जादूई चमत्कार की तरह शिखर पर पहुंची तस्लीम राहत के अलावा सफलता के सोपान चढ़ती शहर की कहकशां नाज़ ऐसी मिसाल है,जिसके साहस और परिश्रम ने सारे उल्टे पहाड़े सीधे कर दिये हैं । आत्मनिर्भरता की इबारत रचती इसकी उड़ान औरों के हौसले को भी जान बख्श रही है। मां पिता के देहांत के बाद वह भाई बहनों पर भार नहीं, मददगार बनकर सामने आई है। स्कूटी पर फुर्र उड़ जाने वाली, आत्मनिर्भरता से लबरेज इस लड़की का अपना बैंक बैलेंस है। कंप्यूटर सज्जित प्रिटिंग की अपनी यूनिट है। महज छह वर्षों में उपजा यह विश्वास ढेरों मुस्लिम लड़कियों को तालीमो हुनर की स्केटिंग से जेब कर रहा है।
अंजुमन अस्पताल, कोंका डिपो की रहने वाली मरहूम मोहम्मद युनुस की छोटी बिटिया कहकशां ने दरअसल विपरीत स्थितियों में भी सपने को संजोए रखा । उसके जेहन में 26 जुलाई 2004 का दिन स्थायी रूप से अंकित है । दाखिले के सिलसिले में कालेज से सुबह ही लौट कर आई थी । दिलो दिमाग पर कालेज प्रांगन की उ‹मुक्ता हावी थी । रात के गहराने के साथ उसके सपने घने होते जा रहे थे । वह पढऩा चाहती थी । कुछ करना चाहती थी ताकि बूढ़े हो चले गरीब मां पिता की गिरती सांसों को वापस खींच सके । लेकिन रात ने अंधेरा और घना कर दिया । नियति ने उसे ममता से वंचित कर दिया । कुछ सालों बाद पिता के वात्सल्य से भी बेदखल कर दी गई । कहकशां नाज यानी घरकी रिंनकी पंख समेट कर बैठ गयी । साहस ने जब सदमे से बाहर निकाला, तो तीन माह का अर्सा गुजर चुका था । जाना सिर्फ अम्मी का नहीं हुआ, यह हमराज सहेली का भी बिछोह था । बड़ी बहनें ससुराल में थीं । भाई अपने परिवार संग । अकेली जान । दीवारें काटने को दौड़ती । एक भाई तब काफी छोटा था । लेकिन पर कटे नहीं थे, अशक्त थे । उडऩे की उत्कंठा दृढ़ थी । तमन्ना ने स्क्रीन पेंटिंग नामक नए पखेरू दे दिये ।
कालेज से लौटते समय ऑर्डर के लिए दुकान—दुकान का चˆककर पहले बड़ा अटपटा लगता था । रिश्तेदारों ने भी ना नुकुर की । मुस्लिम लड़की का इस तरह बाजार में लोगों से मिलना,जुलना और बतियाना, किसे सुहाता । पड़ोसियों की भवें तन गयीं । लेकिन कहकशां की ईमानदारी और भाइयों के संग सहयोग ने ऐसे सवालों पर तमांचे जड़ दिए । आज कहकशां गैलेक सी प्रिटिंग की संचालक के साथ ऑरी फ्लेम नामक स्वयं सेवी समूह की स्थानीय प्रबंधक भी है । रोस्पा टावर में एक दुकान उसने किसी के साथ साझा किया है ताकि प्रिटिंग व्यवसाय को और बढ़ाया जा सके । महज चंद रुपए से आरंभ कारोबार ने दरख्त की शकल अख्तियार करनी शुरू कर दी है । कारोबार ही क्यों चुना ? पढ़ लिख कर आप अफसर भी बन सकती थीं ? कहकशां कहती हैं कि पैगंबर ने तिजारत को तरजीह दी है । आप कहते थे कि कारोबार में बरकत है ।
हर धूप छांव में साथ खड़ा छोटा भाई गुड्डू के अलावा कहकशां अपनी भाभियों का भी शुक्रगुजार है । जिनके साथ के बिना वह एक कदम भी नहीं बढ़ा सकती थी । वह कहती हैं कि मां बाप को अपने बच्चों पर भरोसा करना चाहिए और बच्चों को भी उनके भरोसे को बनाए रखना चाहिए । वार्षिक डेढ़ से दो लाख अर्जित करने वाली बीकॉम आनर्स , कहकशां कहती है कि मुस्लिम लड़कियों को तालीमो हुनर को अपना जेवर बना लेना चाहिए । तहजीब के साथ, मेहनत और ईमानदरी के बूते लड़कियां तरक्की मंजिलें तय कर सकती हैं । कविता, नाजिया और रेश्मा जैसी लड़कियां भी मंत्र लेकर गुरु कहकशां की तरह कामयाबी की ओर अग्रसर हैं ।
आज के दैनिक भास्कर में प्रकाशित
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अंजुमन अस्पताल, कोंका डिपो की रहने वाली मरहूम मोहम्मद युनुस की छोटी बिटिया कहकशां ने दरअसल विपरीत स्थितियों में भी सपने को संजोए रखा । उसके जेहन में 26 जुलाई 2004 का दिन स्थायी रूप से अंकित है । दाखिले के सिलसिले में कालेज से सुबह ही लौट कर आई थी । दिलो दिमाग पर कालेज प्रांगन की उ‹मुक्ता हावी थी । रात के गहराने के साथ उसके सपने घने होते जा रहे थे । वह पढऩा चाहती थी । कुछ करना चाहती थी ताकि बूढ़े हो चले गरीब मां पिता की गिरती सांसों को वापस खींच सके । लेकिन रात ने अंधेरा और घना कर दिया । नियति ने उसे ममता से वंचित कर दिया । कुछ सालों बाद पिता के वात्सल्य से भी बेदखल कर दी गई । कहकशां नाज यानी घरकी रिंनकी पंख समेट कर बैठ गयी । साहस ने जब सदमे से बाहर निकाला, तो तीन माह का अर्सा गुजर चुका था । जाना सिर्फ अम्मी का नहीं हुआ, यह हमराज सहेली का भी बिछोह था । बड़ी बहनें ससुराल में थीं । भाई अपने परिवार संग । अकेली जान । दीवारें काटने को दौड़ती । एक भाई तब काफी छोटा था । लेकिन पर कटे नहीं थे, अशक्त थे । उडऩे की उत्कंठा दृढ़ थी । तमन्ना ने स्क्रीन पेंटिंग नामक नए पखेरू दे दिये ।
कालेज से लौटते समय ऑर्डर के लिए दुकान—दुकान का चˆककर पहले बड़ा अटपटा लगता था । रिश्तेदारों ने भी ना नुकुर की । मुस्लिम लड़की का इस तरह बाजार में लोगों से मिलना,जुलना और बतियाना, किसे सुहाता । पड़ोसियों की भवें तन गयीं । लेकिन कहकशां की ईमानदारी और भाइयों के संग सहयोग ने ऐसे सवालों पर तमांचे जड़ दिए । आज कहकशां गैलेक सी प्रिटिंग की संचालक के साथ ऑरी फ्लेम नामक स्वयं सेवी समूह की स्थानीय प्रबंधक भी है । रोस्पा टावर में एक दुकान उसने किसी के साथ साझा किया है ताकि प्रिटिंग व्यवसाय को और बढ़ाया जा सके । महज चंद रुपए से आरंभ कारोबार ने दरख्त की शकल अख्तियार करनी शुरू कर दी है । कारोबार ही क्यों चुना ? पढ़ लिख कर आप अफसर भी बन सकती थीं ? कहकशां कहती हैं कि पैगंबर ने तिजारत को तरजीह दी है । आप कहते थे कि कारोबार में बरकत है ।
हर धूप छांव में साथ खड़ा छोटा भाई गुड्डू के अलावा कहकशां अपनी भाभियों का भी शुक्रगुजार है । जिनके साथ के बिना वह एक कदम भी नहीं बढ़ा सकती थी । वह कहती हैं कि मां बाप को अपने बच्चों पर भरोसा करना चाहिए और बच्चों को भी उनके भरोसे को बनाए रखना चाहिए । वार्षिक डेढ़ से दो लाख अर्जित करने वाली बीकॉम आनर्स , कहकशां कहती है कि मुस्लिम लड़कियों को तालीमो हुनर को अपना जेवर बना लेना चाहिए । तहजीब के साथ, मेहनत और ईमानदरी के बूते लड़कियां तरक्की मंजिलें तय कर सकती हैं । कविता, नाजिया और रेश्मा जैसी लड़कियां भी मंत्र लेकर गुरु कहकशां की तरह कामयाबी की ओर अग्रसर हैं ।
आज के दैनिक भास्कर में प्रकाशित
