बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 6 जुलाई 2010

प्रकाश झा की राजनीति यानी हिप-हिप हुर्रे!













आवेश की क़लम से

पिछले एक दशक में रुपहले परदे पर बहुत कुछ बदला ,हिंदी सिनेमा का स्वभाव बदला ,तकनीक बदली ,दृश्यों और संवादों के प्रस्तुतीकरण से जुडी सीमाओं की बाड़ें भी बहुत हद तक खुली ,लेकिन एक जो चीज सबसे ज्यादा देखने को मिली ,वो थी फिल्म के प्रदर्शन से पहले और फिल्म के प्रदर्शन के दौरान निर्माता निर्देशक से लेकर कलाकारों तक द्वारा टी आर पी बढ़ाने के लिए किये जाने वाला जुगाड़  |अगर समकालीन सिनेमा को देखा जाए तो शायद अमिताभ बच्चन एंड संस  के बाद प्रबंधन की यह  कला जिसे हम हाइपर प्रोजेक्शन टेक्निक भी कह सकते हैं  सबसे ज्यादा प्रकाश झा को आती है ,गंगाजल से लेकर राजनीति तक में उन्होंने अपने दांव जम कर खेले ,मगर अफ़सोस उनकी सारी कोशिशें नाकाम रही हाँ इस पूरे मामले में कोई ठगा गया तो वो केवल मीडिया थी | पिछले छः माह से देश  की लगभग सभी पत्र पत्रिकाओं , वेबसाइट्स और चैनलों ने "राजनीति"को कुछ इस तरह प्रोजेक्ट किया जैसे शोले के बाद हिंदी सिनेमा की ये दूसरी सबसे बड़ी सफल फिल्म होगी ,फिल्म के प्रदर्शन के बाद बेहयाई से एकतरफा समीक्षाएं लिखी गयी ,केटरीना कैफ की इंदिरा गाँधी और सोनिया गाँधी के जीवन से मिलते जुलते चरित्र को जम कर बंपअप  किया गया (प्रकाश झा यही चाहते थे , यह  बात साबित है ),वहीँ राजनीति को आंधी जैसी बेहद सार्थक फिल्म से तुलना करके प्रकाश को हिंदी सिनेमा की मसीहाई का दर्जा  देने की पुरजोर कोशिशें की गयी |अब जबकि राजनीतिसिनेमाघरों से उतर रही है ,सबसे अधिक अचरज वाली बात तो यह  हुई  प्रकाश झा न  सिर्फ अखबार के पन्नों  पर खुद को  प्रतिभावान साबित करने की जुगत   में सफल रहे बल्कि मीडिया का इस्तेमाल करते करते खुद भी मीडिया का हिस्सा बन गए |मौर्या टी वी की  लांचिंग भी खुद को न सिर्फ सर्वश्रेष्ठ  निर्देशक अपितु मीडिया में  साबित करने और सिनेमा से जुड़े पूँजी बाजार पर कब्ज़ा करने की मुहिम का हिस्सा था , यह  एक ऐसा जुगाड़ था जिसमे अनुराग कश्यप जैसे नयी पीढ़ी के तमाम निर्देशक अब तक समझ  नहीं पाए हैं  ,और जिसका एकमात्र लक्ष्य माध्यमों का सहयोग न लेकर उसका हिस्सा बनना था |










  






झा ने मीडिया  के लिए पिछले एक साल के दौरान हवाई जहाज के टिकटों से लेकर विज्ञापनों तक में भारी रकम खर्च की  , वह  खुद सफल रहे मगर फिल्म असफल रही |यह उनकी सफलता की ही मापक है कि अब तक मीडिया ने निर्माता निर्देशकों की कतार में अब तक सबसे आगे की सीट पर उन्हें ही बैठा रखा है |मगर यह सच है कि "दामुल" और "हिप हिप हुर्रे का प्रकाश झा कहीं लापता हो गया  है  अफ़सोस बकौल प्रकाश झा यह चीज वो जानते हैं |ऐसा नहीं है कि आमिर खान ,शाहरुख़ खान ने अपनी फिल्मों को लेकर ऐसी  कोशिशें नहीं की की  हैं ,मगर उस हद तक नहीं जिस हद तक प्रकाश झा ने की| आमिर ने "थ्री इडियट्स "  के प्रमोशन के लिए अख़बारों के पन्नों को नहीं ,जनता को ही माध्यम बनाया वो उनके बीच गए |रावण की रिलीज के  पहले अमिताभ के बयान और उनकी ब्लोगिंग भी अपने बेटे अभिषेक को सफल बनाने की मुहिम का हिस्सा थे मगर इसके लिए अमिताभ ने हायपर प्रोजेक्शन टेक्निक या फिर किसी माध्यम  का इस्तेमाल नहीं किया |

हत्या ,भ्रष्टाचार ,खरीद फरोख्त ,जिस्म फरोशी ,परिवारवाद ,क्या  मौजूदा राजनीति  इन्ही के इर्द गिर्द घूमती है ?खुद की तुलना मशहूर हालीवुड  निदेशक ओलिवर स्टोन से किये जाने पर खुश होने वाले प्रकाश झा क्यों नहीं जानते कि बिहार और उत्तर प्रदेश  से लेकर  दिल्ली तक भारतीय राजनीति का चरित्र एक ही परिवार में मिल बाँट कर खाने का है इसी की वजह से भर्ष्टाचार है इसी कि वजह से खरीद फरोख्त हैं ,बाहुबलियों के बोलबाले   में हत्याएं उनकी होती है जो अभी राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं ,राजनीति का एक उज्व्वल पक्ष भी है उसे झा ने पूरी तरह से नजरअंदाज किया है ,फिल्म के रिलीज होने से पहले मैंने कहीं पढ़ा था कि इधर, प्रकाश झा को ऐसे वातावरण में फिल्म बनानी पड़ रही है, जहां कूपमंडूक सेंसर बोर्ड से पारित होने के बाद भी मोहल्लाई दादाओं की स्वीकृति लेना पड़ती है। कोई भी व्यावसायिक हुड़दंगी आपको कहीं भी रोक सकता है।क्या प्रकाश झा इतने बेबस हैं ?अगर हैं तो उनकी यह बेबसी दृश्यों को फिल्माने में तो कहीं नजर नहीं आई ,उन्होंने हाँथ हिलाती केटरीना को इंदु का नाम दिया , लाल झंडा हिलाते नसीरुद्दीन शाह को शारीरिक सुख की कीमत  नैतिक पराजय के रूप में चुकाते हुए दिखाया ,हत्याओं पर हत्याएं दिखाई ,कहीं कोई शोर नहीं ,कहीं कोई विरोध नहीं ,फिर भी बेबसी ?
९० के दशक तक फ़िल्में अपने गानों और कथानक की वजह से हिट हुआ करती थी |बेहद कम बजट में बनायीं गयी नदिया के पार से लेकर प्रतिघात ,सत्या और शूल जैसी पिक्चरों ने सफलता के नए रिकार्ड बनाये लेकिन इन पिक्चरों के हिट होने में जो सबसे बड़ी बात थी  वो यह थी कि इन फिल्मों को दर्शकों ने हिट कराया न कि अख़बारों ,चैनलों और पत्रिकाओं ने |लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है ,पहले संजय लीला भंसाली ने "जोधा अकबर" में और अब  और प्रकाश झा ने "राजनीति के रिलीज होने से पहले दर्शकों के इर्द गिर्द ऐसा वर्चुअल  वातावरण बनाने की कोशिश जिसमे उन्हें सिनेमा हाल के भीतर कदम रखते  ही किसी महान फिल्म को देखने का एहसास हो ,जोधा अकबर का  जो हश्र हुआ था वो सर्वविदित है यही हाल अब राजनीति का हो रहा है झा ने आंशिक तौर पर ऐसी कोशिशें "अपहरण" और गंगाजल " के रिलीज होने से पहले भी की थी ,हालाँकि उस वक़्त भी उनका  करिश्मा नहीं चल पाया था |प्रकाश झा ने हाल में ही दिए गए अपने एक साक्षात्कार में कि राजनीति आज की हो या महाभारत काल की, उसका एक ही मतलब है जीत। राजनीति में नंबर दो कोई नहीं होता। अगर हार एक वोट से भी हो तो हार ही है। मगर सवाल यह है कि जीत हमने किस कीमत पर पाई है |क्या ये सवाल प्रकाश झा खुद से कभी करेंगे कि उन्हें किस कीमत पर जीत चाहिए? क्या राजनीति को हिट करने के लिए राजनीति नहीं की गयी ? क्या सिनेमा प्रेमी दर्शकों की नाउम्मिदगी से उन्हें कोई सरोकार है ?


















[लेखक-परिचय : बहुत ही आक्रामक-तीखे तेवर वाले इस युवा पत्रकार से आप इनदिनों हर कहीं मिलते होंगे, ज़रूर.! .आपका का ब्लॉग है कतरने. लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। ]

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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

ज़िन्दगी मौत न बन जाय संभालो यारो








शहर की बोलती इबारत
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फ़िल्म जागो के बहाने





मध्य- बिहार माओवादियों की हिंसक वारदातों के कारण हमेशा चर्चा में रहता है . शेरशाह सूरी मार्ग,जिसे अब एन.एच-2 कहा जाता है पर स्थित है मध्य -बिहार का प्राचीन शहर शेरघाटी.वैदिक काल में भी इसका ज़िक्र मिलता है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं.एतिहासिक सन्दर्भ मुग़ल काल के अवश्य मिलते हैं.किव्न्दंती है कि शेरशाह ने यहाँ एक वार से शेर के दो टुकड़े किए थे। जंगलों और टापुओं से घिरे इस इलाके को तभी से शेरघाटी कहा जाने लगा.शेरशाह ने यहाँ कई मस्जिदें , जेल , कचहरी और सराय भी बनवाया था.तब ये मगध संभाग का मुख्यालय था.संभवता बिहार-विभाजन तक यही दशा रही.कालांतर में धीरे-धीरे ये ब्लाक बनकर रह गया। 1983में इसे अनुमंडल बनाया गया.मुस्लिम संतों और विद्वानों की ये स्थली रही है. वहीँ प्राचीन शिवालयों से मुखरित ऋचाएं इसके सांस्कृतिक और अद्यात्मिक कथा को दुहराती रहती हैं। १८५७ के पहले विद्रोह से गाँधी जी के '४२ के असहयोग आन्दोलन में इलाके के लोगों ने अपनी कुर्बानियां दी हैं.हिन्दी साहित्य में पंडित नर्मदेश्वर पाठक,यदु नंदनराम, विजय दत्त युवाओं में प्रदीप, सुभाष और उदय आदि की सक्रियता है लेकिन उर्दु अदब यहाँ का काफी उर्वर और संग्रहणीय है। ख्वाजा अब्दुल करीम से असलम सादीपुरी , ज़हीर tishna,सिराज शम्सी से आज के नुमान -उल -हक ,फर्दुल हसन तक लम्बी फेहरिस्त है.शहर से लगे हमजापुर में भी कई नामवर शायर-अदीब रहते हैं।

जब हम चड्डी पकड़ कर दौड़ा करते थे तो रिक्शे के पीछे चिपकी रंगीन तस्वीरें आकर्षण थीं.और ये रिक्शा कस्बे की पहली टाकीज भूषन का रहता.कुछ ही दिनों बाद ये हाल बंद हो गया.टूरिंग सिनेमा हाल के नाम पर बने राजहाल को तीन दशक हुए होंगे, करीब इतना ही कमोबेश यहाँ मंचित हुए किसी नाटक को हुआ.इप्टा यहाँ कभी सक्रीय नहीं रहा , न ही रामलीलाओं की ही परम्परा रही है.लेकिन ऐसी पृष्ठभुमी में भी कई प्रतिभाएं ऐसी हैं जो न सिर्फ़ चमत्कृत करती हैं बल्कि लबरेज़ अपनी संभावनाओं से अग्रिम पंक्ति में खड़े सूरमाओं को ललकारती भी हैं.इमरान अली भी इसमें एक hain .इक्कीसवीं सदी के इस उपभोक्तावादी दौर में आपादमस्तक समाज के लिए प्रतिबद्ध होना, निसंदेह जिंदादिली का काम है.इमरान में ऐसी ही खूबी है.स्थानीय समाचार चैनलों के लिए काम कर चुके सक्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता इमरान ने -जागो का निर्देशन कर अपनी तमन्ना को श्रम के बूते साकार किया, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने मिशन में सफल रहा यह युवा फिलहाल बहुरुप्या और शेरघाटी -गाथा नामक दो फिल्मों के लिए काम कर रहा है ।

दो शब्दों का युग्म जागो जहाँ आकर्षक और मोहक भी है वहीँ इस शब्द में उसकी गंभीरता भी निहित है। आम से लगते इस शब्द का इस फ़िल्म में निर्णायक अर्थों में इस्तेमाल हुआ है ।


ग्रामीण कस्बाई परिवेश और उसमें तीन स्कूली बच्चों के अपहरण के मामले से शुरू हुई यह फ़िल्म भ्रष्ट ,लचर प्रशासन , और आम-जन की असहाय स्थिति को सामने लाती है। यह बताती है कि अपराधियों की राजनीतिज्ञों के संग की जुगलबंदी किस तरह समाज के ताने-बाने को भंग कर रही है । स्थानिय बोली-भाषा में बनी इस फ़िल्म का विषय भले बिहार जैसे प्रांत के लिए चिर-परिचित हो लेकिन इसकी प्रस्तुति यह प्रश्न अवश्य खड़ा करती है कि आख़िर कब-तक यह सब देखा और सहा जायगा ?उपभोक्तावादी संस्कृति के रोज़ हावी होते जाने और असमानता की खाई चौड़ी से चौड़ी होते जाने के चलते समाज में उपजी रोजी-रोटी की हताशा और कही जाति तो कहीं वर्ग संघर्ष । और बेकार नवजवानों को प्रलोभन देकर अपराध के बीहड़ में उतार देना--संघर्ष नित्य नए आयाम ले रहा है.फ़िल्म की विशेषता स्थानीय कलाकारों (नवीन सिंह ,जे.पी.पाटली , विष्णुदेव प्रजापति , अमृत अग्रवाल , कंचन गुप्ता,कुंजन कुमार सिन्हा , रामस्वरूप स्वर्णकार, नवीन सिन्हा वंदना,चंद्रभूशन , सचिदानंद ठाकुर ),पत्रकारों (एस.अहमद, एस.के.उल्लाह, कौशलेन्द्र कुमार, मुहम्मद अली बैदावी, ), राजनेताओं (सुशील गुप्ता ,अजित सिंह , शाहिद इमाम ,लखन पासवान ) और कलमकारों (रज़ा शेरघाटवी , रामचंद्र यादव,नुमान-उल-हक,हिलाल हमज़ापुरी, इश्राक़ हमज़ापुरी ,समी-उर रहमान ) के अभिनय से और बढ़ गई है.यूँ तो भोजपुरी फिल्मों के धर्मेन्द्र यादव, बांगला रंगमंच के संजू और वालीवुड के अली खान जैसे नामचीनों ने भी अभिनीत पात्रों को जीवंत किया है.लेकिन बाल कलाकारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति हर फ्रेम में बरक़रार राखी है।

फ़िल्म अंत में यह संदेश अवश्य देती है कि अपराध को धर्म और जाति के खाने से हरगिज़ न देखा जाय। मौजूदा हालत के मद्देनज़र फ़िल्म सरफ़रोश के मशहूर गीत ज़िन्दगी मौत बन जाय , संभालो यारो....का इस्तेमाल बेहद सामयिक और महत्वपूर्ण हो जाता है.फ़िल्म में घटनाओं और स्थितियों का क्रमिक दृश्यांकन बहुत सहज लगता है। निर्देशक का श्रम बाल-कलाकारों अनम इमरान , सादिया एमाला और गौरव गुप्ता के अभिनय में कमाल होकर मुखर होता है.शेरघाटी के सिनेतिहास की इस पहली टेली -फ़िल्म में उर्दू के चर्चित शायर नदीम जाफरी aur लेखक- रंगकर्मी विजय दत्त ने भावप्रवण अभिनय किया है.


साजसज्जा ,संगीत और दूसरे पहलुओं में इतनी बारीकी और, भव्यता न बरती गई है.बावजूद व्यवसायिक फूहड़ता से फ़िल्म कोसों दूर है.फ़िल्म में संगीत पटना दूरदर्शन के कलाकार राजू लहरी ने और गया घराने के शास्त्रीय गायक राजेन्द्र सिजुवार ने प्रात: अलाप को स्वर दिया है।
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रविवार, 1 नवंबर 2009

जागो ...

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जागो-2

जागो-2

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जागो-3

जागो-3
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

जागो-४

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जागो- फ़िल्म ५

जागो- फ़िल्म -5


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