बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.

रविवार, 31 अगस्त 2014

कभी सूली नफ़रत की कभी फंदा हिफ़ाज़त का
















धीरेन्द्र सिंह की क़लम से

1. 
उम्र भर बस यही इक उदासी रही
आपके दीद को आँख प्यासी रही

तुम गये बाद जाने के बस दो यही
बेक़रारी रही,  बदहवासी रही

याद करने से क्या कोई आये भला?
एक उम्मीद थी जो ज़रा सी रही

मिस्ले- नामा- ए- बेनाम की ही तरह
मेरे अफ़सानों की इक हवा सी रही

हाले- दिल क्या बयां और कहके करूँ?
हार अपनी हुई और ख़ासी रही


2.

शौक़  तो हम तमाम रखते हैं.
सो सभी इन्तज़ाम रखते हैं.

आपके पास गर सुबह है तो
देखिये हम भी शाम रखते हैं

जाओ तुम क्या हमें ख़रीदोगे
हम बहुत ज्यादा दाम रखते हैं.

पत्थरो इक नयी ख़बर सुन लो
सर पे अब हम भी बाम रखते हैं.

क्या सिखाते हो बारहा हमको
काम से ही तो काम रखते हैं.

3.

काबा खोजे कलीसे ढूंढें हैं
सबमें  तुझको तुझी से ढूंढें हैं

कोई मिलया न कोई भाया है
सबमें  तुझको ही मैंने पाया है

मेनू इंसान दी शकल देके
रूह बनकर के तू समाया है

प्यार गर है ख़ुदा तो नासेहो
अब के मैंने उसी से ढूंढें हैं

काबा खोजे कलीसे ढूंढें हैं
सबमे तुझको तुझी से ढूंढें हैं

चाँद को वो उठाये मिटटी सा
वो बिगाड़े बनाये मिटटी सा

थोडा बाहर से सख्त दिखता है
पर वो नाज़ुक है हाये मिट्टी सा

हम-क़दम, हम-सफ़र है वो मेरा
अक्स उसके उसी से ढूंढें हैं

काबा खोजे कलीसे ढूंढें हैं
सबमे तुझको तुझी से ढूंढें हैं

4.

कभी सूली थी नफ़रत की कभी फंदा हिफ़ाज़त का
तरीक़ा ख़ूब तेरा था इबादत का मुहब्बत का

अबाबीलें थी मेरी दोस्त लेकर उड़ चलीं मुझको
तभी से ना ज़मीं देखी न देखा डर क़यामत का

कि करके वादा भी उसने मेरी लाज न रक्खी
वो है दुनिया से बे- ग़ाफ़िल, वो आशिक़ है शरारत का

तबीयत क्यूँ नहीं बनती कि जबसे वो हुई ओझल
सिला क्या बस यही हासिल है सजदे का इबादत का?

मुझे क़ानून का है डर, मगर दिल में ख़ुदा का घर
बहुत हूँ मुन्तज़िर कब से बस उसकी ही इजाज़त का

मिरे ख़्वाबों में भी मुझको यही इक खौफ़ रहता है
कि अगला खेल क्या होगा दिखावे की रिफ़ाक़त का

क़ुरआन-ए-पाक को छूकर, क़सम खाकर रमायन ( ण ) की
मैं करने आ रहा हूँ सामना फिर से क़यामत का

5.

चाहे तो मुझको दर- बदर कर दे
पर ख़ुदा इस मकां को घर कर दे

और गर हो, तो जान भी ले ले
मौत से पहले पर ख़बर कर दे

जान फूंको तो बुत बने इंसां
टूटी डाली को तू शजर कर दे

कुछ अता मुझको हिम्मतें कर दे
कुछ तो आसां मिरा सफ़र कर दे

6.

मेरी बात की बात कुछ भी नहीं है.
कहूँ क्या सवालात कुछ भी नहीं है.

तुम्हारी नज़र में ये दुनिया है सब कुछ,
हमारे ये हालात कुछ भी नहीं है?

कहें भी तो क्या क्या कि क्या हार आये,
मिली है जो ये मात कुछ भी नहीं है.

ग़म-ए-हिज्र इक ज़िन्दगी भर जिया है,
जुदाई की ये रात कुछ भी नहीं है.

7.

मिरे ख़त ध्यान से पढ़ना दुआएं साथ भेजी हैं
उन्ही आँखों से बरसेंगी घटाएं साथ भेजी हैं

अगर आँखें समझ न पायें तो तुम दिल से पढ़ लेना
मिरा ख़त बोल उट्ठेगा सदायें साथ भेजी हैं

तिरी आवाज़ के साये ज़बां से बाँध कर मैंने
वो सारी बातें जो तुमको सताएं साथ भेजी हैं

वही संजीदा सी ग़ज़लें तुम्हे जो ख़ास लगती हैं
वही जो इश्क़ से वाकिफ़ कराएं साथ भेजी हैं

तुम्हारी सांस से उलझी हैं जो खुशबू बहारों की
जो दुनिया भर को महका दें, हवाएं साथ भेजी हैं.

8.

कब तक कहूँ ये फितरत अच्छी नहीं किसी से
बे-इन्तहा मुहब्बत अच्छी नहीं किसी से

बेहद बुरी है हालत शब् भर मैं जागता हूँ
कैसे कहूँ तबीयत अच्छी नहीं किसी से

उसने कहा था मुझसे मेरी दुआ है रख लो
यूँ बाटना ये दौलत अच्छी नहीं किसी से

पूरा ही तोड़ देगा ये हश्र आदमी को
सच पूंछ लो तो कुदरत अच्छी नहीं किसी से

(रचनाकार-परिचय:
जन्म:  १० जुलाई १९८७ को क़स्बा चंदला, जिला छतरपुर (मध्य प्रदेश) में
शिक्षा: इंजीयरिंग की पढाई  अधूरी
सृजन: 'स्पंदन', कविता_संग्रह '  और अमेरिका के एक प्रकाशन  'पब्लिश अमेरिका' से  प्रकाशित उपन्यास 'वुंडेड मुंबई' जो काफी चर्चित हुआ।
शीघ्र प्रकाश्य: कविता-संग्रह  'रूहानी' और अंग्रेजी में उपन्यास   'नीडलेस नाइट्स'
संप्रति : प्रबंध निदेशक, इन्वेलप  ग्रुप
संपर्क: renaissance.akkii@gmail.com, यहाँ- वहाँ भी )

धीरेन्द्र सिंह की कुछ और ग़ज़लें हमज़बान पर ही


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शनिवार, 30 अगस्त 2014

रूट्स की खोज में झारखंड पहुंचा युवा फिल्मकार रंजीत उरांव

 कुडुख में बनाई पहली फीचर फिल्म पेनाल्टी कार्नर



















जब आप अपने परिवार और पुरखों के बारे में बात करते हैं, तो असल में आप पृथ्वी के सारे इंसानों के बारे में बात कर रहे होते हैं। ऐसा विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ‘रूट्स’ के आदिवासी लेखक एलेक्स हेली ने कहा है। यही बात युवा फिल्मकार रंजीत कुमार उरांव के मन में रही और वह रूट्स की तलाश में चेन्नई की अच्छी-खासी इंजीनियरिंग की जॉब छोड़कर झारखंड पहुंच गए। अश्विनी कुमार पंकज की कहानी पर उन्होंने कुडुख में पहली फीचर फिल्म पेनाल्टी कार्नर बनाई। यह अभी प्रमाण-पत्र के लिए सेंसर बोर्ड में है।

पलामू में जन्म, पढ़ाई चेन्नई से

रंजीत का जन्म पलामू के जुरू गांव में हुआ। यहां से शुरुआती पढ़ाई के बाद वह चेन्नई चले गए। पिता वहां नौकरी में थे। वहां अन्ना इंजीनियरिंग यूनिवर्सीटी से 2005 में बीटेक किया। इसके बाद चेन्नई और कोयंबटूर में मल्टीनेश्नल कंपनी में तीन साल तक अच्छे पैकेज पर नौकरी की। लेकिन बच्पन से ही सृजनशील रहे रंजीत का मन इसमें नहीं लगा। नौकरी छोड़कर पुणे के फिल्म प्रशिक्षण संस्थान (एफटीआई) में दाखिला ले लिया। यहां से निर्देशन व लेखन का कोर्स किया।

जनजातीय फिल्म बनाने वाले पहले झारखंडी

एफटीआई में यूं अब तक झारखंड से करीब 20-25 युवाओं ने कोर्स किया है। इसमें कई आदिवासी समुदाय से भी हैं। लेकिन रंजीत इनमें से अकेले युवा हैं, जिन्होंने पांच मिनट की डॉक्यूमेंट्री से फीचर फिल्म तक अपनी मातृभाषा कुड़ुख का चयन किया। इस तरह निसंदेह वह जनजातीय फिल्म बनाने वाले पहले झारखंडी हुए। पेनाल्टी कार्नर की कहानी में कर्मा कथा के साथ एक आदिवासी खिलाड़ी बच्ची का संघर्ष समानांतर चलता है। विलुप्त हो रही उरांव संस्कृति व भाषा उनके झारखंड वापसी का कारण बनी।

भास्कर झारखंड के 15 अगस्त 2014 अंक में प्रकाशित 
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बुधवार, 27 अगस्त 2014

ऋषभ @ कविताएं संगीत के दूसरे सात स्वर की तरह














अजित कुमार सिन्हा की कविताएं

याद
हवा के झोंके  की तरह
तुम आये मेरे जीवन में
कर दिया खुशबू से सराबोर मुझे
उड़ा दिया हिचकिचाहट के परदे को
हवा के झोंके की तरह
बस गयी तुम्हारी महक साँसों में
स्पर्श से तुम्हारे थरथराता रहा जिस्म
छेड़ते रहे तुम मेरी जुल्फों के तार
हवा के झोंके की तरह
सर्वस्व दिया मैंने तुमको, पर हुआ क्या?
मुझे नहीं पता, आये थे जितनी तेजी से
उतनी ही तेजी से लौट गए, बिलकुल
हवा के झोंके की तरह
पर अफ़सोस नहीं जरा भी, खुश हूँ मैं
क्योंकि, मेरी रूह में बसे हो तुम
हर सुगंध में तुम्हारी याद चली आती है
हवा के झोंके की तरह

अवसाद
घुप्प अँधेरा घिरता हुआ
रौशनी को लीलता हुआ
सुदूर क्षितिज तक आसमां के पार तक
बिंदु रौशनी भी दृष्टिगोचर नहीं
लोभ नहीं छूटता कहने का,
मिलेगा चाँद कहीं पे सहमा हुआ.
अवसादग्रस्त हैं फिजायें
हवा में भी सूनापन है
ठहरा हुआ है सब कुछ
आ रहा है बस अँधेरा घिरता हुआ
अब आशा की किरणें भी मद्धिम होती सीं
अनिश्चित भविष्य के गर्भ में विलीन होती सीं
इनपर घना कोहरा सा छाता हुआ
डूबता हुआ सा मन इस अँधेरे में
प्रतीत होता है इन क्षणों में
बस अँधेरे से अँधेरा मिलता हुआ

इंतजार
ये बिखरे हुए कागज़ ,
अलसाए से परदे, खिड़कियाँ
कर्कश प्रतीत होता बुलबुल का कलरव
भुतहा लगता अंधियारे में पार्क, बोझिल हवा
और ये सहमा हुआ चाँद
हाथ की किताब का मुड़ा हुआ पन्ना, बुझती मोमबत्ती
पॉकेट में सूखी गुलाब की पंखुडिया
तुच्छ लगती भावनाएं
मन को भाता अकेलापन
याद दिलाता है मुझको
अभी भी मैं वहीँ हूँ
जहाँ छोड़कर चले गए थे तुम

मन की बात
निस्तब्ध चंद्रमा को देखती एकटक झील में
ज्यों कोई कंकड़ गिरा हो
असंख्य उर्मियाँ खेलती ह्रदय के आँगन में
मथती हुई झील के ह्रदय पटल को
विलोड़ित करती नीरव शांति को
हो रहा लगातार ऊर्जा प्रवाह
रात्री के अन्धकार में
एक हलचल आती है एक हलचल जाती है
शांत हो जाता है सब , कुछ समय उपरांत
सीमाओं में बाँध लिया है खुद को
झील के बाहर नहीं होता ऊर्जा प्रवाह
कितने ही कंकड़ गिरे , कितनी ही तरंगे आईं और गयी
तोड़ न सकी कोई सीमाओं के बंधन को
कलुषित हृदयों के उद्धार के लिए पर्याप्त थी एक ही हलचल
सीमायें हम खुद बांधते हैं सो
कोई तरंग उठती है कुछ समय के लिए
पर उद्वेलित नहीं क़र पाती , जड़ बना रहता है सब कुछ
संचार नहीं होता ऊर्जा का
हम होने देते हैं कह के होनी और रह जाते हैं
निस्तब्ध , चंद्रमा को देखती , एकटक , झील की तरह .

(रचनाकार -परिचय:
जन्म: २१ मई १९८७ को गाजीपुर, उत्तर प्रदेश में
शिक्षा: प्रारंभिक- तराँव, गाजीपुर स्कूल- बक्सर कालेज- नोएडा से मेकेनिकल इंजीनियर
सृजन: फेसबुक पर सक्रिय। कोई प्रकाशित रचना नहीं।
संप्रति: मुंबई में सरकारी नौकरी
संपर्क: axn.micromouse@gmail.com 
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मंगलवार, 26 अगस्त 2014

पटना में कामकाजी स्त्री


तकिया और बस के सिवा कौन है उसका साथी 

प्रीति सिंह की क़लम से
सुबह का धुंधलका. रात की कालिमा को परे धकेलते हुए सूरज की हल्की-हल्की रोशनी बिखरने को तैयार थी. चिड़ियों का झुंड शोर मचाते हुए दाने की तलाश में निकल पड़ा हो. ओस की बूंदें यूं लग रही थीं मानो अपने प्रीतम से बिछड़ने का दर्द किसी नवयौवना की आंखों से छलक आये हों.. सब कुछ ठहरा-ठहरा.. अलसाया हुआ था...
लेकिन इन सबसे अलग एक तबका भोर की इस हल्की सी रोशनी में भी भाग रहा था. आपाधापी कर रहा था .. बड़ी उत्सुकता से जब मैंने इन्हें जानने की कोशिश की.. तो हैरान रह गई.. दरअसल.. ये परछाईयां जो भाग रही थीं.. ये वो महिलायें थीं.. जो कामकाजी हैं.. ऑटो और बसों में एक-दूसरे को धकियाते हुए आगे निकलने की इनकी होड़ इसलिए थी ताकि ये सही समय पर अपने ऑफिस पहुंच सकें. किसी को अपने शहर के किसी सड़क तक जाने की हड़बड़ी थी, तो कुछ महिलाओं को दूसरे शहरों की ओर रुख करना था. इसके लिए पहले उन्हें पहले ऑटो फिर ट्रेन पकड़नी थी.
लेकिन समस्यायें यहीं पर खत्म नहीं हुई थीं. ये तो बस एक शुरुआत थी. उसकी जो इन्होंने कामकाजी होने के एवज में चुकाई थी. कई घंटों का ट्रेन का सफर करने के बाद तय समय पर अपने ऑफिस पहुंचना इनकी पहली चुनौती थी. उससे भी बड़ी चुनौती थी अपने घर के सारे काम-काज को पूरा कर ऑफिस के लिए तैयार होकर सही समय पर निकलना. सुबह 4 बजे उठने के बाद भी उनकी ये तपस्या तब तक पूरी नहीं होती.. जब तक थक-हार कर घर लौटने के बाद वो फिर से अपने सारे काम-काज को निबटा न लें. काम-काज से यहां तात्पर्य उन कामों से हैजिसका न तो कोई तय रुटीन है.. और न ही कोई ड्यूटी आवर.. इसके लिए इन कामकाजी महिलाओं को कोई वेतन भी नहीं मिलता.. लेकिन.. फिर भी जन्म से लेकर मरते दम तक उसे ये घरेलू काम अनवरत करने पड़ते हैं.
कमोबेश ये हालत हर शहर, हर क़स्बे की है. लेकिन पटना जैसे शहर में तो हालात और भी बुरे हैंबुरे इसलिए क्योंकि यहां कुछ दिनों में लोगों के खान-पान और पहनावे में बदलाव तो आया है. लेकिन महिलाओं को लेकर पुरुषवादी मानसिकता में आज भी यहां बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है. सामाजिक रुढ़ियां लोगों को जकड़े हुई हैं.  कामकाजी महिलाओं के लिए हालात बहुत ज्यादा मुफीद नहीं हैं. आने-जाने के साधनों की कमी की वजह से महिलाओं को हर दिन परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है. पटना जैसे छोटे शहर में महिलाओं के लिए स्पेशल ट्रेन तो नहीं ही है. जो महिला बोगी है, उस पर भी पुरुषों का ही कब्जा अधिक नजर आता है. बंदी और हड़ताल में तो इन महिलाओं की हालत और भी ज्यादा खराब हो जाती हैऐसे में कभी ट्रेन छूट जायेतो फिर भगवान ही मालिक है.
मुझे याद आता है. रात 8 बजे ऑफिस से घर लौटने के दौरान मैंने पटना जंक्शन से घर जाने के लिए बस पकड़ी. बस में मेरी बगल वाली सीट पर एक महिला (जिनकी उम्र लगभग मेरे ही बराबर थी) बैठीं. रास्ते में बातचीत के दौरान पता चला कि वो हर दिन पटना बाइपास से मोकामा जाने के लिए सुबह 6 बजे घर से निकलती हैं. इसके पहले उन्हें सुबह जल्दी उठकर घर का सारा काम-काज निपटाना पड़ता है. घर पर अपनी छोटी सी बेटी को सास-ससुर पर छोड़कर वो हर दिन अपने काम पर जाती हैं. इस दौरान उन्हें बस स्टॉप तक जाने के लिए डेढ़ घंटे पैदल जाना पड़ता है. कई बार उनकी बेटी बीमार होती है. लेकिन उन्हें काम पर जाना ही पड़ता है. फिर भी आये दिन वो देर से ऑफिस पहुंचती हैं. वहां बॉस की झिड़कियां उन्हें सुननी पड़ती हैं. उन्होंने बताया कि कैसे घर लौटने के दौरान आये दिन ट्रेन में लोग बदतमीजी करते हैं. डांटने पर उल्टे वही लोग इन्हें ‘मनबढ़ू महिला’ की संज्ञा देते हैं. कहते हैं हमारे घर में ऐसी महिलायें हों तो हम उन्हें जिंदा न रहने दें. इन सबसे लड़ते-निपटते जब वो घर पहुंचती हैं, तो फिर से रात के खाने का वक्त हो जाता है. कई बार तो बिना कपड़े बदले ही उन्हें भयंकर गर्मी में सीधे रसोई में घुस जाना पड़ता है. देर रात गए जब वो बिस्तर पर जाती हैं तो पति से बिना बात किए सो जाती हैं. जिस पर उनके पति की नाराजगी और बढ़ जाती है.. उसी कामकाजी महिला के शब्दों में..”नौकरी करना जी का जंजाल बन गया है. न करो तो घर में पैसों की तंगी और करो तो जिंदगी हराम.“ उन्होंने बस से उतरते-उतरते मुझे सलाह दी, काम तभी तक करना जब तक शादी न हो जाये. शादी के बाद तो नौकरी और जिंदगी में तालमेल बिठाते-बिठाते ही उम्र खत्म हो जाती है और हम जिंदा हैं या नहीं ये एहसास भी मर जाता है.
लगभग हर कामकाजी महिला की यही कहानी है... काम पर से देर रात गए घर लौटते वक्त हाड़-हाड़ थक कर चूर हो जाता है. सोचने-समझने की शक्ति जवाब दे जाती है. लेकिन  घर के ढ़ेरों काम इनके इंतजार में रुके होते हैं. सब निबटा कर बिस्तर पर गिरने के बाद कोई होश नहीं रहताऐसे में पति की इनसे अलग शिकायतें होती हैं और बच्चों की अपनी. सासू मां और ससुर जी को इनका नौकरी करना रास नहीं आता, तो पति को घर पर खाली बैठे रहना.
लेकिन कोई नहीं सोचता कि महिला क्या चाहती हैकैसा लगता है उसे जब घर पर अपने छोटे बच्चे को छोड़ कर उसे नौकरी पर जाना होता है. मन बच्चे में अटका होता है. काम सही समय पर पूरा नहीं होने पर बॉस से झिड़कियां खानी पड़ती हैं. कैसा लगता है उसे तब.. जब ट्रेन की भीड़भाड़ में कई लोग हर रोज जाने-अंजाने उसे टटोलना चाहते हैं. कैसा लगता है जब बुखार के बाद भी उसे अहम फाइलों को निबटाने के लिए ऑफिस जाना पड़ता है.
सबसे अहम लेकिन सबसे खास कि कैसा लगता है उसे जब महीने के आखिर में उसकी मेहनत से कमाये गए रुपये बिना उसकी मर्जी जाने पति उससे ले लेते हैं. कहते हैं कि लाओ इसे मुझे दो नहीं तो तुम इसे बेकार की चीजों पर खर्च कर दोगी. तब पता चलता है एक कामकाजी महिला होने के सारे संघर्ष किस कदर बेमानी और बेमकसद हो जाते हैं. सारी रात तकिये को गीला करने के बाद अगली सुबह कामकाजी महिलायें फिर तेज-तेज कदमों से भागे चलती है उस बस को पकड़ने.. जो संघर्षों और संकटों में अकेला उसका साथी है. दूर खड़ी होकर मैं महिलाओं की इन भागती-दौड़ती परछाईयों को देखती हूं.

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 20 मई 1980 को पटना बिहार में
शिक्षा: पटना के मगध महिला कॉलेज से मनोविज्ञान में स्नातक, नालंदा खुला विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में हिन्दी से स्नाकोत्तर
सृजन: कुछ कवितायें और कहानियां दैनिक अखबारों में छपीं। समसायिक विषयों पर लेख भी
संप्रति: हिंदुस्तान, सन्मार्ग और प्रभात खबर जैसे अखबार से भी जुड़ी, आर्यन न्यूज चैनल में बतौर बुलेटिन प्रोड्यूसर कार्य के बाद फिलहाल वास्तु विहार मीडिया वेंचर प्राइवेट लिमिटेड में कंटेंट डेवलपर और  आकाशवाणी में नैमित्तिक उद्घोषक
संपर्क: pritisingh592@gmail.com)
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शनिवार, 16 अगस्त 2014

संजय शेफर्ड की कविताएं













टूटने का मर्म   

यक़ीनन जब भी कुछ टूटता है
हमारे अंदर
सबसे पहले यक़ीन टूटता है
खुद का का, खुद से
विश्वास करना मुश्किल हो जाता है
स्वयं पर, स्वयं से

महज़ एक बार टूटने के बाद से ही
हमारा अनुभव स्वयं कर लेता है
अच्छे- बुर, अपने-पराये की पहचान
अनायास ही !
अनायास ही होता है ?
बाक़ी  बाद का सबकुछ
आख़िर उसने विश्वास ही तो तोड़ा था ?

बाक़ी का, ना जाने कैसे
किस आंधी के डर से बिखर गया ?
बिना किसी तूफ़ान के
ज़ार-ज़ार  हो गया सपनों का वह घर
जिसे हमने कभी रेत
कभी ग्लास से बनाया था
विश्वास आख़िर एक शीशे का मकान ही तो है ?

कभी-कभी खुद को भी समझाना पड़ता है
अपने ही टूटे हुए दिल को
टुकड़ों- टुकड़ों में टूट जाने के बाद भी
नहीं टूटने का यक़ीन दिलाना पड़ता है
और इसी जद्दोजहद में
विश्वास फिर से अपनी उम्र क़ायम करता है।


तुम उदास हो !

जैसे कोई लम्हा टूट गया हो
अंदर ही अंदर
जैसे किसी ने तुम्हारे सकून भरे पलों पर
दर्द की बुझी हुई
एक ऐसी ढ़िबरी रख दिया हो
जो सिर्फ
दर्द, तड़प, सिहरन और तरल आंसुओं से जलती है

उस बुझे हुए दिए को
जलाने की मनाही नहीं है
पर क़तरे-क़तरे   रौशनी के लिए
खुद को मारना ; खुद को तड़पाना और
खुद को जलाना होगा

अंधेरा जितना तुम्हारी उम्र के इस पार है
उतना ही उम्र के उस पार है
और तुम बीचोबीच खड़ी हो
अपने दुपट्टे के एक छोर से अतीत
दूसरे छोर से भविष्य को थामें
एक ऐसे वर्तमान में जिसका होना नगण्य है

जिसके होने और नहीं होने का अर्थ
सृष्टि के जीवों के लिए संदेहास्पद रहा है
जिसका होना और नहीं होना
अक्सर हम मनुष्यों को
आश्चर्यचकित और विस्मित करता रहा है

आश्चर्यचकित नहीं ; आज मैं विस्मित हूं
और यह जानते हुए भी कि विस्मय में पूछे गए सवाल
इंसान की भावनाओं को रक्तरंजित
देह को लहुलुहान कर देते हैं
फिर भी मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं

अगर मैं तुम पर पत्थर फेंकू तो
कहां गिरेगा ?
अतीत में ? भविष्य में ?
या फिर उस वर्तमान में जो होता ही नहीं !
जिसका होना महज़  आभासी है
जो अतीत की खिड़की से
अक्सर भविष्य में झांका करता हैं
खुद को वर्तमान कहकर
कभी दर्द ; कभी आंसू ; कभी तड़प बनकर

आखिर तुम उस खिड़की को आज बंद क्यों नहीं कर देती ?


स्वछंद प्रेम  

मुलाक़ात  के पहले ही दिन
एक पुरूष ने
मुट्ठी भर रेत स्त्री की हथेलिओं पर रखा
और कहा, लो ! यह 'प्रेम' है
इसे तुम हमेशा संभाल कर रखना

पल भर के लिए उसे खो देने का डर
स्त्री के हृदय - आत्मा - देह में उतर आया
दिल धड़का, अंगुलियां कांपी,
सांसे रुकने लगी
शायद यह पल उसका था
यह डर भी उसी का दिया हुआ

दूसरे पल उस लम्हे से  आज़ाद होते ही
वह स्त्री ज़ोर-ज़ोर से हंसी
और अपनी हथेलियों की रेत को
आसमान में बिखरा दिया
वह पल दो पल स्तब्ध देखता रहा
और फिर चलता बना

आख़िर  'प्रेम' जैसी चीज को
बंद मुठ्ठियों में
कब तक रखा जा सकता है ?
उस स्त्री का 'प्रेम' कल भी उन्मुक्त था
और आज भी स्वच्छंद और आज़ाद है।


नंगा खेल

रात ख़त्म हो जाती है
एक दूसरे को नंगा करने का खेल
कभी ख़त्म नहीं होता
वह सिर्फ कपड़े नहीं उतारता है
शरीर में घुसकर देह से
एक-एक चमड़ी को अलग कर देता है

सिर्फ वक्षों को नहीं मसलता
पीठ -पेट ; कुल्हे-कोहनियों तक को
रक्तरंजीत और लहुलुहान कर देता है
बहुत ही विभत्स होता है
एक रात के लिए सौदे की शर्त पर
किया जाने वाला अंधेरी रातों का 'अवैध प्रेम'

यूं तो कुछ तितलियां
कोठे की चौखट पर कदम रखने से पहले
अपनी आत्मा और प्रेम को त्याग
अपने गर्भ द्वार को बंदकर
सिर्फ देह के साथ
अपने-अपने घरों से प्रस्थान करती हैं

फिर भी कुछ आत्माएं
देह से चिपकी रह जाती हैं
दौड़ती रहती हैं ; धमनियों, रक्त शिराओं में
रक्त कणिकाओं की तरह
गिरती रहती हैं ; नंगी धरती पर
कटे जिस्म से टपकते लहू की बूंद बन
देह के युद्बभूमि में देह से पराजित हो
हर रात की लड़ाई हारकर

उदास कराहों के बीच न जाने
कितनी सिसकियां खो जाती हैं
भूख, उन तितलिओं के परों को
सिर्फ बेरंग और बदनाम नहीं बनाती
उड़ने की हर कोशिश को बाधित करके
रक्तरंजीत और लहुलुहान भी करती है

देह में कामुकता को तलाशने वाले
हम कलाकार देह को तो उलट-पलट
पेंटिंग या फिर किताब की तरह पढ़ते है
नहीं पढ़ पाते हैं तो देह की
उन उदासिओं को जो पुलिस थाने में
पेट की भूख तो लिखा देती हैं ;
कभी देह का 'बयान' नहीं लिखा पाती।

(रचनाकार-परिचय: 
मूल नाम: संजय कुमार पाल।
जन्म: 10 अक्टूबर 1987 को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जनपद में।
शिक्षा: भारतीय मीडिया संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता व जन संचार में स्नातक, जबकि जेवियर इंस्टिट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन मुंबई से इसी में स्नातकोत्तर किया
कार्यक्षेत्र: एशिया के विभिन्न देशों में शोधकार्य, व्यवसायिकतौर पर मीडिया एंड टेलीविजन लेखन, साहित्य, सिनेमा, रंगमंच एवं सामाजिक कार्य में विशेष रुचि।
नुक्कड़ नाटकों का निर्देशन।  25 से अधिक नाटकों का लेखन।
सृजन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन एवं आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन व प्रसारण।
संप्रति: बीबीसी एशियन नेटवर्क में शोधकर्ता एवं किताबनामा प्रकाशन, हिन्दीनामा प्रकाशन के प्रबंध निदेशक के तौर पर संचालन।
संपर्क: sanjayshepherd@outlook.com)
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बुधवार, 13 अगस्त 2014

चरवाहा से कवि तक की यात्रा












संजय शेफर्ड का आत्मकथ्य

लेखन और पाठन का सफ़र जीवन में काफी देर से जुड़ा, लेकिन घुम्मकड़ी की प्रवृति मुझमें जन्म के साथ ही मौजूद थी। उस समय जब लोगों का वक़्त लोगों की अंगुली पकड़कर उम्र के साथ- साथ चलता है। मेरे वक़्त ने मेरी उम्र के साथ किसी भी रूप में चलने से इंकार कर दिया था। पढ़ाई- लिखाई की अवधारणा को भाग्य की नियति मानकर कई वर्षों तक मैं अपने पुश्तैनी पेशे भेड़ पालन की वजह कर इधर-उधर भटकता रहा. यहीं पर मेरा साक्षात्कार जंगल, पहाड़, नदी, नाले और प्रकृति से हुआ. जाने-अनजाने में ही सही मेरा मन भावनाओं, संवेदनाओ और अहसासों सागर के रूप में मुझमें लहराने लगा।
वह रातें मुझे आज भी याद हैं, जिन्हें खुली पलकों के आगोश में लेकर मैंने कभी किसी नदी-नाले के किनारे या फिर वियाबान जंगलों की बांहों में बिताई थी। उन दिनों शेफर्ड हट जैसी कोई चीज अस्तित्व में नहीं आई थी। उस समय भेड़ पालन करने अथवा चराने वालों का कोई निश्चित ठौर ठिकाना नहीं होता था।  जहां सांझ ढली वहीं भेड़ों के लिए ठहराव ढूंढा और पाल डालकर खुले आसमान के नीचे सो गए। उस दौरान सर्दी, गर्मी, बरसात को मैंने बहुत क़रीब से देखा, छुआ और खुद में महसूस किया। उस समय मेरे पास एक विस्तृत धरती, खुला आसमान और दूर- दूर तक लहराता अथाह सागर था।

कुछेक ही दिनों में यह यायावरी भरी जिन्दगी मुझे रास आने लगी थी। यहां हमारी आवश्यकताएं बहुत ही सीमित थी। हम पूरी तरह से प्राकृतिक चीजों पर आश्रित थे, पेड़ से तोड़कर फल खा लिया, प्यास लगने पर किसी नदी का पानी पी लिया, भूख सताने लगी तो उपले इकट्ठा करके आग जलाई और लिट्टी आदि बनाया और पेट भर लिया। सही मायने में दुख, दर्द और विषाद क्या होता है बहुत दिनों तक जाना ही नहीं लेकिन एक दिन मेमने की में-में आवाज़ से रात का सन्नाटा टूटा तो ऐसा लगा कि सिर पर पहाड़ गिर गया।
उस समय भी जंगली जानवर रात के सन्नाटे में निचाट जगहों पर आकर शिकार तलाशते रहते थे। सुबह पास के खेत में उस मेमने की हड्डियों, बाल और खाल को लहू में लिपटा देखकर मन सिहर उठा और यहीं से जीवन में दुख, दर्द, विषाद और संवेदना का फूटा और वक़्त के साथ अपना आकर लेता रहा। इस तरह जन्म के साथ के सात शुरुआती  सालों ने मेरे हृदय- आत्मा कई अनकही कविताओं, कहानियों, उपन्यासों को जन्म दिया( जिसका लिखा जाना इस 27 साल की उम्र में पहुँचने के बावजूद भी बाक़ी है।

सही मायने में जब मैं कविता लिखता हूं तो कविता नहीं महज अपने मन के भाव लिखता हूं. कभी-कभी यही भाव विचार बन जाते हैं, स्थायित्व की प्रक्रिया पार कर अपना प्रतिबिंब बनाते हैं, और कविता बन जाती है । मेरी कविता, कुछ कल्पना, कुछ यथार्थ, कुछ वक़्त को समेटने की कोशिश, कुछ प्रतिध्वनि, कुछ परछाई, कुछ प्रतिबिंब के आलावा कुछ भी तो नहीं है। 

हमज़बान की अगली पोस्ट में पढ़ें  संजय शेफर्ड की कविताएं

(रचनाकार-परिचय: 
मूल नाम: संजय कुमार पाल।
जन्म: 10 अक्टूबर 1987 को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जनपद में।
शिक्षा: भारतीय मीडिया संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता व जन संचार में स्नातक, जबकि जेवियर इंस्टिट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन मुंबई से इसी में स्नातकोत्तर किया
कार्यक्षेत्र: एशिया के विभिन्न देशों में शोधकार्य, व्यवसायिकतौर पर मीडिया एंड टेलीविजन लेखन, साहित्य, सिनेमा, रंगमंच एवं सामाजिक कार्य में विशेष रुचि।
नुक्कड़ नाटकों का निर्देशन।  25 से अधिक नाटकों का लेखन।
सृजन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, टेलीविजन एवं आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन व प्रसारण।
संप्रति: बीबीसी एशियन नेटवर्क में शोधकर्ता एवं किताबनामा प्रकाशन, हिन्दीनामा प्रकाशन के प्रबंध निदेशक के तौर पर संचालन।
संपर्क: sanjayshepherd@outlook.com)
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सोमवार, 11 अगस्त 2014

दावेदारी फिर अनुरोध












रजनी त्यागी की कविताएं

तुम्हारी सदाशयता पर शक नहीं

तुमने कहा, सुरक्षा
लड़की ने सुना, क़ैद
क्या सचमुच तुमने सुरक्षा कहा
या सचमुच तुमने क़ैद कहा था
नहीं ! तुम्हारी सदाशयता पर शक ठीक नहीं
क्योंकि तुमने लड़की को धन भी कहा था
और वो भी पराया

फिर लड़की ने क्यों सुना क़ैद ?
शब्द उसके कानों तक पहुँच कर बदल कैसे गए?
या फिर वो ही बदल गई है?
लड़की बड़ी मुश्किल में है
जब से एक दिन उसने झाँक लिया
अनगिनत परिंदे उड़ते हैं उसके भीतर
पंख फड़फड़ाते और भी बड़ा आकाश चाहते हैं
लड़की इधर-उधर दौड़ती
हांफ-हांफ जाती है
इन्हें पकड़ने के लिए
बस में नहीं आते कम्बख़्त !
लड़की को चैन से बैठने नहीं देते
धन नहीं होने देते
एकदम ज़िंदा रखते हैं
पंखों की फड़फड़ाहट और इनकी चायं-चायं ने ही
ख़राब कर दिए हैं लड़की के कान
तुम्हारी सदाशयता पर शक ठीक नहीं!
तुम तो कहते हो 'सुरक्षा'
और लड़की सुनती है 'क़ैद '

8 मार्च : दावेदारी फिर अनुरोध

वैसे दिन तो सभी मेरे भी थे
पर दावेदारी के लिए एक दिन तो मिला
वैसे दावेदारी करना मेरे जीने का ढंग था ही नहीं कभी
मेरे जीने का ढंग तो प्रेम और मित्रता था
प्रेम का अनुवाद तुमने दासता किया
और दासों से कैसी मित्रता
चढ़ते गए तुम प्रभुता के पायदानों पर
मै क्योंकर रोकती
और पहुँच भी गए तुम सबसे ऊपर

सुनो, आज के दिन मैं तुमसे कहती हूँ
बहुत सन्नाटा है प्रभुता के शिखर पर
वहां का अकेलापन लील देगा तुम्हें
सुनो, वापस लौट चलो
ये कोई दावेदारी नहीं किसी दिन पर
मित्रता का अनुरोध है प्रेम भरा
क्योंकि मेरे जीने का ढंग प्रेम और मित्रता है

ऊर्जा की संभावना

तुम्हारे भौतिक जीवन में यदि मेरी कोई भूमिका होगी
तो मैं ज़रूर मिलूंगी तुम से ..एक दिन
क्योंकि प्रकृति का नियम है
जो विज्ञानियों ने खोज निकला है
पदार्थ के बनने को अणु करते हैं
इलेक्ट्रान का लेन-देन और जुड़ जाते हैं
तब तलक हमारी संवेदनाओं की ऊर्जाएं
मिलती रहेंगी स्वाभाविक बहाव में
क्योंकि ऊर्जा पदार्थ की मोहताज  नहीं होती.

आभार

रोज़ चली आती हो
बिना नाग़ा
नियम की बहुत पक्की
बहुत कर्मठ हो तुम
रास्ते हज़ार रोके कोई
हों कितने भी दरवाज़े बंद
अपनी मंज़िल पहुँच
जम ही जाती हो तुम
कई बार सोचा, नहीं दूँ ध्यान तुम पर,
पर तुम ज़िद्दी जमी हुई अपनी जगह
मुंह चिढ़ाती और भी जम जाती हो
दिलाती हो मुझे मेरा निक्क्मापन याद
धूल तुम्हें धन्यवाद् !!

जानती हूँ..तुम हो मेरे आस-पास

सुनहरे तिलिस्म का सागर है
दूर तक लहराता हुआ
असंख्य लहरें
व्यस्त हैं अपने रोज़मर्रा के कामों में
तूफ़ान और शान्ति दोनों को
एक साथ समेटे
इस किनारे बैठ जब छूती हूँ इन्हें
खरगोश सा स्नेह मेरी हथेलियों पर
आ फुदकता है
जानती हूँ किसी किनारे पर
तुम बैठे हो

रूह पर स्वामित्व कैसे हो

वो जो रौशन थी परिधि
वो नूर रूह का ही था
तुम घूमते रहे, उलझते रहे
परिधि से बारहा
वर्ना मुझ तक पहुँचने का रास्ता
कितना सीधा सा था
उस रास्ते में तुमको
अपने खो जाने का था शुबहा
सो परिधि पर ही चिन लिया
तुमने क़िला अधिपत्य का
मैं दे भी देती रूह को राजस्व में तुमको
मगर रूह के स्वामित्व का पट्टा कभी बना न था

लम्हों की प्रतिध्वनियां

साथ बिताये लम्हों की प्रतिध्वनियां
नई-नई व्याख्याएँ पेश करती हैं
उस दिन साथ बैठ कर खाते हुए
एक कौर मेरे मुंह के पास लाकर
तुमने निर्देश दिया, आ!
तुम्हारी उपस्थिति की तरंगों में सराबोर
तुम्हारी आँखों के तिलिस्म में डूबी मंत्रमुग्ध सी
एकदम यंत्रवत मैंने भी पालन किया
और मुझे छलते हुए तुमने
झट से कौर अपने मुंह में रख लिया था
ठगी हुई, आहत सी मैं हैरान हुई पहले
फिर तुम्हारी मज़बूत बाज़ू पर
ढेरों मुक्के बरसाए
और तुम हंस रहे थे बेसाख़्ता
मैं तो इसे प्रेम की
चुहलबाज़ी समझी थी
क्या इसी से मुझे समझ लेना था
कि दरअसल छल करना ही
तुम्हारा असल मिजाज़ है ..

गहरी जमी उदासी

कुछ इधर पड़ा है
कुछ उधर पड़ा है
मेरे भीतर का सब सामान तितर-बितर पड़ा है
उधर गिलास लुढका हुआ
कुछ घूंट जो उम्मीद थी उसमें
अब बह चली है फर्श पर
सपनों के बिस्तर पर हजारों सिलवटें हैं
अनधुले कपड़ों सा दर्द कुर्सी पर बिखरा
बिस्तर पर भी
मेज़ पर जमे बैठे हैं काम कई
टुकुर-टुकुर घूरते हैं
फर्श पर भी जम गया है कितना ही कूड़ा-कबाड़
कुछ चोटें हैं
कुछ गुस्सा है
बहुत सी खिन्नता है
मेरे भीतर का सब सामान-तितर बितर पड़ा है
म्मम्म..सोचती हूँ शुरुआत बुहारने से करूँ

स्थगित किये हुए दर्द

स्थगित किये हुए दर्द भी जागते हैं बारहा
किसी ज़रूरी काम के लिए लगाये रिमाइंडर की तरह
करते रहते हैं दावेदारी
स्थगित किये हुए दर्द भी डालते हैं असमंजस में बारहा
किसी क़ीमती याद से जुड़े क़ीमती सामान की तरह
जो टूट-फूट गया है
नहीं है किसी भी काम का
जिसे ना फेंकते बनता है ना रखते

स्‍थगित किए हुए दर्द ज्‍यादा कुछ कहते-सुनते नहीं
लेकिन वे बदलते रहते हैं
तुम्हारे जीवन की रंगत धीरे-धीरे
पायदान पर जमा होती धूल की तरह
जो बदलती रहती है उसका असल रंग
ग्रे से गहरा ग्रे, कत्‍थई से गहरा कत्‍थई, लाल से मैरून..


(रचनाकार-परिचय: 
जन्म:  26 नवंबर 1981 को दिल्ली में
शिक्षा:दिल्ली के आईपी कोलेज से इतिहास में एम. ए. और  IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा
सृजन: कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित 
संप्रति: दिल्ली में रहकर अनुवाद और और हिंदी साप्ताहिक आफ्टर ब्रेक के लिए लेखन
संपर्क: rajni2ok@gmail.com)  
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रविवार, 10 अगस्त 2014

स्त्री को लड़ाई खुद लड़नी होगी

कानून पीड़िता को सुरक्षा कम देता है, डराता है अधिक












फ़रहाना रियाज़ की क़लम से
 
टीवी चैनल्स और अखबारों पर नज़र डाली जाये तो आधे से ज़्यादा स्पेस महिला शोषण और अत्याचारों से भरे पड़े हैं | महिलाओं के साथ हो रहे इन हादसों को देख कर मन व्यथित है | कैसी विडंबना है कि नारी सशक्तीकरण  और नारी मुक्ति के जितने दावे किये जा रहे हैं, उतना ही नारी शोषण और अत्याचारों की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है | कहा जाता है कि नारी को शोषण और अत्याचार से मुक्त करना है, तो सब से पहले उसको शिक्षित करना होगा | शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं बल्कि जीवन के हर पहलु को समझना होगा जिससे कि वो अपने अधिकारों के लिए जागरूक हों | परन्तु मौजूदा हालत पर नज़र डालें तो पिछड़ी और अशिक्षित महिलाओं की बात तो दूर जो शिक्षित महिलाएं हैं, वे भी निजी से लेकर सार्वजनिक जीवन में, सरकारी और निजी सेवाओं में, खेल मीडिया और राजनीति जैसे क्षेत्रों में उत्पीड़न और शोषण का शिकार हैं |
सबसे अधिक चिंता की बात ये है कि जिन महिलाओं को समाज में महिलाओं के शोषण और अत्याचार के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया जाता है , वे स्वयं शोषण और उत्पीड़न का शिकार हैं | भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा सेवाओं में महिलाओं का शोषण और उत्पीड़न की घटनाएँ आये दिन सामने आती रहती हैं | देश में राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग जैसी संस्थाओं को पर्याप्त अधिकार और संसाधन उपलब्ध कराए गये हैं, इसके बावजूद कई महिलाएं न्याय के लिए मुंह तकती सी रह जाती हैं | 

देश में इस तरह के शोषण और अत्याचार के ख़िलाफ़ कानून भी है परन्तु फिर भी क्या कारण है कि ऐसी घटनाओं में दिन–ब-दिन वृद्धि होती जा रही है? दरअसल इसके लिए शासन-प्रशासन का ग़ैरज़िम्मेदार रवय्या तो दोषी है ही, साथ में हमारा समाज और मानसिकता भी बेहद ज़िम्मेदार है | कमी हमारी व्यवस्था और सोच में भी है | क्योंकि अधिकतर ऐसी घटनाओं के बाद एक तरफ जहाँ कुछ राजनेताओं के ग़ैरज़िम्मेदार ब्यान अपराधियों के हौसले बुलंद करते हैं ,तो दूसरी तरफ हमारा समाज अपराधी को अपराधी न मानकर पीडिता को ही दोषी मान लेता है | जिसके कारण समाज और अदालत में होने वाली बदनामी और परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर अधिकतर ऐसे मामलों को दबा दिया जाता है | यदि कोई महिला अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाती है, तो उसे डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है | पीड़िता के चरित्र पर ही सवाल खड़े किये जाते हैं. 
हमारा कानून पीड़िता को सुरक्षा कम देता है, भयभीत अधिक करता है | अपराधी अपने रसूख और पैसों के बल पर कानूनी शिकंजे से बच निकल जाता है | कानून में बच निकलने के रास्ते बकायदा मौजूद हैं | इस प्रकार की घटनाओं में वृद्धि का एक प्रमुख कारण ये भी है कि आज जिस तरह से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में महिला को किसी भी वस्तु और विज्ञापन के प्रचार और प्रसार के नाम पर देह प्रदर्शन के द्वारा एक भोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे समाज में महिलाओं के प्रति विकर्ष्ण पैदा होता है और गन्दी मानसिकता पनपती है | जिसके कारण बलात्कार अत्याचार और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं में वृद्धि हो रही है | और भी कई कारण है जैसे, लड़कियों को बचपन से ही दोयम दर्जे का समझना और मूल्य शिक्षा और अच्छे संस्कार का अभाव | यही वजह हैं कि इतने सामाजिक सुधार आन्दोलनों के बावजूद भी ये समस्या एक चुनौती पूर्ण समस्या बनती जा रही है | गंभीर समस्या होने के बाद भी हमारी सरकार इसे निरंतर अनदेखा कर रही है | 
कहते हैं कि जो बीत गया उसे बदला नहीं जा सकता लेकिन जो बदल सकता है, उसके बारे में सोचना आवश्यक है | इसलिए इस चुनौती पूर्ण समस्या के लिए किसी एक व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव समुदाय को आगे आना होगा | जो कमी हमारी व्यस्था और सोच में है, उसमे सुधार करना होगा तभी इस तरह की घटनाओं में कमी हो पायेगी | सर्वप्रथम तो जब भी ऐसी घटना घटती है तो इस अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ ज़रुर उठाई जाये क्योंकि अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना पीड़ित पक्ष की नैतिक ज़िम्मेदारी है | ऐसे मामलों में सम्बंधित महिला का नाम गोपनीय रखते हुए न्यायिक प्रकिया जल्दी शुरू की जानी चाहिए | क्योंकि न्यायिक प्रकिया जल्दी शुरू करने से पीड़ित पक्ष भावनात्मक रूप से मज़बूत होगा | समाज की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि पीड़िता को भावनात्मक सपोर्ट दी जाये, जिस से वो अपनी लड़ाई मज़बूती से लड़े| दूसरी ओर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में नारी की भूमिका में पर्याप्त सुधार करके ,पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण न करते हुए भोगवादी प्रवृति को समाप्त करके ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहाँ नारी को सम्मान की नज़र से देखा जाये | बालिकाओं को समानता का अधिकार देते हुए आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाये | आत्मरक्षा प्रशिक्षण को शिक्षा का एक अहम हिस्सा बनाया जाये | बच्चों को बचपन से ही ऐसे संस्कार दिए जाएँ जिस से कि वो स्त्री की इज्ज़त करना सीखे | 

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी | आर्थिक संबलता और आत्मनिर्भर होने के लिए सपनो को पूरा करते हुए , समाज में जो इंसानी भेड़िये घूम रहे हैं, उनको पहचान कर उनसे सावधान रहना होगा और साहस के साथ इनका सामना करते हुए ये बताना होगा कि नारी अबला नहीं है | यदि वो शोषण और अत्याचार के ख़िलाफ़ संघर्ष पर उतर आये तो दुनिया बदल सकती है | जब हम खुद अपनी लड़ाई लड़ेंगे तभी तो क़ानून और समाज हमारा साथ देगा , क्योंकि दुनिया में इंसानियत आज भी जिंदा है|                                                  
      

(रचनाकार-परिचय:
जन्म: 11 अप्रैल 1985 को मेरठ (उत्तर प्रदेश ) में
शिक्षा: बीए. (चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ )
सृजन: समसायिक विषयों पर इधर कुछ पोर्टल पर लेख
संप्रति: अध्ययन और स्वतंत्र लेखन
संपर्क: farhanariyaz.md@gmail.com)  

                                        
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गुरुवार, 7 अगस्त 2014

चटख़ धूप की दबीज़ चादर


 









मृदुला शुक्ला की कविताएं

पिता
चौतरफा दीवारें थी
भीतर घुप्प अँधेरा
एक खिड़की खुली

कुछ हवा आई
ढेर सारी रौशनी

तुम चौखट हो गए
आधे दीवार में धंसे से
आधे कब्जों में कसे से

ये जो उजाला है ना
खिडकियों के नाम है

चौखट तो अब भी
डटी है दीवारों के सामने
अंधेरों से लड़ती......

पिता तुम चौखट ही तो रहे हमेशा ..
ये जो तमाम उजाले हैं हमारे हिस्से के
ये मुझ तक पहुंचे ही हैं
तुम्हारे कंधो पर सवार होकर ...

मेरी कविताएँ

कविताएं मुझे मिलती हैं
चौराहों पर ,तिराहों पर
और अक्सर
दोराहों पर

संकरी पगडंडियों पर कविताएं
निकलती हैं
रगड़ते हुए मेरे कंधे से कन्धा
और डगमगा देती हैं मेरे पैर

इक्क्का दुक्का दिख ही जाती है
तहखानों में अंधेरो को दबोचे
उजालों से नहाए
महानगरों की पोश कोलोनियों में

पिछले दिनों गुजरते हुए गाँव के
साप्ताहिक बाज़ार में
उसने आकर मुझसे मिलाया अपना हाथ
और फिर झटके से गुज़र गयी
मुस्कुराते हुए ,दबा कर अपनी बायीं आँख

मेरे बेहद अकेले और उदास दिनों में
वो थाम कर घंटो तक
बैठती हैं मेरा हाथ
थपथपाती है मेरा कन्धा
अपनी आँखों में
सब कुछ ठीक हो जाने की आश्वस्ति लिए

सच तो ये है कि
कविताये मुझे घेर लेती हैं
पकड़ लेती हैं मेरा गिरेबान
सटाक ,सटाक पड़ती हैं मेरी पीठ पर
और छोड़ जाती हैं
गहरे नीले निशान .....

मेरी पीठ पर पड़े गहरे नीले निशान ही तो हैं  मेरी कविताएं


धृतराष्ट्र होना आसान है, गांधारी होने से

धृतराष्ट्र  होना आसान है गांधारी होने से
धूल धुएं और कुहासे से भरे मौसमों में
आसन होता है जीवन
जब सब धुंधला सा हो ,आप गढ़ पाते हैं
मनोनुकूल परिभाषाएं
अपने अननुभूत सत्यों के

सहज होता है कहना
ठंडा पड़ा सूरज किन्नरों के हाथ की थाली है
बजते हुए किसी पुत्र जन्मोत्सव पर

अपने चेहरे पर उग आये कांटो को
मान लेना खरोंच भर
पिछली हारी हुई लड़ाई का
सामने रखे आदमकद आइने

आईने में भी हम खुद को देख
पाते हैं इच्छानुसार
घटा बढ़ा कर
पीछे से आता प्रकाश का श्रोत भर

कठिन समय में हथियार डालते हुए
आप खुद को पाते हैं बेबस, लाचार
बदलने में दृश्य को,
आइना झूठ नहीं बोलता
वो समझता है पीछे से आती प्रकाश की भाषा मात्र

मैं कल्पना करती हूँ
एक दिन प्रकृति उतार ले सूर्य ,चन्द्रमा
प्रकाश के तमाम श्रोत आकाश से
और टांग दे उनकी जगह उनके धुंधले प्रतिबिम्ब

निःसंदेह धृतराष्ट्र होना आसान है, गांधारी होने से


उकताहटें हावी हैं प्रतिबद्धताओं पर

मेरे सपने नहीं रहते अब
मेरी आँखों में
वो प्रायः होते हैं
क्रूर गाडीवान की भूमिका में
हाथ में चाबुक लिए ,
नाक के कसे नकेल,
गाड़ी में जुते दोनों बैलों की भूमिका में
अकेली होती हूँ मैं

कभी वो कूद कर सवार हो जाते हैं
मेरे कंधो पर
अटपटे रास्तों पर सुनाते हैं कहानियां
अंत में कहानी को रूपांतरित कर एक प्रश्न में,
चस्पा कर एक प्रश्नवाचक चिह्न
उगते सूरज के मुहं पर
वे फिर से जा बैठते हैं
बूढ़े बरगद पर ,बेताल की तरह

वो मुझे प्रायः मिल जाते हैं
प्रकाश से सराबोर रास्तो पर
चुपचाप चलते
हाथों में उठाये जलती मोमबत्तियां
मशाल की तरह

अब जबकि,उकताहटें हावी है
प्रतिबद्धताओं पर
छद्म मौलिकता के इस विषम दौर में
मैं रोज भरती हूँ उनमे
समुद्री हरा ,आसमानी नीला
और गौरैया के पंखों का धूसर सलेटी रंग ,
चौराहों पर लगी हाइड्रोजन लैम्पों के
नीचे से गुजरते
वो खो देते हैं अपनी पहचान
और घर लौट आते हैं ,मुहं लटकाए
गिरह कट गए मुसाफिर से

मैं खुद को पाती हूँ
रंगमंच पर ठठा कर हँसते हुए विदूषक सा
जो आंसू पोछने के लिए
प्रतीक्षा करता है
यवनिकापात की

वो खुद को साथ नहीं लाती

रोज सुबह
जब वो घर से निकलती है
खुद को घर मैं छोड़ आती है
और साथ ले लेती है अपने
वो तमाम असबाब......................
जिनको साथ रहना चाहती है वो

वो ओढ़ लेती है अपनी
पिछली रात की नींद
जो कभी पूरी नहीं होती
दिन के सपनो की वजह से

उसके कंधो पर सवार होती हैं
वो लोरियां
जिन्हें सुनाने से पहले
नींद आ धमकती है
उसकी आँखों मैं

उसकी आँखों मैं बसे होते हैं
रूहानी मुस्कुराहट वाले दो दांत
जिनके निकलने की तकलीफ
तारी रहती है ,हर वक्त उसके दिल दिमाग पर

मैं रोज मिलता हूँ उससे
बस पर चढ़ते,उतरते

बस वो नहीं मिलती मुझसे
क्यूंकि वो खुद को साथ नहीं लाती

अस्पताल

अस्पताल में अपने बिस्तर पर
अकेले लेटे,आप पाते हैं
आपके पास पर्याप्त कारण नहीं है दुखी होना का ,
वंहा मौजूद लोगों के चेहरे पर नाचती भय की तेखाएँ
भारी पड़ जाती हैं आपके हर दुःख पर

आप देखते हैं डॉ का सफ़ेद चोंगा पहनना उसे
नहीं साबित कर देता धवल ह्रदय होना
अक्सर साबित करता है ,
उसकी रगों में बहते लाल रंग का सफ़ेद हो जाना

बेवजह मुस्कुराती नर्सों के पास
कोई वाजिब वजह नहीं होती मुस्कुराने की
आप पाते हैं कि.उनके मुस्कुराने का सम्बन्ध
उनकी किसी आंतरिक प्रसन्नता से नहीं
उनके चूल्हे के रोटी से है

विभिन्न प्रकार के कचरों के निस्तारण के लिए रखे
लाल ,पीले, काले डिब्बे
आपको अपने ही मस्तिष्क के
गुप्त तहखानों से लगते हैं

मृत्यु के कोलाहल से भरी इस इमारत में
जीवन आकांक्षा नहीं आशा होता
डॉ के आखिरी न में सर हिलाने तक

चपटी थैली नुमा बोतल में खूंटियों पर लटकता रक्त
अक्सर टिकट होता है
आगे की सवारी का, जीवन की रेलगाड़ी में

यंहा दफ़न होती हैं मृत आशाएं
लिपटी सफ़ेद चादरों में
मृतात्माओं की जगह ,
उनके प्रेत नहीं ठहरते यंहा
चल पड़ते हैं अपने रोते बिलखते परिजनों के पीछे

सधः प्रसव पीड़ा मुक्त माँ की मुस्कुराह्टें
उलट देती
पीड़ा के सारी पिछली ज्ञात परिभाषाएं

नवजातों के कोमल रुदन परास्त करते रहते हैं
तीक्ष्ण मृत्युगंधी विलापों को

विशवास की पराकाष्ठा ,उम्मीदों के तिलिस्म होते हैं
टूटी कसौटियों खंडित आस्थाओं के शवदाहगृह होते हैं... अस्पताल

वो कमरा
बहुत बेतरतीब है कामगारों की बस्ती सा ये कमरा ,
बंद पड़ी दीवाल घडी वक्त पूछती रहती है सबसे
वक्त बे वक्त
और हमेशा अपना सीना टटोल ढूँढा करती है
टिक टिक की आवाज

चिंता में रहती है तीन टांगो वाली डायनिंग टेबल
इस घर के लोग अब कुछ खाते क्यूँ नहीं
याद करती है पकवानों की खुशबु
और खो जाती है बिना रुके चलती पार्टियों के दौर में

गठ्ठर मैं बंधी किताबें हुलस कर बात करती हैं अक्सर
उन दिनों की पढ़ी जाती थी बड़े शौक से

इस कमरे में अक्सर कानाफूसी होती है
यंहा टेबल तीन पैर की तिपाया दो पैर का
कुर्सियां बिना हत्थे की क्यूँ हैं

जब भी चरमरा कर खुलता है दरवाजा
चौकन्नी हो जाती है जंग खाई सिलाई मशीन
शायद आज फिर कोई तेल डाल करेगा पुर्जे साफ़, ,
वो इतराती हुई सी गढ़ेगी कुछ नया सा

हैंडल टूटे मग अक्सर बाते करते हैं कॉफ़ी के
अलग अलग फ्लेवर के बारे में,

कभी कभी मुझे ये कमरा बस्ती से दूर किसी वृधाश्रम सा लगता है
जहाँ सब खोये होते हैं अपनी जवानी के दिनों में,
सब रहते हैं उदास,
धूल की एक मोटी चादर बड़े प्यार से
समेट कर रखती उन सबको अपने भीतर,
जैसे अवसाद समेटे रहता है बुजर्गों को

मकड़िया मुस्कुराती रहती हैं सुन कर इनकी बातें
बुनते हुए जाल इस छोर से उस छोर तक
बुनते हुए मच्छरदानियों सरीखा कुछ

(रचनाकार-परिचय :
जन्म: 11 अगस्त १९७० को प्रतापगढ़ में
शिक्षा:स्नातकोत्तर
सृजन: उम्मीदों के पाँव भारी हैं  कविता संग्रह प्रकाशित
संप्रति : शिक्षण, गाज़ियाबाद
संपर्क : : mridulashukla11@gmail.com)

 
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बुधवार, 6 अगस्त 2014

हवा में लहू की गंध है












शायक आलोक की कविताएं

1.

एक पेड़ जो बूढा हो गया है
आँधियों में जिसके उखड़ जाने का खतरा है
जो हवाओं में चिंयारता है काठ कठोर आवाज़ में
उस पेड़ के लिए लिखता हूँ मैं कविता
मेरी चिड़िया बेटी गुनगुनाती है उसे.

2.

विचारधारा को तुमने खून की तरह रखा
खून खौलता था
ठंडा होता था
जम जाता था खून
खून पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता था

जबकि यह सब बस कहने की बातें थीं

तुम्हें रखना था विचारधारा को पानी की तरह
खौला सकते थे पानी
ठंडा कर सकते थे
जमा कर बना सकते थे बर्फ
काम के जरुरी रंग भी मिला सकते थे. 

3.

तुम्हारे समय का घाव
मेरे समय पर बचा हुआ दाग है
दाग में है तुम्हारे घाव की स्मृति

तुम्हारी स्मृति बचाऊं या कुरेद
लौटा लाऊं तुम्हारा समय
तय करो पिता !

4.

मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए सादिया हसन
ये चाय इतनी गर्म कभी न थी
इसकी मिठास इतनी कम कभी न थी.

मैं सूंघता हूँ मुल्क की हवा में लहू की गंध है
कल मेरे कमरे पर आये लड़के ने पूछा मुझसे
कि क्रिया की प्रतिक्रिया में पेट फाड़ अजन्मे शिशु को मार देंगे क्या
बलात्कार के बाद लाशें फूंक जला देंगे क्या
हम दोनों फिर चुप रहे सादिया हसन
हमारी चाय रखी हुई ठंडी हो गई.

हम फूलों तितलियों शहद की बातें करते थे
हम हमारे दो अजनबी शहर की बातें करते थे
हम चाय पर जब भी मिलते थे
बदल लेते थे नजर चुरा हमारे चाय की ग्लास
पहली बार तुम्हारी जूठी चाय पी
तो तुमने हे राम कहा था
मेरा खुदा तुम्हारे हे राम पर मर मिटा था.

पर उस सुबह की चाय पर सबकुछ बदल गया सादिया हसन
एक और बार अपने असली रंग में दिखी
ये कौमें ..नस्लें .. यह मेरा तुम्हारा मादरे वतन
टी वी पर आग थी खून था लाशें थीं
उस दिन खरखराहट थी तुम्हारे फोन में आवाज़ में
तुमने चाय बनाने का बहाना कर फोन रख दिया.

मैं जानता हूँ उस दिन तुमने देर तक उबाली होगी चाय
मैंने कई दिन तक चाय नहीं पी सादिया हसन.

मैं तुम्हारे बदले से डरने लगा
क्रिया की प्रतिक्रिया पर अब क्या दोगी प्रतिक्रिया
इस गुजार में रोज मरने लगा
जब भी कभी हिम्मत से तुम्हें कॉल किया
बताया गया तुम चाय बनाने में व्यस्त हो
मैंने जब भी चाय पी आधी ग्लास तुम्हारे लिए छोड़ दी.

गुजरात ने हम दोनों को बदल दिया था सादिया हसन.

ठंडी हो गई ख़बरों के बीच तुम्हारी चिट्ठी मिली थी-
‘’ गुजरात बहुत दूर है यहाँ से
और वे मुझे मारने आये तो तुम्हारा नाम ले लूँगी
तुम्हें मारने आयें तो मेरे नाम के साथ कलमा पढ़ लेना
और मैं याद करुँगी तुम्हें शाम सुबह की चाय के वक़्त
तुम्हारे राम से डरती रहूंगी ताउम्र
मेरे अल्लाह पर ही मुझे अब कहाँ रहा यकीन ‘’

तुम्हारे निकाह की ख़बरों के बीच
फिर तुम गायब हो गई सादिया हसन
मैंने तुम्हारा नाम उसी लापता लिस्ट में जोड़ दिया
जिस लिस्ट में गुजरात की हजारों लापता सादियाओं समीनाओं के नाम थे
नाम थे दोसाला चार साल बारहसाला अब्दुलों अनवरों के.

हजारों चाय के ग्लास के साथ यह वक़्त गुजर गया.

मैं चाय के साथ अभी अखबार पढ़ रहा हूँ सादिया हसन
खबर है कि गुजरात अब दूर नहीं रहा
वह मुल्क के हर कोने तक पहुँच गया है
मेरे हाथ की चाय गर्म हो गई है
ये चाय इतनी गर्म कभी न थी
इसकी मिठास इतनी कम कभी न थी
सादिया हसन, मेरी चाय को तुम्हारी फूंक चाहिए.

5.

प्रार्थना से हम करते हैं
तुम्हारे प्रति हमारे अविश्वास की संस्तुति
और रखते हैं आँखें बंद कि
हमारे समक्ष होने में प्रकट
तुम्हें खुली आँखों से भय न हो ईश्वर !

और हम हाथ इसलिए जोड़े रखते हैं कि
तुम हो नहीं
जो होते तो थामते हाथ
कि हमारे एक हाथ को देता है ढाढस
हमारा ही हाथ दूसरा.

6.

आर्मेनिया में गुलाब को क्या कहते हैं अना अनाहित
और क्या कहते हैं फूल पत्ती चाँद तितली चिड़िया को
छोड़ो कहो प्यार को क्या कहते हैं
और क्या कहते हैं लाल ताशअमल को.

सबसे पुराने चमड़े के जूते को क्या कहते हैं
क्या कहते हैं स्कर्ट को
अना अनाहित, क्या तुम स्कर्ट पहनती हो.

अपने उनतालीस वर्णक्रम से
मेरे बावन अक्षरों के संवाद को जवाब दो
कहो अना अनाहित
आर्मेनिया की लड़की को ब्याह के लिए कैसा वर चाहिए.

7.

तुम मेरी बात सुनो
मैं मेरा समय तुम्हें सौंपना चाहता हूँ
मेरे समय के कई मुंह हैं
इसने हर मुंह से काटना सीख लिया है
दुनिया के किसी रसायन शाला में नहीं बना अभी
इसकी काट का जहर
इसलिए तुम्हें इसे पालना सीखना होगा
सहलाने पुचकारने की कला आजमानी होगी.

मेरे पूर्वजों ने मुझे अपना समय सौंपा था
मैं तुम्हें मेरा समय सौंपना चाहता हूँ
सुनो मेरी बात.

सुनो सुनो
या एक और इंतजाम करो
हथियार तलाश करो
मेरे समय का मुंह कुचल मार दो इसे.

8.

चींटियों को यकीन है आएगी बारिश
कौवे को यकीन आएगा आने वाला
लड़की को यकीन है पत्थर देवता ढूंढ लायेंगे अच्छा घर वर
पंडित को यकीन कि मरेगी बिल्ली और बरसेगा सोना.

मछलियों को यकीन है कि तालाब में रहेगा साल भर पानी
बगुले को यकीन एक रोज चुग लूँगा मन भर मछलियाँ
केकड़े को यकीन वह बचेगा हर सूरत में

घर को यकीन है लौट आएगा प्रवासी
सिपाही को यकीन है जल्द ही बुला लेगा घर. 

सब यकीन में जी रहे हैं. 

मुझे यकीन है कि अब बदल गया है समय 
पुरानी बात रही नहीं 
यकीन पर भरोसे लायक रही नहीं दुनिया. 


(रचनाकार-परिचय:
जन्म : 11.01.1983 बेगूसराय, बिहार में
शिक्षा : इतिहास और मनोविज्ञान में स्नातक, स्नातकोत्तर (हिंदी साहित्य)
सृजन: कुछ कविताएं समावर्तन रेखांकित, जनसत्ता, कथादेश, शुक्रवार वार्षिकी आदि में छपीं
पहली कहानी निकट पत्रिका में.
संप्रति : सन्मार्ग अखबार, पटना में पोलिटिकल फीचर एडिटर के रूप में कार्य. आलेख और कॉलम लिखे. कस्बाई न्यूज़ चैनल सिटी न्यूज़ में कुछ दिनों पत्रकारिता बाद फ़िलहाल दिल्ली में रहकर स्वतंत्र  लेखन और जीविका के लिए अनुवाद करते हैं.
संपर्क: shayak.alok.journo@gmail.com)   
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