बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

चुप होंगे साहित्यकार-कवि


टिटिहरी गाएगी मृत्युराग













अदनान कफ़ील की कविताएं

आताताई

सुनो साथी !
उस दिन की कल्पना करो
जब आएगा आताताई
अपने लश्कर के साथ
इन मक्खन-सी मुलायम
सड़कों को रौंदते हुए
कुचलते हुए हरी दूब को।
उस दिन तुम्हारे चौपाल पर धूल उड़ेगी
कबूतर दुबक जायेंगे
अपने दड़बों में
टिटिहरी गाएगी मृत्युराग
उस दिन सूरज नहीं खिलेगा आकाश में
बल्कि दूर क्षितिज के उस पार
किसी अज्ञात कोने में
सहमा दुबक जायेगा।
रहट ख़ामोश होगी
बेज़ुबान होगी बुलबुल

लेखक चुप होंगे
चुप होंगे साहित्यकार-कवि
जो नहीं होंगे चुप उनके ज़ुबान खेंच लिए जायेंगे
अखबार के पन्ने स्याह होंगे
आतताई के स्वागत गीतों से
उनमें दर्ज होंगी आततायी की जीवनी
उससे सम्बंधित छोटी-छोटी बातें
मसलन उसके मूंछों की लम्बाई-चौड़ाई वगैरह-वगैरह

साथी ! उस दौर में वो कलम घसीट बड़े साहित्यकार-पत्रकार कहलायेंगे
जो बैठे होंगे साहिब की गोद में
उस दौर में बनेंगे बड़े-बड़े पुल, मेट्रो-रेल
बड़ी प्रगति होगी
लेकिन रघुआ फिर भी मैला ही उठाएगा
कल्लन मियाँ चाय ही बेचेंगे।

सड़कें रगड़-रगड़ कर चमकाई जाएँगी
जिसपर चलेगा आततायी अपने लश्कर के साथ
उसकी भावनाहीन आँखें तनी होंगी अभिमान से
उसके चेहरे पर बिखरी होगी
विजयी कुटिल मुस्कान

आततायी होगा उस दौर का अकेला तानाशाह
साथी उस दौर में हमें तय करनी होगी अपनी भूमिका
कि हम कैसे जीना पसंद करेंगे
अँधेरे के अधीन होकर
या फिर
अपने कलम को तलवार
और अपनी हड्डियों को मशाल बना कर. 

झूठों के शिलालेख

वो लिखेंगे झूठ
शिला-खण्डों पर
ताकि सभ्यता के
समाप्त हो जाने के बाद भी
बचा रह जाये
उनका झूठा-सच
लेकिन साथी
हम लिखेंगे सच
चाहे रेत ही क्यूँ न हो अपने पास
साथी हम बोलेंगे सच
तब तक
जबतक कि
हमारी ज़ुबाने नहीं काट ली जातीं।

एक कवि का डर
मैं मौत से ख़ायफ़ नहीं होता
न ही मुझे डर लगता है
किसी भूत-पिशाच-प्रेतात्मा से
लेकिन मैं डरता हूँ
वक़्त के
अंतहीन-संकरे-घुप्प-सुरंग से
डर लगता है मुझे
इतिहास की डरावनी आँखों से
डरता हूँ मैं कभी-कभी अपने ही हाथों से
कभी-कभी मैं अपने आप से
बहुत डरता हूँ साथी...

पिपासा

जब भी तुम्हें
अपनी इन आँखों से देखता हूँ
हर दफ़ा
थोड़ा ही देख पाता हूँ
और तुम्हें
सम्पूर्णता में देखने की तृष्णा
और बढ़ जाती है
मैं इन कंचे-सी अपनी आँखों को
अब और नहीं पहनना चाहता
मैं तुम्हें
एक अंधे की आंख से
देखना चाहता हूँ ...

साथी से

ये चराग़ बुझा दो
मैं तुम्हें अँधेरे में देखना
ज्यादा पसंद करता हूँ
क्यूंकि
अँधेरे में
मेरे अन्दर का आदमी
तुम्हें
एक आदमी की तरह देखता है
एक औरत की तरह नहीं...

देह से परे

तुम्हें हर दफा
एक देह की तरह देखा गया
कभी तुम्हें किसी मूर्ति में जकड़ा गया
तो कभी तुम्हें
किसी पेंटिंग में बंद कर
लटकाया गया
किसी दीवार से
सबने तुम्हारे आरिज़ के रंग और सुडौलता
के क़सीदे पढ़े
लेकिन किसी ने नहीं देखी
तुम्हारी पनीली आँखें
तुम्हें घुटते हुए किसी ने नहीं पाया
लेकिन मैं तुम्हारे अस्तित्व को
समग्रता में देखता हूँ
तुम्हारी कठिनाइयों, संवेदनाओं और
संघर्षों का इकलौता गवाह हूँ मैं
मैं तुम्हें एक देह की तरह नहीं
एक जीते जागते इंसान की तरह देखता हूँ .....

मैं अब सोना चाहता हूँ

मेरा सिर अनिर्वचनीय बोझ से
दुःख रहा है साथी
मेरी जिह्वा में
बहुत ऐठन है
मेरी आँखों का तेल
चूक गया है
लम्बे सफ़र के बाद
अब मैं दो घड़ी
सोना चाहता हूँ साथी ...

सोता हुआ आदमी

सोता हुआ आदमी
झूठ नहीं बोलता
सोता हुआ आदमी
गाली नहीं देता
सोता हुआ आदमी
किसी का क़त्ल नहीं करता
न ही सोते हुए रचता है साज़िशें
सोता हुआ आदमी मुखौटा भी नहीं लगाता
सोते हुए आदमी, आदमी होता है.

मैं लिखूंगा एक कविता मेरी जान

मैं लिखूंगा एक कविता मेरी जान
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए
जिसमें करूँगा ज़िक्र तितलियों का
मधुमक्खियों का, चींटियों का.
गुलाब, चमेली के फूलों और अमलतास के पत्तों का
उसमें करूँगा ज़िक्र तुम्हारी भिन्न-भिन्न मुद्राओं का
मापूंगा तुम्हारी हँसी को अपनी कविता के स्केल से
और खींचूंगा वैसी सैकड़ों हंसी
और बिखरा दूंगा तुम्हारे चारों ओर
चाँद से थोड़ी चांदनी उधार मांग लूँगा
और बुनूँगा उससे एक चमकदार शॉल तुम्हारे लिए
तारों से थोड़ी टिमटिमाहट चुरा लूँगा
और तुम्हारी नाक की लौंग में नग की जगह भर दूंगा

हाँ मेरी जान मैं लिखूंगा एक कविता
एक ऐसी कविता जिसमें दर्ज होगा
तुम्हारा गुनगुना स्पर्श
तुम्हारा मुलायम-गीला-चुम्बन
जिसमें दर्ज होगी तुम्हारे गालों की लालिमा
तुम्हारे गुलाबी होंठ
तुम्हारी रूबी और नीलम सी आँखें

हाँ मेरी जान मैं लिखूंगा एक कविता
ऐसी कविता जिसमें इन सबका ज़िक्र होगा
लेकिन न होगा तो सिर्फ मेरा
क्यूंकि तब मैं 'मैं' नहीं रहूँगा
'तुम' हो जाऊंगा.
तब तुम मुझे ख़ुद में तलाशना.....

शैतान

अब वो काले कपड़े नहीं पहनता
क्यूंकि तांडव का कोई ख़ास रंग नहीं होता
ये काला भी हो सकता है और लाल भी
भगवा भी और हरा भी.

अब वो आँखों में सुरमा भी नहीं लगाता
अब वो हवा में लहराता हुआ भी नहीं आता
ना हीं अब उसकी आँखें सुर्ख और डरावनी दिखतीं हैं
वो अब पहले की तरह चीख़-चीख़कर भी नहीं हँसता
ना हीं उसके लम्बे बिखरे बाल होते हैं अब.

क्यूंकि इस दौर का शैतान
इंसान की खाल में खुलेआम घूमता है
वो रहता है हमारे जैसे घरों में
खाता है हमारे जैसे भोजन
घूमता है टहलता है
ठीक हमारी ही तरह सड़कों पर
और मज़ा तो ये
कि वो अखबार में भी छपता है
टी.वी. में भी आता है.

लेकिन अब उसे कोई शैतान नहीं कहता
क्यूंकि उसके साथ जुड़ी होती हैं जनभावनाएँ
लोग उसे "सेवियर" समझते हैं
और अब अदालतें भी कहाँ
सच और झूठ पर फैसले देतीं हैं साथी ?
अब तो गवाह और सबूत एक तरफ़
और सामूहिक जनभावनाएँ दूसरी तरफ.

अब इस अल्ट्रा मॉडर्न शैतान की शैतानियाँ
नादानियाँ कही जाती हैं
क्रिया-प्रतिक्रिया कही जातीं हैं.

इस दौर का शैतान बेहद ख़तरनाक है
क्यूंकि अब उसकी कोई ख़ास शक्ल नहीं होती
वो पल-पल भेस बदले है साथी
वो तेरे और मेरे अन्दर भी
आकर पनाह लेता है कभी-कभी
अब ज़रूरत इस बात की है
कि हम अपने इंसानी वजूद को बचाने के लिए
छेड़ें इस शैतान के साथ
एक आख़िरी जिहाद
एक आख़िरी जंग
इससे पहले की बहुत देर हो जाए..


(कवि-परिचय:
 जन्म: ज़िला-बलिया, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में जुलाई  30, 1994
शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में स्नातक
संप्रति: दिल्ली रहकर अध्ययन और स्वतंत्र लेखन 
सृजन: बचपन से ही शायरी और कविता, छिटपुट प्रकाशन
संपर्क: thisadnan@gmail.com )

हमज़बान पर अदनान  की और कविताएं



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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

दंतेवाड़ा के दौर में














अदनान कफ़ील की क़लम से


 दूर क्षितिज के पार

उदित हुआ है अंतर्मन में सहसा एक विचार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा, दूर क्षितिज के पार
निर्मम धागों से अब तक है, गुथी हुई यह काया
भाग रहा हूँ कब से जाने, फिर भी हूँ भरमाया
समय पाश से बच न पाया, घोर अँधेरा छाया
चिंतन करता,मंथन करता,क्या खोया क्या पाया
अनुत्तरित प्रश्नों को तुझसे अब भी है दरकार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा दूर क्षितिज के पार.
छवि तो तेरी अब भी है, अंतर्मन की गहराई में
मसल गयीं हैं खिलने से पहले कलियाँ अमराई में
दुनिया से बेग़ाने बच्चे खेल रहे मैदानों में
ख़ुद भी यूँ ही दिख जाता हूँ चेहरे से अनजानों में
जीवन मदिरा जिसने पी ली, क्यूँ जाता मैख़ानों में
टीस मारती अब भी बातें, मन के विस्तृत वीरानों में
नहीं कोई है सच्चा प्रेमी, नहीं कोई है यार
सोच रहा हूँ कुछ तो होगा, दूर क्षितिज के पार.
 स्मृतियाँ

इक भींनी ख़ुश्बू यादों की, अंतर में घुसती जाती है
उषा की मोहक लाली-सी, मन-नभ पे छिटती जाती है.
इक शून्य व्याप्त हो जाता है, मन मानों पर पा जाता है
गुज़रे लम्हों के जंगल में, मानो खोता-सा जाता है.
मन विकल-विकल हो जाता है, वह क्षण ज्वलंत हो जाता है
स्मृतियाँ कोमल स्वप्नों-सी, नयनों में बंधती जाती हैं.
अम्मा! अम्मा! चिल्लाता है, लय टूट-टूट भर्राता है
वह स्वर अनंत तक जाता है,' औ फिर थक के गिर जाता है.


 मेरी उदासी

तुम फुर्सत के क्षणों में मेरे आस-पास हो
मैं जब भी यादों के फूल चुनता हूँ
तुम ख़ुश्बू बन कर घुल जाती हो.
जब भी कोहरे से ढकी राहों पर
अकेला चलता हूँ
तुम्हें अपनी लड़खड़ाहटों में
महसूस करता हूँ.
जब भी किसी पत्थर पर बैठ कर
अपनी धड़कनों को सुनता हूँ
तुम कानों में कोई
निराशा का गीत
गुनगुना जाती हो.
मैं हमेशा तुमसे दूर भागता हूँ
पर तुम सामने प्रकट हो
मानो
मेरी खिल्ली उड़ाती हो.
आखिर तुम मुझसे
इतनी आसक्त क्यूँ हो ?
जो तुम मेरी
कलम की स्याही तक में घुल गयी ?
ऐ मेरी उदासी-
जवाब दो !

बर्बरता और ईसा

प्रिये !
आज ये हृदय
अति व्याकुल है
'औ सदियों से खड़ी
ये हांड-मांस की प्रतिमा
जर्जर हो चुकी है
संसृति की इस
बर्बरता से.
प्रिय ! मेरा रक्त
जो शायद अब भी लाल है
रिस रहा है
संभवतः
मुक्ति की अभिलाषा में .
पैबंद लगे मेरे वस्त्रों से
सड़े मांस की
बू आती है
और नीच भेड़िये
मेरा रक्त पी रहे हैं.
क्या इस दंतेवाड़ा के दौर में
मेरा अस्तित्व संभव है?
और कितनी सदियों तक
मैं आहार बनता रहूँगा
इन वहशी दरिंदों का ?
और आख़िर कब तक
मरियम जनती रहेगी
एक नए ईसा को ?
कब तब
कील ठोंके जायेंगे
मेरे इस वजूद में ?
कब तक ?
आखिर कब तक ?
लेकिन शायद
ये इस बात से अनभिज्ञ हैं
कि मेरी
उत्कट जिजीविषा
और मेरे
बाग़ी तेवर
कभी ठन्डे नहीं पड़ सकते.
यूँ ही ईसा
पैदा होता रहेगा
चाहे हर बार उसे
सूली ही क्यूँ न चढ़ना पड़े.

आवाज़
  
मैं तो आवाज़ था,
गूंजता ही रहा,
तुम दबाते रहे ,
हर घड़ी टेटुआ,
तुम सताते रहे ,
पर मिटा न सके,
मैं निकलता रहा ,
इक अमिट स्रोत से,
तेरी हर चोट पे.
तुम कुचलते रहे ,
मैं उभरता रहा,
तुम सितम पे सितम ,
मुझपे ढाते रहे,
लब को सिलते रहे,
अश्क ढलते रहे.
मैं बदलता रहा ,
हर घड़ी रूप को,
तुम तो अनपढ़ रहे ,
मुझको पढ़ न सके,
मेरी चुप्पी में भी ,
एक हुंकार थी ,
मुझमें वो आग थी ,
जो जला देती है,
नींव ऊँचे महल की ,
हिला देती है,
मुझमें वो राग है ,
मुझमें वो साज़ है,
जो जगा देती है ,
इक नया हौसला,
और बना देती है,
इक बड़ा क़ाफ़िला,
एक स्वर ही तो हूँ ,
देखने में मगर,
पर अजब चीज़ हूँ ,
तुम समझ न सके.

माफ़ करना
  
ऐ उर्वशी !!
आज तुम मेरी आँखों में
न देखो
और न मुझसे अपनी मासूम
स्वप्नों की दुनिया में
प्रविष्ट होने का आग्रह
करो.
और न मुझसे
किसी गीत की आशा रखो.

तुम सोच रही होगी
आज मुझे ये क्या हो गया ?
हाँ, मुझे कुछ हो-सा गया है
आज मेरे सुर खो गए हैं
मेरे साज़ भग्न हैं
जहाँ मेरे स्वप्नों की बस्ती थी
वहां अब बस राख
और धुआं है.
मेरी आँखों में विभीषिका के
मंज़र हैं
मत देखो मेरी तरफ
शायद डर जाओगी
इन स्थिर नयनों में
डरावने दृश्य अंकित हैं-
कोई स्त्री चीत्कार और
रोदन कर रही है
तो कोई बच्चा भूख से व्याकुल
स्थिर तर नयनों से
न जाने क्या सोच रहा है ?
जहाँ कोई तथाकथित रक्षक
भक्षक का नंगा भेस लिए
अपने शिकार की टोह में
घूम  रहा है.
तुम इन आँखों में
निरीह बेचारों को भी
देख सकती हो
जो एक मकड़-जाल में
उलझे
सहायता की गुहार
लगा रहे हैं.
यहाँ तुम उन मासूमों को भी
पाओगी जिन्हें
हक के बदले गोली देकर
हमेशा के लिए
सुला दिया गया
या कारे की तारीकियों में
फेंक दिया गया
असभ्य और जंगली कह कर.
तुम यहाँ उन बेबस माओं
को भी देख सकती हो
जिनके बेक़सूर चिरागों को
दहशतगर्द कह कर
हमेशा के लिए बुझा दिया गया.
तुम कुछ ऐसे भी दृश्य
देख सकती हो जो
अत्यंत धुधले हो चुके हैं
शायद उनपर समय की
गर्द बैठ गयी है.
क्या गीता,कुरान और
गुरु-ग्रन्थ की आयतें
नष्ट हो गयीं ?
क्या बुद्ध की शिक्षाएं
अपने अर्थ खो चुकीं ?
मालूम होता है उन्हें
दीमकों ने चाट लिया है
फिर बचा ही क्या है
यहाँ ?
मैं नहीं जानता
कहो प्रिये !
मैं कैसे इस कड़वे यथार्थ को
भूल कर
स्वप्नों में विचरण करूँ ?
कैसे प्रणय के गीत रचूं ?

अंतिम फैसला

हमारी मेहनत हमारे गहने हैं,
हम अपना श्रम बेचते हैं,
अपनी आत्मा नहीं,
और तुम क्या लगा पाओगे हमारी कीमत?
तुम हमें अपना हक़ नहीं देते,
क्योंकि तुम डरते हो,
तुम डरते हो हम निहत्थों से,
तुम मुफ्त खाने वाले हो,
तुम हमें लाठी और,
बन्दूक की नोक पे,
रखते हो-
लेकिन याद रक्खो,
हम अगर असलहे उठायें,
तो हम दमन नहीं,
फैसला करेंगे.
  
अँधेरा और चिंगारी

मैं कुछ भी नहीं था
हाँ,शायद कुछ भी नहीं
मेरी बातें साफ़ और
सपाट थीं
बिलकुल बारिश से धुले
आकाश की तरह
जिन्हें तुम अतिबौद्धिक
दार्शनिक,उन्मादी,सनकी
न जाने क्या क्या नाम देते थे.
मेरा आक्रोश कोई
क्षणिक उत्तेजना,कत्तई नहीं थी
मैं तो उन वर्षों तक की
दबी,कुचली भावनाओं की
एक प्रतिध्वनि मात्र था
मैं तो भोर की ठंडी हवा
के एक झोंके की तरह था
एक नई सुबह की
एक हलकी-सी लकीर भर था
हाँ,मैं कोई रौशनी का चिराग
नहीं था
मैं तो एक चिंगारी मात्र था
जिसे अँधेरा हर वक़्त
खा जाने की जुगत में
लगा रहता है
लेकिन मुझे अपने तुच्छ
होने का
ज़रा भी दुःख नहीं था
क्योंकि मैं फिर भी
अँधेरे से लाख गुना
बेहतर था.
  

मौत के सौदागर
 

ऐ मौत के सौदागरों !
मैं तुम्हें खूब पहचानता हूँ
वो जो तुम्हारे तोपों,बमों और मिसाइलों
को देख कर
तालियाँ पीटते हैं उन्हें भी
खूब जानता हूँ
तुम्हारा ये घिनौना प्रदर्शन
मुझे अखरता है
क्योंकि मैं तुम्हारी खेंची लकीरों को
नहीं मानता
तुम्हारे बटवारे को नहीं मानता
तुम्हारे ओछे और निकृष्ट
राष्ट्रवाद को नहीं मानता
क्योंकि वो इंसानियत के खिलाफ है
सारी खराबियों की जड़ है
वो विध्वंसकारी है
हमें उनकी कोई दरकार नहीं
तुम रक्षक की खाल में
छिपे भेड़िये हो
वक़्त आने दो जनरल !
हम अपने परचम
तुम्हारे सीनों में गाड़ेंगे
और
तुम्हारे ये हथियार,गोले, बारूद
तुम्हारी कब्र में......



(कवि-परिचय:
 जन्म: ज़िला-बलिया, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में जुलाई  30, 1994
संप्रति: अभी दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस आनर्स में स्नातक की पढाई कर रहे
सृजन: बचपन से ही शायरी और कविता का शौक़, छिटपुट प्रकाशन 
संपर्क: thisadnan@gmail.com)

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सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

सुकून का लम्‍हा कि जागती सी एक रात













रश्‍मि शर्मा की  दस कविताएँ





अभि‍शप्‍त आत्‍माओं की नींद

फि‍र बीती एक रात
ध्रुव तारे से आंख मि‍लाते
चांद को बादलों तले
देखते ही देखते छुप जाते
तुम्‍हारी भेजी नींद को
देखा रूठ कर दूर जाते

और अब सुबह
आंखों की कालि‍मा में
ढूंढ रही हूं
एक सुकून का लम्‍हा
कि जागती सी एक रात
फि‍र गुजर गई जिंदगी से

इंतजार में हूं कि
देर से जागने के बाद
कहोगे तुम
बड़ी सुकून भरी नींद आई
बस..सपने में तुम न आई

मैं हंस पडूंगी और कहूंगी
दादी कहती थी
सोए इंसान की आत्‍मा
वि‍चरती है, पूरी करती है
अतृप्‍त कामनाएं, मगर

अभि‍शप्‍त आत्‍माओं को
नींद ही मयस्‍सर नहीं होती
कि‍सी के ख्‍वाब में उतर सके
ऐसी तक़दीर नहीं होती...

 मेरे पास कोई स्‍याहीसोख नहीं

ले आई थी
एक कोरी सी डायरी
जि‍समें
मोति‍यों से अक्षरों में
लि‍खना चाहा मैंने
खूबसूरत नर्म सी सुबह
और बारि‍श के बाद
क्षिति‍ज में फैले धुंध को
मुट़ठि‍यों में समेट लेने के
अहसास से भरे
हसीन हसरतों के कि‍स्‍से

तुम्‍हारे साथ और
तुम्‍हारे बगैर गुजरे, वक्‍त के चि‍थड़े
मगर
नामालूम कैसे
खूबसूरत हर्फों के उपर
उलट पड़ी स्‍याही, मि‍ट गया सब
अब फैले हैं
नीले-नीले धब्‍बे, और
मेरे पास कोई स्‍याहीसोख भी नहीं

 जिंदगी इतनी भी रहमदि‍ल नहीं

होकर बेइख्‍़ति‍यार
छू लि‍या तुम्‍हें
एक आवारा से पल में
मेरे अहसास ने
जबकि‍ तय हुआ था
आजन्‍म
एक मर्यादि‍त दूरी
हमारे दरमि‍यां

प्रेम दंश देता है
और फूलों सा
कोमल अहसास भी
बंदि‍शें जि‍स्‍म की होती है
रूह तो
आजाद उड़ान भरती है

तुम्‍हें हक है, सहस्रबाहु बनो
देह के स्‍पंदन को
मेरी तप्‍त सांसों को
अपनी सांस में भरो
प्रेम के लाल रंग से
जीवन-भीत रंग लो

मगर न भूलना ये
सारे सपने पूरे कर दे
जिंदगी इतनी भी
रहमदि‍ल नहीं होती
एक आवारा पल की शरारत
जिंदगी की दशा और दि‍शा
बदल दि‍या करती है.........

रात की झील पर

रात की झील पर
तैरती उदास कि‍श्‍ती
हर सुबह
आ लगती है कि‍नारे
मगर न जाने क्‍यों
ये जि‍या बहुत
होता है उदास .....

ऐ मेरे मौला
कहां ले जाउं
अब अपने
इश्‍क के सफ़ीने को
तेरी ही उठाई
आंधि‍यां हैं
है तेरे दि‍ए पतवार....

कहती हूं तुझसे अब
सुन ले हाल
जिंदगी की झील पर
उग आए हैं कमल बेशुमार
उठा एक भंवर
मुझको तो डूबा दे
या मेरे मौला
अब पार तू लगा दे......
 
 वक्‍त दो वक्‍त को

सच है
मन के तार की झंकार
बि‍ना साज भी
झंकृत करती है
समूचे अस्‍ति‍त्‍व को
और
वेदना के पलों में
नाजुक संवेदनाएं
और मुखरि‍त होती हैं

हां, मैं हूं अपराधि‍नी
अनजाने ही सही
अनसुनी की मैंने
वो आवाज
जब हृदय के हाहाकार से
दग्‍ध तुम पुकार रहे थे
तुम मेरा नाम

अब जबकि
प्रति‍उत्‍तर न पाकर
दि‍ग्‍भ्रमि‍त होकर वो
कातर आवाज
वि‍लीन हो गर्इ अनंत में
और जो मुझ तक आ रही है
वो तुम्‍हारी नरम और
प्‍यारी ध्‍वनि नहीं
एक ज्‍वालामुखी है

मत करो ध्‍वस्‍त सब कुछ
वक्‍त दो वक्‍त को
धीरज धरो
मन का मौसम भीगा सही
आज हम मीलों दूर कहीं
मगर
चलेगी बासंती पुरवाई
ये यकीन अभी एक
ताजी हवा है लेकर आई.....
 
अक्‍स तेरा ही  झलकता है


मेरे
मन के आंगन में
लगे
तुलसी के बि‍रवे को
प्रेम-जल से
सींचती रही हूं बरसों

संचि‍त कर सीने में
रखा है उस एक छुअन को
जो मेरे माथे पर
सिंदुरी होंठों से
रख दि‍या था तुमने

मेरे प्राण, मेरे श्रृंगार
आईने में
जब भी रूप मेरा
दमकता है
आंखों के काजल से ले
हाथों की मेंहदी तक
अक्‍स तेरा ही
झलकता है.....

फुर्सत के पल

आकाश के
दक्षि‍ण-पश्‍चिम कोने पर
टि‍मटि‍मा रहे
चमकीले तारे ने
पूछा मुझसे......
क्‍या मैं तुम्‍हारे लि‍ए
बस एक फुर्सत का
पल हूं ?
जब दुनि‍या भर के
कामों को
नि‍बटा लेती हो
अपनों को संतुष्‍ट
और परायों को
वि‍दा कर देती हो....
तब
मेरी ओर देखकर
इतनी लंबी सांसे
क्‍यों भरती हो ?
मैं भी चाहता हूं
तुम्‍हें भर आंख देखना
तुमसे कुछ बति‍याना
और तुम्‍हारी
खि‍लखि‍लाहट को सुनना
मगर तुम
तभी आती हो
जब मैं डूबने वाला होता हूं
तुम्‍हारा आना
और मेरा जाना....
क्‍या नि‍यत है हमारा वक्‍त ?
कभी सोचा है तुमने
कि‍ मैं
तुम्‍हारे फुर्सत का पल हूं
या फि‍र
यही एक पल है
जब तुम
तुम्‍हारे साथ होती हो
और मैं
तुम्‍हारे नि‍तांत अपने पल का
एकमात्र साक्षी बनता हूं.....
 
वि‍देह हो जाना चाहता है.

बनकर खुशी
कभी नहीं रहे तुम पास मेरे
जब भी महसूस कि‍या
उमस भरी दोपहरी की तरह ही
मि‍ले तुम
एक अबूझ बेचैनी लि‍ए
दर्द से अनवरत बहते हुए
आंखों में भर आए पानी जैसे
सर के दोनों तरफ की
तड़कती नसों में घुले दर्द के साथ
हरदम आए तुम

फि‍र भी

तुम्‍हारा पास न होना
इतना दर्द देता है जैसे
रेत रहा हो आरी से
एक हरेभरे पेड़ का
मजबूत तना कोई
और दूरी का अहसास
इस तरह पागल करता है
जैसे
शरीर छोड़ने को प्राण तड़पे
मगर मुक्‍ति नहीं मि‍ले

तुम हो न हो
तुम्‍हारा दर्द कसकता, टीसता है
हरदम
फि‍र भी ये नि‍स्‍पृह देह
वि‍देह हो जाना चाहता है
अंतरि‍क्ष में एक घर बनाना चाहता है
चाहे-अनचाहे मि‍ले
सारे दर्द को समेटकर
ध्रुव तारे की तरह हरदम
तेरे-मेरे नाम से 'एकनाम' बन
चमकना चाहता है.......

अनदेखी लि‍पि‍यां

कही तुमने मुझसे
बार-बार वो बातें
जि‍नका मेरे लि‍ए
न कोई अर्थ है
ना ही अस्‍ति‍त्‍व
जो मैं पढ़ना चाहूं
तुम्‍हारे आंखों की
अनदेखी लि‍पि‍यां
कहो कौन सी कूट का
इस्‍तेमाल करूं
मैं ढूंढती रहती हूं
कोई ऐसा स्रोत
ऐसी कि‍ताब
जो आंखों की भाषा को
शब्‍दों में बदलती हो
है ये ईसा पूर्व की या
सोलहवीं सदी
की सी बात
कि हमारे बीच से
शब्‍द अदृश्‍य ही रहे हैं

अब तुम पढ़ना
मेरा मौन, सहना
मेरी अनवरत प्रतीक्षा
और मैं कूट-लि‍पि‍क बन
पढूंगी, आंखों की अनदेखी लि‍पि‍यां
 
है कोई नापना.

कि‍तनी है
आकाश की उँचाई
और धरती की गहराई
ये हम कल्‍पना कर सकते हैं
मगर
नापना चाहकर भी
नाप नहीं सकते
फि‍र
मेरे अंतस में छुपे भावों की
तुम्‍हारे प्रति
छलकते प्‍यार को
और जुड़े रहने की चाह को
क्‍यों नापना चाहते हो
बार-बार
है कोई नापना जो तुम्‍हारे पास
तो दे दो मुझे
मैं बता दूं नापकर
कि कि‍तना प्‍यार है तुमसे.........


(परिचय:
जन्म:   2 अप्रैल 1974,  मेहसी थाना, मोतीहारी, बि‍हार
शिक्षा:   इति‍हास में स्‍नात्‍कोत्‍तर बैचलर ऑफ जर्नलिज्‍म लेखन
सृजन: पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कविताओं का प्रकाशन, शब्द-संवाद व स्त्री होकर सवाल करती है जैसे  कविता संकलनों में भी रचनाएं संगृहित
ब्लॉग: रूप-अरूप
सम्मान: सीएसडीएस का  नेशनल इंक्लूसिव मीडिया फ़ेलोशिप-२०१३
संप्रति:स्‍वतंत्र पत्रकारि‍ता एवं लेखन
संपर्क:rashmiarashmi@gmail.com)   








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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

केशव तिवारी की कविताएँ





 









डर

डर कहीं और था
मैं कहीं और डर रहा था
डर उस जर्जर खड़े
पेड़ की छाँव में था
और मैं धूप से  डर रहा था
दुनिया भर की तमाम
पवित्र किताबें
भय और आतंक से
भरी पडी थीं
और मैं

अपने सबसे डरे समय में
उन्ही को पढ़ रहा था।

 
 मैं इन ठंडी किताबों में क्या कर रहा हूँ


अगर मुझे बाज की उड़ान पसंद है
तो मुझे अपनें पठारी मैदानों में होना चाहिए

तब मैं इस तंग काफी हाउस में
क्या कर  रहा  हूं

अगर मैंने पिछली सर्दी में
आलू बोना सीखा है
तो मुझे ठंडी में अपने
खेत और क्यारियों को
तैयार करना था।

मैं इन ठंडी किताबों में क्या कर रहा हूं

अगर मैंने अभी हाल में
कविता लिखना सीखा है
तो मुझे सबसे पहले
अपने गांव के उस
अलमस्त गडरिये को सुनना चाहिए था

मैं इन वातानूकूलित सभागारों में
क्या कर रहा हूँ।

मुझे वहां होना चाहिए
जहां कहीं नए मकान को
बनाने के बुनियादी प्रयत्न किए जा रहे हैं
इन हवाई किलों में
मेरा दम घुटता है।


जौ  भर नहीं जुमका

 पक कर तैयार है धान की फसल
दूज का चाँद पंहट कर अपनी हंसिया
फसल कटाई की शुरुआत कर रहा है

 मैं फटे कपड़ों में खुद को समेटे
खेत काटती औरतों को देख रहा हूँ
इन्हें इसी हालत में मेरे पुरखों
के पुरखों ने भी देखा था

कब से डटी हैं ये भूख के खिलाफ
इनके हिस्से है इस धरती की भूख
पर इनके समय का धंसा पहिया 
लाख कोशिशों के बाद भी

जौ भर नहीं जुमका
इनका वक्त दुनियां की घड़ियों
के बाहर है
ये धान सटक रही है
इनकी घरों की मुंडेरों पर
बैठा चांद
सुन रहा है इनकी बोलचालभर
मेरा मन समय के उस
धंसे पहिये में ही फंसा है।


 खेत जगाए जा रहें हैं

 दिवाली है
खेत जगाए जा रहे हैं
मेड़ों पर जलाए जा रहे है दिए
न धान को जड़ों भर पानी
न खेतों को कम्पोस्ट और डी .ए.पी .
भूखे प्यासे खड़े हैं खेत
मैं उनको भी जानता हूं
जो इन खेतों के साथ साथ जाग रहे हैं
और उनको भी जो लगातार
सड़ते हुए अनाज पर
गलत बयानी करते जा रहे हैं

 मैं पूछना चाहता हूं
इनकी सजा कौन तय करेगा
ये खेतों के साथ जागते लोग
या फिर एक और तीसरा आयोग

  कराहती क्यों हैं

 रात के पास क्या कोई बीन है
जो घने अंधेरे में भी
बजती है धीमे धीमे

फूल सुंघनी क्या गा गई
सुर्ख अड़हुल के कान में
कि मुंह खोले है अवाक
समुद्र के पास क्या कोई मृदंग है
जो शाम ढलते  ही
देने लगता है ताल
पेड़ों के पास तो
पत्तों की करतल धुने हैं

 सुरों में डूबी धरती
फिर कराहती क्यों है

क्या धरती के हृदय  में
कोई कांटा गड़ा हुआ है।

 मुराद अली

 मशक बीन के उस्ताद मुराद अली
गलगल हो गई शरीर पकी ढाढी
बिना दांत का मुंह
बात-बात में फूलती सांस

ऐसे  ही नहीं थे मुराद अली
जिसने देखा हो उन्हें जवानी में
मशकबीन कांख में दबाए
पैंतरा बदल बदल कर  बजाते

वही जाने क्या थे
गरीब गुरबा सेठ जमींदार
किसके कार परोजन में
नहीं गूंजी उनकी मशक  बीन

मैंने पहली बार इन्ही धुनों  पर
नाचते देखा था नइका को
नयी नयी आई थी ब्याहकर
नाम मिल गया था नइका
कुछ दिन बाद किसी और के
साथ उढर गई
उसके तोड़ की नाचने वाली

फिर नहीं देखी
आज भी याद करते हैं मुराद अली
सूना सूना कर गई गड़रियान
कुछ दिन ही टिकी पर नाम कर गई
 नाचते ही आई थे और
नाचते ही चली गई
चढी दुपरिया जब बाग़ में
टिकाई जाती बारात
सन्नाटे और घमस के बीच
गूंज उठती उनकी मशक बीन
बराती समझ जाते
रंग में मुराद अली
सुर मन में ही नहीं गदराये  आमों में

धीरे धीरे
मिठास की तरह उतर रहे होते
समय के लम्बे दौर  में वो
सक्रिय रहे अपनी मशक बीन
के सुरों के साथ
पूरे के पूरे  पवस्त में कहाँ कहाँ नहीं
उनके सुरों की छाप
हम जैसे कितने जवान हुए
उनके सुरों के साथ
बँसवारी के कितने बांस
कैची से आकाश छूने लगे
भले ही आज भोंडे शोर में
कहीं दब गए  मुराद अली
के मशक बीन के सुर
पर खूंटी पर टंगी लगभग फट चुकी
मशक बीन

यह हिलती डुलती काया
बता रही है अपने समय में
किस तरह हस्तक्षेप किया उसने।

 मोमिना

खटिया बिनती है मोमिना
गाँव- गाँव जाकर
साईकिल मिस्त्री पति नहीं रहा
सयाने होने को दो बच्चे
खटिया बीनना सीख लिया
घुरुहू गडरिया से

यूँ तो दूसरे निकाह की भी
सलाह दी  मायके वालों ने
पर लड़के बेटी का मुंह देख
उधर सोचा भी नहीं

रकम रकम के फूल काढती है
वे अपनी बिनाई  में
आप ने धूप में स्वेटर बुनती
महिलाएं देखी होंगी
नीम के नीचे खटिया बिनते
मोमिना को देखिए

सधे हाथों में बिनाई  का बाध
मछली सी चलती चपल उँगलियाँ
हाथ और चेहरे की तनी नसें
एक थकी थकी फीकी सी मुस्कान

खटिया बिनती मोमिना
मेरे गाँव की
सबसे जागती कविता है

ये जानती भी नहीं कब में
आगे बढ़कर निकल आई
परदे के बाहर
मौलवियों की तिरछी नजर से
बा खबर

गांव -गांव घूमती
जिन्दगी के चिकारे का
तना तार है मोमिना।


(कवि-परिचय:

जन्म:  4 नवम्बर 1963, प्रतापगढ़, अवध के छोटे से गाँव में
शिक्षा:  वाणिज्य स्नातक
सृजन :    देश की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में कविता, समीक्षा और आलेख। ‘इस मिट्टी से बना’, ‘आसान नहीं बिदा कहना’ कविता-संग्रह प्रकाशित
सम्मान:  सूत्र सम्मान से अलंकृत
संप्रति: एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अधिकारी 
संपर्क : keshav_bnd@yahoo.co.in  )

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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

तीन कविताएँ : तीन रंग

                                                          














रोशनी मुरारका की क़लम से 



अब नहीं रहा वो बचपन

पैदा होते ही रोना-बिलखना,
उठना फिर गिरना, गिरकर संभलना,
याद आता है अक्सर,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
परीयों की कहानी, चंदा मामा की कविता पुरानी,
सपनों की दुनिया भी लगती थी प्यारी,
याद आती है रातें वो सारी,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
भागा-दौड़ी, मस्ती-ठिठोली और क्रिकेट की टोली,
पिचकारी भर-भर खेली मित्रों संग होली,
अब रह गई किस्सों में वो केवल,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
पापा की उंगली पकड़कर स्कूल जाना,
पढ़ना, लिखना, मौज-मनाना,
बीत गया वो सारा जमाना,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
रूठना-इतराना, दादा का वो मनाना-फुसलाना,
कंधों पर बैठ मेले दिखाना,
अब अपने में ही कैद हो गया मेरा ये जीवन,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
मामा के संग मजाक में लड़ना-झगड़ना,
सिनेमा में जाकर शोर मचाना,
याद आए ननिहाल वो अपना,
क्योंकि पीछे छुट गया बचपन,
अब नहीं रहा वो बचपन।
चिंता और उम्र के बढ़ते कदमों ने छिन लिया बचपन,
जिम्मेदारियों की आड़ में छिप गया बचपन,
अक्सर तन्हाइयों के क्षणों में याद आ जाता है बचपन,
पता नहीं क्यों जुदा हो जाता है बचपन,
उलझी-सी ज़िंदगी में गुँथ जाता है बचपन।

तन्हाइयाँ ये तन्हाइयाँ
 
तन्हाइयाँ ये तन्हाइयाँ,
घर की चार दिवारी में कैद जीवन की परछाईयाँ,
बिखरी-सी है ज़िंदगी, टुकड़े चंद बिखरे हुए,
समेटते हुए थक गई, हाथों की ये लकीरें,
ढूँढती है मंजिल, देखती है सपने ये आँखें,
नज़र नहीं आती मंज़िल, सिर्फ दूर तक फैली है तनहाइयों की ये रातें,
बिना वजह की ये ज़िंदगी बस यूँ ही बिती जा रही,
वक्त की रेत हाथों से फिसलती जा रही,
ज़िंदगी में अब कोई नहीं लगता अपना, सिवा उस खुदा के,
स्वार्थी इस दुनिया में, रंगमंच के इस देश में,
न गिला है किसी से, न शिकवा किसे से,
ये ज़िंदगी मिली है ईश्वर से, चाहे तन्हाइ ही मिली हो मुझे।

एक दिन फिर तुम आओंगे
 
कल जब किसी ने दस्तक दी तो मुझे लगा तुम आए,
मैं भागी उस ओर जहाँ तुम्हारे होने का भास था
लेकिन अब भी मैं वही गलती कर रही थी
अपने टूटे हुए सपनों को यूँ ही समेट रही थी
जानती हूँ नदी सागर में मिलने पर उससे जुदा नहीं हो सकती
लेकिन हम उसी नदी के दो किनारे है जो कभी मिल नहीं सकते।
सब जानती हूँ बस दिल को समझाना नहीं जानती,
आँखों से रोती हूँ पर दिल की ही सुनती हूँ।
पता नहीं अब भी क्यों लगता है,
तुम जरूर आओंगे और एक दिन फिर नदी अपने अंतिम गंतव्य तक पहुँच जाएगी।

( रचनाकार परिचय:
जन्म: 11 जुलाई 1985       Name-Roshni Murarka
शिक्षा: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा से एम-फिल  
सृजन: कविता और लेख
संप्रति: वर्धा में रहकर स्वतंत्र लेखन 
संपर्क: roshni.boltoye@gmail.com)

 

                                                                
                                                              














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रविवार, 16 दिसंबर 2012

ग़ज़ल इस्मत बचाए फिर रही है.......

एक भी  शे’र अगर हो जाए







 




विजेंद्र शर्मा की क़लम से 
इसमें कोई शक़ नहीं कि अदब की जितनी भी विधाएं हैं, उनमे सबसे मक़बूल ( प्रसिद्ध ) कोई विधा है, तो वो है ग़ज़ल ! दो मिसरों में पूरी सदी की दास्तान बयान करने की सिफ़त ख़ुदा ने सिर्फ़ और सिर्फ़ ग़ज़ल को अता की है ! यही वज्ह है कि जिसे देखो वही ग़ज़ल पे अपने हुनर की आज़माइश कर रहा है ! ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल कहने के लिए शाइर को उर्दू रस्मुल-ख़त (लिपि) आना ज़रूरी है मगर ग़ज़ल से सम्बंधित जो बुनियादी बातें है वे तो ग़ज़ल कहने वाले को पता होनी चाहिए ! ऐसे बहुत से शाइर है जो उर्दू रस्मुल-ख़त नहीं जानते पर उन्होंने बेहतरीन ग़ज़लें कही हैं और उनके क़लाम की उर्दू वालों ने भी पज़ीराई की है ! यहाँ एक बात ये भी कहना चाहूँगा कि अगर किसी ने ठान लिया है कि मैंने ग़ज़ल कहनी है तो उसे उर्दू रस्मुल-ख़त ज़रूर सीखना चाहिए क्यूंकि ग़ज़ल से मुतालिक बहुत सी ऐसी नाज़ुक चीज़ें हैं जिनके भीतर तक बिना उर्दू को जाने पहुंचना बड़ा दुश्वारतरीन है !

शाइरी ज़िंदगी जीने का एक सलीक़ा है और शे’र कहने की पहली शर्त है शाइर की तबीयत शाइराना होना ! कुछ ग़ज़लकार अदब के नक़्शे पे अपने होने का ज़बरदस्ती अहसास करवाना चाहते है उनकी ना तो तबीयत शाइराना है ना ही उनके मिज़ाज की सूरत किसी भी ज़ाविये (कोण) से  ग़ज़ल से मिलती है !

शाइरी की ज़ुबान में शे’र लिखे नहीं कहे जाते हैं ! इस तरह के नकली शाइरों की ज़बराना लिखी ग़ज़लें नए लोगों को ग़ज़ल से दूर कर रही है ! इन दिनों अदब के हर हलके में चाटुकारों की तादाद बढती जा रही है और ठीक उसी अनुपात में नए–नए ग़ज़लकार भी!

शकील जमाली की ताज़ा  ग़ज़ल का एक शे’र मुझे बरबस याद आ रहा है .. इस शे’र को सुनने के बाद ही ये मज़मून लिखने का मन हुआ :--

ग़ज़ल इस्मत बचाए फिर रही है

कई शाइर है बेचारी के पीछे ....

ग़ज़ल का अपना एक अरूज़ (व्याकरण/छंद-शास्त्र  ) होता है ! अरूज़ वो कसौटी है जिस पे ग़ज़ल परखी जाती है ! यहाँ मेरा मक़सद ग़ज़ल का अरूज़ सिखाना नहीं है मगर कुछ बुनियादी चीज़ें है जो ये तथाकथित सुख़नवर ना तो जानते हैं और ना ही जानना चाहतें हैं ! अल्लाह करे ये छोटी–छोटी बाते तो कम से कम शाइरी के साथ खिलवाड़ करने वालों के ज़हन में आ जाए !

ग़ज़ल के पैकर (स्वरुप) को देखें तो ग़ज़ल और नज़्म (कविता ) में बड़ा फर्क ये है कि ग़ज़ल का हर शे’र अपना अलग मफ़हूम (अर्थ) रखता है जबकि कविता शुरू से लेकर हर्फ़े आख़िर (अंतिम शब्द )  तक एक उन्वान (शीर्षक ) के इर्द-गिर्द ही रहती है !

ग़ज़ल कुछ शे’रों के समूह से बनती है ! शे’र लफ़्ज़ का मतलब है जानना  या किसी शै (चीज़ ) से वाकिफ़ होना ! एक शे’र में दो पंक्तियाँ होती हैं ! एक पंक्ति को मिसरा कहते है और  दो मिसरे मिलकर एक शे’र की तामीर (निर्माण )  करते हैं ! किसी शे’र के पहले मिसरे को मिसरा-ए -उला और दूसरे मिसरे को मिसरा ए सानी कहते हैं !किसी भी शे’र के दोनों मिसरों में रब्त (सम्बन्ध ) होना बहुत ज़रूरी है इसके बिना शे’र खारिज माना जाता है !

बहर  वो तराज़ू है जिसपे ग़ज़ल का वज़न तौला जाता है इसे वज़न भी कहते हैं ! बहर में शे’र कहना उतना आसान नहीं है जितना आजकल के कुछ फोटोस्टेट  शाइर समझते हैं ! मोटे तौर पे उन्नीस बहरें प्रचलन में हैं ! बहर को कुछ लोग मीटर भी कहते है ! जो शाइर बहर में शे’र नहीं कहते उन्हें बे-बहरा शाइर कहा जाता है और हमारे अहद का अलमिया (विडंबना ) ये है कि रोज़ ब रोज़ ऐसे शाइर बढ़ते जा रहें हैं ! बहर को समझना एक दिन का काम नहीं है और ना ही सिर्फ़ किताबें पढ़कर बहर की पटरी पे शाइरी की रेल चलाई जा सकती है ! बहर का मुआमला या तो शाइरी के प्रति जुनून से समझ में आता है या फिर बहर की समझ  कुछ शाइरों को ख़ुदा ने बतौर तोहफ़ा अता की है !

रदीफ़ :--शाइरी में हुस्न और ख़यालात में फैलाव के लिए ग़ज़ल में रदीफ़ रखा जाता है ! ग़ज़ल को लय में सजाने में रदीफ़ का अहम् रोल होता है ! मिसाल के तौर पे  मलिकज़ादा “जावेद” साहब का ये मतला और शे’र देखें :--

मुझे सच्चाई की आदत बहुत है !

मगर इस राह में दिक्कत बहुत है !!

किसी फूटपाथ से मुझको ख़रीदो !

मेरी शो रूम में क़ीमत बहुत है !!

इस ग़ज़ल में बहुत है रदीफ़ है जो बाद में ग़ज़ल के हर शे’र के दूसरे मिसरे यानी मिसरा ए सानी में बार – बार आता है

क़ाफ़िया :-- क़ाफ़िया ग़ज़ल का मत्वपूर्ण हिस्सा है बिना क़ाफ़िए के ग़ज़ल मुकम्मल नहीं हो सकती ! शे’र कहने से पहले शाइर के ज़हन में ख़याल आता है और  फिर वो उसे शाइरी बनाने के लिए  रदीफ़,क़ाफ़िए तलाश करता है ! क़ाफ़िए का इंतेखाब (चुनाव )शाइर को बड़ा सोच–समझ कर करना चाहिए ! ग़लत क़ाफ़िए का इस्तेमाल शाइर की मखौल उड़वा देता हैं ! राहत इन्दौरी का ये मतला और  शे’र देखें :--

अपने अहसास को पतवार भी कर सकता है !

हौसला हो तो नदी पार भी कर सकता है !!

जागते रहिये,  की  आवाज़ लगाने वाला !

लूटने वाले को होशियार भी कर सकता है !!

इसमें पतवार,पार,होशियार क़ाफ़िए हैं और “ भी कर सकता है”

रदीफ़ है !जिस शे’र में दोनों मिसरों में क़ाफ़िया आता हो उसे मतला कहते हैं ! किसी ग़ज़ल की आगे की राह मतला ही तय करता है ! मतले में शाइर जो क़ाफ़िए बाँध देता है  फिर उसी के अनुसार उसे आगे के शे’रों में क़ाफ़िए रखने पड़ते हैं ! जैसे किसी शाइर ने मतले में किनारों , बहारों का क़ाफ़िया बांधा है तो वह शाइर पाबन्द हो गया है कि आगे के शे’रों में आरों का ही क़ाफ़िया लगाए ना कि ओ का क़ाफ़िया  जैसे पहाड़ों , ख़यालों का क़ाफ़िया ! हिंदी ग़ज़ल के बड़े शाइर  दुष्यंत कुमार ने भी अपनी ग़ज़लात में ग़लत क़ाफ़िए बांधे और तनक़ीद कारों को बोलने का मौका दिया ! दुष्यंत कुमार की एक बड़ी मशहूर ग़ज़ल है :----

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए !

कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए !!

वे मुतमईन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता !

मैं बेक़रार हूँ आवाज़  में  असर  के लिए !!

इस ग़ज़ल के मतले में “घर” के साथ “शहर” का क़ाफ़िया जायज़ नहीं है ,दुष्यंत साहब जैसे शाइर ने फिर अगले शे’र में “असर” का क़ाफ़िया लगाया उसके बाद इसी ग़ज़ल में उन्होंने “नज़र” ,”बहर” ,”गुलमोहर” और “सफ़र” के क़ाफ़िए बांधे ! इस पूरी ग़ज़ल में शहर और बहर के क़ाफ़िए का इस्तेमाल दोषपूर्ण है ! दुष्यंत कुमार की इसके लिए बड़ी आलोचना भी हुई !

ग़लत क़ाफ़िए को शे’र में बरतना शाइर की मुआफ नहीं करने वाली ग़लती है ! ये सब बातें यूँ ही नहीं आती हैं इसके लिए अच्छा मुताला (अध्ययन) होना ज़रूरी है मगर लोगों को पढ़ने का तो वक़्त ही नहीं है बस क़लम और काग़ज़ पर कहर बरपा के सिर्फ़ छपने का शौक़ है ! स्वयंभू ग़ज़लकारों के अख़बारात और रिसालों में छपने की  इस हवस ने सबसे ज़ियादा नुक़सान शाइरी का किया है !

वापिस ग़ज़ल  पे आता हूँ .. शाइर अपने जिस उपनाम से जाना जाता है उसे ”तख़ल्लुस” कहते हैं और अपने तख़ल्लुस का जिस शे’र में शाइर इस्तेमाल करता  है वो शे’र  “मक़ता” कहलाता है !

मासूम परिंदों को आता ही नहीं “निकहत” !

आगाज़ से घबराना ,अंजाम से डर जाना !!

ये मक़ता डॉ.नसीम “निकहत” साहिबा का है, शाइरा ने इस शे’र में अपने तख़ल्लुस का इस्तेमाल किया है सो ये मक़ता हुआ !

ग़ज़ल से त-अल्लुक़  रखने वाली  जिन बातों का मैंने ज़िक्र किया, अपने ख़यालात को ग़ज़ल बनाने के लिए सिर्फ इतना जान लेना ही काफ़ी नहीं है ! ग़ज़ल कहने के लायक बनने  के लिए और भी बहुत से क़ायदे-क़ानून /ऐब - हुनर हैं जिन्हें एक शाइर को सीखना चाहिए !

शाइरी में कुछ ऐब है जिन्हें  शुरू – शुरू में हर शाइर नज़रंदाज़ करता है !ये ऐब अच्छे –भले शे’र और शाइर  को तनक़ीद वालों (आलोचकों ) के कटघरे में खड़ा कर देतें हैं !

शतुरगुरबा ऐब ..शतुर माने ऊंट और गुरबा माने बिल्ली यानी ऊंट –बिल्ली को एक साथ ले आना इस ऐब को जन्म देता है! ग़फ़लत में शाइर ये ग़लती कर जाता है ! जैसे पहले मिसरे में “आप” का इस्तेमाल हो और दूसरे में “तुम” का प्रयोग करे या यूँ कहें कि संबोधन में समानता ना हो तो शतुरगुरबा ऐब हो जाता है !

ग़ज़ल में कभी “ना” लफ़्ज़ का इस्तेमाल नहीं होता इसकी जगह सिर्फ़ “न” का ही प्रयोग किया जाता है ,”ना” का इस्तेमाल सिर्फ़ उस जगह किया जाता है जहां “ना“हाँ की सूरत में हो जैसे भाई पवन दीक्षित का ये शे’र :-

पारसाई न काम आई ना !

और कर ले शराब से तौबा !!

ज़म :-- कई बार शाइर ऐसा मिसरा लगा देते है जिसका अर्थ बहुत बेहूदा निकलता है ,या शाइर से  ऐसे लफ़्ज़ का अनजाने में इस्तेमाल हो जाता है  जिसके  मआनी फिर शाइरी की तहज़ीब से  मेल नहीं खाते ! ज़म के ऐब से शाइर को बचना चाहिए !

कई बार शाइर बहर के चक्कर में अब, ये, तो,भी,वो आदि लफ़्ज़ बिना वज्ह शे’र में डाल देता है जबकि कहन में उस लफ़्ज़ की कोई ज़रूरत नहीं होती ! शाइर को भर्ती के लफ़्ज़ों के इस्तेमाल से भी बचना चाहिए ! जहां तक शाइरी में ऐब का सवाल है और भी बहुत से ऐब है जिन्हें एक शाइर अध्ययन और मश्क़ कर- कर के अपने कहन से दूर कर सकता है !

शाइरी में ऐब इतने ढूंढें जा सकते है कि जिनकी गिनती करना मुश्किल है मगर जहां तक हुनर का सवाल है वो सिर्फ़ एक ही है और वो है “बात कहने का सलीक़ा” ! अपने ख़याल को काग़ज़ पे सलीक़े से उतारना आ जाए तो समझो उस शाइर को शाइरी का सबसे बड़ा हुनर आ गया है ! एक सलीक़ामंद शाइर बेजान मफ़हूम और गिरे पड़े लफ़्ज़ों को भी अपने इसी हुनर से ख़ूबसूरत शे’र में तब्दील कर सकता है ! ज़ोया साहब के ये मिसरे मेरी इस बात की पुरज़ोर वकालत कर सकते हैं :-

कट रही है ज़िंदगी रोते हुए !

और वो भी आपके होते हुए !!

इसी तरह शमीम बीकानेरी साहब का एक मतला और शे’र बतौर मिसाल अपनी बात को और पुख्ता करने के लिए पेश करता हूँ :--

रातों  के  सूनेपन  से  घबरायें क्या !

ख़्वाब आँखों से पूछते हैं, हम आयें क्या !!

बेवा का सा हुस्न है दुनिया का यारों !

मांग इसकी सिन्दूर से हम भर जायें क्या !!


मामूली से नज़र आने वाले लफ़्ज़ों को इस तरह के मेयारी  शे’रों की माला में मोती सा पिरो देने का कमाल एक दिन में नहीं आता इसके लिए बहुत तपस्या करनी पड़ती है,शाइरी की इबादत करनी पड़ती है और अपने बुज़ुर्गों के पाँव दबाने पड़ते हैं ! मुनव्वर राना ने यूँ ही थोड़ी कहा है :-

ख़ुद से चलकर नहीं ये तर्ज़े-सुख़न आया है !

पाँव दाबे हैं बुज़ुर्गों के तो फ़न आया है !!

ग़ज़ल कहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है आपके पास एक ख़ूबसूरत ख़याल का होना ! उसके बाद उस ख़याल को मिसरों में ढालने के लिए उसी मेयार के लफ़्ज़ भी होंने चाहिए ! लफ़्ज़ अकेले शाइरी में नहीं ढल सकते इसके लिए एक शाइर के पास अहसासात की दौलत होना बहुत ज़रूरी है !एक शाइर के पास अल्फ़ाज़ का ख़ज़ाना भी  इतना समृद्ध होना चाहिए कि उसके ज़हन में अगर कोई ख़याल आये तो उसे लफ़्ज़ों के अकाल के चलते मायूस ना लौटना पड़े !

ग़ज़ल का एक-एक शे’र शाइर से मश्क़ (मेहनत) माँगता है ! किसी शाइर का सिर्फ़ एक मिसरा सुनकर इस बात को बा-आसानी कहा जा सकता है कि इन साहब को शे’र कहने की सलाहियत है या नहीं !

एक और अहम् चीज़ शाइरी को संवारती है वो है इस्ल्लाह (सलाह-मशविरा ) ! कुछ ऐसे ग़ज़लकार हैं जो अपनी तख़लीक़ को ही सब कुछ समझते हैं ! किसी जानकार से सलाह लेना उन्हें अपनी अना के क़द को छोटा करने जैसा लगता है !  शाइरी में इन दिनों उस्ताद–शागिर्द की रिवायत का कम हो जाना भी शाइरी के मेयार के गिरने की एक बड़ी वज्ह है !

जिस शाइर में आईना देखने का हौसला है ,अपने क़लाम पे  हुई सच्ची तनक़ीद (समीक्षा ) को सुनने का मादा है तो उस शाइर का मुस्तक़बिल यक़ीनन सुनहरा है ! जो तथाकथित शाइर बिना मशकक़त किये बस छपने के फितूर में क़लम घिसे जा रहे हैं वे ग़ज़ल और पाठकों के साथ – साथ ख़ुद को भी धोखा दे रहें हैं !

छपास के शौक़ीनों ने ग़ज़लों के साथ–साथ दोहों पर भी कोई कम ज़ुल्म नहीं ढायें हैं ! दोहे का अरूज़ भी ग़ज़ल जैसा ही है ,ग़ज़ल उन्नीस बहरों में कही जाती है दोहे की बस एक ही बहर होती है ! सरगम सरगम सारगम,सरगम सरगम सार!

 ग़ज़ल कहने के लिए कम से कम आठ – दस क़ाफ़िए आपके ज़हन में होने चाहियें मगर दोहे में तो सिर्फ़ दो ही क़ाफ़ियों की ज़रूरत होती है तो भी अपने आप को मंझा हुआ दोहाकार कहने वाले ऐसे –ऐसे दोहे लिख रहें है जिनके बरते हुए क़ाफ़िए आपस में ही झगड़ते रहते हैं ! ऐसे दोहों से त्रस्त होकर मैंने एक दोहा लिखा था :---

दोहे में दो क़ाफ़िए , दोनों ही बे-मेल !

ना आवे जो खेलना ,क्यूँ खेलो वो खेल !!

ग़ज़ल के शे’र और दोहे छंद की मर्यादा में कहे जाते है! बिना बहर और छंद के इल्म के इन दोनों विधाओं पे हाथ आज़माना सिर्फ़ अपनी हंसी उड़वाना है ! ग़ज़ल के सर से दुपट्टा उतारने वाले ये क्यूँ नहीं समझते कि पाठक इतने बेवकूफ़ नहीं है जितना वे समझते हैं ! एक अलमिया ये भी है कि बहुत से जानकार लोग सब कुछ जानते हुए भी इनकी ग़ज़लों की तारीफ़ कर देते हैं जिससे इन नक़ली सुख़नवरों का हौसला और बढ़ जाता है ! अपने ज़ाती मरासिम (सम्बन्ध) बनाए रखने के लिए कुछ मोतबर शाइर भी ग़ज़ल के श्रंगार से छेड़- छाड़ करने वालों की शान में जब कसीदे पढ़ते है तो ऐसे अदीब (साहित्यकार) भी मुझे  ग़ज़ल के दुश्मन नज़र आते है !

मैं जानता हूँ ये मज़मून बहुत से लोगों के सीने पे सांप की तरह रेंगेगा मगर ये कड़वी बातें मैंने शाइरी के हित में ही लिखी हैं ! ग़ज़ल से बे-इन्तेहा मुहब्बत ने मुझे ये सब लिखने की हिम्मत दी है ! मैं जानता हूँ ज़ाती तौर पे मुझे इसका नुक़सान भी होगा , कुछ अदब के मुहाफ़िज़ नाराज़ भी हो जायेंगे खैर ये सच बोलने के इनआम हैं ! जब पहली मरतबा ये पुरस्कार मुझे मिला तो ये पंक्तियाँ  ख़ुद ब ख़ुद हो गयी थी  :--

इक सच बोला और फिर , देखा ऐसा हाल !

कुछ ने नज़रें फेर लीं , कुछ की आँखें लाल !!

ग़ज़ल का ये बड़प्पन है कि वो उनको भी अपना समझ लेती है जो उसके साथ चलने की तो छोडिये साथ खड़े होने के भी क़ाबिल नहीं हैं ! अपने आपको शाइर समझने वाले ग़ज़ल के ख़िदमतगारों से मेरी गुज़ारिश है कि ग़ज़ल कहने से पहले इसे कहने का हक़ रखने के लायक बने ! ग़ज़ल कहने से पहले उसके तमाम पेचो-ख़म के बारे में जाने ! शाइरों का काम आबरू ए ग़ज़ल की हिफ़ाज़त करना है ना कि ग़ज़ल को बे-लिबास करना ! केवल तुक मिलाने से सुख़नवर होने का सुख नहीं मिलता  जहां तक तुकबंदी का सवाल है तुकबंदी तो लखनऊ ,दिल्ली और लाहौर के तांगे वाले भी इन शाइरों से अच्छी कर लेते है ! ग़ज़ल से बिना मुहब्बत किये उसकी मांग भरने की ख़्वाहिश रखने वाले इन अदीबों से एक और इसरार (निवेदन) कि छपने और झूठी शुहरत के चस्के में ऐसा कुछ ना लिखें  जिससे जन्नत में आराम फरमा रही  मीर ओ ग़ालिब की रूहों का चैन और सुकून छीन जाए और यहाँ ज़मीन पे ग़ज़ल का दामन उनके आंसुओं  से तर हो जाए !

परवरदिगार से ग़ज़ल के हक़ में यही दुआ करता हूँ  कि ख़ुद को शाइर समझने का वहम पालने वाले ग़ज़ल को बेवा ना समझें ,ग़ज़ल कहने से पहले उसे कहने की सलाहियत, अपने जुनून, अपनी मेहनत, अपनी साधना से हासिल करें ताकि ग़ज़ल भी अदब के बाज़ार में इठलाती हुई चल सके और ख़ाकसार को अपने दिल पे ग़ज़ल की पीड़ा का टनों बोझ लेकर किसी शाइर को जो तथाकथित ग़ज़लकार कहना पड़ता है वो फिर से ना कहना पड़े ! आख़िर में तश्ना कानपुरी के इसी मतले के साथ इजाज़त चाहता हूँ ...

एक भी  शे’र अगर हो जाए !

अपने होने की ख़बर हो जाए !!

आमीन..!






(लेखक परिचय 
जन्म: 15 अगस्त 1972, हनुमान गढ़ (राजस्थान)
शिक्षा: विद्युत् इंजीनियरिंग में स्नातक एवं एमबीए
सृजन:
गत पंद्रह  वर्षों से शायरी पर लेखन. दोहा  लेखन भी ...
           विभिन्न अखबारात के लिए साप्ताहिक कॉलम
सम्प्रति:
सीमा सुरक्षा बल में सहायक कमांडेंट ( विद्युत् ), बीकानेर
संपर्क:  vijendra.vijen@gmail.com )



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