बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 12 मई 2015

धर्मांतरण बनाम घर वापसी

चित भी उनका, पट भी उनकी











पंकज साव की क़लम से

आगरा में हुई कथित 'घर वापसी' की खबर मीडिया के लिए भले बासी हो चुकी है। लेकिन उसके अर्थ व भाव भारतीय लोक चेतना को रह-रहकर उद्वेलित करते रहेंगे। क्योंकि इस घटना को स्वाभाविक मान लेना बौद्धिक भोलेपन के सिवा कुछ नहीं है। कुछ घटनाओं की कड़ियां जोड़ने पर यह बात साफ हो जाती है कि इसे हवा देने में उन्हीं तत्वों का हाथ है, जो चाहते हैं कि किसी न किसी तरह धर्मांतरण के खिलाफ कानून बन जाए ताकि उनका 'हिन्दू राष्ट्र का सपना' साकार हो सके। पिछली सरकारों की दूरदर्शिता अथवा हिन्दुत्ववादी ताकतों के सत्ता पर उतनी मजबूत पकड़ (जो अब है) से दूर होने के कारण इस तरह का कानून बनाना अब तक संभव नहीं हो सका था।

आठ दिसंबर को आगरा के 57 गरीब मुसलमानों ने हिन्दू धर्म अपना लिया। यह धर्मांतरण की घटना थी, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अन्य हिन्दूवादी संगठन घर वापसी कहते हैं। आरएसएस के ही एक विंग धर्म जागरण समिति की इसमें मुख्य भूमिका थी। यह समिति देश के बहुत से हिस्सों में अन्य धर्मों के लोगों को हिन्दू बनाने का काम कई सालों से कर रही है, पर गोपनीय तरीके से। लेकिन, इस बार इसी समिति के एक नेता ने आगरा की घटना के बाद घोषणा कर दी कि क्रिसमस के दिन पांच हजार ईसाइयों को हिन्दू बनाया जाएगा। केंद्र ने राज्य सरकार के पाले में गेंद डालते हुए खुद को मामले से दूर कर लिया, मगर बयानबाजी जारी रही।

पिछले वर्ष मई में देश में मोदी सरकार बनने के सात महीने के अंदर आगरा में ऐसा हुआ और संसद से सड़क तक बहस छिड़ गई। इसमें मीडिया की भूमिका अहम रही। संसद में भाजपा नेताओं की ओर से धर्मांतरण रोकने के लिए कानून बनाने की वकालत के पीछे उनके मातृ संगठन की ही बरसों पुरानी मांग है। संसद के बाद देश भर में योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, अमित शाह के बयान यह साबित करने के लिए काफी हैं कि धर्मांतरण को चर्चा में लाने में वे सफल हो गए हैं। मिला-जुलाकर उनकी बातों का यही मतलब बना कि या तो घर वापसी (जो वास्तव में धर्मांतरण ही है) का विरोध बंद कर दिया जाए या फिर धर्मांतरण के खिलाफ कानून बना दिया जाए। आरएसएस-भाजपा के लिए ये दोनों ही स्थितियों में 'चित भी उनका है और पट भी उनकी'

आरएसएस शुरू से धर्मांतरण का विरोधी रहा है। इसके खिलाफ कानून बनाने की उसकी मांग पुरानी है। कानून बनवाने में सक्षम नहीं होने पर हिन्दुओं की घटती आबादी का ढिंढोरा पीटते हुए उसने आदिवासियों के बीच ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का जवाब देने के लिए वनवासी आश्रम, वन बंधु परिषद, एकल विद्यालय जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू किए। लेकिन मिशनरियों की सेवा भावना, आधुनिक सोच, संसाधनों की ताकत के आगे उनकी कोशिशें बौनी ही रहीं। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पूर्वोत्तर के राज्यों समेत देश के बड़े इलाके में आधुनिक स्कूलों, हॉस्पिटल्स, रोजगार प्रशिक्षण केंद्रों के फैले जाल ने मिशनरियों को जो ताकत दी है, उसका सत्ता की बदौलत संघ मुकाबला करना चाहता है। उसके इस मिशन में भाजपा बहुत चालाकी से साथ देती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने 'झुंझलाहट' में पद छोड़ने की जो चेतावनी दी थी, उसमें सच्चाई खोजना हमारी भूल होगी। धर्मांतरण की चर्चा का एक और फायदा सरकार को और हुआ है कि जनता और मीडिया का ध्यान उन जमीनी मुद्दों से भटका, जिन पर नई सरकार कुछ उल्लेखनीय कर पाने में नाकाम रही है।

(लेखक-परिचय :
जन्म: 8 अक्टूबर 1986 को हज़ारीबाग (झारखंड) में
शिक्षा : संत कोलंबा कॉलेज, हजारीबाग से कला स्नातक तथा माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं जनसंचार विवि, भोपाल से MA in Mass Communication
सृजन : छिटपुट यत्र-तत्र लेख, रपट प्रकाशित
2011 से पत्रकारिता की शुरुआत
संप्रति : रायपुर में दैनिक भास्कर डॉट कॉम से संबद्ध
संपर्क : pankajsaw86@gmail.com )



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बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

किसको राहत देती हैं संघ की बातें

चित्र: गूगल से साभार

हमारी अतियों से माहौल और बिगड़ेगा ही
 
भवप्रीतानंद की क़लम से
आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने जब हिंदू महिलाओं को कितने बच्चे जन्म दें के मुद्दे पर बीजेपी के कुछ सांसदों को अघोषित रूप से फटकार लगाई थी तो यह भान स्वभाविक था कि चीजों को तार्किक नजरिए से देखने की कोशिश की जा रही है। उसी के आसपास दिल्ली में चर्चों पर हुए हमलों के विरोध में पीएम नरेंद्र मोदी की स्पष्ट टिप्पणी भरोसा जगाने वाली लगी थी। पर पता नहीं क्यों बार-बार कुछ मुद्दों पर, जिसपर बोलने की आवश्यकता नहीं है और जिसका कोई तार्किक आधार हम प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं उसपर कुछ बेतुका बोल दिया जाता है। मदर टेरेसा में मन में लोगों को  ईसाई बनाने की भी मंशा थी, इसे पुष्ट करने के लिए हमारे पास कोई तथ्यात्मक सबूत नहीं है। खुद मोहन भागवत  के पास ऐसा कोई सबूत हो तो वे बताएं, और साबित करें। बाद में जब मीडिया में ऐसे बयान मुद्दे के रूप में व्याख्यायित होते हैं तो सफाई दी जाती है कि बयान को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। यही सफाई बोलते  वक्त ध्यान में रखी जाए तो ऐसी नौबत ही नहीं आएगी। इससे होता कुछ नहीं है पर ऐसे-ऐसे वक्तव्यों को एक तार में जोड़कर यह साबित करने का  प्रयास किया जाता है कि आरएसएस की सोच इससे आगे बढ़ी ही नहीं है। अगर किसी पार्टी या संगठन में समस्या समाधान करने की सम्यक सोच है तो वह कश्मीर समस्या का समाधान क्यों नहीं कर देते हैं जो सर्वमान्य हो। बार-बार उन चीजों को कुरेद कर जिसका कोई इतिहास हमारे पास उपलब्ध नहीं है, उसपर बयानबाजी से क्या होगा।

जब मुसलामानों और ईसाइयों के लिए घर वापसी वाला बेतुका शोर वातावरण में घुल रहा है तो मोहन भागवत को यह स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि हिंदू धर्म में वह मुसलमान और ईसाई बने हिंदुओं को वापस लाकर ब्रह्मण का दर्जा देंगे। क्योंकि वह भागे ही इसलिए थे कि उन्हें हिंदू धर्म की अतियां जीने नहीं दे रही थीं। लतमारा की श्रेणी में रखे हुई थी। मैला ढुलवाती थी। गांव के अंतिम छोर पर उसके रहने के लिए झुग्गी मुकर्रर थी। उसकी छाया तक ब्रह्मण-राजपूत अपनी जमीन में पडऩे नहीं देता था। कोई भी हिंदुवादी संगठन खुलकर, इतिहास को ठीक से पढ़कर बताए कि किसी देशकाल में बड़ी संख्या में ब्रह्मण और राजपूतों ने धर्म परिवर्तन किए हैं।
सत्ताधारी पार्टी भाजपा के लिए यह सतत प्रक्रिया की तरह हो जााएगा कि कोई संघी जबतब कुछ बोल देगा और केंद्र सरकार यह कहकर किनारा करते रहेगी कि इस वक्तव्य का सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। आप से दिल्ली में करारी हार के बाद प्रधानमंत्री चर्चों के हमले पर बोलने के लिए मजबूर हुए नहीं तो शायद ही उनसे इस तरह की भाषा की अपेक्षा थी।  पता नहीं अपनी इस भाषा पर वह कालांतर में कायम रह भी पाएंगे या नहीं। मीडिया से वह जिस तरह की दूरियां बनाकर रखते हैं, वह चीजों को भड़काउ बनने का वक्त दे देती हैं। गुजरात के गोधरा कांड के बाद जो उन्होंने मीडिया से परहेज किया वह पीएम बनने तक जारी है। यह बहुत खतरनाक इस मायने में  है कि राष्ट्रीय स्तर के संवेदनशील मुद्दों पर प्रधानमंत्री का वक्तव्य ही मायने रखता है, क्योंकि उसे ही पार्टी लाइन कहा जाता है।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी बहुत कम लाइम लाइट में दिखते हैं। जरूरी होने पर ही बोलते और दिखते हैं। लेकिन उनका मन भी संघी आग्रह  कहां छोड़ पाता। एक आरोपी बलात्कारी आसाराम बापू को वह पूज्य संत कहने में एक जरा हिचक महसूस नहीं करते हैं तो शक होता है कि सत्ता के इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठे लोग क्या देश की संप्रभुतता से न्याय कर पाएंगे। उसकी विविध सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रख पाएंगे। 

अभी तो सत्ता के एक साल भी पूरे नहीं हुए हैं। ऐसी नकारात्मक चीजों से उन तत्वों को बढ़ावा ही मिलेगा जो दंगे करने में या फिर अराजक स्थिति पैदा करने में सहायक होते हैं। कांग्रेस ने भ्रष्टाचार में जिस तरह से अराजकता की स्थिति पैदा कर दी थी, वैसी ही स्थिति भाजपा के शासनकाल में समाज के स्तर पर बलवती होंगी तो इसके कई खतरनाक परिणाम हमें भुगतने पड़ेंगे। आरएसएस की धर्म से जुड़ी बयानबाजी में वह तत्व निराधार रूप से संपुष्ट होते रहते हैं कि मैं इस देश का असली वारिस, बाकी सब बाहरी। बाहरी को अगर रहना है तो मैंने जो तय किया उसके तहत रहो।
किसी को कोई शक नहीं पालना चाहिए, कांग्रेस की दुर्गति का मुख्य कारण है कि वह भ्रष्टाचारी और कालाबाजारी पर मजबूती से काबू नहीं रख पाई। उसने सत्ता को बेजा इस्तेमाल होने दिया। मनमोहन सिंह को कठपुतली की स्थिति में ला दिया। लगातार दस वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद अगर भ्रष्टाचारी और कालाबाजारी पर अंकुश लगा लिया गया होता तो देश की प्रगति की रफ्तार दूनी तो निश्चित ही होती। भाजपा के शासन का मूल्यांकन जल्दबाजी होगी, क्योंकि अभी एक वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं, पर एक जिस मोर्चे पर अभी से वह कमजोर दिखाई दे रही है वह है उसका संघ से, उसके विचारों से लाग-लपेट। बार-बार संघ की ओर से और पार्टी की ओर से इस मद्देनजर सफाई दी जाती है कि दोनों एक-दूसरे के कार्यों में दखल नहीं देते हैं। पर जब बिना लगाम की बातें निकलती हैं तो समाज में उसके बहुत अच्छे अर्थ नहीं जाते। और जब कोई एक ही प्रकृति की चीजें बार-बार होती रहती हैं तो वह कई मुश्किलें खड़ी करती हैं। कें्रद के लिए यह स्थिति असमंजसपूर्ण होती है। मेक इन इंडिया को यह सफाई देनी पड़ी है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी से उनका कोई लेनादेना नहीं है। कल को गृहमंत्री जी भी सफाई देंगे।

अब जिला स्तर पर, राज्य के स्तर पर होने वाले हिंदू सम्मेलन को अधिक मीडिया कवरेज इसलिए मिलेगा क्योंकि भाजपा सत्ता में है। सम्मेलन करने में कोई गड़बड़ी नहीं है। पर वहां से कोई ऐसी  बात निकलकर समाज के आखिरी छोर तक नहीं पहुंचनी चाहिए जो बेवजह लोगों को उत्तेजित करती है। कोई भी धर्म, मथकर ही दुरुस्त और तार्किक होता है। विशुद्ध आस्था को भी तार्किकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए, नहीं तो मुश्किलें पैदा होती हैं। इराक में आईएस की गतिविधियां इस्लाम की व्याख्या नहीं है। इस्लाम के नाम पर वह रोटी इसलिए सेंक पा रहे हैं कि चीजें सामाजिक स्तर पर बहुत विद्रूप रूप में पहुंची और लोगों को उत्तेजित करती गईं। और अब वह काबू से बाहर हो गईं हैं। किसी को जला देना, किसी को काट देना, मौत की सजा देने से पहले यह पूछना कि आपको मौत से पहले कैसा महसूस हो रहा है आदि जघन्यतम स्थितियां कोई एक दिन की उपज नहीं है। विद्रूप चीजों और विचारों के हावी होने और समाज में उसके  व्यवस्थित रूप ले लेने का कारण यह नासूर पैदा हुआ। हमें इससे बचना है किसी भी कीमत पर। फरवरी-मार्च के इस मौसम में अभी फुलवारी में एक साथ कई फूल खिले होंगे,  अपना-अपना स्पेस लेकर। हमें विचारों को स्पेस देना होगा। ऊंचे पद पर बैठे लोगों को न तो लट्ठमार भाषा शोभा देती है और न ही लट्ठमार स्वभाव।

 













(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )

हमज़बान पर पढ़ें  भवप्रीतानंद को

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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

के होतई बिहार के मांझी

चित्र: गूगल से साभार



 
बिहार के सुशासन को चुनौती देते कुछ तत्व
भवप्रीतानंद की क़लम से
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी को अपना नेता चुनने में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी। दल की एकता  और गांधी परिवार की आशक्ति ने एकमत से राजीव गांधी को नेता चुन लिया। लालू यादव के लिए भी चारा घोटाला में फंसने के बाद मुख्यमंत्री के पद पर बने रहना असंभव हो गया था, तो पार्टी में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कोई और नहीं सूझा, पत्नी राबड़ी के अलावा। इससे न सिर्फ वह पार्टी पर कमांड रख सके, बल्कि सत्ता में भी छाया प्रशासक की भूमिका निभाते रहे। नीतीश कुमार के पास शायद ऐसा कोई नहीं था। इसलिए उन्होंने महादलित जीतनराम मांझी को चुना। नीतीश ऊपर के दोनों दोनों उदाहरण से थोड़ा  अलग इसलिए हैं कि उन्होंने सत्ता  लोकसभा में बिहार में मिली करारी हार के कारण छोड़ी थी। कमान जीतनराम मांझी को यह सोचकर दी थी, कि वह उसी कार्य परंपरा को बनाए रखेंगे, जो वह आठ वर्षों से बनाए रखे थे। इससे नीतीश ने जनता के सामने यह साबित करने का प्रयास किया कि हार के बाद उन्होंने सत्ता में बने रहने का आधिकार खो दिया है।
आम आदमी पार्टी फिर से जब दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई है, तो पार्टियों को दो खेमे में बांटकर देखने का चलन शुरू हुआ है। एक परंपरागत पार्टी का खेमा बना है जो वर्षों से राजनीति कर रहा है और नाम अलग-अलग  होने के बाद भी चारित्रिक रूप से दोनों एक हैं। मतलब दोनों में दागी नेताओं  की कमी नहीं है। दोनों के पास काले धन हैं। सत्ता में जो रहता है, वह इन दागी नेताओं से परहेज नहीं करता है। या फिर सत्ता में रहकर भी जो अलोकतांत्रिक फैसले लेता से उसपर तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, जब तक की पानी सिर के ऊपर ने न गुजर जाए।

इन्हीं परंपरागत राजनीतिक  दलों में से कई नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने विकास को एक नया आयाम दिया है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, एमपी में वर्षों से परंपरागत पार्टी के नेताओं ने लीक से हटकर काम करके दिखाया, तो लोग उन्हें सत्ता में बनाए हुए है। बिहार के नीतीश कुमार भी ऐसे सीएम की केटगरी में देखे जाते हैं जो विकास की राजनीति करते हैं। काम के बल पर वोट मांगते हैं और जातीय गणित के जोड़-तोड़ में लिप्त रहने वाला राज्य भी उन्हें सत्ता में बनाए रखता है।

नीतीश ने भाजपा से नाता तोडऩे के बाद जो राजनीति की है, वह कई शंकाओं को जन्म देती है। लालू यादव से हाथ मिलाकर उन्होंने जातीय गणित को दुरुस्त करने की भले कोशिश की हो, पर जिस दम पर उनकी राजनीतिक  शख्सियत बनी थी, उसपर सवालिया निशान लग गया है। यह चुभने वाली बात है। जदयू और नीतीश नरेंद्र मोदी की अखिल भारतीय स्वीकृति को नहीं आत्मसात कर पाए, यह बात अपने-आप में और अपनी जगह ठीक हो सकती है। पर जदयू-शरद यादव-नीतीश कुमार इसके काट के लिए लालू यादव को गले लगाते हैं, यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है।

लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी नीतीश बिहार की सत्ता में बने रहते, तो लोगों में कोई बहुत गलत संदेश नहीं जाता। खासकर तब जब कि उन्होंने आठ वर्ष राज कर लिया था और बिहार में विकास की स्थिति को गतिशील बना दिया था। २०१५ अंत में जब वह जनता के सामने रिपोर्ट कार्ड लेकर जाते, तो शायद उनकी स्थिति भाजपा और राजद से बेहतर ही होती। पर जीतनराम मांझी के बेसुरा होने के बाद और लालू यादव को गले लगाने के बाद नीतीश उस रिपोर्ट कार्ड को बहुत अधिकार के साथ प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे, जिसे वह सुशासन कहते हैं। जीतनराम मांझी ने नीतीश की छवि सत्ता लोलुप की बना दी है। शायद इसी कारण वह जीतनराम मांझी के चुनाव को  अपनी बड़ी भूल मान रहे हैं। पर अगर बिहार की जनता विकास की राजनीति को मानक मानकर वोटे देती है तो जीतनराम मांझी से अधिक खतरनाक उनका लालू  यादव से गठबंधन वाला दांव रहेगा। लालू यादव ने सत्ता में आने के बाद से वहां बने रहने के लिए उसका जितना गलत इस्तेमाल करना था, किया था। उन्होंने बिहार में चुनाव का मखौल बनाकर रख दिया था। जिस सुशासन को नीतीश अपना गहना मानते हैं, क्या उनके साथी लालू यादव भी उसे इसी रूप में देखते हैं। यह प्रश्न इसलिए लाजिमी है क्योंकि लालू यादव को लठैती की भाषा समझ में आती है। वह चीजों को व्यवस्थित तरीके से देख ही नहीं सकते। बिहार में विकास के ग्रिप में आई जनता लालू यादव को सिरे से नकारती है। क्योंकि उन्होंने अपने कर्मों का कोई प्रायश्चित नहीं किया है। उन्होंने  कुछ ऐसा कर नहीं दिखाया है जिससे कि बिहार की जनता समझे कि चलो अब लालू यादव को सद्बुद्धि आई। ऐसी स्थिति में नीतीश का लालू के गले लगना खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि मिलकर अगर उन्हें सत्ता मिलती है तो नीतीश के सुशासन के रथ में पहिए सुरक्षित रह भी पाएंगे-इसमें शक है।
दिल्ली में भाजपा की करारी हार के बाद जीतनराम मांझी नामक वायरस से नीतीश को आने वाले सप्ताह में मुक्ति मिल सकती है। पर मांझी के वायरस ने नीतीश को सताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। १६ फरवरी को जब हाईकोर्ट ने जीतनराम मांझी के थोक में लिए गए फैसले पर रोक लगाई तो पहली बार उनके चेहरे पर हार का डर दिखने लगा। दिल्ली में भाजपा की करारी हार के बाद से भाजपा भी बहुत उत्सुक होकर माझी के साथ नहीं चल रही है। नीतीश के दूसरी बार विधायक दल के नेता चुने जाने के बाद सत्ता पाने के लिए जो हड़बड़ाहट दिखा रहे हैं वह उनके व्यक्तित्व के इतर है। पर बात सिर्फ फिर से सीएम बन जाने की नहीं है। बात है साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव की है। वह क्या लालू यादव को साथ लेकर चुनाव जीता जा सकता है।
आप ने हर परंपरागत पार्टियों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। उसके सुशासन की परिभाषा नीतीश कुमार से भी अलग है। अगर पूरे देश की जनता ऐसे ही मानक को प्रतिमान मानकर लोगों को चुनती है तो लालू से गठबंधन नीतीश के लिए गले की फांस बन जाएगी। नीतीश जब फिर से सीएम बनेंगे तो उन्हें बहुत संभलकर कदम रखने होंगे। लालू यादव से हुए गठबंधन को अवसरवादी नहीं बताकर उसकी स्पष्टता की व्याख्या जनता के समझ प्रस्तुत करना पड़ेगा। यह चुनौती कई मायनों में अधिक जटिल है। जातीय गणित बिहार की राजनीति में अहम है। बिहार क्या पूरे देश की राजनीति में अहम है। पर लोग अब इससे परे भी देखने लगे हैं। देखने के आदी हो रहे हैं। तो राजनीति को भी उसके अनुसार बदलना होगा। राजनीति करने वाले को भी जातीय गोटी फिट करने से इतर सड़क-बिजली-पानी-शिक्षा आदि विषय-वस्तुओं पर ध्यान देना होगा। लालू यादव क्या राजनीति के इस परिवर्तन को देख-महसूस कर पा रहे हैं? नीतीश से उनका गठबंधन भी तभी सफल होगा जब विकास की राजनीति का मोर्चा उनके लिए भी जुनून का विषय बनेगा।



 









(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )
 
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शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल में उतरी अरविंद की सादगी

दिल्ली में बस कुछ नहीं, आप ही आप 


चित्र: गूगल से साभार



भवप्रीतानंद की क़लम से
अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिले असाधारण बहुमत पर अचंभित हैं, और कह रहे हैं, यह बहुमत डरानेवाला है। आप कार्यकर्ताओं को चेता रहे हैं,  अधिक अहंकार मत पालो नहीं तो पांच साल बाद हमारी हालत भी भाजपा-कांग्रेस की तरह हो जाएगी। जीत के बाद यह दो बातें वही व्यक्ति कह सकता है जो चीजों को सही तरीके से देखने का आदी है। जो यह कह सकता है,  मैंने पिछली बार गलती की। मुझे दिल्ली में सरकार नहीं गिरानी चाहिए। अबकी मौका मिला तो ऐसा नहीं करूंगा। यह सादगी लोगों के दिलों में सीधे उतरती है। और उतरी भी। दिल्ली की जनता ने दिल खोलकर आप को ७० विधानसभा सीट में से ६७ सीट दे दिए।


देश में परंपरागत पार्टियों के लिए यह बहुमत सुधरकर सलीके से काम करने का संकेत दे रहा है। परंपरागत पार्टियां मतलब भाजपा और कांग्रेस को अपनी बैठकों में इस बात पर निश्चित मंथन करना चाहिए कि वह कौन-सा आंतरिक फोर्स काम कर रहा था, जो आप को लोगों ने इकतरफा वोट दे डाले। भ्रष्टाचार से मुक्ति हर आमोखास चाहता है। यह एक बहुत बड़ा मुद्दा तो है ही। दिल्ली में लोकल समस्या बिजली-पानी से जुड़ी है। इस संबंध में केजरीवाल की पिछली पचास दिनों की सरकार ने बहुत ठोस कदम उठाए थे। उस ठोस कदम का फायदा भी लोगों मिलने लगा था। इसके अलावा दिल्ली में एक प्रमुख समस्या कच्ची बस्ती की मान्यता से जुड़ी हुई है। उसके नियमन के लिए भी आप ने नीतिगत आश्वासन दिया था। ये कुछ ऐसे तत्व हैं, जो लोगों को आप के करीब ले आई। खासकर कच्ची बस्ती के नियमन से जुड़े मुद्दे ने निम्र मध्यमवर्गीय परिवार को आप के करीब ला दिया। इसके बरक्स भाजपा और कांग्रेस के वादे सिर्फ कोरे वादे ही लगते हैं। दोनों पार्टियां चुनाव के समय किए गए वादे को सत्ता मिलने के बाद लगभग भूल जाती हैं। फिर उन्हें उन लोगों की फिक्र ही नहीं रहती, जिसने उन्हें सत्ता दी है। यह जो ट्रेंड पारंपरिक पार्टियों में है, वादों से मुकरने का, इसके टूटने की दिन अब आ चुके हैं। अगर इस मिथ को इन पार्टियों ने नहीं तोड़ा तो उनका नामलेवा भी कोई नहीं रह जाएगा। जैसा कि अभी कांग्रेस की गत हुई है। लोकल मीडिया में एक जुमला खूब चला है कि भाजपा का भी यारो अजीब गम है। पहले चार कम थे...अब चार से भी कम है।
दिल्ली का विधानसभा चुनाव परिणाम है, इसलिए इसके राष्ट्रीय अर्थ भी निकाले जाते हैं। भाजपा में मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने कई चुनाव जीते हैं। दिल्ली में उन्हें मुंह की खानी पड़ी है। इसलिए कोई इसे दिल्ली  भाजपा की हार  या दिल्ली  भाजपा की रणनीतिक असफलता मानने को भी तैयार नहीं है। खासकर तब जब भाजपा ने दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के लिए हैलीकॉप्टर लेंडिंग की तरह किरण बेदी को उतारा। दिल्ली में किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर उतारने के बाद से ही भाजपा कार्यकर्ताओं में नाखुशी थी। खासकर किरण बेदी की कार्यशैली को लेकर। वह भाजपा या संघ की बातों को तवज्जो ही नहीं दे रही थीं। किरण बेदी का प्रशासनिक कार्यकलाप उन्हें राजनीति में कभी सहजता से लोगों से रूबरू नहीं होने देगा, इसे दिल्ली की चुनाव ने साफ कर दिया है। अमित शाह ने मुखमंत्री पद के लिए किरण बेदी को इसलिए प्राथमिकता दी कि वह साफ छवि की हैं। भ्रष्टाचार से मुक्ति की बात केजरीवाल के बरक्स वही करेंगी  तो दिल्ली  की जनता में अच्छा संदेश जाएगा। फिर मोदी की चार-पांच सभाएं कराकर दिल्ली के किले में भी घुस जाया जाएगा। लेकिन यह सब दांव उलट पड़े। सबसे पहले संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं में किरण बेदी को लेकर उपेक्षा का भाव पनपा। जो ठीक चुनाव के पहले स्पष्ट रूप से दिखाई देना शुरू हो गया था। दूसरा, जो सबसे खतरनाक ट्रेंड दिखाई दिया वह यह है कि पार्टी में वर्षों समय खपाने के बाद  अगर बाहर से मुख्यमंत्री पद के लिए किसी को बिठा दिया जाता है तो पार्टी में उपेक्षा का वातावरण पसर जाता है। यही बेदी के साथ हुआ। हार के बाद उनका पहला स्टेटमेंट देखिए, मैं हारी नहीं हूं। हार के बारे में जानना है तो भाजपा से पूछो। सोचिए, जिस प्रशासनिक अधिकारी कम  नेता को आपने मुख्यमंत्री पद के लिए चुना वह पूरी पार्टी को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। भाजपा यही भूल पश्चिम बंगाल में क्रिकेटर सौरभ गांगुली को पार्टी में लाकर करना चाहती है। वो तो सौरभ ही बार-बार कन्नी काट रहे हैं। कुल मिलाकर अपने पार्टी में तपे नेता में से ही किसी एक को चुनकर उसे प्रोजेक्ट किया जाए तो अधिक अच्छा है। किरण बेदी वाला प्रयोग भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए एक सबक से कम नहीं है।
केंद्र में सत्ता में आने के बाद से भाजपा ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिसने दिल्ली चुनाव पर बुरा असर डाला है। इसमें पहला है, धर्म परिवर्तन कर घर वापसी वाली मुहिम। संघ के नेताओं को अब तो ऐसा लग रहा है,  जैसे लाइसेंस मिल गया है। कुछ सांसद तो मुंहफट हो चुके हैं। हिंदुओं को अधिक बच्चे पैदा करने के सार्वजनिक बयान ऐसे दे रहे हैं, जैसे वह उनका निजी मसला है। ऐसे बयान अगर थोक के भाव में आते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब भाजपा मूल मुद्दे से भटक जाएगी और देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा जब इस ओर इंगित करते हैं तो बुरा लगता है क्योंकि यह हमारा नितांत निजी मामला है। पर मामला निजी तभी तक रहता है, जब हम चीजों को निजी रहने देते हैं। बेलगाम होकर जहां-तहां घर वापसी के स्टेटमेंट देने से चीजों निजी नहीं रह पाएंगी। दिल्ली की जनता ने इसके विरोध में भी अपना वोट दिया है। नहीं तो दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में साक्षी महाराज ने माहौल तो बिगाड़ ही दिया था।
एक अन्य बात मोदी के पर्सनल व्यक्तित्व से जुड़ी है। वह जब सोने के तार से अपना नाम गुदवाई शेरवानी पहनते हैं और मीडिया में यह बात उछलती है कि मोदी नेदस लाख की ड्रेस पहनी है, तो इसकी कोई सार्थक छाप जनता पर नहीं जाती। मोदी से अधिक मोदी का पहनावा समाचार का विषय वस्तु बने तो इसमें भविष्य के खतरनाक संकेत  छिपे हैं। दूसरी बात, अपने विचार या किसी मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया ट्विट करने के स्थान पर पत्रकारों से मिलिए। धर्म परिवर्तन, घर वापसी ऐसे मुद्दे हैं जिसपर लोग प्रधानमंत्री की राय जानता चाहते हैं। उनकी प्रतिक्रिया से लोगों में उनसे प्यार या उपेक्षा जन्म लेगी। इस मामले में मोदी तो मनमोहन सिंह से भी आगे हैं। वह मीडिया से मिलना ही नहीं चाहते हैं। जनता को अपने सामने सरकार की स्थिति स्पष्ट ही नहीं करना चाहते हैं। हर उस मुद्दे पर, जो राष्ट्रीय स्तर पर असर डालती है उसपर मोदी की या फिर स्पोक्स पर्सन की सफाई (जवाब) आनी चाहिए। मोदी की कई मुद्दों पर अस्पष्टता ने भी दिल्ली में भाजपा के वोट काटे ही होंगे।

दिल्ली चुनाव परिणाम ने स्पष्ट संकेत दिया है जो कहो, उसे करो। जो करो उसके बारे में बताओ। जो बताओ वह तथ्यहीन नहीं हो। यानी प्रशासक और उसको चुनने वाली जनता के बीच कोई बिचौलिया नहीं हो।
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(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )
 
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गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

भगवद गीता वाया सुषमा @ संघ






 









कॅंवल भारती की क़लम से 




गीता पर ख़तरनाक  राजनीति


तवलीन सिंह वह पत्रकार हैं, जिन्होंने लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी के पक्ष में लगभग अन्धविश्वासी पत्रकारिता की थी। लेकिन अब वे भी मानती हैं कि ‘मोदी सरकार ने जब से सत्ता सॅंभाली है, एक भूमिगत कट्टरपंथी हिन्दुत्व की लहर चल पड़ी है।’ उनकी यह टिप्पणी साध्वी निरंजन ज्योति के ‘रामजादे-हरामजादे’ बयान पर आई है। लेकिन इससे कोई सबक लेने के बजाए यह भूमिगत हिन्दू एजेण्डा अब ‘गीता’ के बहाने और भी खतरनाक साम्प्रदायिक लहर पैदा करने जा रहा है। 
मोदी सरकार की विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने हिन्दू धर्म ग्रन्थ गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने की मांग की है। उन्होंने गीता की वकालत में यह भी कहा है कि मनोचिकित्सकों अपने मरीजों का तनाव दूर करने के लिए उन्हें दवाई की जगह गीता पढ़ने का परामर्श देना चाहिए। इससे भी खतरनाक बयान हरियाणा के मुख्यमन्त्री मनोहरलाल खटटर का है, जिन्होंने यह मांग की है कि गीता को संविधान से ऊपर माना जाना चाहिए। इसका साफ मतलब है कि खटटर भारतीय संविधान की जगह गीता को भारत का संविधान बनाना चाहते हैं।

दरअसल, मोदी के प्रधानमन्त्री बनते ही संघपरिवार का हिन्दुत्व ऐसी कुलांचे मार रहा है, जैसे उसके लिए भारत हिन्दू देश बन गया है और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत में पेशवा राज लौट आया है। शायद इसीलिए गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने की मांग करके संघपरिवार और भाजपा के नेता भारत को पाकिस्तान बनाना चाहते हैं। जिस तरह पाकिस्तान में कटटर पंथियों के दबाव में ईश-निन्दा कानून बनाया गया है, और उसके तहत अल्लाह और कुरान की निन्दा करने वालों के विरुद्ध फांसी तक की सजा का प्राविधान है, जिसके तहत न जाने कितने बेगुनाहों को वहां अब तक मारा जा चुका है। ठीक वही स्थिति भारत में भी पैदा हो सकती है, यदि कटटर हिन्दुत्व के दबाव में गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित कर दिया जाता है। शायद कटटरपंथी हिन्दू पाकस्तिान जैसे ही खतरनाक हालात भारत में भी पैदा करना चाहते हैं, क्योंकि गीता के राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित होने का मतलब है, जो भी गीता की निन्दा करेगा, वह राष्ट्र द्रोह करेगा और जेल जाएगा। इस साजिश के आसान शिकार सबसे ज्यादा दलित और आदिवासी होंगे, क्योंकि ये दोनों समुदाय गीता के समर्थक नहीं हैं। इसके तहत अन्य अल्पसंख्यक, जैसे मुस्लिम, ईसाई और सिख समुदाय भी हिन्दू कटटरपंथियों के निशाने पर रहेंगे। वैसे इस खतरनाक मुहिम की शुरुआत नरेन्द्र मोदी ने ही जापान के प्रधानमन्त्री को गीता की प्रति भेंट करके की थी।

सवाल यह भी गौरतलब है कि गीता में ऐसा क्या है, जिस पर आरएसएस और भाजपा के नेता इतने फिदा हैं कि उसे राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करना चाहते हैं? सुषमा जी कहती हैं कि उससे मानसिक तनाव दूर होता है। मानसिक तनाव तो हर धर्मग्रन्थ से दूर होता है। ईसाई और मुस्लिम धर्मगुरुओं की मानें, तो बाइबिल और कुरान से भी तनाव दूर होता है। सिखों के अनुसार ‘गुरु ग्रन्थ साहेब’ के पाठ से भी तनाव दूर होता है। अगर तनाव दूर करने की विशेषता से ही गीता राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित होने योग्य है, तो बाइबिल, कुरान और गुरु ग्रन्थ साहेब को भी राष्ट्रीय ग्रन्थ क्यों नहीं घोषित किया जाना चाहिए। लेकिन, यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि बाइबिल, कुरान और गुरु ग्रन्थ साहेब में सामाजिक समानता का जो क्रान्तिकारी दर्शन है, क्या वैसा क्रन्तिकारी दर्शन गीता में है? क्या गीता के पैरोकार यह नहीं जानते हैं कि गीता में वर्णव्यवस्था और जातिभेद का समर्थन किया गया है और उसे ईश्वरीय व्यवस्था कहा गया है? यदि गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ बनाया जाता है, तो क्या वर्णव्यवस्था और जातिभेद भी भारत की स्वतः ही राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं हो जाएगी? क्या आरएसएस और भाजपा के नेता इसी हिन्दू राष्ट्र को साकार करना चाहते हैं, तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि भारत में लोकतन्त्र है और जनता ऐसा हरगिज नहीं होने देगी।

यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा के नेताओं का गीता-शिगूफा यादव समाज को, जो अपने को कृष्ण का वंशज मानता है, भाजपा के पक्ष में धु्रवीकृत करने की सुनियोजित राजनीति है। उत्तर प्रदेश और बिहार में यादवों की काफी बड़ी संख्या है, जो वर्तमान राजनीति में मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के वोट बैंक बने हुए हैं। लेकिन आरएसएस और भाजपा के नेता प्रतीकों की जिस राजनीति में अभी भी जी रहे हैं, उसका युग कब का विदा हो चुका है। आज की हिन्दू जनता 1990 के समय की नहीं है, जो थी भी, उसमें भी समय के साथ काफी परिवर्तन आया है। कुछ मुट्ठीभर कटटरपंथियों को छोड़ दें, तो आज के समाज की मुख्य समस्या शिक्षा, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं की है, मन्दिर और गीता-रामायण की नहीं है। अतः यदि भाजपा गीता के सहारे यादव समाज को लक्ष्य बना रही है, तो उसे सफलता मिलने वाली नहीं है। (8 दिसम्बर 2014)






गीता, कृष्ण और भाजपा

ऐसा लगता है कि आरएसएस और भाजपा ने उत्तर भारत के यादवों को पार्टी से जोड़ने के लिए गीताका कार्ड खेला है। इसमें उन्हें सफलता तो मिलनी नहीं है, पर इस बहाने गीता, कृष्ण और यादव बहस के केन्द्र में जरूर आ गए हैं।

1.
पूर्ण बहुमत की सत्ता में आते ही आरएसएस और भाजपा के नेताओं को लगने लगा कि गीताको राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित किया जाना चाहिए। इससे पहले ऐसी आवाज न उठी थी और न उठाने की उन्होंने हिम्मत की थी। चूँकि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इस अलोकतान्त्रिक मांग का विरोध नहीं किया है, इसलिए यह मानना होगा कि उनकी स्वीकृति भी इस खेल में है, अन्यथा क्या मजाल कि सुषमा स्वराज गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने की मांग करें और मरीजों को गीता पढ़ाने का परामर्श देने के लिए मनोचिकित्सकों को कहें। और, क्या मजाल हरियाणा के मुख्यमन्त्री मनोहर लाल खटटर की कि वे यह बेहूदा वक्तव्य दें कि गीता का स्थान भारत के संविधान से ऊपर होना चाहिए। यह दो नेताऔं का खेल नहीं है, वरन् इसके पीछे एक सोची-समझी योजना काम कर रही है। कोई खटटर से पूछे कि क्यों होना चाहिए संविधान से ऊपर गीता का स्थान? इसका कोई तार्किक जवाब है उनके पास? अगर होगा भी, तो वही रटटू तोता वाला घिसा-पिटा जवाब कि यह आस्था का सवाल है, कि आस्था संविधान से ऊपर होती है, और यह कि गीता पर करोड़ों हिन्दुओं की आस्था है। अब आस्था है, तो क्या उसे संविधान से ऊपर कर दोगे? संविधान में आस्था का कोई महत्व नहीं है क्या? जब इसी आस्था का तर्क देकर कोई कटटरपंथी मुसलमान अपने कुरान को संविधान से ऊपर बताता है, तो आरएसएस और भाजपा के लोग ही ज्यादा हाय-हाय करते हैं।

2.
सुषमा स्वराज के भी तर्क देखिए, कितने हास्यास्पद हैं! वे कहती हैं कि गीता को पढ़ने से मानसिक तनाव दूर होता है, शान्ति मिलती है। तनाव से मुक्ति और शान्ति तो कुरान को पढ़ने से भी मिलती है, बाइबिल को पढ़ने से भी मिलती है और गुरुग्रन्थ साहेब का पाठ करने से भी मिलती है। इस बात की तस्दीक मुसलमानों, ईसाईयों और सिक्खों से की जा सकती है। अगर वे इसकी तस्दीक कर दें, तो सुषमा जी गीता के साथ ही कुरान, बाइबिल और गुरुग्रन्थ साहेब को भी राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित कर दीजिए। क्या कर सकेंगी ऐसा?

3.
एक सवाल मेरे जहन में यह पैदा हो रहा है कि अगर मोदी सरकार ने गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित कर दिया, हालांकि ऐसा होना सम्भव नहीं है, तो क्या हो सकता है? मेरा जवाब यह है कि अगर ऐसा हुआ, तो भारत में पाकिस्तान जैसे फासीवादी हालात पैदा हो जाएंगे । जिस तरह वहाँ कटटरपंथियों के दबाव में ईश-निन्दा कानून बना है, जिसकी आड़ में वहाँ के मौलवी अपने विरोधियों पर ईश-निन्दा करने का इलजाम लगाकर उन्हें ठिकाने लगवा देते हैं, उसी तरह की स्थिति भारत में हो भी जाएगी। यहाँ भी गीता की निन्दा करने वाले को राष्ट्र-द्रोह के अपराध में जेल में डाल दिया जाएगा। इसकी आड़ में कटटरपंथी हिन्दू अपने विरोधियों को ही ठिकाने लगाने का काम करेंगे और उनकी हिंसा के आसान शिकार दलित और आदिवासी ही ज्यादा होंगे, क्योंकि वे स्वयं को हिन्दू फोल्ड में नहीं मानते हैं। उनकी हिंसा की जद में मुसलमान और ईसाई तो पहले से ही हैं, तब वे और भी उनके निशाने पर आ जाएंगे।

4.
चूँकि ब्राह्मणों ने कृष्ण की असुर-विरोधी छवि पहले ही बनाई हुई है, इसलिए आरएसएस उसी का लाभ उठा रही है। उसके सारे कथावाचक आजकल इसी अभियान में लगे हुए हैं। कल ही मेरे शहर के एक ग्रामीण अंचल में कथावाचिका मंजू शास्त्री प्रचार कर रही थीं कि असुरों ने पृथ्वी पर देवताओं का जीना मुश्किल कर दिया था, जिनके विनाश के लिए कृष्ण को जन्म लेना पड़ा था। यह एक ऐसा मिथ्या प्रचार है, जिसका कृष्ण के जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। ब्राह्मणों ने कंस के संहारक के रूप में जिस कृष्ण को पुराणों में गढ़ा है, वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक कृष्ण इन्द्र विरोधी, आर्य विरोधी, देवता विरोधी और उनकी पशुबलि तथा यज्ञ-संस्कृति के विरोधी थे। कृष्ण का जिस इन्द्र से भयानक संघर्ष चला था, उसका वर्णन कोई कथावाचक नहीं करता। आरएसएस के इतिहासकार भी इसे बताना नहीं चाहते। अगर वे उसे बता देंगे, तो कृष्ण के नाम से जो मिथकीय लीलाधाम उन्होंने खड़ा किया है, वह ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा और उसी के साथ उनका भोगेश्वर भी समाप्त हो जाएगा।
कृष्ण पाण्डवों का समकालीन समझे जाते हैं, पर यह भूल है। धर्म-दर्शन और इतिहास के महाविद्वान धर्मानन्द कोसम्बी ने अपने ग्रन्थ भारतीय संस्कृति और अहिंसा’ (1948) में लिखा है कि कुरु देश में कौरवों और पाण्डवों का साम्राज्य होना और उसी के पड़ोस में, उसी समय, कंस का साम्राज्य होना सम्भव ही नहीं है। उनके अनुसार, महाभारत में कंस और कौरवों का कोई भी सम्बन्ध नहीं दिखाया गया है। पौराणिक काल में कृष्ण की और पाण्डवों की कथाओं का मिश्रण किया गया, पर उसे विश्वसनीय मानने के लिए कोई आधार नहीं है। कोसम्बी लिखते हैं कि कृष्ण गोरक्षक थे, जबकि इन्द्र के यज्ञों में गोहत्या होती थी। इसी गोहत्या को रोकने के लिए कृष्ण ने इन्द्र के साथ युद्ध किया था, जिसमें इन्द्र की पराजय हुई थी। कोसम्बी ने लिखा है कि यदि कृष्ण ने इन्द्र की अधीनता स्वीकार करके उसके नाम से यज्ञ-याग आरम्भ कर दिए होते, तो कृष्ण भी दिवोदास की तरह ऋग्वेद के एक प्रसिद्ध व्यक्ति होते। पर, गायें मारकर यज्ञ करना कृष्ण को पसन्द नहीं था, इसलिए इन्द्र ने उन्हें शत्रु माना और उनकी गणना असुर-राक्षसों में की गई। लेकिन कोसम्बी कहते हैं कि मध्य हिन्दुस्तान में कृष्ण की पूजा बराबर जारी थी। इसीलिए ब्राह्मण उन्हें अवतार बनाने पर मजबूर हुए, पर उनका विकृतीकरण करके। कोसम्बी के अनुसार, दास और आर्यों के संघर्ष से उत्पन्न बलिपूर्वक यज्ञ करने की प्रथा का एकमात्र विरोधी देवकीनन्दन कृष्ण ही था।
कोसम्बी के अन्य विवरण से पता चलता है कि सप्तसिंधु प्रदेश पर कब्जा करने के बाद जब इन्द्र पूर्व की ओर बढ़ा, तो उसका सामना कृष्ण से ही हुआ था। कृष्ण ने दस हजार सेना के साथ अंशुमति नदी के समीप, जहाँ उनकी छावनी थी, इन्द्र से मुकाबला किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद के आठवें मण्डल में सूक्त 85 में मिलता है। यहाँ कृष्ण को तेज चलने वाला असुरकहा गया है। कृष्ण की व्यूह रचना जबरदस्त थी, जिससे इन्द्र को पराजय का सामना करना पड़ा था। इससे बौखला कर इन्द्र ने कृष्ण के देश में एक प्रसूतिगृह में घुसकर वहाँ सभी गर्भवती स्त्रियों को मार डाला था। भागवत के दशवें स्कन्ध से यह भी पता चलता है कि इन्द्र ने कृष्ण समर्थक कुछ अन्य स्त्रियों पर तेज पानी की बारिश करके (धार छोड़कर) उन्हें मारने की कोशिश की थी, तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर (स्त्रियों को किसी पर्वत की आड़ में ले जाकर) उनकी रक्षा की थी। ये वर्णन बताते हैं कि जो कृष्ण स्वयं असुर या अनार्य थे, वह असुरों का वध कैसे कर सकते थे?

5.
यह भी देख लेना चाहिए कि क्या गीता से कृष्ण का कोई सम्बन्ध बनता है? गीता गुप्तकाल में किसी समय लिखी गई रचना है, जिसे बाद में महाभारत में जोड़ा गया होगा। गीता की रचना से कृष्ण का कोई भी सम्बन्ध नहीं है। कृष्ण का समय ऋग्वेद का समय है, जबकि गीता के अध्याय 13 के चैथे श्लोक में ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमöिर्विनिश्चितैःमें ब्रह्मसूत्रका उल्लेख स्वयं बताता है कि गीता की रचना ब्रह्मसूत्रके बाद हुई थी। ब्रह्मसूत्रके रचयिता वादरायण माने जाते हैं, जिनका समय 300 ई. था। वह जैमिनी के समकालीन थे। पौराणिक परम्परा वादरायण और वेदव्यास को एक मानती है और पांच हजार साल पहले के महाभारत काल में ले जाती है, पर राहुल सांकृत्यायन कहते हैं कि इसका खण्डन स्वयं वेदान्त सूत्रकार के सूत्र करते हैं, जिनमें सिर्फ बुद्ध के दर्शन का ही नहीं, बल्कि उनकी मृत्यु (483 ई.पू.) से छह-सात सदियों से भी पीछे अस्तित्व में आने वाले बौद्ध दार्शनिक सम्प्रदायों- वैभाषिक, योगाचार, माध्यमिक- का खण्डन है। बुद्धवचनों में, जो ऐतिहासिक माने जाते हैं, कहीं भी राम-रावण और कृष्ण-कंस का जिक्र नहीं है, पर पांचवी शताब्दी में लिखी गईं अट्ठकथाओं में जरूर उनका उल्लेख मिलता है। इस प्रकार  गीता चैथी या पांचवी सदी की रचना होनी चाहिए, जिसका देवकीनन्दन कृष्ण से कोई ऐतिहासिक मेल नहीं बैठता है।

6.
गीता का धर्म वर्णव्यवस्था और जातिभेद का धर्म है। गीता में कृष्ण के मुॅंह से अध्याय 4 के श्लोक 13 में कहलवाया गया है कि चातुर्वर्ण व्यवस्था का कर्ता मैं ही हूॅं, यह मेरे द्वारा ही रचा गया है।दूसरे शब्दों में गीता में वर्णव्यवस्था ईश्वरीय व्यवस्था है। ऐसे ग्रन्थ को अगर राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित कर दिया जाता है तो वर्णव्यवस्था भी स्वतः ईश्वरीय व्यवस्था घोषित हो जाएगी, जबकि कृष्ण की वर्णव्यवस्था में कोई आस्था नहीं थी। (9 दिसम्बर 2014) 

कॅंवल भारती हमज़बान में भी
 

(लेखक-परिचय:
प्रगतिशील -अम्बेडकरवादी विचारक, कवि, आलोचक और पत्रकार
जन्म: 4 फ़रवरी 1953 को उत्तर प्रदेश के रामपुर  में
शिक्षा: स्नात कोत्तर
सृजन: पंद्रह वर्ष की उम्र से  ही कविताई। दलित इतिहास, साहित्य,  राजनीति और पत्रकारिता पर हिंदी में अब तक 40 पुस्तकें प्रकाशित.
ब्लॉग:   कँवल भारती के शब्द 
संप्रति: स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
संपर्क: kbharti53@gmail.com) 


   

 
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बुधवार, 3 दिसंबर 2014

16 मई के बाद बदलते रंग हज़ार



लोकतंत्र का भगवाकरण















कृष्णकांत की क़लम से

 हमारे संविधान की उद्देशिका कहती है कि भारत एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। संविधान के अनुसार राजसत्ता का कोई अपना धर्म नहीं होगा। संविधान भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन कुछ राज्यों में पहले से मौजूद राज्य सरकारें और अब केंद्र में पूर्ण बहुमत की नरेंद्र मोदी सरकार लगातार प्रशासनिक संस्थाओं, शिक्षा और संस्कृति के भगवाकरण का प्रयास कर रही है. हालांकि नरेंद्र मोदी कहते हैं कि 'भारत इक्कीसवीं सदी में विश्वगुरु बनेगा', लेकिन लक्षण इसके विपरीत दिख रहे हैं. केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद एक तरफ तो देशभर के शिक्षण संस्थानों में एक खास तरह का राजनीतिक एजेंडा बड़ी खामोशी से लागू करने का प्रयास किया जा रहा है, तो दूसरी ओर प्रशासन पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नियंत्रण की कोशिश के क्रम में संघ के हिंदूवादी कार्यक्रमों में मंत्रियों व अधिकारियों को शामिल किया जा रहा है.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ हमेशा यह दावा करता रहा है कि वह सरकारों के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करता। लेकिन संघ की ओर से एक नई पहल चर्चा में है. केंद्रीय मंत्रियों के सभी निजी स्टाफ को सप्ताह में एक दिन संघ की शाखा में शामिल होने को कहा गया है. मीडिया में आई खबरों में कहा गया कि हाल ही में संघ के कर्ता-धर्ताओं और केंद्रीय मंत्रियों के बीच मीटिंग हुई, जिसमें संघ ने मंत्रियों से कहा कि वे अपने निजी स्टाफ को रविवार को संघ की शाखा में जरूर भेजें. संघ के इस प्रस्ताव पर मंत्री राजी भी हैं. मंत्रियों के निजी स्टाफ को हर रविवार सुबह संघ की शाखा में पहुंचना होता है. इसके लिए उन्हें एक दिन पहले मोबाइल से जानकारी दे दी जाती है.

दिल्ली में वर्ल्ड हिंदू फाउंडेशन के तत्वावधान में 21 नवंबर को तीन दिवसीय विश्व हिंदू कांग्रेस शुरू हुई, जिसमें विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख अशोक सिंघल ने घोषणा की कि 'दिल्ली में 800 साल बाद पहली बार दिल्ली में हिंदू स्वाभिमानियों के हाथ सत्ता आई है.' सिंघल ने कहा कि विहिप का उद्देश्य निर्भीक अजेय हिंदू बनाना है। हिंदू राष्ट्र की घोषणा करने वाले इस सम्मेलन में दलाई लामा और संघ प्रमुख मोहन भागवत व अन्य लोगों के अलावा सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी, वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण को भी शिरकत करनी है.

दूसरी तरफ संघ और केंद्र सरकार के बीच समन्वय के लिए एक समिति बनाई गई है और उस समिति की हाल ही में बैठक हुई। बैठक में सरकार का नेतृत्‍व कृषिमंत्री राधा मोहन सिंह ने किया। श्रम मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल, कृषि राज्य मंत्री संजीव कुमार बालियान केंद्र की ओर से शामिल होने वाले अन्य मंत्री थे। आरएसएस की ओर से बैठक में संघ और भाजपा के बीच समन्वय के लिए हाल ही में नियुक्त कृष्‍ण गोपाल, वरिष्ठ संघ पदाधिकारी सुरेश सोनी, भाजपा महासचिव राम लाल, राम माधव और पी मुरलीधर राव मौजूद थे। बैठक में संघ से जुड़े संगठनों स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, लघु उद्योग भारती और सहकार भारती के पद‌ाधिकरियों ने भी हिस्सा लिया। खबरों के मुताबिक, सरकार और संघ के बीच समन्यव की दिशा में पहल की जा चुकी है। बैठक में आर्थिक गतिविधियों से जुड़े मंत्रियों और संघ पदाधिकारियों के बीच नीतिगत पर चर्चा हुई. मंत्रियों ने संघ पदाधिकारियों के मशविरों को नोट किया. बैठक में शामिल एक पदाधिकारी का कहना था कि हाल में सरकार के कई फैसले संघ की नीतियों के अनुरूप नहीं रहे, ऐसे मुद्दों पर संघ की नीतियों को लेकर समझ बनाने के लिए यह बैठक हुई और आगे भी होती रहेगी।

शिक्षा की बात करें तो हालत और बदतर हैं. शिक्षा के लिए ऐसे ऐसे तर्क और ज्ञान पेश किए जा रहे हैं कि कोई हाईस्कूल पास व्यक्ति भी अपना सिर पीट ले. हरियाणा में भाजपा सरकार बनते ही बच्चों से बीस—बीस रुपये लेकर गोसेवा पर लि​खी गई दो किताबें बांटी गई हैं. बीते 30 जून को गुजरात सरकार ने सर्कुलर जारी कर राज्य के 42,000 सरकारी स्कूलों को निर्देश दिया कि वह पूरक साहित्य के तौर पर दीनानाथ बत्रा की नौ किताबों के सेट को शामिल करें। इन्हें पढ़ना सब बच्चों के लिए अनिवार्य होगा। दीनानाथ बत्रा संघ से जुड़ी संस्था विद्या भारती के मुखिया हैं। ये किताबें पूरी तरह संविधान की उस भावना की धज्जियां उड़ाती हैं कि सरकार वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देगी. यह किताबें घोर अज्ञान को बढ़ावा देने वाली और बेहद हास्यास्पद हैं. किताब की कुछ बानगियां देखें— 'भारत के नक्शे में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, बांगलादेश, श्रीलंका और म्यांमार अर्थात बर्मा भी शामिल है। ये सब 'अखंड भारत' का हिस्सा हैं।'

बत्रा साहेब की किताब ‘तेजोमय भारत’ का एक हिस्सा देखें—'अमेरिका आज स्टेम सेल रिसर्च का श्रेय लेना चाहता है, मगर सच्चाई यह है कि भारत के बालकृष्ण गणपत मातापुरकर ने शरीर के हिस्सों को पुनर्जीवित करने के लिए पेटेंट पहले ही हासिल किया है. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस रिसर्च में नया कुछ नहीं है और डा मातापुरकर महाभारत से प्रेरित हुए थे. कुंती के एक बच्चा था जो सूर्य से भी तेज था. जब गांधारी को यह पता चला तो उसका गर्भपात हुआ और उसकी कोख से मांस का लंबा टुकड़ा बाहर निकला. व्यास को बुलाया गया जि‍न्होंने मांस के उस टुकड़े को कुछ दवाइयों के साथ पानी की टंकी में रख दिया. बाद में उन्होंने मांस के उस टुकड़े को 100 भागों में बांट दिया और उन्हें घी से भरी टंकियों में दो साल के लिए रख दिया. दो साल बाद उसमें से 100 कौरव निकले. महाभारत में इस किस्से को पढ़ने के बाद मातापुरकर को अहसास हुआ कि स्टेम सेल की खोज उनकी अपनी नहीं है बल्कि वह महाभारत में भी दिखती है. (पृष्ठ 92-93)

इसी किताब में वे दावा करते हैं कि 'हम जिसे मोटरकार के नाम से जानते हैं उसका अस्तित्व वैदिक काल में बना हुआ था. उसे ‘अनश्व रथ’ कहा जाता था. अनश्व रथ ऐसा रथ होता था जो घोड़ों के बिना चलता था, यही आज की मोटरकार है, ऋग्वेद में इसका उल्लेख है.' (पृष्ठ 60) बत्रा की यह किताब ऐसे हास्यास्पद आख्यानों से भरी है. यह विश्वगुरु बनने की तैयारी कर रहे देश के बच्चों को दी जानी वाली अनिवार्य शिक्षा की बानगी है. यह संयोग नहीं है कि संघ परिवार से संबंधित तमाम साहित्य ऐसे असाधारण ज्ञान विज्ञान से भरा पड़ा है. क्या स्मृति ईरानी जैसी कम शिक्षित टेलीविजन अदाकारा को इसीलिए मानव संसाधन मंत्रालय दिया गया ताकि संघ परिवार बेरोकटोक ऐसी पोंगापंथियों का प्रसार कर सके? 

संघ की स्थापना से ही उसका सपना रहा है कि इतिहास को हिंदूवादी नजरिये से लिखा जाए. केंद्र में नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के बाद येल्लाप्रगदा सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद का अध्यक्ष बनाया गया. राव इतिहासकार के तौर पर इस बात के हिमायती हैं कि महाभारत और रामायण को 'ऐतिहासिक घटनाएं' सिद्ध किया जाए. अध्यक्ष बने राव ने हास्यास्पद दुस्साहस दिखाते हुए ‘भारतीय जाति व्यवस्था’ की अच्छाइयां खोज लीं और घोषणा भी कर डाली कि उनका एजेंडा महाभारत की घटनाओं की तारीख निश्चित करने के लिए शोध कराने का है.
यह सब इत्तेफाक नहीं है. गुजरात और मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकारें पहले से ही ऐसी कोशिश करती रहीं हैं. करीब एक दशक से मध्य प्रदेश के मिस्टर क्लीन मुख्यमंत्री शिवराज चौहान शिक्षण संस्थानों के भगवाकरण की कोशिश में लगे हैं. अगस्त 2013 में मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने राजपत्र के जरिये  अधिसूचना जारी कर मदरसों में भी गीता पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया था. इसमें प्रदेश मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त सभी मदरसों में कक्षा तीन से आठ तक सामान्य हिंदी की तथा पहली और दूसरी की विशिष्ट अंग्रेजी और उर्दू की पाठ्यपुस्तकों में भगवतगीता में बताए प्रसंगों पर एक एक अध्याय जोड़े जाने की अनुज्ञा की गई थी और इसके लिए राज्य के पाठ्य पुस्तक अधिनियम में बाकायदा जरूरी बदलाव भी किए गए थे. विवाद पैदा हुआ तो अपने को भाजपा के अटल विहारी वाजपेयी साबित करने की कोशिश कर रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह निर्णय वापस ले लिया.

इसके पहले 2011 में ​ही शिवराज सरकार स्कूलों के पाठ्यक्रम में गीता लागू करवा कर चुकी थी. शिवराज सरकार ने शासकीय स्कूलों में योग के नाम पर ‘सूर्य नमस्कार’ भी अनिवार्य किया था, बाद में उसे ऐच्छिक विषय बना दिया गया. स्कूल शिक्षकों को ऋषि कहकर संबोधित करना हो या मिड डे मील के पहले भोजन मंत्र पढ़ाने का आदेश, यह सब संस्थानों के भगवाकरण की ही कड़ी थे. वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका देवपुत्र को सभी स्कूलों में अनिवार्य तौर पर पढ़ाए जाने का फैसला लिया था. संघ और भाजपा की प्राथमिकता शिक्षा का स्तर सुधारने और उसे वैज्ञानिक बनाने के बजाय हिंदू शिक्षा देने की है जिसकी वकालत आए दिन दीनानाथ बत्रा या बाबा रामदेव करते रहे हैं.

शिक्षा का अधिकार कानून अब तक पूरे देश में लागू नहीं हो सका है. पूरे देश के बच्चे कुपोषण और अशिक्षा से जूझ रहे हैं. ऐसे में संघ के रिमोट से चल रही केंद्र और राज्य सरकारें देश भर के संस्थानों में हिंदू एजेंडा लागू करने में जुटी हैं. यह देश के सौ सालों के स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत और भारतीय संविधान की आत्मा को ध्वस्त करने की कोशिशें हैं. कालांतर में इनके परिणाम भयावह होंगे. (जनपथ से )
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(रचनाकार-परिचय:
जन्म:  30 अगस्त 1986 को  उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में।
शिक्षा: इलाहाबाद विवि से पत्रकारिता में एमए।
सृजन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताएं और कहानियां प्रकाशित
संप्रति:  दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में बतौर चीफ सब एडीटर कार्यरत
संपर्क : krishnkant1986@gmail.com)
  
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सोमवार, 1 दिसंबर 2014

झारखंड को किसने लूटा 14 में 9 साल किया भाजपा ने शासन

 भाजपा नामक ढोल की पोल














मुजाहिद नफ़ीस की क़लम से 

झारखंड में भी चुनाव है। पहले चरण के बाद आज यानी दो दिसंबर को दूसरे चरण के तेहत राज्य के 20 विधानसभा क्षेत्रों में वोट पडेंगे। इनमें से अधिकतर इलाके नक्सल प्रभावित हैं। इसका कारण है, पहाड़ों से घिरे पेड़-पौधे से आच्छादित इन क्षेत्रों में विकास के सूरज का न पहुंच पाना। इधर, बड़ी तेजी से विकास के नाम पर हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति कर सत्ता शिखर पर पहुंची, भाजपा ने विस पर कब्जे की मुहिम शुरू कर दी। प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी अध्यक्ष तक चुनाव प्रचार में डगर-नगर हुए। दूसरे दल अपेक्षाकृत प्रचार-प्रसार कम कर रहे हैं। लेकिन इनमें बड़ा अंतर यह है कि भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता झूठ बेशर्मी की हद तक बोल रहे हैं। आईये उनकी बातों की सचाई को आंकड़े के आईने में झिलमिल देखें। भारतीय जनता पार्टी के चेहरे द्वारा ये कहा जा रहा है कि जिन्होंने झारखण्ड को लूटा है व विकास नहीं होने दिया, उन्हें बेदखल करना है. स्थायी सरकार ही राज्य का विकास कर सकती है जैसे लोकलुभावन नारे के साथ अपनी सभा की शुरुआत करते हैं। मैं यहाँ आपके सामने कुछ आंकड़े रखना चाहता हूँ जो इन दोनों बातो को ख़ारिज करते हैं। 
लगभग 60 % समय तक भाजपा रही सत्ता में
पहला कि झारखण्ड का गठन 15 नवंबर 2000 को हुआ था। उस वक़्त भाजपा ने सत्ता संभाली थी। तब से लेकर आज तक आचार संहिता लागू होने तक कुल 5121 झारखण्ड में शासन रहा है। अलग-अलग करके देखें तो भाजपा नें कुल 2982 दिन, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा नें 306 दिन, निर्दलीय नें  1212 दिन, व राष्ट्रपति शासन 621 दिन रहा है। कुल का अगर हम प्रतिशत निकालें तो लगभग 60 % समय तक भाजपा का ही शासन रहा है। जितने मुख्य कंपनियों के साथ राज्य की सम्पदा के साथ खिलवाड़ करने वाले समझौते हुए हैं वो सब के सब महान राष्ट्र भक्त भाजपा के शासन काल में हुए हैं। झारखण्ड को तो भाजपा नें ही सबसे ज्यादा लूटा है।  (स्रोत )

स्थायी गुजरात सरकार के विकास का सच
इधर, भाजपा समेत मीडिया ने गुजरात को सबसे विकसित राज्य के मॉडल की तरह पेश किया। हालांकि ईमानदार सर्वे और पत्रकारों की रपटों ने इसकी भी कलई खोल दी। झारखंड में चुनाव प्रचार के दौरान भोपूओं द्वारा शोर किया जा रहा है कि स्थायी सरकार ही राज्य में विकास करा सकती है। अगर मोदी जी के मॉडल गुजरात का उदाहरण लें तो हम पाते हैं की राज्य में गृह विभाग, सूचना जनसम्पर्क विभाग, विधायी कार्य एवं संसदीय कार्य, जलसंसाधन/नर्मदा, राजस्व विभाग एवं जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विभाग इंचार्ज सेक्रेटरी के भरोसे चल रहे हैं। (स्रोत गुजरात इंडिया)

राज्य मे माननीय उच्च न्यायलय अहमदाबाद के समक्ष 320 जनहित याचिकाएं आज की तिथि तक वर्ष 2014 दाखिल हो चुकी हैं। (स्रोत ) याचिकाएं शिक्षा, नौकरी, मानवाधिकार, जबरन भूमि अधिग्रहण आदि जनहित के व्यापक मुद्दो की हैं। राज्य में मानवाधिकार आयोग के दो सदस्यों में से एक, रजिस्ट्रार, लॉ (विधि) अधिकारी के पद रिक्त है (स्रोत ), राज्य में अलपसंख्यक आयोग नहीं है। (स्रोत टाइम्स ) राज्य के बाल अधिकार आयोग के सदस्यों के अधिकार आज तक वर्णित नहीं हैं।   शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत वर्ष 2013 में 49 बालको व 2014 में 614 के दाखले हुए हैं। (स्रोत ऑउटलुक ) ये साफ़ दिखाता है कि राज्य में कितना विकास स्थाई सरकार नें किया है। 

दरअसल भाजपा के सूरमा नेता जनता को गुमराह कर सत्ता को हथियाने वाले हैं। जनता के मुद्दे बिजली, रोज़गार, पानी, पर्यावरण से भटका कर सुनहरी सपनो की दुनिया को दिखा कर देश का निजीकरण कर अपनी झोली भरने का मामला है। 

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 11मार्च 1982 को बाराबंकी उत्तर प्रदेश में
शिक्षा: स्नातक
सृजन: छिटपुट इधर-उधर
संप्रति: बाल अधिकार कार्यकर्ता, रांची
संपर्क: nafeesmujahid43@gmail.com )
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मंगलवार, 20 मई 2014

उत्तर प्रदेश में लहर के मायने



सपा, बसपा और हमारी भूमिका















कॅंवल भारती की क़लम से

 उत्तर प्रदेश में लोकसभा-2014 के चुनाव-परिणाम इसलिये नहीं चैंकाते हैं कि भाजपा की इतनी बड़ी जीत अप्रत्याशित थी, बल्कि इसलिये चैंकाते हैं कि इसने बसपा का सूपड़ा साफ कर दिया है और सपा को पाॅंच सीटों पर समेट दिया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा-बसपा की इस शर्मनाक पराजय के दूरगामी अर्थ हैं। कुछ चिन्तकों का कहना है कि मोदी की लहर ने जाति और धर्म की राजनीति को खत्म का दिया है। किन्तु यदि ऐसा सचमुच होता, तो भाजपा को इतनी बड़ी जीत कभी हासिल नहीं हो सकती थी। जाति-धर्म से मुक्त राजनीति की जीत तब तो मानी जा सकती थी, जब यदि आम आदमी पार्टी को यह सफलता हासिल हुई होती। पर भाजपा की इस जीत का अर्थ ही यह है कि जनता ने जाति और धर्म के नाम पर भाजपा के पक्ष में मतदान किया है। क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि संघ परिवार और मोदी की टीम ने मिलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणवाद का पुनरुद्धार किया है? किन्तु इस पुनरुद्धार के लिये अगर कोई जिम्मेदार है, तो वह है सपा-बसपा का नेतृत्व, जिसके पास भाजपा से लड़ने के लिये कोई कारगर राजनीतिक हथियार नहीं था। मुलायमसिंह यादव ने मोदी को मुस्लिम-विरोधी बताकर राजनीति की, तो मायावती ने उन्हें दलित-विरोधी बताकर, और इसी राजनीति ने हिन्दू मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकृत करने का काम किया। सवाल यह नहीं है कि भाजपा और मोदी मुस्लिम-दलित-विरोधी नहीं हैं, सचमुच वे हैं। पर बात सिर्फ इतनी भर नहीं है। यह बहुत ही छोटा नजरिया है, उन्हें देखने का। भाजपा, मोदी और संघपरिवार को इससे बड़े नजरिये से देखा जाना चाहिए था। यह नजरिया सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का होना चाहिए था, जो एक फासीवादी अवधारणा है। दलित और मुस्लिम-विरोध तो इस राष्ट्रवाद का छोटा-सा हिस्सा भर है। यदि इस नजरिये से मायावती और मुलायम सिंह ने भाजपा, मोदी और संघपरिवार के विरुद्ध जनता में एक वैचारिकी विकसित की होती, तो शायद भाजपा के लिये दिल्ली अभी आसान नहीं होती। लेकिन यह काम वे इसलिये नहीं कर सके, क्योंकि इसके लिये जिस पढ़ाई-लिखाई की जरूरत है, वह न सपा-मुखिया मुलायमसिंह यादव के पास है और न बसपा-सुप्रीमों मायावती के पास है। दोंनों पार्टियों के नेता जब रैलियों और अन्य मंचों पर बोलते हैं, तो वे कहीं से भी पढ़े-लिखे नजर नहीं आते। वैचारिकी तो एकदम सपा नेताओं के पास नहीं है। वे सिर्फ नाम के समाजवादी हैं, उसकी ए, बी, सी तो दूर, ‘ए’ भी ठीक से नहीं जानते हैैं। उन्हें सुनकर लगता ही नहीं कि वे समाज और राजनीति में कोई बदलाव चाहते हैं।
जिस निर्भया के बहाने बलात्कार के विरुद्ध कड़े कानून बनाने के लिये देश-व्यापी जनान्दोलन हुआ, वहाॅं मुलायमसिंह यादव अपनी चुनावी रैलियों में यह कह रहे थे कि ‘बच्चे हैं, गलती हो जाती है, तो क्या उन्हें फाॅंसी दे दी जाय?’ पूरे देश की महिलाओं ने मुलायमसिंह के इस बेहूदे और शर्मनाक बयान को स्त्री-विरोधी बयान के रूप में लिया और उन्हें एक सम्वेदनहीन अयोग्य शासक के रूप में देखा। इसी तरह जब सपा नेता आजम खाॅं ने कारगिल की जीत को मुस्लिम सैनिकों की जीत कहकर इस इरादे से अपनी पीठ ठोकी कि मुसलमान  खुश होकर उन्हें अपने कन्धों पर बैठा लेंगे, तो वहाॅं उनकी ‘तालीमी जहालत’ ही ज्यादा नजर आ रही थी, जो यह नहीं समझ सकती थी कि उन्होंने अपनी समाजवादी राजनीति की ही कब्र नहीं खोद दी है, बल्कि मुसलमानों को भी मुख्यधारा से दूर कर दिया है। यह इसी का परिणाम हुआ कि न सिर्फ मुसलमानों में इसकी अच्छी प्रतिक्रिया नहीं हुई, बल्कि सपा-समर्थक हिन्दू मतदाता भी सपा के खिलाफ ध्रुवीकृत हो गये। 
इतना ही नहीं, प्रदेश की जनता यह भी देख रही थी कि सपा-बसपा के नेता संसद में काॅंग्रेस की जन-विरोधी नीतियों में काॅंगे्रस का खुलकर समर्थन कर रहे थे और संसद के बाहर काॅंगे्रस का विरोध करके जनता की आॅंखों में धूल झोंक रहे थे। वे उस काॅंगे्रस सरकार के संकट-मोचक बने हुए थे, जिसने आम आदमी को जीने-लायक हालात में भी नहीं छोड़ा था। इन सपा-बसपा नेताओं की आॅंखों पर अज्ञानता की इतनी मोटी पट्टी चढ़ी हुई है कि उन्हें यह तक दिखाई नहीं दे रहा है कि कम्प्यूटर युग की जनता न सिर्फ सब जानती है, बल्कि उनके खेल को समझती भी है। इस जनता ने यह जान लिया था कि सपा-बसपा के ये मुखिया केन्द्र में अपनी राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल सिर्फ अपने निजी हित में सौदेबाजी करने के लिये करते हैं।

                वे लोकतन्त्र की दुहाई जरूर देते हैं, पर खुद फासीवादी चरित्र से मुक्त नहीं हैं। यही कारण है कि वे भाजपा और संघपरिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझने का वैचारिक स्तर नहीं रखते। याद कीजिए, नोएडा में एक मस्जिद का अवैध निर्माण गिराने के आरोप में सपा-सरकार ने एक आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिया था, पर जब वही गलत काम आजम खाॅं ने रमजान के महीने में मदरसा गिराकर रामपुर में किया, तो फेसबुक पर उसका विरोध करने पर उसी सरकार ने मुझे गिरफ्तार करा लिया। इस घटना के विरोध में देश-व्यापी प्रदर्शनों के बावजूद सरकार ने मेरे विरुद्ध दायर मुकदमा वापिस नहीं लिया। क्या यह सपा का फासीवादी चरित्र नहीं है? यही नहीं, जब मायावती ने भी इस सम्बन्ध में मौन रहकर सपा सरकार का समर्थन किया और लोकतन्त्र का गला घोंटने वाली सपा सरकार की तानाशाही के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठायी, तो उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता ने यह समझने में जरा जरा भी देर नहीं लगायी कि मायावती भी सांस्कृतिक फासीवाद को ही पसन्द करती हंै और लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सवाल उनके लिये बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है।

                बहुत से दलित विचारक और राजनीतिक विश्लेषक 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार के लिये मायावती की सोशल इंजीनियरिंग को श्रेय देते हैं। पर मैंने उस समय भी इसका खण्डन करते हुए लिखा था कि यह सोशल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लम्बे समय से हाशिए पर बैठे ब्राह्मणों ने सत्ता में आने के लिये मायावती का साथ पकड़ा था, क्योंकि यह वह समय था, जब उनकी प्रिय पार्टियों--काॅंगे्रस और भाजपा--का पतन हो चुका था और सपा को वे पसन्द नहीं करते थे। इस तरह मायावती उनके डूबते जहाज के लिये तिनके का सहारा भर थीं। अतः, कहना न होगा कि ब्राह्मण स्वार्थवश बसपा से जुड़ा थे, न कि दलितों के प्रति उनका हृदय-परिवर्तन हुआ था। इसलिये जैसे ही मोदी ने भाजपा का रास्ता साफ किया, ब्राह्मणों ने अपनी घर-वापसी करने में तनिक भी देर नहीं लगायी। अगर सच में कोई सोशल इंजीनियरिंग होती, तो क्या बसपा का सूपड़ा साफ होता?

                मैं लगभग 1996 से ही डा. आंबेडकर की जातिविहीन और वर्गविहीन वैचारिकी के सन्दर्भ में कांशीराम और मायावती की राजनीति को कटघरे में खड़ा करता आ रहा हॅंू, जिसके लिये मैं दलित चिन्तकों और बुद्धिजीवियों की निन्दा का पात्र भी हूॅं। पर, मैं जातिवादी तरीके से नहीं सोच सकता। मेरे लिये दलित-विमर्श सामाजिक परिवर्तन का विमर्श है। इस नजरिये से मैं जब भी मायावती की राजनीति को देखता हूॅं, तो वह मुझे उनकी जाति को भुनाने वाली राजनीति ही दिखायी देती है। वह मुझे कहीं से भी परिवर्तन की राजनीति नजर नहीं आती है। इसलिये वर्तमान लोकसभा में बसपा की शर्मनाक ‘अनुपस्थिति’ पर हमारे दलित चिन्तक मायावती के पक्ष में चाहे कितने ही ‘किन्तु-परन्तु’ करके बात करें, पर मेरा आज भी यही मानना है कि उन्होंने डा. आंबेडकर के आन्दोलन को गर्त में ढकेल दिया है। उनकी राजनीति का सबसे बड़ा विद्रूप यह है कि उसका कोई सांस्कृतिक आन्दोलन नहीं है। अगर होता, जिस दलित वोट पर मायावती सबसे ज्यादा आत्ममुग्ध होती हैं और जिसकी पूरी कीमत वसूल कर वे सवर्णों को टिकट देती हैं, वह वोट आज उनसे खिसका नहीं होता। यह जानकर तो उनको जरूर तगड़ा झटका लगा होगा कि उनके चमार और जाटव वोटर ने इस बार मोदी के पक्ष में भाजपा को वोट दिया है। शायद मायावती इस अनहोनी को नहीं समझ सकंेगी, क्योंकि एक तो जनता के साथ उनका संवाद न के बराबर है और दूसरे वे दलित बुद्धिजीवियों को नापसन्द करती हैं। शायद ‘बसपा’ भारत की एकमात्र पार्टी है, जिसकी अपनी कोई बौद्धिक सम्पदा नहीं है। दलित बुद्धिजीवी केवल जाति के आधार पर ही इस पार्टी से सहानुभूति रखते हैं। इसलिये इस तथ्य को समझना जरूरी है कि बसपा-सुप्रीमो, जो किंगमेकर ही नहीं, सौदेबाजी करके प्रधानमन्त्री बनने का भी सपना देख रही थीं, धड़ाम से नीचे कैसे गिर गयीं? इसका एक बड़ा कारण है नयी पीढ़ी के मध्यवर्गीय दलित युवकों का हिन्दू चेतना से जुड़ाव। इस पीढ़ी के साथ लगातार सम्पर्क और संवाद करने के बाद यह तथ्य सामने आया कि वे अपने दिन-भर का अधिकांश समय अपने हिन्दू दोस्तों के साथ व्यतीत करते हैं, जो उनके सहपाठी और सहकर्मी दोनों हैं। उनके साथ उनका उठना-बैठना, घूमना-फिरना और खाना-पीना सब होता है। वे एक-दूसरे के घरों में आते-जाते हैं, सुख-दुख में शरीक होते हैं। इस बीच जाति के सामाजिक तनाव उनके बीच नहीं होते। ये सम्बन्ध यहाॅं तक विकसित हुए हैं कि दलित युवक अपने हिन्दू दोस्तों के साथ मन्दिर भी जाते हैं और उनके देवी-जागरण जैसे धार्मिक कार्यों में भी भाग लेते हैं। इस दोस्ती ने दलित युवकों को सिर्फ हिन्दू चेतना से ही नहीं जोड़ा, बल्कि उन्हें हिन्दू राजनीति से भी जोड़ दिया। लेकिन इसी हिन्दू राजनीति ने उन्हें मुस्लिम-विरोधी भी बना दिया, जिसमें उनके कुछ कटु सामाजिक अनुभवों ने भी अपनी भूमिका निभायी है। चूॅंकि इन दलित युवकों के घरों में भी कोई सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं हुआ है, इसलिये उनका मोदी के पक्ष में भाजपा के साथ जाना बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है। मायावती चाहें तो अपने दलित वोट बैंक का सर्वे करा सकती हैं और देख सकती हैं कि जिस जमीन पर वे खड़ी हैं वह किस कदर दरक गयी है।

                सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ? हमेशा हाथी पर बटन दबाने वाले कुछ दलितों का तर्क है कि जब मायावती हाथी से गणेश तक जा सकती हैं, तो वे सीधे गणेश को वोट क्यों नहीं दे सकते? जब मायावती परशुराम का गुणगान कर सकती हंै, तो वे मोदी का समर्थन क्यों नहीं कर सकते? जब मायावती को भाजपा मुख्यमन्त्री बना सकती हैं, तो वे मोदी को प्रधानमन्त्री क्यों नहीं बना सकते? ये वे तर्क हैं, जिनका कोई जवाब मायावती के पास नहीं है। कुछ दलितों का तो यहाॅं तक कहना है कि अगर बसपा की पिछली सीटें बरकरार रहतीं और भाजपा की सीटें बहुमत से कुछ कम आतीं, तो मायावती को भाजपा को ही समर्थन देकर अपना उल्लू सीधा करना था।

                दरअसल, जाति और वर्गविहीन समाज की दिशा में डा. आंबेडकर की जो रेडिकल वैचारिकी थी, मायावती न केवल उससे दूर हैं, बल्कि उसे जानना भी नही चाहती हैं। यही कारण है कि उन्होंने सत्ता में आने के लिये जातियों को मजबूत करने का ‘शार्टकट’ रास्ता अपनाया। इसके सिवाय उन्होंने दलितों में कोई रेडिकल सांस्कृतिक आन्दोलन पैदा करने की कोशिश कभी नहीं की। सत्ता के ‘शार्टकट’ रास्तों की परिणति हमेशा लाभकारी नहीं होती है, वह धूल भी चटा देती है।

                बहरहाल, देश की जनता ने यह जानते हुए भी कि मोदी घोर साम्प्रदायिक और मुस्लिम-विरोधी हैं, यह जानते हुए भी कि उनका राजनीतिक एजेण्डा लोकतन्त्र का नहीं, हिन्दू राष्ट्रवाद का है और यह जानते हुए भी कि वे बड़े पूॅंजीपतियों के हित में सामाजिक न्याय, सुरक्षा और परिवर्तन की संवैधानिक व्यवस्थाओं को बदल सकते हैं, उन्हें भारी बहुमत से जिताया है। मैं तो कहुॅंगा कि देश की निकम्मी वाम-सेकुलर शक्तियों ने थाल में सजाकर मोदी को सत्ता सौंप दी है। इसलिये अब प्रगतिशील चिन्तकों, लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों की भूमिका और भी बढ़ गयी है, जिसे हमें अब पूरी निर्भीकता और जिम्मेदारी से निभाना होगा।

(17 मई 2014)

(लेखक-परिचय:
प्रगतिशील -अम्बेडकरवादी विचारक, कवि, आलोचक और पत्रकार
जन्म: 4 फ़रवरी 1953 को उत्तर प्रदेश के रामपुर  में
शिक्षा: स्नात कोत्तर
सृजन: पंद्रह वर्ष की उम्र से  ही कविताई। दलित इतिहास, साहित्य,  राजनीति और पत्रकारिता पर हिंदी में अब तक 40 पुस्तकें प्रकाशित.
ब्लॉग:   कँवल भारती के शब्द 
संप्रति: स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
संपर्क: kbharti53@gmail.com
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