बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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रविवार, 4 जनवरी 2015

ज़मीन का संघर्ष और संघर्ष की ज़मीन

बदलते समय में भूमिसंबंध , किसान और जनसुनवाई
















अपर्णा की क़लम से 




भारत में लंबे समय समय से परंपरागत पेशे और विकास का झगड़ा चल रहा है और इस बात को साहित्य में भी कुछ लेखकों ने उठाया है . प्रेमचंद की प्रसिद्ध कृति ‘रंगभूमि’ में गाँव में लगाये जाने वाले कारखाने के परिणाम स्वरुप ग्रामीण और कुटीर उद्योगों की होनेवाली तबाही और ग्रामीणों के जीवन में पैदा होने वाले भ्रष्टाचार , नशाखोरी , वेश्यावृत्ति और मूल्यहीनता के विरोध में उपन्यास का नायक सूरदास लड़ता है . सूरदास का तर्क लम्बे समय तक गांधीवाद के एजेंडे के रूप में आलोचना के केंद्र में रहा है. क्योंकि उन्नीस सौ नौ में ‘हिन्द स्वराज’ में गाँधी ने योरोपीय औद्योगिक ढांचे और कार्यप्रणाली की आलोचना की थी और ‘रंगभूमि’ उस विचार का एक सर्जनात्मक रूप माना जाता है .इस आलोचना के पीछे भारत के पिछड़े जनसमूहों को मुख्यधारा में शामिल करने का तर्क था . माना जाता रहा है कि एक पिछड़े पूंजीवादी देश और वर्ण-व्यवस्था मूलक समाज व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए औद्योगिक विकास की तेज प्रक्रिया बहुत ज़रूरी है .  नेहरू ने उद्योग को भारत का नया तीर्थ कहा और सार्वजनिक उपक्रमों की एक कतार देश में बनी . निजी उद्योगों के विकास के लिए जगह और धन के साथ कानूनी लचीलापन उपलब्ध कराया गया . इस प्रकार परंपरागत उत्पादन व्यवस्था की जगह बड़े उद्योगों का प्रसार तेजी से हुआ . बेशक इस प्रक्रिया में लघु और कुटीर उद्योगों ने तेजी से दम तोड़ना शुरू किया और बीसवीं शताब्दी बीतते बीतते कई कारोबार तो एकदम विलुप्त ही हो गए .

लेकिन आज जबकि स्थितियां कई करवट बदल चुकी हैं तो हमें उन चीजों पर बहुत गंभीरता से विचार करना चाहिए जो इस देश के वर्तमान को क्षत-विक्षत तो कर ही रहा है भविष्य को भी बहुत बड़े खतरे में डाल रहा है . इन चीजों में हम भारत की नयी आर्थिक और औद्योगिक नीति के तहत विकसित होने वाले खनन उद्योगों और उनके मालिकानों के रवैये को देख सकते हैं, जो आज देश को गृहयुद्ध के कगार पर ले आकर खड़ा कर चुका है .  यह और बात है कि अपने ही देश की जनता के खिलाफ सेना और अर्द्ध-सैनिक बलों को उतारने के मंसूबे के बावजूद शासक वर्ग पूरी तरह डरा हुआ है और धीरे-धीरे लोगों को नियंत्रित कर रहा है . यह नियंत्रण अनेक तरह की लोकतांत्रिक प्रणालियों के बहाने तानाशाहीपूर्ण ढंग से लोगों की जमीन और श्रम को हडपने की साजिशों के रूप में लगातार बढा है . देश के विभिन्न हिस्सों में होनेवाली जनसुनवाइयाँ और उनके खिलाफ लोगों के असंतोष के रूप में इसे देखा और परखा जा सकता है .


जन सुनवाई में पुलिस ने किया जाना महाल

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की तहसील घरघोड़ा के गांव जमुनीपाली, जहाँ कोयले की विशाल खदान में काम शुरू होने वाला है , में हुई जनसुनवाई में उसी गाँव के लोग शामिल नहीं हो पाए.  उन्हें वहां जाने से रोकने के लिए पुलिस का इतना अधिक बंदोबस्त किया गया था कि लोग जनसुनवाई के पिछले अनुभवों से भयभीत हो गए . 2008 में इस जिले में जनसुनवाई के दौरान पत्थरबाजी , लाठीचार्ज और गोलीबारी हुई थी . लोगों को फर्जी मुकदमों में फंसाया गया और खदान करने वाली कंपनी ने दर्जनों किसानों से जबरन उनकी जमीनें छीन ली . मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई कसबे में भी बारह साल पहले पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में एक सोलह किसान मारे गए थे . इस प्रकार हम देखते हैं कि देश के विभिन्न हिस्सों में भूमि अधिग्रहण को लेकर अनेक रूपों में नीतिगत और अनीतिगत गतिविधियाँ चल रही हैं . किसानों के आक्रोश को दबाया जा रहा है और दमन का इतना वीभत्स रूप सामने आ रहा है कि अगर मीडिया लोगों को मनोरंजन के नशे में बेहोश न करे तो सचमुच लोगों के होश उड़ जाएँ . सिंगुर और लालगढ़ के घाव अभी सूखे नहीं हैं .

औने-पौने ली जा रही किसानों की जमीन
देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक कोई एक ऐसा राज्य नहीं बचा जहाँ विकास के नाम पर लाखों किसान-आदिवासियों की ज़मीनों का औने-पौने दाम अथवा थोडा सा मुआवज़ा दे विस्थापित कर कॉपोरेट और विदेशी कंपनियों को लाभ न पहुंचाया गया हो. इसी वजह से विस्थापन विरोधी आन्दोलन स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक चल रहें है. देश ब्रिटिश साम्राज्य के चंगुल से 200 वर्ष बाद मुक्त हुआ लेकिन आज फिर विकसित अवस्था में पहुँचने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों के औपनिवेशीकरण के चपेट में है . निवेशीकरण की नीति पर परवान चढ़ता यह औपनिवेशीकरण ज्यादा खतरनाक और त्रासद है.200 वर्षों तक पूरा देश आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक रूप से गुलामी की जंजीरों को अपने वजूद पर झेलता रहा लेकिन उन दिनों मानसिक गुलामी से लोग बचे रहे . उन्हें पता था कि किस प्रकार उनके देश की सारी सम्पदा और दौलत ब्रितानी शासक लूट रहे हैं और इसकी खिलाफत करनेवाले का राजनीतिक दमन कर रहे हैं . इसीलिए राष्ट्रीय मुक्ति के बहुत लम्बे संघर्ष के बाद देश मुक्त हो सका लेकिन आज की स्थिति पहले के मुकाबले बिलकुल भिन्न है . आज की गुलामी पूरी तौर पर आर्थिक है.

विडम्बना यह है कि इसे ही आज़ादी बताने के लिए सैकड़ों चैनल , अखबार और पत्रिकाएं दिन-रात एक किये हुए हैं . लोगों के विवेक को पूरी तरह से काबू में कर लिया गया है क्योंकि अधिकांश मध्यवर्ग इस आर्थिक साम्राज्य का शेयर होल्डर है . लोग इसीलिए मानसिक गुलामी का शिकार हुए है क्योंकि इस नए परिदृश्य ने लोगों की वैचारिक क्षमता को कॉर्पोरेट सोच में तब्दील करने में आशातीत सफलता पाई है .हालांकि मुट्ठी भर लोग इस तंत्र की डोर संभालने में शामिल हैं लेकिन कॉर्पोरेट प्रचार-तंत्र इन मुट्ठी भर लोगों की स्थिति के बहाने बहुत ही मजबूती से अपने पक्ष को सही ठहराने में लगा हुआ है. यही तंत्र देश को किसी भी शर्त पर विकसित अवस्था में पहुंचाने की प्रतिज्ञा किये हुये है. बेशक विकसित होने की इस कोशिश में करोड़ों की आबादी अँधेरे में गर्त हो जाए .

विकास की परिभाषा क्या है ? इस प्रश्न का जवाब तलाशने से पहले एक प्रश्न और सामने आता है कि किस वर्ग के विकास की बात हो रही है ?  यहाँ विकास एक खास वर्ग के लिए ही है. उस विकास के नाम पर चमचमाती सड़कें वह भी मेट्रो शहरों में और उन शहरों में जहाँ बड़े-बड़े उद्योग स्थापित किये जाने हैं. इन चमचमाती सड़कों का तात्पर्य कच्चे माल के स्रोतों तक पहुंचना और बेतहाशा उन्हें लूटने से है .विकास का मतलब मोबाइल के टावर स्थापित करना है ताकि आर्थिक और राजनीतिक राजधानियों में बैठे मालिक काम पर आने वाले अधिकारियों से संपर्क कर वहाँ के अपडेट्स लेते रहें . विकास का मायने अपने बच्चों के लिए शहरों और दूरदराज के इलाकों में पब्लिक स्कूलों के स्थापना है ,जहाँ उस गाँव के बच्चों को दाखिला ही नहीं मिल सकता है जिसकी जमीन पर उसकी तामीर हुई है . विकास का मतलब असीमित और गैरजरूरी भौतिक सुख-सुविधाओं से है.जबकि देश की आधी से अधिक जनता अपनी आधारभूत जरूरतों को ही पूरा करने में असमर्थ है . ऐसे में यह विकास किस खास वर्ग के लिए मायने रखता है इसे समझना कोई टेढ़ी खीर नहीं है .

इस जगह पर मुझे मारिओ वर्गास लोसा का उपन्यास ‘किस्सागो’ याद आता है जिसमें विकास और प्रकृति के सम्बन्ध में बहुत बुनियादी और मौजूं सवाल उठाये गए हैं . आधुनिक सभ्यता के बरक्स आदिवासी जीवन-दृष्टि और अस्मिता के सवालों को उठानेवाले इस उपन्यास ने विकास की प्रक्रिया में किये जाने वाले विनाश की तीखी आलोचना की है . पेरू के माचीग्वेंगा समुदाय के आदिवासियों की मान्यताओं , नैतिकता और दृष्टि को न केवल उनकी ज़िन्दगी के बुनियादी प्रश्नों के साथ बल्कि विकास के मायाजाल को मानवीय ज़रूरतों के समानांतर सामने रखते हुए यह उपन्यास भारत के आदिवासी जीवन और उसमें लगाई जा रही सेंध और किये जा रहे विनाश पर हमें सोचने की जगह देता है . धरती के भीतर छिपी अकूत प्राकृतिक संपदाओं की लूट के बहाने झारखंड , उडीसा , छत्तीसगढ़ ,आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र आदि राज्यों में जिस तरह आदिवासियों को पिछड़ेपन का प्रतीक बताकर खदेड़ा जा रहा है वह भारत के सबसे ज्वलंत प्रश्नों में से एक है . सिर्फ आदिवासी और पहाड़ी इलाकों ही में नहीं बल्कि मैदानी इलाकों में तमाम सारे उद्योगों और प्लांटों के नाम पर भूमि पर जिस तरह कब्ज़ा जमाया जा रहा है वह पूँजी की अनियंत्रित ताकत के सामने लाचार ग्रामीणों और आदिवासियों की एकांगी गाथा ही है . जिस तरह से किसानों और आदिवासियों को लालच देकर और उनकी मज़बूरी का फायदा उठाकर उनके जीवनाधार के रूप में बची हुई भूमि अधिग्रहित की जा रही है वह पूँजी की ऐसी साजिश है जिसके खिलाफ आमतौर पर आवाज नहीं उठ रही है . जो आवाजें उठ भी रही हैं उन्हें दबाने के लिए जुल्म और दमन किया जा रहा है . अभी तक जनसुनवाई के जैसे तौर-तरीके सामने आये हैं वे सिर्फ इस जुल्म और दमन के ही एक पहलू को उजागर करते हैं . बेशक इसका दूसरा पहलू भी कम शर्मनाक नहीं है क्योंकि वहां केवल बिचौलियों और दलालों का बोलबाला है .

कुछ इसी तरह का मामला है विदेशी पूँजी-निवेश का , जो अंततः देशी ताकत , कच्चा माल और श्रमशक्ति के उपयोग से अपरिमित मुनाफा खड़ा करने का उपक्रम है . जहाँ-जहाँ विदेशी पूँजी-निवेश से उद्योग शुरू हो रहे हैं वहां-वहां भूमि अधिग्रहण और उससे पैदा हुए असंतोष की कहानियां देखी जा सकती हैं .विदेशी पूँजी का निवेश इस शर्त पर शुरू हुआ था कि विस्थापित परिवारों में से एक को रोज़गार और उचित मुआवजा मिलेगा . यह सब देने के आश्वासन के बदले देश में विशाल औद्योगिक संस्थानों की स्थापना करने वाले विकास की अनिवार्य शर्त है विस्थापन . इसका सीधा तात्पर्य है कि कॉर्पोरेट और सत्ता में बैठे लोगों की नज़रें इनकी ज़मीनों पर है .प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता वाले इलाके में विकास का सबसे अधिक जोर होता है क्योंकि यहाँ ज़मीनें सस्ते दामों में उपलब्ध हो जाती हैं और यहाँ विकास वे अपनी शर्तों पर कर सकते हैं. कहा यही जाता है कि ये विकास इन्हीं किसानों और आदिवासियों के लिए ही होना है चाहे वे उस तथाकथित विकास की मुख्यधारा में शामिल होना चाह रहे हैं या नहीं यह पूछने ,जानने और समझने वाला कोई नहीं .ऐसा नहीं है कि वे विकास नहीं चाहते . चाहते हैं लेकिन अपनी शर्तों पर और अपने हिसाब क्योंकि अभाव की ज़िन्दगी से वे भी त्रस्त रहते हैं , लेकिन प्रकृति के निकट रह वे पुरसुकून और अपने को सहज महसूस करते हैं. लेकिन उद्योगपति औद्योगिकीकरण, शहर का विकास ,विशेष आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण , बुनियादी ढांचे के   निर्माण आदि के लिए ज़मीनें हडपते जा रहें हैं. लोग अपने पुश्तैनी घरों और स्थानों, परम्परागत आर्थिक कार्य-कलापों ,स्थानीय और लोक संस्कृति से ज़बरदस्ती ही भगाए जा रहें हैं . इसके नतीजे में नकारात्मक तरीके से धन का इतना बड़ा अम्बार खड़ा होना है कि पूंजीपती आर्थिक स्थिति जो टापू के रूप में थी अब विशाल पहाड़ में परिवर्तित हो एक बड़ी जगह घेर चुकी है जिसके नीचे गरीब और अधिक गरीबी में दबे चले जा रहें हैं.



जमीन का संघर्ष और संघर्ष की जमीन

ज़मीन की लड़ाई आज की नहीं है बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही है .पाषाण युग में दो आदिवासियों समूहों के बीच ज़मीन और पद के लिए युद्ध होते रहे हैं . उसके बाद ज़मींदारी प्रथा में गाँव के ज़मींदारों द्वारा किसानों की ज़मीनें हड़प ली जाती थीं और अब आज के इस युग में कॉर्पोरेट गिरोहों ने इस प्रक्रिया को अपने हिसाब से तेज कर दिया है . लेकिन पहले के मुकाबले आज ज़मीन के संघर्ष अधिक घिनौने , षड्यंत्रपूर्ण और खतरनाक हो गए हैं . आज कॉर्पोरेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ  समूचे पर्यावरण और प्रकृति के सत्यानाश करने में लगी हुई हैं . उत्तराखंड का चिपको आन्दोलन पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और उससे होने वाले पर्यावरण के विनाश के विरुद्ध एक बहुत बड़ी लड़ाई थी . देश के विभिन्न हिस्सों में लगाये जाने वाले परमाणु रिएक्टरों के कारण पैदा होने वाले खतरों , बांधों और टावरों , हवाई अड्डों से स्थानीय प्रकृति पर पडनेवाले असर और होने वाले विनाश को लेकर जैतापुर , नर्मदा के किनारे के हजारों गाँवों और पनवेल के आसपास के ग्रामीणों के विरोध को यूँ ही नज़रन्दाज नहीं किया जा सकता .

भारत में भूमि पर अधिकार और बंदोबस्ती एक जटिल प्रक्रिया रही है और उसमें धीरे-धीरे बदलाव भी आये लेकिन आज जब श्रमशील ताकतें धरती को नए सिरे से उपजाऊ बनाने के लिए पसीना बहा रही हैं उन्हें फिर से तहस-नहस करने का परिणाम बहुत घातक होगा . जो जमींन किसानों ने अपने विराट धैर्य से बचाए रखी वह उनके हाथ में किसी दैवीय उपहार के रूप में नहीं हासिल थी बल्कि आज़ादी के बाद हमारे देश में कृषि कार्यों के विकास और किसानों की स्थिति को सुधारने के लिए कई आन्दोलन किये गए और इन आन्दोलनों में किसानों और खेतिहर मजदूरों ने अपने जन नेताओं के नेतृत्व में बढ-चढ कर हिस्सा लिया . 1951 में विनोबा भावे ने गरीब और भूमिहीन किसानों के लिए राष्ट्रव्यापी  भूदान आन्दोलन चलाया जिसमे लाखों एकड़ भूमि दान में मिली और 1955 आते तक भूदान के बदले कई स्थानों पर यह ग्रामदान आन्दोलन में तब्दील हो गया . आज भी दान हो रहा है लेकिन यह चिंता बात है कि आज हमारे प्रतिनिधि जो तंत्र का प्रमुख हिस्सा हैं वे भी गाँव के गाँव नाममात्र के मुवाअजे पर दान करने में ज़रा भी संकोच नहीं कर रहे. जबकि देश में भूमि हदबंदी कानून, आदिवासी स्वशासन कानून जैसे कई गरीबोन्मुखी कानून वर्षों से लागू हैं, परन्तु आज तक उनका सही क्रियान्वयन नहीं किया जा सका। दूसरी तरफ गरीबों के अधिकारों का हनन करने वाले कानून जैसे भूमि अधिग्रहण अधिनियम, विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, खान और खनिज अधिनियम आदि भी बनाये गये और बड़ी तीव्रता के साथ इन कानूनों का क्रियान्वयन भी किया जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में यह आवश्यक है कि न्याय और समानता के लिये कुछ मुद्दों पर तुरन्त कुछ कदम उठाये जायें।



हर जगह हो रहा है विरोध

अध्ययन से यह पता चलता है कि भूमि अधिग्रहण संबंधी कानूनों , प्रावधानों और तरीकों में सैद्धांतिक और व्यवहारिक र्रूप से ज़मीन आसमान का अंतर है . यानी कागज़ पर कुछ और तथा व्यवहार में कुछ और . हम जानते हैं कि पूरे देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हों या कॉर्पोरेट द्वारा स्थापित कोई प्लांट हो या खदानों से खनन कार्य हो सबसे पहले अनुमति मिलती है केंद्र और राज्य सरकार से और फिर शुरू होता है सर्वे का काम जिसमें गाँव-गाँव जाकर निजी भूमि,राजस्व भूमि,और शासकीय भूमि की नाप-जोख चालू होती  है .जबकि किसानों की और आदिवासियों की भूमि पर काम शुरू करने या कहें अधिग्रहित करने की अनुमति मिलती है ग्रामसभा में हुए निर्णय से , जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से भी जयादा अहम् होता है अर्थात् इस भूमि पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी मान्य नहीं होता है. इसका सबसे सामयिक उदाहरण उड़ीसा के रायगड़ा ज़िले के नियमगिरि पहाड़ियों से बाक्साईट खनन के लिए 12 गावों में जनसुनवाई के लिए अलग-अलग दिन ग्रामसभा बुलवाई गई जिसमें से हर गाँव में खनन कार्य के लिए स्थापित वेदांता को एक सिरे से और एक सुर में खारिज कर दिया गया. यह जनसुनवाई उन  गांवों के आदिवासियों की एकता ,दृढ निश्चय, सकारत्मक दृष्टि , अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की जड़ को बचाए रखने का जज़्बा तारीफ़-ए-काबिल है. लेकिन यह जज्बा हर कहीं नहीं है अथवा जहाँ कहीं है उसे दबाया भी जा रहा है .

इसके विपरीत पूरे देश में भूमि अधिग्रहण के लिए चल रहे आन्दोलान और हो रही जनसुनवाई से संबधित समाचार किसी भी चैनल पर देखने को नहीं मिलते , न ही इन्हें अखबारों में प्रकाशित किया जाता है . यदि गाहे-बगाहे कुछ खबर छपी भी तो इतनी छोटी होती है कि लोगों की नज़र वहां तक नहीं पहुँच पाती . तंत्र का चौथा खम्भा अब पूरी तरह बिक चुका है कॉर्पोरेट के हाथों. इस मीडिया में पूरी तरह बाजारवादी और उपभोक्तावादी संस्कृति का पहरा लगा हुआ है .

उपभोक्ता संस्कृति के इस चकाचौंध के साथ-साथ भूमि -अधिग्रहण  के मामले पूरे देश में हर प्रदेश में देखे जा रहे हैं और इस कार्य में शासन का पूरा सहयोग है . और दूसरी बात यह कि भूमि अधिग्रहण केवल गाँव के किसानों और आदिवासियों की ज़मीनों का ही नहीं हो रहा है बल्कि शहरों में विकास के लिए (शहरों में विकास के मायने वातानुकूलित शॉपिंग काम्प्लेक्स और माल से हैं ) वहाँ रहनेवाली जनता को उनके घरों से बेघर कर या थोडा सा मुआवजा दे या ज़मीन के टुकड़े का आबंटन कर भूमि पर कब्ज़ा जमा अपने दायित्व की इतिश्री समझ लेना भर ही है . वे शर्तों पर दस्तख़त करते हुए आम नागरिकों के हित की बात दरकिनार करते हुए कॉर्पोरेट और विदेशी कंपनियों को पीले चांवल दे आमंत्रित करते हैं. पॉस्को इसका बेहतरीन उदाहरण है .

जैसा कि मालूम है कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी ,प्रतिपक्ष पार्टी और राज्य सरकार ने मिल-जुलकर पॉस्को की स्थापना पर सहमति प्रदान की है. आप और हम सोच सकते हैं कि प्रतिपक्ष पार्टी गैर ज़रूरी मुद्दों पर संसद पर आवाज उठा विरोध दर्ज करती है लेकिन आम जनता के हित से जुड़े सीधे मामलों में वह सत्ता के साथ खड़ी हो हाँ में हाँ मिला आने वाले दिनों के लिए अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने से नहीं चूकती है . उडीसा के तटीय ज़िले जगतसिंहपुर में स्थित तीन गांवों के करीब दस हज़ार लोगों को बेदख़ल कर पॉस्को (पोहाग स्टील कम्पनी) को स्थापित किया जा रहा है. पिछले 8 वर्षों से जारी व्यापक जन प्रतिरोध और आन्दोलन को नज़रअंदाज़ कर वर्ष 2014 के जनवरी माह में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्लांट की स्थापना को अनापत्ति प्रमाण पत्र दे दिया है . इस कम्पनी के 4004 एकड़ भूमि में से 1700 एकड़ भूमि पहले ही आबंटित हो चुकी है .पॉस्को (पोहाग स्टील कंपनी) प्रतिवर्ष 1.2 मिलियन टन स्टील का उत्पादन करेगी जिस पर लगभग 1.3 बिलियन डॉलर की लागत आएगी और इस संयंत्र से नदियों,जंगलों और पेड़-पौधों को जो नुकसान होगा उसका कोई बैरोमीटर/थर्मामीटर नहीं है जिससे उसे आंका जा सके. जिन लोगों को यह नहीं पता है वे भी जान लें कि मोइलीजी ने यह  कहा कि “जंगल हजारों वर्षों से जीवित अवस्था में है तो किसी संयंत्र की स्थापना के बाद भी वे वैसे ही बने रहेंगे” . है न गजब का सामान्य ज्ञान !

इस सरकारी सामान्य ज्ञान के विरुद्ध देश भर में आन्दोलन होते रहे हैं . उड़ीसा के रायगडा में वेदांता का विरोध,मध्यप्रदेश में पेंच-अदानी परियोजना को रद्द करने हेतु आन्दोलन , उत्तरप्रदेश में गाजीपुर में गंगा एक्सप्रेस वे परियोजना का के विरोध में आन्दोलन , दादरी में अनिल अम्बानी की प्रस्तावित कंपनी का विरोध ,उ.प्र. में इलाहाबाद ज़िले की करछना तहसील में जे.पी. कंपनी के  पावर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध, राजस्थान में नवलगढ़ की तीन सीमेंट इकाइयां लगाने के 18 गांवों में जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण करने का विरोध,छत्तीसगढ़ में जांजगीर चाम्पा ज़िले में 34 थर्मल पॉवर प्लांट लगाने की योजना का विरोध ,रायगढ़ ज़िले के आस-पास लगभग 55  स्पंज आयरन प्लांट , जिनमें जिंदल ग्रुप (सांसद नवीन जिंदल) का जेएसपीएल ,जेपीएल आदि हैं के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध इन आन्दोलनों की श्रृंखलाओं की कुछ कड़ियाँ भर हैं .

रायगढ़ का उदहारण

ज्ञातव्य है कि रायगढ़ में जिंदल को आबंटित कोल खदानों से खनन कार्य के लिए आदिवासियों और किसानों की हजारों एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया गया . जबकि मुवाअज़ा कुछ लोगों को ही मिला . इसके साथ ही स्थाई काम का अभाव हमेशा की ही तरह बना रहा . लगभग 35 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि और 11 हजार हेक्टेयर वनभूमि गैरकानूनी ढंग से  खदानों और उद्योगों के कब्जे में चली गई है , जिनमें कृषि मजदूरों और परम्परागत रूप से काम करने वाले ग्रामीणों तथा हस्तशिल्प का काम करने वाले, लुहार ,सुनार, बढई, कुम्हारों की भी ज़मीनें हैं .ये ज़मीनें उनसे जनसुनवाई का दिखावा कर ली गई हैं  .इसके तहत यह पक्का वादा किया गया था  कि उनकी ज़मीन के बदले बेरोजगार हुए स्थानीय लोगों को रोज़गार अवश्य दिया जाएगा . लेकिन देखा यही गया है कि जैसे ही जनसुनवाई मालिकानों के पक्ष में होती है कम कृषि भूमि वाले ग्रामीणों को कम योग्यता के कारण नकार दिया जाता है . जिनकी ज़मीनें अधिग्रहित नहीं हुई उन्हें रोज़गार सम्बंधित अपनी बात रखने कहीं कोई मौका नहीं मिलता और जिनकी ज्यादा ज़मीनें उद्योगों के पास चली गई हैं और उस परिवार में कोई पढ़ा-लिखा है तो अपना पल्ला झाड़ने के लिए उन्हें कामचोर ,अयोग्य और अविश्वसनीय मान नौकरी देने से इनकार कर दिया जाता है लेकिन इसके उलट यदि आप दिल्ली,पंजाब या हरियाणा से हैं तब आपको प्रबंधन में सबसे ऊपर की श्रेणी में रखा जाएगा . छतीसगढ़ छोड़कर यदि आप किसी अन्य राज्य के हैं तब आपको दूसरी श्रेणी पर काम मिलेगा. छतीसगढ़ के भीतर राजनीतिक रसूख रखने वाले को कम्पनी में तीसरी श्रेणी पर रखा जाता है.  आप और हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि विकास और रोज़गार के नाम पर ये उद्योगपति किस तरह का झांसा देते हैं .

रायगढ़ ज़िले में वर्तमान में रोज़गार कार्यालय में लगभग 1.50 लाख बेरोजगार पंजीकृत हैं . शासन भी अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करते हुए प्रतिवर्ष रोज़गार मेले का आयोजन करता  है लेकिन उनमें से किसी का चयन नहीं किया जाता क्योंकि ये लोग उनके द्वारा तय किये हुए मापदंड को पूरा  नहीं करते हैं. यह सोचने की बात है कि जब उद्योग स्थापित करते समय रोज़गार देने के वादे किये जाते हैं तब न तो उनकी योगता को परखा जाता है और न जांचा जाता है क्योंकि यदि अधिग्रहण से पहले ही इन बातों पर विचार कर लिया जाए तो वास्तविक स्थिति दोनों पक्षों के सामने आ जायेगी . एक बात और,यदि उद्योग स्थापित हो भी गया तब विस्थापित लोगों में से लोगों को ट्रेनिंग दे उन्हें काम के योग्य बनाया जाए . लेकिन वास्तव में जिन लोगों को काम पर रखा जाता है उन्हें दरअसल मजदूर बनाया जाता है . जो किसान और आदिवासी हैं वे केवल अपने परम्परागत कार्यों को ही करने में सक्षम होते हैं लेकिन अपना सब कुछ दांव पर लगाने के बाद वे न तो घर के होते हैं न ही घाट के , क्योंकि नए रोजगार के लिए अकुशल होने के कारण अब हर जगह उन्हें सिर्फ मजदूरी का काम करना पड़ता है . कुछ किसान दूसरे राज्यों में पलायन कर लेते हैं. मध्यम किसान से टैक्टर और बोलेरो खरीद किराए पर उठा बैंक के ऋण को चुकता करने की व्यवस्था में जुट जाते हैं.जबकि छोटे किसान कम्पनी के ठेकेदारों के नीचे मजदूरी करने लगते हैं.जबकि भूमिहीन लोग कंपनियों के अधिकारियों के  यहाँ घरेलू काम करने को मजबूर होते हैं . यह सोचने की बात है कि जिन लोगों ने ताउम्र अपना गुजारा कृषि कार्यों से किया है बिना किसी उचित प्रशिक्षण के उन्हें दूसरे काम की कुशलता कहाँ से मिलेगी ?

रायगढ़ छतीसगढ़ के पूर्व में स्थित जिला है और जिसकी जनसंख्या लगभग 18 लाख की है.आज़ादी से पहले यहाँ गोंड(आदिवासी) राजाओं का शासन रहा है , जिन्हें जीवनयापन के लिए कृषि योग्य भूमि जंगलों के भीतर दी  गई थी , ताकि टैक्स के रूप में अनाज और वनोपज राज्य को मिलता रहे. पारंपरिक रूप से जंगलों और खेती पर निर्भर रहने वाले आदिवासियों और किसानों की आवश्यकता उनकी मूलभूत जरूरतों पर ही आकर खत्म हो जाती है . रायगढ़ के जंगलों में महुआ,चार,साल,साजा,तेंदू,खम्हार आदि वनोपजों के बड़े पेड़ हैं तो दूसरी तरफ चिरौंजी,लाख,तसर आदि कंदमूल और वनौषधियां हैं जिनके आधार पर उनका जीवनयापन आसानी से हो जाता (है) था . अब चूँकि औद्योगिक विकास के नाम पर वर्तमान में रायगढ़ जिले में 54 स्पंज आयरन प्लांट चालू स्थिति में हैं और लगभग 15 पॉवर प्लांट आम जनता के नाम पर उदयोगों के लिए बिजली का उत्पादन कर रहें हैं इसलिए वन और पर्यावरण पर इसका क्या असर पड़ रहा है इसे आसानी से समझा जा सकता है . दूसरी ओर रायगढ़ ज़िले में कोयला का अथाह भण्डार है . यहाँ ए.सी.सी ,जिंदल,  मोनेट और निकी जायसवाल की ओपन कास्ट और अंडर ग्राउंड कोल माइंस हैं . इस बात से हम निश्चित तौर पर यह अनुमान लगा सकते हैं कि जहां इतने विशाल स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है वहां पर्यावरण किस हाल में होगा ? पूरे ज़िले में दस बड़े संयंत्रों द्वारा निजी और शासकीय भूमि को मिलाकर लगभग 1630.670 हजार  हेक्टेयेर भूमि का अधिग्रहण कर लोगों को विस्थापित किया गया है .

ये आंकड़े केवल कुछ संयंत्रों द्वारा अधिग्रहित भूमि के हैं . इसमें जो कृषि भूमि थी और जिस पर वर्ष भर में दो फसलें ली जाती थीं वह तो किसानों के हाथ से चली ही गई .इसके साथ-साथ जलस्रोतों , जिनमें ज़िंदा नाला का पानी , रामझरना ,कई तालाबों , नदियों में केलो ,कुरकुट ,महानदी और मांड नदी का पानी संयंत्रों के लिए सरकार ने उपलब्ध करवाया . इतना ही नहीं प्राकृतिक जलस्रोतों , बांधों और जंगलों में औद्योगिक कचरा और संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई एश,कोयले का चूरा, डीजल, मोबिल तेल बेहिचक डस्टबिन समझ डाला जाता रहा है ,जिससे जलाशयों और तालाबों में मिलने वाली मोंगरी,कोतरी, गिना, बांबी, गाजा,चिंगरी इन छ मछलियों का अस्तित्व ही लुप्त हो चुका है. भूमि का जल स्तर नीचे बहुत गहरे तक पहुँच गया है इस कारण पानी की किल्लत का सामना करना पड रहा है. केवल पीने के पानी की कमी ही नहीं , निस्तारण के काम के लिए भी पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है . औद्योगिक प्रदूषण के कारण यहाँ के लोग अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो चुके हैं. कुछ ब्रेन टूयमर से तो ढेरों लोग चर्म रोगों से . कोई आँखों की जलन से तो किसी को अस्थमा और श्वांस की बीमारियों से परेशानी है . पानी की खराबी से हड्डियों का टेढ़ा और कमज़ोर पड़ना आदि  असर दिखाई दे रहा है.  इतना ही नहीं चारागाह,वनोपज संग्रहण,पशुपालन जैसे आजीविका के साधन पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं. सबसे ज्यादा संकट आदिवासियों की खाद्य सुरक्षा पर पड़ा है .

इन सब स्थितियों का गरीबों के जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ा है . वर्तमान स्थिति में जिस तरीके से रायगढ़ ज़िले में एच.आई.वी. एड्स के मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई है उससे कुछ मजबूर महिलायों के द्वारा देह व्यापार जैसे गर्हित रोज़गार के साधनों को अपनाने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है. कंपनियों के मालिकों और स्थापना की अनुमति देने वाले आकाओं को कोई चिंता नहीं कि इस तरह से किस प्रकार का समाज निर्मित होगा ? उन्हें अपने प्रदेश को देश भर में तकनीकों से लैस और आधुनिक बनाना है. राजधानी रायपुर में नया रायपुर बसाने की कवायद में वहाँ से हज़ारो लोगों को विस्थापित किया गया. विस्थापन की शर्त पर तरक्की का यह रूप देश में हर जगह दिखाई देना लगा है .



अरहर की टाटी गुजराती ताला

सरकार और उद्योगपति आदिवासियों, किसानों को उनकी भूमि से विस्थापित कर मुआवजा बाँट रही  है .जबकि आदिवासियों की भूमि के अधिग्रहण के बारे में धारा 170 “स” एवं अनुसूची 05 में पेसा अधिनियम जैसा विशेष अधिनियम बनाया गया है लेकिन इसका अमल कहाँ और कब होता है ? जबकि पेसा कानून अनुसूची पांच के तहत आने वाले आदिवासियों की सुरक्षा और स्थितरता के लिए ही बनाया गया  है . यहाँ तक कि उनके क्षेत्र में उद्योग स्थापित करने की सहमति के अधिकारों का संविधान ने पूरी तरह से विकेन्द्रीयकरण कर दिया है अर्थात् सत्ता की सबसे छोटी इकाई ग्रामसभा  इस बात का निर्णय बिना किसी के दबाव में आकर कर सकती है . उडीसा में स्थापित होने वेदांता कम्पनी के विरुद्ध बारह गाँव के आदिवासियों ने जनसुनवाई में विपक्ष में मत दे कर पूरी दुनिया में एक  मिसाल कायम की है .लोकतंत्र की इस सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई में जंगल में रहने वाले इन अशिक्षित आदिवासियों ने जीत हासिल की  .लेकिन ऐसी दृढ़ता और दबाव से मुक्त होकर कम ही जगह निर्णय आदिवासियों के पक्ष में हो पाते हैं ,उनमे सबसे बड़ा कारण कुछ लोगों का लालच की गिरफ्त में आ जाना या कुछ लोगों का अपने फायदे के लिए उद्योगपतियों और प्रशासन के हाथों की कठपुतली या साफ़ शब्दों में कहे तो दलाल की भूमिका में आ जाना है . रायगढ़ में भी स्थापित अनेक वृहद् उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए प्रशासन के तमाम आला अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा मिलकर धारा 4,6 और धारा 9 की एवं पेसा या पंचायत(एक्सटेंशन टू शेडूयल एरिया) अधिनियम 1996 का ,वनाधिकार क़ानून और खनन कानून का खुल कर उल्लघंन किया गया है .जबकि बिना प्रशासन के सहयोग और मिलीभगत के पेसा क्षेत्र में एक इंच भी ज़मीन का डायवर्सन नहीं हो सकता . जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसी स्थिति में हजारों एकड़ भूमि का डायवर्सन हुआ है .

जनसुनवाई पहले बंद कमरों में की जाती थी जिसमें कोई पारदर्शिता नहीं होती थी .लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं और किसानों के दबाव और मांग के लिए जन आन्दोलन किये गए जिसके बाद जनसुनवाई को सार्वजनिक किया गया. नहीं तो जिसके पक्ष को लेकर चर्चा होनी है उसे ही इसमें शामिल होने का अधिकार नहीं था .भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में एस.डी.एम. के कार्यालय से धारा 4 लगाकर सूचित किया जाता है .3 महीने बाद धारा 6 लगाकर भूमि अधिग्रहण से जुडी आपत्तियों को आमंत्रित किया जता है, जिसमें ग्राम सभा के प्रस्ताव को पूरे कोरम के साथ होना अनिवार्य है . इसके बाद यदि धारा 9 के तहत कोई आपत्ति नहीं है तब मुआवजा, पुनर्वास,  रोज़गार, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने की शर्तों पर भूमि अधिग्रहण का काम पूरा किया जाता है. जबकि पेसा अधिनियम के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण करने की प्राथमिकता और निर्णय  के सभी अधिकार ग्रामसभा  को मिले हुए हैं .लेकिन जानकारी के अभाव में पेसा अधिनियम का पूरा लाभ प्रभावितों को नहीं मिल पा रहा है. इस कमी के बाद भी नियमगिरि (उडीसा) , केरल में कोकाकोला आदि में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कोयला खदानों की जांच में अब तक 11 खदानें और हिमांचल प्रदेश में 4 हाइड्रो पॉवर रद्द किये गए हैं.

नए उद्योगपतियों द्वारा विकास के बड़े-बड़े दावे ही नहीं किये जाते बल्कि उन पर अमल भी किया  जाता हैं – स्कूल ,अस्पताल,  क्लब, पक्की सड़क,बिजली, पानी, मोबाइल के टावर आदि लगाने और बनाने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दूर से ही दिखती है लेकिन स्थानीय रूप से देखने पर हाथी के दांतों की असलियत सामने आ जाती है . वास्तव में ये सारी सहूलियतें गाँववासियों के लिए नहीं होतीं बल्कि यहाँ संयंत्रों में काम करने आये बड़े अधिकारियों ,प्रबंधक वर्ग और कर्मचारियों की सुविधा के लिए होते हैं. जिसमें सी.एस.आर. के नाम पर समाज के कल्याण के बहाने वे अपना नफ़ा पहले देखते हैं . वहां खोले गए स्कूलों में न तो आदिवासी बच्चों और न ही ग्रामीण बच्चों का एडमिशन हो पाता है और न ही वहां खुले अस्पतालों में इन गरीब विस्थापितों के अपने लोगों का मुफ्त इलाज किया जाता है क्योंकि दोनों ही जगह का फीस उनकी पहुँच से बाहर होती है . केवल विकास के नाम पर सड़क और मोबाइल के टावर का खुलकर उपयोग करना सीख जाते  है. सड़क निर्माण का भी अपना एक समीकरण और सूत्र है.वह ऐसे कि सडकों का विकास किया गया है तो ऑटो मोबाइल वाले उद्योगपतियों की चांदी हो रही है , कारण उनकी दोपहिया और चार पहिया गाड़ियों की बिक्री में वृद्धि हुई है. कभी सरकार ने रेल लाइन बिछाने का बेड़ा इतने जोर-शोर से नहीं उठाया क्योंकि रेल लाइन बिछाने के बाद  वह मुनाफ़ा उद्योगपतियों से नही मिल पाता जो मोटरगाड़ियों से मिलता है . इसीलिए पूरे देश में जितनी तरक्की और बिक्री ऑटोमोबाइल कम्पनियों की हुई है उसके मुकाबले कोई दूसरा नहीं.



वास्तविकता को जानना बहुत ज़रूरी है

इन्ही सब खामियों और पूरे देश भर में चल रहे भूमि अधिग्रहण विरोधी आन्दोलन के चलते 120 वर्ष पुराना भूमि अधिग्रहण क़ानून 1894 पूरी तरह से निरस्त कर एक जनवरी 2014 से भूमि अधिग्रहण , पुनर्वास एवं पुनर्व्यवास्थापन में पारदर्शिता अधिनियम 2013 लागू गया है. गौरतलब है कि पिछले साल 5 सितम्बर 2013 को संसद के दोनों सदनों द्वारा मानसून सत्र में यह विधयेक पारित किया गया एवं 27  सितम्बर 2013 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाने के बाद यह क़ानून बना . विभिन्न स्टॉक होल्डरों के साथ किये गए राष्ट्रव्यापी परामर्श के बाद नियमों का प्रारूप अनुमोदन के लिए विधि मंत्रालय द्वारा अंतिम रूप दिए जाने के बाद 1 जनवरी 2014 को ये कानून लागू लागू कर दिया गया .

तुलनात्मक रूप से 120 वर्ष पहले लागू 1894  का भूमि अधिग्रहण क़ानून में ‘अनुमति’ नहीं ‘मशविरा’  शब्द का प्रयोग किया गया था जबकि इस नए कानून में अनुमति का प्रयोग किया गया है . इस सन्दर्भ में ‘बिना ग्रामसभा के अनुमति’ का पद प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ यह हुआ कि बिना ग्रामसभा के अनुमति के भूमि अधिग्रहित नहीं की जा सकेगी .भूमि अधिग्रहण के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में बाज़ार मूल्य का चार गुना और शहरी क्षेत्र में बाज़ार मूल्य  का दो गुना मुआवजा देना होगा . इसके अतिरिक्त एकमुश्त नकद भुगतानों के अलावा भूमि ,आवास की व्यवस्था, रोज़गार का  विकल्प आदि प्रावधान भी इसमें शामिल हैं .

पुराने 1894 के भूमि अधिग्रहण के तहत अगर भूमि अधिग्रहण प्राधिकारी द्वारा भूमि अधिग्रहण का मन बना लिया गया तो अधिग्रहण की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी जाती थी. लेकिन नए क़ानून में ऐसे प्रावधान को हटा दिया गया है .नए क़ानून के तहत यदि भूमि अधिग्रहण के पांच साल तक अधिगृहित भूमि का उपयोग नहीं किया गया तो इसे किसानों को लौटा दिए जाने या ‘लैंड बैंक’ को दिए जाने का प्रावधान किया गया है .

लैंड बैंक राज्य सरकार के अधीन कार्यरत होगा . नए क़ानून के तहत किसी भी व्यक्ति को विस्थापित करने से पहले उसके लिए पुनर्वास की वैकल्पिक व्यवस्था तथा मुआवज़े का सही भुगतान के बाद ही अधिग्रहण करने की अनुमति दी गयी है .साथ ही आदिवासियों की भूमि हस्तांतरण यदि वर्तमान क़ानून के नियमों की अनदेखी के तहत हुआ तो उसे रद्द माना जाएगा .

नए भूमि अधिग्रहण में आदिवासियों के हितों की सुरक्षा की दृष्टि से अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभाओं की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण न करने के साथ ही पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों के विस्तार) अधिनियम 1996 तथा वन अधिनियम 2006 के प्रावधानों का भी पालन करने के प्रावधानों को रखा गया है.

नए क़ानून के लागू होने से जो लाभ होगा उसे रेखांकित करते हुए तत्कालीन केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जैराम रमेश ने कहा था कि नए भूमि अधिग्रहण क़ानून के लागू होने से नक्सली समस्या में कमी आएगी. झारखंड उडीसा,छतीसगढ़ जैसे नक्सल प्रभावित राज्यों में ग्रामसभा की अनुमति जरुरी होगी.

उल्लेखनीय है कि यदि अधिग्रहण की प्रक्रिया पुराने कानून के तहत शुरू हुई हो ,मगर अब तक मुआवज़े की घोषणा नहीं हुई और न ही ज़मीन पर पांच साल गुजर जाने के बाद कब्ज़ा ही लिया गया हो,तब भी नया भूमि अधिग्रहण क़ानून लागू हो जाएगा . यदि पुराने क़ानून के तहत प्रक्रिया शुरू हुई हो लेकिन बहुमत से प्रभावित भूस्वामियों ने मुआवज़े का बहिष्कार कर दिया हो ऐसी परिस्थिति में भूस्वामियों को नए क़ानून के तहत मुआवजा व अन्य लाभ दिया जाएगा .

गौरतलब है कि पुराने भूमि अधिग्रहण क़ानून की जगह लाये गए नए क़ानून में फिलवक्त 13 ऐसे कानूनों को , जिनके तहत भूमि अधिग्रहण हो सकता है, को शामिल नहीं किया गया है लेकिन सालभर के अंदर ही इन अलग-अलग कानूनों को नए भूमि अधिग्रहण क़ानून में शामिल कर लिया जाएगा. इसके लिए तीन मंत्रालयों कोयला मंत्रालय,खान मंत्रालय और परिवहन एवं एन एच आई मंत्रालय को पत्र लिखा गया है.

केंद्र के इस भूमि अधिग्रहण क़ानून लागू होने के बाद प्रत्येक राज्य को अपना भूमि अधिग्रहण क़ानून बनाने का अधिकार है .भूमि अधिग्रहण के समवर्ती सूची में होने के कारण राज्य व केंद्र के भूमि अधिग्रहण कानून में अंतेर्विरोध होने पर केन्द्रीय कानून ही सर्वोपरि होगा.

उल्लेखनीय है कि भूमि अधिग्रहण संबंधी इस तरह की गतिविधियों और कानूनों में त्वरा हमारे देश की उस स्थिति की ओर इशारा करती है जो यहाँ के प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और मानवीय संसाधनों के अकूत शोषण से पूँजी की विशाल मीनार खड़े करने का सन्दर्भ बनती हैं . हम देखते हैं कि खेती और स्वरोजगार तथा लघु और कुटीर उद्योगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है लेकिन बड़े उद्योगों और खनन को अतिशय महत्व मिला है . झारखण्ड और बंगाल की खदानों की लूट का किस्सा अभी भी पुराना नहीं हुआ है और पिछले साल कोल गेट घोटाला इस देश का सबसे बड़ा घोटाला बनकर सामने आया . ये सारी स्थितियां हमें इस देश के वर्त्तमान और भविष्य     को लेकर अगर गहरी चिंता में नहीं डालतीं तो हमारे सरोकारों में निस्संदेह कोई खोट है . भूमि अधिग्रहण ने कई तरह के वर्ग पैदा कर दिए हैं और इस तरह पूँजी की दुनिया ने शोषकों को और भी पाँव पसारने का मौका दे दिया है . हमें इस बात पर बहुत गंभीरता से विचार करना होगा कि गाँव , किसान और आदिवासी आज और आने वाले दिनों में किन चुनौतियों से दो चार हो रहे हैं !!


(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 19 मार्च 1970 को रायगढ़, छत्तीसगढ़ में.
शिक्षा : बीकॉम। एम-फ़िल
सृजन : कविताएं और लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
अन्य : इप्टा में क़रीब डेढ़ दशक से सक्रिय। रंगकर्मी। रेडियो का भी अनुभव
संप्रति : कॉलेज में तदर्थ व्याख्याता
संपर्क : aparnaa70@gmail.com
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बुधवार, 15 जनवरी 2014

मरना सिर्फ हम भूखे नंगे को है माई बाप!



 









संजय सिंह की पांच कविताएं


1.
उनकी अफरातफरी में
शामिल हैं हिरनों की कुलाचे
नील गायों की
कुचल डालने वाली निगाहें
और चट्टानी खुर

उनके उन्माद में
शामिल हैं हाथों में हाथ डाले
गलबहियाँ किये
सब के आक्रोश

दण्डकारण्य में
दण्ड भोगते लोग
जो न इधर हैं
जो न उधर हैं

जंगल, जमीन और जल
आदिवासियों की नींद से निकाल
सपना उगाते
इधर के लोग
उधर के लोग

गोली और बोली से खूनाखून आदिवासी।।

2.
भागना
सिर्फ भागना
अपनी ही जमीन से
जंगल से
नियति को ”शिशनाग्र पर रखने वाले
भोले भाले

आदिवासी -एक प्रजाति

रेती जा रही कंठों की आवाज से
न ईश्वर काँपते हैं
और न ही उनकी रूह

साँवले घोटूलों पर काबिज
उधार के सपने
कोलेस्ट्राल घटाने वालों की चिंता में
विलुप्ति का कगार
और दया, करूणा, सरकारी मदद

मुखारी, चार और तेंदूपत्ता के खेल में
उनके खून से
अपने जूते
बूट चमकाते लोग।।

3.
उनकी चीखें
सपने को चिंदी करती

सिर्फ कल्पना ही
त्वचा में खूँटा उखाड़ देती है

मान लो किसी पुलिस कैम्प में
कोई आधी रात
बाँस को आपके शरीर के अवांछित जगह में घुसेड़ रहा हो

मान लो किसी अलसुबह
आप रास्ते पर
अपना ही सिर कटा धड़ देखें

तुम मारो
या
वो मारे

मरना
सिर्फ हम भूखे नंगे आदिवासियों को है माई बाप।।

4.
धरती के नीचे
लोहा, बाक्साइट, हीरा
ऊपर हम आदिवासी
और जंगल

त्वचा के नीचे
लालच
इच्छा के नीचे
धोखा

तुम्हारे सपने के लिए
मारे जाते लोग
सरकार और लाल सपने की ठोकरों के बीच
हमारी पूरी प्रजाति
दौड़ती-भागती-हाँफती

गोलियों से भून दी गयी
माँदर की थाप
पैरों की ताल

आदिम ख़ुशी की लाशों  पर
पैर रखकर मुस्कुराता एक देश ।

5.
देश  के नखरे
उठाती पथरीली पीठों
कंधे की गाँठ में बदल गयी सिसकियों
और
नाबालिग इच्छा नुचवाती माँओं
चुप रहने के द्रोह से बेहतर होगा
पूछो
कि हमारा
चीखो
चिल्लाओ

(कवि-परिचय:
जन्म: 28 दिसंबर, 1970 को रायगढ़, छत्तीसगढ़ में
शिक्षा: विज्ञान में स्नातक,  स्नातकोत्तर ग्राम विकास में. साथ स्पेनिश भाषा का डिप्लोमा
सृजन: कथादेश, साक्षात्कार, परिकथा, कथा क्रम, माध्यम,  मधुमती, पक्षधर  आदि में कथा-कविताएं प्रकाशित
सम्मान:विपाशा  कहानी प्रतियोगिता 2008  में प्रथम।  कथादेश कहानी प्रतियोगिता 2007 का सांत्वना पुरस्कार 
संप्रति: महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रिय हिंदी विवि, वर्धा से सम्बद्ध
ब्लॉग: कोशिश
संपर्क: perjs@rediffmail.com )      
           
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रविवार, 20 अक्टूबर 2013

विकास की अंधी दौड़ में आम छत्तीसगढ़िया ग़ायब














ज़ुलेख़ा जबीं की क़लम से

आदिवासी और स्त्रियों के बहाने
तेजी से विकसित होते भारत में भौतिक विकास तो चरम की तरफ है मगर नागरिक विकास में भारत लगातार पिछड़ता जा रहा है। आज से 12 बरस पूर्व (लगभग 1करोड़ 55लाख 98 हजार की आबादी वाले छग में 66 लाख 36 हजार औरतें, और 67लाख 11 हजार मर्द ) जब एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ का उदय हुआ, तो उसकी बड़ी वजह भूगर्भीय खनिज संपदा के साथ ही इस क्षेत्र की विशेष सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान के साथ ही यहां की आदिवासी बहुलता भी थी। छत्तीसगढ़ की 32 फीसद आबादी आदिवासियों की है। विकास के नाम पर राज्य में आदिवासियों/आम जनता खासकर औरतों की जमात को जिस तरह लाठी, गोली और फौज से दबाया जा रहा है, जिस तरह से औरतों/बच्चियों पर किए जा रहे उत्पीड़न, शोषण, हिंसा व अत्याचारों में नित नए आपराधिक (नौकरशाही, राजनीतिज्ञों) आयाम जुड़ रहे हैं, सरकारी हिंसा के खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज को देशद्रोह के नाम पर जिस तरह खामोश किया जा रहा है, राज्य में जिस तरह भू-गर्भीय संसाधनों की लूट खसोट मची है, और खूनी अ-सामाजिक तत्वों की जो नस्ल पैदा की जा रही है उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले कई दशक आदिवासियों के खात्मे और अगली पीढ़ीयों के लिए संकट भरे होंगे।

प्रदेश के लिए कृषि तीन चैथाई आबादी का जीवनआधार है। यह अकल्पनीय लगता है कि राज्य की नदियों का पानी खेती को सींचने के बजाए उद्योगों के लिए मुनाफा पैदा कर रहा है और इसके लिए खनिजों की अंधाधुंध खुदाई करके जंगलों की जैव विविधता का खात्मा किया जा रहा है।  राज्य में करीब 70,000 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए एमओयू किए जा चुके हैं, ताप विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं।  (जबकि 2012 की केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में पीक लोड 5800 मेगावाट अनुमानित है.) इसके लिए 70,000 एकड़ जमीन, 33करोड़टन कोयला, खनन के लिए 1.5 हेक्टेयर वनभूमि,  और 2669 घनमिलियन पानी प्रतिवर्ष खर्च होगा जिससे राज्य मंे 5.33 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई हो सकती है (कमेटी आन इन्टीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर डेव्हलपमेंट रिपोर्ट-छग सरकार) यहां विकास का मतलब बड़े बड़े विद्युत प्लांट, इनके अफसरों के लिए आलीशान रिहाइशी कांप्लेक्स,चमचमाती चैड़ी सड़कें, आलीशान शापिंग माल, हर समय उपलब्ध रहने वाली बिजली, उससे चलने वाले उपकरण, सभी चीजें आसानी से मुहैया कराई जा रही है. ताकि अमीरों को मुनाफा कमाने के रास्ते फराहम किए जा सकें। इसके लिए थोक में लोगों को जबरदस्ती उनकी जमीन, जंगल, जल से उन्हें बेदखल किया जा रहा है, जो विरोध कर रहे हैं उन्हें नक्सली, राजद्रोही बताकर खामोश करने की कोशिशें की जा रही हैं, जो इससे भी नहीं डरते उन्हें फर्जी मुठभेड़ों में मार गिराया जा रहा है। इन परिवारों की औरतों से निपटने के लिए उनपे शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न, यौन शोषण, बलात्कार, हत्या जैसे औज़ार इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

आइये देखें छग में जन विकास का सच दिखाती सरकारी रिपोर्टस क्या कहती हैं
जीडीपी में पिछड़ापन-छत्तीसगढ़ का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 2012 में 46.743 था जबकि इसके साथ ही वजूद में आए उत्तराखंड का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 79.940रुपए है। तमाम दावों के बावजूद हकीकत ये है कि 2000 में नए बने 3 राज्यों में छत्तीसगढ़ दूसरे नंबर पर है, जबकि देश का औसत प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन 61,564 रु है। ये और बात है कि छग के सकल घरेलू उत्पादन की विकासदर अच्छी है लेकिन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक अगर हम पिछडे हुए हैं तो केवल विकासदर (18.36)अधिक होने से कुछ नहीं होगा।
सर्वाधिक मदद पाने के बावजूद गरीबों का बढ़ना-  रिजर्व बैंक के मुताबिक देश में सर्वाधिक आर्थिक मदद (1,540रु) पाने वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ भी शामिल है लेकिन राज्य में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली जनसंख्या बढ़ती ही जा रही है।  रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक केंद्र से झारखंड (1,556) और उड़िसा(1,688) के साथ ही छग (1,540) को भी प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति यह अनुदान मिलता है। उक्त तीनों राज्यों को प्रति व्यक्ति औसत अनुदान सबसे अधिक दिया जाता है, मगर छग में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान में छग की 40.1 फीसदी जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे वास कर रही है जबकि राज्य में वनसंपदा तथा प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं. राज्य में  38,200मिलियनटन कोयला है। 30,500मिलियनटन लौह अयस्क है। 30,500 मिलियनटन चूना पत्थर है,  600 मिलियनटन डोलोमाइट है। 96 मिलियनटन बाक्साइट है। इन सबके अलावा राज्य में हीरा, एलेक्जेंड्राइट, सोना और कोरंडम भी प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है। छग सरकार का दावा है कि सरकारी राजस्व का सिर्फ 32 फीसदी प्रशासन पे खर्च किया जाता है। बाक़ी का 68फीसदी विकास पे खर्च किया जाता है। लेकिन हकीकत में सरकार का ये दावा छग की (40.01फीसदी) गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की लगातार बढ़ती जनसंख्या के सामने कोरा झूठ साबित हो रहा है. (जबकि इस समय देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी महज 27.5फीसद है).
पीडीएस की स्थिति- एनएसएस के आंकड़ों के मुताबिक जहां 2004-05 में केवल आधे गरीब परिवारों से पास ही बीपीएल कार्ड था।  वहीं इस बरस के दौरान छग में आधा अनाज ही लोगों तक ही पहुंचता था. जिस राज्य की कम से कम दो तिहाई आबादी गरीबी में जी रही हो उस राज्य की विधानसभा में 23 करोड़पति विराजमान हों और 37 लाख गरीब परिवारों के लिए सस्ते अनाज की योजना राज्य में गरीबी की व्यापकता को व्यक्त करती है।
वित्तीय समावेशन में पिछड़ापन- वित्तीय सेवाओं के मामलें में छत्तीसगढ़ अच्छी हालत में नही है अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो वित्तीय समावेशन के नजरिए से छग राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है। हकीकत ये है कि राज्य के रहवासियों की बैंक, बीमा, पेंशन तक में पहुंच औसत से काफी कम है.(अंतिम पांच में) देश के सभी राज्यों में छग की रेटिंग 32 वीं है और सूचकांक 27 है. यानि राज्य में प्रति 100 लोगों में 27 लोगों की ही पहुंच वित्तीय सेवाओं तक है. विशेषज्ञों का मानना है कि छग में वित्तीय संस्थाओं तक मात्र 27फीसदी लोगों की पहुंच है तो सरकारी योजनाओं को उन तक कैसे पहंचाया जा सकता है? मतलब साफ है छग वर्तमान विकास के माडल के साथ अपना सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है।


बाल अपराध में देश का पांचवां राज्य
देखा जाए तो राज्य में हो रहे विकास की लहर बच्चों तक नहीं पहुंची है और वे इस विकसित समाज में अमानवीय अत्याचार के शिकार हैं।  जिसमें राजधानी रायपुर का नाम देश में आठवें नबर पे लिया जा सकता है। और छ.ग बाल अपराधों में देश में पांचवे नंबर पर है। केंद्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरों की रिपोर्ट पे नजर डालें तो 2012 में बच्चों के खिलाफ विभिन्न थानों में दर्ज अपराधों की संख्या 1881 हैं। (जिसमें शिशु हत्याएं, बलात्कार, हत्या, अपहरण, आत्महत्या के लिए उकसाना, परित्याग करना, देह व्यापार के लिए बच्चियों की खरीद-फरोख्त और भू्रण हत्या शामिल है- इनमें अकेले राजधानी रायपुर में 204 अपराध और एजुकेशन हब कहलाने वाले दुर्ग में 268 अपराध दर्ज हुए हैं) राज्य में हो रहे इन बाल अपराधों के 10.2 फीसदी मामलों की जांच अभी तक बाकी है।
 बेटियों की क़त्लगाह  बनता छग
यूनाइटेड नेशंस के मुताबिक दुनिया में औरतों के साथ की जाने वाली हिंसा में भारत 5वें नंबर पे है। पाकिस्तान जैसे देश से भी पीछे है. छग में बलात्कार की बढ़ती हिंसा पर नजर डालें तो 2010 में 1012 बलात्कार के प्रकरण विभिन्न थानों में दर्ज किए गए (बावजूद इसके कि एफआईआर करवाना कितना मुश्किल है) जहां पीड़िताएं गुमनाम हो चुकी हैं या मौत को गले लगा चुकी है और उनके अपराधी आजाद घूम रहे हैं, ऐसे आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब एक होनहार महिला खिलाड़ी को उसके ही कोच की बदनीयती का शिकार बनना पड़ा। बात खुलने पर कोच पर अपराध दर्ज होना तो दूर उसे बचाने की सरकारी स्तर पर सरगर्मियां किसी से छुपी नहीं है। उच्च शिक्षा में महिलाओं के शोषण का आलम ये है कि इकलौती सेंटरल यूनिवर्सिटी में एक महिला व्याख्याता कुलपति द्वारा शारीरिक, मानसिक शोषण किए जाने की गुहार पिछले दो वर्षों से लगातार लगा रही है मगर आज तक संबंधित थाने ने उनकी एफआईआर नहीं लिखी और न ही किसी तरह की जांच शुरू की गई। राष्ट्रपति तक मामला सुबूतों और गवाहों सहित पहुंचाया गया मगर राज्य के मुख्यमंत्री के प्रिय और केंद्र सरकार के चहेते कुलपति आज भी अपने पद में रौब के साथ बने हुए हैं। शोधार्थी छात्राओं के साथ होने वाले यौन शोषण में जिस तरह बढ़ोतरी हो रही है उससे तो लगता है कि बहुत जल्द राज्य महिला शिक्षार्थियों के यौन शोषण में भी अव्वल नंबर की श्रेणी में गिना जाने लगेगा।

2011 की जनगणना के मुताबिक जहां देश में औरतों का अनुपात प्रति 1000मर्दा की तुलना में 940 है।  वहीं छग का औसत 991 लेकिन राज्य के बड़े शहरों में यह जसं 956 हैं. तो 0-6बरस की उम्र का लिंगानुपात यहां 964 और 932 है. (रायपुर,बिलासपुर,दुर्ग कोरबा,रायगढ़ ). जबकि ग्रामीण इलाकों में 1000 पे 1004 औरतें हैं. तो वहीं 0-6 बरस उम्र की बच्चियों की संख्या आज भी 972 है.(बस्तर, दंतेवाड़ा, महासमुंद, राजनांदगांव, धमतरी, कांकेर, जशपुर) मतलब साफ है राज्य के बड़े शहरों में तथाकथित विकास का उन्माद बेटियों का खात्मा करने पे उतारू है. यानि आदिवासी (विकास की नजर में असभ्य)आज भी अपनी बेटियां को जिन्दा रखने में गर्व महसूसते हैं। ताजा आंकड़े यही दिखा रहे हैं कि राज्य के बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहरों में बेटियों का अनुपात ज्यादा है। बेटियों को भ्रूण  में मार डालने का सभ्य धंधा इन बड़े शहरों में पिछले एक दशक से खूब फलफूल रहा है यहां बंगाल और उड़िसा की बेटियां के भ्रूण  भी चिंहाकित करके मार दिए जाते हैं। नालियों में मिलने वाले स्वस्थ्य मादा भ्रूण  की तादाद भी कुछ कम नहीं, .(सुबूतों के साथ शिकायतों के बावजूद)मजाल है जो सरकार ने ऐसे किसी भी सेंटर पे आज तक कोई कड़ी कार्रवाई की हो।

बलात्कार -नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में हर दिन तीन औरतें बलात्कार का शिकार होती हैं। औरतों के साथ बलात्कार की घटनाओं की अपराधदर 8.41 फीसद से राज्य देश में सातवें स्थान पे चमक रहा है। 2013 के ताज़ा आंकड़ों पे नजर डालें तो राज्य 2012 में कुल 1034 औरतें बलात्कार की शिकार हुई हैं (350 औरतों के अपहरण के मामले और 980 घरेलू हिंसा में पति/रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ना के मामले दर्ज किए गए) जबकि 2011 में 1053 औरतें बलात्कार की शिकार दर्ज की गई। यहां भी एजुकेशन हब कहलाने वाले दुर्ग जिले (शहरी)में बलात्कार का क्राइम रेट 13.50 है तो राजधानी रायपुर में ये दर 11.76 है. शीलभंग की कोशिश में पिछले बरस 1601दर्ज मामलों के साथ यह राज्य देश में सातवें नंबर पे हैं. और इसका दुर्ग शहर पांचवे नंबर पे दर्ज है।
हत्या-राज्य में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा का ये आलम है कि सालभर(2012) में हत्या के 320 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए जिसमें महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है अकेले रायपुर में 97 मामले थानों में दर्ज हुए जिसमें 34 महिलाओं का कत्लेआम किया गया।
आदिवासी बालाओं के साथ हिंसा- चूंकि छग मातृपधान सत्ता वाला आदिवासी बहुल राज्य है यहां आदिवासी महिलाओं के साथ चिंहाकित अलग तरह की हिंसा चिंतित करने वाली है जैसे- छग के बस्तर संभाग (संपूर्ण आदिवासी )का कांकेर जिला के नरहरपुर ब्लाक के झालियामारी गांव के एक प्राइमरी आदिवावी कन्या आश्रम जहां 46 छात्राएं ( 5से 12 वर्ष की)रहती हैं- पिछले 2 बरस से यहां की 11 बच्चियांे के साथ वहीं के शिक्षाकर्मी और चैकीदार बलात्कार, यौन शोषण करते हुए, मारपीट कर किसी से न बताने के लिए उन्हें धमकाते रहे हैं। औचक निरीक्षण में पहुंची स्थानीय कलेक्टर से आश्रम की पीड़ित बच्चियों ने अपने साथ की जा रही घिनौने अपराध की जानकारी दी तब मामला बाहर आया और आनन फानन में सिर्फ चैकीदर की गिरफतारी की गई और शिक्षा कर्मी फरार घोषित हो गया. अधिकारी स्तर पर कोई जवाबदेही, जिम्मेदारी या कार्रवाई अब तक निल है। इसके साथ ही आदिवासी औरतों के साथ यहां तैनात राज्य एवं केंद्र सरकार के सेना बल द्वारा विभत्स यौन हिंसा व उत्पीड़न की घटनाएं अंजाम दी जाती है. साथ ही हिरासत में इन औरतों के साथ बलात्कार यौन उत्पीड़न, शोषण राज्य में कोई मुददा ही नहीं है. पुलिस हिरासत में, एसपी की मौजूदगी में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर घुसेड़े गए जिसपर न महिला आयोग और न अदालतें सुनवाई करने को तैयार हैं।

2008-2009 के आंकड़ों के मुताबिक 20 हजार आदिवासी लड़कियां सरगुजा और जशपुर जिलों से गायब हो चुकी हैं। राज्य से 3000 लड़कियां की गुमशुदगी का इकरार खुद सरकार 2 बरस पहले ही विधानसभा में कर चुकी है लेकिन अभी तक इनमें से ज्यादातर अपने परिजनों तक नहीं पहुच पाई हैं। राज्य से मानव तस्करी व्यवस्थित तरीके से जारी है जिसमें बड़ी तादाद औरतों और नाबालिग बच्चियों की है मगऱ इन्हें रोकना तो दूर पिछले नौ बरसों में सरकार इनके ठेकेदारों और दलालों पर भी हाथ नहीं डाल पाई है क्योंकि इन गिरोंहों के सरगना छग और दिल्ली में बैठे रसूख वाले (गैर आदिवासी)मंत्री और राजनीतिज्ञ हैं।

 38.47फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार

कुपोषण के मामले में देश के पूर्वाेत्तर राज्यों के हालात छग से बेहतर है। बच्चों में खून की कमी का आंकड़ा 2012 में 70 फीसदी था।  केंद्र सरकार के आंकड़े देखें तो छग में 38.47फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. जबकि देश में सबसे कम 2फीसद कुपोषण अरूणाचल प्रदेश में दर्ज की गई है.(जबकि इन राज्यों को गरीब/पिछड़ा माना जाता है) लेकिन कुपोषण और एनीमिया के मामलों छग उनसे पिछड़ा हुआ है।
स्वास्थ्य- एओआई की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की बड़ी कमी है.. रिपोर्ट में साफ लिखा है कि ग्रामीण इलाकों के वंचित तबकों में भी औरतों और बच्चियों के स्वास्थ्य के लिए सरकारी सुविधाओं की बड़ी कमी सामने आई है। दंतेवाड़ा जिले के सिर्फ 59 गांवों में ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं।  सरकारी अस्पतालों में बढती अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, डाक्टरों की लापरवाही, स्वास्थ्य सुविधाओं और संसाधनों की कमी के चलते मरीजों की मौत के मामले बढ़े हैं. रायपुर के गरियाबंद में 36 मरीजों की मौत जिसमें आधी संख्या औरतों की है चिंता करने लायक है।
सरकारी नेत्र शिविरों में आए दिन गरीब बूढ़ों के अंधे होने की खबर अब किसी को नहीं चैंकाती हैं। पिछले बरस करीब 70 लोग अंधे हो गए और 4 की मौत हो गई।
 नेशनल इंस्टीटयूट आफ न्यूट्रीशन के मुताबिक 18से 29 वर्ष के भारतीयों को 2,320 कैलोरी भोजन की रोज जरूरत पड़ती है, लेकिन छग में 1900 कैलोरी भोजन भी एक छत्तीसगढ़िया को मयस्सर नहीं है। यहां राज्य सरकार अपने नागरिकों को पर्याप्त कैलोरी युक्त भोजन भी नहीं दे पा रही है। जबकि मंत्रियों के बाहर निकलते हुए पेट फट पड़ने को बेताब हैं. ऐसे में पति को परमेश्वर मानने वाले समाज में जहां 80 फीसदी गरीबी है उस राज्य में औरतों को कितना कैलोरी में भोजन मिलता होगा इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।
गए बरस राज्य के बस्तर जैसे (धुर आदिवासी) इलाकों में रेडक्रास जैसी संस्था पे सरकार ने रोक लगा दी है। इन इलाकों में सरकारी सुविधाओं की बेहद कमी की वजह से कुपोषण, एनीमिया, औरतों की स्वास्थ्य समस्याओं के कारण मौतों की संख्या बढ़ी है। यह इलाका माओवाद से प्रभावित है और सरकार जहां एक तरफ आपरेशन ग्रीनहंट जैसे कार्यक्रम चला रही है वहीं सलवा जुड़ुम जैसी जन मिलेशिया द्वारा उद्योगपतियों के हित में आदिवासियों का सफाया कर रही है।  अतः पहले से ही यहां स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी रही है तब भी यहां काम कर रही संस्थाओं को भी भगाया जा रहा है. ’’डाक्टरर्स विदाउट बार्डर’’ और ’’रेडक्रास’’ पर 2011 पर माओवादियों का इलाज करने का आरोप लगाकर रोक लगा दी गई है।

शिक्षा-79फीसदी आदिवासी आबादी वाले दंतेवाड़ा जिले की साक्षरता दर देश में सबसे कम है वहीं जिले के 1220 में से 700 गांवों में विद्यालय नहीं हैं, यहां के 600 से भी अधिक गांवों के तीन लाख से भी ज्यादा लोग पिछले नौ बरसों में सशस्त्र संघर्ष की वजह से विस्थापित हो चुके है। राज्य में प्रायमरी स्तर की कक्षा में पढ़ने वाले आदिवासी बच्चों में से 16 हजार 386 बच्चे प्रतिवर्ष ड्राप आउट होते हैं, तो अनुसुचित जाति के 2हजार 582 बच्चे स्कूलों से बाहर हो जाते हैं। यही नहीं ओबीसी के 7हजार 60 बच्चे और सामान्य वर्ग के 2हजार 243 बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। मात्र प्राथमिक स्तर पर हमारे नौनिहाल इतनी बड़ी मात्रा में स्कूल से बाहर जा रहे हैं तो इनके कारणों की पड़ताल करना ही जरूरी नहीं है बल्कि उन विसंगतियों को दूर किया जाना भी जरूरी है जिनकी वजह से ये बच्चे बाहर का रास्ता नाप रहे हैं।  शिक्षा विकास का पहला कदम है और उस पहले कदम के लिए राज्य में मजबूत जमीन अब तक नहीं बन पा रही है।
रोजगार- रोजगार गारंटी योजना के तहत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 में राज्य में 43 लाख 92 हजार 789 परिवारों के पास मनरेगा जाब कार्ड था। जिसमें से 27 लाख 26 हजार 377 परिवारों ने काम मांगा था। कुल26 लाख 26 हजार 54 परिवारों को काम मिल सका। उनमें से भी पूरे 100 दिनों का काम महज 2 लाख 39 हजार 43 परिवारों को ही मिल पाया। गौरतलब है कि इस कानून के सामाजिक और आर्थिक पहलू हैं। एक तरफ जहां इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा जिसका सीधा फायदा उस परिवार को पहुंचेगा। जब घर में पैसा आएगा तो भोजन के साथ ही परिवार की मूल जरूरतें पूरी होंगी. कितनी हास्यास्पद बात है कि जिन कुल परिवारों के पास मनरेगा जाब कार्ड था (जबकि मजदूरी 155रू प्रति दिन थी) अगर सभी को 100 दिन की काम और मजदूरी मिलती तो उक्त परिवारों के पास (68,08,83,69.000)अड़सठ अरब रूपए आते।  अगर कार्य मांगने वाले सभी 27,26,377 परिवारों को 100दिनों का रोजगार दिया जाता तो छग में बयालीस अरब(42,25,43,500) रूपए आते.मगर सिर्फ 2,39,430 परिवारों को ही 100 दिनों का काम मिल पाया अतः सिर्फ तीन अरब रूप्ए (3,67,41,66,500)ही राज्य में आ पाए मगर भ्रष्ट नौकरशाही ने वो भी आज तक पूरी तरह मजदूरों तक नहीं पहूंचाए हैं।

कृषि- राज्य बनने के बाद कृषि रकबे में लगभग 10 लाख हेक्टेयर की कमी आई है और इतने ही किसान भूमिहीनों और सीमांत श्रेणी में शामिल हो कर गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में जा चुके हैं। धान का कटोरा कहलाने वाला छग आज देश के अठारह राज्यों की सूची में अठारहवें नंबर पे है। विकास करते देश भारत के लिए ये कम शर्मनाक बात है कि 2001की जनगणना में जहां छग में कुल कामकाजी लोगों में किसानों की जनसंख्या 44.54 फीसदी थी वह 2011 में घट कर 32.88 फीसदी रह गई. जबकि इसके विपरीत खेतीहर मजदूरों की जनसंख्या में आश्चर्य करने लायक बढोत्तरी हो गई।  2001 में जहां कुल कार्मिकों में 31.94 फीसद खेतिहर मजदूर थे लेकिन 2011 में इन्हीं खेतिहर मजदूरों की जनसंख्या बढकर 41.80 फीसद हो गई। जिससे लाखों किसान मजदूर बन गए. भारत सरकार की कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी)  की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ की इस हालत की जिम्मेदार राज्य सरकार की नीतियां है।

केंद्र सरकार द्वारा आबंटित बजट- केंद्र सरकार, सुरक्षा संबंधी व्यय योजना के तहत नक्सल उन्मूलन अभियानों पर राज्य सरकारों(वर्तमान में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित 9 राज्यों अर्थात आंध्र प्रदेश, बिहार, छग झारखंड मप्र महाराष्ट उड़िसा) द्वारा किए गए व्यय की प्रतिपूर्ति करती है।  पिछले दस वर्षा के दौरान सुरक्षा संबंधी व्यय योजनांतर्गत उक्त राज्यों को 2002.03 से लेकर 2011.12 तक 811.09 करोड़ रूपए जारी किए गए हैं। इसके अलावा इस अभियान के लिए मुहैया कराई गई हवाई उड़ानों पर साल 2010-11 में 16.10 करोड  और 2011-12 में 13.30 करोड रूपए खर्च किए गए हैं।  इसके साथ ही पुलिस थानों के निर्माण और सुदृढीकरण ( ‘Construction/fortification of Police Stations’  )स्कीम के तहत नक्सल प्रभावित उक्त राज्यों को साल 2010-11 में 10 करोड और साल 2011-12 में 210 करोड रूप्ए खर्च किए गए हैं। इन्हीं 9 राज्यों में Special Infrastructure Scheme    के तहत साल 2008-09 में 9999.92 लाख, साल 2009-10 मे 3000 लाख , साल 2010-11 में 13000 लाख तथा 2011-12 में 18582.01 लाख रूपए दिए गए हैं. यानि  नक्सल प्रभावित 9 राज्यों में विगत 4 बरसों में Special Infrastructure Scheme   के तहत 445.81 करोड़ रूप्ए खर्च किए जा चुके हैं।
इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा शत प्रतिशत वित पोषण से नक्सल प्रभावित राज्यों लिए विशेष अवसंरचना योजना शुरू की गई है जिसके तहत 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान इस योजना में 500 करोड़ रूपए आबंटित किए गए हैं. 2008-09 में 100 करोड़,2009-10 मे 300 करोड़, और 2010-11 में 100 करोड़ रूप्ए जारी किए जा चुके हैं।
इसके यही नहीं नक्सलवाद से निपटने के लिए गृह मंत्रालय का नक्सल प्रबंधन प्रभाग लोगों को हिंसा छोड़ने के जारी विज्ञापन में पिछले दो बरसों में 10 करोड़ 80 लाख रू. जारी कर चुका है।  (2010-11 मंे 570 लाख और 2011-12 में 510.19लाख रू.)गौरतलब है कि 1 अपे्रल 2008 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकी और सांप्रदायिक हिंसा में मारे जाने वाल लोगों के परिजनों को मुआवजा देने के लिए एक योजना शरू की जिसके तहत आतंकी घटना या सांप्रदायिक हिंसा में मारे जाने वाले एवं गंभीर रूप से घायल होने वाले लोगों के परिजनों को 3 लाख रूप्ए राहत राशि देने का प्रावधान है। (केंद्र सरकार की यह योजना 22 जून 2006से नक्सली हिंसा में मारे जाने वाले लागों के परिजनों पर भी लागू है.) मगर जमीनी हकीकत ये है कि छग में किसी भी आदिवासी परिवार (महिला/पुरूष)को इस मद से कोई राशि नहीं दी गई है।

राज्य बनने के पहले से ही आदिवासियों के खात्मे की साजिश-
गौरतलब है कि छग में आदिवासियों की जनसंख्या कम करने की साजिश राज्य बनने से पहले केंद्र की एनडीए सरकार ने शुरू कर दी थी। 2001 की जनगणना में बस्तर के 564 गांव और जशपुर के 300 गांवों को वीरान बता कर उनकी गणना ही नहीं की गई थी। आज फिर 2011 की जगणना के आंकड़ों पे सवाल उठ रहे हैं।  शुरूआती आंकड़ों के मुताबिक़ छग राज्य की जनसंख्या में 22.59फीसदी वृद्धि हुई है। जहां एक तरफ कबीरधाम(मुख्यमंत्री की कांस्ट्वेंसी) की जसं में 40.06 फीसद,(रायपुर 34.59,बिलासपुर 33.02 फीसद) की वृद्धि हुई है वहीं धुर आदिवासी बस्तर के सुकमा में जसं वृद्धिदर 8.09 फीसदी,दंतेवाड़ा 11.09, बीजापुर 8.76, जशपुर14.65, कांकेर 15.01फीसदी वृद्धि दिखाई गई है. यानि आदिवासी बहुल सुकमा की तुलना में कबीरधाम की जनसंख्या 5 गुना बढ़ी है। जनगणना के इन आंकड़ों ने राज्य सरकार के विकास कार्यक्रमों पे भी सवालिया निशान लगा दिया है।
राजनीति में भागीदारी- छग देश के उन चुनिंदा राज्यों में है जहां औरतें श्रम में बराबर की भागीदार होने की वजह से निर्णयों में उनकी भागीदारी है. साथ ही चूड़ी प्रथा जैसी सशक्त सांस्कृतिक परंपरा भी छग की धरती में मौजूद है जो यहां की औरतों को मर्दा की हिंसक श्रेष्ठता और खराब शादीशुदा जिंदगी से निजात दिलाने में सहायक है।  ये और बात है कि बाहर से आए गैर छत्तीसगढ़िया सवर्ण धनाडय व्यापारी वर्ग की अय्याश प्रवृत्ति की वजह से यह स्वस्थ्य परंपरा भी औरत विरोधी दिखाई पड़ने लगी है। महिला प्रधान आदिवासी संस्कृति का द्योतक होने के बावजूद छग की राजनीति में औरतों की मौजूदगी उतनी सशक्त नहीं है जितनी होनी चाहिए। यहां महिला नेतृत्व पर पुरूषिया प्रभुत्व की वजह से नेतृत्व में  औरतों की तादाद नगण्य हैं। जबकि बहुसंख्यक आदिवासी नेतृत्व को महज चुनाव जिताने का जरिया मान लिया गया है लेकिन जीतने के बाद भी इन औरतों को वो जगह नहीं दी जा रही है. जिसकी वे हकदार हैं. महिला नौकरशाहों के साथ दुव्र्यवहार यहां आम बात है.( 32फीसदी आदिवासी बहुत राज्य में एकमात्र आदिवासी महिला मंत्री है जो अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करेंगी.)
चंद अमीरों की अय्याशी के लिए जब सारे वंचित तबक़े समाज सुनियोजित तरीके से हाशिए में ढ़केले जा रहो हैं,  तब उनकी औरतों के हालात बेहतर कैसे हो सकते हैं? राज्य में औरतें मर्दो के कांधों से कांधा मिलाकर देश विकास में कृषि, खेल (अंतर्राष्ट्रीय) जगत में शिक्षा से लेकर भारतीय सीमा पर अपनी भागीदारी दर्ज करा चुकी है। ऐसे में तेजी से विकास की ढ़लान उतरते देश, धनाडय समाज और सरकारों को-औरत होने के गुणों सहित, उनकी संपूर्ण इंसानी/संवैधानिक हक़ों की हिफ़ाज़त, संरक्षित और सुरक्षित करने की जिम्मेदारी उठानी ही पडे़गी. वर्ना वर्तमान से भी तेजी से आगामी पीढ़ियों का लहू राज्य की धरती सिंचित करेगा और सरकारें माओवादी हिंसा की आड़ में अपनी जनसंहारक अमानवीय नीतियों की पर्दादारी नहीं कर पाएंगी।
राज्य में बढ़ाई जा रही नौकरशाहों, व्यापारियों, सवर्ण राजनीतिज्ञों और सरकारी हिंसा के तौर तरीकों से आदिवासी, दलित, महिला विहीन छग की कल्पना भी रोंगटे खड़े कर देती है। इसके अलावा राज्य में एक तरफ दक्षिण पंथियों की नफरत की राजनीति के तहत धर्मान्तरण के झूठे प्रचार और चर्च वर्सेस आरएसएस के राजनैतिक विद्वेष की आड़ में झूठे प्रचार द्वारा हिंसक हमलों का बढ़ाया जा रहा है,(इसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ) दूसरी तरफ मुस्लिम अल्पसंख्कों के खिलाफ कुत्सित पूर्वाग्रह आधारित मानसिकता से सरकारी स्कीमों से उन्हें दूर रखते हुए उनके नागरिक अधिकारों का हनन पिछले 12 बरसों से बदस्तूर जारी है।  रहे उनके बच्चे तो वे किसी गिनती में ही नहीं है।  राज्य की विधानसभा (पिछले दो टर्म से) में इकलौते मुस्लिम विधायक (कांग्रेस) हैं। छत्तीसगढ में विकास के इस चरित्र को देखते हुए बक़ौल जनकवि गोरख पांडेय के मुताबिक़ अब यहां आमजन का भविष्यगान होगा--
सुनो कि हम दबे हुओं की आह इन्क़लाब है.
खुलो कि मुक्ति की खुली निगाह इन्क़लाब है.
उठो कि हर गिरे हुओं की राह इन्कलाब है.
हमारी ख़्वाहिशों का नाम इन्क़लाब है.
हमारी ख़्वाहिशों का सर्वनाम इन्क़लाब है.
हमारी कोशिशों का इक नाम इन्क़लाब है.
हमारा आज एकमात्र काम इन्क़लाब है.

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(लेखिका-परिचय:
जन्म:9 अगस्त 1977, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में
शिक्षा: अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा पत्रकारिता व जनसंचार में उपाधि
सृजन: मानवाधिकार पर प्रचुर लेखन-प्रकाशन, देशबंधु में कुछ वर्षों नियमित रिपोर्टिंग, कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित  
संप्रति: कई प्रमुख महिला संगठनों में सक्रिय और स्वतंत्र लेखन
संपर्क:Jabi.Zulaikha@gmail.com)
 
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गुरुवार, 21 मार्च 2013

आँखों में कोई अश्क न मुझमे लहू बचा .....

















अजय पांडेय 'सहाब' की क़लम से 

1.


कुछ चीखती उदास सी शामों को छोड़कर 
वो चल दिया कहीं सभी रिश्तों को तोड़कर 

सब कुछ बिखर गया मेरा उसके फ़िराक में 
वो जो चला गया मुझे रखता था जोड़कर 

मिल भी गया तो देखिये ,चेहरा घुमा लिया 
इक वक़्त था कि वो मुझे मिलता था दौड़कर 

आँखों में कोई अश्क न मुझमे लहू बचा 
रक्खा है तेरे दर्द ने ऐसा  निचोड़ कर 

ले दे के उसका खाब ही मेरा था पर 'सहाब '
दुनिया ने क्यूँ जगा  दिया  मुझको  झिंझोड़  कर 

2.

जिसे लिखता है तू वो ही तेरा किस्सा नहीं होता 
जो अपना है वही अक्सर यहाँ अपना नहीं होता 

कहीं चेहरा तो मिलता है मगर शीशा नहीं होता 
कहीं आइना होता है मगर  चेहरा नहीं होता 

मुहब्बत की न हो बुनियाद  तो रिश्ते  बनाएं क्यूँ 
फ़क़त बरगद उगा लेने ही से साया नहीं होता 

फ़क़त इंसान ही इन्सां  नहीं बनता ज़माने में 
वगरना आज की दुनिया में देखो क्या नहीं होता 

करे तश्हीर वो जितनी  मचाले शोरो गुल जितना 
कोई क़तरा कभी फैलाव में दरिया नहीं होता

कई आंसू यहाँ चुपचाप  बह  जाते हैं  अनदेखे
हरिक आंसू की ख़ातिर  दोस्त  का कन्धा नहीं होता

वो सब कुछ देख कर और सोचकर कुछ फैसला करता 
अगर मज़हब न होता तो बशर  अँधा नहीं होता 

3.

 मुझे मौजू'अ ग़ज़लों का, गमे  दुनिया से मिलता है
ये है वो आब जो मुझको इसी सहरा से मिलता है 

जहाँ का दर्द मिल जाता है मेरे शेर में जैसे 
फ़ना होकर कोई कतरा किसी दरिया से मिलता है 

जहाँ के तजरुबे ही हैं  हमारे इल्म के मकतब 
कहाँ ये इल्म हमको सोह्बते दाना  से मिलता है 

ज़मीं  पर हिन्दू ओ मुस्लिम झिझकते होंगे मिलने से
मगर जन्नत में मेरा राम तो  अल्ला से मिलता है 

वही गद्दार मेरे मुल्क का रहबर न बन जाए 
जो हर इक रोज़ जाकर लश्करे आदा से मिलता है ..

वो तो यादें तुम्हारी हैं जो मिलने आ ही जाती हैं 
वगरना कौन अब मेरे दिले तनहा से मिलता है 

मिरे  नज़दीक क्यूँ हो फर्क भी हिन्दू में मुस्लिम में ?
मिरे  मंदिर का हर रस्ता, रहे काबा से मिलता है 

अगर अशआर  अच्छे हैं तो है तनक़ीद भी उतनी 
कहाँ एजाज़  ऐसे पुर हसद उदबा  से मिलता है

(मौजू'अ=विषय, मकतब=पाठशाला 
सोह्बते दाना=विद्वानों की संगत,.लश्करेआदा=दुश्मनसेना 
एजाज़=सम्मान, पुरहसद=इर्ष्यासे भरे, उदबा=विद्वान समूह)

4.

ज़ात के नाम पे बंटना नहीं देखा जाता 

हमसे नफरत का ये धंदा नहीं देखा जाता 


जिनकी हर सोच ही जुगनू में सिमट आई है 

उनसे सूरज का उजाला नहीं देखा जाता 


जिसको कुत्ते भी न खाएं उसी रोटी के लिए 

भूके बच्चे का बिलकना नहीं देखा जाता 


मेरे मौला मिरी आँखों को तू पत्थर कर दे 

मुझसे ये खून ये दंगा नहीं देखा जाता 


हमने बस प्यास में काटे हैं ज़माने लेकिन 


हमसे इक शख्स भी प्यासा नहीं देखा जाता 


जो बदलना है बदल डाल तू रहबर लेकिन 

हमसे हर वक़्त का नारा नहीं देखा जाता 


दर्द इतना है दिया उसके बिछड़ने ने मुझे 

मुझसे कोई यहाँ बिछड़ा ,नहीं देखा जाता 


कितना धुन्दला है सियासत का ये दरपन यारो 

दिल में गैरत हो तो चेहरा नहीं देखा जाता 


थोड़ी आजादी तो इन्सां को दो मज़हब वालों 

अब ये हर बात पे फतवा नहीं देखा जाता 


तंग  
तशरीह   के खूँरेज़ अंधेरों में 'सहाब '

हमसे मज़हब का सिमटना नहीं देखा जाता





 (परिचय:
जन्म: रायगढ़( छत्तीसगढ़ ) में 23 अप्रेल 1972 को
शिक्षा: रसायन विज्ञानं में स्नातकोत्तर और मास कॉम
सृजन: पहला अल्बम, वन्स मोर . अंतिम अल्बम : रोमानियत
पंकज उदास, शिशिर, चन्दन दास,  सुदीप बनर्जी, गुलाम अब्बास खान और गुरमीत ने गजलों को स्वर दिया है। मरहूम जगजीत सिंह ने भी एक ग़ज़ल को अपनी धुन में पिरोया था लेकिन आकस्मिक निधन से वो अल्बम नहीं आ पाया।
उर्दू व हिंदी के कई पत्र-पत्रिकाओं  में प्रकाशन, उर्दू में मज्मुआ कहकशाँ शीघ्र प्रकाश्य 
कुछ फिल्म के लिए गीत। फिल्म स्केपगोट  का लिखा गाना वाह रे दुन्या, शिकागो फिल्म फेस्ट के नामांकित।
सम्प्रति:मुंबई में स्पेशल एक्साइज़ कमिश्नर
सम्मान: साहित्य के लिए नेशनल स्माइल अवार्ड, उर्दू अदब के लिए 2013 का साहिर लुधियानवी अवार्ड
संपर्क: ajay.spandan@gmail.com )






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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

दलितों के क्रीमी लेयर का उच्छ्वास

छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय दलित सम्मलेन का तुष्टिकरण




 






संजीव खुदशाह की क़लम से 



गत १७ सितंबर को छत्तीसगढ़ कि राजधानी रायपुर में देश भर के दलित जुटे.जातिगत भेदभाव एवं दलितों का प्राकृतिक संसाधनों में उनके अधिकार विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में वे खूब बोले. लेकिन अपनी भदेस भाषा में नहीं. न ही राष्ट्रभाषा या क्षेत्रीय बोली में. उन्होंने अपना बक अंग्रेजी में खूब उगला.इस मौके पर स्थानिय लोग काफी संख्या में उपस्थित थे। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में खड़गपुर आई.आई.टी के प्रोफेसर श्री आनंद तेलतुम्डे उपस्थित थे. शेष वक्ता भी प्रोफेसर ही थे. सभी टाटा इन्टीटूयूट आफ सोशल सांईस एवं उड़ीसा के महाविद्यालय से यहां आये थे। इसे दलित प्रोफेसर वक्ताओं का तथा आम संघर्षशील दलित श्रोताओं का सम्मेलन कहना ज्यादा उचित होगा। लगभग सारे के सारे श्रोता अंग्रेजी में ही अपना उद्बोधन देना पसंद कर रहे थे। शायद हिन्दी या अपनी मातृ भाषा मे बोलना वे अपनी शान के खिलाफ  समझ रहे थे। दिन भर के पूरे कार्यक्रम में आम दलित अपने आपकों इन वक्ताओं से नहीं जोड़ पाया। न ही इस कार्यक्रम में आम दलितों की कोई सहमागिता रही। पूरा का पूरा कार्यक्रम फंगीस आईडीयाज की सीमाओं में बंधा दिखा। जिस विषय पर कार्यक्रम रखा गया उससे भी ज्वलंत समस्या एक आम दलित झेल रहा है लेकिन तथा कथित सवर्ण हो चुके दलित प्रोफेसरों ने इन मुद्दो पर झांकना भी मुनासिब नही समझा। दूर-दूर से आये श्रोता अपने समय और धन की बर्बादी को लेकर दुखी रहे एवं आपस में चर्चा करते रहे। उन्हे सिर्फ एक बात की तसल्ली थी कि वे एक भीड़ के रूप में पहली बार इकट्ठा हुए।
ये बात मुझे इसलिए भी लिखनी पड़ रही है क्योंकि आयोजन समिती दलित मुक्ति मोर्चा के कर्ताधर्ता श्री गोल्डी एम जार्ज मेरे मित्र हैं. और वे छत्तीसगढ़ में दलित कर्याक्रमो के सफल आयोजन के लिए जाने जाते हैं। यहां सभी दलितों को एक मंच पर लाने श्रेय उन्हे जाता है।

वे बातचीत के दौरान कहते हैं कि डी.एम.एम. आपका है, आपका है, लेकिन निर्णय लेते वक्त किसी की राय शुमारी मुनासिब नही समझते। उन्होने पता नही किस मजबूरी के तहत इस समिती में डमी अध्यक्ष सचिव की परंपरा शुरू की।

एक खास बात जिसकी चर्चा में यहां करना जरूरी समझता हूं वह यह कि कार्यक्रम में डा. अम्बेडकर की फोटो के साथ गुरू घासिदास की फोटो भी लगाई गई। डॉं अम्बेडकर के साथ जनेउ-धारी गुरूघासीदास की फोटो लगाना दलित आंदोलन को एक भ्रमित संदेश देता दिखाई पड़ रहा था। आयोजन समिती का झुकाव किसी एक दलित जाति की ओर है यह इंगित करता है। साथ ही अन्य दलित जातियों के लिए यह गुप चुप बहिष्कार किये जाने जैसा संदेश देता है। जो कि दलित आंदोलन की भावनाओं के खिलाफ है। लेदेकर यह प्रोग्राम प्रोफेसरों के लिये भड़ास निकालने का एक बड़ा अड्डा बन गया। पूरे प्रोग्राम में आनंद जी की चर्चा रही वह यह की वे अपने कृत्यों से कम अम्बेडकर जी के भांजी दमाद हाने पर ज्यादा प्रचारित किये जा रहे थे। बातचीत के दौरान वे किसी को तरजीह नही दे रहे थे। दुख हुआ हिन्दी में खाने,बोलने एवं छिछी करने वाले हिंगलीस में बोलने मे बड़प्पन समझ रहे थे। वो भी जब मुद्दा प्राकृतिक संसाधनों के अधिकार पर था। जब आनंदजी से पूछा गया कि वे कितनी किताबे लिख चुके है तो उन्होने कहा गिनता कौन है? ऐसा दंभ नये दलित ब्राम्हण में ही देखा जा सकता है। कुल मिलाकर पूरे कार्यक्रम में लोगों ने आपस में मेल मिलाप कर कार्यक्रम को सार्थक किया।

बेहतर होता यदि आम-भाषा में आम दलितों कि समस्याओं पर बात होती। आज एक दलित सम्मान, रोजी-रोटी, जाति प्रमाणपत्र, जातिगत प्रताड़नाओ से जूझ रहा है। लेकिन इन मुद्दों को दर किनार कर दिया गया। जो मुद्दा था भी वो वक्ताओं की बोझिल भाषाशैली की भेट चढ़ गया।



 (लेखक-परिचय:
जन्म: 12 फरवरी 1973  बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
शिक्षा: बी.काम., डी.बी.एम.एस., एम..समाज शास्त्र, एल.एल.बी
सृजन: लेख, कहानी, एवं कविताएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित               
कृतियां : सफाई कामगार समुदाय और आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग` नामक दो पुस्तकें चर्चित
ब्लॉग: www.sanjeevkhudshah.blogspot.com
संप्रति:राजस्व विभाग में प्रभारी सहायक प्रोग्रामर
संपर्क:
sanjeevkhudshah@gmail.com)


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