बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

हौसला फिर से कश्मीर को बना रहा जन्नत

 फोटो रमीज़


श्रीनगर से सैयद शहरोज़ क़मर

लाल चौक धूप में भले चटक रहा हो, लेकिन फुटपाथ पर दुकानों से सामान निकालकर बेचने वालों और खरीदारों के चेहरे से रौनक गायब है. जबकि नाम के अनुरूप ही श्रीनगर के इस दिल की लालिमा निशात बाग़ की तरह ही खुश बाग़ हुआ करती थी. जबकि डेढ़ माह पहले समूचा शहर ही डल झील हो चुका था। डल पर बसी चालीस हजार आबादी अपने चौदह हजार शिकारे के साथ नहर बनी सड़कों पर आ चुकी थी। इनके साथ ही मुन्ना भाई, वसीम, करतार और उमर जैसे युवाओं की टोलियां। इन सबने हौसले की कश्ती से लाखों लोगों की जानें बचाईं। वहीं लतीफ खान जैसों ने अपने होटल में लंगर खोल दिया।
यह 7 सितम्बर की बात है. फ़िज़ा में शोर व खौफ था. बीस से चौबीस फ़ीट पानी में डूबे घरों से निकलने की हड़बड़ाहट का प्रवाह झेलम से भी तेज़ था. मजहूर नगर के गगन दीप कोहली सुबह जल्दी उठ गए थे। उन्हें गुरुद्वारा में अरदास के बाद लाल चौक अपनी जूतों की दूकान खोलनी थी. लेकिन खिड़की से झाँका तो उनके पैरों तले ज़मीन न थी. बस था पानी-पानी। बाहर शिकारे लिए मोहल्ले के युवा। गगन ने माँ, पत्नी और दो बच्चे को लिया और उस पर बैठ गये. लेकिन कुछ दूर पर ही नाव पलट गयी. सभी सवार को बचा तो लिया गया. पर गगन को ही धरती ने समो लिया। लाल चौक स्थित कोहली एंड संस धन तेरस पर खुली है। इसे संभाल रही हैं, अरविंदर कौर और जिंदर। इनकी आंखों में रह -रह कर सैलाब उमड़ पड़ता है।  गगन दीप कोहली का शोक इन महिलाओं के चेहरों पर अयां है। मां जिंदर तो कभी-कभार पहले भी दुकान आ जाया करती रही हैं। पर गगन की पत्नी अरविंदर पहली बार साहस बटोर रही हैं। दुकान के सारे जूते-चप्पल पानी में होम हुए। गगन के भाई दिल्ली से नया माल लेकर आए। वहीं हिम्मत ने शोक को हवा किया। 















इधर, जम्मू एंड कश्मीर बैंक की कार्गो शाखा दफ्तर पहुंची काशिफा नज़ीर की उंगलियां की-पेड पर कांपती हैं, लेकिन यह कंपन 7 सितंबर से काफी कम है, लेकिन उनकी आँखों में उतरी झेलम डेढ़ माह पहले ठहरी। उसका असर उनके गालों पर ज़र्द हुआ जाता है. उनकी ललाट पर खिल-खिलाती उनकी बच्चियां। जल-प्रलय की चपेट में आया रविवार का दिन था. काशिफा आसिफ सरवाल ने बच्चों के साथ चश्म शाही जाने का इरादा किया था. लेकिन वे कुछ समझ और संभल पाते कि इससे पहले अचानक ही राज बाग़ जैसे उनके इलाक़े में चारों तरफ तबाही फैल चुकी थी.

उनके घर के पास भी लोग शिकारे लेकर पहुंचे। आसिफ ने उस पर काशिफा के साथ तीन छोटी बच्चियों और माँ हाजरा बेगम को बैठा दिया। पर कुछ देर बाद यह नाव भी पानी का वेग न संभाल सकी। दादी की गोद में सात माह की राहत, तो काशिफा ने ढाई साल की सर्वत का हाथ थामा। बड़ी बिटिया तरावत खुद पानी में. इधर, आसिफ जब कुछ देर बाद दूसरी नाव से सुरक्षित जगह पहुंचे तो पत्नी, माँ और बच्चियों को न पाकर बेचैन हो गए. घंटे भर बाद भी जब उनका पता न चला तो उनकी बेज़ारी बढ़ गयी. काशिफ़ा जब तरावत के साथ पहुंची तो लिपट कर सुबकने लगी. दूध मुँही बच्ची समेत सर्वत और माँ के डूबने की खबर ने आसिफ को चिनार के पत्तों की तरह बिखेर दिया.    


लेकिन कहते हैं कि तमसो मा ज्योतिर्गमय। आसिफ हो काशिफ़ा, अरविंदर हों राजिंदर या राजा खान के परिजन। और ऐसे ढेरों लोग जिनके घरों के चिराग हमेश के लिए बुझ गए। लेकिन अब इन्होने बिखरे तिनकों को इकठ्ठा कर ज़िन्दगी को नयी रौशनी दी है। बक़ौल कश्मीरी कवि लल दह आमे पन रस नाए छस लमान कच्चे धागे की मदद से काशिफा, आरिफा, मदीहा और गुरप्रीत अपनी किश्ती को खींच रही हैं। मदीहा एनआईटी से मेकेनिकल इंजीनियरिंग कर रही हैं। उनका घर पूरी तरह तबाह हो गया। मामू के घर से फिलहाल इंस्टीच्यूट आना-जाना करती हैं। शीतरा शाही का गुरप्रीत का घर भी कहां रहा। दीवारों के साथ उस ऑटो को भी तो गिरी छत ने लील लिया, जिसे उनके पति कँवल नैन सिंह चलते थे। भास्कर टीम जब पहुंची तो पूरा परिवार घरों के बिखरे तिनकों को इकट्ठा कर रहा था। उनकी बेटी सिमरन का आत्मविश्वास बोलता है, रब्बा ने दर्द दिया वही दवा देगा। अब ज़िन्दगी है. यही हौसला मुन्ना भाई में नज़र आया। मलवे में दबी दुकानों से किसी तरह सामान निकाल कर धोने और चमकाने में लगे हैं। उनका जज़्बे का तेज शहीद गंज पुलिया पर दौड़ती ज़िन्दगी में भी अकार पाता है। झेलम की नहर पर बनी इस पुलिया ने भी तो साथ छोड़ दिया था। पर लोगों ने आपसी मदद से उसे बना डाला, न वक़्त रुकता है , न ही हवा-बवंडर लेकिन इंसानी हिम्मत चिर युवा होती है। इसका एहसास जवाहर श्रीनगर से अनंत नाग तक दिखा। फ़िदा हुसैन के तीन भाई हैं, सभी ने साथ-साथ एक जगह आशियाने बनाये। पर अब बचा है तो सिर्फ ईंट और गारे का ढेर। फ़िदा जब बिना यूनिफार्म के अपनी बेटियों को स्कूल छोड़ने के लिए निकले तो उनकी माँ की आँखें से चश्मा (झरना) तारी हो गया, जिसे उनका चश्मा (ऐनक ) न छुपा सका। सारे कपड़ों और सामानों के साथ यूनिफार्म और किताबें भी तो नष्ट हो गयीं। लेकिन उड़ान निसंदेह हौसले में होती है, यही हौसला कश्मीर को फिर से जन्नत बना रहा है।  


फोटो रमीज़     



भास्कर के कई संस्करणों में 26 अक्टूबर 2014 के अंक में प्रकाशित

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गुरुवार, 4 सितंबर 2008

पानी में डूबा बिहार

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अल्प समय में ही साहित्यिक गलियारों में अपना मक़ाम बना चुकी पत्रिका बया के संपादक और कथाकार-मित्र गौरीनाथ अभी -अभी बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों से लौटे हैं.उनकी रुदाद सिर्फ़ मार्मिक ही नहीं बल्कि सियासतदानों की कलई खोल देती है.वो आक्रोश में कहते हैं कि ये बाढ़ आई नहीं लायी गई है.और जिन्हों ने लाया अब वो करोड़ों लूट रहे हैं.उनका कहना है कि अगर समय रहते बाँध की मरम्मत कर ली जाती तो ऐसी नौबत हरगिज़ न आती।

रियाजुल हक़ युवा पत्रकार साथी हैं.फिलवक्त पटना में प्रभात ख़बर से संबंद्ध हैं. उन्होंने पत्रकारिता के लिए समर्पित
साथी आलोक प्रकाश पुतुल की वेब पत्रिका रविवार के लिए बहुत प्रभावी रपट पानी बढ़ रहा है कलमबंद किया है, इसका कुछ अंश हम साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
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सुपौल और मधेपुरा के बाढ़ग्रस्त इलाकों से लौटकर
रियाजुल हक़




70 साल के बूढे जोगेंदर ने सामान तो मचान पर चढा दिया है, लेकिन गेहूं-मकई नहीं चढा पाये। अकेले हैं. दोनों बेटे बहुओं-बच्चों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने गये हैं. खैनी ठोंकते हुए वे हंसते हैं- उदास हंसी-“ यही तेजी रही तो कल तक सडक पार कर जायेगा पानी.” 65-70 साल की जिदंगी में पहली बार देखा है अपने घर में पानी भरते हुए. घर गया. अनाज गया. उनके खेत उन्हें खाने लायक अनाज दे देते हैं- गेहूं, धान, मकई. इस बार सब खत्म. खेत में खडी धान की फसल को बाढ लील गयी, घर में रखा अनाज पानी में डूब गया.... लोग जुट आये हैं. वे सुनाते हैं- “ सौ साल पहले यहां कोसी बहती थी. अब लगता है, वह फिर लौट आयी है.” बेचन यादव, कारी, तेजनारायण, रामदेव, संजय व शैलेंद्र ... दर्जनों लोग, सबके पास कई-कई कहानियां. किसी के आंगन में पोरसा भर पानी है, तो किसी के घर में सांप घुस आया है. अभी लेकिन सब शांत हैं-चिंता की एक रेख तक नहीं है. कहते हैं- अभी सड़क तो है ही सोने के लिए. ज्यादा डूबने लगेगा तो प्लान करेंगे निकलने का....लेकिन बूढे जोगेंदर को यह भी चिंता नहीं. वे अपनी खैनी होठों के नीचे दाब चुके हैं-“ हम अकेले आदमी, मर जायेंगे तो क्या होगा ? सांप भी कांट लेगा, तो क्या होगा ?”
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ऐसा मंजर कभी नहीं...
मधेपुरा जिले के सिंहेश्र्वर मंदिर धर्मशाला से निकलती दलित औरतों के मुंह से कुछ अस्फुट से बोल फूटते हैं-सगरे समैया हे कोसी माई, सावन-भादो दहेला... पूजा गीत। औरतों के चेहरों पर उदासी मिश्रित भय है... हर मंगल को दीप जलाने-संझा दिखाने के बाद भी नहीं मानीं कोसी माई. ...परसा, हरिराहा, कवियाही, रामपुर लाही... शंकरपुर व कुमारखंड प्रखंडों के दर्जनों जलमग्न गांवों से उजडे हजारों लोग पिछले चार दिनों से धर्मशाला में डेरा डाले हुए हैं. यहां रहने के लिए पक्के कमरे हैं. मूढी, चूडा, चीनी, खिचडी व बिस्कुट सबका इंतजाम है. बच्चे चूडा-गुड़ पाकर खुश हैं...बेवजह शोर मचा रहे हैं. बूढे-बुजुर्ग माथे पर जोर देकर याद करने की कोशिश करते हैं कोई पुरानी बात... बाप-दादों की स्मृतियों को भी खंगाल रहे हैं- “ उंहू. ऐसी बाढ मेरे देखे में तो कभी नहीं आयी. बाप-दादे भी कुछ नहीं बता गये. 30 साल पहले पानी भरा था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि पाट की पूरी फसल डूब जाये फुनगी तक.”
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नई खबर, नया दुख...

कटैया बाजार पर पंडा नगर से भैंसे हांक कर ला रहे किसानों ने बताया- वीरपुर बाजार में कमर भर पानी है। भीमनगर बाजार में सरकारी राहत शिविर के सामने आधे घंटे से रोटियों के लिए खडे विकास कुमार राम ने आग्रह करते हुए लिखाया-“ वीरपुर के कुमार चौक में 50 आदमी फंसे हुए हैं.” विकास आज ही वीरपुर से निकला है किसी तरह. कोसी ने लगभग पूरी तरह लील लिया है वीरपुर को. क्या बचा है वहां अब. जो दशा है वहां की ... एक-एक कर नयी सूचनाएं मिल रही हैं वीरपुर से-मानो एक अंधकार से परदा उठ रहा हो. वीरपुर से कुसहा की दूरी महज छह किलोमीटर है और सोमवार को बांध टूटने के बाद भारत में पहला बडा आघात वीरपुर को झेलना पडा. सुपौल जिले के इस इलाके में लोगों के बीच लगातार अफवाहों का बाज़ार गर्म था. सोमवार की सुबह से ही वीरपुर बाजार में अफवाहें थीं कि बांध को खतरा है, लेकिन अधिकारिक तौर पर कोई सूचना नहीं थी. इससे लोगों ने निकलने की तैयारी भी नहीं की. बूढ-पुरनियों ने इन अफवाहों को चुटकी में उडा दिया-पानी तो आता ही रहता है. इस बार भी आया है, तो पहले की तरह ही निकल जायेगा. ...खतरे की गंभीरता का अंदेशा किसी को नहीं था.लेकिन शाम साढे छह बजे पानी शहर में घुसा और घंटे भर में पूरा शहर तीन से चार फुट पानी से भर गया. किसी को निकलने का मौका नहीं मिला. पूरा हफ्ता निकल जाने पर भी वीरपुर में आधा से अधिक लोग फंसे हुए हैं. राहत अब कुछ जाने भी लगी है, तो वह सिर्फ वीरपुर तक सीमित है. आसपास के गांव अब भी अछूते हैं. भीमनगर में मिले परमानंदपुर के एक निवासी ने बताया कि उधर अब तक कोई पहुंचा ही नहीं. रानीपट्टी से आ रहे रंजीत पासवान ने सूचना दी-सारे आदमी फंसे हुए हैं गांव में. बसमतिया रोड पर 30-40 फुट जगह बची है. उसी पर डेढ-दो हजार आदमी रह रहे हैं. खाने-पीने का कोई सामान नहीं. दो-तीन आदमी मर भी गये हैं. कटैया से वीरपुर आठ किलोमीटर है और भीमनगर से पांच. अब नावें वीरपुर तक पहुंचने लगी हैं, लेकिन वे बहुत महंगी हैं. एक नाव एक बार वीरपुर जाने के लिए पांच से छह हजार रुपये लेती है. उसमें भी पानी की धार देखते हुए इन छोटी नांवों से वहां जाना जोखिम भरा है. कटैया में एक चाय दुकान पर मिलते हैं, दिलीप कुमार गुप्ता. उनके पास वीरपुर से आज सुबह तक की सूचनाएं हैं-अब भी हरेक कॉलोनी में सात फुट पानी है. वीरपुर कोसी पुल के हॉस्टल की छत पर तीन सौ आदमी हैं. फतेहपुर स्कूल पर 50-60 आदमी हैं. कहीं कोई मदद नहीं मिल पायी है.वे सुनाते हैं-पूरा गांव भंस गया है फतेपुर का. वीरपुर बाजार में अरबों की संपत्ति का नुकसान है. क्वार्टरों में चोरियां बढ गयी हैं. जो नाववाला दिन में वीरपुर से कटैया पहुंचाता है, वही रात में जा कर खाली घरों पर हाथ साफ करता है. तीन महला मकान गिर रहे हैं. दिलीप कटैया में वीरपुरवालों को सूचना देते हैं चिल्ला कर : चानो मिस्त्री, रमेश कुमार, अख्तर बैंड, दुक्खी बैंड, मनोज पाठक के मकान टूट गये हैं.कुछ दूसरी सूचनाएं भी मिली हैं- वीरपुर जेल में 87 कैदी थे. असुरक्षित. चार दिनों से उनका खाना बंद था. जेल के कर्मचारी भाग चुके थे. अंत में कैदियों ने धोतियां-चादरें जोडीं और भाग गये. उनमें से कितने बचे-कितने डूब गये, अभी कौन बता सकता है? सिविल कोर्ट, अनुमंडल ऑफिस के हजारों रेकॉर्ड पानी में खत्म. धान और पाट की खेती डूब गयी. बीसियों हजार लोग बरबाद हो गये.
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जीना भूल गए

भीमनगर से कटैया आनेवाली सड़क राहगीरों से भरी है. उजडे-बरबाद हुए परिवार छोटे ठेलों पर, कंधे पर सामान लिये जानवर हांकते आ रहे हैं. थके-हारे चेहरे-उदास आंखें. लोग हंसना भूल गये हैं. गलती से कोई बाहरी आदमी हंस दे, तो लोग चौंक उठते हैं. जानवर तक डकरना भूल गये हैं. बूढी, कमर झुकी औरतें भी, बच्चे भी गठरियां उठाये तेजी से चल रहे हैं. कहां पहुंचना है, पता नहीं. कोसी ने उन्हें कहीं का नहीं छोडा.सडक के किनारे बाढ का पानी तेजी से थांप मारता है. कभी-कभी कोई गाड़ी भीड के बीच से गुजर जाती है सीटी बजाती हुई... एक औरत रास्ते की दूसरी ओर अपने किसी परिचित से कह रही है-वीरपुर तो अब सपना हो गया.
... कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
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........ राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री नीतीश मिश्रा बलुआ के निवासी हैं। बलुआ से आये लोग बताते हैं कि वहां न कोई नाव है, न राहत। बलुआ हाइ स्कूल पर 200 लोगों ने शरण ली थी. शुक्रवार 22 अगस्त को छत गिर गयी. उनमें से कम ही होंगे, जो बच पाये होंगे.लेकिन जो जीवित हैं, वे भी हताश हो रहे हैं. एक टेंट में सूखा चूड़ा फांक रहे उपेंद्र प्रसाद कहते हैं-“ और दो चार दिन कुछ नहीं मिला तो लोग भूखे मर जायेंगे. अभी तो जिंदा देख रहे हैं न, चार दिन बाद लाश देखियेगा लोगों की.”
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