बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

समय की बेचैनियों से बनीं शाहनाज़ की कविताएँ
















राजेश जोशी की क़लम से
आँसुओं से भीगी ताज़ा लहू में डूबी कविता
लिखती हूँ काट देती हूँ फिर लिखती हूँ !

शाहनाज़ की ये कविताएँ गुस्से , खीज , गहरी करूणा ,स्मृतियों और हमारे समय की
बेचैनियों से बनी कविताएँ हैं। इनमें गहरी हताशा का स्वर है तो कहीं उसी के बीच से कौंधती उम्मीद की रौशनी भी मौजूद है। यहाँ रौशनी की एक बूंद को अपनी मुट्ठी में बंद कर लेने का खेल है तो यह प्रश्न भी कि आज़ाद चीजों को कै़द करने का ऐसा खेल क्यों होता है। यहाँ कभी न लौट सकने वाले बचपन की स्मृतियाँ है और यह दुख भी कि उस समय जब घर में सब होते थे मतलब दादा-दादी, नाना-नानी, बड़े पापा , चाचा, मामी , ख़ाला उस संयुक्त परिवार के हम आख़री गवाह है। तेजी से बदल रहे शहर, रिश्ते और गुम हो रही चीजें और चिट्ठियाँ हैं,  जिनका शायद कुछ आँखों को अभी भी इंतज़ार है। यह कविताएँ अपनी बात कहने के लिये किसी कविताई कौतुक, अलंकारिकता या भाषायी बंतुपन का आसरा नहीं ढूंढती। इनमें हिन्दी उर्दू की मिली-जुली जबान का वह स्वाद है जो शाहनाज़ को अपने शहर की बोलचाल से प्राप्त हुआ है । शाहनाज़ के पाँव अपनी ज़मीन को पहचानते हैं और अपने आसमान को भी ।
ये कविताएँ उन दृश्यों को सामने रखती है जो अतिपरिचित हैं, सबके देखेभाले हैं और शायद इसीलिए रचना में वो हमसे अक्सर अदेखे रह जाते हैं । वो हमारे एकदम आसपास बिखरे जीवन के दृश्य है। इनमें आँसू भी है और लहू भी। ये कविताएँ जीवन के बहुत ज़रूरी सवालों को बेलाग ढंग से और बेख़ौफ़ होकर उठाती है। इसमें किसी तरह का संकोच या हकलाहट नहीं। पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री की अस्मिता से जुड़े सवाल हों या अल्पसंख्यक समुदाय और तथाकथित सेक्यूलर राजनीति के कारनामे, कहीं भी शाहनाज़ विमर्श के सीमित दायरों में अपने को कैद नहीं रखती , वह उससे बाहर आकर उन सच्चाइयों को वर्गीय राजनीतिक समझ के साथ देखने की कोशिश करती हैं। इसलिए उसकी दृष्टि बहुत हद तक अस्मिताविमर्शवादियों से अलग भी है ।
हमारे समय की राजनीति जिसे हमेशा ही सिर्फ चुनाव के समय ही हाशिये से बाहर के लोग याद आते हैं पर ये कविताएँ विचलित कर देने वाले सवाल खड़े करती हैं। हमारे आसपास बिखरी सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक विद्रूपताएँ इन कविताओं की उठी हुई उंगली की जद में हैं। यह ऐसी राजनीति है जिसे जब वोट मांगना होता है तब ही वह नाक पर रूमाल रखकर मुसलमानों के मोहल्ले में प्रवेश करती है । जहाँ जख़्मों से चूर ज़िन्दगी ख़ून सी छलकती है । यह एक ऐसा जीवन है जो स्टिललाइफ़ की तरह पिछले साठ सालों में ठहर-सा गया है । जिसे किसी न किसी बहाने से सरकारें बार बार भूल जाती हैं । आलोचना की सुई किसी एक ही तरफ ठहरी हुई नहीं है । इसी तरह उम्र बीस साल कविता में वह कहती है-

तुम्हारा परिचय भी हुआ होगा
हिंसा ,उत्पीड़न ,यातना ,अपमान जैसे शब्दों से
मौलवियों और उलेमाओं की इस दुनिया में
रोने पर पाबन्दी है और ज़ोर से हँसना मना है
तबलीग करने वाले सिर्फ फ़र्ज़ बताते हैं
और हक़ सिर्फ़ किताबों में लिखे जाते हैं ।
शाहनाज़ का यह पहला कविता संग्रह है। एक नये कवि को पढ़ते हुए पाठक यही ढूंढता है कि उसमें नया क्या है और कितना चौकन्ना है वह अपने समय और आसपास के जीवन को देखने, जानने बूझने के लिये। शाहनाज़ की ये कविताएँ अपने आसपास के प्रति सजग भी हैं और इनमें कई अलक्षित कोनों में झाकने और चीजों को नये तरह से देखने और कहने का कौशल भी है। इन कविताओं से किसी हिस्से को अलग करके उद्धृत करना मुश्किल है। वस्तुतः ये कविताएँ एक मुकम्मिल इकाई की तरह हैं। इसलिए उन्हें हिस्सों में नहीं पढ़ा जा सकता। कई बार तो किसी पंक्ति या पंक्तियों को अलग करके रखने में यह भी डर होता है कि संदर्भ से कट जाने पर उनका अर्थ ही न बदल जाये ।
शाहनाज़ सोचती है कि इन वर्कों पर कुछ और भी लिखा जा सकता था। जैसे:

एक सफ़र का क़िस्सा
जंग की भयावहता
डरावनी यादें
चूल्हे की आग ,छीनी गई रोटी
झील में उभरता सूरज
अकेली शाम की खामोशी
या तुम्हारी काली आँखें

पर आँसू और खुशी , गुस्से और नफ़रत , तकलीफ़ें और मोहब्बत लिखते हुए उसे लगता है कि ऐसा लिखना-कुछ ऐसा ही जैसे लिखना / खुद को बचाये रखने का रास्ता हो।
 

मुझे पूरा विश्वास है कि इस संग्रह को पढ़ने के बाद आप विचलित हुए बिना नहीं रह सकते और इस संग्रह की अनेक कविताएँ और अनेक पंक्तियाँ आपके मन में उतरकर आपकी स्मृति का हिस्सा हो जायेंगी ।


दख़ल से प्रकाशित शहनाज़ के कविता-संग्रह दृश्य के बाहर की भूमिका


शहनाज़ इमरानी की कविताएं पढ़ें



(लेखक-परिचय:
जन्म: 18 जुलाई 1946 को नरसिंहगढ़, मध्य प्रदेश में
प्रमुख कृतियाँ :     कविता-संग्रह- समरगाथा (लम्बी कविता), एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हँसी और दो पंक्तियों के बीच, दो कहानी संग्रह - सोमवार और अन्य कहानियाँ, कपिल का पेड़, तीन नाटक - जादू जंगल, अच्छे आदमी, टंकारा का गाना। इसके अतिरिक्त आलोचनात्मक टिप्पणियों की किताब - एक कवि की नोटबुक, पतलून पहना आदमी (मायकोवस्की की कविताओं का अनुवाद), धरती का कल्पतरु(भृतहरि की कविताओं का अनुवाद)
कुछ लघु फिल्मों के लिए पटकथा लेखन भी
सम्मान : शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान और माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार के साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार  से विभूषित। )
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बुधवार, 18 जनवरी 2012

नींद उसकी ख़्वाब उसके ज़िक्र उसका हर घड़ी















सिराज फैसल खान की ग़ज़लें 

1

मुल्क़ को तक़सीम करके क्या मिला है
अब भी जारी नफरतों का सिलसिला है

दी है कुर्बानी शहीदोँ ने हमारे
मुल्क तोहफे में हमें थोड़ी मिला है

हुक्मरानोँ ने चली है चाल ऐसी
आम लोगोँ के दिलोँ मेँ फासिला है

क्योँ झगड़ते हैँ सियासी चाल पर हम
मुझको हर हिन्दोस्तानी से गिला है

अब नज़र आता नहीँ कोई मुहाफिज़
हाँ लुटेरोँ का मगर एक क़ाफिला है

लुट रहा है मुल्क अब अपनोँ के हाथोँ
सोचो के आज़ाद हो कर क्या मिला है

2
चाहने वाला मेरा जब बेवफा हो जायेगा
तो किसी दूजे से मेरा राब्ता हो जायेगा

तू जो रुठा तो मनाने का हुनर आ जायेगा
रुठने से तेरे मेरा फायदा हो जायेगा

तुम बड़े या हम बड़े इस बहस मेँ रक्खा है क्या
आइये मैदान मेँ ये फैसला हो जायेगा

नीँद उसकी ख़्वाब उसके ज़िक्र उसका हर घड़ी
रफ़्ता रफ़्ता ये उसी मेँ गुमशुदा हो जायेगा

झूठ के दरबार मेँ सच बोलता है किसलिए
सबकी नज़रोँ मेँ दिवाने तू बुरा हो जायेगा

तू भी अब वैसा नहीँ और मैँ बदल सकता नहीँ
अब हमारे दरम्याँ भी फासिला हो जायेगा

मैँ मिटा किसके लिये, कैसे मिटा, क्योँकर मिटा
वक्त आने पर तुझे ख़ुद तर्जुबा हो जायेगा

फिर चुभेँगे फूल भी पैरोँ मेँ काँटोँ की तरह
एक दिन जब तू अचानक ही जुदा हो जायेगा

जितना भी चर्चा है मेरा जितनी शोहरत है मेरी
तू मेरी हो जा मेरा सब कुछ तेरा हो जायेगा

3

ग़ज़ल मेँ हर कोई महबूब की बातेँ सुनाता है
ये फ़ैसल है जो अपने मुल्क के मुद्दे उठाता है

किसानोँ के लिए अब ख़ुदकुशी है एक हल शायद
लुटेरोँ का कबीला देश की संसद चलाता है

वो भूखा मर रहा है शर्म लोगोँ को नहीँ आती
जो जलती धूप मेँ खेतोँ मेँ अपने हल चलाता है

यहाँ का मीडिया है मुल्क का सबसे बड़ा दुश्मन
जो दिल्ली चाहती है ये वही बंसी बजाता है

अय सूरज दोस्त मेरे इसको तू औकात बतला दे
अकेला जान के दरिया मुझे आँखेँ दिखाता है

अमीरी के नशे मेँ ये भी तुझको याद ना आया
तेरा इक भाई इस शहर मेँ रिक्शा चलाता है

ग़ज़ल के फूल अपनी डायरी मेँ टाँक देता हूँ
किसी की गोद मेँ बच्चा कोई जब मुस्कुराता है

क़लम से ही तेरी बुनियाद जब चाहूँ हिला दूँ मैँ
मैँ शायर हूँ मुझे तलवार से तू क्या डराता है

4
कोई टोपी तो कोई अपनी पगड़ी बेच देता है
मिले गर भाव अच्छा जज भी कुर्सी बेच देता है

तवाइफ फिर भी अच्छी है कि वो सीमित है कोठे तक
पुलिस वाला तो चौराहे पे वर्दी बेच देता है

जला दी जाती है ससुराल मेँ अक्सर वही बेटी
कि जिस बेटी की ख़ातिर बाप किडनी बेच देता है

कोई मासूम लड़की प्यार मेँ कुर्बान है जिस पर
बनाकर वीडियो उसकी वो प्रेमी बेच देता है

ये कलयुग है कोई भी चीज़ नामुमकिन नहीँ इसमेँ
कली, फल, पेड़, पौधे,  फूल माली बेच देता है

उसे इंसान क्या हैवान कहने मेँ भी शर्म आए
जो पैसोँ के लिए अपनी ही बेटी बेच देता है

जुए मेँ बिक गया हूँ मैँ तो हैरत क्योँ है लोगोँ को
युधिष्ठर तो किसी चौपड़ पे पत्नी बेच देता है

चमन मेँ जब से ये गन्दी हवा आयी है मग़रिब से
मेरा हर फूल अब साँपोँ को तितली बेच देता है

5
रोज़ नया एक ख़्वाब सजाना भूल गए
हम पलकोँ से बोझ उठाना भूल गए

साथ निभाने की कसमेँ खाने वाले
भूले तो सपनोँ मेँ आना भूल गए

जब से तुमने नज़र मिलाना छोड़ दिया
हम लोगोँ से हाथ मिलाना भूल गए

उनसे मिलने उनके घर तक जा पहुँचे
क्योँ आये हैँ यार बहाना भूल गए

झूठोँ ने सारी सच्ची बातेँ सुन लीँ
सूली पर मुझको लटकाना भूल गए

पीने वाले मस्जिद तक कैसे पहुँचे
हैरत है ग़ालिब मैख़ाना भूल गए

चकाचौँध मेँ बिजली की ऐसे खोये
कब्रोँ पर हम दीये जलाना भूल गए

मार दिया सुकरात को सबने सम देकर
बातोँ को वो ज़हर पिलाना भूल गए

दर्द पे कुछ लिखने की मैँने क्या सोची
मीर भी अपना दर्द सुनाना भूल गए

अंग्रेजी का भूत चढ़ा ऐसा सिर पर
बच्चे हिन्दी मेँ तुतलाना भूल गए

6
फिर रक़ीबोँ से उसने मुलाकात की
कर रहा है तिज़ारत वो जज़्बात की

बस गया अब तो सावन मेरी आँख मेँ
अब ज़रुरत नहीँ मुझको बरसात की

ज़िन्दगी मेँ कभी पास आया ना वो
रोज़ ख़्वाबोँ मेँ जिसने मुलाकात की

उसके बारे मेँ पहरोँ न सोचा करो
तितलियाँ मत उड़ाओ ख़यालात की

फूल खिल जायेँगे रुत बदल जाएगी
चूड़ियाँ जब बजेँगी तेरे हाथ की

इसलिए हो गया है ख़ुदा भी ख़फा
जब भी खोले हैँ लब आपकी बात की

ज़िन्दगी का सफर तन्हा कटता नहीँ
आ ज़रुरत है मुझको तेरे साथ की


7

अगर नेताओँ की चलती यहाँ मेले नहीँ लगते
शहीदोँ की चिता पर भीड़ के रेले नहीँ लगते

अगर हर एक औरत दिल से 'नेहरु जी' सी हो जाती
तो बच्चे दूसरोँ के इनको 'सौतेले' नहीँ लगते

बहुत से शायरोँ का नाम है लेकिन न जाने क्योँ
वो शायर मीर-ओ-ग़ालिब के हमेँ चेले नहीँ लगते

तुम्हारी और मेरी दोस्ती मुमकिन नहीँ जानाँ
कि पौधे पर करेले के कभी केले नहीँ लगते

नुमाइश रोज़ लगती है यहाँ ख़्वाबोँ ख़यालोँ की
मगर दिल मेँ तुम्हारी याद के ठेले नहीँ लगते

जो अपना रंग, मज़हब, वेष- भूषा एक सी होती
तो हम हिन्दोस्तानी भाई अलबेले नहीँ लगते


( परिचय: जन्म: 10 जुलाई १९९१ शहीदोँ के नगर शाहजहाँपुर के एक छोटे से गाँव महानन्दपुर मेँ
शिक्षा: पहले  गाँव के मदरसे और प्राथमिक विद्यालय मेँ हुयी।फिर शाहजहाँपुर के इस्लामिया इन्टर कॉलेज  से इन्टरमीडिएट . वर्तमान मेँ यहीँ के गाँधी फ़ैज़-ए-आम कॉलेज मेँ बी. एस. सी. के छात्र।
सृजन:  बचपन से साहित्य मेँ रुचि ।कई नेट पत्रिकाओँ मेँ कवितायेँ और ग़ज़लेँ ।
सम्मान: कविताकोश सम्मान-२०११
ब्लॉगखुशबु और आंसू
अपने बारे लिखते हैं : तुम्हारी सादगी ने ही मुझे शायर बनाया है तुम्हीँ ने तो सिखाया है बिना उस्ताद के लिखना
संपर्क:+91-7668666278 )


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बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले!
















सैयद शहरोज़ कमर की कलम से  
 

कई बोलियों भाषा के देश हिन्दुस्तान में अपनी बहुरंगी सांस्कृतिक विविधता की तरह ही बरसों पहले एक हिन्दुस्तानी भाषा का जन्म हुआ.ऐसी ज़बां जिसमें स्थानीय बोली बानी के साथ प्राचीन संस्कृत और फारसी अरबी भी खिल खिला रही थी.कालांतर में इसी लश्करी और हिन्दवी से उर्दू और हिन्दी जैसी भाषा अमल में आई.उर्दू अपनी सोंधी मीठास और गंगा जमनी तहजीब की बतौर प्रतीक अब भी आम जनों के लबों पर आज़ाद है.मौक़ा सितारों  से झिलमिलाती पर्व दीपावली का हो, तो बरबस उर्दू के ख्यात शायर फ़िराक गोरखपुरी याद आते हैं: शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले!



भले आज उर्दू एक सम्प्रदाय विशेष की भाषा बन कर क़ैद हो गयी हों.लेकिन उसके साहित्य ने वसुधव कुटुंब बकम को साकार किया है.ठेठ भारतीय जीवन की तपिश, उसके उल्लास को शायरों ने हमेशा अल्फाजों का झूमर पहनाया है. यह सिलसिला ज़बान की पैदाइश से उसके परवान तक कायम है.  बहुत पहले के शायरों, जैसे मसवी 'कदम राव पदम राव' के रचयिता 'निजामी', सूफीकवि अमीर खुसरो, दक्षिण भारत के वाली दकनी, क़ुतुब अली के नाम से ख्यात मुहम्मद अली कुतुब, 'इंद्रसभा' के कवि 'अमानत', उत्तर भारत के  फ़ाइज़ देहलवी, शायर अफ़जल, गज़लों के इमाम मीर तकी मीर और गंगा-जमनी तहजीब के रूहेरवां 'नज़ीर अकबराबादी' के नाम सहज ही लब पर आ जाते हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाने में आज का उर्दू शायर भी खूने जिगर होम कर रहा है.


सरदार अहमद अलीग जब गुनगुनाते हैं.दीपों की फुलवारी कुछ इस तरह खुशबू लुटाती है:
 
फिर आ गई दीवाली की हँसती हुई यह शाम
रोशन हुए चिराग खुशी का लिए पयाम।
यह फैलती निखरती हुई रोशनी की धार
उम्मीद के चमन पे यह छायी हुई बहार।
यह ज़िंदगी के रुख पे मचलती हुई फबन
घूँघट में जैसे कोई लजायी हुई दुल्हन।
शायर के इक तखय्युले-रंगी का है समां
उतरी है कहकशां कहीं, होता है यह गुमां।




ग़ज़ल के रंग में उमर अंसारी की लंबी नज़्म यूँ चमकती है:


रात आई है यों दीवाली की
जाग उट्ठी हो ज़िंदगी जैसे।
जगमगाता हुआ हर एक आँगन
मुस्कराती हुई कली जैसे।
यह दुकानें यह कूचा-ओ-बाज़ार
दुलहनों-सी बनी-सजीं जैसे।
मन-ही-मन में यह मन की हर आशा
अपने मंदिर में मूर्ति जैसे।


उर्दू के एक विख्यात शायर नाजिश प्रतापगढ़ी का अंदाज़ देखिए:


बरस-बरस पे जो दीपावली मनाते हैं
कदम-कदम पर हज़ारों दीये जलाते हैं।
हमारे उजड़े दरोबाम जगमगाते हैं
हमारे देश के इंसान जाग जाते हैं।
बरस-बरस पे सफीराने नूर आते हैं
बरस-बरस पे हम अपना सुराग पाते हैं।
बरस-बरस पे दुआ माँगते हैं तमसो मा
बरस-बरस पे उभरती है साजे-जीस्त की लय।
बस एक रोज़ ही कहते हैं ज्योतिर्गमय
बस एक रात हर एक सिम्त नूर रहता है।


इस जश्न पर एक नया शायर महबूब राही इन शब्दों में अपनी भावनाओं का इज़हार करता है:
 

दीवाली लिए आई उजालों की बहारें
हर सिम्त है पुरनूर चिरागों की कतारें।
सच्चाई हुई झूठ से जब बरसरे पैकार
अब जुल्म की गर्दन पे पड़ी अद्ल की तलवार।
नेकी की हुई जीत बुराई की हुई हार
उस जीत का यह जश्न है उस फतह का त्योहार।
हर कूचा व बाज़ार चिराग़ों से निखारे
दीवाली लिए आई उजालों की बहारें।


उर्दू के मशहूर आलोचक हैं आल अहमद सुरूर. जब उनकी शायरी कैनवास पर दौडती है, तो दीवाली की दमक में बुराइयों का अँधेरा मिटाने और अच्छाइयों का अंजोर फैलाने की पाक तमन्ना सामने आती है:

यह बामोदर, यह चिरागां
यह कुमकुमों की कतार
सिपाहे-नूर सियाही से बरसरे पैकार।'

यह इंबिसात का गाजा परी जमालों पर
सुनहरे ख्वाबों का साया हँसी ख़यालों पर।
यह लहर-लहर, यह रौनक,
यह हमहमा यह हयात
जगाए जैसे चमन को नसीमे-सुबह की बात।
गजब है लैलीए-शब का सिंगार आज की रात
निखर रही है उरुसे-बहार आज की रात।

इन आँधियों में बशर मुस्करा तो सकते हैं
सियाह रात में शम्मे जला तो सकते हैं।

और चलते-चलते उर्दू के जनकवि नजीर अकबराबादी की बानगी देखिये:
 

हर एकदीवाली मकां में जला फिर दीया दीवाली का
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ
दीवाली का
सभी के दिल में समां भा गया
दीवाली का
किसी के दिल को मज़ा खुश लगा
दीवाली का
अजब बहार का दिन है बना
दीवाली का
मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई
पुकारते हैं कि लाला दिवाली है आई
बताशे ले कोई, बर्फी किसी ने तुलवाई
खिलौनेवालों की उनसे ज़्यादा बन आई।

भास्कर के लिए लिखा गया.
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रविवार, 11 सितंबर 2011

तुम ही छिटक के दूसरे का चांद हो गईं।
















पंकज शुक्ल की क़लम से

फरवरी की पांचवीं तारीख़

वो जो हलचल है तेरे दिल में मेरी हरकत है,
मेरी जुंबिश ही तेरे हुस्न की ये 
  बरकत है।

मेरी गुस्ताख़ नज़र ने तुझे फिर से देखा,
तू कुछ औऱ खिली, और रंगीं शफ़क़त है।

गुम हूं पास तेरे तू ही ढूंढती मुझको,
मेरे सीने में छिपी क्या ये तेरी हसरत है।

तेरे करीब हूं, फिर भी जुदा सी तू मुझसे,
मेरी तदबीर से संवरी ये किसकी किस्मत है।

तेरा ये गोरा रंग,
फ़ितरत मेरी ये काली सी,
ना तू मंदिर में रहे फिर भी मेरी इबादत है। 



2.

रात इक ख़्वाब सा ..




रात इक ख्वाब सा खटका इन आंखों में,
सहर के साथ ही क्यूं तू घर से निकली।

सुबह की धूप सी गरमी है तेरी सांसों में,
फिर कहीं दूर तू मुझसे बचके निकली।

गुजर न जाए ये लम्हा इसी उलझन में,
मेरे बालिस्त में क्यूं तेरी दुनिया निकली।

मेरे उसूल मेरी नीयत ही मेरा धोखा है,
तू कहीं दूर औ चाहत तेरी मुझसे निकली।

क्यूं रंगरेज हुआ मैं तेरी रंगत पाकर
मेरी हर जुंबिश में तेरी धड़कन निकली।

तेरे हुस्न की हसरत यूं पा ली मैंने
तेरे इनकार में भी अब हां ही निकली।

मेरी मदहोशी का ये असर है तुझ पर
सरे राह तू अब से तनकर निकली। 


3.
 
फिर भूलूं, क्यूं याद करूं..

मैं तारे भी तोड़ लाता आसमां में जाकर,
तुम ही छिटक के दूसरे का चांद हो गईं।

घनघोर घटाटोप से मुझको कहां था डर,
तुम ही चमक के दूर की बरसात हो गईं।

रक्खा बचा के ग़म को तेरे नसीब से,
इतनी मिली खुशी के इफ़रात हो गईं।

गाफिल गिरेह भी होकर था तो मेरा
यक़ीन,
तुम क़ातिल के हाथ जाकर वजूहात हो गईं।
 
 
 
 
 
{कवि-परिचय: जन्म: मंझेरिया कलां (उन्नाव, उत्तर प्रदेश) में । 
शिक्षा:शुरुआती पढ़ाई जोधपुर और फिर गांव के प्राइमरी स्कूल में। कॉलेज की पढ़ाई कानपुर में। सिनेमा की संगत बचपन से। सरकारी नौकरी छोड़ पत्रकारिता सीखी.
फ़न की गर्दिश: अमर उजाला में तकरीबन एक दशक तक रिपोर्टिंग और संपादन। फिर ज़ी न्यूज़ में स्पेशल प्रोग्रामिंग इंचार्ज। प्राइम टाइम स्पेशल, बॉलीवुड बाज़ीगर, मियां बीवी और टीवी, बोले तो बॉलीवुड, भूत बंगला, होनी अनहोनी, बचके रहना, मुकद्दर का सिकंदर, तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे, बेगम की महफिल, वोट फॉर खदेरन और वोट फॉर चौधरी जैसी टीआरपी विनिंग सीरीज़ का निर्माता-निर्देशक रहने के दौरान चंद बेहतरीन साथियों से मिलना हुआ। एमएच वन न्यूज़ और ई 24 की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा। ज़ी 24 घंटे छत्तीसगढ़ का भी कुछ वक्त तक संचालन।
बतौर लेखक-निर्देशक पहली फीचर फिल्म "भोले शंकर" रिलीज़। फिल्म ने शानदार सौ दिन पूरे किए। बतौर पटकथा लेखक-निर्देशक 4 शॉर्ट फिल्में - अजीजन मस्तानी, दंश, लक्ष्मी और बहुरूपिया। चारों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित और प्रशंसित। कई फिल्म फेस्टिवल्स में शामिल। विज्ञापन फिल्मों और कॉरपोरेट फिल्मों के लेखन और निर्देशन में भी सक्रिय।
ब्लॉग: क़ासिद
सम्प्रति: रीजनल एडीटर। नई दुनिया/संडे नई दुनिया।
संपर्क: pankajshuklaa@gmail.com   } 
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सोमवार, 29 अगस्त 2011

केदारनाथ का ईद मुबारक











केदारनाथ अग्रवाल की कलम से


हमको,
तुमको,
एक-दूसरे की बाहों में
बँध जाने की
ईद मुबारक।

बँधे-बँधे,
रह एक वृंत पर,
खोल-खोल कर प्रिय पंखुरियाँ
कमल-कमल-सा
खिल जाने की,
रूप-रंग से मुसकाने की
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।

और
जगत के
इस जीवन के
खारे पानी के सागर में
खिले कमल की नाव चलाने,
हँसी-खुशी से
तर जाने की,
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।





















और
समर के
उन शूरों को
अनुबुझ ज्वाला की आशीषें,
बाहर बिजली की आशीषें
और हमारे दिल से निकली-
सूरज, चाँद,
सितारों वाली
हमदर्दी की प्यारी प्यारी
ईद मुबारक।

हमको,
तुमको
सब को अपनी
मीठी-मीठी
ईद-मुबारक।

रचनाकाल: २१-११-१९७१ 


हिंदी के इस अहम कवि का यह जन्मशती वर्ष है!
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सोमवार, 22 अगस्त 2011

कुरआन,मक्का, तिलिस्म और वसीयत














 बाबुषा कोहली की कवितायें  





















कुरआन की पहली आयत

"सब खूबियाँ 
अल्लाह को,
मालिक जो -
सारे जहां वालों का ;
सारी तारीफें 
तेरी ही हैं ! "
यही है न ,
कुरान  की ,
पहली आयत !
मेरे मौला,
मेरे मालिक -
तेरी ही तो हैं,
सब तारीफें !
गुज़ारिश है ,
एक छोटी-सी -
मानेगा तू?
ले -ले मेरी 
कमजोरियां;
तू अपने सर !
ले- ले मेरे 
गुनाह भी तू ,
अपने सर !
ले - ले मेरी 
ये संगदिली ;
तू अपने सर -
एकदम मेरे
बाप की तरह !
दे दे मुझे तू 
हुक्म ,
कि बदल दूँ 
 ये आयत !
क्या पता -
शायद ,
कुछ शर्म 
आ जाए मुझे !
शायद -
दुरुस्त हो जाऊं ,
मेरे मालिक !

 (मार्च २४,२०११)




















 मक्का 



वह राह -
नहीं जाती
'मक्क़ा' को -
लेकिन
पहुंचाती है
आख़िर में -
'मक्क़ा' ही !
 (अप्रैल 30 , 2011)

वसीयत
अपने पूरे होशो - हवास में
लिख रही हूँ आज मैं 
वसीयत अपनी !


मर जाऊं जब मैं 
खंगालना मेरे कमरे को
टटोलना हर एक चीज़ -


दे देना मेरे ख़्वाब
उन तमाम स्त्रियों को
जो किचन से बेडरूम
और बेडरूम से किचन की दौड़ाभागी में 
भूल चुकी हैं सालों पहले ख़्वाब देखना  !

बाँट देना मेरे ठहाके 
वृद्धाश्रम के उन बूढों में
रहते हैं जिनके बच्चे -
अमेरिका के जगमगाते शहरों में !

टेबल में मेरे देखना
कुछ रंग पड़े होंगे 
दे देना सारे रंग  -
उन जवानों की विधवाओं को
शहीद हो गए थे जो 
बॉर्डर पर लड़ते-लड़ते !

शोखी मेरी ,मस्ती मेरी
भर देना उनकी रग - रग में -
झुक गए कंधे जिनके
बस्ते के भारी बोझ से !


आंसू मेरे दे देना
तमाम शायरों को
हर बूँद से होगी ग़ज़ल पैदा
मेरा वादा  है !


मेरी गहरी नींद और भूख
दे देना 'अंबानियों' औ'  'मित्तलों' को 
बेचारे न चैन से सो पाते हैं
न चैन से खा पाते हैं !


मेरा मान , मेरी आबरू
उस वेश्या के नाम है -
बेचती है जिस्म जो
बेटी को पढ़ाने के लिए !

इस देश के एक-एक युवक को 
पकड़ के लगा देना 'इंजेक्शन'
मेरे आक्रोश का

पड़ेगी इसकी ज़रुरत
क्रान्ति के दिन उन्हें !


दीवानगी मेरी
हिस्से में है
उस सूफ़ी के
निकला है जो सब छोड़ कर ,
ख़ुदा की तलाश में ! 


बस !


बाक़ी बचे -
मेरी ईर्ष्या,
मेरा लालच ,
मेरा क्रोध ,
मेरे झूठ ,
मेरे दर्द -
तो -
ऐसा करना ;
उन्हें मेरे संग ही जला देना !

( मार्च ९,२०११)

तिलिस्म
मत ढूंढो मुझे शब्दों में
मैं मात्राओं में पूरी नहीं
व्याकरण के लिए चुनौती हूँ

न खोजो मुझे रागों में 
शास्त्रीय से दूर आवारा स्वर  हूँ
एक तिलिस्मी धुन हूँ
मेरे पैरों  की थाप
महज कदमताल नहीं
एक आदिम  जिप्सी नृत्य हूँ

अपने पैने नाखूनों को कुतर डालो
मेरी तलाश में मुझे मत नोचो
एक नदी जो सो रही है भीतर कहीं
उसे छूने की चाह में मुझे मत खोदो
मत चीरो फाड़ो 
कि मेरी नाभि से ही उगते हैं रहस्य

इस सुगंध को पीना ही मुझे पीना है
मुझे पा लेना मुट्ठी भर मिट्टी पाने के बराबर है
मुझमें खोना ही  अनंत आकाश को समेट लेना है

स्वप्न हूँ भ्रम हूँ मरीचिका मैं
सत्य हूँ सागर हूँ मैं अमृत ..












परिचय : बाबुशा लिखती हैं, बड़ी झिझक हो रही है . परिचय तो है ही नहीं मेरा ..सच मानिए इस बात को ..! भला एक आवारा रूह का क्या परिचय बनाया जाए ?
क्या परिचय दे दिया जाए ..मैं दो दिन यही बात सोचती रही और ख़लील जिब्रान लगातार याद आते रहे जो जीवन में एक ही बार ठिठके जब किसी ने पूछा कि तुम कौन हो ?
बड़ी मुश्किल !
सच में मेरी पात्रता नहीं है कि कुछ भी मेरे बारे में लिखा जाए.
आप चाहें तो कविताओं के नीचे सिर्फ़ 'बाबुषा कोहली' लिख सकते हैं .

विजय के सारे पदक एक दिन पानी में बह जायेंगे..
कुछ भाव गढ़े जो शब्दों में , वो ही बाक़ी रह जायेंगे..

(यह जानकारी  उनके फेसबुक प्रोफाइल से मिली:
जन्म: कटनी में ६ फरवरी , १९७९
शिक्षा: रानी दुर्गावती विश्विद्यालय से
सम्प्रति:  केन्द्रीव विद्यालय जबलपुर में अंग्रेजी अध्यापन
संपर्क:babusha@gmail.com
ब्लॉग:कुछ पन्ने और बारिस्ता )

 
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रविवार, 7 अगस्त 2011

श्रद्धा जैन की भीगी ग़ज़लें



















 1
मुझसे इतना भी हौसला न हुआ
जब बुरा बन गया, भला न हुआ

ज़ख्म के फूल अब भी ताज़ा हैं
दूर होकर भी फासला न हुआ

तेरी आहट क़दम-क़दम पर थी
ज़िंदगी में कभी खला न हुआ

होने वाली है कोई अनहोनी
वक़्त पर एक फ़ैसला न हुआ

रेज़ा-रेज़ा बिखर गए सपने
लोग कहते हैं मसअला न हुआ

हादसा होते सबने देखा पर
कोई उलझन से मुब्तला न हुआ
2.
जैसे होती थी किसी दौर में, हैवानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में

जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में

उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में

जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में

उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में

नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में

झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में

जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है ‘श्रद्धा’
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में
3.
नज़र में ख़्वाब नए रात भर सजाते हुए
तमाम रात कटी तुमको गुनगुनाते हुए

तुम्हारी बात, तुम्हारे ख़याल में गुमसुम
सभी ने देख लिया हमको मुस्कराते हुए

फ़ज़ा में देर तलक साँस के शरारे थे
कहा है कान में कुछ उसने पास आते हुए

हरेक नक्श तमन्ना का हो गया उजला
तेरा है लम्स कि जुगनू हैं जगमगाते हुए

दिल-ओ-निगाह की साजिश जो कामयाब हुई
हमें भी आया मज़ा फिर फरेब खाते हुए

बुरा कहो कि भला पर यही हक़ीकत है
पड़े हैं पाँव में छाले वफ़ा निभाते हुए
4.
जब कभी मुझको गम-ए-यार से फुर्सत होगी
मेरी गजलों में महक होगी, तरावत होगी

भुखमरी, क़ैद, गरीबी कभी तन्हाई, घुटन
सच की इससे भी जियादा कहाँ कीमत होगी

धूप-बारिश से बचा लेगा बड़ा पेड़ मगर
नन्हे पौधों को पनपने में भी दिक्क़त होगी

बेटियों के ही तो दम से है ये दुनिया कायम
कोख में इनको जो मारा तो क़यामत होगी

आज होंठों पे मेरे खुल के हंसी आई है
मुझको मालूम है उसको बड़ी हैरत होगी

नाज़ सूरत पे, कभी धन पे, कभी रुतबे पर
ख़त्म कब लोगों की आखिर ये जहालत होगी

जुगनुओं को भी निगाहों में बसाए रखना
काली रातों में उजालों की ज़रूरत होगी

वक़्त के साथ अगर ढल नहीं पाईं 'श्रद्धा'
ज़िंदगी कुछ नहीं बस एक मुसीबत होगी

कविता कोश के पाँच वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में  प्रथम कविता कोश सम्मान से आज  7 अगस्त को जयपुर में श्रद्धा जैन को भी अलंकृत किया जाना है.हमज़बान की ओर से उन्हें अनगिनत मुबारकबाद.

परिचय :जन्म : ८ नवम्बर,१९७७] विदिशा, मध्यप्रदेश  में
शिक्षा: रसायन  में स्नातकोत्तर
सृजन: गजलों का शतक
सम्प्रति: ग्लोबल इंटर नेशनल स्कूल, सिंगापूर में हिन्दी का अध्यापन
संपर्क: shrddha8@gmail.com
ब्लॉग : भीगी ग़ज़लें  
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बुधवार, 27 जुलाई 2011

स्खलित होता समाज -- अपने ही हाथों में

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गुन्जेश की कवितायें


 (1)
ज्ञान, शांति, मैत्री
हमारे दौर के
सबसे प्रतिष्ठित शब्द हैं........
इतने प्रतिष्ठित शब्द कि
ये हमें प्रतिष्ठित कर सकते थे!!
थे?
हाँ, थे!!!!!!!
ज्ञान अब --तथ्य है,
शांति     --प्रतिबन्ध
मैत्री    --चाटुकारिता
और हम अपने समय के सबसे बड़े
शोर.........

 (2)

उसके आवाज़ में
भारीपन था,
स्वर में गहराई,
विचारों में स्पष्टता ,
समय ने
आवाज़, स्वर, और विचार को
अगवा कर लिया
बचा रह गया
भारीपन ----व्यक्तित्व  का
गहराई ----संबंधों में
स्पष्टता ---अधिकारों की..........

 (3)

आज लिखी जाएँगी
जम कर कुछ पंक्तियाँ,
पंक्तियाँ प्रेम पगी
बहुत रस भरी पंक्तियाँ,
नहीं.....
कोई इन्कलाब नहीं हुआ......
सिंहासन भी ज्यूँ का त्यूं है ...
भाई, जंग तो अभी शुरू ही नहीं हुई, तुम जीतने की बात करते हो???
फिर भी चूंकि बहुत-बहुत नकारात्मक नहीं  होना चाहिए
इसलिए लिखी जा रही हैं पंक्तियाँ,
दो शब्द आस-पास रखे गए हैं --
जैसे कैमरे के सामने दो जिस्म ......
जिसे देख कर रत है पूरा समय हस्तमैथुन में
लिखी जाएँगी पंक्तियाँ इसलिए कि
स्खलित हो जाये पूरा समाज -- अपने ही हाथों में
कि रजा को अब और प्रजा की ज़रूरत  नहीं.....

-->(4)

एक होती है कविता की भाषा
और एक भाषा
की कविता
ठीक वैसे ही
जैसे
होती है
राजनीति की 'शिक्षा'
और
'
शिक्षा'
की राजनीति ......

***********************************************
परिचय:
बिहार-झारखंड के किसी अनाम से गाँव में -09/07/1989 को जन्मे इस टटके कवि-कथाकार [
--> गुन्जेश कुमार मिश्रा ] ने जमशेदपुर से वाणिज्य में स्नातक किया.सम्प्रति महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,  वर्धा में एम. ए. जनसंचार के छात्र हैं.परिकथा में इनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई जिसे हमने भी साभार हमज़बान में प्रस्तुत किया था.खबर है कि उसी पत्रिका के ताज़े अंक में उनकी दूसरी कहानी भी शाया हुई है.उन्हें मुबारक बाद!!
कविता के बारे कोई राय देना नहीं चाहता..वो खुद मुखर हैं.यूँ गुन्जेश स्वीकार करते हैं कि जितना समय वह पाठ्य-पुस्तकों को देते हैं,उस से कम साहित्यिक पुस्तकों को नहीं देते!उनका विश्वास है : संसार में जो भी बड़ा से बड़ा बदलाव हुआ है, उसके पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गंभीर लेखन की भूमिका अवश्य रही है. ..माडरेटर
 


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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

नज़ीर अकबराबादी की ईद
















है आबिदों को त'अत-ओ-तजरीद की ख़ुशी
और ज़ाहिदों को ज़ुहद की तमहीद की ख़ुशी

रिंद आशिक़ों को है कई उम्मीद की ख़ुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

पिछले पहर से उठ के नहाने की धूम है
शीर-ओ-शकर सिवईयाँ पकाने की धूम है

पीर-ओ-जवान को नेम'तें खाने की धूम है
लड़को को ईद-गाह के जाने की धूम है

कल्ला किसी का फूला है लड्डू की चाब से
चटकारें जी में भरते हैं नान-ओ-कबाब से

फिरते हैं दिल-बरों के भी गलियों में ग़त के ग़त
आशिक़ मज़े उड़ाते हैं हर दम लिपट लिपट

काजल हिना ग़ज़ब मसी-ओ-पान की धड़ी
पिशवाज़ें सुर्ख़ सौसनी लाही की फुल-झड़ी

कुर्ती कभी दिखा कभी अन्गिया कसी कड़ी
कह "ईद ईद" लूटेन हैं दिल को घड़ी घड़ी

रोज़े की ख़ुश्कियों से जो हैं ज़र्द ज़र्द गाल
ख़ुश हो गये वो देखते ही ईद का हिलाल

पोशाकें तन में ज़र्द, सुनहरी सफ़ेद लाल
दिल क्या के हँस रहा है पड़ा तन का बाल बाल

जो जो के उन के हुस्न की रखते हैं दिल से चाह
जाते हैं उन के साथ ता बा-ईद-गाह

तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह
मयाने, खिलोने, सैर, मज़े, ऐश, वाह-वाह

रोज़ों की सख़्तियों में न होते अगर अमीर
तो ऐसी ईद की न ख़ुशी होती दिल-पज़ीर

सब शाद हैं गदा से लगा शाह ता वज़ीर
देखा जो हम ने ख़ूब तो सच है मियाँ "नज़ीर"

[आबिद=श्रद्धालु; त'अत=श्रद्धा,ज़ाहिद=पूजा करने वाला; ज़ुहद की तमहीद=धर्म की बात की शुरुआत,पीर=पुराना; नेम'त=इनाम/दया, ग़त =भीड़,पिश्वाज़= कुरती,हिलाल= ईद का चांद; पोशाक=कपड़े]

नज़ीर की लम्बी नज़्म ईद उल फ़ित्र से

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