बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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सोमवार, 31 अगस्त 2015

सड़क के बहाने औरंगज़ेब की बातें भी हैं कुछ और

इधर की टोपी उधर गई



















उमाशंकर सिंह की क़लम से



दिल्ली में हजारों सड़कें हैं। सैकड़ों फ्लाईओवर हैं। रोज नई सड़कों-फ्लाईओवरों का निर्माण होता ही रहता है। ऐसे में ऐसी क्या मजबूरी थी कि औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर आपको माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम रोड करना पड़ा?? आप इसके लिए किसी नई सड़क को चुन सकते थे। क्या आपको ये लगता है कि औरंगज़ेब का नाम एक सड़क से मिटा कर आप इतिहास से यह बात मिटा देंगे कि वह दिल्ली का सबसे लंबे वक्त तक शासक रहा है?? फिर औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर आप हाल ही में सड़क दुर्घटना में दिल्ली में ही दिवंगत हुए इसी सरकार के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे के नाम पर रख सकते थे। पर, चूंकि वह हजारों साल से बदनाम किए गए औरंगज़ेब के नाम का रोड था, इसलिए आपकी सस्ती धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक समझदारी के हिसाब से उसके रिप्लेसमेंट के लिए भी आपको एक मुसलिम नाम चाहिए था जो आपको सूट भी करता हो और आपने औरंगज़ेब रोड का नाम कलाम रोड कर दिया!! असल में हार्दिक पटेल की उम्र कम है जिसकी राजनीति से पार पाने के लिए आपको बहुत कुछ करना पड़ रहा है, पर आपकी राजनीतिक समझदारी और इतिहास ज्ञान उससे भी गया-बीता है। मैं बताता हूं आपको औरंगज़ेब के बारे में आप कितना कम और कितना गलत जानते हैं!


औरंगज़ेब के बारे में कुप्रचार की कहानी सैकड़ों साल पुरानी है और उसके मरने के बाद से ही जारी है। इसमें ब्राह्मण और मौलवी दोनों समान रूप से भागीदार थे। उसके बीज यहां से पड़े जब औरंगज़ेब ने ब्राह्मणें पर तीर्थयात्रा के लिए लगने वाला जज़िया कर कर लगाया जो शेष हिंदुओं पर पहले से लगता था। इसे इस तरह प्रचारित किया गया कि औरंगज़ेब ने हिंदुओं पर जज़िया लगा दिया। जबकि गैर- ब्राह्मण हिंदुओं पर पहले से जज़िया और गैर-मौलानाओं पर जदिया लगता था। औरंगज़ेब ने दोनों को करों के ज़द में लाकर एक साथ दोनों की दुश्मनी मोल ले ली। नतीजा सामने है। कुछ साल पहले बजरंग दल के नेता विनय कटियार ने अपने एक भाषण में कहा था कि औरंगज़ेब संस्कृत ग्रंथों को देखते ही जलवा देता था। अब सचाई देखिये।

मशहूर काव्यशास्त्री और कवि पंडितराज जगन्नाथ औरंगज़ेब के दरबारी थे और उन्हीं के संरक्षण और हौसला अफ़ज़ाई में पंडितराज ने 'पीयूषलहरी', 'गंगालहरी', 'अमृत लहरी', 'लक्ष्मी लहरी' और काव्यशास्त्र मीमांसा ग्रंथ 'रसगंगाधर' लिखा था (काव्यशास्त्र और हिंदी साहित्य के रीतिकाल के छात्र इस पर और प्रकाश डाल सकते हैं) । औरंगज़ेब ने ना तो पंडितराज जगन्नाथ को जलवाया और ना उनके लिखे इन ग्रंथों को। ये ग्रंथ अभी भी उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं पंडितराज ने औरंगज़ेब के राज्याश्रय में रहते हुए बादशाह की बहन से शादी की और उसका नाम तन्वंगी (जहां तक मुझे याद है) रखा। उस पर संस्कृत में कविता भी लिखी। औरंगजेब ने यह रिवर्स लव जिहाद अपने समय में अपने राज में बल्कि अपने दरबार में अपनी बहन के साथ होने दिया!


यह किविदंति हो सकती है। पर, यह किविदंति और किसी उदार मुगल बादशाह के बारे में नहीं, सिर्फ बदनाम औरंगज़ेब के बारे में सुनने को मिलती है कि वह अपने जीवनयापन के लिए शाही कोश को हाथ नहीं लगाता था। टोपियां सिल के अपना गुजारा करता था। और एक दिन जब खाना पकाते हुए उनकी बेगम का हाथ पक गया और तुनकते हुए उसने खानसामे की मांग की, तो औरंगज़ेब ने कह कर इंकार कर दिया कि वह खानसामे का खर्च अफोर्ड नहीं कर सकता। वह पांच वक्त का नमाजी था और इस्लामी रवायत के अनुसार दरबार में शाही पोशाक नहीं पहनता था। शिवाजी को पराजित करने के बावजूद उसने उनकी हत्या नहीं की। उसने दारा शिकोह की हत्या की, पर पर दारा शिकोह के फायनेंसर जो उस वक्त के गुजरात के व्यापारी थे का पूरा पैसा चुकाया। उसने कई मंदिरों को जमीनें दान की, जिनमें मथुरा के मंदिर खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। बनारस के जिस मंदिर को उसने तोड़ा उसके पुजारियों पर किन्हीं हिंदू महिला के बलात्कार का ही अभियोग था। जैसे आशाराम ने अपने हिंदू अनुयायी महिला का ही यौनशोषण किया वैसे ही! बाकी जैसे शासक होते थे वह वैसा ही था। थोड़ा सा निरंकुश! थोड़ा सा न्यायप्रिय! थोड़ा सा खुशामदपसंद। पर ऐसा उसमें क्या था कि आप उससे सदियों तक खुन्नस पालें और उसके नाम का रोड तक बदललते रहें!


वैसे मसला सिर्फ औरंगज़ेब को हीरो या विलेन बनाने का नहीं, पूरे इतिहास को एक आंख से देखने की खतरनाक रवायत का है। वैसे नामकरण की पॉलटिक्स की रोड बहुत आगे नहीं जाती। जनता के प्रतिरोध का अपना तरीका होता है। वह आपके तमाम नामकरण की हवा उड़ा देती है। छ़त्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) के आधिकारिक नाम के बहुत साल बाद भी 'वीटी' (विक्टोरिया टर्मिनस) लोगों के जुबां से कम नहीं हुआ है। दिल्ली के कांग्रेस अध्यक्ष रहे जयप्रकाश अग्रवाल के पिता और अपने वक्त के ताकतवर कांग्रेस नेता रामचरण अग्रवाल के नाम पर दिल्ली का सबसे अहम चौराहा है। पर कोई रामचरण अग्रवाल चौक नहीं बोलता! सब आईटीओ ही बोलते हैं। मेट्रो रोज लाखों लोगों के कान में बोलता रहता है कि अगला स्टेशन राजीव चौक है पर फिर भी राजीव चौक नाम कनॉट प्लेस को रिप्लेस नहीं कर पाया है। अपनी तो बस इतनी ख्वाहिश है आपसे कि कुछ ठोस कीजिये। सिर्फ नाम बदलने से कुछ नहीं होने वाला है। हालांकि मैं जानता हूं ये आपके हिसाब से एक बड़ी मांग हो गई!


(रचनाकार -परिचय:

जन्म: 9 सितंबर को
शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर।
सृजन: कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
संप्रति: मुंबई में रहकर सिनेमा के लिए लेखन
संपर्क: uma.change@gmail.com )









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शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

दिल में उतरी अरविंद की सादगी

दिल्ली में बस कुछ नहीं, आप ही आप 


चित्र: गूगल से साभार



भवप्रीतानंद की क़लम से
अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिले असाधारण बहुमत पर अचंभित हैं, और कह रहे हैं, यह बहुमत डरानेवाला है। आप कार्यकर्ताओं को चेता रहे हैं,  अधिक अहंकार मत पालो नहीं तो पांच साल बाद हमारी हालत भी भाजपा-कांग्रेस की तरह हो जाएगी। जीत के बाद यह दो बातें वही व्यक्ति कह सकता है जो चीजों को सही तरीके से देखने का आदी है। जो यह कह सकता है,  मैंने पिछली बार गलती की। मुझे दिल्ली में सरकार नहीं गिरानी चाहिए। अबकी मौका मिला तो ऐसा नहीं करूंगा। यह सादगी लोगों के दिलों में सीधे उतरती है। और उतरी भी। दिल्ली की जनता ने दिल खोलकर आप को ७० विधानसभा सीट में से ६७ सीट दे दिए।


देश में परंपरागत पार्टियों के लिए यह बहुमत सुधरकर सलीके से काम करने का संकेत दे रहा है। परंपरागत पार्टियां मतलब भाजपा और कांग्रेस को अपनी बैठकों में इस बात पर निश्चित मंथन करना चाहिए कि वह कौन-सा आंतरिक फोर्स काम कर रहा था, जो आप को लोगों ने इकतरफा वोट दे डाले। भ्रष्टाचार से मुक्ति हर आमोखास चाहता है। यह एक बहुत बड़ा मुद्दा तो है ही। दिल्ली में लोकल समस्या बिजली-पानी से जुड़ी है। इस संबंध में केजरीवाल की पिछली पचास दिनों की सरकार ने बहुत ठोस कदम उठाए थे। उस ठोस कदम का फायदा भी लोगों मिलने लगा था। इसके अलावा दिल्ली में एक प्रमुख समस्या कच्ची बस्ती की मान्यता से जुड़ी हुई है। उसके नियमन के लिए भी आप ने नीतिगत आश्वासन दिया था। ये कुछ ऐसे तत्व हैं, जो लोगों को आप के करीब ले आई। खासकर कच्ची बस्ती के नियमन से जुड़े मुद्दे ने निम्र मध्यमवर्गीय परिवार को आप के करीब ला दिया। इसके बरक्स भाजपा और कांग्रेस के वादे सिर्फ कोरे वादे ही लगते हैं। दोनों पार्टियां चुनाव के समय किए गए वादे को सत्ता मिलने के बाद लगभग भूल जाती हैं। फिर उन्हें उन लोगों की फिक्र ही नहीं रहती, जिसने उन्हें सत्ता दी है। यह जो ट्रेंड पारंपरिक पार्टियों में है, वादों से मुकरने का, इसके टूटने की दिन अब आ चुके हैं। अगर इस मिथ को इन पार्टियों ने नहीं तोड़ा तो उनका नामलेवा भी कोई नहीं रह जाएगा। जैसा कि अभी कांग्रेस की गत हुई है। लोकल मीडिया में एक जुमला खूब चला है कि भाजपा का भी यारो अजीब गम है। पहले चार कम थे...अब चार से भी कम है।
दिल्ली का विधानसभा चुनाव परिणाम है, इसलिए इसके राष्ट्रीय अर्थ भी निकाले जाते हैं। भाजपा में मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने कई चुनाव जीते हैं। दिल्ली में उन्हें मुंह की खानी पड़ी है। इसलिए कोई इसे दिल्ली  भाजपा की हार  या दिल्ली  भाजपा की रणनीतिक असफलता मानने को भी तैयार नहीं है। खासकर तब जब भाजपा ने दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के लिए हैलीकॉप्टर लेंडिंग की तरह किरण बेदी को उतारा। दिल्ली में किरण बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर उतारने के बाद से ही भाजपा कार्यकर्ताओं में नाखुशी थी। खासकर किरण बेदी की कार्यशैली को लेकर। वह भाजपा या संघ की बातों को तवज्जो ही नहीं दे रही थीं। किरण बेदी का प्रशासनिक कार्यकलाप उन्हें राजनीति में कभी सहजता से लोगों से रूबरू नहीं होने देगा, इसे दिल्ली की चुनाव ने साफ कर दिया है। अमित शाह ने मुखमंत्री पद के लिए किरण बेदी को इसलिए प्राथमिकता दी कि वह साफ छवि की हैं। भ्रष्टाचार से मुक्ति की बात केजरीवाल के बरक्स वही करेंगी  तो दिल्ली  की जनता में अच्छा संदेश जाएगा। फिर मोदी की चार-पांच सभाएं कराकर दिल्ली के किले में भी घुस जाया जाएगा। लेकिन यह सब दांव उलट पड़े। सबसे पहले संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं में किरण बेदी को लेकर उपेक्षा का भाव पनपा। जो ठीक चुनाव के पहले स्पष्ट रूप से दिखाई देना शुरू हो गया था। दूसरा, जो सबसे खतरनाक ट्रेंड दिखाई दिया वह यह है कि पार्टी में वर्षों समय खपाने के बाद  अगर बाहर से मुख्यमंत्री पद के लिए किसी को बिठा दिया जाता है तो पार्टी में उपेक्षा का वातावरण पसर जाता है। यही बेदी के साथ हुआ। हार के बाद उनका पहला स्टेटमेंट देखिए, मैं हारी नहीं हूं। हार के बारे में जानना है तो भाजपा से पूछो। सोचिए, जिस प्रशासनिक अधिकारी कम  नेता को आपने मुख्यमंत्री पद के लिए चुना वह पूरी पार्टी को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। भाजपा यही भूल पश्चिम बंगाल में क्रिकेटर सौरभ गांगुली को पार्टी में लाकर करना चाहती है। वो तो सौरभ ही बार-बार कन्नी काट रहे हैं। कुल मिलाकर अपने पार्टी में तपे नेता में से ही किसी एक को चुनकर उसे प्रोजेक्ट किया जाए तो अधिक अच्छा है। किरण बेदी वाला प्रयोग भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए एक सबक से कम नहीं है।
केंद्र में सत्ता में आने के बाद से भाजपा ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिसने दिल्ली चुनाव पर बुरा असर डाला है। इसमें पहला है, धर्म परिवर्तन कर घर वापसी वाली मुहिम। संघ के नेताओं को अब तो ऐसा लग रहा है,  जैसे लाइसेंस मिल गया है। कुछ सांसद तो मुंहफट हो चुके हैं। हिंदुओं को अधिक बच्चे पैदा करने के सार्वजनिक बयान ऐसे दे रहे हैं, जैसे वह उनका निजी मसला है। ऐसे बयान अगर थोक के भाव में आते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब भाजपा मूल मुद्दे से भटक जाएगी और देश में सांप्रदायिक माहौल बिगड़ जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा जब इस ओर इंगित करते हैं तो बुरा लगता है क्योंकि यह हमारा नितांत निजी मामला है। पर मामला निजी तभी तक रहता है, जब हम चीजों को निजी रहने देते हैं। बेलगाम होकर जहां-तहां घर वापसी के स्टेटमेंट देने से चीजों निजी नहीं रह पाएंगी। दिल्ली की जनता ने इसके विरोध में भी अपना वोट दिया है। नहीं तो दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में साक्षी महाराज ने माहौल तो बिगाड़ ही दिया था।
एक अन्य बात मोदी के पर्सनल व्यक्तित्व से जुड़ी है। वह जब सोने के तार से अपना नाम गुदवाई शेरवानी पहनते हैं और मीडिया में यह बात उछलती है कि मोदी नेदस लाख की ड्रेस पहनी है, तो इसकी कोई सार्थक छाप जनता पर नहीं जाती। मोदी से अधिक मोदी का पहनावा समाचार का विषय वस्तु बने तो इसमें भविष्य के खतरनाक संकेत  छिपे हैं। दूसरी बात, अपने विचार या किसी मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया ट्विट करने के स्थान पर पत्रकारों से मिलिए। धर्म परिवर्तन, घर वापसी ऐसे मुद्दे हैं जिसपर लोग प्रधानमंत्री की राय जानता चाहते हैं। उनकी प्रतिक्रिया से लोगों में उनसे प्यार या उपेक्षा जन्म लेगी। इस मामले में मोदी तो मनमोहन सिंह से भी आगे हैं। वह मीडिया से मिलना ही नहीं चाहते हैं। जनता को अपने सामने सरकार की स्थिति स्पष्ट ही नहीं करना चाहते हैं। हर उस मुद्दे पर, जो राष्ट्रीय स्तर पर असर डालती है उसपर मोदी की या फिर स्पोक्स पर्सन की सफाई (जवाब) आनी चाहिए। मोदी की कई मुद्दों पर अस्पष्टता ने भी दिल्ली में भाजपा के वोट काटे ही होंगे।

दिल्ली चुनाव परिणाम ने स्पष्ट संकेत दिया है जो कहो, उसे करो। जो करो उसके बारे में बताओ। जो बताओ वह तथ्यहीन नहीं हो। यानी प्रशासक और उसको चुनने वाली जनता के बीच कोई बिचौलिया नहीं हो।
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(लेखक-परिचय:
जन्म: 3 जुलाई, 1973 को लखनऊ में
शिक्षा : पटना से स्नातक, पत्रकारिता व जनसंचार की पीजी उपाधि, दिल्ली विश्वविद्यालय से
सृजन : देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कहानियां
संप्रति: दैनिक भास्कर के रांची संस्करण के संपादकीय विभाग से संबद्ध
संपर्क : anandbhavpreet@gmail.com )
 
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