुबह

माँ माँ होती है
और हमेशा माँ ही बनी रहती है
माँ को कभी किसी ने शाम बनते नहीं देखा
 
गाँव की भाषा
 एक ग्रामीण कवि के लिए
 सिमरिया एक गाँव है
सायटिका एक रोग
शशिधर एक कवि है
दुर्दिनों का एक मित्र भी
जो कभी कभी शहर आता है
और जब कभी होती है मुलाक़ात
शहर डूब जाता है गाँव में .
 
कल भी आया था अपनी गठरी के साथ
कहने लगा :
साहबजी के द्वारे पर
बांके मोची को बैठाकर
खुद चला आया है उस नगर में
जहाँ हाट नहीं लगते .
 
सुबह तोड़ लाया था नीम का दातुन
थूकता रहा शहर की बेहोशी पर
महसूस करता रहा
सूरज के अंखुवाने के संगीत को.
 
जब मेरी नींद खुली
सौंफ और अजवाइन की महक टकराई
कहने लगा : बोझ से दब गयी है कविता.
 
अखबार पर चलती हुई नज़र
मेरे चेहरे पर आ ठिठक गयी
कहा ; स्सालों ने बेच ही दिया
उसकी नसें फड़क रही थीं
एक उच्छ्वास ..
देखो, देखो
सिमरिया की सड़कें
अपने संसाधनों को ढोती हुई
सैन फ्रांसिस्को  की ओर जा रही है.....
 
मैंने उसे बहुत समझाया
वह नहीं माना
कहने लगा :तुम्हारी चेतना
सोवियत संघ की तरह बिखर चुकी है
जानते हो
शहर की एक ऊँचाई  होती है
अलग इतिहास और भूगोल भी
गाँव का अपना आकाश होता है
अपनी मिट्टी और महक भी
तुम नहीं समझ सकते
गाँव की भाषा .
 
हाजीपुर
 
वर्ष १९९२ का था..
विश्व के प्रथम गणतंत्र का वर्तमान मुख्यालय  
केलों के लिए बहुत प्रसिद्ध है
गौतम बुद्ध को लोग भूल चुके होंगे
आम्रपाली को ज़रूर जानते होंगे
गंगा और गंडक के संगम पर बसा यह शहर
गज और ग्राह के युद्ध का प्रत्यक्ष गवाह रहा था कभी.
 
एक सुसज्जित रथ पर
आडवानी का प्रकट होना
इस शहर को बदल गया
बहुत जल्द ही लोग
मस्जिद चौक को महावीर चौक
और बागमली  को बजरंग बली चौक
पुकारने का अभ्यास करने लगे
और देखते ही देखते रामभक्तों द्वारा
पवनसूत हनुमान  की मूर्ति
इन चौकों पर रोप दी गयीं .
 
रथ गुज़र जाने के महीनों बाद
एक नए चलन के रूप में
एम.चौक और बी.चौक
अस्तित्व में आया
लोगों ने सोचा
हम अपनी सुविधा से
इन शब्दों का इस्तिमाल कर लेंगे.
 
पर आज भी
मस्जिद चौक के आस-पास रहनेवाले
लोगों के जीवन में
अज़ान की आवाज़ बहुत मायने रखती है और
बागमली चौक पर स्थित
अनजान पीर के मज़ार पर
लोगों का तांता
इस बात का सबूत है कि
लोग अभी जिंदा हैं.
 
[कवि-परिचय जन्म 1.मार्च, 76 बिहार में .
शिक्षा :हाजीपुर और पटना से एम ए [हिंदी] करने के बाद जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय, दिल्ली से से पी-एच.डी
सृजन :
ढेरों पत्र-पत्रिकाओं में कविता,समीक्षा और समसामयिक लेखों का प्रकाशन.
दो तीन किताबें जल्द प्रकाश्य 
सम्प्रति  :नेशनल बुक ट्रस्ट के सम्पादकीय विभाग से संबद्ध.ट्रस्ट के मुख्य पत्र संवाद का सम्पादन 
संपर्क  : kamalahmad26@gmail.com ]
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बुधवार, 3 मार्च 2010

पगडंडी वापस नहीं लौटती



 














ख़ालिद ए ख़ान की क़लम से


पहले की  तरह
धुंधली आँखों से
बस देखती रहती है
गाँव की सीमा से लगती 
बडी सड़क की ओर
 
अब   पगडंडी वापस नहीं लौटती

चौपाल में फैला हुआ है
मरघट सा सन्नाटा
शाम को बैठे रहते है
कुछ पुरनिया
हुक्के के साथ
अपनी शेष स्मृति
को धुएँ  में  उड़ाते  हुए


खूँटी  से लटके
ढोल मंजीरे
रह रह कर हिल
उठते है
हवा के झोके के साथ
अब इनेह कोई नहीं पूछता है

गाँव के चौराहे की
चाय की दुकान पर
अब नहीं लगता
लोगो का मजमा
वो बुढ़ा पंडित
खुद से ही बतियाता
रहता है

गाँव को छुकर निकलती
दुबली सी नदी
ठिठक कर ठहर सी गयी है
अब नहीं आता कोई
बच्चो का झुंड
करने इससे अठखेलियाँ


गाँव का सबसे बुढ़ा
बरगद
उसकी डालियाँ
अतीत से छनती
रहती है कुछ यादे
उससे चिमटी
एक पुरानी पतंग
की सरसराहट
उसे भविष्य में
ला पटकती है
और वह देखने लगता है
इधर से उधर

शहर से आती हवा ने
भर दिए नए सपने
यहाँ की  नयी पीढ़ी में
और यह उड़ पहुँचे
बड़े से शहर के बड़े से
कारखानों में
 
 
अब यहाँ
जवान होती नस्लों
में भी शहर के ख्वाब
तैरते रहते है


जब ये गाँव से कटे लोग
कारखानों से लौटते हैं
अपनी अपनी मांदों में
थक कर
रात को करवट
बदलते  हुए

 
गाँव का झोंका
छु जाता है इनकी देह से
तो आकार लेने लगता है
इनके बहुत अन्दर बैठ हुआ
इनका गाँव


ढोल मंजीरे की
थाप तेज होने लगती है
बरगद की छाँव
ढक लेती है
 
इन्हें
पूरा का पूरा


दुबली सी नदी का
पानी
गिला कर देता
इनकी आँखों को


अब यह सभी
उड़ जाना चाहते हैं
वापस
पर

अब




 









पगडंडी वापस नहीं लौटती .







[कवि-परिचय: जन्म सुल्तानपुर में.और शिक्षा लखनऊ से वाणिज्य स्नातक .गत कई सालों से दिल्ली में रहकर रोज़ी-रोटी की तलाश.साहित्य,कला में रूचि.]

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