बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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गुरुवार, 26 अगस्त 2010

पैसे से खलनायकी ...सफ़र कबाड़ का

 उड़ीसा से छत्तीसगढ़ तक वेदांता की ख़ूनी रेल















सैयद एस क़मर की कलम से



  यह कोई फ़िल्मी  कहानी नहीं है जिसमें एक कुली मजदूर किस तरह रातों रात खरब पति बन जाता है,यह कहानी वेदांता जैसी कंपनी के मालिक की  है, जिसकी छवि आम लोगों के दरम्यान खलनायक की है ,लेकिन उसे  नायक बनाने के लिए कुछ अफसरों और राजनेताओं ने सारे नियम-कानून को धता बताते हुए ज़मीन-आसमान एक कर दिए हैं। जो किसी भी मोल पर अपने साम्राज्य को बढाए रखना चाहता है, जहां सिसकती विधवाएं हैं ,जवाँ बेटे को खो चुकी बुढी माओं का विलाप है और दरवाज़े को निहार रही उन बच्चों की मासूमियत है, जिनके पिता रोज़ काम करने जाते हैं लेकिन लौट कर कभी नहीं आते! बालको की चिमनी में राख कर दिए जाते हैं । कुछ की ख़बर भी नहीं लगती । ख़बर है कि उड़ीसा में पर्यावरण दोष के कारण वेदांता की एक परियोजना को प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे सुरम्य और शांत अंचल की सुध किसे है। यहाँ तो वही होता है जो अनिल अग्रवाल चाहें या उनके सुपारी पर पल रहे  सरकारी अमले  !

उड़ीसा में आदिवासियों की सुन ली गयी। वेदान्ता जैसी कुख्यात कंपनी के पर सरकार ने कुतर दिए. हम कह सकते हैं बोलो जयराम!! केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम नरेश ने एन. सी. सक्सेना की रिपोर्ट के आधार पर उड़ीसा के कालाहांडी जिले की कंपनी की खनन योजना पर रोक लगा दी । इस खनन योजना से पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम का घोर उलंघ्घन हो रहा था। अनिल अग्रवाल  की कंपनी वेदांता नियमगिरि पहाडिय़ों में बाक्साइड  निकालने के लिए कऱीब पांच हज़ार करोड़ की योजना पर काम कर रही थी। पश्चिमी उड़ीसा के हरे भरे अकाल के नाम से कुख्यात जिले कालाहांडी के तिहत आने वाला प्रस्तावित खनन का यह इलाक़ा डोंगरिया आदिवासियों का गढ़ है। सक्सेना रिपोर्ट के मुताबिक 7500 वर्ग किलोमीटर के इलाके में फैले वन क्षेत्र को खतरा पैदा हो गया था।
छत्तीसगढ़ में हज़ारों एकड़ ज़मीन मुफ्त के भाव में अनिल अग्रवाल को दे दी गयी है। जिसमें सिर्फ बालको में 2700 एकड़ है उसके अलावा राजधानी  रायपुर और कवर्धा यानी कबीरधाम का एक बड़ा हिस्सा वेदांता को खनिज उत्खनन के लिए दे दिया  गया है । पेड़ की अवैध कटाई भी खूब की जा रही है। अभी एक सर्वे से बात सामने आई है कि यदि यही हाल रहा तो प्रदेश  के जंगल तीस सालों के अन्दर ही  ख़त्म हो जायेंगे। पर्यावरण का संकट यहाँ भी खड़ा हो चुका है। वेदांता खूब धज्जियां उड़ा रही है। वहीे अवैध ज़मीन पर बन रही उसकी चिमनियाँ ज़िंदा लोगों को निगलती जा रही हैं। बालको में सितम्बर 2009 में ऐसी ही चिमनी ने सौ मजदूरों को जिंदा निगल लिया था। बालको की चिमनी जहां बन रही थी, वह अवैध कब्जे वाली जमीन है। वनभूमि पर निर्माण हो रहा था और प्रशासन वहां मूकदर्शक बना हुआ था।


छत्तीसगढ़ का कोरबा राज्य का पावर हब कहा जाता है। 2001 में  एनआरआई उद्योगपति अनिल अग्रवाल की लंदन में रजिस्टर्ड कंपनी वेदांता-स्टरलाइट द्वारा  551 करोड़ रुपये में भारत सरकार के उपक्रम भारत एल्युमीनियम कंपनी यानी बालको की 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदे जाने के बाद से बालको पर अनिल अग्रवाल की वेदांता का कब्जा है और वेदांता के साम्राज्य का विस्तार लगातार जारी है। इस विस्तार  में चिमनी में तप रहे और मलवे में दब रही लाशों का ढेर है तो लगातार कट रहे जंगल के कारण उजाड़ श्मशानी सन्नाटा है।

रविवार जैसी साईट ने इस मुद्दे पर लगातार लिखा है.रविवार में दर्ज है कि बालको को अतिक्रमण हटाने की नोटिस दी गई तो उसने कोर्ट से स्टे ले लिया था। बालको प्रबंधन के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने से डरती है। यही वजह है कि न्यायालय में प्रकरण की सुनवाई के दौरान राज्य के एडवोकेट जनरल खड़े नहीं होते एक सामान्य वकील को खड़ा कर दिया जाता है। चिमनी हादसे में १०० लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार बालको के मालिक अनिल अग्रवाल पर भी सरकार कार्रवाई नहीं करना चाहती। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के मज़दूर युनियन से संबद्ध सुधा भारद्वाज पूछती हैं- जब भोपाल गैस कांड में एंडरसन के प्रत्यार्पण की कोशिश जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं तो इस पूरे मामले के लिए सीधे तौर पर जिम्मेवार वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल और उनके मातहत गुंजन गुप्ता को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है ?


इस निर्माण स्थल पर दिए गए ठेकों के बारे में पता करें, तो पता चलता है कि यहां का काम एक चीनी कंपनी सेपको और एक भारतीय कंपनी गैनन डंकरले को दिया गया था. दुर्घटना होते ही इन कंपनियों के अधिकारी वहां से खिसक लिए थे. प्रशासन ने चीनी कंपनी के 76 अधिकारियों के वापस चीन जाने का पूरा प्रबंध तक कर डाला था। प्रशासन ने पहले ही दिन बिना बयान लिए सेपको के चीनी अधिकारियों को अपने संरक्षण में देश से बाहर जाने के लिए भारी सुरक्षा के बीच एयरपोर्ट भी पहुंचा दिया था ।


बिहार में कभी सत्तर के आस-पास  कबाड़ी के रूप में अपनी जीवन यात्रा शुरु करने वाले वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल सन चौरासी तक मुंबई के पेडर रोड पर रहा करते  थे । दो दशक के अंतराल में किस तरह देश में येन केन प्रकारेण खरब पति बनने का सिलसिला शुरू हुआ है ,उसकी ज़िंदा मिसाल धीरे-धीरे बनते चले गए. जिसमें उनका साथ दिया सियासी नेताओं  ने और प्रशासनिक अधिकारियों ने। उनके सहयोगियों में एक केंद्रीय मंत्री का भी नाम सरे फेहरिस्त है जो हर कांग्रेसी हुकूमत में हर बार केन्द्रीय पदों पर रहे हैं। वेदान्त्ता जैसी कुख्यात कंपनी के सर्वेसर्वा अनिल अग्रवाल ने भ्रष्ट होती जा रही सडांध मारती इस व्यवस्था को अपने माकूल करने के लिए अपने सारे अस्त्र खोल दिए थे। अगर प्रमाण सहित कहा जाय तो सन 77 से आज तक कई घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि अपने स्वार्थ के लिए अनिल अग्रवाल कुछ भी कर सकते हैं.उनके गोरख धंधे की एक मिसाल ही लीजिये  वेदांता रिसोर्से प्रा.लि. कंपनी मुंबई स्टाक एक्सचेंज में दिसंबर 2003 में सूचीबद्ध होती है जिसमें स्टारलाईट  के शेयर थे । 88 फीसदी शेयर  इसी अग्रवाल परिवार के थे.और रातों रात इसमें हज़ारों प्रतिशत की उछाल आ जाती है सब कुछ वित्त मंत्रालय के प्रमुख के वरदहस्त से संपन्न होता है । सिर्फ केंद्रीय मंत्री ही नहीं ,इस व्यक्ति ने उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में भी सरकारी अमले को अपने शिकंजे में कसना शुरू किया और किंचित सफल रहा। कहा जाता है कि भाजपा सरकार के पिछले कार्यकाल में जब कोरबा निवासी राज्य के वन मंत्री ननकी राम कंवर ने वेदांता के खिलाफ मोर्चा खोला और 1036 एकड़ वन भूमि पर बेजा कब्जे का सवाल उठाया तो हफ्ते भर बाद उनका विभाग छिन गया था। अभी जब पर्यावरण मंत्रालय ने सक्सेना रिपोर्ट के आधार पर वेदांता की एक खनन परियोजना पर उड़ीसा में रोक लगाने की सोची तो इस मंत्री ने बताया जाता है कि उसे रुकवाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा दिया था। लेकिन पर्यावरण मंत्री जयराम  नरेश आखिर सफल रहे और रोक लग गयी। इधर उड़ीसा की पटनायक सरकार भी अपने तईं वेदांता का सहयोग और समर्थन करती रही है। पर्यावरण मंत्रालय ने इस रोक के लिए आधार वन सलाहकार समिति,महालेखा परीक्षक और एफएसी की सिफारिशों को बनाया है। इन तीनों ने ही वेदान्त के साथ उड़ीसा सरकार पर भी वन कानूनों को तोडऩे का आरोपी बतलाया है। इस फैसले के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक दिल्ली दौड़ पड़ते हैं तो उधर राज्य के  औद्योगिक  इस्पात व खनन मंत्री रघुनाथ मोहंती इस क्रांतिकारी और आदिवासी हितार्थ फैसले को दुर्भाग्य पूर्ण कहते हैं। वहीँ पर्यावरण और वन मंत्री श्री नरेश दो टुक कहते हैं कि लांजीगढ़, कालाहांडी और रायगढ़ जिलों में फैले नियामगिरि पहाडी क्षेत्र में राज्य के स्वामित्व वाली उड़ीसा माइनिंग कर्पाेरोशन और स्टरलाईट  अनिल अग्रवाल की कंपनी की बाक्साइड खनन परियोजना के दूसरे चरण की वन मंजूरी नहीं दी जा सकती । वनोपज पर जिवनोपर्जन कर रहे दलित आदिवासियों की यह जीत है जैसा उड़ीसा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद भक्त चरण दास कहते हैं। दरअसल इस इलाके के आदिवासी बरसों से अपने ज़मीन और अपने प्रेम जंगल के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन इस जीत को उनकी पूरी आज़ादी नहीं कहा जा सकता। छत्तीसगढ़ आज भी अनिल अग्रवाल जैसे कई पूंजीपतियों के निशाने पर है ! सवाल उठना लाजिम है कि विकास के नाम पर आदिवासियों और दलितों से जल, जंगल , ज़मीन और आजीविका छीन लेना कितना उचित है!

दक्षिण भारतीय उस राजनेता को पाठक जानते ही होंगे  जिनका ज़िक्र बतौर केन्द्रीय मंत्री ऊपर आया है. न समझ सके हों तो मैं बतलाता चलूँ आप हैं पी. चिदंबरम .आपके बारे में और स्पष्ट बतला देना ज़रूरी होगा कि आप वेदांता समूह के निदेशक बोर्ड में रह चुके हैं। आर. पोद्दार की लिखी किताब ‘वेदांताज़ बिलियंस’ में बताया गया है कि चिदंबरम वेदांता रिसोर्सेज़ के निदेशक के तौर पर भारी-भरकम तनख्वाह लेते थे। सालाना 70,000 डॉलर उन्हें एक गैर-कार्यकारी निदेशक के तौर पर कंपनी से मिलते थे। यह बात 2003 की है। उस दौरान स्टरलाइट के शेयरों में चिदंबरम के रहते 1000 फीसदी का उछाल आया था।


लेखक-परिचय 
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