बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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बुधवार, 11 दिसंबर 2013

मंज़िल ढूँढता एक मुसाफिर गुमनामी में जी रहा हिंदी का लेखक

 
 सेहन में बैठे फणीन्द्र मांझी  डायरी से एक गीत सुनाते हुए

ज़िंदगी चलती नहीं प्यारे धकेली जाती है :फणीन्द्र  मांझी

चौक-चौराहे पर शहीद भगत सिंह या सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा देख  धरती  आबा का सुरक्षा कवच रहा डुमबारी पहाड़ भले दूर से ही लुकाछिपी खेले, पर खूंटी को इस बात पर कोई गिला नहीं कि यहाँ भगवान् बिरसा की एक भी प्रतिमा शहर में नहीं है. बावजूद इसके अपने पुरखों की विरासत को सम्भालने वाले का तेज ज़रा भी मद्धम नहीं है. खूँटी के शहीद भगत सिंह चौक पर मिले हिंदी लेखक मंगल सिंह मुंडा बताते हैं कि पांचवे दशक में इस जवार में सागू मुंडा जैसा क़िस्सागो भी हुआ. जो घूम-घूम कर अपने पुरखों की कहानियां सुनाया करता था. वहीँ सुखदेव बरदियार गाँव-गाँव मुंडारी में नाटक किया करते थे. सामाजिक बदलाव के अतिरिक्त उनके मंचन मुग़ल काल की ख्यात प्रेम-कथा अनारकली-सलीम पर भी केंद्रित होते। हिंदी के नामवर आलोचकों से अलक्षित मंगल मुंडा का खुद एक कहानी-संग्रह छैला सन्दु  राजकमल प्रकाशन से छप चुका है.
हमारे साथ झारखंडी साहित्य संस्कृति अखड़ा के अश्विनी पंकज और दिल्ली से आये पत्रकार रजनीश साहिल भी थे.  अब हम खूंटी  से महज़ छह किमी की दूरी पर स्थित हस्सा गाँव के अखरा पर पहुंच चुके थे. उसके सामने ही एक धूसर चौड़ी गली बड़े से बगीचा का पता देती है. हस्सा यानी मुंडारी में मिटटी। तो हम इसी हस्सा   के  पुराना घर की  डेवढ़ी में दाखिल हुए.  सामने फूल-पत्तों से लदे आँगन की छोर पर सेहन किनारे फर्श पर एक पाये से कमर टिकाये बैठे थे फणीन्द्र  मांझी। जन्म 21 मार्च 19 30. 

मुंडा संस्कृति की झलक समेत कई किताबें
यह वही फणीन्द्र  हैं जिनके लेखन की कभी तूती बोलती थी. राधाकृष्ण के संपादन में निकलने वाली पत्रिका आदिवासी के अंक की कल्पना तो उनके बिना अधूरी मानी  जाती थी. वहीँ उनके रिपोर्ताज, संस्मरण, गीत और कहानियां धर्मयुग, दिनमान, नवनीत, आर्यावर्त, जनसत्ता जैसे पत्र-पत्रिकाओं  की शोभा बढ़ाते थे. तब के प्रमुख हिंदी दैनिक रांची एक्सप्रेस और प्रभात खबर के तो यह स्थायी लेखक रहे. लेकिन इनके लेखन की चर्चा आपको हिंदी के इतिहास में नहीं मिलेगी। न ही राजधानी रांची के साहित्यिक गलियारे में इनकी कुछ जानकारी मिल पाती है. जबकि  कई पुस्तकें प्रकाशित हैं. तीन खण्डों में मंज़िल ढूँढता एक मुसाफिर, मुंडा संस्कृति की झलक  के अलावा उगता सूरज, ढलती शाम चर्चित रही है.

लिखने का जज़बा 87 साल की उम्र में भी जवां
लेकिन यह लेखक आज खुद ही  गुमनामी में 'मंज़िल ढूंढता एक मुसाफिर' में तब्दील हो गया है.  हालांकि 2002 की 13 जुलाई को नवजवान बेटे की असामयिक मौत ने उनकी लेखनी को विराम दे दिया। पोते-पोतियों को पढ़ाना  अपना ध्येय बना चुके फणिन्द्र का लेखक  अब भी कसमसाता है. कहते हैं, क्या आप अपने अखबार में मेरे लेख या कहानी को छापेंगे।  

भौतिकी में गोल्ड मेडल, पहली कहानी 1958 में छपी
 जानकर हैरत होती है कि मुरहू के मिशन एलपी स्कूल, फिर खूंटी से मैट्रिक कर चुके फणीन्द्र  ने वाया संत ज़ेवियर्स कॉलेज , रांची काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से भौतिकी में एमएससी कर गोल्ड मेडल हासिल किया। लेकिन उनकी प्रतिभा  हिंदी साहित्य में आकर स्वर्णिम हुई. हालांकि शिक्षक विज्ञान के ही रहे. लेखन की ओर झुकाव  के लिए जगदीश त्रिगुणायत  को प्रेरक मानते हैं. कहते हैं, मैं हिंदी में हमेशा अव्वल आता था. वह हाईस्कूल में टीचर थे. एक दिन बोले, फणीन्द्र  तुम अपना अनुभव लिखो। अखड़ा के नृत्य पर कहानी लिखो। तब पहली बार एक कहानी लिखी ' बोलना गीत, चलना नृत्य'. यह सम्भवता सन 1958 में दैनिक आर्यावर्त के किसी अंक में छपी. उसके बाद एक लेख माघ मेले पर लिखा 'अनोखा' जिसे राधाकृष्ण जी ने आदिवासी में छापा।

मुंडारी व हिंदी में आंदोलनकारी गीत भी लिखे
 राधाकृष्ण को सरल ह्रदय बताते हुए लिखने को उकसाने वाले भी कहा. झारखंड के महत्वपूर्ण लेखक  प्यारे लाल केरकेट्टा को याद करते हुए  कहते हैं कि नाम के अनुरूप ही वह बेहद प्यारे थे. जातीय पूर्वाग्रहों से मुक्त स्पष्टवादी। हंसमुख व्यक्ति।  मरांगगोमके की कम चर्चा होने पर कुपित होते हैं. बोले, तब मैं नौवीं में था. खूंटी हाईस्कूल के दक्षिण में एक मैदान था, वहां जय पाल सिंह मुंडा की सभा थी. हेड मास्टर ने हमलोगों की छुट्टी कर दी. यह जज़बा था आंदोलन का. हालांकि इसके असर ने मुझे मैट्रिक बाद घेरा। जय पाल मुंडारी और हिंदी दोनों में धरा प्रभाव बोलते थे. बिना माइक के भी उनकी आवाज़ दूर तक सुनी जाती थी. कहते हैं कि उनकी बातें बहुत बाद में समझ आयी तो मुंडारी और नागपुरी में आंदोलनकारी गीत लिखे।

अब फूलों संग पत्नी गीता का सहारा
फणीन्द्र  बिरसा, गांधी मार्क्स, माओ, लेनिन, फिदेल कास्त्रो, ओशो से प्रभावित फणिन्द्र  प्रेमचन्द, दिनकर,  शेली, गोर्की और टॉल्स्टॉय को रट-घोंट चुके हैं. हमलोगों को दुबारा चाय पीने को कहते हैं. आप लोग आ गये. अब तो कोई बात करने वाला भी नहीं मिलता।  अभी दिल्ली से बेटी ललितां आयी हुई है. वरना पत्नी गीता देवी ही उनकी सच्ची संगिनी हैं जीवन की. उनके साथ ही वो आँगन में आम, अमरुद, मेहंदी, कटहल, अलेवेरा, गुलाब, गेंदा, गुलदाउदी, उड़हुल, अटल और फुटबॉल फूल से बतियाते हैं. बोले जीवन का क्या पूछते हैं. वह  अपना ही मंचित नाटक बहादुर शाह ज़फर का संवाद दुहराते हैं,  'ज़िंदगी चलती नहीं प्यारे, धकेली जाती है'.    

दैनिक भास्कर, झारखंड के 11 दिसंबर 2013 के अंक में प्रकाशित 
   

    
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