बहुत पहले कैफ़ी आज़मी की चिंता रही, यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलताइससे बाद निदा फ़ाज़ली दो-चार हुए, ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलताकई तरह के संघर्षों के इस समय कई आवाज़ें गुम हो रही हैं. ऐसे ही स्वरों का एक मंच बनाने की अदना सी कोशिश है हमज़बान। वहीं नई सृजनात्मकता का अभिनंदन करना फ़ितरत.
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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

धरती आबा बिरसा के गांवों में आदिवासी कर रहे फिल्म उलगुलान

राम-रहीम नाम के कथित बाबाओं को दे रहे जवाब




 


















शहरोज़ की क़लम से


कभी उलिहातू गांव के बिरसा मुंडा ने अबुआ दिशुम अबुआ राज के लिए उलगुलान किया था। वो 19वीं सदी के आखिरी वर्षों की घटना है। अब 21 वीं सदी में उलिहातू के पास के जोरको गांव की लड़की माकी मुंडा नया उलगुलान कर रही है। प्रोजेक्ट बालिका उच्च विद्यालय, अड़की में नवीं क्लास की यह छात्रा फिल्म सोनचांद में नायिका है। इसने न कभी कैमरा का सामना किया, न ही कभी मुंबई ही गई। लेकिन फिल्म में आदिवासी धाविका की केंद्रीय भूमिका उसे बहुत रास आ रही है। दरअसल उसके उत्साह की वजह है, कि पहली बार आदिवासी ही आदिवासियों के लिए आदिवासियों पर फिल्म बना रहे हैं। जिन्होंने कभी अभिनय नहीं किया है, इसमें प्रमुख किरदारों को जी रहे हैं। पेशे से चालक तिर्की बैठा उर्फ फुचो दा एक ऐसे ही अहम कलाकार हैं। इसके अलावा और भी कई नाम हैं, जिनकी पर्दे पर आने की हसरत पूरी होने जा रही है। नये लोगों में अधिकतर गुनतुरा गांव के लोग हैं। इनमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक शामिल हैं। वे खुश भी इसलिए हैं कि उनके ही गांवों में, उनकी ही भाषा-बोली में फिल्म बन रही है। बिर बुरु ओम्पाय मीडिया एंड इंटरटेनमेंट के बैनर तले फिलहाल खूंटी के अड़की प्रखंड के विभिन्न स्थानों पर इसकी शूटिंग चल रही है।

10 जिलों के आदिवासी कलाकार
 
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, पूणे के ग्रेजुएट व निर्देशक रंजीतउरांव ने बताया कि राज्य के करीब 10 जिलों के आदिवासी कलाकारों को फिल्म में मौका मिला है। इसमें मार्शल बारला, रीमा ठाकुर, प्रकाश मसीह सोय और राजन कुजूर (खूंटी), आभा मांझियान, अंजित अरमान, बैजंती सरदार, छवि दास, गणेश ठाकुर हांसदा , जीतराई हांसदा, मानु मुर्मू, नरसिंह टुडू, फुलमनी सोरेन, पोरान हांसदा, राहुल सिंह तोमर, रितेश टुडू, टीकाराम हांसदा, विमल भंज और विनोद मांझी (जमशेदपुर), रवि लकड़ा, शैलजा बाला, संदीप कुमार, सुदीप केरकेट्टा, सुशील केरकेट्टा (रांची), तिलक सिंह मुंडा, राकेश गाड़ी (बोकारो), शीतल बागे, विमल भंज (चाईबासा), कुमेश कुमार मंडल, सागर कुमार, कुमार अश्विनी, सबीना (धनबाद), ब्रजेश उरांव (गुमला), पवन कुमार (लोहरदगा), लखीचरन सिंह मुंडा (सरायकेला खरसावां) और तारकेलेंग कुल्लू व पुरुषोत्तम कुमार (सिमडेगा) शामिल हैं।
टेक्निकल टीम में भी आदिवासी
 
मुंडारी के साहित्यकार जोवाकिम तोपनो व उनकी पत्नी मरियम तोपनो, हिंदी व संताली के लेखक शिशिर टुडू भी फिल्म में भूमिकाएं कर रहे हैं। जबकि मानु मुर्मू, एस मृदुला, शीतल बागे, सुनील हांसदा, रितेश टुडू और जीतराय हांसदा जैसे रंगकर्मी भी फिल्म में नजर आएंगे। फिल्म की टेक्निकल टीम में भी आदिवासी शामिल हैं। कैमरा यूनिट में रांची के प्रवीण होरो, सुरेंद्र कुजूर हैं तो साउंड रिकॉर्डिंग का जिम्मा सत्यजीत रे फिल्म इंस्टीट्यूट के मंजुल टोप्पो और जेवियर मॉस कम्युनिकेशन के बसंत अभिषेक बिलुंग व विकास पर है। महेश मांझी तकनीकी को ऑर्डिनेशन संभाल रहे हैं।
सरहुल तक प्रदर्शित होगी सोनचांद
 
निर्माता वंदना टेटे ने बताया कि शूटिंग 40 दिनों तक चलेगी। सरहुल तक फिल्म प्रदर्शित करने की योजना है। उन्होंने कहा, हमारे पास एक समृद्धशाली कला परंपरा है। हमारे लोग नैसर्गिक रूप से नृत्य, गीत और संगीत में पारंगत होते हैं। परंतु सिनेमा में आज तक झारखंडी लोगों को अवसर नहीं मिला। सोनचांद में 80 फीसदी कलाकार आदिवासी हैं। फिल्म समुदाय के सहयोग से बन रही है। छह सितंबर से दूसरे शेड्यूल की शूटिंग शुरू हुई है। इसमें बड़ी संख्या झारखंड के लोगों की है ही, बाहर के भी कुछ चुनिंदा कलाकार एक्टिंग कर रहे हैं। रांची व इसके आसपास में फिल्मांकन के बाद आजकल यूनिट खूंटी के अड़की प्रखंड के गांवों में है। रांची के मशहूर रंगकर्मी अशोक पागल की भी इसमें बड़ी दमदार भूमिका है। फिल्म की टेक्निकल टीम में फिल्म इंस्टीच्यूट, पुणे से प्रशिक्षित नीरज समद, कोलकाता के राजकुमार के अलावा मुंबई से पहुंचे कैमरामैन कृष्णदेव भी हैं।


दैनिक भास्कर, रांची के 22 सितंबर 2015 के अंक में प्रकाशित





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सोमवार, 1 सितंबर 2014

आदिवासियों ने बनाई पहली फ़िल्म निर्माण कंपनी

पहली फिल्म सोनचांद की शूटिंग जल्द
 


















शहरोज़ की क़लम से
भारतीय सिनेमा में आदिवासी पहचान और अभिव्यक्ति को मुखर करने के लिए वंदना टेटे और ग्लैडसन डुंगडुंग ने मिलकर बिर बुरू ओम्पाय मीडिया एंड इंटरटेनमेंट एलएलपी नामक फिल्म  निर्माण कंपनी बनाई है। यह पहली फिल्म कंपनी है, जिसका स्वामित्व आदिवासियों के पास है। मुंडारी व खड़िया से मिलकर बने शब्द बुरू ओम्पाय का अर्थ ही है, जल, जंगल  व जमीन। जाहिर है, इस कंपनी की फिल्मों में नदी का चंचल प्रवाह,  पहाड़ सा स्वाभिमान और जंगलों सी हरियाली होगी।  वंदना टेटे ने बताया कि भारतीय सिनेमा के सौ साल के इतिहास में आदिवासी कहीं नहीं है। इसलिए उनकी अभिव्यक्ति व उपस्थिति के लिए कंपनी बनाई गई है। जबकि  ग्लैडसन डुंगडुंग का कहना है  आदिवासी अपनी ही जमीन से बेदखल किए जा रहे हैं, उनकी समस्याओं को प्रमुखता से फोकस करना कंपनी का उद्देश्य रहेगा।
कंपनी का पहला प्रोजेक्ट फीचर फिल्म सोनचांद  है। इसमें भी सत्तर फीसदी कलाकार झारखंडी व आदिवासी होंगे। वहीं डैनी डेंगजोप्पा, सीमा बिस्वास और उषा जाधव का अभिनय सोनचांद में चार चांद लगाएगा। झारखंड के अलावा मुंबई, दिल्ली, मप्र., छत्तीसगढ़ व राजस्थान के मनुज मखीजा, रंजीत उरांव, बृजीत सुरीन, विजय गुप्ता, इंद्रजीत सिंह, शंकर सिंह, केएन सिंह मुंडा, इंद्रजीत सिंह और सामंत लकड़ा आदि फनकारों की फिल्म में अहम भूमिका होगी।

 निरे पे सेने पे लंदय पे रियो-रियो
 निरे पे सेने पे लंदय पे रियो-रियो फिल्म सोनचांद की यह पंक्ति टैग लाइन है। मुंडारी के इन शब्दों का मतलब है, आओ दौड़ें, नाचें व खिलखिलाएं। फिल्म में संवाद पात्र के अनुसार नागपुरी, मुंडारी, भोजपुरी और हिंदी में होगा। मुंडारी संवाद कवि-प्रोफेसर अनुज लुगुन लिखेंगे। वहीं निर्देशन करेंगे, अश्विनी पंकज। अभिनय से तकनीकी पहलुओं और लेखन तक में कंपनी को एफटीआई से ट्रेंड सत्तर प्रतिशत आदिवासी युवाओं का योगदान होगा।

 कहानी जो आज तक कही नहीं गई
 इस फिल्म में 12-14 साल की आदिवासी बच्ची सोनचांद मुंडा की कहानी है। आदिवासी प्रदेश की आदिवासी समुदाय से आनेवाली यह लड़की फील्ड एथलीट है। बालिका वर्ग की 100 मीटर रेस में उसका प्रदर्शन बेमिसाल है। यह धाविका स्टेट चैंपियन है। लोग उसे नन्ही आदिवासी उड़नपरी बोलते हैं। उसका सेलेक्शन नेशनल चैंपियनशिप के लिए होता है। लेकिन चैंपियनशिप के कुछ दिन पहले एक रात कोई उसके पांव काट देता है।
भास्कर के रांची संस्करण में 1 सितंबर 2014  प्रकाशित

लेखक-परिचय






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(यहाँ पोस्टेड किसी भी सामग्री या विचार से मॉडरेटर का सहमत होना ज़रूरी नहीं है। लेखक का अपना नज़रिया हो सकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान तो करना ही चाहिए।)